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सोमवार, 16 अगस्त 2010

क्या पुरुष अपने ‘समदुखी मीत’ की व्यथा कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

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औरत की दुनिया -


क्या पुरुष अपने ‘समदुखी मीत’ की व्यथा कथा समानुभूति से लिखेंगे ?
-  सुधा अरोड़ा  
      




mannu bhandari indore city bhaskar interview‘‘ साहित्य समाज का दर्पण है ’’ उक्ति घिस घिस कर पुरानी हो गई , पर साहित्य का समाशास्त्रीय  विश्लेषण  आज भी साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं बन पाया । साहित्य और समाजविज्ञान के बीच की इस खाई ने साहित्य और साहित्यिक समीक्षाओं को शुद्ध कलावादी बना दिया और समाजविज्ञान के मुद्दों को एक अलग शोध का विषय , जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं ।




हिन्दी साहित्य में महिला रचनाकारों की आत्मकथाएँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं । पुरुषवर्ग यह सवाल पूछता है कि लेखिकाएँ  अपनी आत्मकथाएँ  क्यों नहीं लिखतीं ? पर लिखी गयी आत्मकथाओं को इस या उस कारण से कटघरे में खड़ा करता रहता है।




हमारा भारतीय लेखक समाज काफी क्रूर और निर्मम है । बाहर बाहर से सहानुभूति जताता हुआ, यह एक लेखिका के पर कतरने को और उसके औरत होने के कारण जन्मे दुख, उसकी तकलीफ, उसकी व्यथा पर ठहाका लगाने की मंशा रखता हुआ, शातिर अंदाज में मंद मंद मुस्कुराता और व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करता है ।




Ek Kahani Yah Bhiहंस के मार्च अंक में ‘‘ आत्मा का आईना ’’ आलेख में वरिष्ठ समीक्षक मैनेजर पांडे ने बेहद उदारमना होकर मन्नू जी की किताब ‘ एक कहानी यह भी ’ की एक बेहतरीन विश्लेषणात्मक समीक्षा की है , लेकिन अंत तक आते आते उनकी आलोचकीय दृष्टि पर पुरुषवादी सोच ने धावा बोल दिया है। उनका एक लंबा पैराग्राफ है जिसमें मीता के प्रति गहरी समानुभूति से उन्होंने एक टिप्पणी दी है । वे लिखते हैं -


‘‘ इस कहानी में एक पात्र और उससे जुड़ा प्रसंग ऐसा है जिस पर अगर मन्नू परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती. वह पात्र है मीता, जो एक ओर राजेन्द्र यादव के बौद्धिक छल का शिकार हुई है तो दूसरी ओर मन्नू तथा राजेन्द्र के बीच तनाव और अलगाव का कारण भी है. मेरे सामने सवाल यह है कि क्या मीता के कुछ दुख-दर्द नहीं होंगे. अगर वे हैं तो उनकी चिंता किसी को नहीं है, न राजेन्द्र को और न मन्नू को. मन्नू तो एक स्त्री हैं और संवेदनशील लेखिका भी. यही नहीं, वे स्वयं राजेंद्र के छल से पीड़ित स्त्री हैं इसलिए उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे मीता की पीड़ा को एक समदुखिनी के दर्द को समझने और व्यक्त करने की कोशिश करतीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. मीता तो लेखिका नहीं है फिर उसके दुख दर्द की कहानी कौन कहेगा ? लगता है कि दूसरी असंख्य स्त्रियों की तरह मीता की पीड़ा भी अनकही रह जाएगी . ’’ (हंस: मार्च 2010 - पृष्ठ-54 ) 




इस पैराग्राफ में प्रश्नकर्ता का भी बौद्धिक छल उजागर होता है । वह लेखिका से उस विश्लेषण की माँग कर रहा है जो कृति का अभीष्ट है ही नहीं । हाल ही में मन्नू जी से एक पत्रकार ने साक्षात्कार लिया और `हंस'(मार्च) में प्रकाशित इस आलेख ‘ आत्मा का आईना ‘ के अंतिम पैराग्राफ पर उनकी राय पूछी । मन्नू जी ने कहा - ‘‘ जब मीता ने राजेंद्र जी से सारे सम्बन्ध तोड़ लिए थे, उनके सारे पत्र भी लौटा दिए थे, तो जैसे ही उसे पता चला कि वह मुझसे शादी कर चुके हैं, दोबारा वह उनकी जिन्दगी में दाखिल हो गई । अगर उसकी जगह मैं होती और राजेंद्र किसी और से शादी कर रहे होते या कर चुके होते मैं तो अपने को पूरी तरह उनसे काट लेती, उनकी जिंदगी में कोई दखल न देती और एक पत्नी का अधिकार छीन कर कभी अपना घर बसाने का सपना तो नहीं ही देखती । ’’ मन्नू जी की इस उक्ति से आप स्त्रियों की किस्मों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींच सकते हैं । इस विभाजक रेखा के दूसरी ओर पड़ी स्त्रियों का दुख उनके अस्तित्व का नहीं, उनकी आकांक्षाओं ( आज के संदर्भ में महत्वाकांक्षाओं ) का है जिसमें प्रेम या भावना से पैदा होने वाली पीड़ा-व्यथा का कहीं नामो निशान नहीं है । अगर कुछ है तो वह तहस नहस करने का एक त्रासजनित सुख है ।




