Pornography लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Pornography लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 5 मार्च 2013

बनाकर फ़कीरों का हम भेस गालिब.....

0 टिप्पणियाँ


'कथादेश' में प्रकाशित शालिनी माथुर के लेख "व्याधि पर कविता या ...." से प्रारम्भ हुए विमर्श पर शालिनी माथुर के गत लेख  "मृतात्माओं का जुलूस" के क्रम में इसे पढ़ने से पूर्व कृपया पिछला लेख  यहाँ  देखें, उसी क्रम की एक कड़ी के रूप में इस बार पढ़ा जाए सुनील सिंह के - बनाकर फकीरों का हम भेस गालिब 


नीचे दिए पन्नों पर क्लिक करने से वे बड़े आकार में खुलेंगे। खुलने पर वहाँ एक सूक्ष्मदर्शी ( 'मैग्नीफाईंग ग्लास ) पर + का चिह्न आएगा, जिसे क्लिक करने से शब्दों का आकार और भी बढ़ा कर पढ़ सकते हैं।

- सुनील सिंह 









शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

मृतात्माओं का जुलूस : शालिनी माथुर

38 टिप्पणियाँ



अनामिका व पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था व तत्पश्चात राहुल ब्रजमोहन का "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"। उसी क्रम में प्रख्यात कवयित्री कात्यायनी का आलेख " धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका" भी आपने यहाँ पढ़ा। एक अन्य लेख अनिल पुष्कर कवीन्द्र का देह के भीतर छिपे देह के आख्यान भी यहाँ प्रकाशित किया था।

पाठकों ने इन लेखों को जिस गंभीरता से पढ़ा व अपने विचार व्यक्त किए वह प्रशंसनीय व अविस्मरणीय है। शालिनी माथुर के मूल लेख (व्याधि पर कविता या....) पर छिड़े विमर्श ने विमर्श का पथ छोड़ कब व कैसे व्यक्तिगत आक्षेपों आदि का रूप /रंग ले लिया इसे पाठक 'कथादेश' के अंकों में देख चुके होंगे या देख सकते हैं। 

कविताओं पर लिखे अपने आलोचना लेख से प्रारम्भ हुए हिन्दी की समकालीन काव्यालोचना के इस सबसे ज्वलंत विमर्श के पूरे प्रकरण पर शालिनी माथुर का एक दूसरा लेख अभी अभी 'कथादेश' के फरवरी 2013 अंक में "मृतात्माओं का जुलूस" शीर्षक से प्रकाशित हुआ है; जिसे दिल्ली के एक साहित्यिक मित्र ने सौजन्यपूर्वक स्कैन कर भिजवा दिया। उस स्कैन से पाठ तैयार करने में दो तीन दिन का समय लग गया। 

अब उसी लेख का अविकल पाठ सुधि पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत है। आपकी सार्थक प्रतिक्रिया की उत्कंठा से प्रतीक्षा रहेगी। 
- कविता वाचक्नवी

========================================= 



औरत के नज़रिये से
मृतात्माओं का जुलूस
- शालिनी माथुर
ईसा के दो हज़ार बारहवें वर्ष का अंतिम माह इस विडम्बना के लिए याद रखा जाएगा कि जिस समय देश की राजधानी दिल्ली में हज़ारों आम लोग रेप के विरुद्ध जुलूस में चल रहे थे, उसी समय हिन्दी साहित्य की विद्वत्त्रयी दिल्ली में पोर्न के पक्ष में जुलूस निकाल रही थी। यह समय अंधेरा है। मेरा यह प्रतिरोध एक नारीवादी एक्टिविस्ट का पोर्न के विरूद्ध प्रतिरोध है, जो इसी तरह जारी रहेगा क्यों कि मेरा यकीन है कि “पोर्न इज़ द थियरी, रेप इज़ द प्रैक्टिस ।”  इस अंधेरे समय में मैं अपनी रोशनी के साथ खड़ी हूँ कि अब मैं अकेली नहीं, मेरे साथ हिन्दी का लगभग सारा संसार है। 



हमारे देश की राजधानी नई दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्ष की एक युवा स्त्री के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। यह रेप एक पुरुष द्वारा किया गया केवल वासनामूलक यौन शोषण ही नहीं था, इसमें कई पुरुषों ने मिलकर क्रूरता, बर्बरता और नृशंसता से पूरे स्त्री--रीर को अपमानित किया और विरूपित करके चलती हुई बस के बाहर फेंक दिया। 29 दिसम्बर को क्रूर हिंसा की शिकार युवती की मृत्यु हो गई। प्रसिद्ध पुस्तक ’सिस्टरहुड इज़ पावरफ़ुल’ की लेखिका और मिज़ मैगज़ीन की सम्पादिका अमरीकी नारीवादी चिन्तक रॉबिन मार्गन का कथन है -“पोर्न इज़ द थियरीः रेप इज़ द प्रैक्टिस।” हम सब इस कृत्य में रॉबिन मार्गन के इस कथन का सत्यापन होते देख सकते हैं ! 


कथादेश पत्रिका के जून 2012 अंक में औरत के नज़रिए से स्तम्भ में मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था- ''व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि।'' वह आलेख हिन्दी साहित्य में स्त्री-शरीर के पोर्नोग्राफ़िक निरूपण के विरुद्ध था। पोर्न साहित्य और पोर्न कला में स्त्री शरीर को बर्बरतापूर्वक विवश, अपमानित, यौनीकृत और विरूपित रूप में निरूपित किया जाता है और रेप में वास्तविक जीवन में वैसा किया जाता है। पोर्न थियरी यानी सिद्धान्त है और रेप प्रैक्टिस यानी क्रियान्वयन। यह दोनों विमानवीकरण की ही प्रक्रियाएँ हैं।


''व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि'' को पाठकों का इतना सुचिन्तित, सुविचारित, प्रतिबद्ध और उत्साह से परिपूर्ण जन समर्थन मिला क्योंकि यह लेख न्याय के पक्ष में था, सदाशयतापूर्ण था और इसमें पाठक अपने विचारों का प्रतिबिम्ब देख सके थे। इतना बड़ा पाठक वर्ग मेरा हमनवा इसीलिए बना क्योंकि लेख ने उनके ही भावों की तर्जुमानी की थी। इस आलेख को 'कथादेश' से लेकर कम से कम पच्चीस इन्टरनेट पत्रिकाओं ने छापा और लगभग इतनी ही अन्य लघु पत्रिकाओं ने। 


पाठकों का आभार व्यक्त करने के लिए शब्द पर्याप्त नहीं हैं। लेख छपने के बाद तीन जून को मेरे पास पहला प्रशांसात्मक फोन आया और आज आठ जनवरी 2013 तक कोई भी दिन ऐसा नहीं हुआ जिसमें मुझे कोई नया फोन या एस0 एम0 एस0 न मिला हो। जो फोन नम्बर मैं बचा सकी उनको एक छोटी डायरी में लिख लिया है। इनकी संख्या 565 है। इंटरनेट पर आई टिप्पणियाँ जोड़ लें तो पाठकों की प्रतिक्रियाओं की संख्या हज़ारों में होगी। पाठकों की कुल संख्या का तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।


मैं स्वंय को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानती हूँ और विद्यार्थी जीवन से ही समाज से जुड़ कर सामाजिक मुद्दों पर काम करती रही हूँ । साहित्य लेखन में मेरा प्रवेश भी मेरे सामाजिक सरोकार का हिस्सा है। मैं हिन्दी भाषी हूँ। आज मुझे अपने हिन्दी भाषी होने पर बहुत गर्व हो रहा है।


ऐसे आलेख वाहवाही बटोरने के लिए नहीं लिखे जाते । पवन करण और अनामिका की उन दो कविताओं को, जिन्हें मैंने पोर्नोग्राफ़ी की शास्त्रीय रचनाएँ कहा है, मैंने बड़ी तकलीफ़ के साथ उद्धृत किया था। पाठकों की संवेदनाओं को कष्ट पहुँचाने का मुझे खेद है। आज यह लेख भी उतनी ही तकलीफ के साथ लिख रही हूँ, कि लिखना बहुत ज़रूरी हो गया है, उन मृतात्माओं के बारे में जिन्होंने एक गम्भीर चर्चा को मखौल में बदलने का प्रयास किया, एक छद्म विपक्ष खड़ा करके उसे बहस में तब्दील करने का प्रयास किया और अहंकार में चूर हो कर खुद ही ने बहस समाप्ति की घोषणा भी कर दी। वह आलेख मेरा था, उस पर चर्चा मैं यूँ ही समाप्त नहीं होने दूँगी।


मैंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि '' यह टिप्पणी केवल दो रचनाओं पर है, कवि तथा कवयित्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व या कृतित्व पर नहीं।’’ फिर भी अगस्त के कथादेश में जो लेख छपे उनमें से अर्चना वर्मा का लेख " प्रिय शालिनी को सस्नेह’’ और अनामिका का लेख सुश्री ''शालिनी माथुर'' को निवेदित’’ था। तब से अब तक मैंने इस विषय पर एक भी शब्द नहीं लिखा, आज भी न लिखती यदि अर्चना वर्मा ने झूठ, दम्भ, कुत्सा और दुर्भावना से भरे पूरे ग्यारह पृष्ठ उसी कथादेश के दिसम्बर 2012 अंक में न लिखे होते, जिस कथादेश की वे सम्पादन सहयोगी हैं।


जिस आलेख में अर्चना वर्मा का कोई ज़िक्र न था, वह बात उनको बहुत नागवार क्यों गुज़री ? वे इतनी व्यथित, इतनी व्याकुल, इतनी उत्तेजित, इतनी आगबबूला क्यों हैं ? कोई ख़ास बात है क्या? इसका उत्तर इसी आलेख में आगे ढूँढेंगे, पहले उनके झूठ का प्रतिवाद कर दें-


1) अर्चना वर्मा ने लिखा है कि "शालिनी ने आशंका जाहिर की कि कहीं ऐसा तो नही है कि उद्धृत कवियों के विरोधियों का कोई कार्टेल इतर कारणों से मुद्दे को ले उड़ा। ’’ (अगस्त पृष्ठ 8 )

यह झूठ है, मैंने ऐसा नहीं कहा । पाठकों का कोई कार्टेल नहीं हो सकता क्योंकि उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं होता। मैंने अपने लेख में कवियों के कार्टेल का जिक्र किया था जो खुद ही एक दूसरे को पुरस्कृत किया करते हैं। इस प्रकरण ने भी यही सिद्ध किया है कि पाठकों द्वारा तिरस्कृत कवि, कार्टेल द्वारा पुरस्कृत हैं।


2) "शालिनी कथादेश की आमन्त्रित और एक वर्ष से नियमित स्तम्भकार है। उनसे मेरा परिचय उनके लेखन के माध्यम से ही है। यह आमन्त्रण अपने आप में उनमें लेखन की तेजस्विता और धार की स्वीकृति है। कथादेश को इस बात का गर्व है कि उसके लिए व्यक्तिगत जान पहचान का नहीं रचना का महत्व है। ’’ (दिसम्बर पृष्ठ 8) अर्चना वर्मा ने यह साबित करने का प्रयास किया हैं मानों मैं उनके आमन्त्रण पर कथादेश में आई हूँ। यह सच नहीं। सच यह है कि मेरी पहली टिप्पणी ' कहेगी तो बेघर हो कर रहेगी ' अगस्त 2007 में और मेरा पहला वैचारिक आलेख "नारीवादी आन्दोलन पर एक नारीवादी का अन्तर्दर्शन" आज से पूरे पाँच वर्ष पूर्व फरवरी 2008 में प्रतिष्ठित नारीवादी रचनाकार सुधा अरोड़ा ने 'कथादेश' के अपने स्तम्भ 'औरत की दुनिया' में छापा था। उस पर छिड़ी लम्बी बहस में मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग, प्रभु जोशी, प्रभा खैतान, कात्यायनी, रुनू चक्रवर्ती तथा कुसुम त्रिपाठी ने भाग लिया था। उस समय अर्चना वर्मा 'हंस' में सम्पादन सहयोग कर रही थीं। सितम्बर 2008 में साहित्य के नाम पर पत्रिका 'हंस' में चल रही मठाधीशी और पोर्नोग्राफिक प्रवृत्ति के विरुद्ध 'कथादेश' के औरत की दुनिया में ही मेरा आलेख छपा था "नवरीतिकालीन संपादक और उनके चीयर लीडर्स।", वह लेख भी चर्चित हुआ।


3) स्तम्भकार होने का उलाहना अर्चना वर्मा मुझे न ही देतीं तो बेहतर होता। फ़रवरी 2012 में मेरा लेख ''ओथेलो का नारीवादी पाठ'' पढ़ने के बाद एक वरिष्ठ लेखिका होते हुए स्वयं अर्चना वर्मा ने मुझे फ़ोन ही नहीं किया बल्कि उस लेख की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव रखा कि मैं एक स्तम्भ क्यों न शुरू कर दूँ। मार्च 2012 में 'औरत के नज़रिये से' नामक अपने स्तम्भ में मैंने मातृत्व के व्यवसायीकरण पर एक लेख लिखा। मगर अगले ही माह उस स्तम्भ में अर्चना वर्मा ने अपनी एक विस्तृत टिप्पणी के साथ नीहारिका की कहानी छाप दी और उसके कुछ समय बाद उसी स्तम्भ में विभास वर्मा द्वारा किया गया एक अपठनीय अनुवाद। क्या किसी आमन्त्रित स्तम्भकार के स्तम्भ में कोई सहयोगी सम्पादक ऐसी घुसपैठ करता है ? क्या यही उनकी सम्पादकीय नैतिकता है? मुझे स्तम्भकार कहलाने का कोई शौक नहीं है, न ही साहित्यकार कहलाने का । इस प्रकरण को पाठकों के सामने उठाने का मुझे खेद है।


आइए अब अपने लेख के सम्बन्ध में छपे कुछ आलेखों की पाठाधारित चर्चा कर लें। 


दिसम्बर 2012 के 'कथादेश' में छपा अर्चना वर्मा का आलेख 'पढ़न्त की राजनीति'  पूरे ग्यारह पृष्ठों में विस्तीर्ण है। इसकी पढ़न्त उसकी पढ़न्त, तेरी पढ़न्त मेरी पढ़न्त, ऐसी पढ़न्त वैसी पढ़न्त, लगभग इकहत्तर बार पढ़न्त पढ़न्त लिख कर कदाचित् उन्होंने यह कहने का प्रयास किया है कि एक ही रचना को कई तरह से पढ़ा जा सकता है। अनामिका और पवन करण दोनों ही पन्द्रह बीस वर्ष से लिख रहे होंगे। मैंने तो अपना केवल एक ही पाठ उन पाठकों के आगे प्रस्तुत किया था जिनके शीर्ष पर चढ़ कर वर्षों से ऐसा कविता पाठ चल रहा था। अर्चना वर्मा आखिर कितनी पढ़न्त करेंगी ? क्या मेरे जैसा सामान्य पाठक एक पाठ भी नहीं कर सकता ? यह पढ़न्त की कैसी राजनीति है ?


