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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

करवा-चौथ और स्त्री-विमर्श

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करवाचौथ की परम्परा मेरे ददिहाल व ननिहाल में सदा से रही है और मुझे अपने घर की महिलाओं, ताई, चाचियों, बुआ आदि व मोहल्ले की शेष स्त्रियों/ कामवाली तक को साज-शृंगार में लदे-फदे दिन बिताते देखना सदा से अच्छा लगता रहा है। मुझे करवाचौथ इसलिए भी अच्छा लगता रहा है क्योंकि घरों के कामकाज में आकण्ठ डूबी रहने वाली महिलाएँ इस दिन इन सब से मुक्ति पा जाती हैं और यह दिन पूरा इन्हें समर्पित होता है, सास से उपहार मिलते हैं, सुबह उठकर नितांत अपने लिए कुछ खाती बनाती हैं,  अपने सूखे से सूखे कठोर हाथों तक पर भी शृंगार सजाती हैं। शादी का सहेज कर रखा जोड़ा वर्ष में एक दिन निकाल कर पहनती हैं और स्वयं को दुल्हन के रूप में पा कर जाने कितनी जीवन-ऊर्जा अर्जित कर लेती हैं।


परस्पर मिलती जुलती हैं, हँसती बोलती और हँसी ठिठोली करती हैं। शाम को एकत्र होती हैं, रात को उत्सव मनाती हैं, पति के हाथ से साल में एक दिन गिलास से घूँट भरती हुईं दाम्पत्य- प्रेम के इस प्रदर्शन में सराबोर हो शर्माती-सकुचाती व गद-गद होती हैं, भीतर तक मन खिलखिला उठता है उनका। बाजार व सिनेमाहाल इस दिन महिलाओं की टोलियों से भरे होते हैं .... ! आप उन महिलाओं की प्रसन्नता समझ नहीं सकते जो घर गृहस्थी में जीवन बिताने के बाद भी एक पूरा दिन अपने ऊपर बिताने को स्वतंत्र नहीं हैं ।


मुझे महिलाओं का यह उत्फुल्ल रूप देखना सदा ही मनोहारी लगता रहा है और इसमें किसी बड़े सिद्धान्त की हानि होती नहीं दीखती कि इसका विरोध किया जाए या इस पर नाक-भौंह सिकौड़ी जाए या हल्ला मचाया जाए। 


यद्यपि यह भी सच है कि मैंने अपनी दादी व सास को कभी करवा-चौथ करते नहीं देखा। स्वयं मैंने एक बार शौकिया के अतिरिक्त तीस वर्ष से अधिक की अपनी गृहस्थी में कभी करवा-चौथ आदि जैसा कोई भी व्रत-उपवास कभी नहीं किया। न मैं सिंदूर लगाती हूँ, न बिछिया पहनती हूँ, न मंगलसूत्र, न बिंदिया, न चूड़ी न कुछ और। हाँ शृंगार के लिए जब चाहती हूँ तो चूड़ी या कंगन या बिंदिया आदि समय-समय पर पहनती रहती हूँ, हटाती रहती हूँ। न मेरी बेटी सुहाग का कोई ऐसा चिह्न पहनती है या ऐसा कोई उपवास आदि करती है जो एकतरफा हो। उसके पति (दामाद जी) व वह, दोनों ही विवाह का एक-एक चिह्न समान रूप से पहनते हैं। इसके बावजूद एक दूसरे के लिए दोनों का बलिदान, त्याग और समर्पण किसी से भी किन्हीं अर्थों में रत्ती भर कम न होगा, अपितु कई गुना अधिक ही है। मेरे दीर्घजीवन की कामना मेरे पिता, भाई, पति, बेटों व बेटी से अधिक बढ़कर किसी ने न की होगी व न मेरे लिए इन से अधिक बढ़कर किसी ने त्याग किए होंगे, बलिदान किए होंगे, समझौते किए होंगे, सहयोग किए होंगे।  दूसरी ओर इनके सुख सौभाग्य की जो व जितनी कामना व यत्न मैंने किए हैं, उनकी कोई सीमा ही नहीं।  


