Tuesday, September 30, 2008

राजा- रानी आधा -आधी

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भाग
पिता की संपत्ति में हिस्सा इस तथ्य की याद दिलाता है कि वह संपत्ति माता-पिता की नहीं है, सिर्फ पिता की है। पिता के मरने के बाद ही माँ को उसका एक हिस्सा मिल पाता है -- उसकी संतानों के साथ, लेकिन पिता के जीते जी उसकी संपत्ति में माँ का कोई हिस्सा नहीं होता। वह सर्वहारा का जीवन जीती है। यही नियति उसकी बेटियों की होती हैं। जब वे एक नए परिवार में शामिल होती हैं, तो उस नए परिवार में चाहे जितनी संपत्ति हो, उनकी अपनी हैसियत अपनी माँ जैसी हो जाती है -- धन और संपत्ति से विहीन।





राजा-रानी आधा-आधी
- राजकिशोर




बहरहाल, बहुत कम परिवार ऐसे हैं जहाँ बेटियों के इस हक का सम्मान होता है। इसका एक कारण तो परंपरा है, जिसमें बेटी के कोई कानूनी अधिकार नहीं होते थे। उसे पराया धन माना जाता रहा है (अब भी माना जाता है), जिसका उचित स्थान उसकी ससुराल में है। मायके में वह आती-जाती रह सकती है, पर वहाँ की किसी चीज में वह हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जो उसका घर ही नहीं है, उस पर उसका क्या हक। लेकिन समानता का कानूनी अधिकार मिल जाने के बाद भी उसकी बुनियादी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। अगर वह अपना हिस्सा माँगती है, तो मायके के सारे लोग, उसके भाई, विधवा माँ आदि, उसके खिलाफ हो जाते हैं और उसे धन पिशाचिनी मानने लगते हैं। इस डर से ऐसे दावे अकसर नहीं किए जाते। परंपरा कानून पर भारी पड़ती है। लेकिन कभी-कभी ऐसे दावे होते भी हैं और तब मामला अदालत में पहुँच जाता है।



पिता की संपत्ति में हिस्सा इस तथ्य की याद दिलाता है कि वह संपत्ति माता-पिता की नहीं है, सिर्फ पिता की है। पिता के मरने के बाद ही माँ को उसका एक हिस्सा मिल पाता है -- उसकी संतानों के साथ, लेकिन पिता के जीते जी उसकी संपत्ति में माँ का कोई हिस्सा नहीं होता। वह सर्वहारा का जीवन जीती है। यही नियति उसकी बेटियों की होती हैं। जब वे एक नए परिवार में शामिल होती हैं, तो उस नए परिवार में चाहे जितनी संपत्ति हो, उनकी अपनी हैसियत अपनी माँ जैसी हो जाती है -- धन और संपत्ति से विहीन। इसका सबसे दुखद परिणाम तब सामने आता है, जब तलाक की नौबत आती है। तलाक के बाद उसे अपनी पति की संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं मिलता। उसे अगर कुछ मिलता है, तो सिर्फ गुजारा भत्ता या तलाक भत्ता (एलिमनी)। आजकल, कम से कम पश्चिम में, विवाह के वक्त ही अकसर यह तय कर लिया जाता है कि तलाक की स्थिति में एलिमनी की रकम क्या होगी। मुस्लिम विवाह में इसे मेहर कहते हैं। तलाक देने के बाद शौहर को मेहर की रकम देनी पड़ती है। पूर्व-निर्धारित एलिमनी और मेहर में एक पेच यह है कि विवाह के बाद शौहर की आमदनी कई गुना बढ़ जाए, तब भी इस रकम में कोई वृद्धि नहीं होती। औरत की जो कीमत एक बार तय हो गई, वह हो गई। पति चाहे जितना मालदार हो जाए, पत्नी का मेहर-मूल्य नहीं बदलता। दूसरी बात यह है कि जिस शख्स में मेहर चुकाने की जबरदस्त क्षमता हो, वह शादी पर शादी कर सकता है। कहते हैं, मुसलमान पुरुषों को चार शादियां तक करने की छूट है। लेकिन यह सीमा एक समय में चार तक लागू होती है। एक को तलाक दे कर दूसरी शादी करने की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए मुस्लिम पुरुष चाहे तो अपने जीवन काल में एक के बाद एक कर सैकड़ों शादियां कर सकता है। एक-विवाह की परंपरा ईसाइयत की देन कही जाती है। लेकिन अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि में हर पुरुष और हर स्त्री औसतन तीन विवाह करते हैं। मरलिन मुनरो ने शायद पंद्रह या सोलह विवाह किए थे। इस कायदे को क्रमिक बहु-विवाह माना जाता है, जिससे एक-विवाह की प्रथा भी बनी रहती है और बहु-विवाह की स्वतंत्रता भी।
(क्रमश: )>>>>

Tuesday, September 23, 2008

राजा-रानी आधा-आधी

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राजा-रानी आधा-आधी
- राजकिशोर






राजा-रानी का मुहावरा सुनने में बहुत मधुर लगता है। यह आभास भी होता है कि दोनों की हैसियत एक बराबर है। लेकिन इससे बड़ा भ्रम कुछ और नहीं हो सकता। राजा रानी का पति नहीं है, बल्कि रानी राजा की पत्नी है। राज्य का स्वामी राजा है, रानी का उसमें कोई हिस्सा नहीं है। रानी के आने के पहले भी राजा राजा था, लेकिन राजा से परिणय के पहले रानी रानी नहीं थी। यानी राजा रानी के रुतबे में कुछ वृद्धि करता है, पर रानी राजा के रुतबे में कोई वृद्धि नहीं करती। वह राजा के गले में पड़ी हुई माला की तरह है, जिसे राजा जब चाहे गले से निकाल कर फेंक सकता है। दिनकर की एक बहुत खूबसूरत कविता में कहा गया है --



राजा वसंत, वर्षा ऋतुओं की रानी
लेकिन, दोनों की कितनी भिन्न कहानी
राजा के मुंह में हंसी, कंठ में माला
रानी का अंतर विकल, दृगों में पानी।

और यह कोई नई बात नहीं है। दिनकर आगे कहते हैं --


लेखनी लिखे, मन में जो निहित व्यथा है
रानी की सब दिन गीली रही कथा है
त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूं
राजा-रानी की युग से यही प्रथा है।


यही बात प्रत्येक युगल -- जो राजा-रानी का ही एक रूप है -- पर लागू होती है। विवाहित स्त्री ज्यादा से ज्यादा स्त्रीधन की अधिकारिणी है। यह वह धन है जो स्त्री को विवाह के समय उपहार में मिलता है। उपहार देनेवाले उसके माता-पिता तथा अन्य संबंधी हो सकते हैं, मित्र और परिचित हो सकते हैं तथा ससुराल पक्ष के लोग भी हो सकते हैं। आम तौर पर यह स्त्रीधन भी ससुराल की सामूहिक संपत्ति का हिस्सा बन जाता है और उस पर विवाहित स्त्री अपना कोई दावा नहीं कर सकती। इस तरह स्त्री को सर्वहारा बना कर छोड़ दिया जाता है। लेकिन विवाद के समय वह चाहे तो स्त्रीधन अर्थात अपनी निजी संपत्ति को वापस माँग सकती है। व्यवहार में जो भी होता हो, कानूनी स्थिति यही है।

आम तौर पर यह स्त्रीधन भी ससुराल की सामूहिक संपत्ति काहिस्सा बन जाता है और उस पर विवाहित स्त्री अपना कोईदावा नहीं कर सकती। इस तरह स्त्री को सर्वहारा बना करछोड़ दिया जाता है। लेकिन विवाद के समय वह चाहे तोस्त्रीधन अर्थात अपनी निजी संपत्ति को वापस माँग सकती है।व्यवहार में जो भी होता हो, कानूनी स्थिति यही है।




आजकल हमारे देश में विवाद का एक नया विषय खड़ा हो गया है। नया कानून यह है कि पिता की संपत्ति में बेटियों का भी हक है। अभी तक माना जाता था कि विवाह के समय दान-दहेज के रूप में बेटी को जो दिया जाता है, वह एक तरह से पिता की संपत्ति में उसका हिस्सा ही है। विवाह के बाद उसके प्रति उसके मायकेवालों की कोई आर्थिक जिम्मेदारी नहीं रह जाती। दहेज-मृत्यु की घटनाओं को देखते हुए यह बात अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत होती है। आज हजारों विवाहित महिलाऐं जीवित होतीं, अगर उनके माता-पिता ने उनकी ससुराल के धनपशुओं की माँग स्वीकार कर ली होती। लेकिन कानून में परिवर्तन ने स्त्रियों की वैधानिक स्थिति थोड़ी मजबूत कर दी है। अब पिता की संपत्ति में उनका हक उनके भाइयों के बराबर हो गया है।

( क्रमश: )>>>



Saturday, September 20, 2008

पीली आँधी : प्रभा खेतान

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पुस्तक के कुछ अंश


यह न आत्मकथा है और न परकथा। इस उपन्यास में कोई एक परिवार नहीं, इसमें कुल हैं, कबीला है...संयुक्त परिवार है....मगर सब कुछ टूटता हुआ, उड़ती हुई रेत के ढूहें जैसे स्त्री-पुरुष और उनकी किरकिराती हुयी रेतीले क्षण। तीन पीढ़ियों की स्त्रियां; चाची, बड़ी मां और सोमा, अपनी-अपनी बात कहते हुए भी खामोशी की धुन्ध में खोती हुई। मगर एक चीज जो सब को जिन्दा रखती है-वह है प्रेम। चाहे वह राजस्थान की सुनहली रेत हो या बंगाल की हरित्तमा-यह प्रेम ही तो है जो हम सब की पहचान है।

जो हमारे आपके सबके-सबके हृदय में धड़कता है और धड़कता रहेगा। बंगाल की बारिश में, कीचड़ और कादे से सनी हुई सड़कें राजस्थान के पदछापों की धड़कन सुनेगी और कहेगी-अरे ! यह पीली आंधी यहां बंगाल में क्या कर रही है ?





पीली आंधी

माचे पर लेटे-लेटे वृद्ध सेठजी ने करवट बदली और पास बैठी वृद्धा सेठानी की ओर देखा। सूत कातते हुए वृद्धा के हाथ रुक गए। सर का पल्लू ठीक करते हुए उसने चेहरा घुमाकर ध्यान से पति की ओर देखा। फिर सेठजी से पूछा-‘‘क्या बात है ? कुछ चाहिए क्या ?’’
‘‘पानी !’’
‘‘छाछ पी लीजिए ना ! पानी तो घड़े में थोड़ा कम ही है।’’

‘‘नहीं, मुझे पानी चाहिए। आज बार-बार पानी की जरूरत महसूस हो रही है।’’ वृद्ध ने पगड़ी के छोर से ललाट को पोंछा और सूखे होंठों को जीभ से तर करते हुए पूछा-‘‘रामेसर और किशन की कोई खबर आई ?’’

‘‘नहीं।’’ संक्षिप्त उत्तर था। ठंडी उसांस के साथ वृद्धा ने चरखे को परे सरकाते हुए फिर पति से कहा-‘दिन भर आए-गयों का तांता लगा रहता है। बात करते रहेंगे तो गला नहीं सूखेगा ? आज सुबह से चार बार तो पानी पी चुके हैं। थोड़ा छाछ से भी प्यास बुझाने की कोशिश कीजिए ना !’’

‘‘नहीं मुझे पानी चाहिए।’’ जिद्दी बच्चे की तरह मचलते हुए वृद्ध ने कहा।

बातचीत की आवाज सुनकर अब तक घर की छोटी बीणनी घंघूट काढ़े सामने आकर खड़ी हो गई। वृद्धा सेठानी ने लाड़ से अपनी इस छोटी बीणनी की ओर देखा। चटख रंग के गुलाबी घाघरे पर हरी लहरिये का ओढ़ना जिस पर छोटे-छोटे सच्ची चांदी के कटोरी वाले तारे जड़े थे, आंगी की बांहों पर चौड़ा सुनहला गोटा चमक रहा था, पैरों में चांदी की बिछिया और कड़ा, कमर में सोने की भारी तगड़ी, गले में सोने का सतलड़ा हार, गोरी कलाइयों में सोने-मीने की पछेली और लाल चूड़े से कोहनी तक भरी हुई थी। बोरला, फोणी, नाक का जड़ाऊ नथ घूंघट की झीनी आड़ से चमक रहा था। उन्होंने मन ही मन सोचा कि, बीणनी ने कौन-सा बोरला और खैंचा लगा रखा है ?

