Friday, June 6, 2014

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कल रात एक अनुभव ऐसा हुआ जो इस देश में सामान्य अनुभव नहीं कहा जा सकता|
कल का दिन बाकी दिनों के समान वैसा ही अति व्यस्त, भागदौड़ और थकाने वाला था| यह एक सामान्य इतनी सहज हो चुकी दिनचर्या का हिस्सा है कि दिन में घर से बाहर निकलने पर भारत में सौ तरह के तनाव लौटते में संग जाते हैं ऐसे में यदि कोई महिला है तो जाने कितनी अरुचिकर स्थितियों से उसका साबका पड़ता है। तिस पर ये स्थितियाँ इतनी नियमित जीवनानुभव का भाग हो जाती हैं कि सामान्यत: इनका घटना रेखांकित भी करने जैसी घटना नहीं लगता भारतीय समाज की स्त्रियाँ ऐसी अनेक दूसरी प्रकार की घटनाओं को अपने स्त्री जीवन की सामान्य नियति मान स्वीकार किए रहती हैं और अधिक हुआ तो पुरुष को भी उसकी लम्पटता में सदाशयता से स्वीकार किए चलती हैं .... केवल ऐसा कह कर कि `आदमी की जात ही ऐसी है'... उसका होना होना मानो स्त्री के लिए मायने ही नहीं रखता। ऐसी निर्विकारता या अनासक्ति उसकी अपनी विरागता का तो दर्शन करवाती ही है साथ ही पूरुषसमाज से किसी भी प्रकार के परिवर्तन के प्रति हताश निराश हो चुकी मानसिकता की भी व्याख्या करती है। ऐसा मानना मानो इसे स्वीकार कर लेना है कि यह पुरुष समाज कतई नहीं बदल सकता, संघर्ष परिवर्तन के लिए यत्न करना भी अपनी ऊर्जा को व्यर्थ करना है। जैसे कोई यह कहे कि पशु तो पशु ठहरा, उसे तो ऐसा ही बनाया गया है और वह चाह कर भी अपने ट्यून हुए व्यक्तित्व को रत्ती भर भी बदल नहीं सकता










Tuesday, March 25, 2014

आमन्त्रण :'हाशिये उलाँघती औरत' महासंकलन के आगामी 5 खण्डों का लोकार्पण 28-29 मार्च को

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आमन्त्रण : 'हाशिये उलाँघती औरत' (25 खण्ड) महासंकलन के आगामी 5 खण्डों का लोकार्पण 28-29 मार्च को



वर्ष 2008 में रमणिका गुप्ता जी ने 'युद्धरत आम आदमी' के "हाशिये उलाँघती स्त्री" विशेषांक की योजना का सूत्रपात किया था। जिसके अन्तर्गत सभी भारतीय भाषाओं की महिला रचनाकारों की स्त्रीविमर्श विषयक रचनाओं के संकलन की योजना थी, जिसे 'रमणिका फाऊण्डेशन' द्वारा काव्य-संकलन और कहानी-संकलन के रूप में छपना था। काव्य संकलन तो दो भागों में 26 मार्च 2011 को लोकार्पित हो गया था (यहाँ विस्तार से देखें - http://vaagartha.blogspot.co.uk/2011/12/blog-post_9899.html

...और कहानी संकलन का काम अब क्रम से पूरा हो रहा है।
यह कहानी महासंकलन कुल लगभग 25 से अधिक खण्डों में है व इसमें कुल 40 भारतीय भाषाओं की महिला कथाकारों की कहानियाँ सम्मिलित हैं।  इसके प्रारम्भिक (भारत की हिन्दी कहानी) के तीन खण्डों का प्रकाशन हो चुका है और इनका लोकार्पण 11 सितम्बर को साहित्य अकादमी, दिल्ली में हुआ था। शेष लगभग 20-22 खण्ड भी धीरे-धीरे एक-एक कर शीघ्र ही पाठकों के हाथ में आने का क्रम जारी है। अच्छी बात यह भी है कि काव्य की तरह इस कहानी अंक में भी रचनाओं का क्रम रचनाकारों की जन्मतिथि के क्रम से रखा गया है। यथा 'कोठी में धान' नामक पहले भाग में दिवंगत रचनाकार, दूसरा भाग खड़ी फसल' तथा तीसरा भाग 'नयी पौध'  के नाम से हैं। यह सूचना विस्तार से मैंने यहाँ ('हाशिये उलाँघती स्त्री' .... व आप और मैं )  पहले ही दी थी 


अत्यन्त हर्ष की बात है कि इस योजना के प्रारम्भिक तीन खण्डों (जिनका लोकार्पण गत वर्ष साहित्य अकादमी में  हुआ था) के पश्चात् अब आगामी पाँच खण्डों (पंजाबी, गुजराती, मराठी, तेलुगु और प्रवासी ) का लोकार्पण एवं संगोष्ठी का दो दिवसीय आयोजन 28-29 मार्च 2014 को  स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, 203, कमेटी रूम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में होने जा रहा है। आप सब की उपस्थिति सादर प्रार्थित है। यह कार्यक्रम पाँच सत्रों में 28 मार्च और 29 मार्च (दोपहर) तक चलेगा। कार्यक्रम की विस्तृत रूप रेखा संलग्न है।

