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रविवार, 6 अक्टूबर 2013

नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE

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नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE   :   कविता वाचक्नवी


नवरात्रों की इस अवधि में, जबकि सदा की भांति कल भी मैंने स्त्री के वन्दनीया होने और उसे समाज में वन्दनीया का स्थान देने की बात लिखी थी, आज पुनः एक उक्ति याद आ रही है - 
"माता निर्माता भवति"। 


बहुधा लोग इसका अर्थ यह लगाते हैं कि माँ सन्तान / व्यक्ति की निर्माता होती है। जबकि यह पूरा सत्य नहीं है। पूरा सत्य यह है कि माँ के रूप में स्त्री परिवार, समय, समाज, देश, भविष्य, जीवन, राजशाही और सब कुछ की निर्माता होती है। घर व समाज में जिस अनुपात में स्त्री के साथ अन्याय, निरादर व असमानता बढ़ेगी उसी अनुपात में क्रमशः समाज का विध्वंस व विनाश सुनिश्चित है।

इसी प्रसंग में आज कवि William Ross Wallace (1819 – May 5, 1881) की एक ऐतिहासिक कविता स्मरण आ रही है। आप सब भी इस अमूल्य कविता का आनन्द लें, प्रेरणा लें।



THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE IS THE HAND THAT RULES THE WORLD.

      BLESSINGS on the hand of women!
        Angels guard its strength and grace.
      In the palace, cottage, hovel,
          Oh, no matter where the place;
      Would that never storms assailed it,
          Rainbows ever gently curled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Infancy's the tender fountain,
          Power may with beauty flow,
      Mothers first to guide the streamlets,
          From them souls unresting grow—
      Grow on for the good or evil,
          Sunshine streamed or evil hurled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Woman, how divine your mission,
          Here upon our natal sod;
      Keep—oh, keep the young heart open
          Always to the breath of God!
      All true trophies of the ages
          Are from mother-love impearled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Blessings on the hand of women!
          Fathers, sons, and daughters cry,
      And the sacred song is mingled
          With the worship in the sky—
      Mingles where no tempest darkens,
          Rainbows evermore are hurled;
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

स्त्रीपक्षीय कविता के तेवर : 'कविता का समकाल'

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स्त्रीपक्षीय कविता के तेवर 
'कविता का समकाल'
- ऋषभ देव शर्मा


कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500 
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745
कविता के सामाजिक सरोकार का दायरा बड़ा व्यापक है। वह मानवजाति के प्रत्येक प्राणी की चिंता करती है। ऐसे में वह किसी समूह को हाशिए पर छोड़कर नहीं चल सकती। बल्कि हाशिए पर छूटे हुओं को फोकस में लाए बिना वह अपने सरोकार की व्यापकता को सिद्ध नहीं कर सकती। इसीलिए आज की कविता स्त्री और दलित से लेकर जल और पृथ्वी तक की चिंता करती है। इन सबकी उपेक्षा जो की जाती रही, उसकी कुछ तो भरपाई इस तरह हो सकती है। स्त्री को वस्तु बनाकर मनुष्य होने के अधिकार तक से वंचित कर दिया गया, यह मानव इतिहास की सच्चाई है। स्त्रीपक्षीय कविता इसीलिए स्त्री के मनुष्य होने को रेखांकित करती है। यह कविता न तो अनिवार्यतः केवल स्त्री रचनाकारों द्वारा रची गई है और न पुरुषविरोधी ही है। यह तो स्त्री के मानव अधिकारों के लिए आवाज उठानेवाली कविता है। निस्संदेह इस आवाज में स्त्री रचनाकारों का स्वर अग्रणी और प्रखर होना ही चाहिए। 


उल्लेखनीय है कि किसी रचना में निहित बेहतर मानवीय सरोकारों को लेकर हस्तक्षेप करने की काबिलीयत उसके स्त्रीपक्षीय होने की मूलभूत ज़रूरत है। भारतीय स्त्री के संबंध में गढ़े गए मिथों के संदर्भ में स्त्रीपक्षीय चिंतन का मानना है कि ‘नारी की भावशुद्धि‘ की लंबी गाथाएँ पुरुषनिर्मित सीमित मनोकामनाओं का परिणाम हैं। इसी का परिणाम है कि साहित्य में गंभीर स्त्री अंकन जितना कम मिलता है, लाजवंती देवियों की भरमार उतनी ही अधिक है। ऐसी स्थिति का खुलासा करती हुई स्त्रीपक्षीय कविता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि घरेलू औरत सिर्फ रोटी नहीं बेलती, यदि उसे समाज चलाने और राष्ट्रनिर्माण का अवसर दिया जाए तो वह अपनी योग्यता प्रमाणित कर देगी और कर भी रही है। (प्रमीला के. पी., औरत की अभिव्यक्ति एवं आदमी का अधिकार, 2004) 