कहीं वह मोतियों वाला तो नहीं लगा लिया ? और कहीं मोती की लड़े टूट जाएं ? मोती बिखर जाए तो ? टाबर है, भोली है, कुल चौदह बरस की तो है। चार बरस पहले ही तो मुकलावा लेकर आई थी।

उनको अपनी यह छोटी बीणनी बहुत ही प्यारी लगती। गोरा खुलता हुआ रंग, गोल मुखाकृति स्थिर दृष्टि कोमल हंसी और थोड़ा नाटा कद। बीस दिन हुए बीणनी के माथे में घी दबाकर मोम चिपका कर नेवगण सिर गूंथी करके गई सो वापस आने का नाम नहीं। आकर भी क्या करे ?
सिर नहाने का पानी कहां ? नहाने के लिए अभी पानी की बरबादी करे भी कैसे ? बर्तन तक तो बालू से रगड़कर चमका लेते हैं।
बीणनी के पैरों की ओर उन्होंने देखा। चांदी की बिछिया और चांदी का कड़ा। एक ठंडी सांस अजाने ही निकल गई। कहां गए वे पुराने दिन ? इस बिचारी ने तो कुछ देखा ही नहीं। मेरी सासूजी और तायसजी तो पांवों में सोने के कड़े पहनती थीं, महाराजा गंगा सिंह जी के हुकुम से। ब्याह के बाद पहनाया तो मुझे भी गया था। लेकिन खोल कर रख देना पड़ा।

उन्होंने अपने रेजा का कत्थई रंगवाला फूलपत्ती की छपाई के घाघरे की ओर देखा, और फिर उनकी आंखों के सामने मलमल और सिल्क के सुंदर रंग-रंगीले रेशमी घाघरे घूम गए। पीले, पोमचा, लहरिया सतरंगिया ओढ़नी पर कारचोबिये का काम होता, बेल-बूटी लगी होती, रंग-बिरंगी आंगियों की बांहों में चौड़ा गोठ किनारा रहता। सेठजी पचरंगी पगड़ी और लाल अचकन पहनते।

राजा साहब के यहां पर एक बार जलसे में सासूजी के साथ गई थी। वही से तो जब भी बुलावा आता, मांजी तो गहने की पेटी खोलकर बैठ जातीं। उस दिन तो उन्होंने मुझे सच्चे मोतियों वाला सतलड़ा हार पहनाया था। मैं जब राणी साहिबा के सामने प्रणाम करने झुकी तो मोतियों की आब पर उनकी नजर ठहर गई। मांजी से वे पूछ ही बैठीं-
"यह मोतियों का हार तो बहुत सुंदर है। कहां से मंगवाया है ?"

"जी मालवे की गद्दी पर कोई व्यापारी लेकर आया था। बड़े सेठजी ने खरीद कर रख लिया था कि, कावे-ढीचे पर काम आएगा। मेरी सासूजी ने मुंह दिखाई में इसको मुझे पहनाया। आज मैंने बीणनी से कहा, "तू पहन ले।"
बगल में बैठे पासवानजी ने फरमाया-" सेठानीजी, बीणनी, आपकी बहुत सोणी, उस पर से यह फालसाई रंग का उसका ओढ़ना भी अच्छा लग रहा है।"

जब राणी साहिबा और पासवान की आंखें मुझ पर गड़ीं रहीं तो ठकराणियों की तो क्या बात करें ? वापस घर आकर मांजी ने पहले तो मेरी नजर उतारी और फिर काकोजी से सारी कहानी कह सुनाई। सुसराजी तो ठहरे स्याणे, आदमी तुरंत चुरू की गद्दी पर ओढ़ने का आर्डर भेजा गया, और मांजी से बोले कि, अपने को तो यह बेशकीमती हार राणी साहिबा को नजराने में देनी होगी। बात यह है कि, सेठाणी तुम समझ लो कि राणी की नजर जिस पर पड़े वही उसका नजराना होता है। मोतियों का कंठा लेकर सासूजी खुद गई थीं
और ओढ़ना भेजा गया था, पासवानजी के पास।
उन्होंने प्रत्यक्ष में पति से पूछा-"हां...जी ! आपको वह मोतियों के कंठे की याद है ना ?"
"तेरी मति कहां चली गई ? मैं पानी के लिए छटपटा रहा हूं और तू कौन से कंठे का जिकरा लेकर बैठ गई ?" सेठजी एकदम से झल्ला उठे।

छोटे बेटे किशन की बीणनी एक कदम और आगे बढ़ी, चुड़ले की आवाज सुनकर सास ने कहा-"बीणनी काकोजी पानी मांग रहे हैं, एक गिनौड़ा डाल देना, प्यास कम लगेगी।"

"दादी, मैं भी एक गिनौड़ा चूसूंगा...!" बाहर से दौड़कर आते हुए माधो ने कहा।
"तू राम मारया ! इत्ती लाय में बाहर क्या कर रहा था ?"
"दादी तिबारे में ही तो था, भायलो के साथ गिल्ली-डंडा खेल रहा था।" अब वह वापस मचल रहा था-"दो....ना....दादी, गिनौड़ा दो....ना, तुम तो गिनौड़ा छुपा कर रखती हो।"

"दे बीणनी दोनों छोरों को एक-एक गिनौड़ा दे दे। चूसते रहेंगे तो प्यास कम लगेगी।"
"जी !" कहते हुए बीणनी, चौके की ओर वापस मुड़ गई। मांचे के पास जमीन पर बैठा खेलता हुआ बच्चा अपनी मां को यों पलटते देख जोर से चिंघाड़ उठा।

"अरे गीगा क्यों रो रहा है ? ज्यादा रोएगा तो गला और सूखेगा।" सेठजी ने कहा।
"हो जाएगा चुप, अभी हो जाएगा।" कहते हुए उन्होंने बच्चे को गोद में बैठा लिया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए वृद्धा सेठानी वापस अपने ख्यालों में खो गई-

छोटी बीणनी के पीहर वालों ने मुकलावा अच्छा दिया था। नवलगढ़ वालों की हैसियत अच्छी है। बस सासू की तील थोड़ी हल्की थी, लेकिन जाने दो क्या फायदा मन में शिकायत रखकर, बड़ी बीणनी के पीहर से तो वह भी नहीं आता। छोटकी के मुकलावे के दस दिन बाद ही तो दोनों बेटे दिसावर चले गए थे। कमाई के लिए जाना ही पड़ता। कोई उपाय भी तो नहीं, लेकिन अबकी यात्रा और लंबी थी-"रायबक्सगंज तक की। किशन तो साथ जाता ही। लेकिन किशन ने तो बस बेटा होने की खबर ही सुनी है,
उस समय जो दोनों भाई गए तो फिर गांव लौटकर ही कब आए ? अबकी तो आते ही दो काम बड़े करने हैं-एक तो खिचड़ी का नेग और दूसरे सालासारजी जाकर "गीगे" का जड़ुला (मुंडन) करवाना है, साथ में परोजन का भी नेग होता है। लेकिन दोनों नेग एक साथ करेंगे ना, तो किशन के सासरले सासू की तील हल्की कर देंगे। इससे तो अच्छा है कि जात-जडुला बाद में कर लेवें।
इसी बहाने बेटों में रामेसर नहीं तो कम से कम किशन को तो गांव जल्दी ही आना होगा। गीगा तीन का हो गया, पांचवां लगते ही मैं तो जड़ुला करवा दूंगी। इसकी अभी से ही चोटी गूंथनी पड़ती है। बालों में खेलते-कूदते बालू ही बालू भर जाती है।
वृद्धा सेठानी की एक ठंडी सांस कमरे में फैली गर्म हवा के साथ ठहर गई। अपने-आप में मां की प्रतीक्षा थी-बेटों के लिए। जाते समय उन्होंने बेटे रामेश्वर से पूछा भी था, "क्यों बेटा मिर्जापुर नहीं जाओगे ?"

"नहीं मां, वहां अब पहले वाली कमाई नहीं। हमें तो रायबक्सगंज से भी और आगे जाना होगा। कंपनी सरकार तक। देख नहीं रही हो कि, घर में खाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।"
"एक ही तो पोता है, दस वर्ष का।" प्यार से अपने बड़े पोते माधो के सर पर हाथ फेरते हुए उन्होंने बेटे से कहा था। दादी की ममता से माधो खिल उठा था।

"जी, दस महीने में छोटकी बीणनी के एक और आ जाएगा।" घूंघट को सामने खींचते हुए बड़ी बीणनी ने कहा था।
"देखो लंगड़िया बाबा की किरपा होगी तो। कहां बेटे पड़े हैं, तुम तो दस बरस में एक ही पैदा करके थक गई।"
घूंघट के अंदर एक ठंडी सांस थी। बिना कुछ कहे भी वृद्धा सास इन उसांसों का अर्थ समझती थी। बड़ा बेटा रामेश्वर देश में रह ही कहां पाया ? तीन-तीन बरस की लंबी दिसावरी।

पति-पत्नी साथ रहें तब ना बच्चे हों। अफीम के कारोबार से सेठजी ने पैसा तो कमाया ही था। लेकिन अब उनका गिरता हुआ स्वास्थ्य और दिन-दिन भर अम्मल पानी के नशे में मांचे पर पड़े रहना। नाई, ब्राह्मण, यार दोस्तों का जमघट लगा ही रहता।
‘‘दादी प्यास लगी है।" अब पानी मांगने की माधो की बारी थी।
"दिन भर उछल-कूद करेगा तो प्यास नहीं लगेगी ? जा, चाची से मांग कर छाछ पी लो।" फिर मानो अपने आप से बोली-"गला तो सभी का सूख रहा है, लेकिन घर में पानी कहां ?"
"क्यों ?" वृद्ध सेठजी की सफेद भौंहों में बल पड़ गए।

"बड़ी बीणनी दो दिन से बुखार में तप रही है, छोटी बीणनी की आंखें देर से खुली, तब तक गांव की लुगाइयां नोहर की ओर चली गई थीं।"
"लेकिन तू क्या कर रही थी ? तू तो चार बजे उठ ही जाती है।" वृद्ध के स्वर की रुक्षता से वृद्धा ने भी चिढ़कर उत्तर दिया-
"मेरा तो बुढ़ापे का शरीर ठहरा। गोड़े के दरद से तो मैं खुद परेशान हूं।"
"कितनी बार कहा, मेथी की फांकी ले लो।"
"मुझे नहीं भाता।" नवोढ़ा की तरह ठुनकते हुए वृद्धा ने कहा।
"तो भागवान तू मेथी के लाड़ू बनवा लेती।" वृद्ध के स्वर में लाड़ था।

"जी, अब आप चुप करिए तो, क्या जोर आया बोलने में ? बीणनियां तो घर के काम में उलझी रहती हैं।" वृद्धा रोते हुए बच्चे को फिर वापस थमकने लगी...और मानो पुनः स्वयं से बोली-
"बड़की बीणनी तो दिन भर नमक की डली-सी घुलती जा रही है। इतनी तो माड़ी हो गई। रोज शाम को हल्की बुखार चढ़ जाती है। लेकिन तब भी काम में फुर्ती है। काम अधूरा नहीं छोड़ती। यह तो छह सात दिन से उसने एकदम खाट पकड़ रखा है। बुखार में बेहोश जैसी हो रही है। वैद्यजी का इलाज काम नहीं आया। कितना इलाज कराया था। जत्तीजी को भी दिखाया था, नाड़ी देखकर सर हिला दिए, बोले-"बहूराणी के लक्षण ठीक नहीं, मुझे तो राजरोग लगता है।"

मैंने तो पांव पकड़ लिए थे-"महाराज कोई दवा तो दीजिए। दस बरस का बेटा है, उसकी ओर जोहिए। आप क्या नहीं कर सकते ? मावस की अंधेरी रात को चमाचम पूरणमासी में बदल सकते हैं। आपने तो महावीर स्वामी की इतनी बड़ी तपस्या की, महाराज कोई दवा तो दीजिए। मैं तो बहुत रोई। बहुत गिड़गिड़ाई।"

वृद्धा सेठानी ने चर्खा अपनी ओर खींचा और वापस सूत कातने लगी-"घर-गृहस्थी में काम किए बिना कैसे सरे ? बक्सा में काफी सूत जमा हो गया है। थोड़ी और जमा हो जाए तब लीलगर को रंगने के लिए दे दूंगी। मुझे तो रेजे का यह कत्थई रंग जरा भी नहीं सुहाता। अबकी बार तो मैं उससे कहूंगी-भाया, जरा तेरी लुगाई से सलाह कर ले ! मोटे सूत पर केशारिया रंग ठीक से नहीं खिले तो थोड़ा मिलता-जुलता रंग कर दिए।"