इसलिए प्रत्येक परिवार, दंपत्ति व स्त्री को अपने तईं इतनी स्वतन्त्रता होनी चाहिए कि वह/वे क्या करें, क्या न करें। जिन्हें करवाचौथ, गणगौर या तीज आदि करना अच्छा लगता है उन्हें अवश्य करना चाहिए। महिलाओं / लड़कियों के हास-परिहास और साज- शृंगार के एकाध उत्सव की इतनी छीछालेदार करने या चीरफाड़ करने की क्या आवश्यकता है ? दूसरी ओर किसी को बाध्य भी नहीं करना चाहिए कि वे/वह ये त्यौहार करें ही। इतनी स्वतन्त्रता व अधिकार तो न्यूनतम प्रत्येक व्यक्ति का होना चाहिए और व्यक्ति के रूप में स्त्री /स्त्रियों का भी। 


मैं अपनी सभी मित्रों, सखियों, स्नेहियों व परिवारों को करवाचौथ के पर्व पर बधाई व शुभकामनाएँ देती हूँ॥ उनका दाम्पत्य-प्रेम अक्षुण्ण हो, स्थायी हो, दो-तरफा हो और सदा बना रहे !

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है : जिंदा गाड़ दी गई लड़की

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 ..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है 

- कविता वाचक्नवी 




पिछले दिनों अलग अलग अवसरों पर जब महिला मुद्दों को लेकर मैंने जरा भी कुछ लिखा तो मेरे ब्लॉग की पोस्ट के बाद व्यक्तिगत रूप से या फेसबुक की वॉल पर टिप्पणी करते हुए अनेक पुरुष - रत्नों ने मुझे समझाईश दी कि कविता जी ज़माना बदल गया है अब कहाँ आप महिलाओं पर अत्याचार की बात करती हैं अब तो ...... आदि आदि अनादि... । 

..... और कुछ महापुरुषों ने तो इतने भद्दे कमेन्ट किए कि उनकी भाषा और विचार पढ़कर उनके प्रति वितृष्णा ही जागी कि कैसे कैसे लोग हैं। अस्तु ! 

आज इस बदले जमाने का सच उघाड़ती सचाई देखें -






कुछ लोग देते हैं कि महिलाओं के प्रति अत्याचार के लिए महिलाओं की ही अधिक भूमिका होती है, उसे क्यों नकारते हैं या पुरुष को क्यों दोषी ठहराते हैं। ऐसा तर्क देने वाले लोग जरा समाज-मनोविज्ञान या समाज शास्त्र आदि को गहराई से जानें समझेंगे तो पता चलेगा कि कभी यदि जब महिलाएँ ऐसा करती हैं तो क्यों करती हैं ।

 ..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है। 


बात यह नहीं है कि किसने गलत किया, बात यह है कि क्यों किया गया। हमारी सामाजिक बुनावट में वे कौन- से ऐसे तत्व हैं जो किसी को बाध्य करते हैं ऐसा करने को .... इस पर विचार किया जाना अनिवार्य है। 


ऐसा नहीं कि स्त्री ने जब ऐसा किया तो उसे समझने/ समझाने के लिए किन्हीं बड़े ग्रन्थों का पारायण अनिवार्य है और  न ही इन बातों पर नासमझी का तर्क देकर पीठ फेर लेने से काम चलता है कि केवल  शिक्षित व्यक्ति ही समाज की बनावट और बुनावट को समझ सकते हैं।  यह चीज पुस्तकों से अधिक समाज के मन को और उसकी गतियों को अधिक निकट से समझने की है। क्रिया और प्रतिक्रिया को देखने बूझने की है ,  `किसी ने ऐसा किया तो क्यों किया ' के विवेचन की है। 

जिस आयु में स्त्री माँ बनती है, उस आयु में भारतीय समाज व्यवस्था में वह मुखिया नहीं हो चुकी होती। उसके ऐसा करने के पीछे कई कारक होते हैं, उन कारकों को तलाशना जरूरी है। वे कारक कोई किताबों की चीज नहीं। तब जरा-सा ध्यान देने पर  समझ आ जाएगा कि स्त्री की भूमिका कितनी है और पुरुष की कितनी । 


 एक युवक ने इसी प्रसंग में प्रतिप्रश्न किया कि क्या स्त्री परिवार और समाज में पद पर नहीं होती, क्या उसके पास कोई अधिकार नहीं होते या वह बेटी, माँ, बहू की ज़िम्मेदारी के समय मज़बूर बन जाती है। 

तो ऐसे प्रश्नकर्त्ता ये भूल जाते हैं कि स्त्री के  पद पर होने न होने का प्रश्न नहीं है यहाँ। उसके पद पर होने या अधिकार-सम्पन्न (?) होने से क्या होगा ? 



