Tuesday, October 7, 2008

ब्लॉग्गिंग से उपजी मर्दवादी निरंकुशता

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ब्लॉग्गिंग से उपजी मर्दवादी निरंकुशता
- कविता वाचक्नवी




ब्लॉग्गिंग ने भले ही हर किसी की छपने की लालसा को बड़ा रास्ता दे दिया हो और भले ही कोई कुछ भी लिख मारने में खूब स्वछंदतावादी होने की और छपास मिटाने की मौज ले रहा हो, पर एक बात जो खटकती है वह यह कि विद्वान व सम्पादकीय सूझ वाले माध्यम से छपने और इस प्रकार छपने में जो एक सम्पादकीय अंकुश होता था, उसके अभाव के परिणाम ब्लॉग - समाज में खूब देखने में आ रहे हैं| आत्मानुशासन में दीक्षित न होने पर ऐसे अंकुश की आवश्यकता रहती ही है।

स्त्री पर लिखना, स्त्री- विषयों की चर्चा अपने ब्लॉग पर करना (अहेतुक?) ब्लॉग पर आने वाली टिप्पणियों के लोभ में तो होता ही है पर गर्मागर्म "सत्यकथाएँ" जैसी अधिक सर्कुलेशन वाली पत्रिकाएँ बनने की लालसा ही बहुधा इनमें निहित रहती ही है, साथ ही इन विषयों में पुरुषों को जो रसातीत( रासातीत ) आनंद आता है उसकी भी भूमिका असंदिग्ध होती है । स्त्री के कपड़े पहनने और उतारने के मुद्दे तो इतने प्रिय हैं ऐसे ब्लोगर्स को कि क्या कहें; और वे बार बार खुल कर लिखते चले आ रहे हैं कि स्त्री को पूरी न ढकी हुई देखने की अवस्था में वे उसके उपभोग को जायज करार देते हैं | (मैंने पूर्व में भी लिखा था कि ) एक बलोगर ( सारथी : शास्त्री जे.सी .फिलिप) ने तो इस आशय तक का लिखा कि कम वस्त्र में स्त्री को देख कर होने वाली उत्तेजना के फलस्वरूप ही बलात्कार होते हैं अत: ऐसी उत्तेजना पुरूष में पैदा करने वाली स्त्रियाँ ही वास्तव में मानसिक बलात्कार की दोषी हैं, उनके लिए दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए|

ऐसी ही अनेक प्रगल्भताऑं से भरे जमावड़े को उन जैसे कुछ ब्लॉगस पर देखा जा सकता है| रचना बहुधा ऐसे प्रत्येक जमावड़े से टक्कर लेने से नहीं चूकती हैं और हम सबके नारी ब्लॉग से हटकर दूसरे बलोग्स पर भी ललकार तक देती हैं|मेरी नीति है कि मैं ऐसे बलोग्स पर जाती ही नहीं, हाँ कभी जिक्र आ पड़ने पर देख भी लेती हूँ। आज भी ऐसा ही हुआ। रचना का मेल आने पर व उस प्रकरण पर प्रविष्टि लिखने पर मैंने जब पढ़ा तो स्वयं को अपने ही क्रोध से रोक नहीं पाई| रचना को उन लोगों के लिए लिखा संदेश भेजा कि -

"जब लोगों की चर्चित होने की इच्छा लत बन जाए तो वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। जिन लोगों को स्त्री को अनावृत्त( क्या स्त्री भला इतनी मूर्ख है कि वह नंगी होकर घूमेगी) देख कर हाजत लग जाती है, वे अपनी नन्हीं बेटियों तक को देख कर जाने कितनी बार क्या से क्या कर गुजर चुके होंगे, भगवान् जाने! या वे बेचारी बेटियाँ। वैसे समाचारपत्रों में भी नित अब तो पिता द्वारा बेटी से मुँह काले करने के कारनामे चमचमाते हैं,(और युगों से ही) ८५प्रतिशत बलात्कारी घर के ही होते आए हैं। इन्हें अपनी काली करतूतों पर गर्व है और अपनी औलादों को भी ये ऐसे ही तथाकथित मर्दवादी बनाने में लगे हैं तो रचना को भला पेट में क्यों दर्द होता है? और दर्द का ईलाज भी ये ही मान्यवर बताएँगे। कुंठित मर्दवादी परिवारों में पले बढ़े लोग ऐसे ही होते हैं, रचना! ऐसे लोगों के चटखारे लेने के लिए लिखे गए वक्तव्यों पर नजर डालना भी अपनी तौहीन है। सत्यकथाएँ और मनोहर कहानियाँ को पढ़ने वालों की संख्या निस्सन्देह `सरस्वती' को पढ़ने वालों से १० गुना अधिक होती ही है। भीड़ जुटाने का मनोविज्ञान नट से बेहतर किसे आता है? उन अर्थों में ये लोग नट ही हैं। ऐसे ही लोग समुद्रतटों पर धूप नहीं केवल आँखें सेंकने जाया करते हैं| उस उत्तेजना में रस लिया करते हैं |


चालाक और धूर्त पुरुषों ने ही स्त्री को हवा और प्रकाश तक से वंचित करने के तर्क गढ़ लिए, अन्यथा स्त्री के समाज में चंडी बनकर आते ही इन सब जैसों की भैरव मंडली का अन्त न हो जाता?


पाश्चात्य देशों में किसी के पास इतनी फ़ुरसत तक नहीं है, न किसी को रुचि है, न वे ऐसी अनधिकार चेष्टा करते हैं कि स्त्री के वस्त्र और परिधान तक के निर्णायक बनें।


अगर स्त्री को देखने मात्र से ये स्खलित हुए जाते हैं तो क्या खा कर गांधी जी के चरण की चप्पल के नीचे के थूक तक में लिपटे एक रजकण तक पहुँचने की भी किसी की सामर्थ्य है भला? क्योंकि गांधी बाबा तो अपने चरित्र की परीक्षा के लिए पत्नी से इतर स्त्रियों के साथ नग्नावस्था में सोने का सफल प्रयोग करते रहे हैं। उनका तो चरित्र न भ्रष्ट हुआ.


इस लिए महानुभावो (?)! अपने चरित्र का इलाज करवाएँ। आने वाली पीढियाँ दुआ देंगी। ....... या कम से कम कोसेंगी तो नहीं।"

आमीन !

औरत

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औरत
- चन्द्रकान्त देवताले






वह औरत

आकाश और पृथ्वी के बीच

कब से कपड़े पछीट रही है

पछीट रही है शताब्दियों से

धूप के तार पर सुखा रही है

वह औरत

आकाश और धूप

और हवा से वंचित घुप्प गुफा में

कितना आटा गूँथ रही है?

गूँथ रही है मनों सेर आटा

असंख्य रोटियाँ

सूरज की पीठ पर पका रही है

एक औरत

दिशाओं के सूप में

खेतों को फटक रही है

एक औरत

वक्त की नदी में

दोपहर के पत्थर से

शताब्दियाँ हो गईं , एड़ी घिस रही है

एक औरत

अनन्त पृथ्वी को अपने स्तनों में

समेटे दूध के झरने बहा रही है

एक औरत

अपने सिर पर घास का गट्ठर रखे

कब से

धरती को नापती ही जा रही है

एक औरत

अंधेरे में खर्राटे भरते हुए आदमी के पास

निर्वसन जागती

शताब्दियों से सोई है

एक औरत का धड़ भीड़ में भटक रहा है

उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं

उसके पाँव जाने कब से

सबसे

अपना पता पूछ रहे हैं।
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