"रामू की मां तेरा तो माथा दिन पर दिन खराब हो रहा है। तू जत्तीजी की बात कर रही थी ना !" सेठजी ने फिर पूछा।
"हां...हां...कहा न मैंने कि, जत्तीजी ने नाड़ हिला दिया। बोले बीमारी बहुत बढ़ गई है, मेरे पास इलाज नहीं है। उन्होंने बीणनी को आशीर्वाद भी नहीं दिया।"

"ओ..हो, जत्तीजी ने आशीर्वाद नहीं दिया ?" अबकी चौंकने की बारी सेठजी की थी। "वे त्रिकालदर्शी हैं, घणा तप किए हैं। उनकी बात गलत नहीं हो सकती, रामेसर की मां ! कभी-कभी सोचता हूं तो कलेजा हिल उठता है।"
"बीणनी कह रही थी कि रचनगढ़ में एक अंग्रेजी पढ़ा हुआ डाक्टर है। दो रुपया फीस का लेता है।"

"रामेसर को आ जाने दो, उसका भी बंदोबस्त हो जाएगा। देखो, तकदीर का लेखा कोई नहीं मिटा सकता। लेकिन पाणी तो छोटी बीणनी भी कर ला सकती थी ?" पानी के बारे में सेठजी का पुनः प्रश्न था।

"ओ.....हो....आपके तो कुचरनी बहुत लग जाती है। कहा न कि, छोटी बीणनी की नींद देर से खुली।"
भीतर, पैंडे में छोटी बीणनी ने घड़े के भीतर झांका आधे से ज्यादा घड़ा खाली देखकर मन ही मन अपने को बरजने लगी-बास तो लगे मेरी नींद को। सूरज चढ़ने तक सोती ही रह गई। कागे की कांव-कांव से भी नींद नहीं खुली। लेकिन आज सुबह कागा मेरी खिड़की पर बैठा था। कौन आएगा ? मुकलावे के बाद जिसके साथ मैं बस दस दिन ही रह सकी थी। उसके हृदय में एक हल्की-सी पीर उठी।
एक कसक, एक रीती चीख...क्यों आखिर क्यों हमारे पुरुषों को दिसावरी में जाना पड़ता है ? और वह भी इतनी कम उमर में ? गांव का नाई नहीं जाता, जोशी नहीं जाता, ठाकुर नहीं जाते, राजा साब नहीं जाते, फिर खाली हम बाणिये ही क्यों जाते हैं ? जैसे उनका गुजारा होता है, वैसे हमारा भी क्या नहीं हो सकता ? उसको याद आया-हां, यहीं तो मैंने चार साल पहले उस दिन, उस आखिरी रात को अपने पति से भी पूछा था-

"क्यों जी, क्या यहां अपने सुजानगढ़ में गुजर-बसर नहीं कर सकते ? कोई दुकान खोल लीजिए।"
"तुम भी क्या बोलती हो ? बाणिये का बेटा घर में मोदी की दुकान खोलकर बैठ जाए, दो सूखी रोटी में गुजारा कर ले...तब हो चुका गांव वालों का भरण-पोषण। यह मत भूलो कि, तुम सेठ गुरमुखदास रूंगटा के पोते की बहू हो। दादाजी तो रतनगढ़ रहते थे। अफीम का बहुत बड़ा व्यापार था।

जब मालवा, अजमेर, मिर्जापुर की गद्दियों से मुनीम गुमाश्ते लौटते, तब दादाजी बीकानेर महाराज के लिए अशर्फियों से भरा चांदी का थाल नजराने में ले जाते। यह तो कंपनी सरकार की वजह से अफीम का कारबार बंच हो गया। एक बार तो रुपये की चौकी बनाकर महाराज को उस पर बैठाया गया था। दादाजी ने महाराज का तिलक किया, इक्कीस तोपों की सलामी दी गई और नजराने में वे सारे नोटों की गड्डियां पेश की गई थीं।"

"आपको याद है ? आपने महाराज गंगासिंहजी को देखा था ?"
"मुझे तो उतना याद नहीं, लेकिन रामेसर भाया को रतनगढ़ की सारी बातें याद हैं। वे ही कभी-कभी बताया करते हैं। लेकिन तब भी अपने महाजनी में बहुत कमाई थी। राज घराने से रोज धन की मांग आती, आखिर हम भी कहां तक राजाजी को धन निकाल-निकाल कर देते ?

कितना सदाव्रत खोलते ? हम भूखे तो नहीं मर सकते थे। छप्पनिये के अकाल के बाद भी अपने देश में अकाल पड़ता ही रहता है। आए दिन के इन अकालों से हमारी तो हिम्मत टूटने लगी थी।
वह अपनी बाल सुलभ चंचलता को भूलकर पति का चेहरा निहारती रह गई थी।

उसने धीरे से मुस्कुरा दिया...उसकी आंखों के सामने पति का खूबसूरत चेहरा था-वह ध्यान से निहार रही थी। अपने पति का चौड़ा ललाट, बड़ी-बड़ी आंखें ऊंची नासिका, लाल होंठों के ऊपर बारीक मूंछें, नुकीली ठुड्डी। ब्याह के समय पीहर में बड़ी भावज ने बड़ा हुलस कर गाया था।

"म्हारी ननदल बाई तो सुकुमार ए नन्दोई म्हाने प्यारा लागो जी !"
मां ने कहा था-"देखो भगवान ने नाम का भी कैसा हिसाब बैठाया, अपनी राधा को साक्षात् कृष्ण कन्हैया ही मिले।"
शायद वह अपने आपसे कुछ और बातें करती। शायद वह फिर उस कागे के बारे में सोचती जो पिया के पास उसका संदेश लेकर जाएगा, शायद यह भी सोच लेती कि क्या पता दिसावरी करने गया हुआ उसका पति आज ही लौट आए और वह हल्के-हल्के गुनगुना उठी-
"उड़...उड़ रे...म्हारा काला कागला, जे म्हारा पीवजी घर आवे। खीर खांड को थाल परोसूं....थारी सोने चोंच मढ़ाऊं रे कागा...थारी...जलम...जलम...गुण गाऊं रे...कागा जलम...जलम..."
लेकिन तब तक वृद्धा सास की तेज आवाज थी...हां, ऐ बीणनी कहां रह गई ?"

आवाज से वह चौंकी। गिलास में पानी डालते हुए घबराहट में थोड़ा पानी बाहर छलक गया। अफसोस और गिला से उसका कलेजा उमड़ आया। इतना पानी तो बच्चा ही पी लेता। कब से रो रहा है। या फिर जिठाणीजी को पिला देती, बुखार से उनका शरीर तप रहा होगा, कंठ सूख रहा होगा।
घूंघट को और थोड़ा नीचे खींच वह उठ खड़ी हुई। काकोजी कल ही तो मांजी को बता रहे थे...राम की मां तुम तो छप्पनिये के अकाल की तो कल्पना नहीं कर सकती..ढोर-डांगर की तो किसको चिंता थी। चारों तरफ हड्डियों के कंकाल के डेर लग गए थे। प्यास से आदमी तड़फड़ाने लगे थे।
भूख और गरीबी देखी नहीं जाए। दिन में एक बार बाजरे की लाप्सी मिल गई या किसी को दो टिक्कड़ खाने को मिल जाए गए तो बहुत बड़ी बात थी। क्या करते लोग, रोजगार की खोज में सब निकले। सेठ, साहूकार निकले, उनके मुनीम गुमाश्ते निकले। कोई अजमेर, मालवा की ओर गया, कोई पंजाब की तरफ, तो कोई बंबई की ओर।
बापूजी ने मालवा में अफीम का व्यापार तभी शुरू किया था। अपनी अफीम की पेटियां चीन और जापान तक जातीं। साथ ही बड़े ताऊजी ने चुरू में गद्दी खोली, महाजनी का काम बढ़ाया।"
"छप्पनिये की अकाल की तो मुझे ज्यादा बेरा नहीं, लेकिन यहां सुजानगढ़ में भी तो सेठ छेदीलालजी की जोहड़ भी सूख गई, पानी कहां ? खाली काचड़ी ही कीचड़ दिखाई देता है। दो साल पहले जब बिरखा हुई थी तो जोहड़ कैसा लबालब भर गया था। गांव के सब लोग गोठ करने गए थे।"
"कहावत है न, कि अपने देश में तो हर "तीसरो सूखो, आठवों अकाल" पड़ता ही रहता है।" हताशा के स्वर में सेठजी ने कहा।
भीतर छोटी बीणनी ने अपनी फटी हुई एड़ियों की ओर देखा और सोचा, कितना भी घी लगाकर सोए, लेकिन पीली रेत पर कोसों का आना जाना, जूती के भीतर तलवे जलने लगते हैं, एड़ियां फटने लगती हैं। उसने देखा, घड़े के जमीन पर गिरा हुआ पानी मिनटों में सूख गया। सुजानगढ़ की जमीन प्यासी थी।

सास-ससुर की बात सुनकर बीणनी को भी ख्याल आया कि, हां हमारे हेली के पीछे वाला कुआं भी तो सूख ही गया। कुआं तो मेरे ब्याह के बाद ही बनवाया गया था। जिस दिन पहली बार कुएं का पानी निकाला गया था, तब पानी चखने के लिए सारा गांव उमड़ पड़ा था। लंगड़िये बाबा के नाम का राती जुगा हुआ, चूरमे का परसाद किया गया था। कोई दो सौ आदमियों को तो जीमने बुलाया गया था।

कुएं की सारण ढालू रखी गई ताकि बेचारे बैलों को मेहनत कम पड़े। कुएं की पास की बाड़ी में हरी साग-सब्जी होती। रामी दादी तो बिचारी जात की भंगन ठहरी, कभी कुएं के ऊपर नहीं चढ़ी, नीचे बनी खोलों से ही पानी ले जाती या फिर पास बनी गढ़ाइयों में ही अपनी पीतल की चमकती हुई गोल कलसी डुबाती। सबेरे-सबेरे माली काका पानी खींचने के लिए बैलों को जोत देते और भजन गाते, सुनकर मन निहाल हो जाता।

शाम को हेली के पिछवाड़े सारा गांव जमा हो जाता, मेला लग जाता। लेकिन इतना अच्छा कुआं भी सूख गया। मांजी के मन में तो इसका विचार भी बहुत हुआ, कुआं, सूखना अच्छा सगुन नहीं। कई बार जी नाराज करने लगती है, देख ऐ बीणनी कुआं कैसे सूख गया। देखो, रामजी की मरजी जो होसी सो होसी।

ठंडी सांसों के साथ छोटकी बीणनी ने मन ही मन कहा-लेकिन कुआं तो अंधा ही हो गया। अब तो पानी लाने के लिए पांच कोस, सात कोस आना जाना पड़ता है। मैं तो रोज ही जाती थी। बस आज ही गलती हो गई। पास-पड़ोस की बहुएं और बेटियां तो सुबह पानी भर के ला चुकी होंगी। नोहर पर उगी थोड़ी बहुत हरी सब्जी मालण लाकर बेच भी गई।

अब कौन जाएगा इतनी दूर....एकेले तो मैं जा नहीं सकती और न ही मुझे जाने दिया जाएगा, लेकिन घड़े में तो पानी नाम भर का है, किससे कहूं....अपने ही सोच में डूबी उसने पानी का गिलास सास को पकड़ाया और रोते हुए बच्चे को गोद में उठा लिया।
"लीजिए, पानी पी लीजिए।" सेठानी पत्थर की दीवारों के पार देखते हुए अपने-आप से कहने लगी-"बाहर लाय पड़ रही है।"
"गाय-बछड़ों की ओर तो देखा नहीं जाता, उनकी पीठ पर जगह-जगह घाव हो गए हैं। उस पर अपनी धोलती गाय तो उठकर खड़ी नहीं हो पा रही। घाव पर मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं। बिना चारे पानी के वह कितने दिन जीएगी ? उसकी पूंछ में ताकत ही कहां बची होगी कि, भिनभिनाती मक्खियों को परे सरकाए।" सेठजी मानों खुद से ही कह रहे थे। या अपनी सेठानी से ? या चौखटे पर खड़ी छोटी बीणनी से ?

