Monday, April 29, 2013

"जब तक स्त्री मुक्त होना न चाहे तब तक वह मुक्त नहीं होगी"

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22 अप्रैल, 1930 को सुनाम (पंजाब) में जन्मीं रमणिका गुप्ता हिन्दी की आधुनिक महिला साहित्यकारों में प्रमुख नाम हैं। 

बिहार/झारखंड की पूर्व विधायक एवं विधान परिषद् की पूर्व सदस्या रह चुकीं रमणिका दी' कई गैर-सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्बद्ध तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में सहभागिता कर चुकी हैं तथा आदिवासी और दलित महिलाओं-बच्चों के लिए कार्यरत हैं। कई देशों की यात्राएँ करने वाली रमणिका जी विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। इनकी रचनाओं में प्रमुख हैं, कविता संग्रह - पातियाँ प्रेम की, भीड़ सतर में चलने लगी है, तुम कौन, तिल-तिल नूतन, मैं आजाद हुई हूँ, अब मूरख नहीं बनेंगे हम, भला मैं कैसे मरती, आदिम से आदमी तक, विज्ञापन बनता कवि, कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का, प्रकृति युद्धरत है, पूर्वांचल : एक कविता-यात्रा, आम आदमी के लिए, खूँटे, अब और तब तथा गीत-अगीत। उपन्यास हैं - सीता, मौसी। कहानी-संग्रह है- बहू-जुठाई। आत्मकथा है - हादसे, साक्षात्कार संग्रह है - साक्षात्कार, स्त्री विमर्श विषयक कृतियाँ हैं, कलम और कुदाल के बहाने, दलित हस्तक्षेप, निज घरे परदेसी, साम्प्रदायिकता के बदलते चेहरे, तथा दलित चेतना विषयक कृतियाँ हैं - साहित्यिक और सामाजिक सरोकार, दक्षिण-वाम के कटघरे और दलित-साहित्य, असम नरसंहार एक रपट, राष्ट्रीय एकता, विघटन के बीज आदि। इनके अतिरिक्त अनेक संपादित कृतियाँ भी। 


संप्रति वर्ष 1985 से उनके सम्पादन में एक त्रैमासिक पत्रिका 'युद्धरत आम आदमी' शीर्षक से निकलती हैं। 

रमणिका जी के सम्पादन में इस समय एक अन्य बड़ी महत्वपूर्ण योजना पर कार्य चल रहा है; वह है सभी भारतीय भाषाओं की महिला कथाकारों की स्त्रीमुक्ति विषयक कहानियों के बृहद संकलन " हाशिये उलांघती स्त्री" के प्रकाशन का। यह संकलन इस वर्ष के अंत तक तैयार हो कर आ जाएगा। यह संकलन लगभग 22- 25 खंडों (वॉल्यूम्ज़) का होगा। इस से पूर्व इसी नाम से 2 वर्ष पूर्व भारतीय भाषाओं की कवयित्रियों की स्त्री विषयक कविताओं का बृहद संकलन इन्हीं के सम्पादन में आ ही चुका है। मेरे लिए यह हर्ष की बात है कि मैं भी इस प्रकाशन-योजना से जुड़ी हुई हूँ । 

रमणिका जी रमणिका फाऊंडेशन, दिल्ली की संस्थापक भी हैं और दिल्ली में रहते हुए अत्यंत सतर्कता से लेखन, सम्पादन, सामाजिक कार्यकर्ता व फाऊंडेशन से जुड़े कार्यों को सम्हालती देखती हैं, जो किसी के लिए भी प्रेरणादायक हैं। 

गत दिनों दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल ने उन का साक्षात्कार लिया। उसके प्रमुख अंश यहाँ देखें - 



Monday, April 15, 2013

जब मैं अपने साथ छुरा ले गई : कविता वाचक्नवी

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आज अपने जीवन का एक खतरनाक-सा प्रतीत होता प्रसंग लिखने जा रही हूँ । लोग अक्सर मुझ से मेरे साहस और जुझारूपन के बारे में पूछते हैं और मुझे लिखते भी हैं। उसका उत्स क्या है, यह भी जानना चाहते हैं। कुछ साहस जन्मजात ही शायद प्रकृति ने मुझ में भर कर भेजा है और उत्स तो पिताजी व आर्यसमाज के संस्कार ही हैं। 

