Tuesday, September 11, 2012

जहाँ शुरू नहीं होती कविता.........

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अनामिकापवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख  ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं  कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था।

उसी क्रम में आज पढ़ें राहुल ब्रजमोहन का लेख  -  "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"

- कविता वाचक्नवी
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जहाँ शुरू नहीं होती कविता.........
- राहुल ब्रजमोहन


‘‘यह बता पाना बेहद मुश्किल है कि कविता में शाब्दिक अभिव्यक्ति कहाँ खत्म होती है और दिक् का विस्तार कब शुरू हो जाता है।"

इसके पहले कि हम रिल्के की इस स्थापना पर सौंदर्यशास्त्रीय मिजाज से विचार करें, हमें कविता परिधि में साहित्य के उस समाजशास्त्रीय-अवलोकन की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही है, जो कथ्य के प्रतिपाद्य सत्य और उसके आद्य-अतीत की लम्बी काल सर्जित रेखा पर संतुलन साधना सिखाता है, यद्यपि यह साहित्य की नहीं, विशुद्ध रूप से समाज की जरूरत का मामला है.... साहित्य में इसीलिए भाषा के साथ होने वाला प्रश्नोत्तर और इस संवाद के उत्तर प्रश्न हमेशा ही प्रासंगिक होते हैं। इधर हिन्दी कविता में काफी कुछ उथल-पुथल हुई है। उसने अपना एक नया मुहावरा गढ़ा (या आहरित किया) है और अब वह अपनी उत्तुंग शिरोभंगिमा के साथ उस नीली घाटी में प्रवेश कर गई है, जहाँ उसे लगता है कि उसके पीछे सिर्फ जलते हुए वन का वसंत (दुष्यंत के शब्दों में) रह गया है और आधुनिकता के नवोद्यान में आश्रय पाने के लिए उसे एक ऐसे ‘दैहिक विमर्श’ की अपरिहार्य आवश्यकता है, जो कविता को एक ग्लॉसी मेकओवर का रूतबा सौंपे दें, जिसकी चौंध में हर रूखाई चिकनाई प्रतीत हो और आप चाह कर भी न बता पाएँ कि कथ्य की लकीर पर कब शाब्दिक संवेदना दम तोड़ती है और कहाँ ‘देह का अनंग राग’ शुरू हो जाता है।


‘कथादेश‘ में समकालीन कविता पर पिछले दिनों प्रकाशित शालिनी माथुर के आलेख और तदनंतर आई प्रतिक्रियाओं की उन्मादी आमद से लगा, जैसे कविता-लोक में कोई बड़ी अनहोनी घट गई हो जो नहीं होनी चाहिए थी। चूंकि प्रतिवाद का स्वर कमोबेश शालिनी के विरोध में एक-सी आक्रामकता में आपादमस्तक निमज्जित था। लिहाजा यही प्रतीत हुआ कि कहीं कुछ ऐसा अघटित-सा घटा है, जिसे घटने से रोका जा रहा था। सब चाहते थे कि वह न घटे और अब जबकि यह घट गया, तो हर तरफ अफरातफरी मच गई है... मैं कविता के विषय में अधिक जानने का दावा तो नहीं कर सकता क्योंकि वह मेरे रचनाकर्म के दायरे से बाहर है। उस पर किसी प्राधिकारी सत्ता की तरह टिप्पणी करना मेरे लिए उचित नहीं होगा। फिर भी कविता के एक साधारण पाठक की हैसियत से मुझे लगता है कि उस टिप्पणी में जो मुद्दे उठाए गये हैं, वे कतई अनावश्यक या अनामंत्रित तो नहीं ही कहे जा सकते। भले ही उनकी विवेचना सर्वग्राह्य न हों किन्तु उनके द्वारा प्रस्तुत प्रश्नों की सार्थकता को संदिग्ध नहीं कहा जा सकता । उन पर विचार विनियम बेहद जरूरी है। क्योंकि अभी तक कविता के इरोटिक होने को लेकर उसे प्रश्नांकित नहीं किया जाता रहा है लेकिन पहली बार पोर्न के उसकी पीठ पर आरूढ़ होने की बात उठायी गयी है । 


