Saturday, October 15, 2011

सरोज-स्मृति

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निराला जी की पुण्यतिथि (15 अक्तूबर , 1961) पर विशेष


पुत्री की मृत्यु पर लिखी शोकान्तिका
सरोज-स्मृति











प्रभु जोशी की तूलिका से बना चित्र





ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!" --



अशब्द अधरों का सुना भाष,
मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश
मैंने कुछ, अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर।
जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर
छोड़ कर पिता को पृथ्वी पर
तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --
"जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,
तारूँगी कर गह दुस्तर तम?" --

कहता तेरा प्रयाण सविनय, --
कोई न था अन्य भावोदय।
श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार
शुक्ला प्रथमा, कर गई पार!



धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।
शुचिते, पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अत: दधिमुख।
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख न सका वे दृग विपन्न;
अपने आँसुओं अत: बिम्बित
देखे हैं अपने ही मुख-चित।



सोचा है नत हो बार बार --
"यह हिन्दी का स्नेहोपहार,
यह नहीं हार मेरी, भास्वर
यह रत्नहार-लोकोत्तर वर!" --
अन्यथा, जहाँ है भाव शुद्ध
साहित्य-कला-कौशल प्रबुद्ध,
हैं दिये हुए मेरे प्रमाण
कुछ वहाँ, प्राप्ति को समाधान





पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त
गद्य में पद्य में समाभ्यस्त। --
देखें वे; हसँते हुए प्रवर,
जो रहे देखते सदा समर,
एक साथ जब शत घात घूर्ण
आते थे मुझ पर तुले तूर्ण,
देखता रहा मैं खडा़ अपल
वह शर-क्षेप, वह रण-कौशल।
व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल
क्रुद्ध युद्ध का रुद्ध-कंठ फल।
और भी फलित होगी वह छवि,
जागे जीवन-जीवन का रवि,
लेकर-कर कल तूलिका कला,
देखो क्या रँग भरती विमला,
वांछित उस किस लांछित छवि पर
फेरती स्नेह कूची भर।



अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
कुछ दिन को, जब तू रही साथ,
अपने गौरव से झुका माथ,
पुत्री भी, पिता-गेह में स्थिर,
छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर।
आँसुओं सजल दृष्टि की छलक
पूरी न हुई जो रही कलक

प्राणों की प्राणों में दब कर
कहती लघु-लघु उसाँस में भर;
समझता हुआ मैं रहा देख,
हटती भी पथ पर दृष्टि टेक।



तू सवा साल की जब कोमल
पहचान रही ज्ञान में चपल
माँ का मुख, हो चुम्बित क्षण-क्षण
भरती जीवन में नव जीवन,
वह चरित पूर्ण कर गई चली
तू नानी की गोद जा पली।
सब किये वहीं कौतुक-विनोद
उस घर निशि-वासर भरे मोद;
खाई भाई की मार, विकल
रोई उत्पल-दल-दृग-छलछल,
चुमकारा सिर उसने निहार
फिर गंगा-तट-सैकत-विहार
करने को लेकर साथ चला,
तू गहकर चली हाथ चपला;
आँसुओं-धुला मुख हासोच्छल,
लखती प्रसार वह ऊर्मि-धवल।
तब भी मैं इसी तरह समस्त
कवि-जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त
लिखता अबाध-गति मुक्त छंद,



पर संपादकगण निरानंद
वापस कर देते पढ़ सत्त्वर
दे एक-पंक्ति-दो में उत्तर।
लौटी लेकर रचना उदास
ताकता हुआ मैं दिशाकाश
बैठा प्रान्तर में दीर्घ प्रहर
व्यतीत करता था गुन-गुन कर
सम्पादक के गुण; यथाभ्यास
पास की नोंचता हुआ घास
अज्ञात फेंकता इधर-उधर
भाव की चढी़ पूजा उन पर।
याद है दिवस की प्रथम धूप
थी पडी़ हुई तुझ पर सुरूप,
खेलती हुई तू परी चपल,
मैं दूरस्थित प्रवास में चल
दो वर्ष बाद हो कर उत्सुक
देखने के लिये अपने मुख
था गया हुआ, बैठा बाहर
आँगन में फाटक के भीतर,
मोढे़ पर, ले कुंडली हाथ
अपने जीवन की दीर्घ-गाथ।
पढ़ लिखे हुए शुभ दो विवाह।
हँसता था, मन में बडी़ चाह
खंडित करने को भाग्य-अंक,
देखा भविष्य के प्रति अशंक।



इससे पहिले आत्मीय स्वजन
सस्नेह कह चुके थे जीवन
सुखमय होगा, विवाह कर लो
जो पढी़ लिखी हो -- सुन्दर हो।
आये ऐसे अनेक परिणय,
पर विदा किया मैंने सविनय
सबको, जो अडे़ प्रार्थना भर
नयनों में, पाने को उत्तर
अनुकूल, उन्हें जब कहा निडर --
"मैं हूँ मंगली," मुडे़ सुनकर
इस बार एक आया विवाह
जो किसी तरह भी हतोत्साह
होने को न था, पडी़ अड़चन,
आया मन में भर आकर्षण
उस नयनों का, सासु ने कहा --
"वे बडे़ भले जन हैं भैय्या,
एन्ट्रेंस पास है लड़की वह,
बोले मुझसे -- 'छब्बीस ही तो
वर की है उम्र, ठीक ही है,
लड़की भी अट्ठारह की है।'
फिर हाथ जोडने लगे कहा --
' वे नहीं कर रहे ब्याह, अहा,
हैं सुधरे हुए बडे़ सज्जन।
अच्छे कवि, अच्छे विद्वज्जन।
हैं बडे़ नाम उनके। शिक्षित
लड़की भी रूपवती; समुचित
आपको यही होगा कि कहें
हर तरह उन्हें; वर सुखी रहें।'


आयेंगे कल।" दृष्टि थी शिथिल,
आई पुतली तू खिल-खिल-खिल
हँसती, मैं हुआ पुन: चेतन
सोचता हुआ विवाह-बन्धन।
कुंडली दिखा बोला -- "ए -- लो"
आई तू, दिया, कहा--"खेलो।"
कर स्नान शेष, उन्मुक्त-केश
सासुजी रहस्य-स्मित सुवेश
आईं करने को बातचीत
जो कल होनेवाली, अजीत,
संकेत किया मैंने अखिन्न
जिस ओर कुंडली छिन्न-भिन्न;
देखने लगीं वे विस्मय भर
तू बैठी संचित टुकडों पर।



धीरे-धीरे फिर बढा़ चरण,
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारुण्य सुघर
आईं, लावण्य-भार थर-थर
काँपा कोमलता पर सस्वर
ज्यौं मालकौस नव वीणा पर,
नैश स्वप्न ज्यों तू मंद मंद
फूटी उषा जागरण छंद
काँपी भर निज आलोक-भार,
काँपा वन, काँपा दिक् प्रसार।
परिचय-परिचय पर खिला सकल --
नभ, पृथ्वी, द्रुम, कलि, किसलय दल
क्या दृष्टि। अतल की सिक्त-धार
ज्यों भोगावती उठी अपार,
उमड़ता उर्ध्व को कल सलील
जल टलमल करता नील नील,
पर बँधा देह के दिव्य बाँध;
छलकता दृगों से साध साध।
फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर
माँ की मधुरिमा व्यंजना भर
हर पिता कंठ की दृप्त-धार
उत्कलित रागिनी की बहार!
बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि,
मेरे स्वर की रागिनी वह्लि
साकार हुई दृष्टि में सुघर,
समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।
शिक्षा के बिना बना वह स्वर
है, सुना न अब तक पृथ्वी पर!
जाना बस, पिक-बालिका प्रथम
पल अन्य नीड़ में जब सक्षम
होती उड़ने को, अपना स्वर
भर करती ध्वनित मौन प्रान्तर।
तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि,
जागा उर में तेरा प्रिय कवि,
उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज
तरु-पल्लव कलिदल पुंज-पुंज
बह चली एक अज्ञात बात
चूमती केश--मृदु नवल गात,
देखती सकल निष्पलक-नयन
तू, समझा मैं तेरा जीवन।



सासु ने कहा लख एक दिवस :--
"भैया अब नहीं हमारा बस,
पालना-पोसना रहा काम,
देना 'सरोज' को धन्य-धाम,
शुचि वर के कर, कुलीन लखकर,
है काम तुम्हारा धर्मोत्तर;
अब कुछ दिन इसे साथ लेकर
अपने घर रहो, ढूंढकर वर
जो योग्य तुम्हारे, करो ब्याह
होंगे सहाय हम सहोत्साह।"




सुनकर, गुनकर, चुपचाप रहा,
कुछ भी न कहा, -- न अहो, न अहा;
ले चला साथ मैं तुझे कनक
ज्यों भिक्षुक लेकर, स्वर्ण-झनक
अपने जीवन की, प्रभा विमल
ले आया निज गृह-छाया-तल।
सोचा मन में हत बार-बार --
"ये कान्यकुब्ज-कुल कुलांगार,
खाकर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
इस विषय-बेलि में विष ही फल,
यह दग्ध मरुस्थल -- नहीं सुजल।"
फिर सोचा -- "मेरे पूर्वजगण
गुजरे जिस राह, वही शोभन
होगा मुझको, यह लोक-रीति
कर दूं पूरी, गो नहीं भीति
कुछ मुझे तोड़ते गत विचार;
पर पूर्ण रूप प्राचीन भार
ढोते मैं हूँ अक्षम; निश्चय
आयेगी मुझमें नहीं विनय
उतनी जो रेखा करे पार
सौहार्द्र-बंध की निराधार।


वे जो यमुना के-से कछार
पद फटे बिवाई के, उधार
खाये के मुख ज्यों पिये तेल
चमरौधे जूते से सकेल
निकले, जी लेते, घोर-गंध,
उन चरणों को मैं यथा अंध,
कल ध्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऐसी नहीं शक्ति।
ऐसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह!"
फिर आई याद -- "मुझे सज्जन
है मिला प्रथम ही विद्वज्जन
नवयुवक एक, सत्साहित्यिक,
कुल कान्यकुब्ज, यह नैमित्तिक
होगा कोई इंगित अदृश्य,
मेरे हित है हित यही स्पृश्य
अभिनन्दनीय।" बँध गया भाव,
खुल गया हृदय का स्नेह-स्राव,
खत लिखा, बुला भेजा तत्क्षण,
युवक भी मिला प्रफुल्ल, चेतन।
बोला मैं -- "मैं हूँ रिक्त-हस्त
इस समय, विवेचन में समस्त --
जो कुछ है मेरा अपना धन
पूर्वज से मिला, करूँ अर्पण
यदि महाजनों को तो विवाह
कर सकता हूँ, पर नहीं चाह
मेरी ऐसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूं यह नहीं सुघर,
बारात बुला कर मिथ्या व्यय
मैं करूँ नहीं ऐसा सुसमय।
तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम,
लग्न के; पढूंगा स्वयं मंत्र
यदि पंडितजी होंगे स्वतन्त्र।
जो कुछ मेरे, वह कन्या का,
निश्चय समझो, कुल धन्या का।"



आये पंडित जी, प्रजावर्ग,
आमन्त्रित साहित्यिक ससर्ग
देखा विवाह आमूल नवल,
तुझ पर शुभ पडा़ कलश का जल।
देखती मुझे तू हँसी मन्द,
होंठो में बिजली फँसी स्पन्द
उर में भर झूली छवि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर
तू खुली एक उच्छवास संग,
विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग,
नत नयनों से आलोक उतर
काँपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैनें वह मूर्ति-धीति
मेरे वसन्त की प्रथम गीति --
श्रृंगार, रहा जो निराकार,
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग --
भरता प्राणों में राग-रंग,
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदल कर बना मही।
हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन
कोई थे नहीं, न आमन्त्रण
था भेजा गया, विवाह-राग
भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;
प्रिय मौन एक संगीत भरा
नव जीवन के स्वर पर उतरा।
माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में, "वह शकुन्तला,
पर पाठ अन्य यह अन्य कला।"



कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यों अपार;
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त,
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;
वह लता वहीं की, जहाँ कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली,
अंत भी उसी गोद में शरण
ली, मूंदे दृग वर महामरण!



मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!





Saturday, October 8, 2011

..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है : जिंदा गाड़ दी गई लड़की

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 ..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है 

- कविता वाचक्नवी 




पिछले दिनों अलग अलग अवसरों पर जब महिला मुद्दों को लेकर मैंने जरा भी कुछ लिखा तो मेरे ब्लॉग की पोस्ट के बाद व्यक्तिगत रूप से या फेसबुक की वॉल पर टिप्पणी करते हुए अनेक पुरुष - रत्नों ने मुझे समझाईश दी कि कविता जी ज़माना बदल गया है अब कहाँ आप महिलाओं पर अत्याचार की बात करती हैं अब तो ...... आदि आदि अनादि... । 

..... और कुछ महापुरुषों ने तो इतने भद्दे कमेन्ट किए कि उनकी भाषा और विचार पढ़कर उनके प्रति वितृष्णा ही जागी कि कैसे कैसे लोग हैं। अस्तु ! 

आज इस बदले जमाने का सच उघाड़ती सचाई देखें -






कुछ लोग देते हैं कि महिलाओं के प्रति अत्याचार के लिए महिलाओं की ही अधिक भूमिका होती है, उसे क्यों नकारते हैं या पुरुष को क्यों दोषी ठहराते हैं। ऐसा तर्क देने वाले लोग जरा समाज-मनोविज्ञान या समाज शास्त्र आदि को गहराई से जानें समझेंगे तो पता चलेगा कि कभी यदि जब महिलाएँ ऐसा करती हैं तो क्यों करती हैं ।

 ..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है। 


बात यह नहीं है कि किसने गलत किया, बात यह है कि क्यों किया गया। हमारी सामाजिक बुनावट में वे कौन- से ऐसे तत्व हैं जो किसी को बाध्य करते हैं ऐसा करने को .... इस पर विचार किया जाना अनिवार्य है। 


ऐसा नहीं कि स्त्री ने जब ऐसा किया तो उसे समझने/ समझाने के लिए किन्हीं बड़े ग्रन्थों का पारायण अनिवार्य है और  न ही इन बातों पर नासमझी का तर्क देकर पीठ फेर लेने से काम चलता है कि केवल  शिक्षित व्यक्ति ही समाज की बनावट और बुनावट को समझ सकते हैं।  यह चीज पुस्तकों से अधिक समाज के मन को और उसकी गतियों को अधिक निकट से समझने की है। क्रिया और प्रतिक्रिया को देखने बूझने की है ,  `किसी ने ऐसा किया तो क्यों किया ' के विवेचन की है। 

जिस आयु में स्त्री माँ बनती है, उस आयु में भारतीय समाज व्यवस्था में वह मुखिया नहीं हो चुकी होती। उसके ऐसा करने के पीछे कई कारक होते हैं, उन कारकों को तलाशना जरूरी है। वे कारक कोई किताबों की चीज नहीं। तब जरा-सा ध्यान देने पर  समझ आ जाएगा कि स्त्री की भूमिका कितनी है और पुरुष की कितनी । 


 एक युवक ने इसी प्रसंग में प्रतिप्रश्न किया कि क्या स्त्री परिवार और समाज में पद पर नहीं होती, क्या उसके पास कोई अधिकार नहीं होते या वह बेटी, माँ, बहू की ज़िम्मेदारी के समय मज़बूर बन जाती है। 

तो ऐसे प्रश्नकर्त्ता ये भूल जाते हैं कि स्त्री के  पद पर होने न होने का प्रश्न नहीं है यहाँ। उसके पद पर होने या अधिकार-सम्पन्न (?) होने से क्या होगा ? 