"ऐ रामजी, सोच-सोचकर मेरा तो कलेजा मुंह को आता है। मेरी गोमाता को कुछ हो न जाए। अब गांव के वैद्यजी से कुछ पूछिए ना..." वृद्धा सेठानी के स्वर में प्राणों की छटपटाहट थी।

"रामू की मां, तुम भी क्या टाबरपने की बात करती हो। पानी नहीं। गांव में कहीं पानी नहीं। हरी घास का तिनका नहीं..कहां से इनके लिए चारा मंगवाऊँ ? क्या करूं ? मेरी अपनी बुढ़ापे की लाचारी।"
"हे पीतर देवता, मेरी गोमाता की रच्छा करीयो।" सेठानी ने आंसू पोंछते हुए कहा-"ऐसा अशुभ नहीं हो जाए। अनर्थ हो जाएगा।"
"हवा के रुख से तो मुझे लगता है, आंधी आएगी।" पानी का खाली गिलास पत्नी को पकड़ते हुए सेठजी बोले।
बच्चे को कंधे से सटाए-सटाए छोटी बीणनी ससुर की बात सुनकर सहम सी गई। रे मेरी, मां इतने कम पानी से कैसे काम चलेगा ? पड़ोस की काकी सा से मांग कर ले आती हीं, उनके बंद कुंडे में तो पानी होगा, आधा घड़ा पालर मांगने में कोई वे मना थोड़े ही करेंगी ? कल एक घड़ा और ज्यादा भर कर ला दूंगी। नहीं होगा तो कुएं पर दो बार चली जाऊंगी, चार-पांच घर ही तो बाणिये के हैं, जहां से पानी उधार लिया जा सकता है।

राजा साहब के घर से या पासवानजी के घर से भी लिया जा सकता है, लेकिन सासूजी को पसंद नहीं। राजा साहब के घर से यदि कभी कुछ खाने-पीने का सामान आ जाए तो मांजी बिना कुछ कहे परे सरका देती हैं-"किसी से कुछ कहना मत, लेकिन राजा साहब के घर तो भक्ष्य-अभक्ष्य सब कुछ बनता है। अपने उनका छुआ हुआ पानी भी नहीं पी सकते।"
बार-त्यौहार कभी जीमने का न्यौता आए तो बीणनियां चली जातीं, लेकिन सासूजी नहीं। कहतीं-"उनकी गढ़ी में रहते हैं तो इसका यह अर्थ तो नहीं कि अपना धरम भ्रष्ट कर लें।"

ब्राह्मण के घर कुछ खाने का सवाल ही नहीं पैदा होता। ब्राह्मण को अपने दान दें या फिर उससे लेकर खाएं और यही बात दूसरे छोटे लोगों पर लागू होती है।

"ले बीणनी, गिलास ले जा। गरमी के मौसम में भी अम्मलपानी (अफीम) का नशा करेंगे तो प्यास तो लगेगी ही...तुम किसी सोच में डूबी हो ?"
"जी घड़े में पानी नहीं है।" उसने धीरे से सास से कहा।

"बीणनी पानी तो कहीं नहीं है। ढोर-ढांगर तड़फड़ा रहे हैं....प्यासी धरती की छाती फटी जा रही है। कैसा तावड़ा है कि आंख नहीं खुलती और आकाश से तो लाय बरस रही है, लाय ! यह गांव सुजानगढ़ है भी ऐसा। वहां चुरू में तो कितने कुएं हैं। बीकानेर महाराजा गंगासिंहजी के नहर बनाने से तो काफी समस्या सुलझ गई।"

"तुमने फिर बीकानेर की बात छेड़ दी ? तुमको यह गाँव अच्छा नहीं लगता ना, भागवान ब्याह कर आए इतने बरस हो गए। रतनगढ़ से यहां सुजानगढ़ आकर बसे बीस बरस हो गए लेकिन तू इस गांव की बुराई करने से नहीं चूकती।"
बीणनी के कान में सास-ससुर की बात पड़ी। उसने सोचा, पता नहीं क्या बात है

कि, आजकल बात-बात में काकोजी और मांजी की लड़ाई हो जाती है। कहां-सुनी का अंत नहीं। क्या वजह हो सकती है ? बुढ़ापा ? नहीं, यह राम मारी गरमी के कारण। गरमी भी तो कैसी गरमी नस-नस को सुखा डाले, ऐसी लू चलती है।

साभार : भा . सा. सं.

Wednesday, September 17, 2008

स्विमिंग पूल के किनारे टॉपलेस

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रसांतर




स्विमिंग पूल के किनारे टॉपलेस
- राजकिशोर


और मामलों में कोलकाता की चाहे जितनी तारीफ की जाए, वहां की जलवायु के लिए मेरे पास प्रशंसा का कोई शब्द नहीं हैं। यह जलवायु ऐसी है कि आदमी का तेल निकाल लेती है। देह से पसीना बहना लाभदायक है, यह विज्ञान और स्वास्थ्य की किताबों में पढ़ाया जाता है। लाभदायक होगा, लेकिन गरमी के महीनों में सुबह होने के कुछ घंटों बाद ही जब शरीर से पसीने की धार बहने लगे, तो विज्ञान भूल जाता है। चेतना को आक्रांत किए रहता है वह चिपचिपापन जो शरीर के शेष बचे हुए सुखों को संकट में डालने में अद्भुत रूप से कामयाब हो। अगर आप पंखे के नीचे, मेरा मतलब है चलते हुए पंखे के नीचे, बैठे हों, तो गनीमत है। गरमी भले ही लगती रहे, पर पसीना तो सूख ही जाता है।


मैं अपने बचपन के इस पहलू के बारे में लिखना चाहता हूं जब मेरे परिवार में बिजली का पंखा नहीं हुआ करता था। हाथ पंखे से जितना काम चल सकता था, हम लोग काम चलाते थे। उन दिनों कोलकाता में बिजली नहीं जाती थी। बाद में हमने बिजली के पंखे के युग में प्रवेश किया, तो बिजली अकसर जाने लगी। दोनों ही युगों में गरमी और पसीने से निजात पाने के लिए मैं तथा अन्य लड़के और पुरुष कमर से ऊपर के कपड़े खोल देते थे और अर्धनग्न हो जाते थे। इससे गरमी तो क्या खाक कम होती, पसीने की फजीहत से छुट्टी मिल जाती थी। ऐसे मौकों पर घर की स्त्रियों पर बहुत दया आती थी। तापमान जितना भी चढ़ा हुआ हो, मेरी मां, भौजी, बहन, भतीजियां -- सभी को पूरे कपड़े पहने रहना पड़ता था। गरमी और पसीने की तकलीफ से छुटकारा पाने की तुलना में भारतीय संस्कृति के मूल्यों की रक्षा करना ज्यादा जरूरी था। यह एक मौका ऐसा था, जब मुझे स्त्री और पुरुष के बीच भेदभाव का एहसास अनायास ही होता था। भौजी को तो, जब वे घर से बाहर निकलती थीं या मायके से ससुराल आती थीं, तो एक चादर भी ओढ़नी पड़ती थी। खुदा का शुक्र है कि चादर का रिवाज अब खत्म हो चुका है। निश्चय ही, मुसलमान महिलाओं की यातना और ज्यादा थी और है, क्योंकि उनके लिए बुरका अनिवार्य था और है।


ये बाते मुझे यह समाचार पढ़ कर याद आ रही हैं कि डेनमार्क की स्त्रियों ने पिछले हफ्ते स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में एक उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वहां अब स्त्रियों को सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में टॉपलेस हो कर तैरने तथा पूल के इर्द-गिर्द टॉपलेस अवस्था में टहलने की स्वतंत्रता मिल गई है। इस स्वतंत्रता के लिए वहां के टॉपलेस फ्रंट द्वारा लगभग एक साल से अभियान चलाया जा रहा था। फ्रंट के नेतृत्व का कहना था कि जब पुरुष टॉपलेस हो कर सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में तैर सकते हैं, तैरने के पहले उसी अवस्था में पूल के किनारे टहल सकते हैं, तो स्त्रियों के लिए यह पाबंदी क्यों कि उन्हें अपने को ढक कर रखना होगा। स्विमिंग पूल यानी मानव निर्मित तालाब वह जगह है जहां आप प्रकृति के ज्यादा से ज्यादा नजदीक होना चाहते हैं। पुरुष एक हद तक ऐसा कर सकता है, तो स्त्रियां कम से कम उस हद तक ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं? एक अलग किस्म के शरीर के साथ पैदा होने की सजा स्त्री को कब तक मिलती रहेगी? यह किसी के बस की बात नहीं है कि वह पुरुष हो कर पैदा हो या स्त्री हो कर। फिर स्त्रियों पर ऐसे प्रतिबंध क्यों लगाए जाएं जो पुरुषों के लिए आवश्यक नहीं माने जाते? कोपनहेगन संस्कृति तथा फुरसत समिति काफी विचार-विमर्श के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची कि टॉपलेस फ्रंट की यह मांग सर्वथा जायज है। यह निर्णय सुनने के बाद डेनमार्क की महिलाएं खुशी से नाचने लगीं। अब उन्हें स्विमिंग पूलों के आसपास पुलिस और सुरक्षा कर्मचारियों द्वारा बार-बार यह याद नहीं दिलाया जाएगा कि वे स्त्रियां हैं। डेनमार्क की सोशलिस्ट पीपुल्स पार्टी भी प्रसन्न है, क्योंकि वह इस मांग का समर्थन कर रही थी।


डेनमार्क के इस निर्णय से स्वीडन में टॉपलेस का आंदोलन जोर पकड़ेगा। वहां भी यह अभियान चल रहा है कि सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में स्त्रियों के साथ वैसा ही सलूक किया जाए जैसा पुरुषों के साथ किया जाता है। कई स्विमिंग पूलों के मालिकों ने तो घोषणा कर दी है कि वे अपने यहां स्त्रियों को टॉपलेस होने की सुविधा प्रदान करेंगे। लेकिन कुछ आंदोलनकारी महिलाओं ने टॉपलेस हो कर स्विमिंग पूलों में तैरना शुरू कर दिया, तो सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें वापस बुला लिया। मजे की बात यह है कि यूरोप के बहुत-से हिस्सों में स्त्रियों को टॉपलेस अवस्था में समुद्र में स्नान करने या समुद्र किनारे धूप सेंकने का रिवाज है। वहां कोई इसका बुरा नहीं मानता। अब डेनमार्क में सार्वजनिक स्विमिंग पूलों को इस स्वतंत्रता और समानता के दायरे में ले आया गया है, तो स्वीडन में भी सफलता मिलना निश्चित है। धीरे-धीरे गोरी सभ्यता के दूसरे प्रगतिशील केंद्र भी पुरुष-स्त्री के बीच के भेदभाव को कम करने को कम करेंगे।


इला अरुण का गया हुआ यह फिल्मी गीत आज भी सुनाई दे जाता है -- चोली के पीछे क्या है। डेनमार्क की महिलाओं ने इसका जवाब बता दिया है। वहां के नाारीवादी आंदोलन की नेताओं का कहना है कि इस मांग के माध्यम से हम स्त्री के स्तनों का वियौनीकरण (डी-सेक्सुअलाइजेशन) करना चाहते हैं। सोशलिस्ट पीपुल्स पार्टी के नेता फ्रैंक हेडेगार्ड का कहना है, 'मेरी समझ में नहीं आता कि स्त्रियों के स्तनों के ले कर लोग इतने आक्रामक क्यों हो जाते हैं। यह फैसला इस आइडिया को रोकने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि स्त्रियों की देह केवल यौन वस्तु नहीं है।' एक नारीवादी महिला ने घोषणा की कि यह हम तय करेंगे कि हमारे स्तन कब यौनिकता का वहन करेंगे और कब नहीं। स्वीडन के एक ऐसे ही ग्रुप की प्रवक्ता मारिया हेग का बयान है कि औरतों को सेक्स सिंबल बनाए जाने से हम ऊब चुके हैं -- उन्हें यह इजाजत नहीं है कि उनकी बांहों या पैरों में बाल उगे हुए हों।


निश्चय ही मामला उतना सीधा नहीं है जितना डेनमार्क या स्वीडन की कुछ मुक्त या मुक्तिवादी स्त्रियां समझ रही हैं। इस अर्धनग्नता से इन देशों में कोई बड़ी जटिलता नहीं खड़ी होगी, क्योंकि वहां का समाज सेक्स से जितना अभिभूत है उतना ही मुक्त भी है। यह स्थिति कोई एक दिन, वर्ष, दशक या शताब्दी में नहीं पैदा हुई है। इसके पीछे कई सौ वर्षों का इतिहास है। दूसरे देशों में शरीर के प्रति ऐसी निर्विकारता आने में पता नहीं कितना समय लगेगा। लेकिन एक बात निश्चित है। आधुनिक सभ्यता आदिवासी संस्कृति के एक समृद्ध संस्करण की ओर बढ़ रही है। मेरा अपना अनुमान है कि इसके नतीजे सकारात्मक ही होने चाहिए। इस सिलसिले में गांधी जी की याद आती है। जब उनसे पूछा गया कि चर्चिल आपको अधनंगा फकीर कहते हैं, इस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है। महात्मा का जवाब था -- 'काश, मैं इससे और ज्यादा नग्न हो सकता।'


(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)

Tuesday, September 16, 2008

शोक गीत : एक लड़की की आत्महत्या पर

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एकालाप : ८
शोक गीत:एक लड़की की आत्महत्या पर
(भाग १)
- ऋषभ देव शर्मा



दहक रही यह चिता तुम्हारी, धधक रहे अंगारे .
तरुणि! तुम्हारे अल्हड यौवन को लपटें शृंगारें .
कौन सुन रहा है मरघट में, विकल ह्रदय का रोदन ?
केवल तीक्ष्ण हवाएं करतीं , 'सांय-सांय' अनुमोदन.
अरी कुमारी, सखी, वेदने, दर्दों की बेटी !
असमय परिचित हुई मृत्यु से, और चिता में लेटी .