‘ अन्या से अनन्या ' की लेखिका प्रभा खेतान क्या मीता नहीं हैं ? क्या उस ‘मीता’ की भरी पूरी आत्मकथा से अनकही मीताओं के तथाकथित दुख दर्द की भरपाई नहीं हो गई ? मन्नू जी ने तो फिर भी मीता के कोण से कई कहानियाँ  लिखीं - जिनमें ‘स्त्री सुबोधिनी’ , ‘एक बार और’ चर्चित भी हुईं क्योंकि उसकी स्थिति में कल्पना का पुट देकर कहानियाँ  लिखना ही उनके लिए संभव था । मीता के वास्तविक जीवन की न तो मन्नू जी को जानकारी थी, न वे उसके निजी जीवन से वाकिफ होना चाहती थीं तो वे आत्मकथा जैसी विधा में उसका क्या बयान करतीं - जो पूरी तरह सच और वास्तविकता पर आधारित होती है । जिस ‘व्यथा’ को हाईलाइट करने की बात हमारे वरिष्ठ समीक्षक करते हैं , शायद वे यह नहीं जानते कि यह मीता ‘तनाव’ का कारण जरूर थी पर ‘अलगाव’ का नहीं । मीता - चाहे वह जैसी भी हो - का एकवचन तो पत्नी स्वीकार करके जीवन के तीसेक साल गुजार देती है पर बहुवचन में ‘ मीताओं ’ को स्वीकार करना मुश्किल होता है ।




विडम्बना तो यह है कि इनमें से कुछ मीताओें के भी एक नहीं , कई मीत होते हैं । आज के समय में इन बहुवचन में ‘मीत’ पालने वाली ‘मीताओं’ का दुख दर्द कैसा ? अनकही पीड़ा का अर्थ क्या है ? यह अनकही पीड़ा-व्यथा किस किस्म के समीक्षकों को आलोड़ित करती है ? ऐसी मीताएँ पुरुषों  के ‘‘बौद्धिक छल का शिकार’’  नहीं होतीं, वे तो सबकुछ जानते समझते एक पिता और पति के दायित्व से पुरुष  को डिगा कर उसका प्रेमी के रूप में खुद शिकार करती हैं । इस शिकार में उसे न सिर्फ विवाहित पुरुष से प्रेम (!) करने का , बल्कि सिर्फ अपनी देह के तांडव के बूते पर एक समर्पित-समझदार-विदुषी औरत को उसके अधिकार से अपदस्थ और उसकी ‘स्पेस’ से बेदखल करने का दोहरा सुख शामिल हो जाता है जो उसे एक त्रासदी निर्मित करने का और संगति में विध्वंस करने का भी क्रूर त्रासजनित आनंद देता है । हमारे समीक्षकों के पास इन देहवादी ‘मीताओं’ को पहचानने की निगाह क्यों नहीं है ? समीक्षकीय दृष्टि की सारी स्पष्टता इस ‘मीता’ के संबंध पर आकर धुंधलके में क्यों बदल जाती है ?




संभवतः इसका कारण यह है कि हिन्दी साहित्य मीताओं से अंटा पड़ा है । आज के अधिकांश लेखकों- कवियों-समीक्षकों के जीवन में एक एक मीता है । ये सब मीताओं वाले पुरुष हैं - गाँव में जिनकी बेपढ़ी बीवियाँ या शहर में जिनकी पढ़ी लिखी बीवियाँ उनके बच्चों को बगैर किसी गिले-शिकवे के पाल रही हैं इसलिए अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर इन मीताओं के प्रति उनकी सहानुभूति का पलड़ा भारी है ।




हिन्दी साहित्य में पुरुष रचनाकारों ने भी आत्मकथाएँ लिखी हैं । क्या हमारे वरिष्ठ समालोचक पुरुष आत्मकथा लेखक से आग्रह करेंगे कि उनकी पत्नी का अगर कोई ‘मीत’ रहा है तो उस समदुखी ‘मीत’ की व्यथा कथा का वे संवेदनशीलता से बयान करें ? आखिर संवेदनशीलता सिर्फ महिलाओं की बपौती तो नहीं है न !