(1) पहली बात तो यह कि समाज में कितने प्रतिशत महिलाएँ स्वायत्त अथवा अधिकार सम्पन्न हैं?


(2 ) उनके अधिकार की सीमा क्या है ? अर्थात वे अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र हैं, या पति के भी, या पति और परिवार के भी या या बच्चों के भी ? क्या आर्थिक और सामाजिक निर्णयों में उनकी भूमिका / निर्णय का कोई महत्ब है ?


(3) वे अधिकार संपन्न (?) महिलाएँ कहाँ रहती हैं, उन पर अन्य दबावों / निर्णयों / परिस्थितियों का प्रभाव कितना होता है ? 

 
(4) बेटी के जन्म के साथ ही उस के पालन पोषण से जुड़ी असुरक्षा से बचाव के कितने हथियार उसके पास होते हैं ? 


(5) बेटी के जन्म से ही उसके साथ जुड़ी पारिवारिक हीनताबोध , संत्रास की स्थितियों में उसके साथ कितने लोग होते हैं?


(6) बेटी के साथ जुड़ी बलात्कार, छेड़छाड़, अपहरण, दहेज, वर ढूँढने , उसे संतुष्ट करने, उसे बेटी पसंद आने/ न आने, बेटी के बार बार रिजेक्ट हो कर बाजार में बिकती वस्तुओं की तरह अपनी बोली लगाए जाने की पीड़ा ..... अनगिन समस्याओं का क्या हल है उस तथाकथित अधिकार सम्पन्न महिला के पास ?


(7) बेटी के ससुराल में जला दिए जाने , मार दिए जाने या पति के परस्त्रीगामी होने पर उस अधिकार सम्पन्न स्त्री का कितना बस है?

आशा है इतने जरा से कारक उसकी भूमिका का कुछ तो खुलासा कर देंगे । या कम से कम इतना तो पता दे ही देंगे कि सामाजिक संरचना में वे कौन-से तत्व हैं, जिनके कारण यह सब आज भी हमारे आसपास ही चुपचाप व सरेआम भी चल रहा है। 



Wednesday, October 5, 2011

तुलसी की स्त्रीनिंदा (?) और स्त्रीविमर्श का ध्येय

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तुलसी की स्त्रीनिंदा (?) और स्त्रीविमर्श का ध्येय 

- (डॉ.)कविता वाचक्नवी






कवि तुलसीदास के प्रसंग में उनके स्त्री विषयक कुछ कथनों पर आपत्ति / या प्रश्न-प्रसंग बार बार कई लोग उठाते हैं। आज एक लेख पर प्रतिक्रिया करते हुए किसी ने पुनः यह विषय उठाया तो मैं स्वयं को रोक नहीं पाई। 


ऐसे प्रसंगों में एक बात यह भी ध्यान रखने की है कि भक्तिकाल अथवा सन्यासी आदि की नीति इन प्रसंगों में भिन्न होनी स्वाभाविक है। वह सामान्य व्यक्ति की स्त्री विषयक अवधारणा या दृष्टिकोण का पता नहीं देती अपितु एक संस्कार- विशेष अथवा नीति-विशेष वाले व्यक्ति के दृष्टिकोण का पता देती है । 



दूसरी बात, मेरी जानकारी के अनुसार किसी भी लेखक के लेखन में पात्र भिन्न भिन्न होते हैं, जो खल/दुर्जन और सज्जन इत्यादि विविध सामाजिक कोटियों के ही होते हैं। अब यदि किसी खल पात्र की भूमिका को लेखक लिखेगा तो क्या लिखेगा ? जैसे रावण के संवाद लिखेगा तो लेखक ही; और सज्जन के भी लिखेगा तो लेखक ही। इन सज्जन और दुर्जन पात्रों के संवादो या कथनों को लेखक के निजी विचार मानना कितना न्याय संगत है? 



इसलिए आवश्यक होता है कि किसी भी कथन के प्रसंग, परिप्रेक्ष्य, संदर्भ, समय, तत्कालीनता, अवसर, इत्यादि ढेरों चीजों के साथ जोड़ कर देखना। तभी हम लेखक के साथ न्याय कर सकते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि जो कथन किसी व्यक्तिविशेष के लिए कहा गया हो, वही समस्त वर्ग के लिए सही नहीं हो सकता। जैसे शूर्पनखा के व्यवहार से स्त्री की जो छवि बनती है उस पर टिप्पणी करते हुए कही गई बातें समस्त स्त्री जगत पर लागू नहीं हो सकतीं। 



अच्छे व बुरे सदा व हर स्थान, हर वर्ग/समुदाय में होते है। जैसे, ऐसा नहीं है कि स्त्री सदा गलत/बुरी व पुरुष सदा सही/अच्छा हो और स्त्री सदा सही/अच्छी व पुरुष सदा गलत/ बुरा हो। ऐसा भी होता है कि एक ही व्यक्ति अलग अलग भूमिका में अलग अलग प्रकार का हो जाता है। जैसे पिता या पुत्र या भाई के रूप में अच्छा व्यक्ति आवश्यक नहीं कि अच्छा पति भी हो; अथवा ठीक इस से उलटा कि कि माँ, बहन और बेटी के रूप में स्त्री बहुत अच्छी हो किन्तु सास के रूप में कर्कश। 



मानव-निर्माण की यह प्रक्रिया संस्कार, परिवेश, समय और परिस्थिति और प्रसंग सापेक्ष होती है। अतः लड़ाई किसी व्यक्ति-विशेष अथवा वर्ग - विशेष के विरुद्ध होने की अपेक्षा प्रवृत्ति के विरुद्ध होनी चाहिए। पुरुष के विरुद्ध होने की अपेक्षा उसकी सामंतवादी और सत्तात्मकता के विरुद्ध होनी चाहिए। यह सत्तात्मकता यदि वंचित व्यक्ति द्वारा सत्ता पा जाने के पश्चात् उसमें भी आई तो उसके विरुद्ध भी। क्योंकि बहुधा ऐसा ही होता है। ऐसा करके हम समाज के वंचित और शोषित वर्गों का (भले ही वह स्त्री हो अथवा दलित) का अधिक भला कर सकेंगे और समाज के अधिक बड़े वर्ग को साथ जोड़ सकेंगे। 



Monday, October 3, 2011

‘एक औरत - तीन बटा चार’

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लेखिका सुधा अरोड़ा जी के जन्मदिवस पर विशेष 


औरत की ज़िंदगी का दुखद सच दर्ज करती कहानी :  ‘एक औरत - तीन बटा चार


औरत की पीड़ा और वेदना पर केंद्रित आज तक बहुत कहानियाँ मैंने पढीं, लेकिन यह एक ऐसी कहानी थी, जिसे पढ़ कर मेरे आँसू जो बहने शुरू हुए तो बहते ही रहे और अंत तक चेहरा आँसुओं से तर रहा. हाल ही में जून माह में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हिन्दी की शीर्षस्थ लेखिका ‘सुधा अरोड़ा’ का कहानी संग्रह ‘एक औरत - तीन बटा चार’ पढ़ा. यूँ तो इस संग्रह की सभी कहानियाँ जीवन के महत्वपूर्ण आयामों से जुडी हैं लेकिन जिस कहानी ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया वह है : ‘एक औरत - तीन बटा चार’. इस कहानी ने जिस पुरजोर ढंग से मुझे अपनी गिरफ्त में लिया, उससे बाहर निकलने में मुझे पूरे पच्चीस दिन लगे. मेरी दृष्टि में यह इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है. इस कहानी का शीर्षक ही नहीं अपितु शुरुआ़त भी बड़ी चुम्बकीय और जिज्ञासा जगाने वाली है -‘‘ तीस बरस पुराना एक घर था. वहाँ पचास बरस पुरानी एक औरत थी. उसके चेहरे पर घर जितनी ही पुरानी लकीरें थीं.’’



 इस कहानी में नायिका कहीं भी रोती बिसूरती नहीं;  लेकिन उसका दर्द, सिर से पाँव तक कतारबद्ध हुआ, उसके समूचे व्यक्तित्व से कतरा-कतरा रिसता है. उस एकाकी औरत का दर्द मेरे दिल में ऐसा घनीभूत हुआ कि मैं उससे न सिर्फ अभिभूत हुई बल्कि बड़े कष्ट में रही. ऐसे दर्द से सामना होने पर, उससे पहचान होने की वजह से , हम अनजाने ही उसे अपने में सोखते चले जाते हैं. यह शायद तादात्म्य होने की प्रक्रिया थी. ऐसा तभी घटता है जब हमारे अंदर सूक्ष्म अनुभूति को ग्रहण करने वाली पारदर्शिता और संवेदनशीलता हो. वह मेरे अंदर शायद कहीं खामोश पडी थी, जो इस कहानी को पढते ही सक्रिय हो उठी और लेखिका द्वारा सर्जित नायिका की एक-एक चिटकन, भटकन, बोझिल धडकन के साथ एकात्म होती गई. कहानी में नायिका को पढते हुए, ब्रिटिश लेखिका Jill Briscoe की यह उक्ति ‘The storms in my life have become workshops ’ मुझसे बार बार-बार टकराने लगी ! 

हर एक की ज़िंदगी के झंझावात उसे कुछ न कुछ सीख देते हैं. इस कहानी की नायिका तूफ़ान के बदले तूफ़ान उठाने के बजाय खामोश रहना सीख लेती है - घर को घर बनाए रखने की खातिर, लेकिन उसकी इस कुर्बानी के बावजूद भी, उसका घर सच्चे अर्थों में घर बना रहता है क्या ? जब घर को सहेज कर रखने वाली के दिल में न सुकून हो, न प्रफ्फुलता, उलटे भावनात्मक रुग्णता के चलते वह गहन खामोशी का शिकार बन गई हो, तो ऐसी कुर्बानी का क्या लाभ ? उस घर में सब साजो-सामान के होते हुए भी एक खालीपन अखरता है. सन्नाटे के साए तले वह घर, खुद-ब-खुद ऊँची-ऊँची दीवारों वाला एक मकान बन के रह जाता है. 



 यह महज़ एक इत्तेफाक है कि नायिका का कहानी में कोई नाम नहीं है. मेरे अनुसार, यह इत्तेफाक यानि उसका कोई नाम न होना, कहानी के शीर्षक से पूरी तरह तालमेल में जाता है, क्योकि जो औरतें पूरी तरह घरेलू हैं, सिर्फ पति से ही नहीं, घर की चारदीवारी से भी उनका विवाह हुआ होता है - उनके नाम होकर भी ‘नहीं’ के बराबर होते हैं , वे इस्तेमाल ही कहाँ होते है ? खासतौर से एक घरेलू नारी की पहचान उसके नाम से उतनी नहीं होती जितनी कि उस पर लदे रिश्तों से होती है...किसी की बेटी, किसी की पत्नी, किसी की माँ. इन रिश्तों के खोल में वह ऐसी समाती है कि अपनी पहचान, अपना नाम सब भूल जाती है. दूसरे भी उसे, उसके नाम से न पहचान कर पिता या पति के नाम से ही पहचानते हैं. इसलिए नायिका का नाम हो या ना हो फर्क ही क्या पडता है. ‘अनाम नायिका’ की कहानी होते हुए भी यह ‘ हर नाम ’ की कहानी है. वह ‘अनाम’ पात्र कहानी में पूरी तरह छाई हुई है. इस कहानी में नायिका अपने बेतरतीब, बिखरे व्यक्तित्व के कारण पाठक मन को बेइंतहा अजीबोगरीब ढंग से अपने से बाँधे रखती है. अपनी इस खूबी के कारण वह प्राणविहीन औरत कहानी का प्राण है, बिखरी होने पर भी केंद्रबिंदु है. अजीब-सा विरोधाभास है, लेकिन है बड़ा ख़ूबसूरत और चित्ताकर्षक ! कहानी की शुरुआत में दूसरे पैरा की ये पंक्तियाँ – ‘‘घर के साहब और बच्चों की उपस्थिति में भी उनका जहाँ-तहाँ फैला सामान उनकी बाकायदा उपस्थिति की कहानी कहता था.’’ हालाँकि ये पंक्तियाँ घर में सिर्फ बच्चों और पति के फैलाव की बात करती हैं , लेकिन इसके साथ-साथ एक शब्द मेरे ज़ेहन में उभरा कि उस फैलाव से घर में अकेले होने पर अधिक उलझती, उस फैलाव को अधिक बेडौलपन से महसूस करती - उस औरत का बिखराव घर में हावी था. आगे - 

"उस घर को ‘घर’ बनाती हुई, यहाँ से वहाँ घूमती वह एक खूबसूरत औरत थी’’ -

 कहानी की इस पंक्ति में प्रच्छन्न रूप से चलता, एक और भाव है कि वह औरत उस फैलाव के नीचे पसरे अपने स्थायी बिखरेपन को, मानो अधिक समेटना चाहती थी. उस मकां को अकेले अपनी जान लगा कर ‘घर’ बनाती हुई, इस कमरे से उस कमरे में भटकती हुई, एक ऐसी औरत थी जिसकी खूबसूरती, वीरानी से एकरस हो, उदासी बन सदा के लिए सरापा उसके व्यक्तित्व पर छप गई थी. 



