Monday, December 15, 2008

यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!

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एकालाप


'न' कहने की सज़ा
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- उन्होंने जोरों से घो
षणा की :
अब से तुम आजाद हो,
अपनी मर्जी की मालिक.
 
 
- मुझे लगा,
मैं अब अपने सारे निर्णय ख़ुद लूंगी,
इन देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना  पड़ेगा.
 
 
- मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी 
कि फ़रिश्ते आ गए. 
बोले-हमारे साथ चलो.
हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे.
 
 
- मैंने इनकार कर दिया.
मेरा अकेले उड़ने का मन था..
 
 
- फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए.
उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए.
गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई.
 
 
- सर्पविष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली 
और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन 
एक एक धमनी में समाती चली गई.
 
 
- मैं तड़प रही  हूँ.
फ़रिश्ते जश्न मना  रहे हैं - जीत का जश्न.
 
 
- जब जब वे मुझसे हारे हैं 
उन्होंने यही तो किया है.
 
 
- जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी ,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा,
तब तब या तो  मुझे 
आग के दरिया में कूदना पड़ा
या उन्होंने अपने अग्निदंश से
मुझे जीवित लाश बना दिया.
 
 
- जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा
तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा
या महाभारत रचाना पड़ा.
 
 
- मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे 
कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे
कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी
कितनी बार....
कितनी बार...
 
 
- पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है
घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में ;
और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक 'ना' 
तो वे सारी नफरत 
सारा तेजाब 
उलट देते हैं मेरे मुँह पर . 
 
 
- मैं अब नरक में हूँ
अन्धकार और यातना के नरक में . 
 
 
- अब मुझे नींद नहीं आती
आते हैं जागती आँखों डरावने सपने.
नहीं,
उड़ान के सपने नहीं,
आग के सपने 
तेजाब के सपने 
साँपों  के सपने
यातनागृहों के सपने
वैतरणी के सपने .. 
 
 
- यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!


-ऋषभ देव शर्मा



Wednesday, December 10, 2008

‘लिपस्टिक ऑन हिज़ कॉलर’

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थोड़ी-सी लिपस्टिक आपके लिए भी
- शोभा डे



पिछले दिनों हमारे कुछ राजनीतिज्ञ अपने बयानों के कारण चर्चा में रहे. एक बयान दिया भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नक़वी ने. उनके बयान पर जानी-मानी लेखिका शोभा डे ने एक तल्ख टिप्पणी की हिन्दुस्तान टाइम्स में. मुझे उनकी ज़्यादातर बातें सही लगीं. शोभा डे की टिप्पणी वे लोग भी पढ़ें जो हिन्दुस्तान टाइम्स नहीं पढ़ते, इसी खयाल से मैं उस टिप्पणी का अनुवाद यहाँ दे रहा हूँ: - दुर्गाप्रसाद


हाँ, मुख्तार नक़वी जी, मैं लिपस्टिक लगाती हूँ. लेकिन, पाउडर नहीं लगाती. और हाँ, मैं उस दक्षिण मुम्बई में रहती हूँ जिसे एक अभिजात रिहायश माना जाता है (हालाँकि उसे एक अभिजात स्लम कहना ज़्यादा सही होगा). मैं अक्सर पाँच सितारा होटलों में जाती हूँ, खास तौर पर भव्य ताज महल होटल में. मैं बिना किसी संकोच के उसे अपना दूसरा घर कहती हूँ, क्योंकि वो मेरा दूसरा घर है.

ज़्यादातर मानदण्डों के अनुसार मेरी जीवन शैली को विशिष्ट कहा जा सकता है.

तो?

इन सुख सुविधाओं के लिए मैंने लम्बे समय तक कठिन श्रम किया है. इन सबको मैंने ईमानदार साधनों से जुटाया है. मुझे अमीरी विरासत में नहीं मिली और मेरा पालन-पोषण एक मध्यम वर्गीय घर-परिवार में हुआ. सभी भारतीय अभिभावकों की तरह मेरे माँ-बाप ने भी शिक्षा के माध्यम से अपने बच्चों को एक बेहतर ज़िन्दगी देने का ख्वाब देखा. हमने उनके सपनों को, और कुछ अपने सपनों को भी, साकार किया. क्या यह कोई ज़ुर्म है?