प्रभा खेतान की ‘‘अन्या से अनन्या’’ की काफी चर्चा हुई क्योंकि खुलकर उन्होंने विवाहित पुरुष से अपने प्रेम संबंध की चर्चा की । राजेंद्र जी ने भी प्रभा खेतान से अपनी मित्रता को सार्त्र और सिमोन के संबंधों के बरक्स रखा और एक साक्षात्कार में यह भी कहा - ‘‘ प्रभा खेतान मेरी बहुत इंटीमेट फ्रेंड रही हैं ।’’ ( 23 लेखिकाएँ और राजेंद्र यादव - पृष्ठ 85) .   मुझे हैरानी तब होती है जब मैं देखती हूँ  कि प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘‘अन्या से अनन्या ’’ के बारे में प्रकाशित  तमाम समीक्षाओं में, एक भी आलोचक ने यह सवाल नहीं उठाया कि सहजीवन निभाने वाले जिन अपने प्रेमी डॉ. गोपालकृष्ण सराफ के बारे में उन्होंने इतने विस्तार से लिखा है , वह संवेदनशील लेखिका जरा अपनी समदुखिनी - पाँच बच्चों की माँ, श्रीमती सराफ की पीड़ा, यातना के बारे में भी कुछ लिखतीं कि पति को अन्या के पास जाते देखकर उन महिला पर क्या बीतती होगी ? कलकत्ता के तमाम साहित्यकार ‘जन्नत की हकीकत’ जानते हैं पर जाहिर है , हमें सिर्फ उतना ही दिखाई देगा और उतना ही समझ में आएगा, जो शब्दों में कह दिया गया है । उस आत्मकथा में बस इतना ही जिक्र है कि डॉ. सराफ कहते हैं कि वह हर समय रोती रहती है, उसे तो रोने की आदत पड गयी है । ‘अन्याओं ’ से संबंध रखने वाले अधिकांश लेखक कवि कलाकारों की बीवियों को रोने की आदत पड़ जाती है जिससे बचने के लिए वे साइकिएट्रिस्ट के चक्कर लगाती हैं या एंटी डिप्रेसेंट दवाइयाँ खाती हैं । इनसे हमारे समीक्षक वर्ग का सरोकार नहीं है क्योंकि एक रोने-कलपने वाली, चिड़चिडी, बुझी हुई पत्नी कमोबेश सबके घरों में मौजूद है जो खुद तनाव और बीमारियों से ग्रस्त होते हुए भी, गैर जिम्मेदार पति को बख्शते हुए बच्चों समेत परिवार के दोनों पहियों को अपने मजबूत (!) कंधों पर यथासंभव भरसक खींचती चली जाती हैं । इसी श्रेणी में आती हैं मन्नू जी । मन्नू जी की किताब एक कहानी यह भी - जिसके बारे में भूमिका में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि यह किताब चौदह साल में टुकड़ों टुकड़ों में लिखी गयी । यह उनके जीवन की लेखकीय यात्रा है, आत्मकथा नहीं है और उन्होंने अपने निजी जीवन के प्रसंग खोलकर नहीं लिखे, एक पूरक प्रसंग भी उन्होंने एक संपादक के दबाव के तहत ही लिखा वर्ना वह उतना भी नहीं लिख पातीं , फिर भी समीक्षक ढिठाई से कहे चले जा रहे हैं कि मीता के बारे में वे परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती।.......




आज भारतीय समाज और जीवन में ही नहीं , साहित्य में भी मूल्य बदल रहे हैं । अनैतिकता हमें चौंकाती नहीं है, आकर्षित  करती है । उसका बयान हमें रोमांचकारी लगता है । दूसरे तमाम मुद्दों को दरकिनार कर , हम ललक कर उस किताब को पढ़ना चाहते हैं । साहित्य का प्रकाशक इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ है । मैत्रेयी की आत्मकथा का फ्लैप मैटर देखें -‘‘ मैत्रेयी ने डॉ. सिद्धार्थ और राजेंद्र यादव के साथ अपने संबंधों को लगभग आत्महंता बेबाकी के साथ स्वीकार किया है।’’ अंदर पूरी किताब का एक एक पन्ना पढ़ जाइए , आप उस ‘आत्महंता बेबाकी’ (!) को ढूँढते रह जाएँगे । इसके उत्तर में फरवरी 2009 के आउटलुक में राजेंद्र यादव की अपनी एक टिप्पणी पर्याप्त है -‘‘ मैत्रेयी ने मुझे कुछ जरुर जाना होगा पर लिखने में शायद वह भी चूक गई है । चूकने से ज्यादा कहना चाहिए कि वह छिपा गई है। वह जो इबारत में नहीं झाँकता, पर पीछे से झाँकता जरूर दिखता है। जाने उसने ऐसा क्यों किया ? ’’ ( आउटलुक: फरवरी 2009 - पृष्ठ - 75 )




आत्मकथा लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है -  अपने जीवन, बल्कि कहना चाहिए, अपनी व्यथा से, अपने झेले हुए से, एक दूरी बनाने की । आत्मकथा लेखन में सेल्फ सेंसरशिप - स्व प्रतिबंध - अपना अंकुश सबसे पहले सबसे आड़े आता है । भारतीय समाज में परिवार एक बहुत महत्वपूर्ण इकाई है । अगर हम सच बोल रहे हैं तो हमारे अपने परिवार के या करीबी लोग नाराज हो सकते हैं। तो मेरा मानना यह है कि इस तरह के प्रतिबंधों के बीच आत्मकथा नहीं लिखी जानी चाहिए । एक ईमानदार आत्मकथा तभी लिखी जा सकती है जब आप यह मानकर चलें कि आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा, सिवाय उन जंजीरों के जो समाज ने हमारे इर्द गिर्द जकड़ रखी हैं । 





जबकि वास्तविकता यह है कि एक औरत का अपनी आत्मकथा लिखना स्त्री सशक्तीकरण की ओर बढ़ता पहला चरण है । ईमानदारी इसकी पहली शर्त है । अपने जीवन को और अपनी कलम को महिमामंडित करने या अपने गुनाहों पर परदा डालने के लिए लेखकीय बुनावट के साथ शब्दों से खेलना , भाषा की कशीदाकारी करना और कला के कीमखाबी लिहाफ में अपनी करतूतों को सजा धजाकर प्रस्तुत करना आत्मकथा की विधा के मकसद को ही डिफ्यूज करना है । 




