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26/05 /2008 से प्रारम्भ हुए पाक्षिक `एकालाप ' स्तम्भ के २००९ - नवम्बर ( प्रथम ) अंक में पुरुष-विमर्श शीर्षक से प्रकाशित कविता के क्रम में इस बार प्रस्तुत है उसका दूसरा भाग -
पुरुष विमर्श - २
ऋषभदेव शर्मा
ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
सपनों पर पहरे बिठलाए |
भाई! तेरा भी धन्यवाद
तुम दूध छीन कर इठलाए ||
संदेहों की शरशय्या दी
पतिदेव! आपका धन्यवाद ;
बेटे! तुमको भी धन्यवाद
आरोप-दोष चुन-चुन लाए ||
मैं आज शिखर पर खड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
तुमसब के कद से बड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
कलकल छलछल बहती सरिता
जम गई अहल्या-शिला हुई;
मन की कोमलता कड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
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by कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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औरतों के नाम
कविता वाचक्नवी
कभी पूरी नींद तक भी
न सोने वाली औरतो !
मेरे पास आओ,
दर्पण है मेरे पास
जो दिखाता है
कि अक्सर
फिर भी
औरतों की आँखें
खूबसूरत होती क्यों हैं,
चीखों-चिल्लाहटों भरे
बंद मुँह भी
कैसे मुसका लेते हैं इतना,
और आप!
जरा गौर से देखिए
सुराहीदार गर्दन के
पारदर्शी चमड़े के नीचे
लाल से नीले
और नीले से हरे
उँगलियों के निशान
चुन्नियों में लिपटे
बुर्कों से ढँके
आँचलों में सिमटे
नंगई सँवारते हैं।
टूटे पुलों के छोरों पर
तूफान पार करने की
उम्मीद लगाई औरतो !
जमीन धसक रही है
पहाड़ दरक गए हैं
बह गई हैं - चौकियाँ
शाखें लगातार काँपती गिर रही हैं
जंगल
दल-दल बन गए हैं
पानी लगातार तुम्हारे डूबने की
साजिशों में लगा है,
अंधेरे ने छीन ली है भले
आँखों की देख,
पर मेरे पास
अभी भी बचा है
एक दर्पण
चमकीला।
अपनी पुस्तक " मैं चल तो दूँ " (२००५ ) / सुमन प्रकाशन / से उद्धृत
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