चिता ही है जीवन का सार.
देवि! नश्वर सारा संसार..[ ]



प्रसव क्षणों की महावेदना से जब मुक्ति जुटा कर.
जिस दिन पहले-पहल सखी! तुम रोईं जग में आकर .
सोच रहा था नन्हा मन, यह जीवन का वरदान मिला.
इसीलिए तो रोकर के भी, नादानी में फूल खिला.
किंतु तुम्हें क्या ज्ञात, उसी क्षण क्या जननी पर बीता.
रोया उन्मन
निर्धन बापू, देख देख घर रीता.

ज्ञात था उन्हें विश्व का सार .
बिना धन जीवन है निस्सार..[]




खेलीं छोटे से आँगन में ,जब तुम किलक किलक कर .
भरा अंक में जब जननी ने तुमको पुलक पुलक कर.
मुस्कानों से नन्हीं बाला ! तुमने फूल खिलाए .
' ललाट पर निज बापू के स्नेहिल चुम्बन पाए .
रहीं खेलती और किलकती , पुलक रहीं मन ही मन.
तुम क्या जानी गृह स्वामी का कैसे सुलगा जीवन ?


निरीहों पर फणि की फुंकार.
निर्धनों पर विधि की हुंकार॥[]



यदा कदा चलता ही रहता अन्न अभाव उपवास।
कई दिनों तक जीते रहते पीकर बस वातास.
किंतु तुम्हें तो सखी! सदा ही दूध खरीद पिलाया.
शुष्क छातियों से पिलवाती क्या निर्धन की जाया ?
रहीं अपरिचित कैसे घर में हर प्राणी जीता है.
केवल दर्द भरा है सबमें शेष सभी रीता है.

मिला उनको शून्य उपहार.
हँसा उनपर अपना संसार .. []




गली मुहल्ले में जाकर भी , सखी , बहुत तुम खेली.
निर्धनता किसको कहते हैं ? समझ सकीं , सहेली!
बचपन में जितनी लीलाएं की होंगी सीता ने.
जितना स्नेह दिया गोपों को प्रिय बाला राधा ने.
रंकसुते ! तुमने भी उतनी लीला करनी चाहीं.
मन का सारा स्नेह उडेला ,सखियों की गलबाहीं .

साम्य का बचपन में विस्तार .
मुग्ध जिस पर कवि का संसार .. []



याद नहीं या वह दिन तुमको? मरघट की सुकुमारी !
जिस दिन नभ में रंग उड़ा था, गलियों में पिचकारी..
देख रही थीं तुम क्रीडा को, निज प्यासा मन मारे
स्नेहमयी माता शैया पर पड़ी रोग तन धारे.
बदन तप्त था ,बस गृहस्वामी खड़ा हुआ सिरहाने .
मन ही मन था देव मनाता , बुरा किया विधना ने !

फागुन पर बिजली का प्रहार.
सूना फाग , निर्धन घर-बार ..[]


क्रमशः]


Monday, September 15, 2008

( रसांतर ) बाढ़ में औरत - राजकिशोर

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(रसांतर)


पर मीडिया की दुनिया में क्यों औरतों का राज है। माफ कीजिएगा, सभी औरतों का नहीं, सुंदर और स्वस्थ औरतों का। सुख में भी औरतें और दुख में भी औरतें। बहुत दिनों से मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि वर्तमान व्यासायिक सभ्यता औरतों की पीठ पर ही खड़ी है। स्त्रियां मानती हैं कि उनका समय आ गया है। वास्तव में, यह उनके शोषण के बहुमुखी और बहुआयामी विस्तार का समय है। स्त्रियों का सच्चा समय तब आएगा जब उनके गुणों की पूछ होगी।
--- राजकिशोर



बाढ़ में औरत
- राजकिशोर


उस दिन सबेरे तो मैं रो ही पड़ा था। बस आंसू नहीं निकले, बाकी सब हो गया। एक हिन्दी अखबार में बिहार की बाढ़ की तसवीर छपी थी। कमर तक पानी में डूबी हुई एक औरत बिलख रही थी। जब सब कुछ हाथ से छूट जाए और सामने कोई भविष्य दिखाई न पड़ता हो, तब ऐसी रुलाई फूटती है। दो-तीन बार इस रुलाई से मेरा भी पाला पड़ चुका है। उस समय चारों ओर शून्य ही शून्य और आप निपट अकेले नजर आते हैं। जीने की इच्छा खत्म नहीं होती, पर जीने का कारण या आधार दिखाई नहीं पड़ता। बाढ़ से घिरी यह औरत शायद इसी प्रकार के संकट से गुजर रही थी। उसका घर-बार सब ढह या छूट गया होगा। क्या पता परिजन भी लापता हों। अखबार ने सिर्फ उसकी तसवीर छापी थी, यह नहीं बताया था कि उसके साथ घटित क्या हुआ था। कैमरे से किसी दृश्य का फोटो खींच लेना बहुत आसान है। फोकस किया और क्लिक, काम पूरा। लेकिन तसवीर का इतिहास क्या है, यह जानने के लिए बहुत यत्न करना पड़ता है और समय निकालना पड़ता है। दौड़ते हुए की जानेवाली वर्तमान पत्रकारिता में इसके लिए जगह कहां। वह यह मान कर चलती है कि सभी बाढ़ के प्लावन में फंसे हैं, तो सभी का दुख एक ही होगा। वास्तव में ऐसा है नहीं। अग्निकांड, सूखा, बाढ़ प्रत्येक आदमी और परिवार को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं। बाढ़ उतर जाने के बाद, काश, कोई अखबार कम से कम सौ ऐसी कहानियां पूरे ब्यौरे के साथ छापता जो इस खंड प्रलय से पैदा हुई हैं। जब केंद्रीय सरकार के बजट को, जिसका अर्थ समझना एक बहुत ही तकनीकी मामला है, सात-आठ पृष्ठों में छापा जा सकता है, तो बाढ़ से हुई बरबाद हुई जिंदगियों के बारे में विस्तार से बताना उससे ज्यादा महत्वपूर्ण और सार्थक काम हैं। दुख को आंकड़े में बदल देना आधुनिक चेतना के अभिशापों में एक है। इससे दुख को समझने में बाधा की बहुत ऊंची दीवार खड़ी हो जाती है। ये दीवारें आर्थिक और सामाजिक नियोजन की आत्मा को कुचलती रहती हैं।


जब मैंने बाढ़ में फंसी हुई उस बिलखती औरत को देखा और कई मिनटों तक देखता रहा, तो मेरा ध्यान इस ओर गया ही नहीं कि औरत के रूप में वह कैसी है। वह एक सामान्य देहाती अर्ध-स्वस्थ औरत थी, जिसके परिवार में पैसे या पूंजी का अभाव होगा और जो किसी नीची माने जानेवाली जाति की होगी -- यह विचार मन में तब आया जब मैंने अंग्रेजी के एक लोकप्रिय साप्ताहिक के आवरण पर बाढ़ की शिकार एक और औरत की तसवीर देखी। यह स्वस्थ और सुंदर थी। उसने अपनी नई हवाई चप्पलें दाहिने हाथ में थामी हुई थीं। उसकी साड़ी सस्तीवाली नहीं थी। रंग गोरा था। बाल संवरे हुए थे। उससे डेढ़-दो गज की दूरी पर उसकी सुंदर-सी तंदुरुस्त बिटिया थी, जो अच्छे कपड़े पहने हुए थी। मां और बेटी, दोनों में से किसी के भी चेहरे पर बाढ़ की यातना के हस्ताक्षर नहीं दिखाई पड़ रहे थे। मां के चेहरे पर हलकी-सी उदासी और चिंता जरूर थी, पर ऐसी नहीं जिससे उसका भविष्य धूमिल दिखाई पड़ता हो।


बाढ़, सूखा और भूकंप सभी को एक जैसा प्रभावित नहीं करते। यह वह जाल है, जिसमें से बड़ी मछलियां आसानी से निकल आती हैं और जिसमें फंस कर छोटी मछलियां जान गंवा देती हैं। अखबारों की खबरों से ही पता चला कि जिनके कई मंजिला पक्के मकान हैं, वे बाढ़ से सबसे कम प्रभावित हुए हैं। कच्चे घर पानी में डूब गए और अब तक तो घुल भी गए होंगे। इस तरह हर विपदा का एक वर्ग चरित्र होता है। पत्र-पत्रिकाओं का एक प्रमुख काम इस वर्ग चरित्र को समझना और समझाना है। लेकिन दुर्भाग्य से उनका भी अपना एक वर्ग चरित्र बन गया है। इससे उनका संपादकीय विवेक भी निर्धारित होता है। जिस अखबार ने बिलखती हुई औरत की तसवीर छापी, वह यह दिखाना चाह रहा था कि बाढ़ ने उत्तर विहार के सामान्य लोगों को किस प्रकार प्रभावित किया है। लेकिन अंग्रेजी के जिस रंगीन साप्ताहिक की बात की जा रही है, उसे अपने आवरण पृष्ठ पर ग्लैमर चाहिए। इसलिए बाढ़ में फंसी उसकी औरत भी जरा ऊंचे दरजे की हैं। सुंदर स्त्रियां सुंदर आवरण पृष्ठ बनाती हैं।


अब हम समझ सकते हैं कि जीवन व्यवस्था में तो औरतों की हालत पतली है, पर मीडिया की दुनिया में क्यों औरतों का राज है। माफ कीजिएगा, सभी औरतों का नहीं, सुंदर और स्वस्थ औरतों का। सुख में भी औरतें और दुख में भी औरतें। बहुत दिनों से मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि वर्तमान व्यासायिक सभ्यता औरतों की पीठ पर ही खड़ी है। स्त्रियां मानती हैं कि उनका समय आ गया है। वास्तव में, यह उनके शोषण के बहुमुखी और बहुआयामी विस्तार का समय है। स्त्रियों का सच्चा समय तब आएगा जब उनके गुणों की पूछ होगी। अभी पूछ उनकी शारीरिक बनावट और चेहरे की सुंदरता का है। टीवी की दुनिया के मेरे एक मित्र ने बताया कि उनके चैनल में एंकरों की भरती के लिए सुंदरियों की खोज चल रही है। साधारण नहीं, असाधारण सुंदरियों की। यह कुछ ऐसी घटना है जैसे सफल फिल्म निर्देशक और निर्माता जिस शहर में भी जाते हैं, उनकी नजरें ऐसी लड़कियों की खोज में लगी रहती हैं जिन्हें वे अपनी अगली फिल्म में नायिका बना कर उतार सकें। वहीदा रहमान का आविष्कार इसी तरह किया गया था। टेलीविजन एक तरह से फिल्म माध्यम का ही विस्तार है। आज की रंगीन पत्रिकाओं को इसी बाजार में प्रतिद्वंद्विता करनी है। इसलिए आदमी और औरत का अर्थ उनके लिए वह नहीं है जो हमारे-आपके लिए हैं। सुनामी से प्रभावित इलाकों में भी उन्हें मरी हुई सुंदर आकृतियों की तलाश रहती है। जिस साप्ताहिक की यहां चर्चा हो रही है, उसने भीतर के पृष्ठों पर तबाही और दैन्य की तसवीरें छापी हैं। इसके बिना यथार्थवादी होने का दम नहीं भरा जा सकता। लेकिन आवरण पृष्ठ पर वह तसवीर कैसे छापी जा सकती है, जिसमें दीन-हीन स्त्रियां और बच्चे पत्तल की थाली में थोड़ा-सा भात ले कर बैठे हैं? पत्रकारिता का काम बताने से ज्यादा लुभाना हो गया है। इसीलिए किसी हसीना ने अगर एक बार में दस खून किए हैं, तो आवरण पर उन मरे हुए आदमियों और औरतों की लाशों की नहीं, उनके बिलख रहे परिजनों की भी नहीं, बल्कि उस हसीना की ही तसवीर छापी जाएगी। हमारे संविधान में कहा गया है कि राज्य के सामने हर आदमी की हैसियत एक जैसी होगी। यह नहीं कहा गया है कि समाज में हर आदमी की हैसियत बराबर होगी। या, जन संचार माध्यमों का लोकतंत्रीकरण किया जाएगा ताकि वे मानव छवियों का व्यापार न कर सकें।


-(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)


Thursday, September 11, 2008

वूमन इन इस्लाम : An exegesis ( भाग -३) - Abul Kasem

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स्त्री भले ही वह किसी भी वर्ग- विशेष से सम्बन्ध रखती हो, अपने सामान्य मानवीय अधिकारों के प्रति पक्षपात का शिकार हुई है, होती चली आई हैजिस पर समाज के निर्माण का दायित्व व्यवस्था में सर्वाधिक था वह स्वयं ही उस व्यवस्था समाज में दोयम दर्जे की उत्पीड़न की त्रासदियों से दो -चार होती रही हैहमारा उद्देश्य किसी भी वर्ग, जाति,सम्प्रदाय, मत अथवा क्षेत्र की सीमा से परे जा कर सारे स्त्री समाज को अपने प्रति बरते गए रवैये के प्रति सचेत करते हुए पारस्परिक सद्भाव की आपसी समझ की पहल उनमें जगानी हैसाथ ही ऐसे प्रत्येक व्यवहार भेदभाव को रेखांकित करना है, जिसके सन्दर्भ में कोई भी समाज अपनी आनेवाली नस्लों के सम्मुख गौरवान्वित नहीं हो सकता

यह लेखमाला सिडनी के श्री Abul Kasem ने तैयार की है, जिसके २ भाग पूर्व में प्रकाशित किए जा चुके हैं। उसपर मिले प्रतिक्रियात्मक (विरोध) आलेख को भी उसी श्रृंखला में पूरा प्रस्तुत किया गया था। लंबे अन्तराल के बाद पुन: मूल श्रृंखला की तीसरी कड़ी को अब यहाँ देखें-पढ़ें .........