अंत में कुछ जरूरी बातें --

सबसे पहले मन्नू जी की इस पुस्तक ‘एक कहानी यह भी ’ को पढ़ते हुए यह स्पष्ट कर लिया जाना चाहिए कि यह पुस्तक दाम्पत्य के दैनंदिन के छलावों में मरती खपती एक ईर्ष्यालु स्त्री का सियापा नहीं, बल्कि इसमें एक स्त्री रचनाकार की बौद्धिक दृष्टि और उस दृष्टि का आलोक भी है जो एक ‘सामान्य‘ स्त्री का ‘रचनाकार’ स्त्री में कायांतरण करता है। दाम्पत्य के अलावा भी साहित्यिक और सामाजिक अंतर्विरोधों के कई मुद्दों को रचनात्मकता के पार्श्व में रखकर देखने की इस पुस्तक में वस्तुगत और निरपेक्ष कोशिश है । यहाँ स्त्री के किसी गोपन जगत को खोलकर लोलुप पाठकीय उपभोग के लिए किया गया मुआयना नहीं है बल्कि आत्मसजग भाषा में एक स्त्री रचनाकार के परिवेश की मार्मिक मीमांसा है । लेकिन इसका क्या किया जाए कि हिन्दी साहित्य में आलोचना क्षेत्र के अधिपतियों की आस्वाद ग्रंथि में जादुई यथार्थ ( मैजिकल रिएलिज़्म ) के बदले आभासी यथार्थ ( वर्च्युअल रिएलिज़्म ) का चस्का लग गया है। यह एक दुखद स्थिति है कि वे महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में प्रेम के पुराने त्रिकोण के रोमांच का अतिरेक में आख्यान सुनने की अपेक्षा रखते हैं और ऐसी तमाम मीताओं की मर्मकथा सुनना चाहते हैं ताकि बौद्धिक लंपटई का साहित्यीकरण कर सकें । पुरुष रचनाकारों की आत्मकथा में क्या उन्होंने किसी छूटे हुए प्रसंग या छूटे हुए पात्र को लाने की माँग कभी की,  जो लेखक की पत्नी का लंपट प्रेमी रहा हो ?





जहाँ तक संवेदनशीलता के साथ पीड़ा और दुख दर्द को व्यक्त करने का सवाल है तो वे तो क्रिमिनल्स - जघन्य अपराधियों - के भी हो सकते हैं तो इन मीताओं के क्यों नहीं ? मीताएँ बहुत हैं और उनकी आबादी में उत्तरोत्तर इजाफ़ा हो रहा है क्योंकि साहित्य के बाजार का विचार उनकी रचनात्मकता का राजमार्ग बन रहा है । यह मुद्दा अलग है और इस पर विस्तार से फिर कभी लिखा जाएगा । अभी सिर्फ इतना ही कि आत्मकथात्मक रचना से उस ब्यौरे की अनावश्यक  माँग  बार बार क्यों की जाती है जो उस रचना का अभीष्ट है ही नहीं ?

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1702, साॅलिटेअर, हीरानंदानी गार्डेन्स, पवई, मुंबई - 400 076 





गुरुवार, 11 जून 2009

सुगंधी की कहानी : उसकी ज़ुबानी (४)

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औरत की दुनिया



सुगंधी की कहानी : उसकी ज़ुबानी (४)

सुधा अरोड़ा
गतांक से आगे





बहरहाल , शराब की दूकान बंद करने के बाद वड़ा - पाव की गाड़ी शुरु की गई । कुछ लड़कों को साथ लेकर गाड़ी चलाई गई । लेकिन यह काम भी कुछ ही साल तक चल सका , क्यों कि वहाँ भी शराब पीकर झगड़ा , मार-पीट होती थी । एक स्थानीय गुंडे के साथ मारामारी की वजह से यह काम भी बंद हो गया । बाद में वह गुंडा वहाँ का नगरसेवक बना और कई साल बाद गैंगवार में मारा गया । अब फिर से बेकारी , वही शराब पीना , वही झगड़े ,वही घर में मारपीट .... पूरा घर आतंकित और सहमा - सहमा सा रहता ।


1982 के आते आते वड़ा पाव की गाड़ी बंद कर दी गई ।


इस दौरान फ्रांसिस का सीटू यूनियन ऑफिस में आना-जाना शुरु हो गया था । 1980 में विवेक मोंटेरो और फ्रांसिस की पहचान यूनियन ऑफिस में हुई । इसके बाद 1980 के दरम्यान विवेक मोंटेरो और उनके दो साथी जोसेफ पिंटो और पुरुषोतम त्रिपाठी हमारे घर के पास पचास कदम की दूरी पर मौजूद एक कमरे में किराए पर रहने लगे । ये तीनों साथ - साथ रहते थे । कभी - कभी विवेक के वैज्ञानिक दोस्तों या ट्रेड यूनियन के कामगारों की भी भीड़ वहाँ लग जाती थी । वैसे ये तीनों साथी ज्यादातर बाहर खाते थे पर कभीकभी हमारे यहाँ भी खाना खाने आ जाते थे । इसी वजह से पिंटो , विवेक मेरे बच्चों की पढ़ाई में मदद करते थे , जब घर में रोजाना होनेवाले झगडों, मार पीट की वजह से बच्चों को पढ़ने की और सोने की बहुत तकलीफ होती थी । मुझे हमेशा इस बात की चिंता लगी रहती थी कि कहीं मेरी तरह मेरे बच्चों को भी पढ़ाई बीच में छोड़नी न पड़े । ऐसे वक्त पर पिंटो और विवेक बच्चों को काफी राहत देते थे ।


मैं इस रोज - रोज की मार पीट और झगडों से तंग आ चुकी थी । हम दोनों के कलह से बच्चे बेहाल से हो जाते थे । जिन घरों में पति - पत्नी में कलह होता रहता है , मासूम बच्चे उसका सबसे बड़ा शिकार हो जाते हैं , उनके मानसिक विकास में अवरोध आ जाता है । बच्चों के लिये मेरा जी बहुत कलपता था ।दस बाई दस के छोटे से कमरे में बच्चों के सामने ही यह सारा धमाल चलता था ।