मैं गर्व पूर्वक अपना टैक्स अदा करती हूँ और अपने तमाम बिल भरती हूँ. लेकिन क्या ऐसा ही आपकी बिरादरी के अधिकाँश लोगों, जो वर्तमान समय के असली अभिजन हैं, के लिए भी कहा जा सकता है? मेरा इशारा राजनीतिज्ञों की तरफ है जिनकी जवाबदेही शून्य है लेकिन जो उन तमाम सुविधाओं का भोग करते हैं जिनके लिए वे अन्यों की आलोचना करते हैं. अपनी जीवन शैली के लिए लज्जित होने से मैं इंकार करती हूँ. कहावत है न कि बदला लेने का सबसे बढिया तरीका है बेहतर ज़िन्दगी जीना.


बहुतेरे तथाकथित नेताओं के विपरीत मेरा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. जब मैं घर से बाहर निकलती हूँ तो उम्दा कार में निकलती हूँ, लेकिन वह कार कोई चलता फिरता दुर्ग नहीं होती जिसकी रक्षा सरकारी खर्च पर पलने वाले बन्दूक धारियों का समूह किया करता है. जब मैं निकलती हूँ तो मेरे कारण ट्रैफिक को दूसरे रास्तों पर मोड़ कर औरों के लिए असुविधा पैदा नहीं की जाती. हवाई अड्डों पर दूसरों की तरह मेरी भी तलाशी ली जाती है.

इसलिए मिस्टर नक़वी, आपकी हिम्मत कैसे हुई इस तरह की अनुपयुक्त और अवांछित टिप्पणी करके मुझे (और अन्य स्त्रियों को) नीचा दिखाने की? हम लोग प्रोफेशनल हैं जो अपनी भरपूर क्षमता का प्रयोग करते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं. क्या आप भी ऐसा ही दावा कर सकते हैं? हम लोग चाहें लिपस्टिक लगायें, अपने चेहरों पर पाउडर पोतें, विग लगायें या कृत्रिम भौंहें लगायें, यह हमारा अपना निजी मामला और विशेषाधिकार है. आपकी यह टिप्पणी सिर्फ महिलाओं और विशेष रूप से उन शहरी कामकाजी महिलाओं के बारे में, जो कि आप जैसों के द्वारा निर्धारित पारम्परिक छवियों की अवहेलना करती हैं, आपके एकांगी और पक्षपातपूर्ण रवैये का दयनीय प्रदर्शन मात्र है.

आपकी और आप जैसे उन स्व-घोषित बुद्धिजीवियों जिन्होंने अभिजात लोगों को गरियाने का एक नया खेल तलाशा है, की यह टिप्पणी ऐसे वक़्त में आई है जब हमारा ध्यान अधिक महत्व के मुद्दों, जैसे घेरेबन्दी के समय में जीवित रहने की चुनौती पर, केन्द्रित होना चाहिए था. समाज के अधिक समृद्ध/शिक्षित लोगों पर इस प्रहार से एक रुग्ण संकीर्ण मानसिकता का पता चलता है.

मेरी आवाज़ की भी वही वैधता है जो एक अनाम सब्ज़ी विक्रेता की आवाज़ की है, क्योंकि हम दोनों भारत के नागरिक हैं. क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वे टी वी एंकर जो लिपस्टिक या पाउडर का इस्तेमाल नहीं करतीं, अपने काम में दूसरों से बेहतर हैं? क्या राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाली औरतों को इसलिए सौन्दर्य प्रसाधनों से परहेज़ करना चाहिए ताकि उन्हें (निश्चय ही मर्दों द्वारा) अधिक ‘गम्भीरता’ से लिया जा सके? क्या सार्वजनिक जीवन में काम करने वाली महिलाओं को इसलिए घटिया कपड़े पहनने चाहियें कि उनकी विश्वसनीयता अधिक बढी हुई नज़र आए और समाज द्वारा उन्हें जो भूमिका प्रदान की गई है वे उसके उपयुक्त दिखाई दें? क्या लिपस्टिक उनके योगदान और योग्यता का अपहरण कर लेती है?

