Thursday, September 22, 2011

बैड पैरेन्टिंग : माता पिता के बीच की दरारों से दिग्भ्रमित बच्चे

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बैड पैरेन्टिंग - माता पिता के बीच की दरारों से दिग्भ्रमित बच्चे
- सुधा अरोड़ा



माता और पिता के रूप में बच्चों को भावनात्मक सहारा देना और उन्हें एक स्वस्थ माहौल में बड़ा होने की सुविधाएँ और अवसर देना हमारे हाथ में है । अपने तनावों का दंश  बच्चों को देकर असमय उनसे उनका बचपन छीन लेना और उन्हें एक दहशत के माहौल में बड़ा होने देना एक अपराध से कम नहीं ! 







पिछले दिनों ब्रिटेन के कई शहरों में दंगे भड़के । टोटेनहम से शुरु हुई यह आग बरमिंघम , मैनचेस्टर और कई शहरों तक फैल गई । इसके राजनीतिक और वर्णविभेद के कारणों और दंगों के बीच भारतीय चैनलों पर कई जगह यह कैप्शन बार बार दिखा - ‘‘ बैड पैरेन्टिंग - कॉज़ फ़ॉर रायट्स ’’ -- कि दंगों को भड़काने में, बड़े बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर की लूट और फसाद में आठ नौ साल से लेकर ग्यारह साल के बच्चों तक की भागीदारी इसमें देखी गई । बैड पैरेन्टिंग - यानी बच्चों के पालन पोषण में खराबी, बच्चों को घर में सही संस्कारों और अपनी उम्र का अपेक्षित भावनात्मक संरक्षण न मिलने के कारण उनका दिशाहीन होना । 


पिछले दो दशकों से पश्चिमी देश में बच्चों में बढ़ती हुई हिंसा - कभी स्कूल की अपनी क्लास के सहपाठियों को बंदूक की गोलियों से भून डालना , कभी शिक्षकों के साथ बेअदबी करना , कभी स्कूल में अपनी कलाई की नस काटने की आत्महंता कोशिश और कभी निराशा के गर्त में डूबे बच्चे का शून्य में ताकना और किसी सवाल का जवाब न देना , सोलह से अठारह साल के लड़कों का बाप बन जाना l इसके साथ साथ पिछले कुछ सालों में ब्रिटेन में माता पिता द्वारा चार साल से बारह साल तक के बच्चों पर की गई हिंसा के कई मामले सामने आये हैं । ऐसी घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त पश्चिमी देशों की इतनी विकराल समस्या रही है कि वहाँ सभी स्कूलों में एकाधिक काउंसिलर तो होते ही हैं, कई बार स्कूल के शिक्षकों और प्रधानाचार्य को भी काउंसिलर की भूमिका निभानी पड़ती है । 


यह एक ऐसी समस्या है , जिसका हल तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक ढूँढा नहीं जा सका और इसमें दिन पर दिन बढ़ोतरी ही होती जा रही है जिसका सबसे ताज़ा उदाहरण ब्रिटेन में एक ब्लैक की गोली मारकर हत्या के बाद फैले हुए दंगों के बाद प्राइम मिनिस्टिर का यह बयान है कि बच्चों का लूट पाट और हिंसा में शामिल होना ‘‘ बैड पैरेन्टिंग’’ का नतीजा है । 


सोलह साल का एक लड़का लूटपाट में पकड़े जाने पर कैमरे के सामने बयान देता है कि सरकार इसके लिये जिम्मेदार है क्योंकि सरकार सिर्फ अमीरों के लिये है, गरीबों की उसे कोई चिन्ता नहीं और उसने डिपार्टमेंटल स्टोर से अपने बेटे के लिये कपड़े, नैपीज़ और घर की ज़रूरत का सामान लूटा है । 


कुछ वर्ष पहले मैं लंदन में अपनी मित्र डॉ. अरुणा कपूर अजितसरिया से मिली जो कोलकाता वि. विद्यालय से हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी. थी और जो लंदन से कुछ और डिग्रियाँ हासिल करने के बाद बच्चों के स्कूल में प्रधानाचार्या के पर पर काम कर रही थी । उसने बताया कि स्कूल में उसे प्रिंसिपल की भूमिका से ज़्यादा एक काउंसिलर की भूमिका निभानी पड़ती है क्योंकि नब्बे प्रतिशत बच्चे हैफ पेरेंट्स ( आधे परिवार से ) हैं यानी कोई अपने पिता के साथ है तो माँ सौतेली है या पिता की एकाधिक गर्ल फ्रेंड्स हैं और कोई अपनी माँ के साथ है तो सौतेले पिता है या माँ का कोई फ्रेंड है जिसे बच्चा सम्मान नहीं दे पाता । ये बच्चे पढ़ाई में एकाग्र नहीं हो पाते, इनमें ‘‘ लॉस्ट लुक’’ (खोया खोया सा भाव ) या सेंस ऑफ नॉन बिलॉगिंग( किसी से जुड़ाव महसूस न कर पाना ) होता है, आत्मविश्वास की कमी और असहिष्णुता होती है । उन्हें समझाने या रोकने - टोकने पर वे तोड़ फोड़ करने लगते हैं या चीखने चिल्लाने लगते हैं । 