स्त्रीमुक्ति को प्रतिसंस्कृति की पहल बताते हुए लेखिका ने यह प्रतिपादित किया है कि हाशिए में अवस्थित स्त्रियों, बच्चों, मजदूरों, दलितों और प्रवंचितों की विभिन्न प्रकार के अधीशत्व से मुक्ति स्त्रीमुक्ति की चरमपरिणति होगी और इसके लिए स्त्रीपक्षीय कविता का संदेश है - 

‘‘मनुष्यता की रक्षा के लिए 
कहना नहीं, सहना तुरंत बंद कर देना होगा।"
                                               (कात्यायनी

स्त्रीकविता के तेवर का यह बदलाव काव्यभाषा के स्तर पर भी दिखाई देता है। इतिहास और परंपरा के हाथों निर्मित सभी भाषाओं में अधीशत्व के लक्षण पाए जाते है। इसीलिए स्त्री भाषा की माँग लिंग-समस्या की अपेक्षा अधिकारों के विनिमय के प्रश्न पर केंद्रित है। स्त्रीकविता इसीलिए प्रभुत्व की भाषा के स्थान पर कर्म की भाषा का विकास कर रही है जिसमें पुरुषवर्चस्ववादी यौन चुटकियों से आक्रांत अभिव्यक्ति को किनारे करके अभी तक अनकहे शब्दरूपों का चयन करने की प्रवृत्ति सामने आ रही है। इस प्रतिभाषा के निर्माण से असली संस्कृति का इजाफा हो रहा है, इसमें दो राय नहीं। 


इस संदर्भ में कुछ कविताओं की चर्चा भी यहाँ अपेक्षित है। ‘थपक थपक दिल थपक थपक‘ (2003 ई., राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110 002) की कविताओं में गगन गिल का स्वर मनुष्यता की ही चिंताओं से अनुप्रेरित है। उन्होंने विषय और भावों से लेकर भाषा और लय तक के चयन में इस कृति के गीतों में नई ज़मीन तोड़ी है। इन रचनाओं की सहजता, वेगशीलता, लोक संस्कृति के प्रति प्रीति, गाँव और प्रकृति की उन्मुक्तता, जूझते रहने की ज़िद तथा जीवन की ऊष्मा हिंदी की स्त्रीकविता के तेवर को परिपुष्ट करने वाली हैं। इस कथन को प्रमाणित करने के लिए ‘निचुड़ा-निचुड़ा‘ को देखा जा सकता है:- 

‘‘निचुड़ा निचुड़ा दिल था री माँ! 
मैला मैला डर था री माँ! 
माथा टुकता काग था री माँ! 
नीला हो गया साँस था री माँ!
 xxx
सूँघा सोती को नाग ने री माँ! 
ले गया वो मेरा श्वास था री माँ!
xxx 
अटक गया मेरा प्राण था री माँ! 
घुमड़ रुकी हर बात भी री माँ!
xxx 
जलता जलता ज़हर था री माँ! 
ऐंठ मुड़ी मेरी आँत थी री माँ! 
जड़ उखड़ गया मेरा मन था री माँ! 
कुचला गया जो एक साँप था री माँ!‘‘ 

गगन गिल की स्त्री का यह निचुड़ा निचुड़ा दिल अपनी अनिवार्य नियति से वाक़िफ है लेकिन अब अकेले रास्ते पर वापस लौटना संभव नहीं। खोल से बाहर निकलते ही नोंचने वाले पंजों, नाखूनों और डंकों के अनुभव के बाद तो शेर के पेट में चलते चले जाना भी मानो आसान हो जाता हो -

‘‘जाऊँ हूँ जी जाऊँ हूँ 
रस्ते अकेले पे 
लौटे बिना ही कहीं 
दूर चली जाऊँ हूँ 
चुप हूँ जी बहुत चुप 
चाबी फेंक ताले बंद 
सुख में है अपना जी 
भटका करे था बहुत 
बच गई जी बच गई 
किसी घने दुख से 
बच गई 
देखा भले न था 
खोल से गुपचुप बाहर 
उसमें भी नोंच दें थे 
पंजे, नाखून और डंक 
दुनिया बुनिया का क्या जी 
मैल थी, मलाल थी 
आरी चलाती जी पे 
जी का जंजाल थी 
जाऊँ हूँ जी जाऊँ हूँ 
बीहड़ निराले में 
शेर के पेट में ही 
बैठी दूर जाऊँ हूँ।‘‘ 