सवाल उस महिला कोण्डोलिज़ा राइस से भी पूछा जाना चाहिए जो सालों से दुनिया की मोस्ट स्टाइलिश सूची में जगह पाती रही हैं. पूछा सोनिया गाँधी से भी जाना चाहिए जो हर वक़्त त्रुटिहीन वेशभूषा में नज़र आती हैं, और लिपस्टिक भी ज़रूर ही लगाती हैं. और हाँ, मैं अपनी नई करीबी दोस्त जयंती नटराजन को भला कैसे भूल सकती हूँ?

बहुत दुख की बात है कि वर्तमान संकट के दौरान लैंगिक भेद का मुद्दा बीच में लाकर श्री नक़वी ने सारे मुद्दों को इतना छोटा बना दिया. जॉर्ज़ फर्नाण्डीज़ ने अपनी ज़मीन उस वक़्त खो दी थी जब उन्होंने कोका कोला के विरुद्ध लड़ाई शुरू करने का फैसला किया था. नक़वी शायद अपनी लड़ाई लिपस्टिक के खिलाफ लड़ रहे हैं.


अफसोस की बात है कि मुम्बई ने जो यातना झेली उसे एक तरह के ऐसे वर्ग युद्ध तक सिकोड़ दिया गया जिसमें बेचारे अभिजन से यह आशा की जा रही है कि वे यह कहते हुए अपना बचाव करें कि “नहीं, नहीं, इस हमले में जान देने वालों के लिए हमें भी कम अफसोस नहीं है.” अब तो बड़े हो जाइए. यह एक भयावह ट्रेजेडी थी. ट्रेजेडी को भी एक ऐसे चेहरे या छवि की ज़रूरत होती है जो सामूहिक वेदना को व्यक्त कर सके. और इसी कारण ताजमहल होटल ने उस छवि, उस प्रतीक का रूप धारण किया जो पूरे देश के उस त्रास, उस वेदना, उस पीड़ा को अभिव्यक्त करता है. आप क्यों उसे वर्ग में बाँट रहे हैं?

क्या हमारे राजनीतिज्ञ पाँच सितारा होटलों में सबसे बढ़िया कमरों (और वह भी बिना कोई कीमत अदा किए) की माँग नहीं करते? कम से कम हम शेष लोग उनके लिए भारी कीमत तो चुकाते हैं. क्या भारत के मैले-कुचैले कपड़ों और झोलेवाले बुद्धिजीवी जब भी और जहाँ भी मिल जाए मुफ्त की स्कॉच पीने से बाज आते हैं? साथियों, पहले अपनी दारू की कीमत अदा कीजिए, फिर दुनिया को बचाना.


कहा जाता है कि नारायण राणे के बेटे बेंटली कारों में घूमते हैं और आठ कमाण्डो उनकी रक्षा के लिए तैनात रहते हैं. उनका खर्चा कौन उठाता है? हम जैसे शोषक! जब हमें अपने देश की छवि का अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन करना होता है तो हम अपने अरबपतियों और बॉलीवुड स्टार्स को आगे कर देते हैं. ये ही वे अभिजन हैं जो संकट के समय राहत-पुनर्वास कार्यों के लिए दिल खोलकर दान देते हैं. मुझे तो नक़वी जैसों की बातों से उबकाई आती है. मैं जैसी हूँ और जैसी नज़र आती हूँ, उसके लिए अगर कोई मुझे ‘अपराधी’ ठहराने की कोशिश करता है तो मुझे घिन आती है.


माफ़ कीजिए नक़वी जी. मेरे होंठों को देखें: लिपस्टिक ज़्यादा तो नहीं है? ज़्यादा गाढी और चमकदार? अगर आप चाहें, मुझ से थोड़ी-सी उधार ले सकते हैं.

◙◙◙
अनुवाद: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल


हिन्दुस्तान टाइम्स में शनिवार, 6 दिसम्बर को प्रकाशित आलेख ‘लिपस्टिक ऑन हिज़ कॉलर’ का मुक्त अनुवाद.