एक दिन जब फ्रांसिस ने मुझे बहुत मारा पीटा तो मुझे लगा कि इस अपमान से बेहतर है यहाँ से चले जाना या मर जाना । एक बार मैं बच्चों को साथ लेकर घर छोड़कर जाने को निकली तब जोसेफ पिंटो ने मुझे समझा - बुझाकर रोका । दूसरी बार मैने आत्महत्या करने के लिए अपने ऊपर केरोसीन छिड़क लिया । यह देखकर बच्चे घबड़ा गए और उन्होने जोसेफ पिंटो को बुलाया । पिंटो ने आकर मुझे फटकारा , समझाया बुझाया और इस तरह वह हादसा टल गया ।


आज जब अपने पतियों की हिंसा की शिकार औरतें मेरे पास मदद के लिये आती हैं तो मुझे मार खाकर एक कोने में सिकुड़कर आँसू बहाते अपना चेहरा याद हो आता है । मैं इन औरतों को यही समझाती हूँ कि जब पहली बार पति मारने के लिए हाथ उठाए , तभी प्रतिरोध करना सीखो । पहली बार, दूसरी बार अगर औरत चुपचाप पिटाई बर्दाश्त कर लेती है तो वह रोज़ाना की हिंसा के लिए दरवाजे खोल देती है ।


>>
क्रमशः


आगामी अंक में ---
एक बार फ्रांसिस ने हमारी बेटी ज्योति - जो दसवीं का इम्तहान देकर लौटी थी, को किसी छोटी सी बात पर मेरे सामने इतनी जोर से मारा कि वह फर्श पर गिर गई और बेहोश हो गई । अब तक मैं अपने बच्चों की वजह से अपने शरीर पर मार झेलती थी , बर्दाश्त करती थी । पर बेटी का वह हाल देखकर मुझ.....




मंगलवार, 26 मई 2009

औरत की दुनिया (३)

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औरत
की दुनिया



सुगन्धी की कहानी : उसकी जुबानी

सुधा अरोड़ा





गतांक से आगे


मेरी सास को हिंदी बिल्कुल नहीं आती थी और मुझे तमिल भाषा का ज्ञान नहीं था । हम दोनो घर में इशारों से एक दूसरे को अपनी बात समझाते और समझते थे , लेकिन मैं एक-डेढ़ साल में अच्छी तरह से तमिल बोलना सीख गई । अब तो मैं थोड़ा बहुत तमिल पढ़ भी लेती हूँ । फ्रांसिस के साथ शादी के बाद मेरे घरवालों ने चोदह साल तक मुझसे कोई संबंध नहीं रखा । वैसे फ्रांसिस के तमिल समाज में भी दहेज का चलन था । उस समाज में आनेवाली बहू के साथ भारी दहेज की उम्मीद रखी जाती थी । मैं तो अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं आई थी । इधर फ्रांसिस के पिता भी कर्ज में डूबे थे । बावजूद इसके उन्होंने मेरे साथ हमेशा बहुत अच्छा बर्ताव किया ।



एक साल के भीतर मैने एक बेटी को जन्म दिया और पाँच साल में मैं तीन बच्चों की माँ बन गई । कुर्ला में रहते वक्त ही मुझे पता चल गया था कि फ्रांसिस शराब का आदी है । लेकिन क्या करती ? कहाँ जाती ?अब तो वापस लौटना नामुमकिन था । मेरी कोई सहेली या परिचित कोई भी ऐसा नहीं था जिससे मैं अपनी तकलीफ बाँट पाती !



अपनी मर्जी से शादी करनेवाली लड़कियों के साथ अक्सर ऐसी परेशानियाँ आती हैं । ऐसी शादियाँ सफल रहीं तो ठीक है । लेकिन अगर कोई समस्या उठ खड़ी हो , परिवार में झगड़े झमेले होते रहें , अलगाव या तलाक की नौबत आ जाए तो ऐसी जुल्म की मारी औरतों का कोई ठिकाना नहीं रहता । अगर लड़की अपने माँ - बाप से मदद या सहारा माँगती है तो उसे जवाब मिलता है कि अपनी हालत के लिए तुम खुद जिम्मेदार हो । तुमने हमसे पूछकर तो शादी नहीं की । इसलिए अपने किये का नतीजा खुद भुगतो । पति से झगड़ा , सास - ससुर का दुराव और माता - पिता का कोई आसरा नहीं । ऐसे में वो क्या करे ? उसकी स्थिति ‘ न घर की न घाट की ’ वाली हो जाती है । दूसरी तरफ अगर माँ - बाप की मर्जी से , उनके द्वारा चुने गए लड़के के साथ शादी करने पर भी इसी तरह की समस्याएँ उठ खड़ी हों तो यही माँ - बाप कहते हैं कि हम क्या करें ? उसकी तो किस्मत ही खोटी है । इस तरह औरत पर दो तरफा मार पड़ती है । दोनो ही स्थितियों में जिम्मेदार वही ठहरायी जाती है ।



1975 में जब मेरा तीसरा बच्चा पैदा हुआ , फ्रांसिस देवीदयाल कंपनी में काम करते थे । यूनियन का लीडर होने के कारण उन्हें काम पर से निकाल दिया गया । अब हमारी माली हालत और भी बिगड़ गई । मेरे पति पहले भी पीते थे पर अब काम न होने पर शराब पीना जैसे रोज की बात हो गई थी । नौकरी छूट जाने के बाद फ्रांसिस की बेरोजगारी का दौर शुरु हो गया और घर में जरुरी चीजों का भी अभाव रहने लगा । तनाव के इन दिनों में रोज घर में मारपीट - झगड़ा होने लगा । शुरु - शुरु में फ्रांसिस को मारपीट करना बुरा भी लगता था । वो पछताता भी था । मुझसे माफी माँग लेता और मुझे खुश करने के लिए खुद खाना बनाकर मुझे खिलाता । लेकिन लम्बे अरसे तक बेरोजगार रहने से , उसमें निराशा और कुंठा बढ़ती गई ।