(1) पहली बात तो यह कि समाज में कितने प्रतिशत महिलाएँ स्वायत्त अथवा अधिकार सम्पन्न हैं?


(2 ) उनके अधिकार की सीमा क्या है ? अर्थात वे अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र हैं, या पति के भी, या पति और परिवार के भी या या बच्चों के भी ? क्या आर्थिक और सामाजिक निर्णयों में उनकी भूमिका / निर्णय का कोई महत्ब है ?


(3) वे अधिकार संपन्न (?) महिलाएँ कहाँ रहती हैं, उन पर अन्य दबावों / निर्णयों / परिस्थितियों का प्रभाव कितना होता है ? 

 
(4) बेटी के जन्म के साथ ही उस के पालन पोषण से जुड़ी असुरक्षा से बचाव के कितने हथियार उसके पास होते हैं ? 


(5) बेटी के जन्म से ही उसके साथ जुड़ी पारिवारिक हीनताबोध , संत्रास की स्थितियों में उसके साथ कितने लोग होते हैं?


(6) बेटी के साथ जुड़ी बलात्कार, छेड़छाड़, अपहरण, दहेज, वर ढूँढने , उसे संतुष्ट करने, उसे बेटी पसंद आने/ न आने, बेटी के बार बार रिजेक्ट हो कर बाजार में बिकती वस्तुओं की तरह अपनी बोली लगाए जाने की पीड़ा ..... अनगिन समस्याओं का क्या हल है उस तथाकथित अधिकार सम्पन्न महिला के पास ?


(7) बेटी के ससुराल में जला दिए जाने , मार दिए जाने या पति के परस्त्रीगामी होने पर उस अधिकार सम्पन्न स्त्री का कितना बस है?

आशा है इतने जरा से कारक उसकी भूमिका का कुछ तो खुलासा कर देंगे । या कम से कम इतना तो पता दे ही देंगे कि सामाजिक संरचना में वे कौन-से तत्व हैं, जिनके कारण यह सब आज भी हमारे आसपास ही चुपचाप व सरेआम भी चल रहा है। 



मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

मुझे मेरा पीहर लौटा दो

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एकालाप

मणिपुरी स्त्री का पर्वगीत


मुझे मेरा पीहर लौटा दो



कब से देख रही हूँ रास्ता
माँ के घर से बुलावा आएगा
मैं पीहर जाऊँगी
सबसे मिलूँगी
बचपन से अपनी पसंद के पकवान
जी भर खाऊँगी
निंगोल चाक्कौबा पर्व मनाऊँगी


बरस भर से देख रही हूँ रास्ता


याद आता है बचपन
बड़ी बहन इसी दिन हर बरस आती थी
दूर पहाडी पर बसे खिलखिलाते गाँव से
घाटी के घर में,
भाभी इसी दिन हर बरस जाती थी
पर्वत शिखर से बतियाते अपने पीहर
ससुराल की घाटी से


कितनी बार कहा इमा से
कितनी बार कहा इपा से
कितनी बार कहा तामो से


मैं इतनी दूर नहीं जाऊँगी
इतनी दूर ब्याही गई तो जी नहीं पाऊँगी


पर ब्याही गई इतनी ही दूर
काले कोसों
कहाँ घाटी में माँ का घर
कहाँ नौ पहाड़ियों के पार मेरी ससुराल


सबने यही कहा था
निंगोल चाक्कौबा पर तो हर बरस आओगी ही
[इस दिन मिट जाती हैं सब दूरियाँ
घाटी और पहाड़ी की]
सारी सुहागिनें इस दिन
न्यौती जाती हैं माँ के घर


प्रेम से भोजन कराएगी माँ अपने हाथ से
उपहार देगा भाई


हमारे मणिपुर में इसी तरह तो मनाते थे
निंगोल चाक्कौबा पिछले बरस तक
विवाहित लड़कियों [निंगोल] को घर बुलाते थे
भोजन कराते थे [चाक्कौबा]


घाटी और पहाड़ी का प्यार
इस तरह
बढ़ता जाता था हर बरस
सारा समाज मनाता था मणिपुरी बहनापे का पर्व


पर इस बार
कोई बुलावा नहीं आया
कोई न्यौता नहीं आया


भाई भूल गया क्या?
माँ तू कैसे भूल गई
दूर पहाड़ी पार ब्याही बेटी को?
मैं तड़प रही हूँ यहाँ
तुम वहाँ नहीं तड़प रहीं क्या?