Women in Islam: An exegesis

- Part 3

Abul Kasem writes from Sydney, Australia. His e-mail address is - abul88@hotmail.कॉम


Women are harmful/devilish/crooked and damaging

The holy scriptures of Islam is full of mindless, unbelievably misogynic contents. Islam considers women to be crooked, evil, devilish, damaging, Satanic, harmful, portents of bad luck, and what not. One may be greatly surprised at what I just mentioned. I am listing a few statements below from the principle sources of Islam. After reading these citations, it is difficult not to be disturbed. We may wonderwhy is Islam so misogynic? I sometimes wonder what wrong the women have done to be treated in such a harsh, derogatory and in dehumanized manner. It seems as if Islam is out to prove that women are/were created to be bad and they are devilish inherently. It is not in their upbringing, education, family background-. etc. that are responsible for their badness, dummy! Therefore, there is no way of improving their status, no matter how much a woman wishes or tries. It is her fate and destiny as determined by God. Allah/Islam has relegated her to permanent servitude. It is a great tragedy to be born as a woman especially in an Islamic paradise. The only path for a Muslim woman is accepting the sexual slavery or death. Islamic apologists often take pride by saying that Islam improved the lot of women from those prevalent in the 'dark days' of Arabia, such as abolishing the live burial of girl infants. What a great achievement! After you peruse the following demeaning provisions of Islam for women, you may wonder whether it is worth living as a woman (in an Islamic paradise under Sharia) or not.

It is true that Muhammad did make some improvement to the status of women in Arabia, such as the right of inheritance, abolition of burial of girl babies, etc. However, he did not go further, for he did not want to upset the men of Arabia through a radical change in the then existing status of women. Furthermore, we cannot compare those reforms of women with the time before Islam. We are no longer living in those so-called 'dark' days of Ayame-Jahliat, are we? The world is moving forward and all the secularist countries guarantee the rights of women. It is only the Islamic countries that want to live in their 'golden period' of the past and still subscribe to their 'Gender Apartheid' policy. I would like to ask anyone reading the following 'holy' citations to bring in statements from any secular law more misogynic than what is quoted down below.

A woman is like a rib---that is why she has the crookedness...(Shahih Bukhari 7.62.113)

Volume 7, Book 62, Number 113:

Narrated Abu Huraira:

Allah's Apostle said, "The woman is like a rib; if you try to straighten her, she will break. So if you want to get benefit from her, do so while she still has some crookedness."

Women were created crooked;. if you try to straighten her you will break her and breaking her is divorcing her-( Shahih Muslim 8.3467)

Book 008, Number 3467:

Abu Huraira (Allah be pleased with him) reported: Woman has been created from a rib and will in no way be straightened for you; so if you wish to benefit by her, benefit by her while crookedness remains in her. And if you attempt to straighten her, you will break her, and breaking her is divorcing her.

Women, house and horses are evil omens..( Shahih Bukhari;7.62.30)

Volume 7, Book 62, Number 30:

Narrated Abdullah bin 'Umar:

Allah's Apostle said, "Evil omen is in the women, the house and the horse.'

Portents of hour are drinking, sex , 50 women per men...(Shahih Bukhari 1.3. 81)

Volume 1, Book 3, Number 81:

Narrated Anas:

I will narrate to you a Hadith and none other than I will tell you about after it. I heard Allah's Apostle saying: From among the portents of the Hour are (the following):

1. Religious knowledge will decrease (by the death of religious learned men).

2. Religious ignorance will prevail.

3. There will be prevalence of open illegal sexual intercourse.

4. Women will increase in number and men will decrease in number so much so that fifty women will be looked after by one man.

Nothing is more harmful to men than women...(Shahih Bukhari 7.62.33)

Volume 7, Book 62, Number 33:

Narrated Usama bin Zaid:

The Prophet said, "After me I have not left any affliction more harmful to men than women."

Please read the following hadith if you still thought that Islam has a lot of kind words reserved for women and is very merciful to them. In this hadith, Muhammad clearly declares that a woman is actually a devil in the guise of a human (albeit a female) being. There is no confusion on this matter. Is there any contextual issue for this hadith? I would really like to hear from the Islamic apologists who are always looking for contexts as to what they have to say on this hadith. Is the provision of this hadith applicable today or not? Shall we not consider a woman as an extension of the devil? What punishment Allah has reserved for the devil? Does not this hadith say that our mothers, wives, sisters, and daughter are actually devils? Could any one show me any secularist provision more misogynic than the content of this hadith?

A woman advances and retires in the shape of a devil; so when one of you sees a woman, he should come to his wife and have intercourse with her-(Shahih Muslim 8.3240)

Book 008, Number 3240:

Jabir reported that Allah's Messenger (may peace be upon him) saw a woman, and so he came to his wife, Zainab, as she was tanning a leather and had sexual intercourse with her. He then went to his Companions and told them: The woman advances and retires in the shape of a devil, so when one of you sees a woman, he should come to his wife, for that will repel what he feels in his heart.

Here is another gem from Imam Ghazali.

Women are half devils (Ref: 7.vol. II, p367)

Someone once said: "The devil says to women: 'You are half my army! You are my arrow with which I do not miss! You are my confidante! You are my messenger with whom I achieve my wants!' Thus half of his army is desire, the other half being anger."

The house, the wife and the horse are bad luck-(Shahih Muslim 26.5523)

Book 026, Number 5523:

'Abdullah b. 'Umar reported Allah's Messenger (may peace be upon him) as saying: If there be bad luck, it is in the house, and the wife, and the horse.

Women are more harmful to men than anything else-(Shahih Muslim 36.6603)

Book 036, Number 6603:

Usama b. Zaid reported Allah's Messenger (may peace be upon him) as saying: I have not left after me any (chance) of turmoil more injurious to men than the harm done to the men because of women.

Avoid the allurement of women-(Shahih Muslim 36.6606)

Book 036, Number 6606:

Abu Sa'id Khudri reported that Allah's Messenger (may peace be upon him) said: The world is sweet and green (alluring) and verily Allah is going to install you as vicegerent in it in order to see how you act. So avoid the allurement of women: verily, the first trial for the people of Isri'll was caused by women. And in the hadith transmitted on the authority of Ibn Bashshar the words are:" So that He should see how you act."

Never walk behind a woman (Ref: 7vol. II, p370)

Said ibn Jubayr said: "Temptation came to David (peace be upon him) merely through a glance. Therefore. He told his son (Solomon) (peace be upon him): "O my son! Walk behind a lion or a black cobra, but never walk behind a woman."

Women are damaging (Ibid, p371)

And the Messenger of God (peace and prayer be upon him) said: "A gaze is a poisoned arrow from Satan. Whoever abstains from it in fear of God shall receive from Him increase in faith, the sweetness of which he will feel in his heart."

He (peace and prayers be upon him) also said: "I leave behind me no temptation damaging to men than that of women."

Women are to be feared most (Ibid, p375)

And ibn Al Musayyid said at the age of eighty four when he had lost the use of one eyes, and was almost blind in the other: "In my opinion, women are to be feared more than anything else."

A few traditions on Muhmmad about women (Ref. 6, pp678-679)

"I have left no calamity more detrimental to mankind than women."

"Look to your actions and abstain from the world and from women, for verily the first sin which the children of Israel committed was on account of women."

Finally here is a warning for men. If your boss is a woman then think of changing your job.

p28.1 (1) (Ref. 8, p672)

The Prophet (Allah bless him and give him peace) said,

(1) "Men are already destroyed when they obey women."

Women are ungrateful; therefore, can't trust them.

The foundation of a family is the mutual trust among the family members especially between the husband and wife. Lack of trust will make it almost impossible to have a congenial environment to raise a family. So, how much trust a Muslim husband should put on his wife/s? The Islamic apologists no doubt will tell us that Islam puts the highest priority on family. So, this question is rather a stupid one. Well, let us see what the 'real Islam' has to say on trusting a woman.

Women should give charity and forgiveness because the majority of women will be in hell. The reasons are 1. women curse too much 2. they are ungrateful to their husbands 3.they are lacking in common sense 4. they are failing in religion 5. they rob the wisdom of the wise-(Shahih Muslim 1.0142)

Book 001, Number 0142:

It is narrated on the authority of 'Abdullah b. Umar that the Messenger of Allah observed: O womenfolk, you should give charity and ask much forgiveness for I saw you in bulk amongst the dwellers of Hell. A wise lady among them said: Why is it, Messenger of Allah, that our folk is in bulk in Hell? Upon this the Holy Prophet observed: You curse too much and are ungrateful to your spouses. I have seen none lacking in common sense and failing in religion but (at the same time) robbing the wisdom of the wise, besides you. Upon this the woman remarked: What is wrong with our common sense and with religion? He (the Holy Prophet) observed: Your lack of common sense (can be well judged from the fact) that the evidence of two women is equal to one man, that is a proof of the lack of common sense, and you spend some nights (and days) in which you do not offer prayer and in the month of Ramadan (during the days) you do not observe fast, that is a failing in religion. This hadith has been narrated on the authority of Abu Tahir with this chain of transmitters.

Because of Eve women are unfaithful towards their husbands-(Shahih Muslim 8.3471)

Book 008, Number 3471:

Abu Huraira (Allah be pleased with him) reported Allah's Messenger (may peace be upon him) as saying: Had it not been for Eve, woman would have never acted unfaithfully towards her husband.

The above two hadiths have sealed the fate of a Muslim woman for good. Firstly, the hadith says that women are ungrateful to their husband, and they cannot observe fully the religious rituals (like fasting) because the way Allah has created them. It is not the fault of a woman to have menstruation period. Why should then she be blamed for not fasting during her period? Who imposed this ban? Why was this prohibition obligatory, after all? What would a modern workingwoman think when she learns that Allah penalises her for the attribute that He himself gave her. Why is this devilish and whimsical Allah so cruel and unjust to her? Can some erudite pedagogue come forward and explain to us all?

All those are the questions that any sensible human being will ponder upon. Is it fair to relegate women to hell for the crime that they did not commit in the first place? How insulting is it when a wife hears that she is unfaithful to her husband just because Muhammad had said so? It is absolutely a gross injustice to women to label them as a bunch of ungrateful sinners who are at the mercy of their supposedly godly husbands. There is nothing a woman could do in her power to purge this derogatory treatment of her. It is because Allah has created her to be ungrateful. What a blunder Allah did at the time of Genesis? How absurd! How insulting! How about the fidelity of men to their wives? Surprisingly, both Qur'an and ahadith are completely reticent about this. Does this silence imply that men are always faithful to their wives? Shall we assume that men are created sinless and Allah imbued the women with all the sins? [One Bangladeshi professor who is now in Canada had retorted the other day in NFB that he is now a believer because Allah made opposite things such as day-night, hot-cold, man-woman, etc. I guess in the same vein, Allah made man sinless and to counter balance that He made women with all the sins!] Can we trust our wives in matters of wealth and property? These are silly questions, one would say. However, Islam is not silly with women. This is what the Dictionary of Islam cites about putting trust on your dear wife/s on matters of wealth and property.