 दिल तो अकेला होता अक्सर सुना है, किन्तु जब सबके होते हुए भी जीवन अकेला हो, तो उसकी वेदना की कोई सीमा नहीं होती. वह पीड़ा आकाश की तरह बिना ओर-छोर की होती है. ‘ आखिरी उंगली पर डस्टर लपेटे - हर कोने की धूल साफ़ करती हुई, हर चीज़ को करीने से रखती हुई ’ - उस एकाकी नारी की त्रासदी ही यही है कि घर की चीजों की धूल और साहब और बच्चों के कमरे का कचरा साफ़ करते-करते, वह उसे मानो अपने में समेटती जाती है.



‘ हर चीज़ को करीने से रखने वाली वह औरत,' अपने अंदर कुछ भी करीने से नहीं सहेज पाती. अपने लिए उसे फुर्सत ही नहीं है. ‘फिर रात को सबके चेहरे की तृप्त मुस्कान को अपने चेहरे पर लिहाफ की तरह ओढ़ कर सोती हुई ’ वह निरीह सबकी मुस्कान को अपने चेहरे पर पहन कर, उसके तले अपनी पीड़ा और मन के सन्नाटे के गुबार को छिपाती हुई, सच में, कितना सो पाती है यह तो वह ही जानती होगी. कहानी में आगे की पंक्तियाँ हांलाकि घर की चीजों की, लजीज़ खाने की, ख़ूबसूरत बर्तनों की बात करती हैं, किन्तु इन सबसे जुडी घर की सबसे ‘महत्वपूर्ण चीज़,' किन्तु घर के लोगों के लिए नितांत ‘महत्वहीन’ उस औरत के मन के भाव, उसके खामोशी से काम करते रहने के बावजूद भी, मेरे मन में इस तरह गुंजायमान होते रहे कि मैं कहानी से हट कर उस औरत के अंदर की कहानी, उसके मन के एकाकी दुःख को, भावनात्मक उजाड़पन को पढती रही. दर्द पीकर, खामोशी से, एक के बाद एक काम करती जाती, वह औरत एक भी आँसू नहीं टपकाती, लेकिन मैं उसकी खामोशी, असहज एकाकीपन से असहज हो नम आँखों से कहानी पढ़ती जाती थी - मानो मैं उससे रू-बरू थी और सामने बैठी उसे चलते-फिरते देख रही थी, उसके हर हाव-भाव से उजागर होती पीड़ा को महसूस रही थी. ‘‘इस दिनचर्या से समय निकालकर वह औरत बाहर भी जाती - बच्चों की किताबें लेने, साहब की पसंद की सब्जियाँ लेने, घर को ‘घर’ बनाये रखने का सामान लेने !’’ यूँ कोई पढ़े तो ये सामान्य पंक्तियाँ नज़र आएगीं लेकिन एक ओर मुझे इन शब्दों की पोर-पोर में बसी आकुलता ने विचलित किया तो दूसरी ओर ढेर वीरानियों के साथ जीती उस औरत के साहस ने भी प्रभावित किया कि पथरीले दर्द से टूटने और घर के किसी अकेले कोने में दुबक कर रोने के बजाय, वह घर को ‘घर’ बनाने में लगी रहती है. मानो किसी अदृश्य अनुशासन के तहत, वह अपने हिस्से का दर्द, अपने हिस्से की पीड़ा, खुशी से खाती-पीती है और इसी से यंत्र चालित-सी, कामों को करती जाती है ! उसने अपने को समझदारी और खूबसूरती से दो हिस्सों में बाँट लिया है. जब भी वह घर से बाहर जाती है, तो एक चौथाई हिस्सा घर में छोड़ जाती है, जो उसके लिए ‘सेफ्टी एलार्म’ का काम करता है. वह बाहर जाकर चाहे घर का सामान खरीद रही हो या सहेलियों के साथ चाय नाश्ता करती बैठी हो, घर में छोड़े गए, एक चौथाई हिस्से की आवाज़ सुन कर झटपट उठ खड़ी होती है. जैसे ही वह घर में कदम रखती है, वह एक चौथाई हिस्सा उसके तीन चौथाई से गले मिल, एक हो जाता है और उसे सुख-चैन से भर देता है. आजीवन यही सिलसिला कर्तव्यपरायण, भावुक और संवेदनशील औरतों के साथ चलता रहता है. घर लौट कर वह एकाकी औरत, स्कूल से आए बच्चों को बाँहों में भर कर, ताज़ा नाश्ता देकर, साहब का इंतज़ार करती है. यह पढ़ कर एब्राहम लिंकन की यह पंक्ति एकाएक मेरे मन में कौंधी और उस एकाकी औरत पर सही उतरती लगी -
 Lonely men seek companionship while lonely women sit at home and wait...! 

पति के आने पर, उसकी आवभगत कर, अपना जीवन जैसे सार्थक करती है. लेकिन जब इतना ख्याल-प्यार करने पर भी उसे रूखा-सूखा व्यवहार मिलता है, तब अंदर से कितना निरर्थक महसूस करती है...! अपने लक्ष्यहीन जीवन की त्रासदी उससे बेहतर कौन जानता होगा ? 



घर की खुशियों, पति की हिदायतों, बच्चों की फरमाइशों के वितान में उसे पता ही नहीं चलता कि उसके दो हिस्सों के बीच फासला कितना बढ़ गया हैं, क्योंकि हर दिन, हर रात उसका घर के लिए नियत हिस्सा (Cardiomegaly - हृदय रोग की तरह ) इस कदर फैलता जाता है कि वह उसके अपनी पहचान वाले तीन चौथाई हिस्से को ढाँप लेता है. अपनी बेजान, कंपकंपाती  पहचान को बनाए रखने की नाकामयाब कोशिश में, घबरा कर वह, दूसरों के लिए जीवंत रहने वाले, अपने एक चौथाई हिस्से को ओढ़ती जाती है. उसे पता ही नहीं चलता कि उसका तीन बटा चार हिस्सा कब एक चौथाई में लुप्त हो गया. इस नए रूप के चलते अब वह जब भी बाहर जाती है तो वह ‘वह’ नहीं होती - सिर्फ बच्चों की माँ होती या पति की आज्ञाकारी पत्नी होती या घर की ‘केयरटेकर’ होती है, जिसे बाहर निकलते ही घर लौटने की जल्दी सताने लगती है और तब तक वह बेचैन रहती है, जब तक घर नहीं लौट आती. इस मानसिकता से उसका अपना वजूद गुम होता जाता है. वह जान ही नहीं पाती - अपनी उस खोती हुई पहचान को. उसके इस पराए रूप को दख उसकी सहेलियाँ, नाते-रिश्तेदार खामोश रहते हैं, अनदेखा करते. घर लौटकर वह ‘अपने उसे एक चौथाई हिस्से को ढूँढती फिरती है’ - इस अभिव्यक्ति को पढकर मेरी आँखें छलछ्ला आई. यदि आपको कभी कोई, इस कमरे से उस कमरे में, रसोई से बालकनी में, इस तरह भटकता दिखे, तो समझ लें कि ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ है. वह महिला उखड़ी  हुई है और अपनी पहचान खोज रही है, जो उसे घर के किसी कोने में, न अलमारी में, न दराज़ में, कहीं भी नहीं मिल रही है. कहीं हो तो मिलेगी न ! क्योकि उसकी पहचान अन्य प्राणियों की पहचान तले दबी हुई है. औरत इसी तरह तो बँटी होती है. इसके अलावा भी उसके कई टुकड़े होते है. एक टुकड़ा बच्चों के लिए सक्रिय होता है, तो एक हिस्सा पति को समर्पित रहता है, तो एक टुकड़ा सास-ससुर की सेवा पर तैनात रहता है.जब कभी मेहमान, नाते-रिश्तेदार रहने आते हैं, तो इन टुकड़ों में से किसी तरह वह अपना एक और टुकड़ा करती है और उसे उन मेहमानों की सेवा में लगा देती है. यूँ टुकड़ों में बँटी वह जीने की आदी हो जाती है .... अपने अस्तित्व से कोसों दूर चली जाती है फिर भी उफ़ तक नहीं करती. 


सबसे अधिक कष्ट की बात यह है कि उसका ज़रूरत के अनुसार इस तरह टुकड़े-टुकड़े होना उसकी जानकारी के दायरे में घटता रहता है फिर भी वह बिफरती नहीं. किसी को उसके इस तरह टुकड़े-टुकड़े होने की भनक नहीं पडती.जब-जब वह चिटकती है, टूटती है, बिखरती है, तो उसके आसपास रहने वाले अपनों को उसके चिटकने, टूटने की न तो आवाज़ सुनाई देती है और न उसमे पड़ती दरारें दिखाई देती हैं. इस पर भी, वह टूट कर अपने आप को जोड़ने की कोशिश करने में लगी रहती है. कितना मुश्किल होता है ऐसे टूटने को अंदर ही अंदर जोड़ना, अपने को ‘वनपीस’ बनाए रखना. कितना भी जगह-जगह से अपने को तरह-तरह की झूठी तसल्ली से जोड़े, दरारे तो रह ही जाती हैं जिनसे पीड़ा धृष्टता से निकल कर - कभी उसके चेहरे पर मुर्दनगी बन कर सिमट जाती है, तो कभी आँखों में नमी बन कर तैर जाती है, फिर भी घर के लोग उसे देख नहीं पाते. वह माँ, बहू, पत्नी के धागों से कठपुतली की तरह बंधी - उन धागों के चलाने वालों के इशारे पर नाचती, सबको सुबह से लेकर रात तक खुशी की चमक से भरती है. जैसे ही घर के सूत्रधार रात के निस्तब्ध अंधेरे में सो जाते हैं, वह भी निश्चेष्ट कठपुतली बन जाती है.



 वह औरत घर की चीजों से टकराते हुए, बदहवास सी होकर अक्सर, अपने एक चौथाई हिस्से को इधर-उधर बेताबी से खोजती है, जो इतना ढीला हो गया है, इतना छीज गया है कि उसे पहचानने में समय लगता है. वह एक चौथाई हिस्सा कभी प्लास्टिक के फूलों में, तो कभी घर के ओने-कोने में मिलता है. घर की औरत का घर के लिए नियत हिस्से को यों इधर-उधर ढूँढना - मेरे दिल को बार-बार बोझिल बनाने को काफी था. वह अक्सर ही अपने तीन चौथाई हिस्से को अपने में समेटे, एक चौथाई हिस्से को इधर-उधर खोजती फिरती है - बौराई-सी, व्याकुल-सी, कमरों में, लान में....कभी वह उसे गेंदे की क्यारी के किनारे, ईंटों की तिकोनी बाड़ पर लुढ़का हुआ मिलता है, तो कभी जूतों के बीच धूल मिट्टी खाता मिलता है. वह उसे झाड़ पोंछ कर, सबकी नज़रों से बचाती, अपने दुपट्टे में छिपाती, साथ लिए चलती है. बड़े हो गए बच्चे सामने पड़ जाते हैं तो उसे कुछ छिपाते देख पूछ बैठते है – ‘‘यह तुमने पल्लू में क्या छिपा रखा है ?’’ अपने मरे गिरे, बेजान से ‘एक बटा चार हिस्से’ को, बेचारगी से भरी पहचान को, अपनों से ही छिपाने का दर्द कितना असहनीय हो सकता है, उसे या तो झेलने वाला जान सकता है या उस दर्द से गुज़रा व्यक्ति जान सकता है. बच्चों के पूछने पर वह और अधिक सतर्कता से उसे ढक लेती है और हकबकाई-सी कहती है – ‘’कहाँ कुछ भी तो नहीं....’’ उस तीन बटा चार औरत के इन शब्दों की लाचारगी पर किसका दिल न भर आएगा ? कभी-कभी वह प्यार से उमड़ कर सबके द्वारा अनदेखे, उस एक बटा चार हिस्से के बारे में बड़े हो गए बच्चों से बात करने का साहस जुटाती है तो इतनी ही देर में कि वह कुछ बोल पाती, जीवन की रफ्तार में दौड़ते-भागते बच्चे – ‘ओ.के , समथिंग पर्सनल..’ कह कर आगे बढ़ लेते है. वह फिर वैसी ही अपने भोथरे हिस्से को जिसमें उसके दिल की कुछ धडकनें, कुछ संवेदनाएँ, कुछ निहायत ही कोमल भावनाएँ भी जहाँ-तहाँ चिपकी हुई हैं, पल्लू में छिपाए सन्न-सी खड़ी रह जाती है. न जाने कितनी बार इन भावनात्मक चोटों से गुज़रती है वह. किन्तु अब ये सब चोटें उसका अपना अंश बन चुकी हैं. 


केनेडियन लेखिका ‘सबरीना वार्ड हैरीसन’ ने कहा है -
“What we don't let out, traps us…… So we don't say anything. And we become enveloped by a deep loneliness.

उपेक्षा से उपजे दर्द को बाहर उगलने के बजाय खामोशी से झेलना, अपने जीवन में वीरानियों को दावत देना है. ठीक यही इस कहानी में, दो हिस्सों में बँटी औरत के साथ घट रहा है. मन की बात किसी से बाँटती ही नहीं, बाँट लेने से शायद वह खुद तो न बँटती. कभी वह साहस जुटाती भी है अपनी बात कहने का तो, कह नहीं पाती और दूसरों के पास इतना समय नहीं कि दो घड़ी फुर्सत के निकाल कर उससे कुछ पूछे, उसकी सुनें और इस तरह अपनों से उपेक्षित वह, ‘अकेलेपन’ की परतों में लिपटती जाती है. 



घर में फर्नीचर के वार्निश का बेरौनक होना, पौधे का मुरझाना, सोफे की गद्दियों की सीवनों का उधड़ना, दरवाजो, खिड़कियों के काँचों का धुंधलाना, तस्वीरों के फीके पड़े रंग - ये सब तो उसे नज़र आते है किन्तु इन सबके साथ, उसका अपना एक चौथाई और तीन बटा चार हिस्सा जो दिन-पर-दिन धुंधलाता जा रहा है, वह उस पर कभी ध्यान ही नहीं देती. देती भी है तो अनदेखा करती देती है. चीजों के फीकेपन और उधड़ेपन में वह अपना फीका और उधड़ा अस्तित्व भूल जाती है. अपने अस्त-व्यस्त बेरौनक अस्तित्व की सिलवटों, झोल को सम्हाले वह एक धुंधली उम्मीद के साथ रोज साहब का इंतज़ार करती है कि शायद आज उसे इस तरह उखड़ा, उधड़ा देख कर, वे उसके बिगड़े अनुपात के बारे में कुछ पूछें, लेकिन साहब या तो दो मेहमानों के साथ घर आते हैं - मेहमानों के आने की सूचना देना भी गँवारा नहीं करते, या कभी -कभी होटल में ही खाकर देर गए लौटते हैं. फिर किसी फ़ाइल में उलझ कर घर में होने पर भी नहीं होते. इस तरह रात उतर आती है, सब चैन और सुकून से सो जाते हैं और वह अपने हिस्से में सदा के लिए आई बेचैनी से गले लग कर, उस ढीले हिस्से को थपक-थपक कर सुला देती है. कैसा अकेला, वीरान जीवन है उसका...! उसकी यह स्थिति पाठक के मन में गहरी निराशा और अवसाद को जन्म देने के साथ-साथ, उसे मिटाने का एक आक्रोश भी देती है. 