लोकप्रतीकों और लोककथाओं से अभिव्यक्ति का नया तेवर प्राप्त करती हुई स्त्रीकविता स्त्री के लिए मानव अधिकार का सवाल ज़ोर देकर उठाती है। ‘मैं चल तो दूँ‘ (2005 ई.,सुमन प्रकाशन, सिकंदराबाद -500 025) में संकलित कविता वाचक्नवी की कविताएँ भी इसकी पुरज़ोर गवाही देती हैं। इसमें संदेह नहीं कि कविता वाचक्नवी व्यापक मानवीय सरोकारों वाली कवयित्री हैं। उनके कविता संग्रह में रिश्तों के छीजते जाने की कसक है, प्रणय की सुखद अनुभूतियाँ हैं, एकाकीपन से उपजनेवाले अवसाद का दंश है, सामाजिक विसंगतियों का खुलासा है, उपभोक्तावाद और उत्तर आधुनिकता पर व्यंग्य है, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मुद्दे हैं, युद्ध से उपजा असुरक्षाभाव और आक्रोश है और साथ ही हैं प्रकृति, परिवेश और घर के विविधवर्णी चित्र। लेकिन जो एक स्वर इन सबमें व्यापता है, वह है - स्त्रीजीवन की मर्मांतक वेदना का स्वर। ‘भूकंप‘ कविता का एक अंश यहाँ द्रष्टव्य है -

‘‘तुम्हारे घरों की नींव 
मेरी बाँहों पर थी 
अपने घर के मान में 
सरो सामान में 
भूल गए तुम। 
मैं थोड़ा हिली 
तो लो भरभराकर गिर गए 
तुम्हारे घर। 
फटा तो हृदय 
मेरा ही।‘‘ 

कविता वाचक्नवी ने स्त्री की यातना को कई कोणों से चित्रित किया है। इस संदर्भ में उनकी एक छोटी कविता ‘उसी दिन से‘ इस प्रकार है - 

‘‘जिस दिन 
धुनिये ने 
सेमल की रुई तक को 
धुन डाला 
हवा उसी दिन से 
चिपकी जाती है 
मेरे होठों पर।‘‘ 

अपनी अभिव्यक्ति की खोज करती हुई स्त्रीकविता प्रणय के लिए भी नई भाषा ईजाद करती है - 

‘‘यह सच है, सखे! 
मेरी भाषा की गढ़न 
कविता नहीं लिख सकती, 
वाक् और अर्थ के नियंता 
सुधीजन 
चकला बेलन की चतुर्दिक परिधि में फैले आटे में 
बु़झी तीलियों से 
कविता लिखने के अपराध में 
दंडित भी करेंगे मुझे, 
बवाल भी करेंगे खूब 
पर 
तुम्हारी दाल भात छुई उँगलियाँ 
आटे में उकेरी कविता को बचा लें 
इसी विश्वास से भर 
मैं, तुम्हें 
अपने चौके में बिठा 
अपने हाथों से परोस 
लवण और शक्कर 
सब चखाना चाहती हूँ ....।
 xxx 
बचा सको 
आटे में चींटियाँ लगी कविता को 
तो दाल-भात छुआ अपना हाथ दो, सखे!‘‘
                                                  (व्रतबंध)

लोक और शास्त्र दोनों के प्रतीकों और प्रसंगों का अद्भुत जख़ीरा कविता वाचक्नवी के स्मृतिकोश में विद्यमान है। वे इस सबका उपयोग स्त्री के मानवाधिकार के संघर्ष की कविता रचने के लिए बखूबी करती हैं। ‘मैं चल तो दूँ‘, ‘जल समाधि‘, ‘उत्तरकांड‘, ‘कालपुरुष‘ और ‘गार्गी उवाच‘ में मिथकीय प्रसंगों का नया निर्वचन स्त्रीकविता के खास तेवर को उभारता है: 

‘‘ऋषि! 
तुम भले ही हाँक ले जाओ सब गाय 
और भले ही, तत्वदर्शी होने का 
अहं तुम्हारा 
रहे जीवित 
पर 
आकाश में गूँजते 
तरंगों में लहराते 
विद्युत से कौंधते 
मेरे प्रश्न तो सुनते जाओ। 
शास्त्रार्थ से तुम न दे सकोगे 
इनके उत्तर 
छूट जाएगा सारा दंभ। 
छोड़ दो गउएँ 
मूक प्राणी हैं ..... 
कुछ न कहेंगी 
हकाल ले जाओ भले, 
किंतु मैं 
रोकती हूँ तुम्हारा मार्ग, 
ठहरो .....!! 
प्रश्न तो सुनो, याज्ञवल्क्य!!!‘‘
                               (गार्गी उवाच)

इसी भाँति सविता सिंह के कविता संग्रह ‘नींद थी और रात थी‘ (2005 ई., राधाकृष्ण प्रकाशन, जी-17, जगतपुरी, दिल्ली-110 051) की कविताओं में भी स्त्रीपक्ष व्यापक मानवीय सरोकारों के साथ जुड़कर ही अभिव्यक्त हुआ है। इससे कवित्व को गरिमा मिली है तथा नारेबाजी के सतही मोह से मुक्ति भी। सविता सिंह की कविताएँ ज़ोर देकर स्त्री के सच होने की बात उठाती हैं: 