यों इस तरह की कई घटनाएँ हैं किन्तु आज पहली घटना व शायद सबसे कम आयु में घटी सबसे बड़ी घटना का उल्लेख करती हूँ।


यह बहुत रोचक घटना मेरे विद्यार्थी जीवन की है। हरिद्वार में 1980 में वार्षिक परीक्षाएँ सम्पन्न हो जाने के बाद सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय ने सभी केन्द्रों पर हुई खूब नकल के चलते वे परीक्षाएँ निरस्त कर दी थीं और छह-आठ महीने बाद दुबारा परीक्षाएँ ली गईं। इस से दूसरे नगर (यमुनानगर) से हरिद्वार जा कर परीक्षा देने वाले मुझ जैसे विद्यार्थियों को बहुत असुविधा हुई और जो वर्ष खराब हुआ उसकी भरपाई भी नहीं हो सकती थी। इसे लेकर मेरे मन में बहुत खीज व आक्रोश था। पिता जी का जो समय व धन का अपव्यय इस कारण हुआ था, उसे लेकर दु:ख भी था। मेरी परीक्षाओं के दिनों में पिताजी मेरे वस्त्र तक अपने हाथों से धोया करते थे और स्वयं खाना बनाकर देते थे ताकि मैं पढ़ने में लगी रह सकूँ। अतः  दी  जा चुकी वार्षिक परीक्षाएँ निरस्त हो कर दुबारा होने से पिताजी के लिए कष्ट का ध्यान कर क्रोध भी था। अस्तु! 


अगले वर्ष 1981 में परीक्षाओं का केंद्र मैंने सहारनपुर बदल लिया ताकि नकल करने वालों से बचा जा सके। किन्तु सहारनपुर में भी खूब नकल चल रही थी। मैंने परीक्षा हॉल में खड़े होकर खूब जोरदार ढंग से परीक्षक को अपना विरोध जताया किन्तु परीक्षक ने मुझे ही डपट कर बैठा दिया कि मैं अपनी परीक्षा देने में ध्यान दूँ और सारी दुनिया को सुधारने का ठेका न लूँ। अन्ततः मुझे बाध्य होकर बैठ जाना पड़ा क्योंकि 3 घंटे में मुझे अपनी परीक्षा भी लिखनी ही थी। पर मैंने उसे चेतावनी दी कि मैं उसकी व नकल करने वाले दूसरे विद्यार्थियों की लिखित शिकायत विश्वविद्यालय को करूँगी। 


इसका परिणाम यह हुआ कि उस शाम सहारनपुर के बेहट रोड पर कुछ गुण्डों ने मुझे घेर कर धमकाया कि अगर ज़िन्दा रहना चाहती हो तो अपने पर ध्यान दो वरना ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे और एक लड़का (जिसका नाम 'राजकुमार' था) बोला कि अगर एक शब्द भी बोली तो सहारनपुर के किसी गटर या आम के बगीचे में पड़ी हुई तुम्हारी लाश मिलेगी। 


मैं सहारनपुर के जिस परिवार में ठहरी थी, वे मेरे कॉलेज के प्राचार्य शुभनाथ मिश्र जी का ही आवास था और उनकी धर्मपत्नी दरभंगा नरेश की साली लगती थीं। मैं उन्हें माताजी कहा करती थी और वे दंपत्ति मुझे अत्यंत स्नेह करते थे। उन माता जी ने कुछ दिन पहले ही मेरे जन्मदिवस के उपहार के रूप में मुझे राजपरिवार का एक पीतल का छुरा भेंट में दिया था जो एक बहुत पुराना ऐतिहासिक छुरा था और बंद होने पर धातु का आयताकार 'स्केल' जैसा लगता था पर दोनों ओर से उसका फोल्डिंग कवर खुल जाता था व हत्थे का रूप ले लेता था। अभी भी वह मेरे पास सुरक्षित है। तो यों, वह छुरा मेरे पास था ही क्योंकि उन्हीं दिनों मिला ही था। 