इस अवसाद के तहत कहानी की नायिका कई बार मटमैले लगने वाले उस ‘अपने’ घर से कहीं दूर चली जाना चाहती है लेकिन इससे पहले कि वह पलायन करती, एक दिन साहब तेज़ दर्द से कहराने लगते हैं. जांच-पडताल के बाद हकीम, वैद्य बताते हैं कि लगातार वर्षों से बाईं ओर झुक कर काम करने की आदत के कारण, साहब की गर्दन और पीठ की शिराओं में संकुचन हो गया है, इसलिए दवाओं के बाद भी मर्ज़ लाइलाज है. किन्तु उनकी पत्नी कहलाई जाने वाली, वह अस्तित्वहीन औरत उनकी उस विवश घड़ी में उनका ऐसा मज़बूत सहारा बनती है कि उसके द्वारा की जाने वाली सेवा से वे ठीक होने लगते हैं. चलने के लिए एडजस्टेबल छडी मंगाई जाती है, लेकिन कमज़ोर बाँए हिस्से के लिए वह छड़ी व्यर्थ सिद्ध होती है और दो हिस्सों में बँटी हुई निरर्थक वजूद लिए जीती वह औरत उनका सार्थक और स्थायी सहारा बन जाती है. साहब की ज़रूरत को देखते हुए उसका तीन चौथाई हिस्सा जो उसका अपना था, उसकी पहचान था, वह साहब को समर्पित हो जाता है. लेकिन इस घटना से एक बात औरत के पक्ष में जाती है; साहब के स्वस्थ होने के साथ-साथ औरत का निष्क्रिय, बेजान हिस्सा भी सक्रिय और स्वस्थ होने लगता है. हमेशा के लिए साहब के पार्श्व में उसकी जगह ‘सहारे’ के रूप में स्थायी होने के कारण शायद उसे अपनी एक पहचान मिल गई थी. हालात से विवश साहब द्वारा उनके पार्श्व में अपने लिए जगह पाकर वह सुख और सुकून महसूस करती है. वह साहब के निकट संपर्क में रहने की खुशी का 'कारण' नज़रंदाज़ कर सिर्फ उनके पास बने रहने, उनको सहारा देने में अपने तीन बटा चार हिस्से के अस्तित्व की सार्थकता देखती है इसलिए ही उसका वह तीन चौथाई हिस्सा बड़ा खुश और सेहतमंद होने लगता है. इस सकारात्मक बिंदु पर कहानी अंत हो जाती है उस उपेक्षित, एकाकी औरत के जीवन में गुनगुने उजाले की कुछ उम्मीद बंधा कर.



निसंदेह यह एक कालजयी कहानी है, जो हर युग, हर काल - अतीत, वर्त्तमान और भविष्य के नारी व्यक्तित्व को किंचित परिवर्तन के साथ परिभाषित करती है और करती रहेगी. वे नारियाँ मेरी बात से ज़रा भी असहमत न होएँ जो घर से बाहर काम पर या मस्त होकर, अपनी मर्जी से घूमने जाती हैं - बड़े साहस से घर-परिवार की आवाजों से परे - अपने को ये ‘ऑटो सजेशन्स’ देती हुई - ‘‘वे भी तो इंसान हैं, उन्हें भी अपनी ज़िंदगी जीने का कुछ तो हक है.’’ यदि वे भी अन्तस्तल को टटोलेगीं तो पायेगी कि ऊपर की बलात् कठोर बनाई गई परतों के नीचे घर-परिवार व बच्चों की चिंता से त्रस्त और ध्वस्त परतें ही है. बाहर रहते हुए भी बीच-बीच में न जाने कितनी बार पति का, बच्चों का ख्याल उनके मन में उठता है. वे चाह कर भी कुछ घंटों, कुछ दिनों के लिए कहाँ अपने को अलग कर पाती हैं ? कुछ दिनों के लिए दूर होकर भी उनके अस्तित्व में समाई रहती हैं, इतना ही नहीं, अगर घर के लोग उदारता से उन्हें घूमने फिरने का मौक़ा भी दें तो वे और सघनता से घर-परिवार की ओर पलट जाती हैं. समस्या तो वे खुद हैं अपने लिए. उनकी भावुकता और ममता उन्हें ले डूबती है. 



कहानी यद्यपि बँटी-बिखरी औरत से शुरू होती है और उसी पर अंत, लेकिन कहानी की खासियत यह है कि वह अपनी मुख्य पात्र की तरह न कहीं बंटी हुई , न कहीं बिखरी हुई, बड़ी ही सुगठित और कसावट के साथ बुनी हुई - एक उत्कृष्ट कहानी बन पडी है ! किसी भी बिंदु , किसी भी रेखा पर कहानी भटकती नहीं बल्कि रवानगी से भरी हुई, पाठक मन पर अपनी अमिट छाप छोडती है. अनूठी अंतर्दृष्टि को संजोती, औरत से जुडी ज़मीनी सच्चाईयों को उजागर करती इस भावप्रवण कहानी के लिए सुधा जी की जितनी भी सराहना की जाए कम है.
- दीप्ति गुप्ता  

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Update 

वंदना जी की टिप्पणी के पश्चात् सुधा जी की कहानी का लिंक जोड़ना आवश्यक लगा। अच्छा हो कि यों तो पुस्तक ही पढ़ी जाए किन्तु जब तक वह संभव न हो तब तक इस कहानी को यहाँ पढ़ा जा सकता है -



- कविता वाचक्नवी




Saturday, October 1, 2011

कम से कम एक दरवाज़ा

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कम से कम एक दरवाज़ा 
                - सुधा अरोड़ा 







चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाजा हो

या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना ,

उस पर ख़ूबसूरत हैंडल जड़ा हो

या लोहे का कुंडा !



वह दरवाज़ा ऐसे घर का हो

जहाँ माँ बाप की रजामंदी के बगैर

अपने प्रेमी के साथ भागी हुई बेटी से

माता पिता कह सकें --

'' जानते हैं, तुमने गलत फैसला लिया

फिर भी हमारी यही दुआ है

खुश रहो उसके साथ

जिसे तुमने वरा है !

यह मत भूलना

कभी यह फैसला भारी पड़े

और पाँव लौटने को मुड़ें

तो यह दरवाज़ा खुला है तुम्हारे लिए ! ''

बेटियों को जब सारी दिशाएँ

बंद नज़र आएँ

कम से कम एक दरवाज़ा

हमेशा खुला रहे उनके लिए !

Sunday, September 25, 2011

पुत्री दिवस पर २ विदारक कविताएँ : डेथ सर्टिफिकेट / पगफेरा

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बेटी की मृत्यु पर एक पिता की हृदयविदारक चीख -- 

मूल गुजराती लेखिका : एषा दादावाला
अनुवाद : सागरचंद नाहर
अनुवाद सहयोग : कविता वर्मा 






युवा कवयित्री एषा दादावाला (सूरत)  की अन्य  गुजराती कविताओं के लिए देखें यहाँ `वरतारो' 









डेथ सर्टिफिकेट 



प्रिय बिटिया
तुम्हें याद होगा
जब तुम छोटी थी,
ताश खेलते समय
तुम जीतती और मैं हमेशा हार जाता

कई बार जानबूझ कर भी !
जब तुम किसी प्रतियोगिता में जाती
अपने तमाम शील्ड्स और सर्टिफिकेट
मेरे हाथों में रख देती
तब मुझे तुम्हारे पिता होने का गर्व होता
मुझे लगता मानों मैं
दुनिया का सबसे सुखी पिता हूँ

तुम्हें अगर कोई दु:ख या तकलीफ थी
एक पिता होने के नाते ही सही,
मुझे कहना तो था
यों अचानक
अपने पिता को इतनी बुरी तरह से
हरा कर भी कोई खेल जीता जाता है कहीं?

तुम्हारे शील्ड्स और सर्टिफिकेट्स
मैने अब तक संभाल कर रखे हैं

अब क्या तुम्हारा “डेथ सर्टिफिकेट” भी
मुझे ही संभाल कर रखना होगा ?



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पगफेरा




बिटिया को अग्‍निदाह दिया,
और उससे पहले ईश्‍वर को,
दो हाथ जोड़ कर कहा,
सुसराल भेज रहा हौऊं,
इस तरह बिटिया को,
विदा कर रहा हूँ,
ध्यान तो रखोगे ना उसका?
और उसके बाद ही मुझमें,
अग्निदाह देने की ताकत जन्मी !
लगा कि ईश्‍वर ने भी मुझे अपना
समधी बनाना मंजूर कर लिया

और जब अग्निदाह देकर वापस घर आया
पत्‍नी ने आंगन में ही पानी रखा था
वहीं नहा कर भूल जाना होगा
बिटिया के नाम को

बिना बेटी के घर को दस दिन हुए
पत्नी की बार-बार छलकती आँखें
बेटी के व्यवस्थित पड़े
ड्रेसिंग टेबल और वार्डरोब
पर घूमती है
मैं भी उन्हें देखता हूँ और
एक आह निकल जाती है

ईश्‍वर ! बेटी सौंपने से पहले
मुझे आपसे रिवाजों के बारे में
बात कर लेनी चाहिए थी
कन्या पक्ष के रिवाजों का
मान तो रखना चाहिए आपको
दस दिन हो गए....

और हमारे यहाँ पगफेरे का रिवाज है !



Thursday, September 22, 2011

बैड पैरेन्टिंग : माता पिता के बीच की दरारों से दिग्भ्रमित बच्चे

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बैड पैरेन्टिंग - माता पिता के बीच की दरारों से दिग्भ्रमित बच्चे
- सुधा अरोड़ा



माता और पिता के रूप में बच्चों को भावनात्मक सहारा देना और उन्हें एक स्वस्थ माहौल में बड़ा होने की सुविधाएँ और अवसर देना हमारे हाथ में है । अपने तनावों का दंश  बच्चों को देकर असमय उनसे उनका बचपन छीन लेना और उन्हें एक दहशत के माहौल में बड़ा होने देना एक अपराध से कम नहीं ! 







पिछले दिनों ब्रिटेन के कई शहरों में दंगे भड़के । टोटेनहम से शुरु हुई यह आग बरमिंघम , मैनचेस्टर और कई शहरों तक फैल गई । इसके राजनीतिक और वर्णविभेद के कारणों और दंगों के बीच भारतीय चैनलों पर कई जगह यह कैप्शन बार बार दिखा - ‘‘ बैड पैरेन्टिंग - कॉज़ फ़ॉर रायट्स ’’ -- कि दंगों को भड़काने में, बड़े बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर की लूट और फसाद में आठ नौ साल से लेकर ग्यारह साल के बच्चों तक की भागीदारी इसमें देखी गई । बैड पैरेन्टिंग - यानी बच्चों के पालन पोषण में खराबी, बच्चों को घर में सही संस्कारों और अपनी उम्र का अपेक्षित भावनात्मक संरक्षण न मिलने के कारण उनका दिशाहीन होना । 


पिछले दो दशकों से पश्चिमी देश में बच्चों में बढ़ती हुई हिंसा - कभी स्कूल की अपनी क्लास के सहपाठियों को बंदूक की गोलियों से भून डालना , कभी शिक्षकों के साथ बेअदबी करना , कभी स्कूल में अपनी कलाई की नस काटने की आत्महंता कोशिश और कभी निराशा के गर्त में डूबे बच्चे का शून्य में ताकना और किसी सवाल का जवाब न देना , सोलह से अठारह साल के लड़कों का बाप बन जाना l इसके साथ साथ पिछले कुछ सालों में ब्रिटेन में माता पिता द्वारा चार साल से बारह साल तक के बच्चों पर की गई हिंसा के कई मामले सामने आये हैं । ऐसी घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त पश्चिमी देशों की इतनी विकराल समस्या रही है कि वहाँ सभी स्कूलों में एकाधिक काउंसिलर तो होते ही हैं, कई बार स्कूल के शिक्षकों और प्रधानाचार्य को भी काउंसिलर की भूमिका निभानी पड़ती है । 


यह एक ऐसी समस्या है , जिसका हल तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक ढूँढा नहीं जा सका और इसमें दिन पर दिन बढ़ोतरी ही होती जा रही है जिसका सबसे ताज़ा उदाहरण ब्रिटेन में एक ब्लैक की गोली मारकर हत्या के बाद फैले हुए दंगों के बाद प्राइम मिनिस्टिर का यह बयान है कि बच्चों का लूट पाट और हिंसा में शामिल होना ‘‘ बैड पैरेन्टिंग’’ का नतीजा है । 


सोलह साल का एक लड़का लूटपाट में पकड़े जाने पर कैमरे के सामने बयान देता है कि सरकार इसके लिये जिम्मेदार है क्योंकि सरकार सिर्फ अमीरों के लिये है, गरीबों की उसे कोई चिन्ता नहीं और उसने डिपार्टमेंटल स्टोर से अपने बेटे के लिये कपड़े, नैपीज़ और घर की ज़रूरत का सामान लूटा है । 


कुछ वर्ष पहले मैं लंदन में अपनी मित्र डॉ. अरुणा कपूर अजितसरिया से मिली जो कोलकाता वि. विद्यालय से हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी. थी और जो लंदन से कुछ और डिग्रियाँ हासिल करने के बाद बच्चों के स्कूल में प्रधानाचार्या के पर पर काम कर रही थी । उसने बताया कि स्कूल में उसे प्रिंसिपल की भूमिका से ज़्यादा एक काउंसिलर की भूमिका निभानी पड़ती है क्योंकि नब्बे प्रतिशत बच्चे हैफ पेरेंट्स ( आधे परिवार से ) हैं यानी कोई अपने पिता के साथ है तो माँ सौतेली है या पिता की एकाधिक गर्ल फ्रेंड्स हैं और कोई अपनी माँ के साथ है तो सौतेले पिता है या माँ का कोई फ्रेंड है जिसे बच्चा सम्मान नहीं दे पाता । ये बच्चे पढ़ाई में एकाग्र नहीं हो पाते, इनमें ‘‘ लॉस्ट लुक’’ (खोया खोया सा भाव ) या सेंस ऑफ नॉन बिलॉगिंग( किसी से जुड़ाव महसूस न कर पाना ) होता है, आत्मविश्वास की कमी और असहिष्णुता होती है । उन्हें समझाने या रोकने - टोकने पर वे तोड़ फोड़ करने लगते हैं या चीखने चिल्लाने लगते हैं । 