नौकरी छूटने के बाद से ही वह काम धंधे की खोज में लगातार जुटा रहता था , लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पाई । उसी की कोशिश का नतीजा था 1982 में होटल की शुरुआत , जो बाद में हमें चलाना पड़ा । होटल चलाने में सुबह 5 बजे से लेकर रात 9 बजे तक काम होता था । उसमें ज्यादा कमाई न हो पाने से खीझ उठना और होटल की कमाई में से शराब पीना चलता रहता था । इन सब कमजोरियों के बावजूद फ्रांसिस बच्चों को बहुत प्यार करता था । उनकी जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करना, विभाग में रहनेवाले लोगों की मदद करना उसका स्वभाव था । अपने घर में खाने को हो या न हो , फिर भी दूसरों को मदद करने में वह आगे रहता । लेकिन लम्बे अरसे तक बेरोजगार रहने से , उसमें निराशा और कुंठा बढ़ती गई ।



किसी भी तरह की नौकरी न मिलने के कारण उन्हीं दिनों फ्रांसिस ने शराब बेचना शुरु कर किया । मैने इसका बहुत विरोध किया , पर मेरी एक न चली । कुछ दिनों तक फ्रांसिस ने बाहर कहीं शराब बेचनी शुरु की , लेकिन वहाँ झगड़ा - टंटा होने लगा । तब फ्रांसिस ने घर में ही शराब बेचना शुरु कर दिया । शराब बेचना एक ऐसा काम था जिसके लिए मेरी आत्मा कभी गवाही नहीं देती थी । इसका नतीजा यह हुआ कि मेरा विरोध बढ़ता गया । मैं जितना विरोध करती , उतनी ही मुझे मार पड़ती । मैं फ्रांसिस को भला - बुरा कहती , उसे ताने मारती , वो और भी भड़क उठता । नतीजा - ज्यादा शराब पीना , जमकर मारना पीटना । यह वो दौर था जब मैं रोजाना फ्रांसिस से पिटती थी । घर में शराब बेचने का आलम यह था कि ज्यादातर शराब खुद फ्रांसिस और उसके यार दोस्त मुफ्त में पी जाते थे । फ्रांसिस की गैर मौजूदगी में कभी - कभी मुझे मन मारकर ग्राहकों को शराब देनी पड़ती थी । बहुत लड़-झगड़ कर , मार खाकर किसी तरह एक - दो साल में शराब बेचने का क्रमशः बंद करवाया ।





क्रमशः


सोमवार, 30 मार्च 2009

औरत की दुनिया ( सुगंधि की कहानी - उसकी जुबानी )

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औरत की दुनिया


गतांक से आगे



सुगंधि हों या सखूबाई - दोनों ने अपने जीवन के शुरुआती कठिन समय में किए गए अपने संघर्ष से सबक लिया और दूसरी औरतें उनकी तरह की त्रासदी का शिकार न बनें , इसके लिये अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया । अपने जीवन के अंधेरों से जूझने के बाद आज वे दूसरी अनेक महिलाओं के जीवन में आए अंधेरों को रोशनी में बदल रही हैं । इस रोशनी और हरियाली को देखकर पाब्लो नेरूदा के शब्दों को दोहराने का मन होता है - ‘‘ पेड़ क्यों अपनी जड़ों का वैभव छिपाते हैं ? ’’ इन ‘ जड़ों ’ से और जड़ों के त्रासद ‘वैभव’ से पाठकों का परिचय करवाने के लिए इस बार प्रस्तुत है - सुगंधि और सखूबाई की संघर्ष कथा ।


पुनश्च: बेबी हालदार के उपन्यास ‘ आलो आंधारि ’ और सोना चैधरी के उपन्यास ‘ पायदान ’ की ही लीक पर इन दोनों संघर्ष कथाओं का विवरण भी बिल्कुल सीधा - सहज और सपाट है । भाषा और शिल्प से समृद्ध रचनात्मक साहित्य के पाठकों को हो सकता है यह दोनों कथाएं एक ‘ पैबंद ’ की तरह लगें । जो फर्क एक कलात्मक फिल्म और वृत्तचित्रा में होता है , संभवतः वही फर्क एक साहित्यिक रचना और सामाजिक कार्यकर्ता की संघर्ष कथा में है । रचना में कलात्मकता की अपेक्षा रखनेवाले पाठकों को संभवतः इन दोनों आत्मसंघर्ष कथाओं में कथ्य की सपाट बयानी अखर सकती है । ज़रूरत लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता के बीच की खाई को पाटने की है । दिल्ली की एक प्रतिष्ठित संस्था ‘‘ जागोरी ’’ ने पिछले वर्ष लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाकर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित की थी । ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है ।



सुगंधि की कहानी - उसकी जुबानी
प्रस्तुति - सुधा अरोड़ा






मेरा जन्म गढ़वाल (आज के उत्तरांचल राज्य ) के एक छोटे से गाँव में 1952 में हुआ । रिखणीखाल नाम का यह गाँव कोटद्वारा से एक घंटे के रास्ते पर पहाड़ी पर स्थित हैं । वहाँ से कपड़े और बर्तन धोने के लिए भी नीचे नदी तक आना पड़ता था । वहाँ पर साठ सत्तर घर ही होंगे जो ज्यादातर खेती ही करते हैं । कुछ के बच्चे मिलिट्री में हैं तो कुछ रोटी - रोजी की तलाश में मुंबई आ गए ।



