Tuesday, October 7, 2008
औरत
Labels: POETRY: DEDICATED TO WOMEN, REAL LIFE OF A WOMAN, Women, कविता, जीवन और यथार्थ, स्त्रीविमर्श 2 commentsऔरत
- चन्द्रकान्त देवताले
वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है
पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है
वह औरत
आकाश और धूप
और हवा से वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूँथ रही है?
गूँथ रही है मनों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है
एक औरत
दिशाओं के सूप में
खेतों को फटक रही है
एक औरत
वक्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गईं , एड़ी घिस रही है
एक औरत
अनन्त पृथ्वी को अपने स्तनों में
समेटे दूध के झरने बहा रही है
एक औरत
अपने सिर पर घास का गट्ठर रखे
कब से
धरती को नापती ही जा रही है
एक औरत
अंधेरे में खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती
शताब्दियों से सोई है
एक औरत का धड़ भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव जाने कब से
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं।
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Sunday, October 12, 2008 5:37:00 AM
आपके खूबसूरत ब्लॉग पर सैर कर आनंद होता है आपका मेरे ब्लॉग पर आगमन मेरा सौभाग्य है कृपया आगमन नियमित बनाए रखे
मेरी नई रचना दिल की बीमारी पढने आप सादर आमंत्रित हैं
Saturday, January 03, 2009 3:56:00 PM
bahut sundar lekhan hai aapka.