भारत अभी इस स्थिति पर तो नहीं पहुँचा कि यहाँ सोलह से अठारह साल के लड़के गर्व से अपने ‘‘बाप’’ बन जाने की घोषणा करें । पर भारत के महानगरों के मनोचिकित्सक ( हीरानंदानी हॉस्पिटल के प्रख्यात डॉ. हरीश शेट्टी ) भी कहते हैं कि डिप्रेशन के शिकार टीन एजर्स की तादाद में पिछले कुछ वर्षों में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोतरी हुई है । इसका कारण माँ-बाप का बच्चों को पर्याप्त समय न दे पाने के साथ साथ इंटरनेट, ब्लैकबेरी और तमाम आधुनिक तकनीकी उपकरण हैं जिनके कारण बच्चे समय से पहले ही वयस्कों की दुनिया से परिचित हो जाते हैं और असमय ही अपना बचपन खो बैठते हैं । 


अधिकांश माँएँ भी नौकरीपेशा हैं और घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारी के कारण वे बच्चों को र्प्याप्त समय नहीं दे पातीं । जो गृहिणियाँ हैं, वे भी अगर उच्चमध्यवर्ग की हैं तो मॉल कल्चर और किटी पार्टी की आदी हैं, अगर मध्यवर्ग की हैं तो उनकी शिकायत है कि टीन एज में जाते ही बच्चे बात मानना बंद कर देते हैं और उनकी अवज्ञा करते हैं । 


यह सब देखकर अक्सर भारत के गाँव - कस्बों के संयुक्त परिवार याद आते हैं , जहाँ चाचा, ताऊ, मामा सबके बच्चे आपस में ही पूरा एक स्कूल बना लेते थे, उन्हें बाहर के बच्चों की ज़रूरत ही नहीं होती थी, एक ही जगह खाना बनता था और बच्चों के लिए साथ साथ मिल बैठकर हर रोज़ का खाना एक उत्सव होता था । भारत में संयुक्त परिवार की अवधारणा रही है, जहाँ बच्चे अपेक्षाकृत स्वस्थ सुसंस्कृत माहौल में बड़े होते थे । 


आज के समय और समाज में वैसे संयुक्त परिवारों की कल्पना ही एक खाम खयाली है क्योंकि आज घर की आर्थिक जिम्मेदारी में औरतें भी सहभागी होती हैं और संयुक्त परिवारों की अवधारणा ही अतीत का एक स्वप्न बनकर रह गई हैं । माता और पिता के रूप में बच्चों को भावनात्मक सहारा देना और उन्हें एक स्वस्थ माहौल में बड़ा होने की सुविधाएँ और अवसर देना हमारे हाथ में है । अपने तनावों का दंश बच्चों को देकर असमय उनसे उनका बचपन छीन लेना और उन्हें एक दहशत के माहौल में बड़ा होने देना एक अपराध से कम नहीं ! 


पश्चिम के देशो में भी स्त्रियों की सोच में एक बदलाव देखा जा रहा है । अधिकांश स्त्रियाँ घर में एक गृहिणी बनकर रहना बेहतर समझती हैं ताकि वे बच्चों को अपनी देख रेख में बड़ा कर सकें । बाहर नौकरी करने के अगर फायदे हैं तो तनाव और कुंठाएँ भी कम नहीं जो कार्यालयों में असहयोगी माहौल और प्रतिस्पर्धा रखने वाले सहयोगियों के कारण पैदा होती हैं । 


एक कहावत सदियों से भारत में कही सुनी जाती रही है कि बच्चे हमारे प्रेम की निशानी है । आज पूरे विश्व में बच्चों को जो माहौल दिया जा रहा है - यही कहना पड़ेगा कि बच्चे माता पिता के प्रेम की नहीं, हवस की निशानी हैं जो हवस की समाप्ति पर उनकी जिम्मेदारी से हाथ धो लेते हैं । बच्चे अपनी मर्ज़ी से नहीं आते इस दुनिया में । उन्हें अगर हम लाते हैं तो उनके मानसिक स्वास्थ्य और ज़िम्मेदार नागरिक बनाने की जिम्मेदारी भी एक माँ बाप की है, किसी और की नहीं । 


हमें सोचना है कि इस खूबसूरत दुनिया में हम क्या बच्चों को यहाँ की तमाम बदसूरती दिखाने के लिये लाये थे ? 


इसका जवाब हम बड़ों को ढूँढना है , बच्चों को नहीं !




Monday, August 8, 2011

डिफेंस मैकेनिज़्म है स्त्री की `लपेट '

4 comments

 डिफेंस मैकेनिज़्म है स्त्री की `लपेट '  
- कविता वाचक्नवी


गत दिनों एक संवाद में मैंने लिखा कि 

जहाँ स्त्री को जितना लपेट के लपेटे में रखा जाता है, वहाँ वहाँ प्रमाणित होता है कि उस सभ्यता-समाज के पुरुष अधिक चरित्रहीन, अविश्वसनीय और व्यभिचारी हैं ।

वस्तुतः `लपेट ' स्त्री का डिफेंस मैकेनिज़्म है।

इसे जब अपनी प्रोफाईल पर परिचर्चा के लिए डाला तो एक बहुत ही महत्वपूर्ण संवाद रूपाकार ले पाया जिसमें लगभग 175 लोगों ने भाग लिया।  उसी परिचर्चा का अविकल पाठ स्त्रीविमर्श के पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत है - 




जहाँ स्त्री को जितना लपेट के लपेटे में रखा जाता है, वहाँ वहाँ प्रमाणित होता है कि उस सभ्यता-समाज के पुरुष अधिक चरित्रहीन, अविश्वसनीय और व्यभिचारी हैं ।

वस्तुतः `लपेट ' स्त्री का डिफेंस मैकेनिज़्म है।
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    • Sd Sharma esa nahin hai dr kavita darasal opposite sex ke prati akarshan ek swabhavik prakriya hai , isliye agar istri ko chayiye ki wo jo marzi pehne jaise marzi pehne magar kuch esa nqa pehne ki vipreet sex uske prati akarshit ho jaye wo bhi galat bhawnaon ke saath ,balki yadi purush akarshit ho bhi to man main ek swasth bhawna ke saath (waise istri shingaar kyonkarti hai kya kabhi aapne socha hai , uski kya bhawnayen hotihain uske shingaar ke prati ,ye uska shingaar karne ka dhang bata deta hai ki wo kya cheti hai ) kuch bura lage to kshama cheta hoon
      Tuesday at 14:57 ·  ·  2 people


    • Prabhakar Sharma लेकिन जब उच्च शिक्षित पुरुष भी महिलाओँ के साथ अभद्रता करते पाये जाते हैँ तो लगता है कि हमारी शिक्षा हमेँ चरित्रवान नहीँ बनाती है
      Tuesday at 14:58 ·  ·  2 people


    • Anant Alok मैडम जी आपने बिलकुल सही फ़रमाया |
      Tuesday at 15:06 ·  ·  1 person

    • डॉ. कविता वाचक्नवी जी, सही कहा Prabhakar Sharma जी, वह इसलिए नहीं बनाती क्योंकि शिक्षा कोरा उपदेश हो गई है बजाय कि आचरण।

       आचरण वाली शिक्षा प्रयोग में होती तो बात बनती; वरना इस कथित शिक्षा से भला क्या होने वाला है ?
      Tuesday at 15:21 ·  ·  1 person

    • डॉ. कविता वाचक्नवी Sd Sharma जी, आकर्षण के नाम पर ये केवल थोथे और भोथरे तर्क हैं। 

      1 - आकर्षण होने पर क्या हम आकर्षित करने वाले तत्व को नष्ट करते हैं अथवा उसका बचाव ?
      Tuesday at 15:23 ·  ·  1 person

    • डॉ. कविता वाचक्नवी ‎2 - क्या लिपटी लिपटाई और सौ पर्दों में ढकी स्त्रियॉं के साथ अनाचार नहीं होता ?
      Tuesday at 15:23 ·  ·  2 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी ‎3 - पूंजीवादी देशों में कोई उत्तेजक से उत्तेजक स्त्री पर राह चलते, अकेले में, अंधेरे में भी लोलुप दृष्टि तक नहीं डालता। (इक्का दुक्का उदाहरण छोड़ दिए जाएँ तो )
      Tuesday at 15:25 ·  ·  2 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी वस्तुतः सिद्ध यह होता है कि जिनके अवचेतन में जो भरा होता है , बस वही अवसर मिलने पर प्रकट होता है । जिनके अवचेतन में ऐसा करकट नहीं भरा वे अवसर पा कर भी निर्वैर हैं।... तो मूल अंतर व्यक्ति की अपनी मानसिकता का है।
      Tuesday at 15:26 ·  ·  2 people


    • Nshah Hemnidhii Lapeti gayi stree ke saath ye atyachar nahi to aur kya hai,
      Tuesday at 15:28 ·  ·  1 person


    • Gurbinder Punn Women are not going to achieve equality with the right to bear their breasts in public.

      That would only make them party to their own objectification. 
      True equality will be had only when women don't need to display themselves to get attention and won't need to defend their decision to keep their bodies to themselves.
      Tuesday at 15:28 ·  ·  3 people


    • Priya Sharma Sharma Yeh wisay eisa he jisper mujahay nahi lagta bahas kee jarurat hai. Es visaya per kutark he kutark milangay kewal. Hum ladko ko dos aur ladkay hamay bus eske aagay koi pariwartan nahi honay wala.
      Tuesday at 15:30 ·  ·  2 people


    • Prabhakar Sharma लेकिन पोर्न और ब्लू फिल्मेँ तो सबसे अधिक U.S.A. और यूरोप मेँ ही बनती हैँ मुझे समझ मेँ नहीँ आता कि वहाँ के पुरुष चरित्रवान कैसे हो सकते हैँ? सबसे जरुरी है कि स्त्री आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर हो और यही यूरोप और अमेरिका के विकास का राज है
      Tuesday at 15:38 ·  ·  4 people


    • Shivendra Khampariya बात सही है लेकिन आँखों की पर्देदारी न हो तो ये लपेट भी नहीं चलता नारी मर्यादा आँखों से ज्यादा असरकारक होती है
      Tuesday at 16:09 ·  ·  1 person


    • Priya Dubey डॉ. कविता वाचक्नवी मेंम आप बिलकुल सही कह रही हैं.. जितने ऐसे देस हैं जहा स्त्रियों को जितना जादा प्रतिबंधों मे ढककर रखा जाता है वहा पर उन्हें जादा लोलुप द्रष्टि से देखा जाता है और अवसर मिलने पर बदतमीजी भी सबसे जादा होती है.. पुरुष और स्त्री का एकदूसरे के लिए स्वाभाविक आकर्षण होता है .. हम सभी अछे से रहना पसंद करते हैं हर व्यक्ति चाहता है की वो आकर्षक लगे .. लकिन जैसा कुछ लोग कहते हैं की महिलाये पुरुष को आकर्षित करने के लिए सजती हैं तो उन्हें मनोविज्ञान पढना चाहिए. रही बात बुरी द्रष्टि रखने वालों की तो उसके लिए लड़कियां जिम्मेदार नहीं हैं ऐसे लोग मनोरोगी होते हैं जिन्हें अपना इलाज कराना चाहिए ..आप अक्सर infants के साथ हुए शोषण के बारे मे सुनत है वहा तो कपडे जिम्मेदार नहीं हैं ..
      Tuesday at 16:09 ·  ·  7 people


    • Irene Rattan कविता जी, मेरा मानना यह है कि जहां पर भी स्त्री एवं पुरुष को बचपन से ही एक दूसरे का आदर करना सिखाया जाता है, वहां ये समस्या नहीं आती. जिस घर में माँ को इज्ज़त मिलती हो, और उसे भी "विकल्प" दिए जाते हों, वहां ना तो स्त्री नाजायज़ फ़ायेदे उठाती है, और ना ही पुरुष उसके किसी भी विकल्प को नाजायज़ क़रार देता है. सभी अपनी-अपनी, एवं एक-दूसरे की लक्ष्मण-रेखाओं का आदर करते हैं, अगर सब अपनी-अपनी नज़र में शर्म रक्खें तो.....मेरे ख़्याल से यह एक utopian विचार है. परन्तु है तो !
      Tuesday at 16:11 ·  ·  10 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी ‎@ प्रभाकर शर्मा जी, चरित्र का अर्थ `काम' तक सीमित नहीं होता। जब यह समझ जाएँगे उस दिन इसका अभिप्राय स्पष्ट हो जाएगा। जहाँ ऐसी फिल्में बनती हैं , वहाँ क्या स्त्री के साथ आक्रामक संबंध बनाए जाते हैं? कितने प्रतिशत ?
      Tuesday at 16:24 ·  ·  2 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी रही डिफेंस मैकेनिज़्म की बात ; तो यदि स्त्री स्वयं लपेट में छिपती है तो यह उसका मैकेनिज़्म है, यदि पुरुष अथवा कथित समाज के दबाव में ऐसा करती है तो यह समाज और पुरुष का मैकेनिज़्म है और तीसरी स्थिति है कि वह स्वेच्छा से करती प्रतीत होती है किन्तु वास्तव में कंडीशन्ड हो चुकी होती है, यह भी पुरुष का मैकेनिज़्म है।
      Tuesday at 16:27 ·  ·  3 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी ‎@ गुरबिंदर पुन्न जी, हद्द है, आप जैसा बुजुर्गवार इतना भी नहीं समझ सके कि लपेट में लिपटे रहने और वक्ष लटकाए डोलने के बीच कोई नारी की अस्मिता जैसी चीज भी होती है।
      Tuesday at 16:29 ·  ·  1 person


    • Bikash Lakai Khadka i do agree 100%.....
      Tuesday at 16:30 · 


    • Ashok Singh पुरुष का मेकनिज़्म, ऐसा जरूरी नहीं है। हमारे देश का कानून स्त्री को सर से पैर तक कपड़े लपेट कर रहने को विवश नहीं करता है। ये पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक परम्पराएँ है, जिनको पुरुष भले ही अगवा हो कर निर्धारिण करता हो, लेकिन स्त्रियाँ ही दूसरी स्त्रियों या आने वाली पीढ़ियों को इस परंपरा के अंदर रहने को विवश कर देती है।
      Tuesday at 16:33 ·  ·  2 people


    • Rohit Bhushan नारी से ही रचना है, श्रृंगार है, जीवन में रस है... उसका दम घोंट कर समाज आखिर क्या पा लेता है ?
      Tuesday at 16:35 ·  ·  2 people