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यह अनुवाद मुझे डॉ. अग्रवाल जी ने उपलब्ध कराया हैइसके लिए उनका आभार व्यक्त करती हूँ
विषय यहीं समाप्त नहीं हो जाता. इस घटनाक्रम के कुछ पक्ष और हैं जिनकी जानकारी मुझे अत्यधिक विश्वस्त स्रोतों से प्राप्त हुई हैकिंतु उसका उल्लेख उन पर चर्चा आगामी प्रविष्टि में करूँगीअभी आप इसे पढ़ें अपनी राय बताएँ ताकि उसे भी अगली प्रविष्टि में समेटा जा सके
- कविता वाचक्नवी

Sunday, December 7, 2008

इन्हें चाँद चाहिए : स्त्री के यौनशोषण का तकलीफदेह पहलू

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परत-दर-परत

इन्हें चाँद चाहिए
राजकिशोर

अलोकप्रिय या अलोकप्रिय बना देनेवाली बात कहने से घबराना नहीं चाहिए, यह सिद्धांत 'हितोपदेश' से जरा आगे का है। प्रस्ताव यह है कि 'सत्य वही बोलो जो प्रिय भी हो' की नीति व्यक्तिगत मामलों के लिए तो ठीक है, पर सामाजिक मामलों में कटुतम सत्य बोलने की जरूरत हो तो संकोच नहीं करना चाहिए। इसी आधार पर स्त्रियों के यौन शोषण के एक तकलीफदेह पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। आशा है, मेरी नीयत पर शक नहीं किया जाएगा। लेकिन कोई शक करता भी है, तो मुझे परवाह नहीं है। यह लड़ाई सच की है और सच के मामले में निजी फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता।

तो किस्सा यह है कि यौन शोषण के हर मामले में पुरुष ही सब तरह से दोषी नहीं होता। यह सच है कि पुरुष से भी हम वैसे ही संयम की उम्मीद करते है जैसे स्त्री से। किसी स्त्री की स्थिति का लाभ उठाना महापाप है। यह हर स्त्री जानती है कि वह जैसी भी है, पुरुष कामना का विषय है। भगवान ने उसे ऐसा ही बनाया है। यदि ऐसा नहीं होता, तो इस सृष्टि या जगत के जारी रहने में गंभीर बाधा आ जाती। यह स्त्री की शक्ति भी है। प्रेम या विवाह में स्त्री की इस शक्ति और पुरुष की कामना का सुंदर समागम होता है। स्त्री-पुरुष के साहचर्य में यह समागम केंद्रीय होना चाहिए। बाकी सब छल या माया है।

स्त्री पर भी इस छल या माया का आरोप लगाया गया है। अनेक मामलों में पाया गया है कि पुरुष ही स्त्री को प्रदूषित नहीं करता, स्त्री भी पुरुष को प्रदूषित करती है। यौन जीवन के सभी सर्वेक्षणों में यह तथ्य उजागर होता रहा है कि कई पुरुषों ने स्त्रीत्व का पहला स्वाद अपने से ज्यादा उम्र की भाभी, चाची या मामी से प्राप्त किया था। मैं यह नहीं कह सकता कि यह अनैतिक है। जो बहुत-से मामले नैतिक-अनैतिक के वर्गीकरण से परे हैं, उन्हीं में एक यह है। सभी मनुस्मति या भारतीय दंड संहिता को कंठस्थ करने के बाद जीवन के गुह्य पहलुओं का ज्ञान या अनुभव प्राप्त नहीं करते। संस्कृति के साथ-साथ प्रकृति के भी दबाव होते हैं। संत वही है जो इस दबाव से मुक्त हो गया है। बाकी सभी लोग कामना और कर्तव्य के बीच झूलते रहते हैं तथा पारी-पारी से आनंद का सुख और ग्लानि का दंश महसूस करते हैं।


इसीलिए दुनिया में सच है तो धोखा भी है। कोई गुरु अपनी शिष्या को, मैनेजर अपनी अधीनस्थ कर्मचारी को और नेता अपनी अनुयायी को धोखे में रख कर यौन सुख हासिल करता है, तो वह इसलिए अपराधी है कि उसने अपनी उच्चतर स्थिति का नाजायज फायदा उठाया है। किसी अत्यंत पवित्रतावादी समाज में ऐसे अपराधियों को गोली से उड़ा दिया जाएगा। कुछ मामलों में सच्चा प्रेम भी हो सकता है, जिसका अपना आनंद और अपनी समस्याएँ हैं, पर अधिकतर मामलों में किस्सा शोषण का ही होता है। माओ जे दुंग की सीमाहीन बहुगामिता का खुला रहस्य यही है। भारत में जनतंत्र है, पर यहाँ भी ऐसे किस्से अनंत हैं। यहाँ तक कि साधु, योगी, तांत्रिक और मठाधीश भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल पाते।