अगले दिन मैं परीक्षा देने के लिए जाते समय वह छुरा अपने साथ ले गई, ताकि यदि कोई आक्रमण करे तो अपनी सुरक्षा के काम आएगा। उन दिनों और उस आयु में लड़कियाँ पर्स या हैण्ड-बैग आदि तो रखती नहीं थीं,सब हाथ में या रुमाल आदि में तहा कर ले जाती थीं। परीक्षा हॉल में अपनी मेज पर अपने सामान (रुमाल व अतिरिक्त पेन आदि ) के साथ उसे भी मैंने रख दिया और परीक्षा देने लगी। कुछ देर में हॉल में घूमते-घूमते परीक्षक मेरी मेज पर आए और उसे देख कर बोले कि स्केल क्यों लेकर आई हो। मैंने उत्तर दिया कि यह स्केल नहीं है। तब उन्होंने उसे हाथ में उठाया और छुरा देख कर इतना घबरा गए कि कमरे से बाहर भाग गए और पाँच मिनट में कमरे में भीड़ लग गई। पुलिस को बुला लिया गया और छुरा पुलिस ने ले लिया। मैंने पुलिस का विरोध किया और कहा कि यह मेरे उपहार की वस्तु है, इसे कोई नहीं ले सकता और जितना समय मेरा परीक्षा लिखने का बर्बाद किया है उतने मिनट मैं बाद में अलग से लूँगी। उस कमरे में दरवाजे पर दो पुलिस वाले तैनात कर दिए गए और कॉलेज के परिसर व गेट पर भी बीस पच्चीस और पुलिस वालों को बैठा दिया गया। वे पुलिस वाले परीक्षा के बाद परीक्षाकेंद्र से आचार्य जी के घर तक प्रतिदिन मेरे पीछे आते। 


जिस परीक्षक ने पहले दिन मुझे डपटा था, पता चला कि वह इतना डर गया कि बीच परीक्षाओं में उसी दिन से लंबी छुट्टी पर चला गया। पक्का स्मरण नहीं किन्तु संभवतः 'राजकुमार' ने उस वर्ष की शेष परीक्षाएँ ही नहीं दीं। अंतिम पर्चा देकर मैं प्रिंसीपल के कमरे में गई। वह पुलिस वालों से खचाखच भरा था। मैंने उन से मेरा छुरा वापिस देने को कहा। लंबी बहस के बाद छुरा मुझे वापिस मिला। पुलिस ने घंटा-भर मुझ से तरह तरह के सवाल किए। काफी प्रशंसात्मक व सहयोगी रवैये से बातें करते रहे व मेरा अता पता आदि जानने की कोशिश भी की किन्तु अपना पता व पिताजी का नाम आदि मैंने नहीं बताया। जब मैं चलने लगी तो पुलिस वालों की ओर से जो मुख्य व्यक्ति था, उसने दो पुलिस वालों से कहा कि इसके साथ वहाँ तक साथ जाना, जहाँ यह रह रही है। मुझसे अंत में बोला कि "तुम लगभग 18-20 साल की होगी, इतनी धाकड़ हो और इतनी हिम्मत कहाँ से पाई, डर नहीं लगता तुम्हें ?" मुझे याद है उसके 'धाकड़'   शब्द को सुन मैंने हँसते हुए कहा था - "पिताजी कहते हैं कि साँच को आँच नहीं लगती, डर तो झूठ को लगता है और सच्चाई की जीत होती है, ऊपर से आर्यसमाज की बनाई हुई हूँ जिस से हर गलत चीज डर कर भागती है, इसलिए डरूँगी क्यों, मरती भी तो दो चार को मार कर ही मरती।" 


वे पुलिस वाले मेरे पीछे-पीछे आचार्य जी के आवास तक निगरानी करते आए और वहाँ से सहारनपुर के बस अड्डे पर मेरे यमुनानगर की बस मैं बैठने तक डटे रहे। इस घटना के बाद मेरा नाम 'छुरे वाली कविता' और "योद्धा" के रूप में पुकारा जाने लगा था। मैंने उन परीक्षाओं में लगभग सभी विषयों में 75% से अधिक अंक पाए थे। उस समय के कुछ परिचित अब तक मुझे "योद्धा जी" कह कर पुकारते हैं। 


आज सोचती हूँ तो लगता है कि वह साहस शायद आज मैं न कर सकूँ।

अभी कुछ वर्ष पूर्व जब कक्षा नवीं या दसवीं  में पढ़ने वाली मेरी बेटी अपने स्कूल में चार लड़कों को पीट कर आई थी तो इस 'छुरे वाली योद्धा कविता' के भीतर बसी माँ को भी डर लगा था कि कहीं कोई उस से बदले के लिए आगे न बढ़ जाए। 


बाद में साहित्यिक जगत के कई लोगों से भी इसी साहस से कुछ पंगे लेने का क्रम बना रहा जो आज तक  जारी है और ब्लॉग जगत और फेसबुक की दुनिया तक भी चलता आ रहा है। 