‘‘चारों तरफ़ नींद है 
प्यास है हर तरफ़ 
जागरण में भी 
उधर भी जिधर स्वप्न जाग रहे हैं 
जिधर समुद्र लहरा रहा है 
दूर तक देख सकते हैं 
समतल पथरीले मैदान हैं 
प्राचीनतम-सा लगता विश्व का एक हिस्सा 
और एक स्त्री है लाँघती हुई प्यास।‘‘
                                          (स्त्री सच है)

स्त्रीपक्षीय कविता देह की राजनीति को भी भलीभाँति समझती है और उसके पैंतरों को नाकामयाब करने पर कटिबद्ध है। ‘जैसे सौंदर्य में स्वायत्त स्त्रियाँ‘ में सविता सिंह आगाह करती हैं कि चमक कई तरह की होती है - आँख की, मन की, आत्मा की और देह की - ठीक उसी तरह जैसे भूख भी कई तरह की होती है - मन की, तन की और ज्ञान की। जो लोग चमक और भूख के सारे प्रकारों को जान लेते हैं वे मीठे जलवाले झरने के पास अपने स्वयं चुने रास्ते से पहुँचते हैं और जीवन की विरल अनंतता को जी पाते हैं और: 

‘‘वे खुश वैसी स्त्रियों की तरह होते हैं 
जो स्वायत्त होती हैं अपने सौंदर्य में।‘‘ 

और तब आता है वह मुकाम ‘जहाँ चट्टानें भाषा जानती हैं‘ : 

‘‘मैं उन सुरम्य घाटियों से गुज़र रही हूँ 
जहाँ चट्टानें भाषा जानती हैं 
ठंड महसूस करती हैं 
सिहरन में इनके भी काँपते हैं होंठ 
हरी काली कहीं 
कहीं बदरंग भूरी 
रंगों के प्रति सजग फिर भी 
जिस्म की ठोस इच्छाओं से बंधी 
प्रकृति की हर आवाज़ को सुनती हैं ये चट्टानें 
एक-एक शब्द बचाती हैं अपने भीतर 
सारे आत्मीय स्पर्श लौटाने के लिए हमें 
मैं उन सुरम्य घाटियों से गुजर रही हूँ 
एक झरना जहाँ बह रहा है 
एक लाल चिड़िया जहाँ मेरा इंतजार कर रही है।‘‘ 

निश्चय ही इस मुकाम पर पहुँचकर कविता की भाषा में स्त्री का मानुषीकरण और प्रकृति का स्त्रीकरण एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं।


शुक्रवार, 8 मार्च 2013

तुममें पूरे इतिहास को जिंदा होना है !

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तुममें पूरे इतिहास को जिंदा होना है ! 
  - सुधा अरोड़ा 
 



दामिनी !
जीना चाहती थीं तुम
कहा भी था तुमने बार बार
दरिंदों से चींथी हुई देह से जूझते हुए
मौत से लडती रही बारह दिन
कोमा में बार बार जाती
लौट लौट आती
कि शायद साँसे संभल जाएँ.......
आखिर सारी प्रार्थनाएँ अनसुनी रह गईं
दुआओं में उठे हाथ थम गये
अपने जीवट की जलती मशाल छोड कर
देह से तुम चली गयी
पर हर जिन्‍दा देह में अमानत बन कर ढल गयी !


अब तुम हमेशा रहोगी
सत्ता के लिए चुनौती बनकर ,
कानून के लिए नई इबारत बनकर ,
हर कहीं अपने सम्मान और अस्मिता के लिए लडती ,
स्‍त्री के लिए बहादुरी की मिसाल बनकर ,
कलंकित हुई इंसानियत पर सवाल बनकर ,
सदियों से कुचली जा रही स्‍त्री का सम्मान बनकर !


तुम एक जीता जागता सुबूत हो दामिनी
कि अभी मरा नहीं है देश
कि अब भी खड़ा हो सकता है यह
दरिंदगी और बलात्कार के खिलाफ
जहाँ लोकतंत्र की दो तिहाई सदी
बीतने के बाद भी सुनी नहीं जाती
आधी दुनिया की आवाज !


तुम हर उस युवा में होगी
जो वहशीपन के खिलाफ
खड़े होते दिख जायेंगे आज भी
देश के हर छोटे बड़े गाँव कस्बे में !
जिंदा होगी तुम हर एक लडकी के जज्‍बे में !