माँ बेटी के बीच में
भाई बहन के बीच में
पर्वत घाटी के बीच में
यह राजनीति कहाँ से आ गई अभागी???


क्यों अलगाते हो
पर्वत को घाटी से
भाई को बहन से
माँ को बेटी से ???


मुझे मेरा पीहर लौटा दो
मेरी माँ मुझे लौटा दो
मेरा निंगोल चाक्कौबा लौटा दो !!!


कब से देख रही हूँ रास्ता ........


- ऋषभ देव शर्मा








[दीपावली की शुभ कामनाएँ देने के लिए प्रो. देवराज को इम्फाल फोन किया तो वे उत्साहहीन से लगे, पूछने पर पहले तो टालते रहे , बाद में बताया कि इस बार वहाँ भैया दूज जैसा परन्तु सामाजिक धार्मिक एकता का पर्व निंगोल चाकऔबा सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जा रहा है . देर तक बातें हुईं . फोन कट भी गया... पर एकालाप चलता रहा.  > ऋ.]

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मंगलवार, 9 जून 2009

मातृदेवो भव

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मातृदेवो भव
***




असल में यह एक लोककथा है और लोककथा की शक्ति यह होती है कि जीवन का सार अपने अनुभव के आधार पर लोक उस में भरता है। इन कथाओं की प्रभविष्णुता का मूल स्रोत ही इनकी सामाजिक भूमिका में निहित होता है व जो मूलत: लोकमंगल के लिए ही रची जाती हैं। कल्पना के सम्मिश्रण द्वारा चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। ऐसी ही एक लोक कथा बल्कि कहें तो चित्रकथा यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। कथा कुछ यों है कि जन्म की घडी़ सन्निकट आने से कुछ पहले एक दिन बच्चे ने ईश्वर से प्रश्न किया कि हे पिता सब कह रहे हैं कि कल तुम मुझे धरती पर भेज देने वाले हो, किंतु मैं भला कैसे वहाँ रह सकता हूँ,अभी तो कितना छोटा व असहाय अवस्था में हूँ मैं? उत्तर मिला कि मैंने बहुत सी परियों में से एक ऐसी परी का चुनाव किया है जो व्यग्रता से तुम्हारी प्रतीक्षा में रत है वही तुम्हारे सब दायित्व लेगी।बच्चे ने फिर पूछा कि यहाँ स्वर्ग में मुझे अपने आनन्द के लिए गाने व मुस्काने के अतिरिक्त कुछ नहीं करना होता,पर----------। (आगे की कथा चित्रों में !)


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तो हे माँ ! प्रणाम तुम्हारे हर रूप को । भारती !!!!



मातृदेवो भव




बुधवार, 15 अप्रैल 2009

गर्भभार

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एकालाप


गर्भभार


सँभलकर, बहुरिया,
त्रिशला देवी के सोलहों सपनों का सच
तेरे गर्भ में है.


नहीं,
दिव्यता का आलोक
केवल तीर्थंकरों की माताओं के ही
आनन पर नहीं विराजता ;
हर बेटी, हर बहू
जब गर्भ भार वहन करती है
उतनी ही आलोकित होती है.


हिरण्यगर्भ है
हर स्त्री.
उसके भीतर प्रकाश उतरता है,
प्रभा उभरती है,
प्रभामंडल जगमगाते हैं.
प्रकाश फूटता है
उसी के भीतर से.

प्रकाश सोया रहता है
हर लड़की के घट में,
और जब वह माँ बनती है
नहा उठती है
अपने ही प्रकाश में,
अपनी प्रभा में.
अपने प्रभामंडल में.


सँभलकर, बहुरिया,
तेरे अंग अंग से किरणें छलक रही हैं!


-ऋषभ देव शर्मा


मंगलवार, 17 मार्च 2009

पीड़ा और शिकायत भी

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एकालाप



बनाया था माँ ने वह चूल्हा




चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर
दिशा अदल - बदल कर.



उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.



गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से .


बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.


सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
- फूले फूले फुलके.



गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर.


जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.


आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है.
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.



माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.


बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.



माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.


रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है.
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है .



मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.