भारत अभी इस स्थिति पर तो नहीं पहुँचा कि यहाँ सोलह से अठारह साल के लड़के गर्व से अपने ‘‘बाप’’ बन जाने की घोषणा करें । पर भारत के महानगरों के मनोचिकित्सक ( हीरानंदानी हॉस्पिटल के प्रख्यात डॉ. हरीश शेट्टी ) भी कहते हैं कि डिप्रेशन के शिकार टीन एजर्स की तादाद में पिछले कुछ वर्षों में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोतरी हुई है । इसका कारण माँ-बाप का बच्चों को पर्याप्त समय न दे पाने के साथ साथ इंटरनेट, ब्लैकबेरी और तमाम आधुनिक तकनीकी उपकरण हैं जिनके कारण बच्चे समय से पहले ही वयस्कों की दुनिया से परिचित हो जाते हैं और असमय ही अपना बचपन खो बैठते हैं । 


अधिकांश माँएँ भी नौकरीपेशा हैं और घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारी के कारण वे बच्चों को र्प्याप्त समय नहीं दे पातीं । जो गृहिणियाँ हैं, वे भी अगर उच्चमध्यवर्ग की हैं तो मॉल कल्चर और किटी पार्टी की आदी हैं, अगर मध्यवर्ग की हैं तो उनकी शिकायत है कि टीन एज में जाते ही बच्चे बात मानना बंद कर देते हैं और उनकी अवज्ञा करते हैं । 


यह सब देखकर अक्सर भारत के गाँव - कस्बों के संयुक्त परिवार याद आते हैं , जहाँ चाचा, ताऊ, मामा सबके बच्चे आपस में ही पूरा एक स्कूल बना लेते थे, उन्हें बाहर के बच्चों की ज़रूरत ही नहीं होती थी, एक ही जगह खाना बनता था और बच्चों के लिए साथ साथ मिल बैठकर हर रोज़ का खाना एक उत्सव होता था । भारत में संयुक्त परिवार की अवधारणा रही है, जहाँ बच्चे अपेक्षाकृत स्वस्थ सुसंस्कृत माहौल में बड़े होते थे । 


आज के समय और समाज में वैसे संयुक्त परिवारों की कल्पना ही एक खाम खयाली है क्योंकि आज घर की आर्थिक जिम्मेदारी में औरतें भी सहभागी होती हैं और संयुक्त परिवारों की अवधारणा ही अतीत का एक स्वप्न बनकर रह गई हैं । माता और पिता के रूप में बच्चों को भावनात्मक सहारा देना और उन्हें एक स्वस्थ माहौल में बड़ा होने की सुविधाएँ और अवसर देना हमारे हाथ में है । अपने तनावों का दंश बच्चों को देकर असमय उनसे उनका बचपन छीन लेना और उन्हें एक दहशत के माहौल में बड़ा होने देना एक अपराध से कम नहीं ! 


पश्चिम के देशो में भी स्त्रियों की सोच में एक बदलाव देखा जा रहा है । अधिकांश स्त्रियाँ घर में एक गृहिणी बनकर रहना बेहतर समझती हैं ताकि वे बच्चों को अपनी देख रेख में बड़ा कर सकें । बाहर नौकरी करने के अगर फायदे हैं तो तनाव और कुंठाएँ भी कम नहीं जो कार्यालयों में असहयोगी माहौल और प्रतिस्पर्धा रखने वाले सहयोगियों के कारण पैदा होती हैं । 


एक कहावत सदियों से भारत में कही सुनी जाती रही है कि बच्चे हमारे प्रेम की निशानी है । आज पूरे विश्व में बच्चों को जो माहौल दिया जा रहा है - यही कहना पड़ेगा कि बच्चे माता पिता के प्रेम की नहीं, हवस की निशानी हैं जो हवस की समाप्ति पर उनकी जिम्मेदारी से हाथ धो लेते हैं । बच्चे अपनी मर्ज़ी से नहीं आते इस दुनिया में । उन्हें अगर हम लाते हैं तो उनके मानसिक स्वास्थ्य और ज़िम्मेदार नागरिक बनाने की जिम्मेदारी भी एक माँ बाप की है, किसी और की नहीं । 


हमें सोचना है कि इस खूबसूरत दुनिया में हम क्या बच्चों को यहाँ की तमाम बदसूरती दिखाने के लिये लाये थे ? 


इसका जवाब हम बड़ों को ढूँढना है , बच्चों को नहीं !




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