इतिहास बार बार दोहराता है
हमें अपनी चूकें याद दिलाता है
और हमारा यह सभ्‍य समाज बार बार उसे
भूल जाने की कवायद करवाता है ।
अब तुममें जिंदा होगी
1979 की गढचिरोली की मथुरा
चौदह से सोलह के बीच की वह आदिवासी लड़की ,
जिसे अपनी उम्र तक ठीक से मालूम नहीं थी
लॉक अप में जिसके साथ हुआ बलात्कार
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का बदला फैसला --
गणपत और तुकाराम बाइज्ज़त बरी कर दिए गए
सारे महिला आन्दोलन और नुक्कड़ नाटक धरे रह गए !


अब तुममें जिंदा होगी
पति के साथ रात का शो देख कर लौटती
हैदराबाद की रमज़ा बी
कि जिसे पुलिस ने पकड़ा और
उसके पति के सामने सारी रात भोगा
कहा --'' पर्दा नहीं किया था
मुँह खुला था, हमने सोचा वेश्या होगी !''
इसी पुलिस ने दूसरे दिन की पति की हत्या
और रमजा बी करार दी गयी वेश्या !


अब तुममें जिंदा होगी माया त्यागी
मुरादाबाद की किसनवती
मेरठ की उषा धीमान
राजस्थान के भटेरी गाँव की भँवरी,
जिसके आरोपियों को सुसज्जित मंच पर
फूलमालाओं से नवाज़ा गया और लगाये गए नारे --
मूँछ कटी किसकी, नाक कटी किसकी, इज्ज़त लुटी किसकी
राजस्थान के भटेरी गाँव की !
महिला कार्यकर्ताएँ फिर अपने नारे बटोरतीं ,
कटे बालों वाली होने का तमगा लिए घर लौट गयीं !


सुनो दामिनी ,
इस बीच बीते पंद्रह साल
लेकिन हमारे पास गिनती नहीं
कि कितनी लाख बेटियाँ और बहनें हुईं हलाल
आँकड़े जरूर मिल जाएँगे कहीं
और इन आँकड़ों की तादाद हर पल बढती ही रही ......


दूर नहीं, अब लौटो पिछले साल
अब तुममें जिंदा होगी
मालवणी मलाड की 14 साल की अस्मां ,
जिसे उठा ले गए पाँच दरिन्दे
खाने के नाम पर देते रहे उसे एक वडा पाव
और रौंदते रहे उस मरती देह को लगातार
बाल दिवस 14 नवम्बर 2011 को
अपने बालिका होने का क़र्ज़ चुकाती
ली उसने आखिरी साँस !
मरने के बाद जिसके पेट से निकलीं
वडा पाव लिपटे अखबार की लुगदी
मिटटी, पत्थर और कपडे की चिन्दियाँ !
क्‍या होगा पोस्‍ट मार्टम के इस खुलासे से
कि वह कागज और मिट्टी से पेट भरती रही
सच तो यह है कि अखबार में छपी उसकी तस्‍वीरें
हमारे चेहरों पर तमाचा जड़ती रहीं ।


अब तुममें जिंदा होगी
वे तमाम मथुरा, माया, उषा, किसनवती
मनोरमा, भँवरी, अस्माँ ....
दूध के दाँत भी टूटे नहीं थे जिनके
वे बच्चियाँ
जिन्हें अपने लड़की होने की सज़ा का अहसास तक नहीं था ...
वे तमाम नाबालिग लड़कियाँ
जिन्हें दुलारने वाले पिता चाचा भाई के हाथ ही
उनके लिए हथौड़ा बन गए
किलकारियाँ चीखों में बदल गयीं !


हम आखिर करें भी तो क्या करें दामिनी ,
चीखें तो इस समाज में कोई सुनना ही नहीं चाहता
रौंदी गयीं , कुचली गयीं बच्चियों की चीखें
नहीं चाहिए इस सभ्य समाज को
यह सभ्य समाज डिस्को में झूमता है
सेल्युलायड के परदे पर लहराता है
युवा स्त्री देहों के जुलूस फहराता है
मुन्नी बदनाम हुई पर ठुमके लगाता है
शीला की जवानी पर इतरा कर दोहरा हुआ जाता है
और चिकनी चमेली को पास की खोली में ढूँढता है
आखिर औरत की देह एक नुमाइश की चीज़ ही तो है !


हम उसी बेशर्म देश के बाशिंदे हैं दामिनी
जहाँ संस्कृति के सबसे असरदार माध्यम में
स्त्री महज़ एक आइटम है
और आइटम सॉन्ग पर झूमती हैं पीढियाँ !!


दामिनी !
उन लाखों हलाल की गयी बच्चियों में
तुम्हारा नाम एक संख्या बनकर नहीं रहेगा अब !
नहीं, तुम्हें संख्या बनने नहीं देंगे हम !
तुममें एक पूरे इतिहास को जिंदा होना है !
वह इतिहास जिस पर तेज़ रफ़्तार मेट्रो रेल दौड़ रही है
वह इतिहास जिसे चमकते फ्लाई ओवर के नीचे दफन कर दिया गया है !


