Saturday, November 22, 2008

स्त्री के हमदर्दों की पोलमपोल

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मारे आसपास अनेक ऐसी घटनाएँ नित घटती रहती हैं, हम उन पर क्षोभ व्यक्त व्यक्त करते या जुगाली करते या रुचिपूर्वक आगे से आगे बढ़ाने के काम के अतिरिक्त कुछ नहीं करते हैं | किसी सकारात्मक पहल या जनचेतना की पहल का तो कहना ही क्या? संभवतः अधिकांश के मन में तब तक प्रतिरोध की भावना भी नहीं पनपती जब तक उनके अपने जीवन या सम्बन्धियों के साथ ऐसा नहीं हो जाता| आश्चर्य की बात नहीं की सम्बन्धियों के साथ ऐसा हो जाने के पश्चात भी घटना को दबा -छिपा देने वाला अनुपात बहुत बड़ा होगा| इतनी दुरभिसंधियों और प्रतिकूलताओं के पक्ष में खड़े हुए हम किस आधार पर सामाजिक परिवर्तन की अपक्षा करते हैं? हमने अपने देश की आधी ऊर्जा को तो अपनी ऐसी अकर्मण्यताओं अथवा शोषण के कारण कुंठित कर दिया ! फिर भला कैसे तो परिवार की या देश समाज की आने वाली पीढ़ी सजग उच्च मानवीय बोध वाली हो सकती है? ऐसी ही घटनाओं पर कम से कम कलम तो उठाइये| स्त्री से हमदर्दी जताने वाले अथवा उसके नाम पर अपने मठ पोसने वाले सामुदायिक संगठन और व्यक्ति कहाँ हैं? स्त्री से हमदर्दी केवल उसका उस से लाभ उठाने की भावना या गतिविधि से ही तो नहीं संचालित हो रहा, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है |

- कविता वाचक्नवी
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परत-दर-परत

वर्ग एकता का एक नमूना
- राजकिशोर

यह किस्सा दिल्ली का ही है, लेकिन आप चाहें तो इसे देश के किसी भी विश्वविद्यालय का किस्सा मान सकते हैं। हुआ यह कि एक सीनियर प्रोफेसर पर एक लड़की ने इलजाम लगाया कि उसने मेरे साथ "सेक्सुअल हैरेसमेंट" किया है। लड़की एमफिल करना चाहती थी। अपनी यह वैध इच्छा पूरी करने के लिए उसे प्रोफेसर की अनेक अवैध इच्छाएँ सहन करनी पड़ीं। जब वह रोज-रोज के इस हैरेसमेंट से आजिज गई, तो एक दिन उसने तय किया कि इस सिलसिले को रोकने के लिए अब कुछ करना ही चाहिए। उसने विश्वविद्यालय के अधिकारियों से लिखित शिकायत कर दी। प्रमाणस्वरूप अनेक विश्वसनीय साक्ष्य पेश किए। जाँच चल रही है। नतीजा क्या आएगा, यह अनुमान से परे है, क्योंकि हमारे देश में अदालत के बाहर न्याय एक विरल घटना है।


इसके बाद की घटनाएँ इससे ज्यादा दुखद हैं। जिस प्रोफेसर मित्र से इस घटना की जानकारी मिली, उनसे मैंने अनुरोध किया कि वे अभियुक्त प्रोफेसर को तुरंत इस्तीफा देने के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते। अकेले सफल होने की संभावना दिखती हो, तो समूह में जा कर उनसे बिनती करें। कारण यह कि मामला सार्वजनिक हो जाने के बाद भी अभियुक्त प्रोफेसर में परिताप का कोई भाव पैदा नहीं हुआ है। दूसरे, सरस्वती के मंदिरों में मूल्यों का सम्मान नहीं होगा, तो कहां होगा? लेकिन मेरे मित्र चुप रहे। उनकी कसमसाहट बता रही थी कि प्राध्यापक बिरादरी का मामला है, इसलिए चुप रहना ही ठीक है। कानून को अपना काम करने दिया जाए।


