Monday, April 5, 2010

मानववाद का ही एक अंग है नारीवाद

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मानववाद का ही एक अंग है नारीवाद

राजकिशोर 




मानववाद का ठीक-ठीक अर्थ क्या है, मैं नहीं जानता। इसे ले कर मानववाद की धाराओं के बीच भी मतभेद है। इसलिए मानववाद को इस रूप में परिभा।षित करना उपयोगी और निरापद, दोनों जान पड़ता है कि मनुष्यता ने जो कुछ भी श्रेष्ठ अर्जित किया है, वही मानववाद है। इससे बहुत तरह के झंझट खत्म हो जाएंगे। कोई पूछ सकता है कि क्या इस्लाम भी मानववाद है और मार्क्सवाद भी ? मैं कहूंगा, हां। इस्लाम या ईसाइयत या बुद्ध मार्ग तब का मानववाद था और मार्क्सवाद आज का मानववाद है। यह नहीं कि दोनों में फर्क नहीं है। फर्क है और बहुत बुनियादी फर्क है। लेकिन यह फर्क देश और काल का है। बुद्ध मार्ग ने तब तक के मानववाद में संशोधन किया और अपना बहुत कुछ जोड़ कर उसे एक नया रूप दिया। लेकिन कालांतर में यह मत भी असंतोषजनक हो गया, क्योंकि बुद्ध के बाद उनके मार्ग पर चलनेवालों ने अपने समय के अनुसार तथा ज्ञान के नए रूप आ जाने के बाद भी अपने मत में संशोधन नहीं किया। मानवता आगे बढ़ती रही और पुराने मतावलंबी पीछे छूटते गए। जिद मूल्यों को ले कर होनी चाहिए, मत और विचार को ले कर नहीं। जो अपने विचार को स्थगित कर देता है, वह स्वयं स्थगित हो जाता है। ऐसे स्थगित व्यक्ति, समूह और समुदाय दुनिया के किसी भी कोने में देखे जा सकते हैं। इन्हें एक तरह का आदिवासी कहा जाए, तो कैसा रहे? 



मानववाद को इस तरह परिभाषित करने से यह समझ भी बनती है कि जैसे मनुष्य किसी एक जगह ठहरा हुआ नहीं रह सकता, उसी तरह मानववाद का कोई एक रूप या संस्करण भी ठहरा हुआ नहीं सकता। सभी युगों के बुद्धिमान स्त्री-पुरुष उसमें अपना अंशदान करते हैं। अर्थात मानववाद की लंबी परंपरा है। इसलिए मानववाद की कोई शाखा गर्व नहीं कर सकती कि उसकी अपनी समझ ही वास्तविक समझ है। बेशक किसी मुद्दे पर मानवादियों में गंभीर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह तो वैज्ञानिकों में भी होता है। मानववाद पर चर्चा के सिलसिले में विज्ञान को बीच में लाना बहुत ही मुनासिब है, क्योंकि सोचने और जीने का भी एक वैज्ञानिक आधार होता है। दोनों ही मामलों में तर्क और विवेक की भूमिका सर्वोपरि है। भावनाओं का भी अपना महत्व है, बल्कि यों कहिए कि विशेष महत्व है, क्योंकि कोई भी आदमी इतना पूर्ण नहीं है कि वह हमेशा तर्क से परिचालित होता रहे; अधिकतर तो वह भावनाओं का दास होता है। जो तर्क और विवेक को मुसीबत मान कर उससे पीछा छुड़ा लेता है और अपनी किसी विशेष भावना के साथ चिपका रहता है, उसे भी अपने ढंग से जीने का अधिकार है, बशर्ते कि इससे किसी और का नुकसान न होता हो। जो अपनी प्राणप्यारी के मर जाने के बाद बाकी जीवन वैधव्य में ही बिता देता है, वह भी ठीक है और वह भी जो दूसरी स्त्री को अपने जीवन में ले आता है। इसके बावजूद इस पर जोर देने की जरूरत है कि विचारों की तरह भावनाओं को भी मानवीय आधार पर अनुशासित करने की जरूरत है, अन्यथा दुनिया में अराजकता फैल जाएगी और बहुत-से जरूरी कार्य-व्यापार रुक जाएंगे। 