इससे पहले कि जनता भूल जाये सोलह दिसम्बर की रात ,
इससे पहले कि तुम्हारा जाना बन जाये एक हादसे की बात
इससे पहले कि सोनी सोरी की चीखें इतिहास बन जाएँ
इससे पहले कि चिनगारियाँ बुझ जाएँ .....


हवा में झूलते अपने हाथों से तुम्हें देते हुए विदा
और सौंपते हुए इन आँखों की थोड़ी सी नमी
ज्वालामुखी के लावे सी उभर आई
इस देश की आत्मा की आवाज के साथ
अहद लेते हैं हम
कि चुप नहीं बैठेंगे अब
न्याय के लिए उठती आवाजों को खामोश करती
किसी भी सत्ता के दमनकारी इरादों के खिलाफ
खड़े होंगे तनकर और दया की भीख नहीं माँगेंगे
इस दबे ढके इतिहास के काले पन्ने फिर से खोलेंगे ।
अब हम आँसुओं से नहीं, अपनी आँख के लहू से बोलेंगे !
हत्यारों और कातिलों की शिनाख्त से मुँह नहीं फेरेंगे !


अपने नारों को समेट सिरहाना नहीं बनायेंगे ।
नए साल की आवभगत में गाना नहीं गायेंगे !
बस, अब और नहीं, और नहीं, और नहीं .........
जैसे जारी है यह जंग, जारी रहेगी !                           


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रविवार, 16 सितंबर 2012

देह के भीतर छिपे देह के आख्यान

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अनामिका पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था व तत्पश्चात राहुल ब्रजमोहन का "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"।  
उसी बहस के क्रम में आज पढ़ें -


देह के भीतर छिपे देह के आख्यान
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अनिल पुष्कर कवीन्द्र 
प्रधान संपादक 
अरगला


दुनिया के किसी भी रचनाकार के पास रचनाकर्म ही एकमात्र ऐसा जरिया है जिससे वो दुनियाभर में हो रही बर्बरता और पीड़ा की अनुभूति को अभिव्यक्त कर सकता है। इस अभिव्यक्ति के लिए उसके पास कुछ विचार पहले-पहल मस्तिष्क में आते हैं फिर कुछ मुद्दों के साथ वह उस विचार को कुछ दूर ले जाता है, जहाँ उसके भीतर उठ रही कल्पनाएँ नई दृष्टि विकसित करती हैं और फिर वह इन सबको एक खास तरह की संवेदना के साथ अंतरंग होकर मथता है।  उसे पुष्ट करने के लिए किसी एक विचारधारा, दर्शन, को रचना का आधार बनाता है। एक सुलझा हुआ किरदार चुनता है। एक ऐसा किरदार जो उसकी मनोदशा को समझता हो, उससे सहमत हो, और उसके मनोजगत में हो रही हलचलों को शिद्दत से महसूस करता हो, जो उसके भीतर पूरी तरह से उतर चुका हो।  और वह सारी कल्पनाएँ जिसका जुड़ाव अब रचनाकार से है उसे कह पाने में समर्थ हो। यहाँ तक कि रचनाकार के मन के संशय और वहम को भी किरदार अपने भीतर ढालने की कारीगरी में माहिर हो। रचनाकार जिस किरदार को चुनता है उससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि वह किस विचार के तहत जीवन जीने की लालसा से भरा है, किस तरह की गतिविधियों में शरीक होकर रचना-उत्सव मनाना चाहता है याकि न्यायिक परिणति में ढालना चाहता है।  उसकी विचारधारा और दृष्टि का दर्शन बताता है कि वह कौन-सी दुनिया रचने के लिए फिक्रमंद है। किस यथार्थ में वो सुकून से जीने की ख्वाईश रखता है, एक दुनिया जो नजर के सामने है जिससे वह या तो तल्ख़ तेवरों के साथ पेश आता है या रागात्मक याकि लचीला व्यवहार करता है। बनिस्बत उसके, किरदार की बानगी यह बताती है कि वह किस दुनिया का पक्षधर है ! 


दो दुनियाएँ उसके आमने-सामने हमेशा ही मौजूद रहती हैं। एक, जिसमें वह जीता है। दूसरी, जिसमें वह किसी खास मकसद से महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की बुनियाद रखता है। जिसके लिए वह एक गढ़े हुए मनचाहे किरदार के साथ जीना चाहता है। रचना जब अपने अन्तिम शिखर पर पहुँच चुकी होती है तब उसका फैसला पाठक या आलोचक को करना होता है कि रचना में जिया हुआ जीवन-जगत भोगे हुए यथार्थ से किस माने में कमतर या बेहतर है। किरदार के भीतर रहकर वो उसकी विकृतियों को अपनाने में दिलचस्पी लेता है। याकि किरदार के भीतर जीते हुए यथार्थ का चिंतन करता है जिसमें रचना के भीतर का जीवन जगत का फलसफा बेहद विस्तृत है। वहाँ जो कुछ भी ले जाकर तरतीबवार संजोकर रखा गया है वो किन मायनों में दो दुनियाओं के बीच एक-दूसरे से भिन्न है?