अनामिका के लेख के विषय में वे कहती हैं, "पढ़ने वालों ने अनुचित ही इसे “शालिनी के जवाब"की तरह पढ़ा और उचित ही असन्तुष्ट हुए कि जवाब नहीं मिला, जवाब दिया ही नहीं गया था।... इसी तरह अर्चना वर्मा का आलेख भी पिछले अंक से जारी लेख का पूरक अंश था।’’(दिसम्बर पृष्ठ 8 ) मतलब यह, कि दोनों विदुषियों ने स्वतन्त्र लेख लिखे हैं, न कि प्रतिवाद । 



अनामिका ने जो लेख बक़ौल अर्चना वर्मा मेरे लेख के जवाब के रूप में नहीं लिखा था उसकी बानगी देखें -"प्रतिवाद- कविता के कंधे -(सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित) "प्रिय शालिनी जी, प्रेमचन्द के बड़े भाई साहब वाले भाव से आप से दो बातें कहना चाहूँगी...। हबड़ तबड़ करने वाले हड़बड़िया पाठकों के सामने कविता खुलती नहीं.....। शालिनी बाबू मैं जिस मिथिला की हूँ वहाँ तो अट्ठाइस तीस की उम्र में ही माताएँ सासें ब्लाउज़ धारना बन्द कर देती हैं ... । लड़कियों की जीन में वाई फैक्टर नहीं होता, न अन्जान सिंह की छवि प्रक्षेपित करने की मजबूरी।... स्त्री शरीर कोई पुपुही नहीं होता कि एक ही फूँक में बजने लगे ...उन्नत पहाड़ विशाल भी हों यह ज़रूरी नहीं। ...नैतिकता का ठेका तो आप खैर लें ही मत......इस बन्धन की गाँठे धीरे धीरे खुलती हैं । यत्न करके देखिये। सस्नेह, अनामिका।’’


अनामिका दर्पवती हैं, वे ईसा मसीह नहीं हैं, वे क्षमा नहीं करेंगी, वे पाठ पढ़ाएँगी, - " ईसू, यदि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं तो इन्हें जानना चाहिए, हम दिखाएँगे इन्हें आईना कि इन्हें पता तो चले कि ये क्या कर रहे हैं। ’’(अगस्त पृ 13) पाठक एक कवयित्री की स्नेह भरी भाषा देखें।


'समयांतर' के प्रतिष्ठित स्तम्भकार दरबारी लाल कहते हैं कि  "अनामिका के लेख की विशेषता उनका गुस्सा है। उनके लेख में नोट करने लायक बात यह है कि वे शालिनी को कम से कम दो जगह पुल्लिंग में बदल देती हैं। इस तरह वे ठीक उस पुरुषवादी तौर तरीके का इस्तेमाल करती नज़र आती हैं, जो अपने विरोधी पुरुषों को अपमानित करने के लिए उन्हें स्त्री या स्त्रैण सम्बोधित ही नहीं करते सिद्ध करने की कोशिश भी करते हैं।’’ (समयांतर सितम्बर 2012) मैं इसमें जोड़ना चाहूँगी कि अनामिका के लेख में रौद्र रस ही नहीं अद्भुत रस भी विद्यमान है। पूरा आलेख ही विस्मयपूर्वक लिखा गया है, अनामिका के पद्य में बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह थे, अनामिका के गद्य में लगभग छप्पन । प्रभु जोशी ने आशंका व्यक्त की है कि, ''अनामिका के पास यदि भाषा का कोई बघनखा होता तो वे शालिनी की आलोचना का पेट फाड़ कर अंतड़ियाँ बाहर निकाल देतीं। " निश्चिन्त रहें, अनामिका ऐसा कर नहीं सकेंगी। वे बेहद सौभाग्यशाली हैं कि गम्भीर आलोचना की निगाह अब तक उनकी एक ही कविता पर पड़ी है। 


अर्चना वर्मा कहती हैं - "अनामिका शालिनी के विश्लेषण को जल्दबाज़ पठन्त के रूप में सन्देह का लाभ दे कर कविता की भाषा के कारगर सूत्र देती हैं यह अलग बात है कि वे शालिनी के क्रोध को उबाल देने का काम करते हैं।’’ (दिसम्बर पृष्ठ 9 ) मैंने तो अनामिका के प्रतिवाद पर एक भी शब्द नहीं लिखा, उन को किस सिद्धि की सहायता से इल्हाम हो गया कि मुझे क्रोध आया या दुलार ? मुझे इन दोनों करुणामयी स्त्रियों के प्रेम पर पूरा यक़ीन है। वे कहती हैं कि "भैया और बाबू अपने से छोटे के लिए लाड़ के उभयलिंगी सम्बोधन हैं," (दिसम्बर पृ 10 ) तो सच ही होगा। बाबू कह कर मुझे नवजात शिशु मानते हुए अनामिका ने अपने वात्सल्य रस के घड़े मेरे ऊपर ऐसे उलीचे कि उस रस से भीग कर इस शरद ऋतु में मैं थर थर काँप रही हूँ। क्रोध के उबाल का प्रश्न कहाँ ? मैं तो अर्चना वर्मा के स्नेह से सिक्त हूँ और अनामिका के लाड़ से सराबोर । समझ में नहीं आ रहा महान विदुषी अर्चना वर्मा की इस बात पर '' अहो अहो'' कहूँ या '' धिक् धिक्।'' (साभार अर्चना वर्मा )


अनामिका अपनी ओर से इस काव्यशास्त्रीय और स्त्रीवादी चर्चा के बीच एक अति महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं , "अरे भैया शालिनी, कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें ? "  मेरे पास इस घटिया प्रश्न का तो उत्तर नहीं मगर एक जिज्ञासा ज़रूर है, अनामिका की जिस मिथिला में अट्ठाइस वर्ष की युवा स्त्री ब्लाउज़ पहनना छोड़ चुकी होती है, क्या अनामिका की उसी मिथिला में बच्चों के साथ भी यौनिकता सम्बन्धी चर्चा की जाती है? ऐसी मिथिला कहाँ है? दोनों विदुषियों से निवेदन है कि मेहरबानी करके वे अब न तो हमारी अक़्ल का और इम्तहान लें, न ही हमारे सब्र का।


अर्चना वर्मा पाठकों की "सीमित पठन्त क्षमता", " सीमित भाषिक क्षमता", "सांस्कृतिक पृष्ठभूमि" और "अनिच्छा" पर खेद जताते हुए कहती हैं - अनामिका की  "लिखन्त के तर्क को समझा ही नहीं गया" । विदुषी लेखिका फ़रमाती हैं, "लेकिन अगर किताब के साथ पाठक की खोपड़ी टकराने से खाली घड़ा बजने की आवाज़ आती हो तो क्या ग़लती सिर्फ किताब की होती है?" (दिसम्बर पृ 9 ) पाठक कृपया ध्यान दें , उक्त वचन एक ऐसी महिला के हैं, जिनकी आयु साठ वर्ष से अधिक है, जो तीस वर्ष तक बी0ए0 के विद्यार्थियों को पढ़ाती रही हैं,जो चालीस पैंतालिस वर्ष से हिन्दी में लेखन कार्य कर रही हैं और जो सम्प्रति 'कथादेश' नामक साहित्यिक पत्रिका की सम्पादन सहयोगी हैं।


यहाँ पर एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़ा होता हैं,कि पाठकों की खोपड़ी खाली क्यों है ? कारण कदाचित् यह है कि जिस समय बुद्धि बंट रही थी उस समय अनामिका सब के शीर्ष पर विराजमान थीं, इसलिए लगभग सारी बुद्धि उन्हें ही मिल गई। बची खुची बुद्धि उनकी अभिभाविका अर्चना वर्मा को प्राप्त हुई। इसमें हम पाठकों का कोई दोष नहीं कि जब तक हमारा नम्बर आया तब तक बुद्धि बची ही नहीं थी। अर्चना वर्मा तो अपार बुद्धिमती हैं ,जब उन्हें मालूम ही है कि खोपड़ियाँ खाली हैं, तो वे अपनी किताब से उन पर प्रहार करती ही क्यों हैं ? सिर में बुद्धि नहीं तो क्या उसमें दर्द तो हो ही सकता है। पाठकों पर कुछ तो रहम करें।


मैं लखनऊ शहर की रहने वाली हूँ। अर्चना वर्मा देश की राजधानी दिल्ली में रहती हैं । उनके शहर में पाठकों के साथ पेश आने की क्या यही तहज़ीब है ? 


वे पाठकों से इसलिए नाराज़ है क्योंकि पाठक न अनामिका का पद्य समझ सके न अनामिका का गद्य। वे कहती हैं "अनामिका के आलेख की पढ़न्त कविताओं से कहीं ज्यादा दिक़्क़त तलब साबित हुई दीखती है। "(दिसम्बर पृ10) उन को सहसा वाचिक परम्परा याद हो आई जब श्रोता कवयित्रियों के सामने होता था, (जिसका ज़िक्र कात्यायनी ने तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा गा कर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री के मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार के रूप में किया है)। अर्चना वर्मा कहती हैं, "लेखन की सीमा यह है कि वह पाठक की क्षमताओं और सीमाओं से अपरिचित होता है।" उन्हें पक्का यकीन है कि अनामिका की क्षमता असीमित है और पाठकों की क्षमता अति सीमित। वे आगे कहती हैं कि अनामिका ने ऐसे पाठक की इच्छा की थी जो उनके "लेखन की देह भाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेगा। यह आकांक्षा हताशा के लिए अभिशप्त है।" (दिसम्बर पृ 9) 


हताश क्यों ? हम सब पाठक महान विदुषियों को यकीन दिलाना चाहेंगे कि पाठक भी देहभाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेंगे, बशर्ते देहभाषा की हर भंगिमा, हर इशारा कविता का हो, न कि कवयित्री का। मंच पर चढ़ कर कवि तथा कवयित्री देहभाषा भंगिमा और इशारों से मंच सिद्ध कर सकते हैं, काव्य नहीं। तीन मुहावरे, चार कहावतें, लोकगीतों के पाँच मुखड़े, छः परस्पर विरोधाभासी उपमान, आन्तरिक विसंगतियों से भरे सात वाक्यांश और बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह कवयित्री को शीर्ष पर बैठा सकते है, कविता को नहीं।


विदुषी अर्चना वर्मा जिस उत्तर आधुनिकतावाद की दुन्दुभी ज़ोर ज़ोर से बजा रही हैं वह एक दर्शन है जिसकी अपनी एक विचारपद्धति है और अपनी निजी शब्दावली। जिस तरह वेदान्त में ब्रह्म और माया महत्वपूर्ण प्रत्यय (कान्सेप्ट) हैं, सांख्य में प्रकृति और पुरुष, न्याय में अणु तथा प्रमा, प्रमेय और प्रमाण , भर्तृहरि के व्याकरण दर्शन में स्फोट और मार्क्सवाद में बोर्जु़आ और प्रॉलिटेरियट, उसी तरह भाषा की निर्मितियों पर विषेश ध्यान देने वाले उत्तर आधुनिकतावादी दर्शन में टेक्स्ट,रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट उनके निजी प्रत्यय हैं। इसे 'रीडर्स रिस्पॉन्स थियरी' के अन्तर्गत समझा गया है, यानि एक ही पठनसामग्री को अलग- अलग दृष्टियों से पढ़ा जा सकता है, आदि।