इस कार्यक्रम में जे.एन.यू. के कुलपति प्रो. एस.के. सोपोरी, अशोक वाजपेयी, गणेश देवी, प्रियदर्शन, लीलाधर मंडलोई, मैनेजर पांडेय, विश्वनाथ त्रिपाठी, मैत्रेयी पुष्पा, मंजीत सिंह (विभागाध्यक्ष, पंजाबी) प्रो. सलिल मिश्र, जे. भाग्यलक्ष्मी (तेलुगु लेखिका), उषा वर्मा (यू.के.), भारती गोरे (मराठी लेखिका), प्रजन्या शुक्ल, (गुजराती लेखिका), अर्चना वर्मा, अनामिका, रूपा सिंह और गीताश्री आदि अलग अलग सत्रों में सभा को सम्बोधित करेंगे।
इस ऐतिहासिक महायोजना की मुख्य सम्पादक रमणिका दीदी है व सह संपादक हैं अर्चना वर्मा जी। कविता व कहानी वाले दोनों संकलनों में रचनाकार के रूप में तो मैं यद्यपि हूँ ही किन्तु मेरे लिए और सुखद बात यह भी है कि इसके विदेश / प्रवासी वाले खण्ड की सम्पादक के रूप में भी मुझे इस से जुड़ने का सौभाग्य मिला है; यह अवसर मेरे लिए एक ऐतिहासिक अनुभव व घटना है। यह अवसर उपलब्ध करवाने के लिए मैं रमणिका दीदी के प्रति कृतज्ञ हूँ; यद्यपि उनका आत्मीय स्नेह तो मैं लंबे अरसे से लेती आ ही रही हूँ । 

प्रवासी / विदेश वाले खण्ड के लोकार्पण में सम्पादक के नाते यद्यपि मुझे निस्संदेह उपस्थित रहना चाहिए था, किन्तु किन्हीं अपरिहार्य स्थितियों के कारण मेरा भारत जाना दो तीन वर्ष से सम्भव ही नहीं हो पा रहा है।  लोकार्पण पर भी उपस्थित नहीं रहूँगी, सम्पादक की प्रतिनिधि व अंक की कहानीकार के रूप में ब्रिटेन की वरिष्ठ कथाकार उषा वर्मा जी इस सभा को सम्बोधित करेंगी।

जिन-जिन लेखिकाओं की रचनाएँ इसमें सम्मिलित हैं वे अपनी लेखकीय प्रति लोकार्पण के समय स-सम्मान प्राप्त करना चाहें व लोकार्पण के ऐतिहासिक अवसर पर सम्मिलित होना चाहें तो कार्यक्रम में उपस्थित होने का कार्यक्रम बनाएँ। यदि भाग लेने के / की इच्छुक हैं तो सम्पर्क करें। 

 जो लेखिकाएँ भाग नहीं ले सकेंगी, वे भी कृपया सूचित करें ताकि उनकी लेखकीय प्रति भिजवाने की व्यवस्था की जा सके। ​



लोकार्पित हो रहे पाँच खण्डों में एक खण्ड 'प्रवासी कहानियाँ' भी है, जिसका सम्पादन करने का सौभाग्य मुझे मिला। इस खण्ड में सम्मिलित होने के लिए जिन-जिन लेखिकाओं की कहानियाँ भेजी गई थीं, उनमें से दो-एक नाम इस खण्ड में सम्मिलित नहीं हो पाए हैं, जिसका बहुत अधिक खेद है। सारी सामग्री भेजना व संकलन के सब कार्य ईमेल आदि से ही हो रहे थे। रमणिका दी' को ईमेल आदि कार्यालय-सहायक आदि लोग ही बताते हैं। लगता है इन्हीं सब कारणों से ये नाम छूट गए हैं। जिन महिला रचनाकारों की कहानियाँ सम्मिलित की जानी थीं, दो एक को छोडकर संकलन की विवरणिका के चित्र (इंडेक्स) में 37 नाम ही दीख रहे हैं। जिनके नाम छूट गए हैं उनसे क्षमा याचना है। किन्तु 'युद्धरत आम आदमी' के विशेषांकों के रूप में छप रहे इस महासंकलन के 25 खण्ड तैयार हो जाने के बाद इन सब को पुस्तकाकार बृहत संकलन के रूप में प्रकाशित किया जाना है। जो नाम छूट गए हैं उन सब को भी पुस्तक के रूप में लाते समय अवश्य सम्मिलित किया जाएगा। 
रचनाओं का क्रम लेखिकाओं की जन्मतिथि के क्रम से रखा गया है। जिसका जन्म पहले हुआ उसकी रचना पहले तथा जिसका जन्म बाद में हुआ उसकी उतनी ही बाद में। 'कोठी में धान' के अंतर्गत दिवंगत रचनाकार सम्मिलित हैं, 'खड़ी फसल'-1  के अन्तर्गत 1947 से पूर्व जन्मीं रचनाकार, खड़ी फसल-2 में 1947 से 1963 के मध्य जन्मीं रचनाकार  तथा नई पौध में 1962 या उसके पश्चात् जन्मीं रचनाकारों को रखा गया है। 

पुनः आप सब से आग्रह है कि 28-29 मार्च को जेएनयू में सम्पन्न हो रहे लोकार्पण व परिचर्चा कार्यक्रम अवश्य भाग लें।




इस महासंकलन के प्रवासी खण्ड की रचनाकार 


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