इस संदर्भ में नारीवाद पर विचार किया जाए, तो वह मानववाद का ही एक अंग ठहरता है। नारीवाद को विचार की एक अलग शाखा के रूप में स्थापित करने की जरूरत इसलिए पड़ी कि मानववादियों ने उस समझ का विकास करने में दिलचस्पी नहीं ली, जो नारीवाद की धारा में विकसित होती रही है। लेकिन नारीवाद मानववाद का क्षेपक नहीं है। यह उसका अनिवार्य विकास है। यही कारण है कि नारीवादी विचार का विकास करने में पुरुष चिंतकों का भी निर्णायक योगदान रहा है। महात्मा फुले जितने मानववादी थे, उससे कम नारीवादी नहीं थे। इस सिलसिले में जॉन स्टुअर्ट मिल का नाम विशेष आदर के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने अपने पिछड़े हुए समय में न केवल स्त्रियों की पराधीनता पर एक लंबा निबंध लिखा, जो आज भी कम उपयोगी नहीं है, बल्कि अपनी प्रेम पात्र हैरिएट टेलर से विवाह करने के पूर्व एक ऐसे दस्तावेज पर दस्तखत किया, जो आज भी उतना ही क्रांतिकारी है जितना तब था। 



इस दस्तावेज को उद्धृत करने का मोह त्यागने के लिए मैं इसलिए तैयार नहीं हूं, क्योंकि आज के युवक इस तरह के दस्तावेज पर दस्तखत करके ही विवाह दफ्तर में जाएं तो बहुत अच्छा हो। इस प्रतिज्ञा पत्र में मिल लिखते हैं, 'जिस एकमात्र स्त्री को मैंने जाना है और जिसके साथ मैंने वैवाहिक संबंध बनाया होता, उससे मेरा विवाह होनेवाला है। इस विवाह के लिए उसकी अनुमति मिल जाने पर मैं अत्यंत प्रसन्न होऊंगा। लेकिन कानून में वैवाहिक संबंध की जो स्थिति है, वह ऐसी है जिसे हम दोनों ही अमान्य करते हैं, क्योंकि अन्य चीजों के अलावा वह वैवाहिक अनुबंध के दोनों पक्षों में से एक को दूसरे के शरीर, संपत्ति और स्वतंत्रता पर हावी होने का कानूनी अधिकार तथा नियंत्रण देती है - इसमें दूसरे पक्ष की इच्छा या सहमति न हो, तब भी। चूंकि मेरे पास कोई ऐसा कानूनी जरिया नहीं है जिससे मैं अपने को इन कुत्सित अधिकारों से वंचित कर सकूं (मैं ऐसा जरूर करता यदि ऐसी व्यवस्था हो सकती जो कानूनी रूप से मुझ पर लागू होती हो), अत: विवाह का जो मौजूदा कानून एक पक्ष को ऐसे अधिकार प्रदान करता है, उसके प्रति अपना लिखित प्रतिवाद दर्ज कराना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं तथा विधिवत यह प्रतिज्ञा करना भी कि मैं किसी भी स्थिति में तथा किसी भी प्रकार से इन (कुत्सित) अधिकारों का इस्तेमाल नहीं करूंगा। यदि श्रीमति टेलर और मेरा विवाह संपन्न हो जाता है, तो उस स्थिति में मैं अपनी यह इच्छा और इरादा तथा इस संबंध की यह शर्त घोषित करता हूं कि उसे उसकी इच्छानुसार कार्य करने तथा अपने आपको तथा उस सबको जो उसके पास है अथवा भविष्य में आएगा, अपने ढंग से व्यवस्थित करने का इस तरह पूर्ण अधिकार होगा जैसे हमारे बीच यह विवाह हुआ ही न हो तथा इस विवाह के द्वारा मुझे जो भी अधिकार मिलते प्रतीत होते हैं, उनका मैं पूरी तरह से परित्याग करता हूं तथा उनका खंडन करता हूं।' आज की नारीवादी हो सकता है इससे भी ज्यादा की मांग करे, लेकिन इतना भी मिल जाए, तो क्या वह कम होगा ? 



नारीवादियों की यह शिकायत बहुत सही है कि जो अपने को मानववादी बताते हैं, उनमें भी मर्दवाद के तत्व दिखाई पड़ते हैं। इसका कारण यह है कि बहुत-से मानववादी भले ही कुछ मामलों में या बहुत-से मामलों में न्यायप्रिय तथा प्रगतिशील हो गए हों, किन्तु स्त्री तथा परिवार के प्रति अपने नजरिए में वे रूढ़ संस्कारों से परिचालित होते हैं। इस तरह की संस्कारबबद्धता प्रायः सभी में दिखाई पड़ती है। इससे विचलित होने की जरूरत नहीं है। अगर किसी में कोई कमी है, तो उसकी आलोचना की जानी चाहिए, लेकिन इस तरह नहीं कि उसके पुण्य भी धुल जाएं। नारीवाद अपने को जितना अधिक उदार और लोकतांत्रिक बनाएगा, वह समाज में उतना ही स्वीकार्य होगा। यह कहना कि हमें समाज की परवाह नहीं है, बेकार का दुःसाहस है, क्योंकि नारीवाद का मुख्य उद्देश्य तो समाज की व्यवस्था और मानसिकता में परिवर्तन लाना ही है। समाज से बहस करना, उसे अपने मत में दीक्षित करने का प्रयास करना और अपनी पवित्र जिदों पर अडिग रहना एक बात है और समाज को गधा या कुत्ता समझना बिलकुल दूसरी बात। सच तो यह है कि समाज में बदलाव लाने की ख्वाहिश रखनेवालों को समाज की सबसे ज्यादा परवाह होनी चाहिए। जिससे आप प्रेम नहीं करते, उसे उपदेश देने का आपको क्या अधिकार है ? और, वह आपकी बात पर गौर भी क्यों करेगा ? 