संस्कृत भाषा तथा दर्शन शास्त्र की अपनी पृष्ठभूमि के कारण शास्त्रों की मर्यादा, भाषाओं की गरिमा और अनुवाद के जिस अनुशासन से मेरा परिचय है उसके अनुसार एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि मूल भाषा तथा संस्कृति में उस प्रत्यय की क्या गरिमा , मर्यादा, स्थान और महत्व है। जैसे कूड़े के ढेर पर घूमते जिस पशु को हम सुअर कहते हैं,सांस्कृतिक धार्मिक संदर्भों के अनुसार अन्यत्र उसे ही वराह कहते हैं । कई बार हम अपनी भाषा का कोई प्रचलित शब्द अपना लेते हैं, जैसे अंग्रेजी के रेल को रेलगाड़ी कहना या केवल गाड़ी कह देना जैसे गाड़ी चल पड़ी, गाड़ी छूट गई आदि।


टेक्स्ट, रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट के महत्वपूर्ण उत्तर आधुनिकतावादी प्रत्ययों का अनुवाद लिखन्त, पढ़न्त और गढ़न्त बेहद कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु है। ये शब्द हिन्दी भाषा के पूर्व प्रचलित शब्द भी नहीं हैं। कृत्रिम रूप से गढ़े गए ये शब्द दर्शनशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रत्ययों को ट्रिवियलाइज़ करते हुए उन्हें मखौल की भाषा में बदल देते हैं, जैसे तोतारटन्त, मनगढ़न्त आदि। ये न किसी दर्शनशास्त्र-गरिमा के अनुकूल हैं, न हिन्दी भाषा की । मैं इन कृत्रिम, कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु शब्दों को सिरे से खारिज करती हूँ। इन निरर्थक शब्दों को बार -बार प्रयोग करके करेंसी में लाने के प्रयास गर्हणीय है।


एक ही आलेख में सत्तर से भी अधिक बार पढ़न्त पढ़न्त लिखने वाली अर्चना वर्मा को उसी आलेख में एकाधिक बार पढ़न्त क्षमता पद का प्रयोग करते हुए ज़रा भी संकोच नहीं हुआ। शिक्षा का अधिकार कानून (2009) बनाने में अमर्त्य सेन और मार्था नुस्बॉम द्वारा प्रतिपादित केपेबिलिटी थियरी का आधार लिया गया है जो यह मान कर चलती है कि क्षमता हर एक के भीतर होती है। अब विद्यार्थियों की क्षमता को भी कम ज़्यादा आँकने पर प्रतिबन्ध है और अध्यापकों द्वारा ऐसी भाषा बोला जाना एक दंडनीय अपराध है। उत्तर आधुनिकता भी पाठों की विविधता की बात करती है, क्षमता पद इस दर्शन में सर्वथा अस्वीकार्य है। स्पष्ट है कि अर्चना वर्मा केवल विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए उत्तर आधुनिकता की शब्दावली दोहराती हैं। वे न तो उस दर्शन की भावना समझ सकी हैं, न ही उसे आत्मसात कर सकी हैं। 


जो पाठक अर्चना वर्मा का अगस्त वाला पाठ ठीक से समझ नहीं पाए थे उनकी सुविधा के लिए दयालु लेखिका दिसम्बर वाले पाठ में उन्हें विस्तार से भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल समझाने लगीं- "शल्योपचार अभी हुआ नहीं है ,बल्कि होने वाला है, मौत की चुहिया अभी निकली नहीं है, निकाली जानी है।वह भूतकालिक क्रिया पदों में बावजूद भविष्यार्थे अतीत है।" (दिसम्बर पृ 15) मेरी जिज्ञासा है कि यह 'भविष्यार्थे अतीत'  पाणिनि का कौन-सा सूत्र है ? अनामिका की कविता में स्त्री को ख़तरनाक व्याधि हो गई है यह सुनकर वह भूतकाल में हँस चुकी हो, व्याधि इतनी फैल चुकी है कि मृत्यु से उसे बचाने के लिए पूरे अंग काट कर निकालने पड़ेंगे, यह सुनकर वर्तमान काल में वह हँस रही हो या अंग शरीर से काट कर अलग कर देने के बाद जब 'सर्जरी की प्लेट’ में सजा कर स्त्री के सामने पेश किए जाएँगे तब 'कहो कैसी रही' कह कर वह भविष्यकाल में हँसेगी, तीनों ही स्थितियों में कवयित्री द्वारा किया गया वर्णन अमानवीय, क्रूर, नृशंस, बर्बर और हृदयहीन है। शरीर का विमानवीकरण करते हुए स्त्री स्वयं को पोर्नोग्राफर की नज़र से देख रही है। काल चाहे भूत हो, चाहे वर्तमान, चाहे भविष्य उससे अनामिका की कविता की अश्लीलता में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 


वैसे अनामिका द्वारा 'ग्रेस निकोलस' की कविता की नग्नतावादी पंक्तियों को उद्धृत करने का क्या प्रयोजन रहा होगा? क्या अपनी कविता को उससे कम अश्लील साबित करना? ग्रेस निकोलस की कविता रंगभेद के विरुद्ध लिखी गई विद्रोह की कविता है, उसमें न आत्ममुग्ध नायिका है, न ही व्याधि का हृदयहीन निरूपण। यह उद्धरण अप्रासंगिक है। व्याधि का रूपक लेकर लिखी गई कविताओं पर हो रही चर्चा के बीच यौनिकता जगाने, पुपुही बजाने, और पहाड़ों की ऊँचाई और विशालता का विवरण देने का प्रयास कवयित्री की मानसिकता प्रदर्शित करता है। पाठकों ने देख ही लिया होगा कि अनामिका का गद्य अनामिका के पद्य से भी ज़्यादा अश्लील है।


मेरे आलेख को इन्टरनेट पर पहुँचाने का श्रेय आशुतोष कुमार को जाता है। "स्त्रीविमर्श"  ब्लाग की सम्पादिका डा0 कविता वाचक्नवी ने 15 जून 2012 को लिखा ''आशुतोष कुमार जी द्वारा यह लिखने पर कि 'कथादेश के जून अंक में शालिनी माथुर ने ग़ज़ब का लेख लिखा है, कविता की व्याधि पर। निवेदन है कि इसे दूसरे दस काम छोड़ कर पढ़ा जाए। पवन करण और अनामिका अपनी स़्त्रीवादी चेतना के लिए चर्चित रहे हैं लेकिन माथुर तर्क करती हैं कि उनकी कविताएँ न सिर्फ स्त्री विरोधी हैं,बल्कि सबसे आपराधिक अर्थों में पोर्नोग्राफिक हैं। किसी भी रूप में उनकी बहस नैतिकतावादी या अंध-अस्मितावादी नहीं है , न कविता के प्रति बेवजह कठोर। इस लेख पर चर्चाओं का तूफ़ान उठना चाहिए।’ इस लेख को पढ़ने की उत्कंठा थी। वैचारिक लेखन, स्त्रीविमर्श और कविता तथा आलोचना में रुचि रखने वालों के लिए उक्त आलेख को कल यूनिकोडित किया है।’’( डा0 कविता वाचक्नवी, लंदन )


जून 2012 के प्रथम सप्ताह में फेसबुक पर इसे ग़ज़ब का लेख बताने वाले आशुतोष कुमार ने अगस्त 2012 के प्रथम सप्ताह में 'कथादेश' में अर्चना वर्मा, अनामिका और मदन कश्यप के एक साथ मिलकर आए आक्रमण में शामिल होकर एक ऐसा लेख लिखा, जिसमें इस 'ग़ज़ब के लेख’ की हर एक निष्पत्ति से असहमति जताई गई थी। (अगस्त पृ 82) बात यहीं तक सीमित नहीं है। तब से लेकर अब तक वे फेसबुक पर मेरे आलेख के विरुद्ध एक लम्बा अभियान चला रहे हैं, जिसमें नवम्बर के कथादेश में छपे कात्यायनी के आलेख का विरोध भी शामिल है। (मैं फेसबुक की सदस्य नहीं हूँ।)


व्याधि पर कविता में मैंने कहा था कि मन, बुद्धि, और आत्मा से रहित स्त्रीशरीर का विमानवीकृत निरुपण पोर्नोग्राफी कहलाता है। लेख में मैंने यौनीकृत, उपभोक्ता वस्तु के रूप में निरूपित, विवश, अपमानित, पुरुष के अधीन, हृदयहीन जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग कम से कम एक सौ तीन बार किया था। आशुतोष कुमार ने 'कथादेश' में लिखा है, "विवशता के उल्लेख-मात्र से कविताएँ पोर्नोग्राफिक कैसे हो गईं ? अगर कविता का पाठ इस तरह किया जाएगा तो 'कस विधि रची नारि जग माहीं,पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ और 'मैं नीर भरी दुख की बदली' जैसी पंक्तियाँ भी पोर्नोग्राफिक कहलाएँगी।" (अगस्त पृ. 83) क्या कोई भी पाठक इस बात से सहमत हो सकता है ? उक्त पंक्तियाँ लिखने वाला व्यक्ति अध्यापक है। जो अध्यापक उसी बात को एक सौ तीन बार पढ़ने के बाद भी इतना ही समझ सका, उसकी बुद्धि पर तरस खाने से ज़्यादा तरस उन विद्यार्थियों के भाग्य पर खाया जाना चाहिए जो ऐसे अध्यापक से पढ़ने के लिए अभिशप्त हैं। 


यह एक बेहद घटिया खेल है, आशुतोष कुमार जिसमें शामिल हो कर पवन करण और अनामिका को गोस्वामी तुलसीदास और महादेवी वर्मा, के समकक्ष बता रहे हैं और मदन कश्यप इन्हें पाब्लो नेरुदा, निराला और मुक्तिबोध के समकक्ष । पाठक को कविता समझने में अक्षम साबित करने का प्रयास करते हुए 'कविता समझने की मुश्किल' शीर्षक से 'कथादेश' में बहुत प्रतिष्ठापूर्वक बॉक्स में छापी गई धूर्त टिप्पणी में मदन कश्यप ने विनम्रता का झूठा प्रदर्शन करते हुए अपनी सहयोगी विदुषियों के समान ही मुझसे व्यक्तिगत निवेदन किया है। मेरा उत्तर है कि पवन करण और अनामिका की आलोच्य रचनाएँ यदि छद्मपूर्वक महीयसी महादेवी वर्मा और महाप्राण निराला के नाम से भी प्रकाशित कर दी जातीं तब भी मैं इन्हें पोर्न ही कहती क्यों कि ये पोर्न ही हैं। मेरी धारणा है कि समीक्षा रचना की होती है, रचनाकार की नहीं । मुझे बड़े-बड़े नामों की 'नेम ड्रापिंग' से बिल्कुल डर नहीं लगता। उम्मीद है कि मदन कश्यप को अपने सवाल का जवाब मिल गया होगा। 


मेरे लेख में जो प्रश्न दो रचनाओं पर थे उन पर विद्वतचतुष्टय ने दुर्भावनापूर्ण व्यक्तिगत उत्तर लिखे, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। विचारणीय है कि आशुतोषकुमार के लिए जून में फेसबुक पर जो ग़ज़ब का लेख अन्ध अस्मितावादी नहीं था, अगस्त में वही लेख अन्ध अस्मितावादी (कथादेश पृ 86) हो गया ? कैसे ? कोई ख़ास बात है क्या ?


ख़ास तो दिसम्बर 2012 में 'कथादेश' में छपा मैत्रेयी पुष्पा का पत्र भी है। वे एक वरिष्ठ लेखिका हैं जो हमेशा किसी न किसी कारण से चर्चा में बनी रहती हैं। उन्होंने स्वयं मुझको तीन बार फोन करके इस आलेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारा यह लेख नहीं, शिलालेख है, जिससे उन्होंने बहुत कुछ सीखा । फिर उन्होंने स्वयं अपनी पुस्तक ''तब्दील निगाहें'' मेरे पास भेजी कि मैं उसकी समीक्षा कर दूँ और यदि समीक्षा न भी करूँ तो अपनी राय ज़रूर बताऊँ क्योंकि वे मेरी स्त्रीवादी दृष्टि की कायल हैं। दिसम्बर में उन्होंने उसी लेख के विरुद्ध सम्पादक ने नाम पत्र लिखना ज़रूरी समझा जो लेख कल तक शिलालेख था। शिलालेख के ऊपर उत्कीर्ण इबारत इतनी जल्दी मिट गई ? कैसे?