लेकिन ऐसी स्त्रियों की उपस्थिति से कौन इनकार कर सकता है जो अपने स्त्रीत्व के आकर्षण का अवसरवादी लाभ उठाती हैं? वे जानती हैं कि पुरुष की नजर में वे काम्य हैं और इस काम्यता का लाभ उठाने की लालसा का दयनीय शिकार हो जाती हैं। किसी को एमए में फर्स्ट होना है, किसी को, अपात्र होने पर भी, लेक्चररशिप चाहिए, कोई चुनाव का टिकट पाने के लिए लालायित है तो किसी को, परिवार की आय कम होने के बावजूद, ऐयाशी और मौज-मस्ती का जीवन चाहिए। किसी को टीवी पर एंकर बनना है, कोई फिल्म में रोल पाने के लिए बेताब है, कोई अपनी कमजोर रचनाएँ छपवाना चाहती हैं, किसी को जल्दी-जल्दी प्रमोशन चाहिए तो कोई लाइन तोड़ कर आगे बढ़ना चाहती है। कोई-कोई ऐसी भी होती है जो खुद पीएचडी का शोध प्रबंध नहीं लिख सकती और अपने प्रोफेसर-सुपरवाइजर से लिखवा कर अपने नाम के पहले डॉक्टर लिखना चाहती है। ज्यादा उदाहरण देना इसलिए ठीक नहीं है कि हमें समाज का बखिया उधेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। पर यह जरूर याद दिलाना चाहते हैं कि जिस स्त्री शक्ति के परिणामस्वरूप ये सारी इच्छाएँ आनन-फानन में पूरी की जा सकती हैं, उसी का राजनीतिक उपयोग करते हुए सामंती काल में सुंदर कान्याओं को विष का क्रमिक आहार देते हुए और उसकी मात्रा बढ़ाते हुए विषकन्या का करियर अपनाने के लिए बाध्य किया जाता था। आज भी जासूसी के काम में स्त्रियों को लगाया जाता है। जिस आकर्षण का दुरुपयोग वे राज्य के काम के लिए कर सकती हैं, उसका अनैतिक इस्तेमाल वे अपने अवैध स्वार्थों की पूर्ति के लिए क्यों नहीं कर सकतीं?


एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता। बहुत-सी ऐसी स्त्रियाँ भी यौन हेरेसमेंट का शिकार बनाए जाने की शिकायत करती हैं जिन्होंने यह हरेसमेंट काफी दिनों तक इस उम्मीद में सहन किया कि उनका काम हो जाएगा। जब काम नहीं बनता, तो वे शिकायत करने लगती हैं कि मेरा शोषण हुआ है या मुझे परेशान किया गया है। मुझे रत्ती भर भी संदेह नहीं कि ऐसे मामलों में भी पुरुष ही अपराधी है। लेकिन यह सोच कर कम दुख नहीं होता कि कि हमारी बेटियाँ-बहनें इस जाल में अपनी मर्जी से दाखिल ही क्यों होती हैं। 'हम प्यार में धोखा खा बैठे' -- यह एक स्थिति है। दूसरी स्थिति यह है कि यह धोखा जान-बूझ कर खाया गया, क्योंकि नजर कहीं और थी। यह एक ऐसा मायावी संबंध है, जिसमें दोनों शिकार होते हैं और दोनों ही शिकारी।


कुल मिला कर स्थिति बहुत ही पेचीदा है। पुरुष की ओर से पेच ज्यादा हैं, पर कभी-कभी स्त्री भी पेच पैदा करती है। इसलिए 'सब धान तेइस पसेरी' का सोच एकांगी है। फिर भी, स्त्रियों का दोष कम करके आँका जाना चाहिए, क्योंकि वे जन्म से ही अन्याय और भेदभाव का शिकार होती हैं तथा अनुचित तरीके से अवैध लाभ हासिल करने के लालच में पड़ जाती हैं। ये अगर चाँद की कामना न करें, तो इनकी गरिमा को कौन ठेस पहुंचा सकता है?