-
ऋषभ देव शर्मा



शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

नचारी

2 टिप्पणियाँ
- नचारी -



नचारी को, मुक्तक काव्य के अन्तर्गत लोक-काव्य की श्रेणी में परिगणित किया जा सकता है। इनका लिखित स्वरूप सर्व प्रथम 'विद्यपति की पदावली' में प्राप्त होता है। इसकी रचना में लोक-भाषा (देसिल बयना ) का प्रयोग और शैली में विनोद एवं व्यंजना पूर्ण विदग्धता, रस को विलक्षण स्वरूप प्रदान कर मन का रंजन करती हैं।विद्यापति के जीवनकाल में ही उनकी नचारियाँ लोक-कण्ठ का शृंगार बन गईं थीं। मिथिला और वैशाली में - नेपाल में भी- ,नचारियों को अब भी भक्ति और प्रेम से गाया जाता है ।

विद्यापति के बाद हिन्दी के काव्य में यह लोक प्रिय रूप कहीं दिखाई नहीं देता । मुझे काव्य का यह रूप बहुत मन-भावन लगा । मेरी 'नचारियों' के मूल में यही प्रेरणा रही है।
- प्रतिभा सक्सेना






1.
(नोक -झोंक)


'पति खा के धतूरा ,पी के भंगा ,भीख माँगो रहो अधनंगा ,
ऊपर से मचाये हुडदंगा ,चढी ये सिर गंगा !'
फुलाये मुँह पारवती !
'मेरे ससुरे से सँभली न गंगा ,मनमानी है विकट तरंगा ,
मेरी साली है, तेरी ही बहिना ,देख कहनी -अकहनी मत कहना !
समुन्दर को दे आऊँगा !'
'रहे भूत पिशाचन संगा ,तन चढा भसम का रंगा ,
और ऊपर लपेटे भुजंगा ,फिरे है ज्यों मलंगा !'
सोच में है पारवती !
'तू माँस सुरा से राजी, मेरे भोजन पे कोप करे देवी .
मैंने भसम किया था अनंगा, पर धार लिया तुझे अंगा !
शंका न कर पारवती !'
'जग पलता पा मेरी भिक्षा, मैं तो योगी हूँ ,कोई ना इच्छा ,
ये भूत औट परेत कहाँ जायें, सारी धरती को इनसे बचाये ,
भसम गति देही की !
बस तू ही है मेरी भवानी, तू ही तन में में औ' मन में समानी ,
फिर काहे को भुलानी भरम में, सारी सृष्टि है तेरी शरण में !
कुढ़े काहे को पारवती !'
'मैं तो जनम-जनम शिव तेरी, और कोई भी साध नहीं मेरी !
जो है जगती का तारनहारा, पार कैसे मैं पाऊँ तुम्हारा !'
मगन हुई पारवती !




2.
गौरा की बिदाई


तोरा दुलहा जगत से निराला उमा, मैना कहिलीं,
कुल ना कुटुम्व, मैया बाबा, हम अब लौं चुप रहिलीं !
सिगरी बरात टिकी पुर में बियाही जब से गौरा ,
रीत व्योहार न जाने भुलाना कोहबर*में दुलहा !
भूत औ परेत बराती, सबहिन का अचरज होइला ,
भोजन पचास मन चाबैं तओ भूखेइ रहिला !
ससुरे में रहिला जमाई, बसन तन ना पहिरे !
अद्भुत उमा सारे लच्छन, तू कइस पतियानी रे !
रीत गइला पूरा खजाना कहाँ से खरचें बहिना !
मास बरस दिन बीते कि, कब लौं परिल सहना !
पारवती सुनि सकुची, संभु से बोलिल बा -
बरस बीत गइले हर, बिदा ना करबाइल का ?
सारी जमात टिक गइली, सरम कुछू लागत ना !
सँगै बरातिन जमाई, हँसत बहिनी ,जीजा !
हँसे संभु ,चलु गौरा बिदा लै आवहु ना ,
सिगरी बरात, भाँग, डमरू समेट अब, जाइत बा !
गौरा चली ससुरारै, माई ते लिपटानी रे
केले के पातन लपेटी बिदा कर दीनी रे !
फूल-पात ओढ़िल भवानी लपेटे शिव बाघंबर ,
अद्भुत - अनूपम जोड़ी, चढ़े चलि बसहा पर !


(* कोहबर - नवदंपति का क्रीड़ागृह जहाँ हास-परिहास के बीच कन्या और जमाई से नेगचार करवाये जाते हैं )

गौरा का सुहाग - later things में कर दिया ।
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