अपनी पुस्तक ''चाक'' पर सात साल से चल रही चर्चा से तो मैत्रेयी पुष्पा को ऊब नहीं हुई, पर मेरे एक गम्भीर लेख पर हो रही चर्चा से वे सात महीने में ही ऊब गईं, उन्होने लिखा, ''देखते पढ़ते और समझते महीनों बीत गए - बहरहाल अब इस पोर्नोग्राफी की चर्चा चकल्लस पर विराम लगा देना चाहिए।'' ( दिसम्बर पृ 5) मैत्रेयी पुष्पा की भेजी हुई पुस्तक मेरे पास है और एस एम एस भी। उनकी ''तब्दील निगाहें '' की समीक्षा तो मैंने नहीं लिखी मगर खुद मैत्रेयी पुष्पा की निगाहें क्यों तब्दील हुईं, यह वे ही बेहतर जानती होंगी।


अर्चना वर्मा ने और कुछ ठीक लिखा हो या नहीं यह तो ठीक लिखा है कि  ''शालिनी माथुर स्वयं को हिन्दी साहित्य जगत् की अन्तेवासी नहीं मानतीं, और वैचारिक दलबन्दियों, सुविधाजनक गुटबाजियों, व्यक्तिगत ईर्ष्याओं, अवसरवादिताओं की भीतरी राजनीतियों से भी अपरिचित हैं।’’ (अगस्त पृ 8) । ख़ुदा का शुक्र है, मैं हिन्दी के इस अन्तःपुर में नहीं रहती, इसके भीतर बहुत अंधेरा है। 


विद्वत्त्रयी के आलेखों के पक्ष में संजीव चन्दन ने अविनाश के ब्लॉग पर लिखा "मुज़फ़्फरपुर में साहित्यकारों ने अनामिका और पवन करण की कविताओं पर एक विचार गोष्ठी आयोजित की। इसमें शिरकत के लिए मैंने भी अनामिका और पवन करण की कविता, उसके पाठ तथा स्त्रीवादी आलोचना के सन्दर्भ पर विचार किया। पवन करण की कविता पोर्न तो कतई नहीं है, इसे बड़ी तफसील से अर्चना वर्मा ने स्पष्ट किया है। .....शालिनी संस्कृत साहित्य की प्रकांड विदुषी बताई जाती हैं। पता नहीं क्यों वे कविताओं को कविता की तरह नहीं पढ़ रही हैं। मुज़फ़्फरपुर में लोग 'कथादेश' के पन्नों की फ़ोटो कॉपी के माध्यम से इन लेखों का प्रसार कर रहे हैं।’’ संजीव चन्दन पाठकों से अपील करते हैं कि “शालिनी जी के आलेख को अकेले न पढ़कर अर्चना वर्मा, आशुतोष कुमार और अनामिका जी के लेखों के साथ पढ़ा जाए।’’ (मोहल्ला लाइव 24 अगस्त 2012) पाठकों ने देख लिया होगा कि विचार का यह मगध दिल्ली में ही सीमित नहीं है इसकी जड़ें मुज़फ़्फरपुर तक फैली है। इसने मेरे आलेख को एक नए विचार के रूप में नहीं, मगध पर हुए हमले की तरह देखा और किलेबंदी का प्रयास किया जो सफल न हो सका।


अनामिका बड़े गर्व से स्वयं को वाइ फैक्टर से रहित बताती हैं । संजीव चन्दन कहते हैं कि अनामिका की पूरी विचारप्रक्रिया ऐसी स्त्रीवादी विचारप्रक्रिया है जो स्त्री को प्रकृति से ही श्रेष्ठ मानती है। मैं भी एक माँ की ही बेटी हूँ  और एक बेटी की माँ भी। एक्स या वाइ क्रोमोज़ोम प्रकृति प्रदत्त होते हैं उन पर क्या इतराना ? केवल अपने क्रोमोज़ोम के आधार पर साहित्य में जगह बनाने की कोशिश करने वाली कुछ महिलाओं के कारण स्त्री का दर्जा साहित्य में भी गिरा है और समाज में भी।


मैं तो यह बात मान गई कि मैं बाबू अर्थात शिशु हूँ, मेरी जिज्ञासा है कि अनामिका जिन्होंने अर्चना वर्मा के "आग्रह की रक्षा करते हुए व्यस्तता के बावजूद लिखना स्वीकार किया" (दिसम्बरपृ08) स्वयं पद्मिनी नायिका हैं या वे भी शिशु ही हैं। कविताएँ तो वे केवल वयस्कों के लिए लिखती हैं, मगर वयस्क पाठकों के प्रश्नों से 'कीलित’ होते ही वे शिशु बन गईं और अर्चना वर्मा उनकी अभिभाविका बन कर उठ खड़ी हुईं। चाइल्डवुमन पोर्नोग्राफ़र का सब से हसीन ख़्वाब होती है, जिसका “शरीर वयस्क हो और चेहरा शिशुवत्, पलकें झपकाती, इठलाती, तुतलाती। स्वयं को वामपंथी कहने वालों को पता होना चाहिए कि कम्युनिस्ट रूस ने अपने देश में बार्बी डॉल्स पर इसीलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि उसका चेहरा शिशु तुल्य है और शरीर वयस्क, जिसे बच्चों के दिमाग़ के स्वाभाविक विकास के लिए हानिकारक माना गया।


अर्चना वर्मा अपने आमन्त्रणों, आग्रहों, गोवा और कर्नाटक वालों से हुई फोन वार्ताओं और मुजफ़्फ़रपुर में हुई कार्यशाला, वहाँ बाँटी गई फ़ोटोकॉपियों और जारी की गई अपील के बावजूद पोर्न कविताओं के समर्थन में जितने समर्थक जुटा सकीं उनकी संख्या दस से भी कम है, इनमें इन्टरनेट पर आई टिप्पणियाँ भी 'शामिल हैं। मामला 'कथादेश' तक सीमित नहीं, जिसे वे "कुल मिला कर तीन बनाम ग्यारह " (दिसम्बर पृ. 7) बता रही हैं। पोर्न के इस प्रायोजित अनुष्ठान में आमंत्रित सदस्यों के अतिरिक्त कोई भी शरीक नहीं। मामला तीन बनाम ग्यारह नहीं, दस बनाम हज़ारों लाखों है।


अर्चना वर्मा केवल उद्भ्रान्त, उर्मिला जैन, अनिता गोपेश, प्रभु जोशी, सुनील सिंह, राहुल ब्रजमोहन, उदयभानु पांडे, विद्या लाल और कात्यायनी के लेखों और पाठकों के छपे पत्रों से ही क्षुब्ध नहीं है। उनका कोप इंटरनेट पर हज़ारों की संख्या में आ रही पाठकीय टिप्पणियों को लेकर भी है और उन अनेक आलेखों को लेकर भी जो 'कथादेश' में नहीं छापे जा सके, मगर जो अन्यत्र प्रतिष्ठा से छपे। उद्भ्रान्त का 15 जून 2012 को लिखा पूरा लेख ’दुनिया इन दिनों’ में विस्तार से छपा। लेख में भविष्यवाणी की गई थी कि "उनका कार्टेल क्या ख़ामोश बैठा रह जाएगा? वह बाँस की खपच्चियों की मदद से उन्हें पुनः त्रिशंकु की तरह ‘शीर्ष ’के स्वर्ग की ओर धकेलने का प्रयास तो अवश्य करेगा।" अर्चना वर्मा ने उद्भ्रान्त पर आ रहे गुस्से को उदयभानु पांडे पर उतारते हुए दिसम्बर में प्रोफेसर पांडे को 'मानसिक आलस्य' और 'बौद्धिक जड़ता' का ताना दे कर डपट दिया।


दीप्ति गुप्ता का आलेख भी रचना समय सहित अनेक ब्लॉग्स में छप कर बहुत चर्चित हुआ। उत्तेजना के ज्वार में अर्चना वर्मा ने दीप्ति गुप्ता के नाम से पृष्ठ 13 पर जो आवेशमय टिप्पणी उद्धृत की है वह दीप्ति गुप्ता ने नहीं लिखी थी। डा0 दीप्ति गुप्ता हिन्दी और अंग्रेजी की वरिष्ठ लेखिका हैं और डा0 अर्चना वर्मा की ही तरह विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका भी। अर्चना वर्मा ने अपने क्रोध की गागर मेरे साथ उन पर भी उलीच दी ,"ये कविताएँ दीप्ति गुप्ता और शालिनी जैसों के लिए नहीं हैं। उनकी सीमाएँ समझी जा सकती हैं।" (दिसम्बर पृ 12) 'कथादेश' की सम्पादन सहयोगी ने यदि जानबूझ कर उनकी टिप्पणी ग़लत उद्धृत की है तो उन्हें अपनी दुर्भावना पर ग्लानि होनी चाहिए, यदि भूलवश ऐसा हुआ है तो उन्हें क्षमा माँगनी चाहिए।


दिसम्बर 2012 में लिखे आलेख में अर्चना वर्मा ने सारे टिप्पणीकारों, पत्रलेखकों और पाठकों को नाम ले लेकर कोसा है। कोसने के इस क्रम में उन्होंने मुझ नाचीज़ का नाम चालीस से भी अधिक बार लिया है। वैसे चालीसा के बारे में कहा गया है कि यदि कोई भक्त इतनी बार प्रेमपूर्वक प्रभु का नाम लेता है तो प्रभु स्वयं धरती पर उतर कर उसके संकट हर लेते हैं।


इस पूरे प्रकरण में अर्चना वर्मा की भूमिका क्या है? न चर्चित लेख उनका था, न आलोच्य कविताएँ उनकी। वे स्पष्ट कहती हैं कि उनकी "शालिनी की पढ़न्त से घनघोर असहमति" है (दिसम्बर पृ. 8)। अनामिका और पवन करण के पद्य के पक्ष में उन्होंने छह पृष्ठ लिखे, और अनामिका के गद्य के पक्ष में ग्यारह पृष्ठ । ज़ाहिर है, वे एक पक्षकार हैं। उन्होंने एक गम्भीर चर्चा को छद्मपूर्वक एक घटिया खेल में तब्दील करने का प्रयास किया और स्वयं एक ऐसी रेफरी की भूमिका में आ गईं, जो सरेआम पक्षपात करते हुए अपनी टीम को पूरे अंक देता है और विपक्षी टीम को केवल फ़ाउल ।


अर्चना वर्मा इतनी व्याकुल इतनी उद्वेलित, इतनी उत्तेजित और क्रोधित यूँ ही नहीं है, बात बहुत ख़ास है। वह ख़ास बात यह है कि इन वरिष्ठ विश्वविद्यालयीय विदुषी के पास हिन्दी के समकालीन साहित्य के लिए एक बहुत बड़ी परियोजना थी, जिसमें कदाचित् मेरे इस छोटे आलेख से बड़ा व्यवधान पड़ गया। अर्चना वर्मा की इस महती परियोजना का प्रस्ताव हम स्पष्ट देख सकते है, वे लिखती हैं-  "एक समाज का पोर्न किसी दूसरे समाज का रसराज शृंगार हो सकता है।" (कथादेश अगस्त पृ0 8) पोर्न को "नैतिक सदमा" बताने वाली इस अति बुद्धिमती विदुषी की इस निष्पत्ति का मैं कड़ा विरोध करती हूँ। 


विश्व की किसी भी सभ्यता संस्कृति के पूरे इतिहास के किसी भी कालखंड में पोर्न का कोई साहित्यिक मूल्य नहीं रहा। अर्चना वर्मा कहती हैं कि वह एक ही रस है, उसे कहीं पोर्न कहते हैं, कहीं रसराज श्रृंगार । उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि पोर्न शृंगार का विलोम है। ग्रीक साहित्यालोचन में भी दो विपरीत ऊर्जाएँ मानी गई है - ईरॉस और थानाटॉस। शृंगार की ऊर्जा है - ईरॉस, पोर्न की ऊर्जा है - थानाटॉस, एक प्रेम है दूसरी मृत्यु। पोर्न दरअसल सारे रसों का विपर्यय है। 


आज से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व भारत में भरत के नाट्यशास्त्र की रचना हुई थी, जिसमें आठ रस वर्णित थे। लोक स्मृति के आधार पर प्रस्तुत कर रही हूँ - 

शृंगारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः।
वीभत्साद्भुतौ संज्ञौ चेत् अष्टौनाट्ये रसाः स्मृताः।।

उसके लगभग एक हज़ार वर्ष बाद हमारे आचार्य अभिनवगुप्त ने 'नाट्यशास्त्र' पर टीका लिखी 'अभिनव भारती', जिसमें नवाँ रस शामिल किया गया- शांतरस, जिसका स्थाई भाव है शम, अर्थात् आठों रसों की सामरस्य पूर्ण उपस्थिति। आज, ईसा के लगभग दो हजार साल बाद, दिल्ली की विदुषी अर्चना वर्मा दशम् रस 'पोर्न' को प्रतिष्ठित करने का प्रस्ताव लाई हैं। इसका स्थाईभाव क्या होगा, विमानवीकरण, विरूपीकरण, और अगर उर्दू से परहेज़ न हो तो ''ग़लाज़त ?'' 



खेल सामने आ चुका है, मामला दो कविताओं की अस्मिता का नहीं, हिन्दी के समकालीन साहित्य में पोर्न की प्रतिष्ठा का है। प्रस्ताव अर्चना वर्मा का है और समर्थन वामपंथी आलोचक आशुतोष कुमार का-   “शालिनी माथुर के चर्चित आलेख में कहा गया है कि वह नग्नता के खिलाफ़ नहीं है सिर्फ स्त्री शरीर के पोर्नोग्राफ़िक निरूपण के खिलाफ हैं, तब भी वह उन तमाम स्त्रियों के खिलाफ़ तो है ही जो अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए पोर्न कलाकार बनती हैं।...आखिर पोर्न कलाकार बनने का फैसला स्त्री के लिए अपमानजनक क्यों होना चाहिए।........पोर्नोग्राफी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही होती है यह कोई सर्वस्वीकार्य धारणा नहीं है।" ( अगस्त पृ0 85 ) पोर्नस्टार की जीविका के अधिकार का प्रश्न उठाते हुए वामाचार के पक्ष में खड़े आशुतोष कुमार अपने नाम से पूर्व बेहयाई से वामपंथी लिखते हैं, इससे ज़्यादा लज्जास्पद बात और क्या हो सकती है ?