अगर नारीवाद में कड़वाहट और गुस्सा दिखाई पड़ता है, तो यह नितांत स्वाभाविक है। अफ्रीका और अमेरिका के नीग्रो साहित्य और भारत के दलित साहित्य में भी इससे कम कड़वाहट और गुस्सा दिखाई नहीं पड़ता। यह गुस्सा मार्क्स और एंगिल्स के लेखन में भी दिखाई देता है। वस्तुतः जो भी समुदाय जाग उठता है और अपने साथ होनेवाले अन्यायों और अत्याचारों को पहचानना शुरू करता है, उसमें गुस्सा न दिखाई पड़े तो यह नाआदमीयत है। लेकिन परिपक्वता आने पर गुस्से की गरमी कम हो जाती है और उसकी रोशनी बढ़ने लगती है। इसे जर्मेन गियर की प्रारंभिक (द फीमेल युनक) और बाद की कृतियों (द होल वीमेन) के मिजाज की तुलना करके समझा जा सकता है। भारत का नारीवाद अभी विस्फोटक गुस्से के स्टेज में है। हम इसे समझते हैं और इसका स्वागत करते हैं। साथ ही, भविष्य में इससे बेहतर की उम्मीद करते हैं। क्योंकि, गुस्से से दुनिया को बदलने का जज्बा पैदा होता है, पर दुनिया को बदलने का शऊर हासिल करने के लिए और भी चीजों की दरकार है। 



इस सिलसिले में इस्लामी नारीवाद, ईसाई नारीवाद और यहूदी नारीवाद (शुक्र है कि हिन्दू नारीवाद नाम की कोई चीज नहीं है) जैसे शब्दों से भड़कने या बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है। चिनगारी जहां भी दिखाई दे, वह स्तुत्य है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि मानववाद आज जा कर वैज्ञानिक हुआ है, इसके पहले तो वह धर्म की छतरी तले ही विकसित हुआ था। जैसे आज मुस्लिम स्त्रियां कह रही हैं कि हम मुल्लों और मौलानाओं के फतवों को अमान्य करते हैं और वही करेंगे जिसे हम कुरआन का आदेश समझेंगे, उसी तरह कभी ईसाई मर्दों और औरतों ने भी घोषणा की थी कि हमारा असली शिक्षक ईसा मसीह है, पोप या कोई और धर्माधिकारी नहीं। गांधी जी ने कहा कि कोई यह साबित कर दे कि छुआछूत शास्त्रों द्वारा समर्थित है, तो मैं इन शास्त्रों का परित्याग कर दूंगा। उम्मीद करनी चाहिए कि आज ईश्वर की वाणी के वाहक माने जानेवाली बाइबल या कुरआन के हवाले से जिस सत्य पर जोर दिया जा रहा है, कल वही मानव बुद्धि और विवेक के आधार पर स्थापित किया जा सकेगा। ईश्वर की उपयोगिता तभी तक है जब तक आदमी अपने जीवन का चार्ज अपने हाथों में नहीं लेता। 



नारीवादियों को अपना कबीला अलग से बसाने की जरूरत नहीं है। स्त्री अधिकार मानव अधिकारों के बृहत्तर दायरे में ही आते हैं। नाराज लोग शुरू में अपनी अलग टोली बना लेते हैं। फिर जब उनकी शिकायतें दूर हो जाती हैं, वे अपने समुदाय में वापस शामिल हो जाते हैं। नारीवाद की नियति भी यही है। दूसरी तरफ, यह मानववाद का फर्ज है कि वह अपने शास्त्र में नारीवाद को उचित जगह दे। नारीवाद की मांग आखिर यही है कि स्त्रियों को पूर्ण मनुष्य का दरजा दिया जाए। मानववादी महसूस करते हैं कि पूर्ण मानव का दरजा अभी तक पुरुषों को भी नहीं मिल पाया है। प्रगतिशील पुरुष ही प्रगतिशील स्त्री का सच्चा साथी हो सकता है। इसलिए साझा संघर्ष की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। यह कब होगा पता नहीं। व्यक्तिगत रूप से मैं यही कह सकता हूं, चंद रोज और मेरी जान, फकत चंद ही रोज।

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