कानून अपना काम करना होता, तो इस तरह की घटनाएँ बढ़तीं ही क्यों? कानून से कोई नहीं डरता, क्योंकि कानून लागू करने वालों ने डर का वातावरण नहीं बनाया है। ऐसी स्थिति में पेशा विशेष के लोग ही अपने कुछ आंतरिक नियम बना सकते हैं और उन्हें लागू कर सकते हैं। पत्रकारों से लगातार कहा जाता है कि वे अपनी आचार संहिता खुद बनाएं। यह बात शिक्षकों पर भी लागू होती है। कानूनी प्रावधानों के अलावा एक नैतिक आचार संहिता भी होनी चाहिए जिसके पालन की जिम्मेदारी शिक्षक समुदाय संभाले। वास्तव में यह आचार संहिता तभी से अस्तित्व में है जब से गुरु-शिष्य का संबंध शुरू हुआ है। यह भी सच है कि इस संहिता का तभी से उल्लंघन भी होता रहा है। यह दुर्भाग्य हर संहिता के साथ जुड़ा हुआ है। कानून बनेगा तो तोड़ा भी जाएगा। यह चिंता की बात नहीं है। देखना यह चाहिए कि किसी समाज या शहर में कानून तोड़ने वालों की संख्या घट रही है, स्थिर है या बढ़ रही है। अफसोस है कि शिक्षकों द्वारा छात्र-छात्राओं के शोषण की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली में ही पिछले एक वर्ष में बहुत-से ऐसे मामले मीडिया में चुके हैं। पता नहीं कितने मामलों में शोषित लड़कियों ने अपनी संकोची जबान सिल रखी है। लड़कियां या स्त्रियां पुरुषों के अतिक्रमणों को चुपचाप सह लेती हैं और शोर नहीं मचातीं, इसका फायदा उठाने की परंपरा बहुत लंबी है। इस लिहाज से हम उस लड़की के अंतत: जाग उठे साहस की प्रशंसा करते हैं जिसने यह मामला विश्वविद्यालय के अधिकारियों को जांच के लिए सौंप दिया है। अन्याय पर चुप्पी साध लेना अन्यायी का साथ देना है।


चिंता का विषय यह भी है कि विश्वविद्यालय का शिक्षक समाज विचलित तो है, पर चुप भी है। निजी बातचीत में सभी कहते हैं कि यह प्रोफेसर दोषी है, पहले भी इस तरह के कांड करता रहा है और इसके सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन जब सामूहिक कार्रवाई की बात उठाई जाती है, तो सभी बगलें झांकने लगते हैं। यह रवैया पुरुष एकता की एक बुरी मिसाल है। सबको ब्लैकमेल और शोषण की शिकार लड़की से सहानुभूति है। लेकिन कोई नहीं चाहता कि प्रोफेसर की नौकरी चली जाए। लड़की का आत्मसम्मान धीरे-धीरे बहाल हो जाएगा, लोग इस घटना को भूल जाएंगे, पर इस प्रोफेसर का क्या होगा? फिर, लड़कियों में अनुचित दिलचस्पी लेने की यह अकेली घटना नहीं है। आज एक के फटे में टांग अड़ाई जाएगी, तो कल दूसरों की भी बारी सकती है। शायद ऐसे ही कारणों से पुरुष प्रोफेसर सक्रिय होना नहीं चाहते। लेकिन महिला प्रोफेसरों को कुछ करने से कौन रोक रहा है? वैसे तो महिलाओं के दमन, शोषण आदि की चर्चा खूब होती है, इस विषय पर लंबे-लंबे प्रबंध लिखे जाते हैं। लेकिन एक सताई गई लड़की को न्याय दिलाने के लिए विश्वविद्यालय का स्त्री शिक्षक समुदाय भी आगे नहीं रहा है। अगर ऐसी ही घटना किसी महिला प्रोफेसर के साथ हुई होती, तो हम सब देखते कि रोज कितनी ढोलें बज रही होतीं। हम एस वर्ग एकता के सदके जाते हैं।


इस तरह की ट्रेड यूनियनी एकता सभी वर्गों, पेशों और समुदायों में देखी जाती है। चिकित्सक चिकित्सकों की गलतियां छिपाते हैं, पुलिस पुलिस का बचाव करती है, नेता नेता का साथ देता है और अफसर अफसर के काम आता है। मजदूर को मजदूर में कोई कमी दिखाई नहीं पड़ती, दलित हर हाल में दलित के साथ होता है, दुकानदार दुकानदारों का और उद्योगपति उद्योगपतियों का पक्ष लेते हैं। यह क्या है? क्यों है? न्याय-अन्याय के प्रश्न ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या समुदायगत स्वार्थ के? हम अभी तक स्वार्थ और हित के बीच फर्क करने की तमीज नहीं जुटा पाए हैं। जो समुदाय अपने दोषी सदस्यों का बचाव करता है, वह अपने समुदाय के अपराधीकरण को प्रोत्साहित करता है।


यहां भक्तराज विभीषण की याद आती है। वे लंका के चंद व्यक्तियों में थे जो मानते थे कि रावण कुमार्ग पर चल रहा है। विभीषण ने अपने कुपथगामी भाई को समझाने की बहुत कोशिश की। इसका नतीजा यह हुआ कि विभीषण को लंका छोड़नी पड़ी। बाद में रावण मारा गया और विभीषण को सत्य का पक्ष लेने और उसके लिए सुविधाओं का त्याग करने का पुरस्कार मिला। विभीषण ने राज्य के लोभ में नैतिक दृढ़ता नहीं दिखाई थी -- उन्होंने परिणामों की चिंता किए बगैर ईमान का काम किया था। लेकिन भारत की जनता ने आज तक विभीषण को माफ नहीं किया है। उन्हें इन्हीं शब्दों में याद किया जाता है - घर का भेदी लंका ढाहे। यह स्वार्थ बुद्धि है। न्याय की खातिर कोई भी सही कदम उठाना जायज है। पाप का भंडा फोड़ने के लिए आज विभीषणों की जरूरत जितनी ज्यादा है, उतनी पहले कभी नहीं थी।

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