जिस तरह हम सब को मालूम है, उसी तरह आशुतोष कुमार को ज़रूर मालूम होगा कि पोर्न एक इंडस्ट्री (व्यवसाय) है और पोर्नस्टार उसका प्रोडक्ट (उत्पाद)। पोर्न इंडस्ट्री उत्पाद को अपमानित, विवश, विरूपित, यौन-उपभोक्ता सामग्री के रूप में पोर्न के उपभोक्ताओं को बेचती है। पोर्न इंडस्ट्री में स्त्री पण्यवस्तु है, उसे बेचा ख़रीदा जाता है। आशुतोष कुमार ने सोच समझ कर ही अर्चना वर्मा की प्रस्तावित पोर्न प्रतिष्ठा का समर्थन किया होगा । यह वामपंथ है, यह जनवाद और जनसंस्कृति है, यह प्रगतिशीलता है, तो अवनति शीलता कैसी होती होगी ? यह समय बहुत अंधेरा है। 


मानिनी विदुषी अर्चना वर्मा ने पवन करण की शहद के छत्तों और दशहरी आमों वाली कविता में संस्कृत के व्याकरण दर्शन के आचार्य भर्तृहरि के शब्दब्रह्म स्फोट का संधान किया है ( अगस्त पृ. 9 ) और अभिमानिनी विदुषी अनामिका ने अपनी उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं वाली कविता को "कालिदास की पंक्तियों से अन्तर्पाठीय संवाद करती" ( अगस्त पृष्ठ 14 ) ब्रह्मगाँठ बताया है जिसे खोल पाना मेरे जैसे सामान्य पाठक के लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।


अर्चना वर्मा, संजीव चंदन और मदन कश्यप ने कहा है कि मैं कविता समझने योग्य नहीं हूँ और अनामिका मुझसे सस्नेह निवेदन कर चुकी हैं कि, ''नए पाठक को कविता के योग्य बनना पड़ता है! समझने की योग्यता विकसित करनी पड़ती है ! यत्न करके देखिये !" ( अगस्त पृ. 14 )


योग्यता वाली बात पर बचपन में पढ़ी हुई एक कहानी याद आ गई, जिसमें सम्राट के कपड़े उसी को दिखाई देते थे जो इस योग्य होता था। नए वर्ष में आइए वह पुरानी कहानी सुनें ।


बहुत दिन पहले एक राजा था। उस मूर्ख और घमंडी राजा को कपड़ों के साथ नए नए प्रयोग करने का बहुत शौक था और वह हमेशा चापलूसों से घिरा रहता था। एक बार उस दम्भी सम्राट के दरबार में दो धूर्त ठग आए और बोले कि वे उसके लिए एक ऐसे कपड़े की पोशाक तैयार करके देंगे जो उसको दिखाई नहीं देगी जो नादान होगा या जो अपने पद के योग्य नहीं होगा।


वे धूर्त ठग हथकरघे पर बिना धागे के ताना-बाना बुनने लगे, वे हवा में सुई में धागा पिरोने का अभिनय करने लगे, फिर वे ऐसी सुई से उस कपड़े पर बारीक बेलबूटे काढ़ने का अभिनय करने लगे जो बुना ही नहीं गया था। वे सोने चाँदी और रेशम के तार मँगवाते और पुरस्कार स्वरूप अपने थैलों में भर लेते। ऐसा बहुत दिनों तक चलता रहा। राजा ने दरबारियों को भेजा। कपड़ा उन्हें दिखाई तो नहीं दिया,पर स्वयं को योग्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने सम्राट से कपडे़ की प्रशंसा की, उसकी नर्मी, बुनावट और उस पर कढ़े बारीक बेलबूटों की भी। सम्राट स्वयं जा पहुँचा, कपड़ा उसे भी दिखाई नहीं दिया पर वह नादान नहीं, योग्य था। 


धूर्त ठगों ने हवा में कैंची चलाते हुए कपड़ा काटा और हवा में सुई धागा चला कर पोशाक सीकर सम्राट को पहनाने का अभिनय किया। आत्ममुग्ध सम्राट अदृश्य पोशाक पहनकर चाटुकार दरबारियों के जुलूस का नेतृत्व करता हुआ शहर के बीच चल पड़ा। भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ ने देखा पर चुप रही। इसी बीच भीड़ में खड़ा एक बच्चा ( मिथिला का बाबू) चिल्लाया - "राजा ने तो कुछ भी नहीं पहन रखा।" "नादान बच्चे की आवाज सुनो", एक बुजुर्ग बोला, और फिर यह आवाज़ फुसफुसाहटों में बदलकर एक कान से दूसरे कान तक होती हुई एक शोर में बदल गई- "देखो राजा के तन पर तो वस्त्र ही नहीं।"


हांस क्रिस्चन एंडरसन की यह कहानी भले ही फेयरीटेल के रूप में संकलित हो, यह कहानी बच्चों की नहीं है। दरबार की हिप्पोक्रेसी और बौद्धिकता के झूठे दम्भ के खिलाफ लिखी कहानी यहीं समाप्त नही होती। कहानी आगे चलती हैं- आवाज़ को सुनकर राजा समझ गया कि सब लोग जान चुके हैं कि वह निर्वस्त्र है, मगर उसने निर्णय किया कि वह उसी प्रकार दरबारियों के जलूस का नेतृत्व करता रहेगा। प्रजा शोर मचाती रही, दरबारी निर्वस्त्र सम्राट के नेतृत्व में चलते रहे और यह दिखावा करने के लिए और भी अधिक श्रम करने लगे कि वे एक बेहद शानदार, बेशकीमती, बेहतरीन पोशाक के दूर तक फैले दामन की झालर को सावधानी से संवार और संभाल कर चल रहे है। 


निर्वसन सम्राट और योग्य दरबारियों का जुलूस
निर्वसनों के वसनों की प्रशंसा में अनेक बौद्धिक लेख लिखे जा चुके हैं। प्रगतिशील तथा अवनतिशील कवि तथा विद्वत्जन निर्लज्जता से निर्वसन के नेतृत्व वाले जलूस में चल रहे हैं। उन सब ने नादान बच्चे की आवाज सुन ली है, और उन सब की भी जिन्हें वे आम पाठक और सामान्य पाठक कह कर अपमानित और तिरस्कृत करते रहे हैं । छद्म खुल चुका है, फिर भी मृतात्माओं का जुलूस चल रहा है। खूबी यह है कि इस जुलूस में इस बार स्त्रियां भी शामिल हैं। 


अर्चना वर्मा ने अपनी आठों सिद्धियों के द्वारा प्राप्त अलौकिक ज्ञान के आधार पर मेरे संस्कारों को कोसा है और मेरे जेहादी नारीवादी एक्टिविज़्म को भी। मुझे अपने बहुत पढ़े लिखे सुसंस्कृत माता पिता से मिले संस्कारों पर नाज़ है, जिनके कारण मैं सामाजिक एक्टिविस्ट बनी। 


ईसा के दो हज़ार बारहवें वर्ष का अंतिम माह इस विडम्बना के लिए याद रखा जाएगा कि जिस समय देश की राजधानी दिल्ली में हज़ारों आम लोग रेप के विरुद्ध जुलूस में चल रहे थे, उसी समय हिन्दी साहित्य की विद्वत्त्रयी दिल्ली में पोर्न के पक्ष में जुलूस निकाल रही थी। यह समय अंधेरा है। मेरा यह प्रतिरोध एक नारीवादी एक्टिविस्ट का पोर्न के विरूद्ध प्रतिरोध है, जो इसी तरह जारी रहेगा क्यों कि मेरा यकीन है कि “पोर्न इज़ द थियरी, रेप इज़ द प्रैक्टिस ।”  इस अंधेरे समय में मैं अपनी रोशनी के साथ खड़ी हूँ कि अब मैं अकेली नहीं, मेरे साथ हिन्दी का लगभग सारा संसार है। 


मैं इस तरह से खेल समाप्ति की घोषणा नहीं होने दूँगी क्योंकि मेरे लिए यह कोई खेल नहीं, एक गम्भीर चर्चा है। यह चर्चा अभी समाप्त नहीं हुई है।

**********************************************
 कथादेश (फ़रवरी 2013)

8 जनवरी 2013
  - शालिनी माथुर ,                            
ए 5/6 कारपोरेशन फ़्लैट्स, 
निराला नगर, 
लखनऊ 
फोन 9839014660


गुरुवार, 22 नवंबर 2012

....नायक की प्रतीक्षा करती व उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती .....

11 टिप्पणियाँ
हिन्दी की समकालीन काव्यालोचना की सर्वाधिक ज्वलंत शृंखला 


अनामिका व पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था व तत्पश्चात राहुल ब्रजमोहन का "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"।  

उसी बहस के क्रम में आज पढ़ें -



धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका
(संदर्भ - पवन करण और अनामिका की कविताओं पर जारी बहस)

- कात्यायनी 


पवन करण और अनामिका की कविताओं का शालिनी माथुर ने जो कुशाग्र विश्लेषण प्रस्तुत किया, उस पर पहले ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं लगी। शालिनी की केन्द्रीय स्थापनाओं से मेरी पूरी सहमति थी। पर बहस के दौरान मूल मुद्दे को इधर-उधर खींचने-तानने-घसीटने से कुछ नए विवाद के मुद्दे उभरकर आए। उन पर अपने विचार रखने की जरूरत महसूस हुई।


पहली बात यह है कि निर्वस्त्रता (जैसा कि शालिनी ने भी लिखा है) अपने आप में अश्लील या पोर्नोग्राफ़िक नहीं होती। यदि ऐसा होता तो पुनर्जागरण काल से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक की यूरोपीय चित्रकला की कई क्लासिकी कृतियाँ अश्लील मान ली जातीं। हाँ, कोर्णाक और खजुराहो की मैथुनरत युगलों और पशुओं तक से मैथुन की मूर्तियाँ भारतीय समाज के एक गतिरुद्ध और पतनोन्मुख समाज के अभिजनों-पुरोहितों की सांस्कतिक सड़ान्ध की अभिव्यक्ति-मात्र हैं। अर्चना वर्मा 'इन्हें इस बहुलताप्रेमी देश के समावेशी स्वभाव में विचित्र और विलक्षण आस्थाओं और अस्मिताओं के लिए भी जगह बना देने के पुरागत परम्परा' मानती हैं। उनके हिसाब से, तान्त्रिकों-वामाचारियों के विविध सम्प्रदाय धार्मिक आस्थाओं को रूपकों-प्रतीकों में ढालकर स्त्रियों के साथ (धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर) जो कुछ करते थे, उन्हें भी 'विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं का एक विशिष्ट गढ़न्त '(Construct) मान लिया जाना चाहिए और उनका सहानुभूतिपूर्वक पाठ/पढ़न्त ( Reading ) होना चाहिए। ऐसा ही सती-प्रथा के साथ भी होना चाहिए।


उत्तर आधुनिकतावादी विमर्श (Discourse) प्रणाली की जिस त्रयी - लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त (Text, reading and construct) को अर्चना वर्मा ने अपनी तर्क-प्रणाली का आधार बनाया है, उसकी सबसे बड़ी सहूलियत यह होती है कि उसका कोई सन्दर्भ-चौखटा (Frame of reference) होता ही नहीं। जो भी सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक गढ़न्त हैं, उनके कई लिखंत और कई पढ़न्त हो सकते हैं। किसी एक अवस्थिति के सही या गलत होने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। पक्षधरता या निर्णायकता का मुद्दा अप्रासंगिक हो जाता है। अनामिका ने शालिनी को यह नसीहत यूँ ही नहीं दी है कि आदमी को 'जजमेण्टल' होने से बचना चाहिए। पाठ की बहुस्वरीयता (Polyphony) की बात जब लुनाचार्स्की ने (दोस्तोयेव्स्की के सन्दर्भ में) और बख़्तीन ने की थी तो उन्होंने रचनाकार को सुनिश्चित विचारधारात्मक अवस्थिति और सामाजिक पक्षधरता से मुक्त कत्तई नहीं किया था। अर्चना वर्मा लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त की अवधारणाओं के मूल में भाषा में स्वभावतः निहित अर्थबहुलता और सन्दर्भ-सापेक्षता की चर्चा करते हुए रचनाकार को पूरी छूट देते हुए ज़िम्मेदारी मुख्यतः पाठक की पढ़न्त क्षमता पर डाल देती हैं जो उसकी भाषिक क्षमता, वैयक्तिक सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, वैचारिक प्रतिबद्धता आदि से तय होती है। उनका साफ-साफ कहना है - "लिखन्त की विवक्षा और अर्थान्विति लेखक की मंशा से नियन्त्रित और अभिप्राय से संचालित न होकर पाठक की पढ़न्त क्षमता द्वारा कार्यान्वित होती है।" बात यहाँ साफ हो गई है। यानी असल बात यह है कि रचनाकार इस तर्क से दायित्वमुक्त हो जाता है और अपनी वैचारिक-सामाजिक अवस्थिति की किसी भी आलोचना के जोखिम से सुरक्षित हो जाता है। यह घिसे-पिटे उत्तर आधुनिकतावादी सिद्धान्त-चर्वण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आज हिन्दी की कई स्त्री चिन्तक और स्त्री कवि अपने कृतित्व में जो नारीवाद प्रस्तुत कर रही हैं वह गत शताब्दी के साठ के दशक के पश्चिमी नारीवाद के विविध सरणियों से सर्वथा भिन्न है। उस दौर के नारीवादी आन्दोलन के पास स्त्री-मुक्ति की कोई सांगोपांग परियोजना नहीं थी, उनकी विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु मध्यमवर्गीय अराजकतावादी थी और स्वरूप रैडिकल स्वतःस्फूर्त था। आगे चलकर अपनी तार्किक परिणति के तौर पर भले ही वह धारा विघटित हो गयी और कुछ हद तक प्रतिगामी निष्पत्तियों तक जा पहुँची, पर अपने समय में कई शीर्षस्थ नारीवादी सिद्धान्त-निरूपकों की उपस्थिति के साथ-साथ उस नारीवादी आन्दोलन का स्वरूप जनान्दोलनात्मक था। पूँजीवादी जनवाद के वैधिक दायरे के भीतर उसकी अपनी कुछ उपलब्धियाँ भी थीं। 