बचपन की एक घटना मुझे अब तक याद है - जब मैं छः साल की थी तो अक्सर अपनी मौसी के यहाँ रहनेजाती थी । उनका घर ऊँची पहाड़ी पर था । उस इलाके में रोज भालू आया करते थे । ये भालू बच्चों को उठाकर ले जाते थे । भालू के आतंक से बचने के लिए मेरी मौसी घर के दरवाजे पर अंदर से बहुत बड़ा पत्थर रख देती थी । यह पत्थर इतना भारी होता था कि हम सभी बच्चे और मौसी मिलकर उस पत्थर को लुढ़काकर दरवाजे तक ले आते थे । उसके बाद मौसी हम छोटे बच्चों को एक - एक टोकरी में बंद कर खाट के नीचे टोकरी को खिसकाकर रख देती थी । खाट के चारों तरफ चादर लटका देती थी ताकि टोकरियाँ भी दिखाई न दें । हम सभी बच्चे उसी टोकरी में दुबके दुबके सो जाते थे । और यह रोज की बात थी ।


पहाड़ी इलाके में छः साल रहने के बाद 1958 में जब हम मुंबई आए तो यहीं के होकर रह गये । मेरे पिता मोटर गैरेज में फिटर मैकेनिक थे । मै भांडुप के हिंदी स्कूल में पढ़ने लगी । मुझे याद है जब मैं आठवीं कक्षा में थी तब पहली बार मुझे माहवारी हुईं । स्कूल वालों ने मुझे घर भेज दिया । जब मेरी माँ को इस बात का पता चला तो उन्होने मुझे घर के भीतर घुसने ही नहीं दिया । मुझे बाहर ही बिठा कर रखा । मुझे बड़ा अजीब लगा । उन्होंने कहा - पिताजी के ऊपर देवता आता है और मुझे चेतावनी दी गई कि इसके बाद जब भी तुम्हें माहवारी हो सारे काम छोड़कर घर के बाहर रहना पड़ेगा । इस झंझट से बचने के लिए मैं अपनी माँ को माहवारी की बात बताती ही नहीं थी । उन तीन दिनों में लड़की को बिल्कुल अछूत की तरह दहलीज़ के बाहर चटाई पर बिठा दिया जाता था । आज भी कई परिवारों में ऐसा ही रिवाज है ।



मैंने जैसे - तैसे आठवीं तक पढ़ाई पूरी की । इसके आगे मैं पढ़ न सकी क्यों कि सबसे बड़ी लड़की होने के नाते घर के काम - काज में माँ का हाथ बँटाना पड़ता था । मुझसे सोलह साल छोटी बहन आनंदी तभी पैदा हुई थी और माँ का ऑपरेशन हुआ था इसलिए घर में चार छोटी बहनों और एक भाई की जिम्मेदारी मुझपर आ पड़ी ।



मुंबई के भांडुप इलाके के जिस घर में हम रहते थे , वहाँ नल नहीं था । पानी बाहर से भरकर लाना पड़ता था । सबसे बड़ी होने के कारण पानी के हंडे सिर पर उठाकर लाने का काम मेरे जिम्मे था । कम से कम डेढ़ दो सौ लिटर पानी रोज़ लाना पड़ता था । सिर पर पानी के हंडे लगातार रखने के कारण कई सालों तक मेरे सिर पर तालू की जगह घिस गई थी और वहाँ बाल उगने बंद हो गये थे । बहुत बाद में जब मैंने पानी लाना छोड़ा तब मेरे सिर पर तालू वाली बीच की जगह पर बाल उगने शुरु हुए ।



पिताजी का काम काज अच्छा चलता था । उन दिनों उनके पास कुछेक लड़के काम सीखने आते थे । उन्हीं में से एक था फ्रांसिस , जो तमिलनाडु का रहनेवाला था । हम दोनों में पहचान हुई और धीरे धीरे हम एक दूसरे को चाहने लगे । मेरे घर में जब इस बात का पता चला तब घरवालों ने तुरंत मेरी मंगनी अपनी बिरादरी के एक गढ़वाली आदमी से कर दी , जो मुझसे नौ साल बड़ा था । मेरी इच्छा के बगैर मंगनी कर दी गई । जब शादी का समय आया तो मुझे लगा कि मैं उससे शादी नहीं करना चाहती । अपनी मर्जी से शादी के लिए मैने घर छोड़ दिया ।



1970 में शादी के बाद मैं और फ्रांसिस कुर्ला में रहने लगे । तीन - चार महीने के बाद जब सब कुछ ठीक ठाक हो गया तब फ्रांसिस के माता - पिता हमें भांडुप में अपने घर में ले आए । वे मुझे बहुत मानते थे । फ्रांसिस के पिता ने तो शादी के समय ही मुझसे कहा कि तुम यहाँ क्यों चली आई , यह लड़का तुम्हे संभाल नहीं पाएगा ।



बचपन में मेरा नाम पवित्रा था । मैं ठाकुर परिवार की हिंदू लड़की और फ्रांसिस तमिल परिवार का ईसाई । शादी के बाद मुझे चर्च में जाकर अपना धर्म बदलना पड़ा । मुझे नया नाम ‘ सुगंधि ’ दिया गया । सब के साथ मुझे अक्सर रविवार की प्रार्थना ( संडे मास ) के लिए चर्च जाना पड़ता था । मैं बस अपने सास - ससुर का मन रखने के लिए चर्च चली जाती थी ।