बस अन्तर केवल यह है कि बड़ी उम्र की इस दुनिया के लोग अधिक शातिर व घाघ हैं। इनके पास बदला लेने के कई दूसरे हथियार हैं, जिन से कई-कई बार लगातार वार होते रहे हैं, होते रहते हैं, पर साहस फिर फिर उठा देता है और लाख बचने के बावजूद फिर कहीं न कहीं पंगा हो ही जाता है, जाने कितनी बड़ी-बड़ी हानियाँ उठाने के बाद भी "छुटती नहीं है गालिब मुँह को लगी हुई" की तर्ज पर "छुटती नहीं है हमको आदत लगी हुई" है। 


पर इतना तय है कि साहस बाहर से आरोपित नहीं किया जा सकता। यदि हम सही मार्ग पर हैं और सच के समर्थन में खड़े हैं तो साहस स्वतः आ जाता है। झूठ, सच में बहुत कमजोर होता है, बस आवश्यकता होती  है उस झूठ को ढहा देने का सामर्थ्य रखने वाले सच के शौर्य की  व अपना लाभ-हानि विचारे बिना गलत को गलत व सही को सही कहने के साहस व ईमानदारी की।


(यह संस्मरण कई दिन से लिखा हुआ रखा था और मैं गूगल इमेजिस् पर अपने वाले उस छुरे से मिलती जुलती कोई छवि खोज रही थी। ज्यों का त्यों तो वैसी नहीं मिली किन्तु जो चित्र प्रयोग किया है यह उस से बहुत मिलता जुलता है। इसकी जानकारी यहाँ क्लिक कर पढ़ी जा सकती है )



Tuesday, April 9, 2013

स्त्री, उसकी उद्यमशीलता और स्त्रीविमर्श

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स्त्री और उसकी उद्यमशीलता


FICCI के 29वें वार्षिक समारोह में Unleash The Entrepreneur Within विषयक आयोजन में 8 अप्रैल को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का स्त्रीमुद्दों पर दिया यह व्याख्यान कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

सकारात्मकता से परिपूर्ण इस व्याख्यान में इतिहास के कई स्त्रीपात्रों को रेखांकित किया, कई मार्मिक स्थलों पर स्त्री की वर्तमान स्थिति पर विचार उठाया गया व स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में प्रभावी पहल की आवश्यकता को सहजता से रेखांकित किया।
यह पूरा व्याख्यान व प्रश्नोत्तर ध्यान से सुनने योग्य हैं। 






Tuesday, April 2, 2013

स्त्रीपक्षीय कविता के तेवर : 'कविता का समकाल'

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स्त्रीपक्षीय कविता के तेवर 
'कविता का समकाल'
- ऋषभ देव शर्मा


कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500 
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745
कविता के सामाजिक सरोकार का दायरा बड़ा व्यापक है। वह मानवजाति के प्रत्येक प्राणी की चिंता करती है। ऐसे में वह किसी समूह को हाशिए पर छोड़कर नहीं चल सकती। बल्कि हाशिए पर छूटे हुओं को फोकस में लाए बिना वह अपने सरोकार की व्यापकता को सिद्ध नहीं कर सकती। इसीलिए आज की कविता स्त्री और दलित से लेकर जल और पृथ्वी तक की चिंता करती है। इन सबकी उपेक्षा जो की जाती रही, उसकी कुछ तो भरपाई इस तरह हो सकती है। स्त्री को वस्तु बनाकर मनुष्य होने के अधिकार तक से वंचित कर दिया गया, यह मानव इतिहास की सच्चाई है। स्त्रीपक्षीय कविता इसीलिए स्त्री के मनुष्य होने को रेखांकित करती है। यह कविता न तो अनिवार्यतः केवल स्त्री रचनाकारों द्वारा रची गई है और न पुरुषविरोधी ही है। यह तो स्त्री के मानव अधिकारों के लिए आवाज उठानेवाली कविता है। निस्संदेह इस आवाज में स्त्री रचनाकारों का स्वर अग्रणी और प्रखर होना ही चाहिए। 