स्त्री-मुक्ति और पुरुष वर्चस्व जैसे प्रश्न आज उत्तर-आधुनिकतावादी विमर्श के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टि के अनुसार दमन या उत्पीड़न, विमानवीकरण, वस्तुकरण या ऐसी कोई भी चीज़ एक वस्तुगत सामाजिक यथार्थ नहीं बल्कि एक वैचारिक समस्या है जिसका सम्बन्ध दार्शनिक द्वैतों से है और इन द्वैतों की व्याख्या में ही दमन-उत्पीड़न-वर्चस्व या ऐसी कोई स्थिति स्वीकार की जा सकती है।
आज स्थिति सर्वथा भिन्न है। स्त्री-मुक्ति और पुरुष वर्चस्व जैसे प्रश्न आज उत्तर-आधुनिकतावादी विमर्श के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टि के अनुसार दमन या उत्पीड़न, विमानवीकरण, वस्तुकरण या ऐसी कोई भी चीज़ एक वस्तुगत सामाजिक यथार्थ नहीं बल्कि एक वैचारिक समस्या है जिसका सम्बन्ध दार्शनिक द्वैतों से है और इन द्वैतों की व्याख्या में ही दमन-उत्पीड़न-वर्चस्व या ऐसी कोई स्थिति स्वीकार की जा सकती है। तात्पर्य यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद और उसकी सहोदरा ''उत्तर''-विचारसरणियाँ सभी विचारों, विश्वासों, व्यवहारों, संस्थाओं, घटनाओं-परिघटनाओं को वस्तुगत यथार्थ के बजाय एक पाठ या लिखन्त (text) मानती हैं और इसकी अर्थान्विती भी पूरी तरह से मनोगत होती है यानी प्रेक्षक-पाठक की स्थिति पर निर्भर होती है, जैसा कि अर्चना वर्मा कहती हैं, ''...लिखन्त पाठक के हाथों में आते ही अपने तात्कालिक सन्दर्भों से मुक्त होती और पढ़न्त-सापेक्ष बन जाती है, हालांकि लिखन्त सापेक्षता से पूरी तरह से मुक्त नहीं होती।'' उत्तर-आधुनिकतावाद का जादुई तर्क सिग्निफायर और सिग्नीफायड की अवस्थितियों को मनमाने ढंग से बदलता रहता है। 


उत्तर-आधुनिकतावादी, उत्तर उपनिवेशवादी, 'सबआल्टर्न' इतिहासकार और अस्मितावादी राजनीति (Identity Politics) के एन.जी.ओ. पन्थी ज्ञानधुरीण - ये सभी लोग प्रबोधन (Enlightenment), क्लासिकी जनवादी क्रान्तियों और समाजवादी क्रान्तियों के "महाख्यानों" (Metanarretives) और मानववाद, जनवाद, समाजवाद की अवधारणाओं-परियोजनाओं को एकलतावादी, अपचयनवादी (Reduchionist) और वर्चस्ववादी (Hegemonist) मानकर खारिज करते हैं। इनका मानना है कि सत्ता विकेन्द्रित होकर हमारे जीवन के पोर-पोर में घुसी हुई है, आमजनों द्वारा आभ्यन्तरीकृत कर ली गयी है, अतः इसका प्रतिरोध असम्भव है। यथास्थिति की जड़ता की हर आलोचना एक नयी जड़ता को जन्म देती है और सत्ता का हर प्रतिरोध सत्ता के नये रूप को जन्म देता है। (अर्चना वर्मा, शालिनी की आलोचना करते हुए जब कहती हैं कि पितृसत्ता के गढ़न्तों से लड़ते-लड़ते स्त्री-विमर्श की अपनी अनेक निष्पत्तियाँ स्वयं न केवल एक गढ़न्त बल्कि जकड़न्त बन चुकी हैं तो इसके पीछे मूलतः यही तर्कप्रणाली सक्रिय होती है)। ऐसी स्थिति में उत्तर आधुनिक, उत्तर औपनिवेशिक और 'सब-आल्टर्न' विचार-सरणियाँ एकमात्र वैकल्पक सम्भावना  के तौर पर दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों आदि की सत्ता से अनछुई-अप्रदूषित प्राक्-आधुनिक (Pre-modern) अस्मिताओं की तलाश करती हैं और उनकी स्वायत्तता के 'स्पेस' को बचाने-बढ़ाने की कोशिश करती हैं। यह साहित्य और मानविकी के क्षेत्र में भी हो रहा है और राजनीति के क्षेत्र में भी। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित इतिहासकार दीपेश चक्रवर्ती और समाजशास्त्री आशीष नन्दी 'कुलवधु' और 'गृहलक्ष्मी' जैसे 'सुन्दरता की अनपचेय (Irriducable) श्रेणियों' के महिमामण्डन तक जा पहुँचते हैं। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित अर्चना वर्मा 'रसराज शृंगार ' की रीतिकालीन रसानुभूति को सकारात्मक बताती हैं और इस बात के लिए चिन्तित दीखती हैं कि आधुनिकता का पीछा करता हुआ भारत विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं और पुरागत परम्पराओं से विच्छिन्न होता जा रहा है (इसमें लिंग-पूजा, योनि पूजा, पशुओं तक से सम्भोग के भित्ति-चित्रों के उत्कीर्णन आदि सभी शामिल हैं!)। अनामिका की कविताओं में और लेखन में स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से विच्छिन्न कर स्त्री-देह की मुक्ति में ( इसी में मन की मुक्ति भी है!) कीलित करने वाली पश्चिमी बुर्जुआ नारीवादी चिन्तन की एक उपधारा के साथ-साथ, लोक-परम्परा के नाम पर जो कुछ भी है; उसके प्रति जो अधिभूतवादी एवं अनालोचनात्मक स्वीकार-भाव है, उसे भी इसी नजरिए से समझा जा सकता है। यह संगमभूमि दरअसल उत्तर-आधुनिकतावाद की जमीन है जहाँ नारी मुक्ति देह-मुक्ति के रूप में और देह-मुक्ति 'देह के उत्सव' (राजेन्द्र यादव इसे यही नाम देंगे) के रूप में पवन करण और अनामिका अपनी-अपनी कविताओं को अंजाम दे रहे हैं। 



'फैट ब्लैक वुमन' से जो एक कविता उन्होंने उद्धृत की है वहाँ भी मोटी होने, अश्वेत होने और स्त्री होने से जुड़े तीन स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का जो तरीका कवि ने चुना है, वह भी व्यापक सामाजिक प्रश्नों को देह-मात्र में कीलित कर देने का ही तरीका है। कविता की स्त्री के दुद्धू उत्तेजक हैं। किसके लिए? निश्चय ही पुरुष के लिए ! वह पुरुष से अपना जड़ीभूत सौन्दर्य-बोध बदलने का आग्रह करती है ताकि वह उसके तरबूज जैसे स्तनों, जुड़वाँ सील मछलियों जैसी जाँघों और उनके बीच जामुनी चेरी मुँह में दबाए झबरे कुत्ते को सराह सके और नाभि के नीचे नीलिमा में हहाते काले सागर में उतर सके।
बकौल अनामिका, उनकी कविता 'ब्रेस्ट' से जुड़ा सारा रूमान झाड़ते हुए यह भी बताना चाहती है कि स्त्री की अस्मिता किसी एक अंग में कीलित नहीं की जा सकती, पर ऐसा करते हुए वे स्त्री की अस्मिता व उससे जुड़े प्रश्नों को स्त्री-देह मात्र में कीलित कर देती हैं। ग्रेस निकोलस के संकलन 'फैट ब्लैक वुमन' से जो एक कविता उन्होंने उद्धृत की है वहाँ भी मोटी होने, अश्वेत होने और स्त्री होने से जुड़े तीन स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का जो तरीका कवि ने चुना है, वह भी व्यापक सामाजिक प्रश्नों को देह-मात्र में कीलित कर देने का ही तरीका है। कविता की स्त्री के दुद्धू उत्तेजक हैं। किसके लिए? निश्चय ही पुरुष के लिए ! वह पुरुष से अपना जड़ीभूत सौन्दर्य-बोध बदलने का आग्रह करती है ताकि वह उसके तरबूज जैसे स्तनों, जुड़वाँ सील मछलियों जैसी जाँघों और उनके बीच जामुनी चेरी मुँह में दबाए झबरे कुत्ते को सराह सके और नाभि के नीचे नीलिमा में हहाते काले सागर में उतर सके। कविता न्यौता किसे दे रही है? क्या खुद को? नहीं, पुरुष को! अतः यह कविता भी समस्या का अपमानजनक अवमूल्यन करती है और सन्दर्भों से कटकर वस्तुगत तौर पर अश्लील बन ही जाती है। अनामिका भी इतना तो मानती ही हैं कि 'एकांगिता ही अश्लीलता है।' 





करीब ढाई-तीन दशक पहले हिन्दी कविता में स्त्रियों के लिए करुणा की बाढ़-सी आ गयी थी। हिन्दी कवि दयनीय, मौन, उत्पीड़ित स्त्री के प्रति कुछ ज्यादा ही करुणार्द्र हो उठे थे। फिर स्त्री कविता का एक विद्रोही स्वर उभरा जिसका एक व्यापकतर सामाजिक परिप्रेक्ष्य था। उस समय भी ज्यादा हावी धारा कुलीन व्यक्तिवादी स्त्री-कविता की ही धारा थी। और अब यह एक दौर है जब पवन करण की चर्चित कविता जैसी हृदयहीन लम्पट-कामुक कविताएँ और अनामिका की चर्चित कविता जैसी कृत्रिम, 'सिंथेटिक' (प्रभु जोशी ने ठीक कहा है) विकृतमानस और संवेदनहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। पितृसत्ता का विरोध करते हुए स्त्री ने प्रकारान्तर से पितृसत्ता के ही गढ़न्तों को स्वीकार कर लिया है- अर्चना वर्मा की यह बात और कहीं लागू हो न हो, अनामिका की कविता पर तो जरूर लागू होती है।
करीब ढाई-तीन दशक पहले हिन्दी कविता में स्त्रियों के लिए करुणा की बाढ़-सी आ गयी थी। हिन्दी कवि दयनीय, मौन, उत्पीड़ित स्त्री के प्रति कुछ ज्यादा ही करुणार्द्र हो उठे थे। फिर स्त्री कविता का एक विद्रोही स्वर उभरा जिसका एक व्यापकतर सामाजिक परिप्रेक्ष्य था। उस समय भी ज्यादा हावी धारा कुलीन व्यक्तिवादी स्त्री-कविता की ही धारा थी। और अब यह एक दौर है जब पवन करण की चर्चित कविता जैसी हृदयहीन लम्पट-कामुक कविताएँ और अनामिका की चर्चित कविता जैसी कृत्रिम, 'सिंथेटिक' (प्रभु जोशी ने ठीक कहा है) विकृतमानस और संवेदनहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। पितृसत्ता का विरोध करते हुए स्त्री ने प्रकारान्तर से पितृसत्ता के ही गढ़न्तों को स्वीकार कर लिया है- अर्चना वर्मा की यह बात और कहीं लागू हो न हो, अनामिका की कविता पर तो जरूर लागू होती है। 



हिन्दी कविता सामाजिक जीवन और संघर्षों के परिप्रेक्ष्य से आज असामान्य रूप से विमुख हुई है। स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आम स्त्रियों के जीवन, वृहत्तर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक मुक्ति की परियोजना से काटकर अभिजन समाज की स्त्रियों का निठल्ला विमर्श बना दिया गया है। इसका मूल कारण इतिहास का ठहराव और विपर्यय की लहर है। मजे की बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर औपनिवेशिकता, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद आदि का जमाना यूरोप-अमेरिका में क़रीब डेढ़-दो दशक पहले ही बीतने लगा था। भारत में यह फैशन काफी देर से आया है, जैसा कि प्रायः होता है।