Monday, December 1, 2008

हर औरत काँपती है

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एकालाप (१३) : स्त्रीविमर्श







हर औरत काँपती है



आज मैं काँप रही हूँ
सदा ऐसा ही होता है
जब जब वे लड़ते हैं
मैं काँपती रहती हूँ





वे लड़ते हैं
लड़ना उनकी फ़ितरत है
कभी ज़र के लिए
कभी जोरू के लिए
कभी ज़मीन के लिए
कभी जुनून के लिए




वे लड़ते हैं
लड़कर उन्हें संतोष मिलता है
कभी शहीद होने का
कभी जीत के जश्न का
कभी स्वर्ग की लिप्सा का
कभी राज्य के भोग का




वे लड़ते हैं
लड़ाई उन्हें महान बनाती है
कभी वे शवाब कमाते हैं
कभी जेहाद करते हैं
कभी क्रांति लाते हैं
कभी तख्ता पलटते हैं




लड़ते वे हैं
काँपती मैं हूँ





लड़े कोई भी
मरे कोई भी
काँपना मुझी को है हर हाल में




वे जिनका खून बहाते हैं
मैं उन सबकी माँ हूँ न
वे जिसके परखचे उड़ाते हैं
वह मेरा सुहाग है न
वे जिससे बलात्कार करते हैं
वह मेरी कोखजनी है न




मुझे काँपना ही है हर हाल में -




वे जो खून पीते हैं
वे जो नरमेध करते हैं
वे जो बलात्कारी हैं
मैं उनकी भी तो माँ हूँ
मैं उनकी भी तो बेटी हूँ
मैं उनकी भी तो बहन हूँ




मैं काँपती हूँ-




उनके लिए मैं माँ नहीं रही न
न बेटी, न बहन
रिश्ते तो मनुष्यों के होते हैं
दरिंदों के कैसे रिश्ते - कैसे नाते




दुनिया को अपने रंग में रंगने का उन्माद
जब जब
मनुष्यों को दरिंदों में तब्दील करता है
तब तब मैं
काँपती हूँ



हर माँ काँपती है
हर औरत काँपती है
और शाप देती है
अपनी ही संतानों को




मैं फिर काँप रही हूँ (26 नवंबर की रात से)
और दे रही हूँ शाप
उन सारी आदमखोर संतानों को
जो दरिंदों में तब्दील होकर
लील रही हैं मनुष्यों को!

- ऋषभदेव शर्मा



Saturday, November 22, 2008

स्त्री के हमदर्दों की पोलमपोल

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मारे आसपास अनेक ऐसी घटनाएँ नित घटती रहती हैं, हम उन पर क्षोभ व्यक्त व्यक्त करते या जुगाली करते या रुचिपूर्वक आगे से आगे बढ़ाने के काम के अतिरिक्त कुछ नहीं करते हैं | किसी सकारात्मक पहल या जनचेतना की पहल का तो कहना ही क्या? संभवतः अधिकांश के मन में तब तक प्रतिरोध की भावना भी नहीं पनपती जब तक उनके अपने जीवन या सम्बन्धियों के साथ ऐसा नहीं हो जाता| आश्चर्य की बात नहीं की सम्बन्धियों के साथ ऐसा हो जाने के पश्चात भी घटना को दबा -छिपा देने वाला अनुपात बहुत बड़ा होगा| इतनी दुरभिसंधियों और प्रतिकूलताओं के पक्ष में खड़े हुए हम किस आधार पर सामाजिक परिवर्तन की अपक्षा करते हैं? हमने अपने देश की आधी ऊर्जा को तो अपनी ऐसी अकर्मण्यताओं अथवा शोषण के कारण कुंठित कर दिया ! फिर भला कैसे तो परिवार की या देश समाज की आने वाली पीढ़ी सजग उच्च मानवीय बोध वाली हो सकती है? ऐसी ही घटनाओं पर कम से कम कलम तो उठाइये| स्त्री से हमदर्दी जताने वाले अथवा उसके नाम पर अपने मठ पोसने वाले सामुदायिक संगठन और व्यक्ति कहाँ हैं? स्त्री से हमदर्दी केवल उसका उस से लाभ उठाने की भावना या गतिविधि से ही तो नहीं संचालित हो रहा, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है |