उल्लेखनीय है कि किसी रचना में निहित बेहतर मानवीय सरोकारों को लेकर हस्तक्षेप करने की काबिलीयत उसके स्त्रीपक्षीय होने की मूलभूत ज़रूरत है। भारतीय स्त्री के संबंध में गढ़े गए मिथों के संदर्भ में स्त्रीपक्षीय चिंतन का मानना है कि ‘नारी की भावशुद्धि‘ की लंबी गाथाएँ पुरुषनिर्मित सीमित मनोकामनाओं का परिणाम हैं। इसी का परिणाम है कि साहित्य में गंभीर स्त्री अंकन जितना कम मिलता है, लाजवंती देवियों की भरमार उतनी ही अधिक है। ऐसी स्थिति का खुलासा करती हुई स्त्रीपक्षीय कविता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि घरेलू औरत सिर्फ रोटी नहीं बेलती, यदि उसे समाज चलाने और राष्ट्रनिर्माण का अवसर दिया जाए तो वह अपनी योग्यता प्रमाणित कर देगी और कर भी रही है। (प्रमीला के. पी., औरत की अभिव्यक्ति एवं आदमी का अधिकार, 2004) 


स्त्रीमुक्ति को प्रतिसंस्कृति की पहल बताते हुए लेखिका ने यह प्रतिपादित किया है कि हाशिए में अवस्थित स्त्रियों, बच्चों, मजदूरों, दलितों और प्रवंचितों की विभिन्न प्रकार के अधीशत्व से मुक्ति स्त्रीमुक्ति की चरमपरिणति होगी और इसके लिए स्त्रीपक्षीय कविता का संदेश है - 

‘‘मनुष्यता की रक्षा के लिए 
कहना नहीं, सहना तुरंत बंद कर देना होगा।"
                                               (कात्यायनी

स्त्रीकविता के तेवर का यह बदलाव काव्यभाषा के स्तर पर भी दिखाई देता है। इतिहास और परंपरा के हाथों निर्मित सभी भाषाओं में अधीशत्व के लक्षण पाए जाते है। इसीलिए स्त्री भाषा की माँग लिंग-समस्या की अपेक्षा अधिकारों के विनिमय के प्रश्न पर केंद्रित है। स्त्रीकविता इसीलिए प्रभुत्व की भाषा के स्थान पर कर्म की भाषा का विकास कर रही है जिसमें पुरुषवर्चस्ववादी यौन चुटकियों से आक्रांत अभिव्यक्ति को किनारे करके अभी तक अनकहे शब्दरूपों का चयन करने की प्रवृत्ति सामने आ रही है। इस प्रतिभाषा के निर्माण से असली संस्कृति का इजाफा हो रहा है, इसमें दो राय नहीं। 


इस संदर्भ में कुछ कविताओं की चर्चा भी यहाँ अपेक्षित है। ‘थपक थपक दिल थपक थपक‘ (2003 ई., राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110 002) की कविताओं में गगन गिल का स्वर मनुष्यता की ही चिंताओं से अनुप्रेरित है। उन्होंने विषय और भावों से लेकर भाषा और लय तक के चयन में इस कृति के गीतों में नई ज़मीन तोड़ी है। इन रचनाओं की सहजता, वेगशीलता, लोक संस्कृति के प्रति प्रीति, गाँव और प्रकृति की उन्मुक्तता, जूझते रहने की ज़िद तथा जीवन की ऊष्मा हिंदी की स्त्रीकविता के तेवर को परिपुष्ट करने वाली हैं। इस कथन को प्रमाणित करने के लिए ‘निचुड़ा-निचुड़ा‘ को देखा जा सकता है:- 

‘‘निचुड़ा निचुड़ा दिल था री माँ! 
मैला मैला डर था री माँ! 
माथा टुकता काग था री माँ! 
नीला हो गया साँस था री माँ!
 xxx
सूँघा सोती को नाग ने री माँ! 
ले गया वो मेरा श्वास था री माँ!
xxx 
अटक गया मेरा प्राण था री माँ! 
घुमड़ रुकी हर बात भी री माँ!
xxx 
जलता जलता ज़हर था री माँ! 
ऐंठ मुड़ी मेरी आँत थी री माँ! 
जड़ उखड़ गया मेरा मन था री माँ! 
कुचला गया जो एक साँप था री माँ!‘‘ 

गगन गिल की स्त्री का यह निचुड़ा निचुड़ा दिल अपनी अनिवार्य नियति से वाक़िफ है लेकिन अब अकेले रास्ते पर वापस लौटना संभव नहीं। खोल से बाहर निकलते ही नोंचने वाले पंजों, नाखूनों और डंकों के अनुभव के बाद तो शेर के पेट में चलते चले जाना भी मानो आसान हो जाता हो -