हिन्दी कविता सामाजिक जीवन और संघर्षों के परिप्रेक्ष्य से आज असामान्य रूप से विमुख हुई है। स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आम स्त्रियों के जीवन, वृहत्तर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक मुक्ति की परियोजना से काटकर अभिजन समाज की स्त्रियों का निठल्ला विमर्श बना दिया गया है। इसका मूल कारण इतिहास का ठहराव और विपर्यय की लहर है। मजे की बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर औपनिवेशिकता, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद आदि का जमाना यूरोप-अमेरिका में क़रीब डेढ़-दो दशक पहले ही बीतने लगा था। भारत में यह फैशन काफी देर से आया है, जैसा कि प्रायः होता है। पश्चिम के अकादमिक-सांस्कृतिक हलकों में इन दिनों "मार्क्सवाद की वापसी" का नारा देने का ज़माना है। फ़ूको, देरिदा, ल्योतार, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक, होमी भाभा आदि घिस चुके हैं। अब फिकरे और जुमले जि़जेक और अलेन बेदयू आदि से उधार लेने का ज़माना है। 


अनामिका ने शालिनी को प्रेमचन्द की कहानी के पात्र 'बड़े भाई साहब' वाले भाव से नसीहत दी है। प्रेमचन्द के 'बड़े भाई साहब' नसीहत क्यों देते थे, वह जानती ही होंगी। हाँ, यह सम्भावना नहीं है कि कथा के अन्त में बड़े भाई साहब की तरह वे रूपान्तरित होकर सरल वेश में आ जायेंगी। नैतिकता का ठेका लेने, 'सेल्फरायटियसनेस' और 'जजमेण्टल' होने तथा "प्रचण्ड मर्दवादी भाषा के तेवर" में श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त होकर आलोचना करने की प्रवृत्त को उन्होंने जब फासीवादी कहा है तो प्रकारान्तर से शालिनी को ही लक्षित किया है। पर स्वयं उनके लेख से ऊँचाई से 'सरमन' बोलने और नसीहत देने का जो तेवर है, कविता की समझ विकसित करने का जिस अन्दाज़ में दिया गया सुझाव है, उससे तो एक आहत फुफकार ही सुनायी देती है। जो तोहमतें वे शालिनी के आलेख पर लगाती हैं, वे ख़ुद उन पर ज्यादा सटीक ढंग से लागू होती हैं। दिलचस्प बात यह है कि शालिनी की मूल आपत्तियों और तर्कों में से उन्होंने एक को भी सीधे-सीधे नहीं छुआ है और बस दाँयें-बाँयें से निकल गयी हैं। 



अनामिका के मर्दवाद-विरोध की ब्रह्मगाँठ तब खुल जाती है, जब एक नैतिक-बौद्धिक रूप से परिष्कृत आधुनिक स्त्री के अकेलेपन के लिए उन्हें "रामगुप्तों से घिसी ध्रुवस्वामिनी के अकेलेपन" का रूपक सूझता है। यानी मर्दवाद (पुरुष वर्चस्ववाद) का सारतत्व यह है कि अपनी नामर्दगी को ढंकने के लिए कायर पुरुष अतिरिक्त आक्रामक और निर्दय आचरण करते हैं।
अनामिका के मर्दवाद-विरोध की ब्रह्मगाँठ तब खुल जाती है, जब एक नैतिक-बौद्धिक रूप से परिष्कृत आधुनिक स्त्री के अकेलेपन के लिए उन्हें "रामगुप्तों से घिसी ध्रुवस्वामिनी के अकेलेपन" का रूपक सूझता है। यानी मर्दवाद (पुरुष वर्चस्ववाद) का सारतत्व यह है कि अपनी नामर्दगी को ढंकने के लिए कायर पुरुष अतिरिक्त आक्रामक और निर्दय आचरण करते हैं। फिर मर्दवाद का समाधान क्या है? यह कि पुरुष "संकल्पपूर्वक अतिपुरुष के खाँचे से बाहर आकर सम्यक् पुरुष यानी प्रजातान्त्रिक/दोस्त पुरुष" बने, "ध्रुवस्वामिनी के योग्य चन्द्रगुप्त" बने, "पद्मिनी नायिका के योग्य धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक" बने। अनामिका जी, महाकाव्य काल के धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक उदारचरित भले हों, पर सत्री के प्रति प्रजातान्त्रिक रुख रखने वाले दोस्त पुरुष तो कत्तई नहीं होते थे। ध्रुवस्वामिनी का अपना व्यक्तित्व था और चन्द्रगुप्त एक जेनुइन प्रेमी और साहसी राजा था, पर आधुनिक स्त्री के स्वतन्त्र व्यक्तित्व और प्रजातान्त्रिक पुरुष व्यक्तित्व को उन दोनों पर आरोपित करना अतिबौद्धिकता के हास्यास्पद द्रविण प्राणायाम से अधिक कुछ भी नहीं है। आज के मूल्यों के सन्दर्भ-चौखटे से देखें तो धीरोदत्त नायक अतिपुरुष के खाँचे में कैद होता था और पद्मिनी नायिका आचरण और सौन्दर्यबोध की दृष्टि से प्राचीन/मध्यकालीन पुरुष वर्चस्ववादी कसौटियों पर खरी होती थी। यानी शब्दों में तो अनामिका पुरुष के अतिपुरुष होने का विरोध करती हैं, पर वास्तव में प्रतीक्षा उन्हें एक अतिपुरुष की ही है। 



बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब वे ("शालिनी बाबू", "शालिनी भैया" को सम्बोधित करते हुए) मानो दुनिया के सारे पुरुषों को चुनौती देती हैं कि "कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें... पढ़ी-लिखी, चेतन परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं"। अब यहाँ यौनिकता से तात्पर्य यदि 'सेक्सुअलिटी' से है, तो वह एक स्वायत्त-सकारात्मक प्रत्यय है, वह एक उन्नत स्त्री-चेतना में उपस्थित रहती है, उसे पुरुष द्वारा जगाने की जरूरत नहीं होती। यौनिकता से तात्पर्य यदि स्वस्थ यौनक्षुधा या स्वस्थ ऐन्द्रिक कामना से है, तो कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और उन्नत चेतना वाली आधुनिक स्त्री इस मामले में समान सक्रिय पक्ष की भूमिका निभाती है।
बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब वे ("शालिनी बाबू", "शालिनी भैया" को सम्बोधित करते हुए) मानो दुनिया के सारे पुरुषों को चुनौती देती हैं कि "कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें... पढ़ी-लिखी, चेतन परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं"। अब यहाँ यौनिकता से तात्पर्य यदि 'सेक्सुअलिटी' से है, तो वह एक स्वायत्त-सकारात्मक प्रत्यय है, वह एक उन्नत स्त्री-चेतना में उपस्थित रहती है, उसे पुरुष द्वारा जगाने की जरूरत नहीं होती। यौनिकता से तात्पर्य यदि स्वस्थ यौनक्षुधा या स्वस्थ ऐन्द्रिक कामना से है, तो कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और उन्नत चेतना वाली आधुनिक स्त्री इस मामले में समान सक्रिय पक्ष की भूमिका निभाती है। अनामिका के विचार से स्त्री शरीर पुपुही नहीं बल्कि गम्भीर राग-रागिनियों, श्रुतियों-अनुश्रुतियों से भरी हुई रुद्रवीणा है, लेकिन है वह एक वाद्ययंत्र ही, जिसके अन्तर्संगीत को जगाने के लिए किसी धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक की जरूरत है। (यह 'साहब, बीवी और गुलाम' की नायिका की कामना लगती है न कि किसी आधुनिक स्वतंत्र चेतस स्त्री की)। धीरोदत्त नायक के पुरातन खाँचे-साँचे वाले ऐसे किसी अतिपुरुष की प्रतीक्षा एक लोकतान्त्रिक सोच न होकर एक फासीवादी आत्मिक जगत और सौन्दर्यशास्त्र की अभिलाक्षणिकता है। यह फासीवादी विचारों से अनुकूलित एक मिथ्याभासी स्त्री-स्वातन्त्रय चेतना है। उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवाद लोकजीवन की रागात्मक चाशनी में लिथड़ी प्राक्आधुनिक सोच-संस्कारों-विचारों-संस्थाओं को महिमामण्डित करने के साथ ही लोकतान्त्रिक मूल्यों-संस्कारों का विरोध करता ही है। साथ ही जेण्डर पर केन्द्रित हर विमर्श को व्यापक सामाजिक-ऐतिहासिक सन्दर्भों से काटकर वह देहकेन्द्रित, यौनकेन्द्रित, 'स्त्री बनाम मर्द' - केन्द्रित बनाकर स्त्री मुक्ति के प्रश्न को परियोजना में रूपान्तरित करने की जगह विमर्श और मुहावरेबाजियों-जुमलेबाजियों तक सीमित कर देता है। कविता और विचार के क्षेत्र विश्वविद्यालयों की अभिजन विदुषियाँ आजकल ऐसा धमाल खूब मचाये हुई हैं। 


अनामिका को ताज्जुब है कि शालिनी ने न जाने कहाँ ऐसी स्त्रियाँ देखी हैं जो बेध्यानी का अभिनय करते हुए जानबूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती हैं और ध्यान से चारों ओर देखती हैं कि सबने उसे ध्यान से देखा या नहीं । हमारे जैसे बन्द समाजों की घुटन में यह विमानवीकरण, विघटित स्त्री चेतना और रुग्णता खूब देखने को मिलती है स्त्रियों के एक हिस्से में। अनामिका को दिल्ली के मध्यवर्गीय इलाकों में जाकर व्यापारियों और बाबुओं की, रुटीनी गार्हस्थ्य से बोर पत्नियों का पास-पड़ोस के "भाई-साहबों" से व्यवहार पर गौर करना चाहिए, कलकत्ता के किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों की बहुतायत वाले इलाकों में जाकर पास-पड़ोस की "भाभी जी" लोगों का उनके साथ व्यवहार देखना चाहिए, किसी तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा-गाकर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री का मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार देखना चाहिए। यही नहीं, साहित्य के मठाधीश कई नौकरशाहों की महफिलों और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तरों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जायेंगे। कविता और कहानी में भी एक स्त्री जब कोई निमित्त तलाशकर, विद्रोह या त्रासदी के नाम पर या किसी अन्य बहाने से, स्त्री को अनावृत करती है तो रुग्ण पुरुष मानस को गुदगुदाने (titillation) का ही काम करती है।

अनामिका को दिल्ली के मध्यवर्गीय इलाकों में जाकर व्यापारियों और बाबुओं की, रुटीनी गार्हस्थ्य से बोर पत्नियों का पास-पड़ोस के "भाई-साहबों" से व्यवहार पर गौर करना चाहिए, कलकत्ता के किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों की बहुतायत वाले इलाकों में जाकर पास-पड़ोस की "भाभी जी" लोगों का उनके साथ व्यवहार देखना चाहिए, किसी तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा-गाकर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री का मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार देखना चाहिए। यही नहीं, साहित्य के मठाधीश कई नौकरशाहों की महफिलों और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तरों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जायेंगे। कविता और कहानी में भी एक स्त्री जब कोई निमित्त तलाशकर, विद्रोह या त्रासदी के नाम पर या किसी अन्य बहाने से, स्त्री को अनावृत करती है तो रुग्ण पुरुष मानस को गुदगुदाने (titillation) का ही काम करती है।

दूर की कौड़ी लाने के चक्कर में वकील कभी-कभी केस बिगाड़ने और मुवक्किल की फजीहत कराने का ही काम किया करते हैं। ऐसा ही आशुतोष कुमार ने किया है। सीढ़ी दर सीढ़ी तर्क़ करते हुए वे यहाँ जा पहुँचते हैं कि जरूरी नहीं कि पोर्नोग्राफ़ी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही हो। सनी लियोन ख़ुद मानती हैं कि पोर्नोग्राफ़ी उनके लिए सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति का एक खास तरीक़ा है जिसे उन्होंने अपनी इच्छा से चुना है और इस पर उन्हें गर्व है। आशुतोष कुमार जी, पोर्नोग्राफ़ी के बारे में 'वैल्यू जजमेण्ट' इस आधार पर नहीं लिया जा सकता कि सनी लियोन इसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम और अपना स्वतन्त्र निर्णय मानती हैं। पोर्न उद्योग और यूरोप के सेक्स उद्योग में लगी ज्यादातर स्त्रियाँ यही कहेंगी कि वे अपने स्वतन्त्र निर्णय से ऐसा कर रही हैं। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। इनके पीछे सैकड़ों परोक्ष रूप से आर्थिक-सामाजिक परिवेशिक दबाव काम करते हैं या फिर एक विघटित स्त्री चेतना काम करती है जो अलगाव और पूँजीवादी सांस्कृतिक अद्यःपतन का परिणाम होती है। यदि कुछ पुरुषों के लिए सनी लियोन कुत्सित उल्लास का रूपक या एक गाली का पर्याय बन चुकी है तो मात्र इसी से यह तय नहीं हो जाता कि हम सनी लियोन (निश्चय ही, उसके निर्णय की आज़ादी उसकी अपनी है, पर उसके निर्णय से असहमति की भी उतनी ही आज़ादी है) के कृत्य का औचित्य प्रतिपादन करने लगें। जहाँ तक सृजनात्मक अभिव्यक्ति का सवाल है, तो आशुतोष जी, पोर्न इण्डस्ट्री तो छोड़ ही दीजिए, हॉलीवुड-बॉलीवुड के कमर्शियल सिनेमा में भी अभिनेता की सृजनात्मक अभिव्यक्ति का 'स्पेस' बस नाम को या अपवादस्वरूप ही होता है। वहाँ कुछ है तो बस पैसे और स्टारडम की कुत्तादौड़ है, खोखलापन है, वैचारिक दिवालियापन है और घनघोर आत्मिक रिक्तता है। आशुतोष कुमार ने अपने लेख के अन्त में पोर्नोग्राफ़ी के बारे में काफ़ी कुछ ठीक-ठीक बातें लिखीं हैं। यह सही है कि पोर्नोग्राफ़र स्त्री को केवल वस्तुकृत नहीं करता (क्योंकि वह कभी भी पूरी तरह से वस्तुकृत नहीं हो सकती)। कभी-कभी वह उसे पशुवत् 'ट्रीट' करके परपीड़क आनन्द लेता है, कभी गोपन को खोलने और निजी स्पेस में झाँकने की फन्तासी रचता है, कभी अपनी समस्त रुग्ण मर्दवादी फन्तासियों-अप्राकृतिक यौनाचार (अब यह मत कहियेगा कि अप्राकृतिक कुछ नहीं होता और यह भी एक पुरानी जड़ीभूत सोच है), सामूहिक यौनाचार, सार्वजनिक नग्नता, 'वाइफ स्वैपिंग' आदि का शिकार बनाता है। यह भी सही है कि जैसे हर उत्पीड़क अन्दर से डरा होता है, उसी तरह पोर्नोग्राफ़र भी स्त्री की स्वतन्त्रता और यौनिकता से डरा होता है। विचित्र बात यह है कि पोर्नोग्राफ़ी के बारे में आशुतोष कुमार ने जो विश्लेषण किया है, उसी के हिसाब से देखें तो भी पोर्नोग्राफ़ी अपनी मूल प्रकृति से ही एक पुरुष वर्चस्ववादी स्त्री विरोधी फासिस्ट उपकरण है। इसे कला-विधा भी नहीं कहा जा सकता। यह बस एक स्त्री विरोधी आक्रामक सांस्कृतिक औजार है। 