Can't tell a wife secrets, amount of property-etc. no musical instruments for her (Ref: 6 p675)

As to the three things to be avoided in husband towards his wife:-

  1. Excess of affection, for this gives her the predominance and leads to a state of perversion. When the power is overpowered and the commander commanded, all regularity must infallibly be destroyed. If troubled with redundance of affection let him at least conceal it from her.
  2. Let him not consult her on matters of paramount importance; let him not make her acquainted with his secrets, nor let her know the amount of his property, or the stores he possesses, beyond those in present consumption, or her weakness of judgment will infallibly set things wrong.
  3. Let him allow her no musical instruments, no visiting out of doors, no listening to men's stories, nor intercourse with women noted for such practices; especially where any previous suspicion has been raised

What do all the women of the world feel when they read those three provisions of Islam? Women are not worth to be loved in excess, they are unintelligent to manage the affairs of property, wealth and business, no learning of musical instrument for them, they are not even be allowed outside home. I would just like to know the reactions from Megawati Sukarno Putri, the President of Indonesia, Begum Khaleda Zia, the Prime Minister of Bangladesh and Mrs. Helen Clark, the Prime Minister of New Zealand if they ever read this 'golden' treatment of women in Islam. If a woman cannot be trusted with the basic family matters, how can the world trust these women leaders to lead their nations- if we really go by Islamic way?

Wednesday, September 10, 2008

गुजारा भत्ता के लिए शादी जरूरी नहीं

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राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना है कि कोई औरत शादी किए बिना अगर किसी मर्द के साथ रहती है, उसे यदि मर्द छोड़ देता है तो औरत को गुजारा भत्ता मिलना चाहिए। महिला और बाल विकास मंत्रालय को भेजी गई अपनी सिफारिश में आयोग ने कहा कि कानून की धारा 125 के तहज दर्ज `पत्नी' की परिभाषा बदलने की जरूरत है। यह धारा गुजारा भत्ते के बारे में है।


घरेलू-हिंसा कानून में कानूनी तौर पर शादीशुदा और बिना शादी साथ-साथ रहने वालों को बराबर समझा गया है। राष्ट्रीय महिला आयोग धारा 125 में एक और बदलाव चाहता है। उसका कहना है कि यदि किसी महिला के संबंध पुरुष से जुड़ जाते हैं और पति उससे रिश्ता तोड़ लेता है, तब भी उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए। आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास के मुताबिक तलाक के 70 फीसदी मामलों में यह देखा गया है कि औरत को कसूरवार ठहराने के लिए उस पर दूसरे पुरुष संबंधों का आरोप लगाया जाता है।


धारा 125 में पत्नी, बच्चे, माता-पिता के लिए गुजारा भत्ते की व्यवस्था है। यह भी कहा गया है कि वही औरत गुजारा भत्ते का दावा कर सकती है जो पत्नी है, उसने तलाक दिया है या उसे तलाक दे दिया गया था फिर पति-पत्नी कानूनी तौर पर अलग हुए हैं और महिला ने दोबारा शादी नहीं की है। ऐसा भी अवसर होता है कि पुरुष औरत से झूठ बोलता है कि वह कुँआरा है, तलाकशुदा है या विधुर है और फिर, हिंदू विवाह कानून या अपने धर्म/जाति के नियमों का फायदा उठा कर बच जाता है।


- मिलाप




Monday, September 8, 2008

स्त्री की पिटाई का अधिकार दिया गया है ...

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स्त्री की पिटाई का अधिकार दिया गया है ...


दैहिक उत्पीड़न के कितने प्रकार हो सकते हैं- यदि यह प्रश्न किसी से किया जाए तो प्रत्येक आयु वर्ग वालों का अलग उत्तर होगा। इतना ही नही, अलग अलग- जीवनानुभव व जीवन स्तर वालों का भी अलग उत्तर होगा. इनमें सर से नख तक मार पीट से लेकर भोजन न देना जैसी क्रूरताएँ ही सम्मिलित नहीं हैं अपितु रोंगटे ख्जदे कर देने वाले सच भी सम्मिलित हैं। स्थिति तो यह है कि सर्वाधिक प्रकार इस उत्पीडन के हो सकते हैं। अभी गत दिनों जैसे एक आया द्वारा ९ माह की बच्ची की पिटाई के घिनौने दृश्य दिखाई दिए उसी कड़ी में जोड़ कर लोनावाला के रेलवे रिजर्व पोलिस के अधिकारी द्वारा किशोरों की जघन्यतम पिटाई के दृश्य भी जग जाहिर हुए, जिसमें वह बच्चों को पूर्णत: नग्न कर के उनके गुप्तांगों पर पेट्रोल डाल कर लाल मिर्च तक छिड़कता साक्षात् देखने को मिला, लाठी डंडों का तो अनंत जोर उसे मिला हुआ था ही।

ऐसे व अनेक विध प्रकार शारीरिक उत्पीड़न के मिल जाएँगे। जबकि यह भी सत्य है कि संसार में किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की सर्वथा भरसक भर्त्सना ही की जाती है। इन सभी प्रकारों में यदि कुछ विशेष प्रकार के उत्पीड़न केवल स्त्री के लिए सुरक्षित हों व वे अधिकार सम्मत भी कहे जाएँ - तो उसे क्या कहा जाएगा? इसके सम्बन्ध में अभी गत दिनों अबू धाबी से श्री शिरोमणि जी ने एक चौंकाने वाला लेख लिखा है। उसे मैं ज्यों का त्यों आप सभी के विचारार्थ यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ -----
- कविता वाचक्नवी





Does Islam permit a man to hit his wife?

- शिरोमणि

Please look at the links also . they have even important story of woman torture in islaam . christian hindu, jain sikh women who want to marry muslim must know this . along with quick divocre by word of mouth by men.









Yes, Islam allows man to beat-up his wives. Please read below:


We have some 20 Quranic translations in English and 99% of them used the word "beat them". There are at least half a dozen Bengali Translations, and they all used "beat them". For 1400 years there was no complaining of mistranslations or metaphor! When people now have begun to understand (by the courtesy of translations) people like you started to cover-up by bringing all these ludicrous excuses. How and why you think "beat them" could be a metaphor and what basis? How "beat them" could mean "Kiss them"?

If Koran is so difficult to understand then what was the purpose of giving Quran to those illiterate Arabs? Do you think you are the only Islamic pundit who understands Quran, and nobody else does? How it is possible that, when something in Quran is good and dandy—it is correct translation; but when something sounds not so good—it is wrong translation! !! Why this travesty? Give us one justification why we should defend on your self-distorted meaning of Quranic words or verses? Who are you? Are you the "GREAT POPE" of Islam?

Allah clearly asked Muslims to believe Quran's literal meaning and clearly forbade any interpretations of Allah's eternal divine words. Quranic verse: 3:7—clearly prohibited to accept anybody's interpretation of Allah's eternal words. Please read this verse below:

(Quran-3:7)— "He it is Who has revealed the Book to you; some of its verses are clear and decisive, they are the basis of the Book, and others are allegorical; then as for those in whose hearts there is perversity they follow the part of it which is allegorical, seeking to mislead and seeking to give it (their own) interpretation. but none knows its interpretation except Allah, and those who are firmly rooted in knowledge say: We believe in it, it is all from our Lord; and none do mind except those having understanding. "

Allah says in Quran that, "I made Qur'an very clear, simple and easy and written in Arabic (44:58, 54:22, 54:32, 54:40) so that Muslims (Arabs of course) can understand very easily?" Please listen what Merciful Allah says in Qur'an: " But We have indeed made the Qur'an easy to understand and remember: then is there any that will receive admonition? (54:22); and "We have made it a Qur'an in Arabic, that ye may be able to understand and learn wisdom (43:3)". Allah emphatically declared that He made Quran very easy so that Muslims can understand very easily.

No where in the Quran Allah says that my words must be read with the help of Quranic interpretations and commentaries! Quranic Interpretations and Tafsirs have been invented by some wishful educated Mullahs only to hide Quranic absurdities and contradictions. In fact, Quranic verses are mostly simple to understand and any elementary student can understand very easily. Therefore, claiming that Quran is difficult to understand is ludicrous and lame excuse only to hide Allah's myriads of inanities and flaws.

If you claim that islam gave women rights which is unheard of then please click to this URL address to read them from Quran and hadiths:
http://www.islam- watch.org/ AbulKasem/ WomenInIslam/ women_in_ islam6.htm
If you are so right, then tell me why in the whole world most oppressed women live in the Islamic countries?

Was the Khadija, a female merchant in pre-Islamic Arab an Islamic product? Are you out of your mind? Khadija was an established very rich merchant long before the arrival of Islam. Please read the history first before you do comment!

Your silly arguments (to hide beating wife) are simply rubbish and have no logic at all; hence they are even not fit for any counter comments. If we bring Quranic verses to substantiate our claim, you say, this must be supported by Sunnah. But if we bring Sunnah only, then you will say, it must be supported by Quran! Therefore below I am giving you one more time both from Noble Quran and Sahi Hadiths. Please do not tell me that we have brought these hadiths from the Zionists' tank!

Quran: 4.34
YUSUFALI: Men are the protectors and maintainers of women, because Allah has given the one more (strength) than the other, and because they support them from their means. Therefore the righteous women are devoutly obedient, and guard in (the husband's) absence what Allah would have them guard. As to those women on whose part ye fear disloyalty and ill-conduct, admonish them (first), (Next), refuse to share their beds, (And last) beat them (lightly); but if they return to obedience, seek not against them Means (of annoyance): For Allah is Most High, great (above you all). [Approved by Saudi Islamic council and by Saudi King]
PICKTHAL: Men are in charge of women, because Allah hath made the one of them to excel the other, and because they spend of their property (for the support of women). So good women are the obedient, guarding in secret that which Allah hath guarded. As for those from whom ye fear rebellion, admonish them and banish them to beds apart, and scourge them. Then if they obey you, seek not a way against them. Lo! Allah is ever High, Exalted, Great.
SHAKIR: Men are the maintainers of women because Allah has made some of them to excel others and because they spend out of their property; the good women are therefore obedient, guarding the unseen as Allah has guarded; and (as to) those on whose part you fear desertion, admonish them, and leave them alone in the sleeping-places and beat them; then if they obey you, do not seek a way against them; surely Allah is High, Great.
Koran-4:34: Men are the protectors and maintainers of women, because Allâh has made one of them to excel the other, and because they spend (to support them) from their means. Therefore the righteous women are devoutly obedient (to Allâh and to their husbands), and guard in the husband's absence what Allâh orders them to guard (e.g. their chastity, their husband's property, etc.). As to those women on whose part you see ill­conduct, admonish them (first), (next), refuse to share their beds, (and last) beat them (lightly, if it is useful), but if they return to obedience, seek not against them means (of annoyance). Surely, Allâh is Ever Most High, Most Great. [Saudi king's approved translation by: Dr. Muhammad Taqi-ud-Din Al-Hilali, Formerly Professor of Islamic Faith and Teachings, Islamic University, Al-Madinah Al-Munawwarah and Dr. Muhammad Muhsin Khan, Formerly Director, University Hospital, Islamic University, Al-Madinah Al-Munawwarah. "The
Noble Qur'an" – Published and freely distributed by His Excellency King Fahd Bin Abdul Aziz (Khademul Haramine Shareefine] .
Prophetic examples (which you desired) which encourages wife beating:

Volume 1, Book 9, Number 490:
Narrated 'Aisha:
The things which annul the prayers were mentioned before me. They said, "Prayer is annulled by a dog, a donkey and a woman (if they pass in front of the praying people)." I said, "You have made us (i.e. women) dogs. I saw the Prophet praying while I used to lie in my bed between him and the Qibla. Whenever I was in need of something, I would slip away. for I disliked to face him."
Volume 1, Book 6, Number 301:
Narrated Abu Said Al-Khudri:

Once Allah's Apostle went out to the Musalla (to offer the prayer) o 'Id-al-Adha or Al-Fitr prayer. Then he passed by the women and said, "O women! Give alms, as I have seen that the majority of the dwellers of Hell-fire were you (women)." They asked, "Why is it so, O Allah's Apostle ?" He replied, "You curse frequently and are ungrateful to your husbands. I have not seen anyone more deficient in intelligence and religion than you. A cautious sensible man could be led astray by some of you." The women asked, "O Allah's Apostle! What is deficient in our intelligence and religion?" He said, "Is not the evidence of two women equal to the witness of one man?" They replied in the affirmative. He said, "This is the deficiency in her intelligence. Isn't it true that a woman can neither pray nor fast during her menses?" The women replied in the affirmative. He said, "This is the deficiency in her religion."