‘‘जाऊँ हूँ जी जाऊँ हूँ 
रस्ते अकेले पे 
लौटे बिना ही कहीं 
दूर चली जाऊँ हूँ 
चुप हूँ जी बहुत चुप 
चाबी फेंक ताले बंद 
सुख में है अपना जी 
भटका करे था बहुत 
बच गई जी बच गई 
किसी घने दुख से 
बच गई 
देखा भले न था 
खोल से गुपचुप बाहर 
उसमें भी नोंच दें थे 
पंजे, नाखून और डंक 
दुनिया बुनिया का क्या जी 
मैल थी, मलाल थी 
आरी चलाती जी पे 
जी का जंजाल थी 
जाऊँ हूँ जी जाऊँ हूँ 
बीहड़ निराले में 
शेर के पेट में ही 
बैठी दूर जाऊँ हूँ।‘‘ 


लोकप्रतीकों और लोककथाओं से अभिव्यक्ति का नया तेवर प्राप्त करती हुई स्त्रीकविता स्त्री के लिए मानव अधिकार का सवाल ज़ोर देकर उठाती है। ‘मैं चल तो दूँ‘ (2005 ई.,सुमन प्रकाशन, सिकंदराबाद -500 025) में संकलित कविता वाचक्नवी की कविताएँ भी इसकी पुरज़ोर गवाही देती हैं। इसमें संदेह नहीं कि कविता वाचक्नवी व्यापक मानवीय सरोकारों वाली कवयित्री हैं। उनके कविता संग्रह में रिश्तों के छीजते जाने की कसक है, प्रणय की सुखद अनुभूतियाँ हैं, एकाकीपन से उपजनेवाले अवसाद का दंश है, सामाजिक विसंगतियों का खुलासा है, उपभोक्तावाद और उत्तर आधुनिकता पर व्यंग्य है, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मुद्दे हैं, युद्ध से उपजा असुरक्षाभाव और आक्रोश है और साथ ही हैं प्रकृति, परिवेश और घर के विविधवर्णी चित्र। लेकिन जो एक स्वर इन सबमें व्यापता है, वह है - स्त्रीजीवन की मर्मांतक वेदना का स्वर। ‘भूकंप‘ कविता का एक अंश यहाँ द्रष्टव्य है -

‘‘तुम्हारे घरों की नींव 
मेरी बाँहों पर थी 
अपने घर के मान में 
सरो सामान में 
भूल गए तुम। 
मैं थोड़ा हिली 
तो लो भरभराकर गिर गए 
तुम्हारे घर। 
फटा तो हृदय 
मेरा ही।‘‘ 

कविता वाचक्नवी ने स्त्री की यातना को कई कोणों से चित्रित किया है। इस संदर्भ में उनकी एक छोटी कविता ‘उसी दिन से‘ इस प्रकार है - 

‘‘जिस दिन 
धुनिये ने 
सेमल की रुई तक को 
धुन डाला 
हवा उसी दिन से 
चिपकी जाती है 
मेरे होठों पर।‘‘ 

अपनी अभिव्यक्ति की खोज करती हुई स्त्रीकविता प्रणय के लिए भी नई भाषा ईजाद करती है - 

‘‘यह सच है, सखे! 
मेरी भाषा की गढ़न 
कविता नहीं लिख सकती, 
वाक् और अर्थ के नियंता 
सुधीजन 
चकला बेलन की चतुर्दिक परिधि में फैले आटे में 
बु़झी तीलियों से 
कविता लिखने के अपराध में 
दंडित भी करेंगे मुझे, 
बवाल भी करेंगे खूब 
पर 
तुम्हारी दाल भात छुई उँगलियाँ 
आटे में उकेरी कविता को बचा लें 
इसी विश्वास से भर 
मैं, तुम्हें 
अपने चौके में बिठा 
अपने हाथों से परोस 
लवण और शक्कर 
सब चखाना चाहती हूँ ....।
 xxx 
बचा सको 
आटे में चींटियाँ लगी कविता को 
तो दाल-भात छुआ अपना हाथ दो, सखे!‘‘
                                                  (व्रतबंध)