    • Mithilesh Dhar Dubey aur jahan naree ardh nagn kapde me ghumati hai ya koshish karti hain use kya kaha jaye??????????????
      Tuesday at 16:44 · 


    • Anita Kapoor aadmi bhi khuub ardh nagan ghmte hai...unhe kaya kaha jaye....
      Tuesday at 16:48 · 


    • Anita Kapoor APNI SOCH BADLE.....YAHI UPPAR DR. kavita kahna chah rahi hai
      Tuesday at 16:48 ·  ·  3 people


    • Rajeev Tiwari nar ki keerti - dhvja us din kat gai desh me jar se , nari ne sur ko tera jis din nirash ho nar se .
      Tuesday at 16:59 · 


    • Leena Malhotra Rao soch badlne me to sadiyan lagengi isliye dande ka raajya banaana padega. yadi is apraadh ke liye kathoor dand nirdharit kiye jaaye aur unka anupalan kiya jaaye to striyon ki surksha ka intzaam ho sakta hai. aur ek saundary ke prati nirdhark tatv hota hai "feel good" jo swayam ke liye hota hai in lolup drishtiyon ke liye nhi ...
      Tuesday at 17:03 ·  ·  2 people


    • Priya Sharma Sharma Wah raykiya topic hay yadi estree ko 500 mt jana ho to bus may seat chahiye. Koi dum niklta bujurg bhi aa jaye to bachaee ko uthna gawara nahi. kinyokee seat to hum jasee nariyon ka janm sidh adikar hay. janha etnay bhi sanskar na ho wanha baki sanskaro kee baat to bilkul biemani hay..Main to es visaya ko kewal bakwas kay alawa kuch nahi kah saktee. Dohra mapdund kewal
      Tuesday at 17:05 · 


    • Rajendra Nath Tripathi जल्दबाज़ी में रखा गया विचार!अपनी हदें निर्धारित करने का अधिकार, एक व्यक्ति होने के नाते खुद स्त्री को है।पुरुष-समाज को इसमें दख़ल नहीं करना चाहिए।रही चरित्र और व्यभिचार की बात, तो ये संश्लिष्ट प्रत्यय वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की माँग करते हैं।कविता जी को इन पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए।लपेटों से चरित्र नहीं तय होता, ये अन्दर की बातें हैं!
      Tuesday at 17:09 ·  ·  2 people


    • Mithilesh Dhar Dubey वस्तुतः `लपेट ' स्त्री का डिफेंस मैकेनिज़्म है........... kavita ji pranam. Agar ye sach hai jo mahilaye nagta ka Bhonda pradrashn karti hai aajadi ke nam par ese kya kaha jayega ??/
      Tuesday at 17:15 · 


    • Mithilesh Dhar Dubey Rajendra ji se sahmat
      Tuesday at 17:17 · 


    • Shivendra Khampariya बहुत अच्छी बहस छेढ़ी है कविताजी आपने इस बात पर एक मुकम्मल तहरीर दूंगा 

      हर हंसी चीज पर दुनिया की नजर होती है 
      जिंदगी फूलों की काँटों पर बसर होती है
      Tuesday at 17:39 ·  ·  1 person


    • Shivendra Khampariya बहुत अच्छी बहस छेढ़ी है कविताजी आपने इस बात पर एक मुकम्मल तहरीर दूंगा 

      हर हंसी चीज पर दुनिया की नजर होती है 
      जिंदगी फूलों की काँटों पर बसर होती है
      Tuesday at 17:42 · 


    • Sundar Srijak ‎"लपेट" रहित समाज की परिकल्पना वस्तुत: महान पर भावुक निर्णय हो सकता है...मेरे विचार से भारतीय समाज में कभी "जूलि" कभी "सिलसिला" कभी "फ़ायर" ,कभी "कामसूत्र" और "नि:शब्द " जैसे फिल्मों के बहाने कुछ नारी. काम और पुरुष तीनों की मर्यादाएँ लांघने की कोशिश की गई .....स्त्री को आदिम रूप में देखकर पुरुष का संयमित रहने की अपेक्षा करना-एक जानवर को अनुशासित कर पुरुष बनाना है जो कि ...नृविज्ञान और जैविक प्रक्रिया के सम्बन्धों को झूठलाना ही है .....क्या एक माँ अपने बेटी को "लपेट" से मुक्त करके "खुलेपन" वाले परिधान में पिता या भाई के सामने भेज सकती है?....यह जानते हुए भी कि तीनों के आपसी संबंध क्या है???क्या चरित्र की एकमात्र कसौटी "स्त्री के प्रति कामजनित उद्गार" ही है? जब पुरुष अपने स्वाभाविक परिधानों से अलग स्त्री के परिधान पहनते है तो उनके लिए "किन्नर" शब्द गढ़े गए है पर जहां बौद्धिक और आर्थिक रूप से मुक्त नारी पुरुषों के वस्त्र पहने तो बराबरी का मामला आ जाता है....और इनके लपेट रहित परिधानों के कारण किसी भी तरह की दुर्घटना घटे तो पूरे पुरुष समाज को चरित्रहीन की उपाधि और slut walk होने शुरू हो जाते है.....| हमारे समाज में पाश्चात्य देशों की तरह सेक्स से संबन्धित विभिन्न प्रस्ताव है...क्या हम सब सहमत है॥उन प्रस्तावों से....सारे आदर्श बाहर ही क्यूँ बंद कमरे में भी क्यूँ नहीं......"supply and demand" का विरोध सभी क्यूँ नहीं करते हम ?........कोई न कोई दाyरा तो होनी चाहिए.........क्षमा चाहता हूँ ,छोटी मुँह छोटी बात होने की संभावना है क्यूंकि ऐसे मुद्दों पर बोलना खतरे से खाली नहीं.....बस एक ही सवाल- जो लोग "लपेट" के खिलाफ है वो"खुलेपन" के खिलाफ नहीं है?...
      Tuesday at 18:12 ·  ·  1 person


    • Satyendra Singh Hamare padosi deso se ham kafi behtar. Haware yaha kisi nari ko taslima nasrin ki fatwa ka sikar nahi. Hamare desh ka kanun unhe apne vicharon ki abhibyakti ki azadi deta hai. Rahi bat purus samaj ki to

      sabhi purush nari ka samman karte hai, is par sandeh hai. Lekin desh duniyan k sabhi purush byabhichari, charitrahin hain, aisa bhi to nahi hai. rani durgawati, jhansi ki rani mather teresa to hamare aadarsh hain. Jagat janani. Hamari janani bhi to ek nari. Unka anadar ham kaise kr sakte hain.
      Tuesday at 18:35 · 


    • Girish Sharma Dr SAAB -- MERE VICHAR SE ISTRI KE HAR IK ROUP KA ADDAR AUR SAMMAN KARNA CHAHIE
      Tuesday at 18:43 ·  ·  1 person


    • Neha Arora very very true......!!!
      Tuesday at 19:26 · 


    • Siddhartha Jain Akot जब कोई इन्सान नहीं चाहे कोई व्यभिचारी नहीं हो सकता फिर भी एसा हे तो इसे रोकना होगा अब काफी फर्क हे ये बाते पुराने जमाने की हे अब भी एसा हे तो महिलाओ को भी प्रयास करना होगा में सहमत हु
      Tuesday at 19:30 · 


    • Sheeba Aslam Fehmi Ekdum agree! lekin thoda-bahot kapda to tan par chahiye hi.
      Tuesday at 20:03 ·  ·  1 person


    • Satya Mishra ye kaise aur kis aadhar pe pata chalta hai kee uss samaz ki उस सभ्यता-समाज के पुरुष अधिक चरित्रहीन, अविश्वसनीय और व्यभिचारी हैं ।
      Tuesday at 21:08 · 







    • rape statistics country;australia total crimes per capita. Country comparison of Rapes (per capita) (Crime)

      Tuesday at 21:15 ·  · 


    • Shambhu Nath Pandey 
      wah ye kaisa lanchhan ? iske biprit agar kaha jay ki jahan nibastra rahte hain ve log adhik charitravan hote hain........... kyon ki ek glass me aadha pani bhara huaa hai > to kuchhlog kahenge aadha glass bhara huaa hai, aur kuchh log kahenge aadha glass khali hai , ...... TO AAP LOGON NE KYA FAISLA KIYE ? KAL SE MAHILAYEN BASTRA NAHI PAHANTI HAI TO PURUSH LOG CHARITRAVAN, VISWASI aur BYABHICHARI NAHI HONGE , yahi thik rahega , lekin samaj ke jo kutte hain un se bachana aapka apna kaam hoga , Aaj ke din me bhi aandaman aur nikobar dweep me aadiwasi log nange rahte hain , kyon ki unke pas abhi bhi sabhyata ki kiran nahi pahunchi hai .........
      Tuesday at 21:16 ·  ·  1 person

    • डॉ. कविता वाचक्नवी ‎@ अशोक सिंह, वे क्यों ऐसा करती हैं, इसकी तहा में जाने के लिए समाज-मनोविज्ञान पढ़ना होगा, इतने आराम से निष्कर्ष निकालने और स्टेटमेंट देने से काम नहीं सधता।
      Yesterday at 00:19 · 

    • डॉ. कविता वाचक्नवी अनूप मिश्रा जी, यह प्रमाणित हो चुका है कि ऐसे डाटा भारत और एशिया/अफ्रीका व अरब देशों के संदर्भ में  एकदम महत्वहीन हैं, क्योंकि हमारे यहाँ इनका कोई रेकर्ड ही नहीं बनता; जितना बनता है वह वास्तविकता से कोसों दूर। वास्तविकता के कुल 10 प्रतिशत केस भी दायर नहीं होते। इसलिए हमें इतराने और खुशफहमी पालने में नहीं पड़ना चाहिए।
      Yesterday at 00:23 ·  ·  1 person

    • डॉ. कविता वाचक्नवी 
      अजीब बात यह है कि जब स्त्री को उसके सामान्य मानवीय अधिकार दिलाने और खुली प्राणवायु में मानुषी की तरह सांस लेने की बात उठती है तो लोग जानबूझ कर व खींच खाँच कर इसे स्वछंदता और यौनमुक्ति का रूप दे देते हैं क्योंकि वैसा करके स्त्री को बंद रखने का अधिकार जो मिल जाता है! क्या इतनी बात समझने के लिए भी किसी डॉक्टर के इलाज की आवश्यकता होती है कि पर्दों और लपेटों से मुक्त करने का अभिप्राय ग्रुप सेक्स की स्वछ्न्दता देना नहीं होता। असल में आम पितृसत्तात्मक पुरुष स्त्री को भी वैसा और उतना ही समझता है, जैसा और जितना वह स्वयं होता है। अपनी काम कुंठाओं के चलते वह यहीं तक समझ पाता है कि स्त्री को पर्दों में बंद रखने से आजादी मिल गई तो पुरुषों से अपेक्षा और उम्मीद (अधिक चरित्रवान होने की) बढ़ जाएगी, जिसे वह संभव नहीं देखता।
      Yesterday at 00:32 ·  ·  5 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी सबसे अच्छी प्रतिक्रिया और सलाह Irene Rattan की टिप्पणी से आई है।

       जिन्हें स्त्री से किसी भी प्रकार के भय लगते हैं उन्हें समझ जाना चाहिए कि जिस समाज में स्त्री को सम्मान और समान अधिकार नहीं मिलते वहीं स्त्री की मानसिकता उस समाज/परिवार से बदला लेने की निर्मित होती चली जाती है, अवसर मिलते ही और समर्थ होते ही वह भी बदले लेती है फिर।
      Yesterday at 00:37 ·  ·  3 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी 
      भारतीय संस्कृति के नाम पर मध्यकालीन अंधविश्वासों, मूढ़ताओं और तत्कालीन विवशताओं को सही और प्रामाणिक करार देना अत्यंत हास्यास्पद है। 



      आक्रांताओं से बचने के लिए अपनाया गया पर्दा आक्रांताओं से पूर्व भारत के इतिहास और संस्कृति में कभी नहीं था। 
      आक्रांताओं से बचने के लिए अपनाया गया था, इसीलिए वह डिफेंस मैकेनिज़्म का हिस्सा था; यहीं से बात प्रारम्भ हुई थी। कोई माई का लाल मध्ययुगीन भारत से पूर्व के इतिहास से स्त्री के पर्दे के कारागर का वास्तविक प्रमाण नहीं दिखा सकता। तो क्या मध्यकाल से पूर्व की सब स्त्रियाँ व्यभिचारिणी थीं ? `लपेटों' की तरफदारी करने वाले यह भूल जाते हैं कि वे होते कौन हैं अधिकार देने या न देने वाले !