- कविता वाचक्नवी
*************



परत-दर-परत

वर्ग एकता का एक नमूना
- राजकिशोर

यह किस्सा दिल्ली का ही है, लेकिन आप चाहें तो इसे देश के किसी भी विश्वविद्यालय का किस्सा मान सकते हैं। हुआ यह कि एक सीनियर प्रोफेसर पर एक लड़की ने इलजाम लगाया कि उसने मेरे साथ "सेक्सुअल हैरेसमेंट" किया है। लड़की एमफिल करना चाहती थी। अपनी यह वैध इच्छा पूरी करने के लिए उसे प्रोफेसर की अनेक अवैध इच्छाएँ सहन करनी पड़ीं। जब वह रोज-रोज के इस हैरेसमेंट से आजिज गई, तो एक दिन उसने तय किया कि इस सिलसिले को रोकने के लिए अब कुछ करना ही चाहिए। उसने विश्वविद्यालय के अधिकारियों से लिखित शिकायत कर दी। प्रमाणस्वरूप अनेक विश्वसनीय साक्ष्य पेश किए। जाँच चल रही है। नतीजा क्या आएगा, यह अनुमान से परे है, क्योंकि हमारे देश में अदालत के बाहर न्याय एक विरल घटना है।


इसके बाद की घटनाएँ इससे ज्यादा दुखद हैं। जिस प्रोफेसर मित्र से इस घटना की जानकारी मिली, उनसे मैंने अनुरोध किया कि वे अभियुक्त प्रोफेसर को तुरंत इस्तीफा देने के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते। अकेले सफल होने की संभावना दिखती हो, तो समूह में जा कर उनसे बिनती करें। कारण यह कि मामला सार्वजनिक हो जाने के बाद भी अभियुक्त प्रोफेसर में परिताप का कोई भाव पैदा नहीं हुआ है। दूसरे, सरस्वती के मंदिरों में मूल्यों का सम्मान नहीं होगा, तो कहां होगा? लेकिन मेरे मित्र चुप रहे। उनकी कसमसाहट बता रही थी कि प्राध्यापक बिरादरी का मामला है, इसलिए चुप रहना ही ठीक है। कानून को अपना काम करने दिया जाए।


कानून अपना काम करना होता, तो इस तरह की घटनाएँ बढ़तीं ही क्यों? कानून से कोई नहीं डरता, क्योंकि कानून लागू करने वालों ने डर का वातावरण नहीं बनाया है। ऐसी स्थिति में पेशा विशेष के लोग ही अपने कुछ आंतरिक नियम बना सकते हैं और उन्हें लागू कर सकते हैं। पत्रकारों से लगातार कहा जाता है कि वे अपनी आचार संहिता खुद बनाएं। यह बात शिक्षकों पर भी लागू होती है। कानूनी प्रावधानों के अलावा एक नैतिक आचार संहिता भी होनी चाहिए जिसके पालन की जिम्मेदारी शिक्षक समुदाय संभाले। वास्तव में यह आचार संहिता तभी से अस्तित्व में है जब से गुरु-शिष्य का संबंध शुरू हुआ है। यह भी सच है कि इस संहिता का तभी से उल्लंघन भी होता रहा है। यह दुर्भाग्य हर संहिता के साथ जुड़ा हुआ है। कानून बनेगा तो तोड़ा भी जाएगा। यह चिंता की बात नहीं है। देखना यह चाहिए कि किसी समाज या शहर में कानून तोड़ने वालों की संख्या घट रही है, स्थिर है या बढ़ रही है। अफसोस है कि शिक्षकों द्वारा छात्र-छात्राओं के शोषण की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली में ही पिछले एक वर्ष में बहुत-से ऐसे मामले मीडिया में चुके हैं। पता नहीं कितने मामलों में शोषित लड़कियों ने अपनी संकोची जबान सिल रखी है। लड़कियां या स्त्रियां पुरुषों के अतिक्रमणों को चुपचाप सह लेती हैं और शोर नहीं मचातीं, इसका फायदा उठाने की परंपरा बहुत लंबी है। इस लिहाज से हम उस लड़की के अंतत: जाग उठे साहस की प्रशंसा करते हैं जिसने यह मामला विश्वविद्यालय के अधिकारियों को जांच के लिए सौंप दिया है। अन्याय पर चुप्पी साध लेना अन्यायी का साथ देना है।