इन्हीं सवालों को हर रचनाकार जब-तब अपने-अपने रचना संसार में निहित निष्कर्षों तक  ले जाकर सहमति-असहमति की गुंजाइश पैदा करता है। ऐसे ही तमाम सवालों को लेकर अनामिका की रचना और पवन करण की रचना का पाठ एक बार फिर कुछ नए सन्दर्भों और नई दृष्टि के साथ प्रस्तुत है। तमाम बार ऐसा हुआ है कि किसी एक रचना का पुनर्पाठ उसके भीतर दबी साँसों के स्पंदन से पुनः जीवन की बची हुई स्मृतियों से हमारी चेतना को भर देता है और कई बार हमें आहत कर देता है।  हमारे इस पुनर्पाठ से आपकी संवेदना अगर कहीं आहत होगी तो इसके लिए क्षमा....देह के भीतर छिपे देह के आख्यान के साथ पाठ को वापस नए नजरिये से तर्क और विचार के बीच संगत करते हुए अनामिका की कविता “ब्रेस्ट कैंसर” पर एक जरूरी बहस.....


मनुष्य कुंठाग्रस्त मानसिकताओं का एक बड़ा पुंज है. जब-जब कुंठाएँ उफनाती हैं रोग उफनाकर निकलने को उतावले होकर बाहर आने को आतुर होते हैं. ऐसे में तमाम तरह की व्याधियाँ उत्पन्न हो ही जाती हैं याकि उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है. ये व्याधियाँ अपने भीतर उद्दाम क्षमता और निर्बाध-आवेग लिए आती हैं. तमाम मनुष्य जो उसके संपर्क में आते चले जाते हैं वे उन्हें किसी न किसी रूप में प्रभावित कर ही लेती है. जो उससे प्रभाव में नहीं आ पाते वे उन्हें लगातार अतिक्रमण के जरिये अपने अस्तित्त्व पर हावी नहीं होने देतीं. इस तरह उसके अस्तित्व और अन्य के प्रभाव के सम्पुट के बीच मनुष्य के रोगी न होने की तमाम स्मृतियाँ उसके अपने मस्तिष्क के भीतर एकत्रित की गयी तमाम तरह की सकारात्मक और नकारात्मक विशेषताओं से भरी होती हैं और मनुष्य उन्हें नजरंदाज नहीं कर पाता. इस स्थति में वो आत्मतुष्टि के लिए तर्क और विचार से उठाने और दबाने के लिए नए-नए तरीके ढूँढ़ ही लेता है. इन स्मृतियों में आदमी के अतीत और भविष्य का अंश छिपा होता है. इन स्मृतियों में वर्तमान से संवाद और उसमें मौजूद संरचनाओं, समय और अंतराल के बीच का एक लंबा उत्सर्जन और अशुद्धियों का स्खलन क्रमशः जारी रहता है. हाँ ये बात और है, कई बार एक समुदाय उन अशुद्धियों को अपने सामाजिक सरोकारों से जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित करने का कार्य भी सम्पादित करता है. बहस और संवाद के बीच यहीं से स्मृतियों के सकारात्मक और निष्क्रिय अंतर्भूत विषयों का कई बार टकराव होता है.


तात्पर्य है कविता स्मृतियों के ही एक दृश्य-बिम्ब का साक्षात अवलोकन है, जिसमें समय अंतराल और वर्तमान तथा भविष्य के गर्भ में छिपे पहलुओं पर बीजांकुर होता है. यदि कोई विषय कविता में सहज ही या सायास आया है उस पर स्मृतियाँ लगातार हावी रहकर अपनी जरूरी भूमिका अदा करती हैं. कविता में कई बार स्मृतियों की ऐतिहासिकता और प्रासंगिकता के चलते उसके अन्य तमाम पहलू दबकर रह जाते हैं. जिन्हें कविता अपने अंदर तब तक जीवित रखती है जब तक उसपर बातचीत का सही समय नहीं आता या भविष्य में सुरक्षित नहीं रहता. हमें अनामिका और पवन करण की कविता को इसी बुनियाद पर रखकर, कसौटी में कसकर देखने की जरूरत है. जब अनामिका कहती हैं....

दुनिया की सारी स्मृतियों को
दूध पिलाया मैंने,
हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर
मेरे इन उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में
जाले लगे!