अनामिका की कविता को जिस हद तक संशय का लाभ दिया जा सकता है, वह उनके तर्कों के लिए मुमकिन नहीं है। अपने पक्ष में उनकी दलीलें इतनी पुष्ट और असंदिग्ध नहीं लगतीं। भाषा के जिन दो लक्ष्यों का जिक्र उन्होंने किया है, उन्हें वह कविताएँ कतई पूरा नहीं करतीं जिन पर शालिनी को आपत्ति है। रुग्णता को रूपक बनाकर लिखी जा रही अधिकांश कविताएँ उस संप्रभु व्यक्ति को सम्बोधित हैं, जिसे पण्य संस्कृति ने गढ़ा है, जो अपने आत्म से नहीं स्वेच्छाचारिता की देह से मुखातिब रहते हुए इरादतन वह खिड़की खुली रखना है जिससे रोशनी नहीं बल्कि ‘भोगाविष्ट’ दृष्टि ही भीतर आ सकती है। व्यक्ति की संप्रभुता अपनी सार्वजनिक नुमाइश में ही सार्थकता तलाश लेती है। ‘उद्बोधन’ और ‘प्रश्नकीलन’-भाषा के यह दोनों ही प्रयोग इस व्यक्ति को लक्षित कर लिखी गई कविताओं के संदर्भ में अर्थहीन हैं, जो केवल शारीरिक पुलक को संवाद की अंतिम अभिलाषा मानता है। मर्यादा को अभिशप्त शब्द बनाकर आप रचना में कोई सौष्ठव नहीं पैदा कर सकते क्योंकि हर आकार एक मर्यादित निग्रह का ही परिणाम होता है। 


अपने आलेख में शालिनी इसी निग्रह की सांस्कृतिकता के नहीं बल्कि मनुष्यता के सन्दर्भ में एक शालीन माँग कर रही हैं, जिसे दरकिनार करने का मतलब साहित्य में ‘सौष्ठव’ को दरबदर करना होगा। धर्मशास्त्र में ईश्वर की उपस्थिति के पक्ष में टॉमस इक्वीनॉक्स और विलियम पेली जैसे विद्वानों ने जिन युक्तियों का सहारा लिया है, वह साहित्य पर भी लागू होती है, क्योंकि साहित्य का भी अपना एक धर्म है। वह स्वातंत्र्य की प्रविधि में मर्यादा की परिधि का अतिक्रमण नहीं कर सकता। प्रयोजन और वर्जना-दोनों से आप अकारण पीछा नहीं छुड़ा सकते बल्कि बाजदफा तो वर्जनाहीनता ही रचना का प्रयोजन बन जाती है। जैसा कि शालिनी पूछती हैं -  क्या मनोरंजन ही साहित्य की एकमात्र सार्थक निष्पत्ति हो सकती है ? मनोरंजन भी ऐसा, जिसका एकमात्र रंजक तत्व कामोद्दीपन हो। अश्लीलता पर जब भी बहस छिड़ती है, तो उसके पक्ष में बहुधा यह समवेत स्वर उभर कर आता है कि ‘अमुक पूर्ववर्ती रचनाकार पर भी ऐसे ही आरोप लगे थे’ किन्तु कालांतर में वह बड़े लेखक सिद्ध हुए। यह तर्क उतना ही जराजीर्ण है जैसे कि कहा जाए हमारे अब्बा हुजूर भी `की होल' से झांकने का हुनर रखते थे। माशा अल्लाह कभी पकड़े भी गए, तो उनका जवाब था - हम अपनी आत्मा के भीतर झाँक रहे थे, `की होल' तो इत्तफाकन सामने आ गया। 


मंटो और तमाम ख्यातनाम रचनाकारों की विवादास्पद कहानियों के संदर्भ में मेबलडॉज की उक्ति का सहारा अक्सर लिया जाता रहा कि ‘रूह तक पहुँचने का सबसे सुरक्षित और सुनिश्चित जरिया सिर्फ गोश्त से भरा जिस्म है।’ कई नामचीन लेखकों ने इस सफाई से आजमाया फिर भी तलछट में बची रह गई थोड़ी सी अ-‘क्षर’ दृष्टि बता सकती है कि अधिकांश आरोप निराधार नहीं थे। मंटो ने बेशक स्त्री के वक्षों पर ‘फाहा‘ जैसी दिलचस्प और मासूमियत से भरी कहानी लिखी, जो पवन करण और अनामिका की रचनाओं से कहीं बेहतर थीं, मगर यह भी सच है कि उनकी कुछ अन्य कहानियों (ठंडा गोश्त, नंगी आवाजें, बू, पढ़िए कलमा) में अश्लील ब्यौरे कथानक की निर्विवाद श्रेष्ठता के बावजूद पाठ में खलते हैं। उर्दू गद्य में उन दिनों यह चलन में था, क्योंकि कृष्ण चंदर और राजेन्द्रसिंह बेदी की रचनाओं पर भी इसका असर नजर आता है। अगर यही कसौटी रखें, तो हिन्दी कविता हाल में जवान हुई है। मगर मेबल डॉज उसका ‘आपात निर्गम’ साबित नहीं होंगे, क्योंकि शालिनी माथुर ने सूसन ग्रिफिन को उद्धृत करते हुए उस लिहाफ की परतें हटा दी हैं, जिसके नीचे मादकता के नाम पर यौनिकता की धुंधकारी देह विकसित हो रही थी। 