Volume 7, Book 62, Number 33:
Narrated Usama bin Zaid:
The Prophet said, "After me I have not left any affliction more harmful to men than women."
Book 11, Number 2142:
Narrated Umar ibn al-Khattab:
The Prophet (peace_be_upon_ him) said: A man will not be asked as to why he beat his wife.
More of the same:
Women are according to the Qu'ran: can be beaten to make them obedient Q.4:34, Women's witness is only worth half of men's Q.2.282, women can receive only half of the inheritance of men Q.4.11, Women have unequal rights to divorce, Men may have 4 wives at a time and unlimited sex slaves. Even married women slaves who they capture are permitted for their enjoyment by the Islamic God Allah: Q.23:05-06, Q.4:24 "Also (prohibited are) women already married, except those whom your right hands possess….."Q.33:50 "O Prophet! We have made lawful to thee thy wives to whom thou hast paid their dowers; and those whom thy right hand possesses out of the prisoners of war whom Allah has assigned to thee….." Their marriages would be immediately dissolved by the Merciful Allah.


Volume 7, Book 62, Number 33:
Narrated Usama bin Zaid:
The Prophet said, "After me I have not left any affliction more harmful to men than women."
Sahih Muslim:8.3240:
The Prophet said, "A woman advances and retires in the shape of a devil; so when one of you sees a woman, he should come to his wife and have intercourse with her.

Please read the following hadith if you still thought that Islam has a lot of kind words reserved for women and is very merciful to them. In this hadith, Muhammad clearly declares that a woman is actually a devil in the guise of a human (albeit a female) being. There is no confusion on this matter. Is there any contextual issue for this hadith? I would really like to hear from the Islamic apologists who are always looking for contexts as to what they have to say on this hadith. Is the provision of this hadith applicable today or not? Shall we not consider a woman as an extension of the devil? What punishment Allah has reserved for the devil? Does not this hadith say that our mothers, wives, sisters, and daughter are actually devils? Could any one show me any secularist provision more misogynic than the content of this hadith?
A woman advances and retires in the shape of a devil; so when one of you sees a woman, he should come to his wife and have intercourse with her-(Shahih Muslim 8.3240)



Please listen to these three videos (just click to listen):






1. Islamic wife beating by Imam (video)

http://www.youtube. com/watch? v=iWGA8i6scYY


2. Manual of wife beating (video)

http://www.youtube. com/watch? v=Wp3Eam5FX58

3. Source of this uncivilized dictum

Koran-4:34:
Men are the protectors and maintainers of women, because Allâh has made one of them to excel the other, and because they spend (to support them) from their means. Therefore the righteous women are devoutly obedient (to Allâh and to their husbands), and guard in the husband's absence what Allâh orders them to guard (e.g. their chastity, their husband's property, etc.). As to those women on whose part you see ill­conduct, admonish them (first), (next), refuse to share their beds, (and last) beat them (lightly, if it is useful), but if they return to obedience, seek not against them means (of annoyance). Surely, Allâh is Ever Most High, Most Great. (Saudi king's approved translation)


004.034
YUSUFALI: Men are the protectors and maintainers of women, because Allah has given the one more (strength) than the other, and because they support them from their means. Therefore the righteous women are devoutly obedient, and guard in (the husband's) absence what Allah would have them guard. As to those women on whose part ye fear disloyalty and ill-conduct, admonish them (first), (Next), refuse to share their beds, (And last) beat them (lightly); but if they return to obedience, seek not against them Means (of annoyance): For Allah is Most High, great (above you all).

Note: Original verse in Arabic never tells to beat lightly. This "lightly" in the parenthesis was introduced by the civilized translator out of shame.


4. Islam is Peaceful video (please click this URL and then click to the pic).

http://islamwatcher s.blogspot. com/2007/ 08/islam- is-superior- to-all-religions .html


Circumsission:
Book 41, Number 5251:
Narrated Umm Atiyyah al-Ansariyyah:
A woman used to perform circumcision in Medina. The Prophet (peace_be_upon_ him) said to her: Do not cut severely as that is better for a woman and more desirable for a husband.
Women in Islam By Abul Kasem:

http://www.islam- watch.org/ AbulKasem/ WomenInIslam/ women_in_ islam6.htm

Mr. Amin sarker,

Thanks for your comments. It's not worth reading or commenting to this article by Mullah Abdul Halim (younger brother of another dishonest and hypocritical BD's Islamists Shaha A. Hannan) who simply distorts Koran to suit his own intention. His explanation is ludicrous and idiotic. We do not cahnge Koranic words, we take verses from authentic internationally accepted Koranic translations and we only comment on the basis of verses. I have already debated Mr. Halim in the past and he fled from the debate. So, it will be wastage of my time to make any comment to his distortions.

It is not good practice of blaming translations and wishful changing of word meaning to suit your own motive. If you people think all those 20 different famous Islamic scholars were wrong in their translations, then why don't you dump all those millions of translated Koran from the shelves and drawers of the millions of Muslims and from the tens of thousands of world's libraries and burn them all? Let your pundits like Shah A. Halim make a new Koran of own choice!!! Could you do this job Mr. Sarker? I promise, if you people can do this great job, then we will never come to comment about wife beating or anything else.

How do you claim that all these most famous Islamic scholars: Yousuf Ali, Pickthal, Shakir, Sunan-abu daoud, Ibn Ishaq, Imam Bukhari, Imam Muslim, Taqi-ud-Din- Hilali, Mohsin Khan— they all were wrong in their translations?

Why do you think people are so stupid to believe your silly logic, that when something in Koran is negative then it has to be bad translation? Why not entire translation is wrong? Why don't you say that stop reading any translated Koran and read it only in Arabic so that nobody can understand a word? How, you can change these hadiths by your translation bogus blame? Could you correct these Hadiths by your translation techniques?

Here are some sahi hadiths for Wife beating :

Sahi Muslim-4.2127

When sleeping with Aisha Muhammad surreptitiously left his bed and went to the graveyard at Baqi; Aisha spied on him and followed Muhammad; when Muhammad learned Aisha's misdeed he hit her (beat her) on her chest that caused much pain to Aisha…[This hadith is very long, please read yourself by the #)


Volume 1, Book 9, Number 490:
Narrated 'Aisha:
The things which annul the prayers were mentioned before me. They said, "Prayer is annulled by a dog, a donkey and a woman (if they pass in front of the praying people)." I said, "You have made us (i.e. women) dogs. I saw the Prophet praying while I used to lie in my bed between him and the Qibla. Whenever I was in need of something, I would slip away. for I disliked to face him."
Volume 1, Book 6, Number 301:
Narrated Abu Said Al-Khudri:

Once Allah's Apostle went out to the Musalla (to offer the prayer) o 'Id-al-Adha or Al-Fitr prayer. Then he passed by the women and said, " O women! Give alms, as I have seen that the majority of the dwellers of Hell-fire were you (women)." They asked, "Why is it so, O Allah's Apostle ?" He replied, "You curse frequently and are ungrateful to your husbands. I have not seen anyone more deficient in intelligence and religion than you. A cautious sensible man could be led astray by some of you." The women asked, "O Allah's Apostle! What is deficient in our intelligence and religion? " He said, " Is not the evidence of two women equal to the witness of one man?" They replied in the affirmative. He said, " This is the deficiency in her intelligence. Isn't it true that a woman can neither pray nor fast during her menses?" The women replied in the affirmative. He said, " This is the deficiency in her religion."


Volume 7, Book 62, Number 33:
Narrated Usama bin Zaid:
The Prophet said, "After me I have not left any affliction more harmful to men than women."
Book 11, Number 2142:
Narrated Umar ibn al-Khattab:
The Prophet (peace_be_upon_ him) said : A man will not be asked as to why he beat his wife.
More of the same:
Women are according to the Qu'ran: can be beaten to make them obedient Q.4:34, Women's witness is only worth half of men's Q.2.282, women can receive only half of the inheritance of men Q.4.11, Women have unequal rights to divorce, Men may have 4 wives at a time and unlimited sex slaves. Even married women slaves who they capture are permitted for their enjoyment by the Islamic God Allah: Q.23:05-06, Q.4:24 "Also (prohibited are) women already married, except those whom your right hands possess….." Q.33:50 "O Prophet! We have made lawful to thee thy wives to whom thou hast paid their dowers; and those whom thy right hand possesses out of the prisoners of war whom Allah has assigned to thee….." Their marriages would be immediately dissolved by the Merciful Allah.
Volume 7, Book 62, Number 33:
Narrated Usama bin Zaid:
The Prophet said, "After me I have not left any affliction more harmful to men than women."
Sahih Muslim:8.3240:
The Prophet said, "A woman advances and retires in the shape of a devil; so when one of you sees a woman, he should come to his wife and have intercourse with her.
Please tell me how can you change all these insults of women from Hadiths? Do you think you can fool the world by your utterly awkward and nonsensical excuse of translation problem? Besides, when you read the Koranic verse-4:34, do you see how insulting the entire verse is for women? Do you think only women could be bad or do wrong? Don't you think men also can do wrong to his wife? Can you bring some Koranic verses and hadiths to punish all bad husbands? Please tell your Islamic pundit Shah A. Halim or Shah Hannan to bring something for men too!

Hope I have made my message clear to you. Thanks.








On Sat, Sep 6, 2008 at 12:57 AM, LATEEF MOHAMMED KHAN wrote:








Question:
Does Islam permit a man to hit his wife?


Summary Answer:
Yes, but only if she doesn't do as he asks. The beating must cease if the woman complies with her husband's demands. Beating is also intended to be the last resort, behind verbal abuse and abandonment.
Muhammad, himself, is recorded as physically striking his favorite wife (from her own testimony). It is not known how he treated his less-favored wives.


The Qur'an:
Sura (4:34) - "Men are the maintainers of women because Allah has made some of them to excel others and because they spend out of their property; the good women are therefore obedient, guarding the unseen as Allah has guarded; and (as to) those on whose part you fear desertion, admonish them, and leave them alone in the sleeping-places and beat them; then if they obey you, do not seek a way against them; surely Allah is High, Great."


From the Hadith:

Bukhari (72:715) - A woman came to Muhammad and begged her to stop her husband from beating her. Her skin was bruised so badly that she it is described as being "greener" than the green veil she was wearing. Muhammad did not admonish her husband, but instead ordered her to return to him and submit to his sexual desires.

Muslim (4:2127) - Muhammad struck his favorite wife, Aisha, in the chest one evening when she left the house without his permission. Aisha narrates, "He struck me on the chest which caused me pain."

Abu Dawud (2141) - "Iyas bin 'Abd Allah bin Abi Dhubab reported the Apostle of Allah (may peace be upon him) as saying: Do not beat Allah's handmaidens, but when 'Umar came to the Apostle of Allah (may peace be upon him) and said: Women have become emboldened towards their husbands, he (the Prophet) gave permission to beat them. Then many women came round the family of the Apostle of Allah (may peace be upon him) complaining against their husbands. So the Apostle of Allah (may peace be upon him) said : Many women have gone round Muhammad's family complaining against their husbands. They are not the best among you." At first, Muhammad forbade men from beating their wives, but he rescinded this once it was reported that women were becoming emboldened toward their husbands. Beatings are sometimes necessary to keep women in their place.

Abu Dawud (2142) - "The Prophet (peace_be_upon_ him) said: A man will not be asked as to why he beat his wife."

Ishaq 969 - Commands that a married woman be "put in a separate room and beaten lightly" if she "act in a sexual manner toward others." According to the Hadith, this can be for an offense as petty as merely being alone with a man to whom she is not related.


Additional Notes:

Muslim apologists often squirm over this relatively straightforward Qur'an verse (4:34). Their masterful aerobics of denial inspired us to write an article:

Wife Beating- Good Enough for Muhammad, Good Enough for You

According to Islamic law, a husband may strike his wife for any one of the following four reasons:
- She does not attempt to make herself beautiful for him (ie. "let's herself go")
- She refuses to meet his sexual demands
- She leaves the house without his permission or a "legitimate reason"
- She neglects her religious duties
Any of these are also sufficient grounds for divorce.

Finally, when Muslim apologists sometimes say that Muhammad commanded that women not be harmed, they are actually basing this on what he said before or during battle, such as in Bukhari (59:447), when Muhammad orders that all the men of Quraiza be killed and the women and children be taken as slaves. (Having your husband murdered and being forced into sexual slavery apparently doesn't qualify as "harm" under the Islamic model).

But, in fact, there are a number of cases in which Muhammad did have women killed in the most brutal fashion. One was Asma bint Marwan, a mother or five, who wrote a poem criticizing the Medinans for accepting Muhammad after he had ordered the murder of an elderly man. In this case, the prophet's assassins literally pulled a sleeping infant from her breast and stabbed her to death.

After taking Mecca in 630, Muhammad also ordered the murder of a slave girl who had merely made up songs mocking him। The Hadith are rife as well with accounts of women planted in the ground on Muhammad's command and pelted to death with stones for sexual immorality.


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