क्रमशः




गुरुवार, 19 मार्च 2009

औरत की दुनिया : सुधा अरोडा

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औरत की दुनिया



औरत की दुनिया स्तम्भ का प्रथम भाग २७ फरवरी को आपने पढा था। इसे दुहराने की आवश्यकता नहीं कि इस स्तम्भ को हिन्दी की सम्मानित वरिष्ठ कथाकार सुश्री सुधा अरोड़ा (औपचारिक परिचय गत अंक में देखें) द्वारा लिखा जा रहा है।


गत अंक में सुगंधि व सखुबाई की संघर्षगाथा का प्रथम आमुख आपने पढ़ा। इस बार उस गाथा का उत्तर आमुख आप सुधा जी की कलम से यहाँ पढ़िए व अपने मित्रों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिए। आगामी अंक में क्रमशः दोनों की आत्मकथाएँ सम्मिलित की जाएँगी.

- कविता वाचक्नवी



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गतांक से आगे






- दस बाई दस के कमरों से खेत खलिहानों तक : सुगंधि और सखूबाई की संघर्ष कथा -






सखूबाई गावित महाराष्ट्र में डहाणु तालुका के मेगपाड़ा बांदघर गाँव की एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता हैं । पिछले दस वर्षों से वे ‘ कष्टकरी संघटना ’ के साथ काम कर रही हैं । यह संगठन छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के हित के लिए कार्य करता है । सखूबाई की प्रेरणा और प्रयास के कारण ही इस संगठन ने गाँव में अपनी एक जगह बनायी है ।



भारत के गाँवों कस्बों में आज भी प्रताड़ना का सिलसिला जारी है। किसी भी औरत को चुडैल या डायन घोषित कर उसके साथ मनमाना सुलूक किया जाता है। इसमें कई बार गाँव की दूसरी औरतें भी शामिल हो जाती हैं। ऐसी औरतें जिन्हें उस औरत से कोई ज़ाती नाराजगी या पुराना बैर हो । कुछ औरतें तमाशा या हिंसा देखने के लिहाज से जमा हो जाती हैं। फिल्मों में जैसी हिंसा, तोड़ फोड़, मारपीट दिखाई देती है, रोजमर्रा की वास्तविकता में उसे सामने घटते हुए देखना भी एक विचित्र परपीड़न को पोसता है ।



इस तरह की घटनाओं में कई बार ‘ डायन ’ औरत को पीट पीट कर उसकी हत्या भी कर दी गयी है। लेकिन हर बार हत्यारे छूट जाते हैं क्योंकि हत्यारा कोई एक नहीं, पूरा समूह होता है और गाँव की व्यवस्था उसे सहमति देती है ।



सखूबाई इसके पीछे के कारणों की जाँच में कुछ तथ्यों को सामने रखती है, ‘मुझे भी किसी दिन मौका मिलते ही ये लोग ‘ चेटकीण ’ (चुड़ैल) बता देंगे । मुझे दबाने के लिए दूसरों को भी भड़काएंगे ! ’ सखूबाई कहती है, ‘ ऐसी औरतें जो मजबूत हैं, जो अपने हक के लिए लड़ती हैं, उन्हें ‘ चेटकीण ’ बुलाने का मौका ढूँढते हैं ये लोग ! ’



औरत को डायन ठहराने के पीछे के कारणों की खोज करें तो कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य हाथ लगते हैं । महाराष्ट्र के कैनाड गाँव में एक जमीदार ने एक ऐसी औरत को डायन कहकर प्रचारित कर दिया जिसके आदमी की उन्हीं दिनों मौत हुई थी और उसे उसकी जमीन उसकी विधवा के नाम करनी थी। जमीदार ने कहा कि यह डायन अपने पति को खा गई , इसे गाँव से बेदखल करो। ऐसी विधवा औरतें जिनके बच्चे छोटे छोटे हैं, जिन्हें जमीन अपने नाम करवानी है , उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल करने के लिए उनके बारे में अफवाह फैला दी जाती है कि वे जादू टोना करती हैं । उनके ही पति की मौत की घटना को उन्हें डायन ठहराने के साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है । संयोग से अगर उस दौरान गाँव के किसी भी बच्चे की किसी भी हारी बीमारी से मौत हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी सीधे उस औरत पर डाल दी जाती है, जिसे डायन घोषित कर कुछ लोगों का स्वार्थ सधता है और गाँव के अधिकांश लोग झट इस तरह की घटना को डायन के कारण आई आपदा मानकर अपनी तार्किक बुद्धि को ताक पर रख उस औरत की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं ।



गाँव की किसी भी औरत को उसकी जमीन से बेदखल करने के लिए सबसे आसान तरीका उस जमीन पर कब्जा पाने वाले लोगों को यही लगता है कि काँटे को किसी न किसी बहाने से जड़ से ही उखाड़ डालो। कोर्ट कचहरी के चक्कर में बरसों निकल जाते हैं और हासिल कुछ नहीं होता, वकीलों को घूस देनी पड़ती है फिर भी जमीन हाथ में आने की गारंटी नहीं होती । इसलिए सुनियोजित साजिश को अंधविश्वास का जामा पहना कर गाँव वालों को अपने पक्ष में कर लेना उनके लिए आसान सिद्ध होता है क्योंकि गाँव के लोगों में इस ‘अंधविश्वास’ की जड़ें गहरे तक धँसी हुई है और अंधविश्वास को कोई पुलिस या व्यवस्था बदल नहीं सकती ।



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क्रमश:



- सुधा अरोड़ा




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