      Yesterday at 00:49 ·  ·  5 people


    • Gurnam Singh Shergill and Albar Allahabadi kaa aur hi vichaar hai- beprdah nazar aayee kall jo chand biwiaaN, Akbar zamin meiN ghairt e kaumi se garh gaya, poochha ke jo aap kaa pardah thaa kya hua, kehne lagiN ki akal pe mardoN ke parh gaya-
      Yesterday at 01:11 ·  ·  3 people


    • Gurnam Singh Shergill Dr SahibaN-you are right and here life style in Canada vouch for your version. No akarshan or anything like that. Woman work as men work and no domination of men or woman upon each other and alas this could be adopted in India. 100 years more slightly less-we are bad.
      Yesterday at 01:16 ·  ·  1 person


    • Maitreyi Nachuri 
      Kavitha Ji, is it surprising that every Indian woman who responded to your statement got your point and almost every Indian male missed it? I really identify with your statement where you talk about societies that " let women breathe" I amconservative but still I was very conscious in India of constant scrutiny, as a girl and as a grown up. I could not move or think without being conscious of an invisible code /standard which let men gawk at me while it was my burden that I personify the so-called Bharatiya (so filmi) sanskriti at its highest. I have heard from my american friends that women do suffer the objectification in the west too but I found I have the space here to just be. The writings of Volga, a famous telugu writer really helped me to sort my feelings in this regard. The west with its respect for the individual's dignity is so much more Bharatiya than India.
      Yesterday at 03:13 ·  ·  4 people


    • Maitreyi Nachuri I also saw in my village near Hyderabad, women who work on the farms are less covered and more assertive than many well-to-do and educated women.
      Yesterday at 03:19 ·  ·  2 people


    • Prabhakar Sharma फेसबुक पर तो कुछ समान विचार के लोग मिल भी जाते हैँ पर यहाँ जौनपुर मेँ तो हाल ये है कि बस उटपटाँग फिल्मेँ ही चलती हैँ भूले-भटके कोई मुद्दा वाली गंभीर फिल्म लग गयी तो दूसरे दिन ही उतर जायेगी पूरे शहर मेँ एक भी अच्छी सी0डी0लाइब्रेरी नहीँ है कि किराये पर अच्छी फिल्म लाकर देख सको, पूरा बाजार पाइरेटेड सी डी से भरा पड़ा है
      Yesterday at 03:21 ·  ·  1 person


    • Prabhakar Sharma फेसबुक पर तो कुछ समान विचार के लोग मिल भी जाते हैँ पर यहाँ जौनपुर मेँ तो हाल ये है कि बस उटपटाँग फिल्मेँ ही चलती हैँ भूले-भटके कोई मुद्दा वाली गंभीर फिल्म लग गयी तो दूसरे दिन ही उतर जायेगी पूरे शहर मेँ एक भी अच्छी सी0डी0लाइब्रेरी नहीँ है कि किराये पर अच्छी फिल्म लाकर देख सको, पूरा बाजार पाइरेटेड सी डी से भरा पड़ा है
      Yesterday at 03:22 ·  ·  1 person


    • Maitreyi Nachuri 
      ‎@ Sundar Srijak Ji, जब पुरुष अपने स्वाभाविक परिधानों से अलग स्त्री के परिधान पहनते है तो उनके लिए "किन्नर" शब्द गढ़े गए है पर जहां बौद्धिक और आर्थिक रूप से मुक्त नारी पुरुषों के वस्त्र पहने तो बराबरी का मामला आ जाता है.. Aap kya yeh kah rahen hain ki jo mahilayein purushon ke samaan vastr pehnti hain woh barabari ko/mukt vichaaron ko saabit karne ke liye aisa karti hain? Vastutah saree aur chunni sambhalte sambhalte na koi naari kheton mein kaam kar sakti hain na hi aaj ke shehron ke traffic mein bach sakti hain. Pitruswamik sanskriti mein jitnaa naari ko lapeton mein, gehnon mein bandh kar ke rakha gaya ho wah uske swami ke utne hi unnat sthaan ko darshatha hai. Jo jitne paise wala ho woh apne paise ko apne stree ke sajdhaj main aur us sajdhaj ke parde mein dikha sakta hai. Lekin wah saji dhaji stree utni hi bekaar bhi hoti hai. "Chudiyaan pehnkar baitho" yah stree ka laachaar sthaan hai zindagi mein -jab tak yah baat hamare samaj ke mastishk main baitha hua hai, tab talk aap yeh samajh nahi paayenge ki hum mard banne ke shaukeen nahi, insaan banne mein lage hue hain.
      Yesterday at 04:09 ·  ·  3 people


    • Sudhakar Ashawadi Sharma shaq ki kenchi ke falke yadi aapas me hi chal jate hai , such kahata hoo viswaso ke chandan van bhi jal jate hai, Lapet bhi isi se prabhavit ek satya hai. Jise swayam par viswas nahi vah bhala kisi aur par viswas kaise kar sakta hai ?
      Yesterday at 05:10 ·  ·  1 person


    • Sudhakar Adeeb स्त्री को आवरण में रखना पुरुष मानसिकता के कुंठाग्रस्त होने का ही परिचायक है । निसंदेह उन्मुक्तता का अर्थ नग्न निरावरणता नहीं , पर समाज मे स्त्री-पुरुष के सह अस्तित्व के साथ ही उनके समान अधिकारों की हिमायत अवश्य है । हमें यह तय करना होगा कि हम आधुनिक समाज में रह रहे हैं कि अभी भी प्राचीन बर्बर समाज के प्रतिनिधि हैं ।
      Yesterday at 06:53 ·  ·  2 people


    • Sat Pal Khayaal 
      India me logon ko qanoon ka khauf nahin hai aur yeh mawaali logon ka to police ke saath choli-daaman ka saath hai to yih log jo chahte hain karte hain, education naam ki to cheez koi hai nahi, doosri countries me log zyada civilised hain aur wahan yeh relationship Hawa nahi hai..I was in thailand and when I went to Pataya beach to mujhe sharm aa gayi kyonki mai pant-kameez tight karke gaya tha, lekin india me jitna lapet hai utna hi... hai to kya kahen ..its tediuos topic
      Yesterday at 07:50 ·  ·  1 person


    • Upendra Pandey डा. साहब आपने बहुत सही फरमाया है।
      Yesterday at 08:22 ·  ·  1 person


    • Anand Mohansrivastava bilkul sahi baat hai
      Yesterday at 08:52 ·  ·  1 person

    • डॉ. कविता वाचक्नवी 
      Maitreyi Nachuri जी ने एकदम सटीक बात लिखी है,Sundar Srijak जी का समाधान हो गया होगा। विदेश की बात जाने भी दें तब भी उत्तर भारत वालों को दक्षिण भारत जाकर व रहकर गंभीरता से देखना चाहिए; विशेषकर पुणे जैसे सुसभ्य नगरों को, जहाँ महिलाएँ आत्मसम्मान व निर्द्वंद्व भाव से खुले रूप में रहती हैं। किसी लपेट के बंधन में कदापि नहीं; और न ही उनसे छेड़छाड़ की घटनाएँ उस तरह होती हैं जैसे उत्तर भारत में। बसों में उनके लिए कोई अलग दरवाजा और कोई अलग प्रावधान नहीं होता, वे सब के साथ सामान्य व्यक्ति की भांति रहती हैं किन्तु तब भी कोई भीड़भाड़ का फायदा उठाकर उनसे खिलवाड़ नहीं करता।



       यहाँ योरोप, कैनेडा और अमेरिका आदि में तो लगभग प्रत्येक स्त्री बिना `लपेटों' के होती है, बल्कि नेकर, शर्ट, जींस, आदि में;  किन्तु कोई आँख उठाकर भी लोलुप दृष्टि से नहीं देखता। लंदन के उन उन भागों में जाना हमारे जैसी (एशियन और बड़ी वय की ) महिलाओं तक के लिए असहज होता है जहाँ जहाँ दक्षिण एशिया आदि के लोग रहते हैं। छिछोरेपन और निगल लेने वाली निगाहों के साथ वे किसी भी स्त्री का चलना, ट्रेन या बस में बैठना तक दूभर कर के उसे असहज बना देते हैं। वस्तुत: इसी से और ऐसी नीयत वालों से अपने बचाव के लिए स्त्री पर पारिवारिक सामाजिक दबाव आने के कारण उसे अपने को पर्दों में बंद करना पड़ा।
      Yesterday at 09:43 ·  ·  2 people


    • Veerbhdra Singh Bundela fir apka najriya kiya kahat hai .......isko kis tarike se dekha jana chiye ????
      Yesterday at 10:01 · 


    • Sundar Srijak 
      डॉ. कविता वाचक्नवी...तर्क सही है पर प्रासंगिक नहीं...मेरा सवाल था -जो लोग "लपेट" के खिलाफ है वो"खुलेपन" के खिलाफ नहीं है?...रही बात मैत्रयी जी उन्होने बस भारतीय परिधानों और पाश्चात्य परिधानों की तुलनात्मक गुणावगुण ही बतलाए है........उत्तर भारत में शादी विवाह की जो परंपरा ही...और साउथ में (आंध्र प्रदेश की बात मै जानता हूँ) बहू विवाह और स्वतंत्र संबंधो का जो चलन है उत्तर भारत अभी तक उसे उस रूप में नहीं अपना सका हाओ तो क्या गलत किया है.....साउथ के फिल्मों में नायिकाओं को जितना प्रेम प्रसंग में जितना बोल्ड दिखाया जाता है...वह साउथ में नहीं....कोई कुछ भी पहने "लपेटकर /खुलापन लिए " सुविधा के नाम पर नुमाइश क्या उचित है....आप आदिम प्रवृति की ओर लौटना चाहते है तो ठीक है.....मुद्दा फिर वही है क्या परिधानों की जरूरत मौसम या प्रकृति से बचना ही है या कुछ और भी.....आखिर कपड़ों की जरूरत क्यों पड़ी थी.....कुछ अपवादों के आड़ में पुरुष समाज पर लांछन लगाना बहुत आसान है पर शहरों में बढ़ती "बंद कमरों में होने वाली अनाचार "की रिपोर्टिंग भी ध्यान रखे जाने चाहिए ....अगर कोई किसी के बाथरूम में घुस जाए तो नि:सनदेह गलती घुसने वाले की मानी जाएगी पर अगर कोई आपत्ति जनक स्थिति में बाथरूम के बाहर खुद आ जाए तो किसकी गलती मानी जानी चाहिए....परिस्थिति के अनुसार सही गलत हो जाता है....सार्वजिंक स्थल पर भी या मानी होना चाहिए....विदेशों के कामजनित अनाचारों के कुप्रभाव पर बहस के लिए समय बहुत कम पd जाएगी....
      Yesterday at 10:11 ·  ·  1 person


    • Nutan Gairola या ये लपेट खुद पुरुष का डिफेन्स मैकेनिज्मतो नहीं है - कही उनकी तरह का व्यवहार समाज के अन्य पुरुष उनके घर की महिलाओं के साथ ना करे ..तो लपेट लो घर की स्त्री को...
      Yesterday at 10:24 ·  ·  3 people


    • Sundar Srijak खुलेपन का व्यवहार घर के सभी सदस्यों के साथ भी लागू होता है क्या? या सिर्फ बाहरी लोगों के लिए यह विरोध....?कोई क्यूँ बताए कि महिलाएं क्या पहनेगी....महिलाएँ अपने सामाजिक और सांस्कृतिक बोध से यह तय करे कि क्या उचित है...उन्हे जबतक कोई बताना नहीं छोड़ेगा तबतक वो पुरुष सत्ता का विरोध दर्ज करने के लिए कुछ भी पहनेगी और slut walk तक करेगी !!!
      Yesterday at 10:30 · 

    • डॉ. कविता वाचक्नवी समझ नहीं आता कि लोगों को पर्दे से मुक्ति का अर्थ यौन मुक्ति के रूप में लेने में क्या लाभ मिलता है !
      Yesterday at 10:34 ·  ·  5 people


    • Sundar Srijak ‎"कोई क्यूँ बताए कि महिलाएं क्या पहनेगी....महिलाएँ अपने सामाजिक और सांस्कृतिक बोध से यह तय करे कि क्या उचित है.."
      Yesterday at 10:37 ·  ·  1 person


    • Sat Pal Khayaal 
      koii ek waqt tha jab log aurat ke pair ka angootha dekhkar romachit ho jaate the,kyonki baaki sab kuch parde me hota tha..ab waqt badal gaya hai , lekin india me kai jagah ab bhi log 100 saal peeche jeete hain aur Metro cities me 100 saal aage bhi hain, jiski gawah yih rave parties hain,.. actually cloth doesnt matter, your characte matters, your attitude matters and as kavita ji said -समझ नहीं आता कि लोगों को पर्दे से मुक्ति का अर्थ यौन मुक्ति के रूप में लेने में क्या लाभ मिलता है ..sahi hai..just be simple and adjust to ur enviorment
      Yesterday at 11:03 ·  ·  1 person

    • डॉ. कविता वाचक्नवी ‎"स्त्री के वस्त्र नहीं अपितु व्यक्ति का अपना चरित्र तय करता है कि वह कैसा आचरण करता है" के तथ्य का उभर कर आना महत्वपूर्ण है। यही वह स्टार्टिंग प्वायंट है, जहाँ से स्त्री के मानुषी होने की यात्रा प्रारम्भ हो सकती है।
      Yesterday at 11:11 ·  ·  2 people


    • Gurnam Singh Shergill 
      Dr.Sahiba aapne yeh kaisa vishe chuna ki band hone kaa nam he nahiN leta. Naganta-hamare yahaN Canada meiN pehraava aisa hai kee sabhi (punjabi yaa doosre Indian ko chhod ke) meiN naganta hai par kisi ko koi attraction nahiN jabke Bharat meiN Saarhi blouse v kaafi hadd takk open dress hai aur majority ke hai phir bhi log aakrshan dhoondtey haiN. Aurt kaa bazaar se guzrna mushkil ho jaata hai. So aap ke samasya youN ke teuN bani huee hai-kuchh accha samadhan saamne nahiN aaya
      Yesterday at 11:55 ·  ·  1 person


    • Yesterday at 12:04 · 


    • Gurnam Singh Shergill par itne barhe vidwaaN Tulsi dass jee ne kya likh dia "Dhor ganwaar shudar pashu Naari, ye sb tadan ke adhikaari"
      Yesterday at 12:18 ·  ·  1 person


    • Sanjay Bengani ताले वहीं जरूरी होते हैं जहाँ चोर होते है.
      Yesterday at 12:31 ·  ·  1 person


    • Mohinder Kumar वस्तु विशेष की अधिकता या कमी ही ...व्यभिचार या सज्जनता का कारण
      Yesterday at 13:37 · 

    • डॉ. कविता वाचक्नवी यदि यह सिद्धान्त सम्पूर्ण होता तो सारे मालामाल लोग काले धंधे करना बंद कर देते । वस्तुत: मुख्य चीज होते हैं व्यक्ति के संस्कार।
      Yesterday at 15:10 ·  ·  1 person


    • Rajendra Nath Tripathi 
      वस्त्र का आविर्भाव सभ्यता का आविर्भाव था!स्वाभाविक लज्जा-बोध के बाद इसे अपनाया गया था।स्त्री-पुरुष के बीच स्वाभाविक आकर्षण होता है।इस आकर्षण में वस्त्रों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।‘नग्नता’ और ‘लपेट’ दोनों ही इस सहज स्थिति के विरुद्ध पड़ते हैं(एक दूसरे के बराबर ही खतरनाक!)।स्त्री को पुरुष की रुग्ण मानसिकता ने ‘व्यक्ति’ से ‘वस्तु’ बनाया। और तभी से पुरुष-समाज उसे अपनी मर्ज़ी से लपेटता और नंगा करता है!कभी बलपूर्वक और कभी छलपूर्वक!नारी-मुक्ति का अर्थ है-उसका ‘वस्तु’ से ‘व्यक्ति’ होना! और ‘यौन-मुक्ति’ का अर्थ खुला व्यभिचार नहीं होता।बल्कि यह स्त्री को इस बात की आज़ादी देता है कि वह उसी पुरुष के साथ यौन -संबन्ध स्थापित करे, जिसे वह प्यार करती है!यह उस पति से आज़ादी है, जो पत्नी की मर्ज़ी के विरुद्ध उसके साथ बार-बार बलात्कार करता है!अब जहाँ तक कविता जी की ‘पश्चिम की वकालत’ का सवाल है तो वे शायद नहीं जानतीं कि स्त्री आज भी सबसे ज़्यादा ग़ुलाम उन्हीं देशों में है क्यों कि उसे आज भी वहाँ ‘वस्तु’ समझा जाता है-मात्र एक देह!और सबसे अधिक बलात्कार की घटनाएं भी उन्हीं तथाकथित विकसित देशों में होती हैं!
      Yesterday at 15:27 · 


    • प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
      प्रश्न जायज लेकिन एक आम धारणा के तहत कुछ विचार .... 