हिन्दी कविता की असली चिंता मन-शरीर की विभक्त व्यंजना के बीच पल रहे उस अनैतिक रचना शास्त्र की पड़ताल पर केन्द्रित होनी चाहिए, जिसकी ओर सूसन ग्रिफिन का आकलन इंगित करता है। देह को आत्मीय संवेग से पृथक कर उसे एक ‘प्लेथिंग‘ में बदलना किसी रचना का मंतव्य नहीं हो सकता क्योंकि कविता सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है-शारीरिक अवयवों और चिलमन से लगे बैठे इरादों का भी नहीं। 


दुर्भाग्यवश हमारे यहाँ राजनीतिक धरा पर भी विमर्श इतनी जल्दी वैयक्तिक बहस में नहीं बदलता, जितना कि साहित्य के जगत में। शालिनी के आलेख को निजी धरातल पर एक फ्रंटल-अटैक की तरह देखे जाने की कोई जरूरत नहीं थी। खासकर तब जब हम साहित्य में भाषा की फुल फ्रंटल मुद्रा के साथ अवसन्न खड़े हैं। संभवतः शालिनी से यह भूल अवश्य हुई है कि अपने आलेख के अन्तर्गत उन्होंने जिन दो कविताओं का हवाला दिया, वह एक ही परिप्रेक्ष्य के धरातल पर भी देखी जा सकती हैं। अतः उन्हें एक रूग्ण काव्य के संदर्भ में परस्पर आरूढ़ (जक्स्टापोज) भी किया जा सकता है। बेशक अनामिका की कविता में इरोटिक एलीमेंट अवश्य मौजूद है। और रचना का मूल अभीष्ट समूची कविता में दृश्य की परिधि से ओझल नहीं होता। समस्त बलाघात देह पर ही है मगर स्मृतियों की सुरक्षित़ ओट लेकर। 


दूसरी ओर पवन करण की कविता को लें, जो देह के एक मांसल सत्य को भाषा के पॉपुलिस्ट मुहावरे में चुहल की तरह प्रस्तुत करती है। भले ही कविता के अंत में त्रासदी का एक दृश्यचित्र यत्नपूर्वक जोड़ा किन्तु वह वैसा ही है, जैसे सिनेमाघर में घंटे भर अश्लील फिल्म चलने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय का कोई सरकारी संदेश दिखाकर उसे फिल्म्स डिवीजन की भेंट बता दिया जाए। पवन की पूरी कविता का समूचा प्रणय संवाद ही यौन अभिमुख है। कवि अपने पात्रों के जरिए लगातार एक ललचाऊ सेक्सुअल बिल्ड अप की सृष्टि करता है। नायिका अपने पुरूष को बदस्तूर दैहिक प्रलोभन दे रही है।


घर पहुँच कर जाँच लेना इन्हें (वक्षों को), शिक्षा संस्थान में बैठी युवती अपनी संगी को इस शैक्षणेतर गतिविधि का खुला आमंत्रण दे रही है। पुरूष उसकी वात्सल्य वाहिनियों को ‘शहद के छत्ते‘ और ‘दशहरी आम‘ जैसी विशुद्ध यौनार्थक उपमाओं से नवाज रहा है और वह (नायिका) आल्हादित है। इस चीप ‘वर्बल फोरप्ले‘ का वह मजा ले रही है, जिसकी परिणति अंततः दैहिक संसर्ग में होना है। नायिका भी यही चाहती है - वह अपने साथी से प्रेम माँग ही नहीं रही। लिहाजा एक वक्ष के न रहने पर वह उसकी अपेक्षा कैसे रख सकती है, जो (कविता के स्त्री-पुरूष के बीच) कभी उपस्थित ही नहीं था। यदि किसी त्रासदीवश पुरुष को अपने अंग विशेष से वंचित होना पड़ता, तब नायिका उसके प्रति क्या वैसी ही उदासीन प्रतिक्रिया दर्शाती, जैसी पुरुष दर्शा रहा है। उन दोनों के दरम्यान ‘वैसा कुछ‘ था ही नहीं, जिसके बगैर उनके बीच ‘कितना कुछ‘ हट जाए। भाव की कोई अगोचर सृष्टि थी ही नहीं, जो गोचर मांसल उपस्थिति के अंग-भंग के बाद भी बची रह पाती।


रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने नृत्य को मनुष्य की एक क्षैतिज कामना की उध्र्वाभिमुख अभिव्यक्ति कहा था। साहित्य में यौन एक निम्नाश्रयी कामना (बेस डिजायर) का दृश्य के दायरे में स्फुरण है, जिसकी उपस्थिति अपरिहार्य तो कतई नहीं कही जा सकती। वह बेशक एक जॉनर के रूप में बनी रहे मगर उसे केन्द्रीय सत्ता घोषित करना उचित नहीं है। इरोटिका को साहित्य के फिटनेस रेजीमन की तरह पेश करने पर हम ‘फिल्दी‘ और ‘हैल्दी‘ का फर्क भी भूल जाएँगे। कदाचित् शालिनी माथुर की असली चिंता यही है। 


22, 21/ सेक्टर-ए,
साईंनाथ कॉलोनी, इंदौर


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