विश्लेषण में काव्यात्मक अमूर्तन रचनाकार को पतली गली से निकल लेने का मौका देता है और आलोचक को यह अवसर देता है कि वह (1) रचनाकार का कोपभाजन न बने और (2) अवसरानुसार, अपनी बात का मनमाना भाष्य कर सके और करवा सके। आप चिन्ता न करें, ठोक वस्तुपरक विश्लेषण से निराला, शमशेर, मुक्तिबोध का वस्तुपरक मूल्यांकन (जो प्रायः सकारात्मक ही होगा) ही होगा, कुछ बिगड़ेगा नहीं। पाब्लो नेरुदा की कविताओं को लेकर भी आप बेकार ही चिन्तत हैं।
बहस में कातर ढंग से अपने कम ज्ञान की दुहाई का दिखावा करते हुए एक बॉक्स की टिप्पणी के जरिए कवि मदन कश्यप का टपक पड़ना भी कुछ अजीब ही लगता है। निहायत अधिभूतवादी तरीके से वे ज्ञान और तर्क को संवेदना से अलगाते हैं और डराते हैं कि कविता को यदि अंक भौतिकी की तरह हल करना चाहेंगे तो पता नहीं निराला, शमशेर और मुक्तिबोध की कितनी कविताओं का क्या होगा? यानि कविता का विश्लेषण कविता की भाषा में होना चाहिए (बतर्ज़, 'सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो') मदन कश्यप जी, कविता ही नहीं, शास्त्रीय संगीत के किसी पक्के राग या सिम्फ़नी का भी जब विश्लेषण किया जायेगा तो ठोस, वस्तुगत, विज्ञान की भाषा में ही किया जायेगा। विश्लेषण में काव्यात्मक अमूर्तन रचनाकार को पतली गली से निकल लेने का मौका देता है और आलोचक को यह अवसर देता है कि वह (1) रचनाकार का कोपभाजन न बने और (2) अवसरानुसार, अपनी बात का मनमाना भाष्य कर सके और करवा सके। आप चिन्ता न करें, ठोक वस्तुपरक विश्लेषण से निराला, शमशेर, मुक्तिबोध का वस्तुपरक मूल्यांकन (जो प्रायः सकारात्मक ही होगा) ही होगा, कुछ बिगड़ेगा नहीं। पाब्लो नेरुदा की कविताओं को लेकर भी आप बेकार ही चिन्तत हैं। प्रश्न यहाँ काम-भावना और यौन-आधारित बिम्बों का नहीं है। इनसे किसी को आपत्ति नहीं है। शालिनी की मूल आपत्ति पर गौर कीजिए। निर्वस्त्रता या यौन सम्बन्ध का चित्रण अश्लील या पोर्नोग्राफिक हो, यह ज़रूरी नहीं है। अश्लील (Indecent)* कामुक (sensual), ऐन्द्रिक (sensvous), कामोद्दीपक/रत्यात्मक (Erotic) और कामविकृति (Peruersity, perversion) में फर्क नहीं करेंगे तो कबाड़ा हो जायेगा। जो पोर्नोग्राफ़िक है वह अश्लील है, कामुक है और कामविकृत है। रत्यात्मक, स्थिति सापेक्षता के अनुसार सकारात्मक भी हो सकता है, नकारात्मक भी। और जो ऐन्द्रिकता है, वह स्वस्थ सौन्दर्यात्मक-कलात्मक मूल्य है। पाब्लो नेरुदा की कविताओं में, ज्यादातर, (हमेशा नहीं) यौनिकता, स्त्री शरीर, सम्भोग आदि के इंगित या प्रसंग स्वस्थ ऐन्द्रिकता के रूप में आते हैं और नेरुदा ही क्यों, होमर अफलातून, होरेस जुवेनाल और गोयठे से लेकर गोओर्ग वेयेर्त जैसे उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वहारा कवि तक के कृतित्व में यह स्वस्थ ऐन्द्रिकता मौजूद है। वेयेर्त के बारे में फ्रेडरिक एंगेल्स के इस विचार पर गौर कीजिए - 

"जिस चीज़ में वेयेर्त आचार्य हैं, जिसमें वह हाइने से ऊपर थे ( क्योंकि वे अधिक स्वस्थ और सच्चे थे) और जर्मन साहित्य में जिनका स्थान केवल गोयठे के एकदम बाद आता है, वह भी स्वाभाविक, स्वस्थ विषय-भोग तथा दैहिक वासना की अभिव्यक्त A Sozial-demokrat के बहुत से पाठक सहमे रह जायेंगे, अगर मैं Neue Rheinische Zeitung से कुछ व्यंग लेख पुनः मुद्रित कर दूँ परन्तु मैं इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता। परन्तु यह टीका किये बिना नहीं रह सकता कि जर्मन समाजवादियों के लिए वह वक़्त आना चाहिए, जब उन्हें इस अन्तिम जर्मन कूपमण्डूकीय पूर्वाग्रह को खुलेआम एक ओर फेंक देना होगा। यह झूठी निम्न-बुर्जुआ लज्जा तो गुप्त अश्लीलता के लिए केवल पर्दे का काम देती है। उदाहरण के लिए फ्रैलीगराथ की कविताओं को पढ़ते समय सचमुच यह सोचा जा सकता है कि लोगों के पास यौनांग ही नहीं हैं। परन्तु चुपके से कोई मसालेदार चुटकुला सुनने में किसी को इतना मज़ा नहीं आता था, जितना काव्य में इस घोर सतित्वधर्मी फैलीगराथ को। अन्ततः समय आ गया है कि कम से कम जर्मन मज़दूर इसके बारे में, जो वे स्वयं दिन या रात को करते हैं, प्राकृतिक, अपरिहार्य तथा निरपवाद रूप से आनन्दयोग्य चीज़ों के बारे मे उतनी ही स्पष्टता के साथ बातें करें, जितनी स्पष्टता के साथ रोमान्सभाषी जनगण करते हैं, तथा होमर और अफ़लातून, होरेस तथा जुवेनाल, पुरानी इंजील तथा Neue Rheinische Zeitung ने की।" 
                                                   (मार्क्स-एंगेल्स - 'साहित्य और कला', राहुल फाउण्डेशन, पृ-375) 



पवन करण और अनामिका की कविताएँ स्वाभाविक-स्वस्थ ऐन्द्रिकता और नैसर्गिक काम भावना की कविताएँ नहीं हैं। ये यौन-उत्पीड़न की विद्रोही प्रतिक्रिया या स्त्री के वस्तुकरण के प्रतिरोध की कविताएँ नहीं हैं। ये मनोरोगी और कामविकृत कविताएँ हैं जो ब्रेस्ट कैंसर के बहाने ब्रेस्ट पर रुग्ण उद्दीपक विमर्श प्रस्तुत करती हैं। एक जगह मर्द के शहद के छत्तों दशहरी आमों की जोड़ी में से एक खो गया, अमानत में खयानत हो गया है, दुखी क्षणों का शरण्य छिन गया है और स्त्री भी उदास है जिसके बारे में बातें सुनकर वह बौराती थी, आइने में जिसे देखकर झूमती थी और दोनों एक साथ अपने प्रेमी के मुँह में भर देने की सोचती थी , उसके देह से उनमें से एक के हट जाने से कितना कुछ हट गया है उनके बीच से। अन्त की कारुणिकता यदि मर्द-मानस पर चोट भी हो, तो भी यह तिनके की ओट बेकार है। पूरी कविता में प्याररत स्त्री भी अपने को लजीज़ गोश्त का टुकड़ा ही समझती रही है और मूल बात है कैंसर जैसे प्रसंग में एक बेरहम कामुक अंग-वर्णन और अनामिका की कविता में उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में लगे जालों, पहाड़ों में छिपी मौत की चुहिया, सर्जनी के प्लेट में खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से खिलन्दड़ा संवाद, दस बरस से पीछे पड़े बुलबुलों का फूटना, ब्लाउज के छिपे तकलीफ़ों के हीरों को निकाल बाहर करना- यह सारा कुछ एक मनोरुग्ण प्रलाप-सा लगता है। दरअसल, एक जबर्दस्त साहसी नारीवादी कविता गढ़ने के चक्कर में अनामिका ने न सिर्फ़ अन्तरविरोधी रूपकों-बिम्बों का जंगल खड़ा कर दिया है, बल्कि एक बेहद संवेदनहीन, असौन्दर्यात्मक, आत्मिक रूप से कंगाल 'सिंथेटिक' कविता बना डाली है। यहाँ भी उनका उत्तर-आधुनिक लोकवाद उपस्थित है। दूध भी वे दुनिया की सारी स्मृतियों को पिलाती हैं। स्मृतियाँ अतीत और परम्पराओं से जुड़ती हैं। कोई भविष्य-स्वप्न नहीं है उनके पास दूध पिलाने के लिए। राहत देने के लिए अन्तिम शरण्य फिर स्मृतियाँ ही हैं। इन कविताओं पर मेरी स्थिति कुल मिलाकर शालिनी माथुर, प्रभु जोशी, राहुल ब्रजमोहन और दरबारी लाल ('समयान्तर', सितम्बर, 2012) के साथ है, हालांकि मेरी और इन सभी टिप्पणीकारों की विचारधारात्मक अवस्थितियाँ अलग-अलग हैं। 


इन कविताओं और इनके (विशेषकर वामपन्थी पैराकारों के) तर्कों-वितर्कों को आज के उस देशकाल के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाना चाहिए जब चतुर्दिक पुरोगामी प्रवृत्तियों पर प्रतिगामी प्रवृत्तियाँ हावी हैं, यथास्थिति का ठहराव सड़ान्ध पैदा कर रहा है, मुक्ति की हर परियोजना को वर्चस्वकारी यूटोपिया बताकर खारिज किया जा रहा है, साहित्य में वामपन्थ के दायरे में भी नवरूपवादी क्रीड़ा-किल्लोल हो रहे हैं, अस्मिताओं के स्वयंस्फूर्त संघर्षों का महिमामण्डन हो रहा है, सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों को दृष्टओझल किया जा रहा है, "लोकवाद" के नाम पर प्राक आधुनिक व्यामोह परोसे जा रहे हैं, खाया-पिया-अघाया महानगरीय बौद्धिक समुदाय जनाकांक्षाओं के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है, अकर्मक विमर्श और खिलन्दड़ा सृजन कर्म हो रहा है। ऐसे में, व्यापक स्त्री समुदाय के जीवन, संघर्ष और स्वप्नों से कोसों दूर ऐश्वर्य द्वीप की निवासिनी विश्वविद्यालयी विदुषियाँ स्त्री देह में स्त्री प्रश्न का कीलन कर रही हैं, पाखण्डपूर्ण बुद्धिविलास कर रही हैं और साथ ही, "रसिक-जनों" का काफी मनोरंजन भी कर रही हैं। और जहाँ तक आज के उदीयमान-प्रतिभावान, प्रशंसित-पुरस्कृत, ज्यादातर वामपन्थी (वैसे आजकल वाम दक्षिण में और दक्षिण वाम में प्रतिष्ठित हो रहा है) युवा कवियों का सवाल है, अपने जीवन और कृतित्व में स्त्री को लेकर वे कितने "उग्र मुक्तिकामी" और "परम्पराभंजक" हैं, यह हिन्दी साहित्य प्रदेश के सुधी नागरिकगण जानते ही होंगे। 
*******
सम्पर्क - 
कात्यायनी, 
डी-68, निराला नगर, लखनऊ-226020 
मोबाइल नं. - 09936650658 
e-mail : katyayani.lko@gmail.com


Related Posts with Thumbnails