लोक और शास्त्र दोनों के प्रतीकों और प्रसंगों का अद्भुत जख़ीरा कविता वाचक्नवी के स्मृतिकोश में विद्यमान है। वे इस सबका उपयोग स्त्री के मानवाधिकार के संघर्ष की कविता रचने के लिए बखूबी करती हैं। ‘मैं चल तो दूँ‘, ‘जल समाधि‘, ‘उत्तरकांड‘, ‘कालपुरुष‘ और ‘गार्गी उवाच‘ में मिथकीय प्रसंगों का नया निर्वचन स्त्रीकविता के खास तेवर को उभारता है: 

‘‘ऋषि! 
तुम भले ही हाँक ले जाओ सब गाय 
और भले ही, तत्वदर्शी होने का 
अहं तुम्हारा 
रहे जीवित 
पर 
आकाश में गूँजते 
तरंगों में लहराते 
विद्युत से कौंधते 
मेरे प्रश्न तो सुनते जाओ। 
शास्त्रार्थ से तुम न दे सकोगे 
इनके उत्तर 
छूट जाएगा सारा दंभ। 
छोड़ दो गउएँ 
मूक प्राणी हैं ..... 
कुछ न कहेंगी 
हकाल ले जाओ भले, 
किंतु मैं 
रोकती हूँ तुम्हारा मार्ग, 
ठहरो .....!! 
प्रश्न तो सुनो, याज्ञवल्क्य!!!‘‘
                               (गार्गी उवाच)

इसी भाँति सविता सिंह के कविता संग्रह ‘नींद थी और रात थी‘ (2005 ई., राधाकृष्ण प्रकाशन, जी-17, जगतपुरी, दिल्ली-110 051) की कविताओं में भी स्त्रीपक्ष व्यापक मानवीय सरोकारों के साथ जुड़कर ही अभिव्यक्त हुआ है। इससे कवित्व को गरिमा मिली है तथा नारेबाजी के सतही मोह से मुक्ति भी। सविता सिंह की कविताएँ ज़ोर देकर स्त्री के सच होने की बात उठाती हैं: 

‘‘चारों तरफ़ नींद है 
प्यास है हर तरफ़ 
जागरण में भी 
उधर भी जिधर स्वप्न जाग रहे हैं 
जिधर समुद्र लहरा रहा है 
दूर तक देख सकते हैं 
समतल पथरीले मैदान हैं 
प्राचीनतम-सा लगता विश्व का एक हिस्सा 
और एक स्त्री है लाँघती हुई प्यास।‘‘
                                          (स्त्री सच है)

स्त्रीपक्षीय कविता देह की राजनीति को भी भलीभाँति समझती है और उसके पैंतरों को नाकामयाब करने पर कटिबद्ध है। ‘जैसे सौंदर्य में स्वायत्त स्त्रियाँ‘ में सविता सिंह आगाह करती हैं कि चमक कई तरह की होती है - आँख की, मन की, आत्मा की और देह की - ठीक उसी तरह जैसे भूख भी कई तरह की होती है - मन की, तन की और ज्ञान की। जो लोग चमक और भूख के सारे प्रकारों को जान लेते हैं वे मीठे जलवाले झरने के पास अपने स्वयं चुने रास्ते से पहुँचते हैं और जीवन की विरल अनंतता को जी पाते हैं और: 

‘‘वे खुश वैसी स्त्रियों की तरह होते हैं 
जो स्वायत्त होती हैं अपने सौंदर्य में।‘‘ 

और तब आता है वह मुकाम ‘जहाँ चट्टानें भाषा जानती हैं‘ : 

‘‘मैं उन सुरम्य घाटियों से गुज़र रही हूँ 
जहाँ चट्टानें भाषा जानती हैं 
ठंड महसूस करती हैं 
सिहरन में इनके भी काँपते हैं होंठ 
हरी काली कहीं 
कहीं बदरंग भूरी 
रंगों के प्रति सजग फिर भी 
जिस्म की ठोस इच्छाओं से बंधी 
प्रकृति की हर आवाज़ को सुनती हैं ये चट्टानें 
एक-एक शब्द बचाती हैं अपने भीतर 
सारे आत्मीय स्पर्श लौटाने के लिए हमें 
मैं उन सुरम्य घाटियों से गुजर रही हूँ 
एक झरना जहाँ बह रहा है 
एक लाल चिड़िया जहाँ मेरा इंतजार कर रही है।‘‘ 

निश्चय ही इस मुकाम पर पहुँचकर कविता की भाषा में स्त्री का मानुषीकरण और प्रकृति का स्त्रीकरण एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं।


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