चिंता का विषय यह भी है कि विश्वविद्यालय का शिक्षक समाज विचलित तो है, पर चुप भी है। निजी बातचीत में सभी कहते हैं कि यह प्रोफेसर दोषी है, पहले भी इस तरह के कांड करता रहा है और इसके सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन जब सामूहिक कार्रवाई की बात उठाई जाती है, तो सभी बगलें झांकने लगते हैं। यह रवैया पुरुष एकता की एक बुरी मिसाल है। सबको ब्लैकमेल और शोषण की शिकार लड़की से सहानुभूति है। लेकिन कोई नहीं चाहता कि प्रोफेसर की नौकरी चली जाए। लड़की का आत्मसम्मान धीरे-धीरे बहाल हो जाएगा, लोग इस घटना को भूल जाएंगे, पर इस प्रोफेसर का क्या होगा? फिर, लड़कियों में अनुचित दिलचस्पी लेने की यह अकेली घटना नहीं है। आज एक के फटे में टांग अड़ाई जाएगी, तो कल दूसरों की भी बारी सकती है। शायद ऐसे ही कारणों से पुरुष प्रोफेसर सक्रिय होना नहीं चाहते। लेकिन महिला प्रोफेसरों को कुछ करने से कौन रोक रहा है? वैसे तो महिलाओं के दमन, शोषण आदि की चर्चा खूब होती है, इस विषय पर लंबे-लंबे प्रबंध लिखे जाते हैं। लेकिन एक सताई गई लड़की को न्याय दिलाने के लिए विश्वविद्यालय का स्त्री शिक्षक समुदाय भी आगे नहीं रहा है। अगर ऐसी ही घटना किसी महिला प्रोफेसर के साथ हुई होती, तो हम सब देखते कि रोज कितनी ढोलें बज रही होतीं। हम एस वर्ग एकता के सदके जाते हैं।


इस तरह की ट्रेड यूनियनी एकता सभी वर्गों, पेशों और समुदायों में देखी जाती है। चिकित्सक चिकित्सकों की गलतियां छिपाते हैं, पुलिस पुलिस का बचाव करती है, नेता नेता का साथ देता है और अफसर अफसर के काम आता है। मजदूर को मजदूर में कोई कमी दिखाई नहीं पड़ती, दलित हर हाल में दलित के साथ होता है, दुकानदार दुकानदारों का और उद्योगपति उद्योगपतियों का पक्ष लेते हैं। यह क्या है? क्यों है? न्याय-अन्याय के प्रश्न ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या समुदायगत स्वार्थ के? हम अभी तक स्वार्थ और हित के बीच फर्क करने की तमीज नहीं जुटा पाए हैं। जो समुदाय अपने दोषी सदस्यों का बचाव करता है, वह अपने समुदाय के अपराधीकरण को प्रोत्साहित करता है।


यहां भक्तराज विभीषण की याद आती है। वे लंका के चंद व्यक्तियों में थे जो मानते थे कि रावण कुमार्ग पर चल रहा है। विभीषण ने अपने कुपथगामी भाई को समझाने की बहुत कोशिश की। इसका नतीजा यह हुआ कि विभीषण को लंका छोड़नी पड़ी। बाद में रावण मारा गया और विभीषण को सत्य का पक्ष लेने और उसके लिए सुविधाओं का त्याग करने का पुरस्कार मिला। विभीषण ने राज्य के लोभ में नैतिक दृढ़ता नहीं दिखाई थी -- उन्होंने परिणामों की चिंता किए बगैर ईमान का काम किया था। लेकिन भारत की जनता ने आज तक विभीषण को माफ नहीं किया है। उन्हें इन्हीं शब्दों में याद किया जाता है - घर का भेदी लंका ढाहे। यह स्वार्थ बुद्धि है। न्याय की खातिर कोई भी सही कदम उठाना जायज है। पाप का भंडा फोड़ने के लिए आज विभीषणों की जरूरत जितनी ज्यादा है, उतनी पहले कभी नहीं थी।

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