      जहां गलत होता है वह अपवाद है। और उसमे सुधार एवं एक मत होने की आवश्यकता है। हमारी समस्या यह है कि हम प्रश्न पूछते है तो अंगुली उठाकर। अगर आज हम यह बात कर रहे है तो फिर कोई भी परिवार इससे अछूता नही है,परिवार का हर पुरुष सवालो के घेरे मे है। आज का महिला वर्ग अपने परिवार के सहयोग से [इसमे पिता भाई पति भी शामिल है ] आगे बढ़ रहा है [हो सकता है विरोध के साथ भी]..... उनके उत्थान मे पुरुष वर्ग का भी उतना हाथ है। 
      संकीर्ण मानसिकता मे सुधार और अपवादो को खतम करने का एक साथ प्रयास होना चाहिए ना कि पुरुष या महिला बन कर करे या सोचे तो बहुत कुछ बदला जा सकता है..... इसी भाव को लेकर एक रचना लिखी थी, भाव को समझिए 


      मैं अबला हूँ
      सदियो से हारती आई हूँ
      यही हम कहते आये है।

      मुझे हर पल कोसा गया
      मेरे अर्थ को निर्थक किया
      यही हम कहते आये है।

      वेदना ही मेरा अस्तित्व है
      हर पल मुझ पर जुल्म हुये
      यही हम कहते आये है।

      दुर्गा हो या पार्वती
      गाते सब मेरी आरती
      कहो कौन जीता कौन हारा?

      सीता हो या सावित्री
      पतिव्रता की है हम निशानी
      कहो कौन जीता कौन हारा?

      पीटी उषा हो या किरन बेदी
      देश का सम्मान हमने है बढाया
      कहो कौन जीता कौन हारा?

      इंदिरा हो या प्रभा पाटिल
      देश पर है राज किया
      कहो कौन जीता कौन हारा?

      हर युग की शान है नारी
      प्रेम त्याग सम्मान का अर्थ हमसे बनता
      कहो कौन जीता कौन हारा?

      आज हम क्यो रोये रोना
      स्वयं तैयार हमे है होना
      फिर देखे कौन जीता कौन हारा?

      कसूरवार है जो नर नारी
      उनको है सीख सिखानी
      फिर देखे कौन जीता कौन हारा?

      दोष क्यो समाज को दे
      अपने अधिकार का हम प्रयोग करे
      फिर देखे कौन जीता कौन हारा?

      सदियो से सश्क्त है नारी
      नर से करे न हम अंतर भारी
      फिर देखे कौन जीता कौन हारा?

      चले साथ हम नर और नारी
      सच्चे मन से निभाये अपनी जिम्मेदारी
      फिर देखे कौन जीता कौन हारा?

      हर एक को शिक्षा और स्वास्थ्य मिले
      भूख और गरीबी का नामो निशान मिटे
      फिर देखो केवल हिन्दुस्तान जीतेगा।

      -प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
      23 hours ago ·  ·  1 person


    • Sundar Srijak bahut khoob!!!
      22 hours ago · 


    • Mohit Bansal 
      ‎@ Priya Dubey, Anant alok, Kavita Chachi ji, Anita Kapoor, Leena Malhotra...........


      plz. reply to following points:
      1. Is the dressing sense of a lady same as in front of her husband & as in front of her brother/ father ?




      it is rightly said that her dressing sense clearly defines the treatment she is demanding from the other person.
      will a lady wear a burka in front of her husband in her bedroom ?



      or 
      will she appear in nighty or bikini in public place in front of strangers/ outsiders ?

      2. Further there should be a level playing field for both girls and boys. a male is deemed guilty even by accusation.



      glaring eg is that of sec 376 IPC & sec 498B IPC.
      plz. here i mean to say that it is mis utilization of these two sections which is hampering our society like any thing.
      many a girls/ ladies have misused these sections by considering the same as their ABSOLUTE PRIVILEDGE 

      plz. i'm not against any of the gals / ladies, as i do respect them a lot as they are like my mother/ sister/ daughter ?

      but my only question to all my mothers/ sisters/ daughters, is that if life of a gal is valuable, won't the life of a boy deserve any value.

      if a gal looses her dignity by such incidences, A BOY ALSO LOOSES THE SAME & THAT TOO WITH A MUCH HIGHER RATE, IN CASE OF FALSE ACCUSATION.

      againsaid, i'm not against punishing the guilty, 
      PUNISH THE GUILTY TO THE HARSHEST POSSIBLE LEVEL
      BE SHE BE A GIRL
      OR 
      BE HE BE A BOY,

      BUT NOT THE INNOCENT ONES.
      AS it is not only the guy, but his entire circle comprising of every1 around him, which suffers because of such useless allegations....
      19 hours ago · 

    • डॉ. कविता वाचक्नवी 
      ‎@ Rajendra Nath Tripathi जी, जिन देशों में सर्वाधिक बलात्कार की घटनाओं का जिक्र आपने किया है, उसका आधर जिन आंकड़ों से तय किया है आपने, वे आंकड़े ( मैं पहले भी लिख चुकी हूँ ) आपको इसलिए अधिक प्रतीत होते हैं क्योंकि दर्ज और गैर दर्ज का अन्तर है। 



       भारत में स्त्रियॉं के विरुद्ध/प्रति होने वाले अन्य अपराधों को छोड़ भी दिया जाए और मात्र बलात्कार की बात की जाए तो वास्तविकता का दस प्रतिशत भी किसी खाते में दर्ज बमुश्किल होता है। और यदि आंकड़ों पर ही चलना चाहें तो अभी अभी लगभग महीने भर की अवधि में आए उस सर्वेक्षण के आंकड़ों को क्या कहेंगे जिनके अनुसार विश्व के स्त्रियॉं के लिए सबसे खतरनाक तीन देशों की सूची में भारत भी सम्मिलित है। वैसे, भाई लोग विषयांतरण करने में या तो माहिर हैं या भटक जाते हैं या कुछ और ... कि वे स्त्री के पर्दों में बंधन की बात को नग्नता और उन्मुक्त संबंध , स्वच्छंदता और जाने कहाँ कहाँ तक घसीट कर ले जाते हैं।
      15 hours ago ·  ·  3 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी 
      आपने पश्चिमी देशों में स्त्री की देह के प्रति अनाचार और बलात्कार का विषय उठाया है तो ज्ञात हो ( यह यद्यपि दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में अत्यंत न्यून है ) कि उसका कारण स्त्री के वस्त्र नहीं अपितु देह और दैहिक सम्बन्धो की मर्यादा, गरिमा और उज्ज्वलता के संस्कार का अभाव है; न कि हमारे समाजों की तरह स्त्री को हड़पने के पुरुष के जन्मसिद्ध अधिकार का प्रतिफल।



       और हाँ, आपने मेरे वक्तव्यों को सही व पूरा पढ़ा होता तो स्पष्ट हो जाता कि मैं किस की वकालत कर रही हूँ। न आपने मध्यकाल से पूर्व के भारत की स्त्री की स्थिति की बात पर गौर फरमाया, न आपने महाराष्ट्र और दक्षिण का प्रसंग समझने लायक समझा।



       वैसे रोचक बात यह लगती है कि समाज का इतना बड़ा वर्ग यह जहमत उठाना नहीं चाहता कि स्त्री किन समाजों में, किन व्यक्तियों में, किस परिवेश में, कहाँ कहाँ, कब कब सहज अनुभव करती है और कब कब असहज व उत्पीड़ित। यह तो कोई स्त्री ही बेहतर बता सकती है न, किस देश का वातावरण किस देश और किस समाज का वातावरण किस समाज से बेहतर या स्वस्थ ( स्त्री उत्पीड़न के संदर्भ में) उसे लगता है। मैं भारत के 3-4 प्रान्तों के अतिरिक्त पूरे भारत में अलग अलग लंबी अवधि तक रह चुकी हूँ, पूर्वी और पश्चिमी देशों में भी रही हूँ, कई लाख स्त्रियॉं से उनके जीवन और अनुभव शेयर कर चुकी हूँ, स्त्री होने के नाते मेरे भी आँख कान इस विषय को समझते बूझते हैं, अतः कम से कम मेरे स्त्री होने का लाभ इस विषय के मेरे अनुभव को अधिक प्रामाणिकता देता है।
      14 hours ago ·  ·  4 people


    • Jasvinder Singh Madam Dr. Kavita Vachavnavi, It is well said that greatness of a country lies in how its people respect their women. I feel we should not forget our moral duty to protect and respect the women in our society. Thanks for initiating an interesting debate.With best wishes, Jasvinder Singh
      14 hours ago · 

    • डॉ. कविता वाचक्नवी 
      ‎@ मोहित, अच्छा लगा तुम्हारा ऐसी गंभीर चर्चा में कुछ बिन्दुओं को उठाना।



       ये सब प्रश्न यद्यपि बड़े अलग अलग और संख्या में अधिक प्रतीत होते हैं किन्तु संक्षेप में कहूँगी कि क्या कभी उन उजड्डों के बारे में भी यही विचार आते हैं जो नंगे अधनंगे, कच्छे या उपरना लपेटे सरे आम बस्तियों में, बाज़ारों में, स्टेशनों पर और जाने कहाँ कहाँ अपनी देह उघाड़े घूमते हैं।



       ध्यान देना कि यहाँ मूल विषय भी वही है जिसका तुम स्वयं समर्थन कर रहे हो कि पुरुष की कुदृष्टि से बचाव के लिए स्त्री को ढाँपते चले जाने और पर्दों में लपेट कर रखने से बेहतर क्या पुरुष को प्र-शिक्षित किए जाने की आवश्यकता नहीं है ?



       और हाँ जो प्रश्न तुमने स्त्री के संदर्भ में उठाए हैं वे केवल स्त्री पर ही लागू क्यों होते हैं? यदि पुरुष को परिवार और समाज के सामने पहने जाने वाले वस्त्रों और पत्नी के सामने पहने जाने वाले वस्त्रों में अंतर की आवशयकता नहीं है तो स्त्री को क्यों है ? क्या स्त्री के लिए भी ऐसे वस्त्रों का प्रावधान नहीं होना चाहिए, जिन्हें वह पुरुष के समान सब जगह सुविधा से प्रयोग करती रह सके? वैसे परिधान पर ऊपर एक बहुत अच्छा विचार आ चुका है, उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है।
      14 hours ago ·  ·  2 people

    • डॉ. कविता वाचक्नवी और सौ बातों की एक बात यह है कि वस्तुतः जो पुरुष प्रधान पीढ़ियाँ अपने उच्छृंखल आचरण द्वारा अपनी पुरुष संतानों को सही संस्कार नहीं दे सकीं , उन्हें जब समाज में इसके दुष्परिणाम दीखने शुरू हुए/ होते हैं/ होते आए, तब वे किस मुँह से अपनी उन उच्छृंखल संतानों से वैसी उच्छृंखलता न करने की बात कहते ? सो, सब से सरल मार्ग उन विपत्तियों से बचने का यही निकाला गया कि स्त्री ही पर्दों में लिपट/लपेट दी जाए।
      14 hours ago ·  ·  3 people


    • Maitreyi Nachuri 
      मुझे अगर पता होता की यहाँ मेरे विचार व्यक्त करने से सारे आन्ध्र संस्कृति और चरित्र पर सुन्दर जी का आक्षेप सुनना पड़ेगा तो दूर ही रहती. आप किस बहु विवाह और स्वतंत्र सम्बन्ध की बात कर रहे हैं जिसके लिए आन्ध्र पर ऊँगली उठा रहे हैं. आज तक सोचते थे की दक्षिण प्रांत तो महिला साक्षरता, ग्रामीण बैंकों में स्त्री स्वाधिकार आदि के लिए प्रसिद्द हैं . मैं रोज़ मर्रा के भाग दौड़ वाले परिवेश में महिलाओं की कठिनाईयों की बात कर रही थी , ना की स्त्री उद्धार /स्वछंदता की. आप सलूट वाल्क की बात कर रहे हैं, हम रेगुलर वाल्क की बात कर रहे हैं. इतना डर क्यों हैं आपको कि महिलाओं की हर हरकत और चाल पे क्या यह नज़र रखा जाए की वह परिधि मैं हैं या नहीं ? उसके मामूली वाल्क कब सलूट वाल्क बन जांए यह भय लगता है आप के मन में घर कर गया है. मातृशक्ति पर थोडा विशवास और बढ़ाना पड़ेगा आपको. जो स्त्री आपके आदर्श नारी के परिभाषा / रूपरेखा के अनुकूल न हो वो भी उसी मातृशक्ति की प्रतिनिधि हैं और उतने ही आदर की अधिकारिणी है. खुला हो या ना हो इस से कोई फरक नहीं पड़ता. लेकिन हाँ यह भी है, मैं तो दक्षिण से हूँ , अक्का महादेवी और वेमन जैसे सरफिरे संतों के देश से, गांधार के घाज़ी/घज्नियों के आक्रमणों से कोसों दूर.अगर यह संत खुलेपन के खिलाफ नहीं थे तो हम क्या चीज़ हैं? आप अलग सोच रखते होंगे,आपको पूरा हक़ है अपने विचार रखने का . आप इरान के मोरल पोलिसे से काफी बेहतर हैं.
      12 hours ago ·  ·  4 people


    • Maitreyi Nachuri Sorry Kavita ji thak gaye honge itne comments se, yeh aakhri tha I promise, :-) I am done.
      12 hours ago · 

    • डॉ. कविता वाचक्नवी Maitreyi Nachuri जी, आपकी टिप्पणियों से मैं कतई नहीं थकी हूँ, अपितु बहुत अच्छा लग रहा है कि आपने अपने अनुभवों व तथ्यों से हम सब को परिचित करवाया। आपके विचारों का सदा स्वागत है।
      5 hours ago · 

    • डॉ. कविता वाचक्नवी Maitreyi Nachuri और हाँ, अभी तक आपके पिताजी से ही परिचय था, अब इस बहाने उनकी बेटी से भी हो गया। :)
      5 hours ago · 


    • Buddhi Lal Pal SAHI HAI
      32 minutes ago · 


    • Alok Khare some how agree!
      Friday at 06:49 · 

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