दुनिया की सारी स्मृतियों को/ दूध पिलाया मैंने, यह पंक्तियाँ इस ओर साफ़ संकेत करती हैं कि वो आदिम सभ्यता में रची बसी स्मृतियों का स्तुति-गान कर रही हैं. स्मृतियों में छिपे इतिहास की गूँज यहाँ मौजूद है. और इस गान में उनका समर्पण भाव उन्हें चेतना के उस स्तर पर ले जाकर खड़ा कर देता है जहाँ अतीत का पुनर्जीवन कवि के अंतर्जगत में आरम्भ हो चुका है...किन्तु अवशेष स्मृतियों के साथ सबसे बड़ी बाधा है- निश्चित समय का निरंतर बने रहकर आभास होना. इसीलिए वे आगे कहती हैं “तब जाकर” यानी जब वह कार्य पूरी तरह संपादित होकर अपने प्रस्थान बिंदु तक पहुँच चुका है, स्मृतियों का पुनरुत्थान तब दिखाई देता है। वे आगे कहती हैं “मेरे इन उन्नत पहाड़ों की/ गहरी गुफाओं में” यानी स्मृतियों का पुनर्जीवन और उसके अंग अब वर्तमान के साथ संपर्क बना चुके है. स्मृतियों के भीतर ही वर्तमान तक आने के क्रम में तमाम तरह के विकार और दोषपूर्ण गत्यात्मकताएँ छिपी होती हैं. ऐसे में यदि कविता अपने इतिहास-संसार से ऐसा कुछ हासिल नहीं कर सकी है जोकि वर्तमान को अपने तर्क और विचार से सहमत कर सके तो द्वंद्वात्मकता और अस्थिरता के बीच विषय के साथ एकचित्त होकर भी ‘कविता का अस्तित्व’ अपने पूर्ण संकट में आना स्वाभाविक है. “जाले लगे” इसी तरफ एक जटिल होती हुई प्रक्रिया जान पड़ती है.


फिर जाले के साथ मौत की चुहिया का आना अत्यंत अस्वाभाविक-सा जान पड़ता है; लगता है जैसे एक अस्पष्ट व जबरन अर्थगर्भित थोपा हुआ बिंब एक खास प्रयोजन तक पहुँचने के लिए लादकर लाया जा रहा है. जाले के साथ मकड़ी यदि आती तो बात समझ में आ सकती थी.

'कहते हैं महावैद्य
खा रहे हैं मुझको ये जाले
और मौत की चुहिया
मेरे पहाड़ों में
इस तरह छिपकर बैठी है


महावैद्य स्मृतियों में आख्यायित ज्ञानसंपदा से संचालित एक सक्षम और निष्कर्ष तक जाने का बोध देने वाला शब्द-चरित्र है. यह सशक्त चरित्र इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि वह मौत को सार्वभौम जगत के जटिल प्रश्न ‘कैंसर’ को बचकाने तरीके से हल करते हुए उसे ‘चुहिया’ के रूप में ले आया है. यदि यहाँ मकड़ी आयी होती तो मौत का उद्घाटन करने में ज्यादा बेहतर स्थिति होती. मकडी तो चूहे से हर मामले में सशक्त और खतरनाक चरित्र हो सकता था. मगर मौत का अगंभीर वर्णन कविता में कहीं भी दहशत और तनाव नहीं पैदा करता. इसीलिए यह स्मृतियों का महावैद्य इतिहास से कटा हुआ और काल्पनिक तथा अवैज्ञानिक जान पड़ता है. कारण, मकड़ी एक मांसाहारी जंतु है और चूहा उससे कम घातक और हिंसक है. कैंसर रूपी व्याधि के जाले उन्नत पहाड़ों को यानि छातियों को खा रहे हैं. चूहे जाले नहीं बुन सकते. जबकि मकड़ी जाले बुनकर मांसाहार करने के लिए ही जानी जाती है. ये जाले जहरीले हैं. इनके एक-एक रेशे में जहर भरा है, जिससे उन्नत पहाड़ भीतर ही भीतर खोखले हो रहे हैं. ये जाले विकृतियों के जाले हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध व्याधि ‘कैंसर’ से है. यह कविता का असम्वेदनशील और सबसे अधिक कमजोर पक्ष रहा है जहाँ से कविता अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान कर रही है. अब जबकि बिम्ब और उसका प्रतिबिम्बन ही अवैज्ञानिक हो तब कविता से यह उम्मीद करना कि वह सही-सही अपने उद्देश्य को प्राप्त करे सिद्धांत और व्यवहार दोनों ही स्तरों पर बेहद कठिन और श्रमसाध्य कार्य है. जिसकी परिणति यह हुई कि कविता आगे बढ़कर निहायत गैरजिम्मेदाराना तरीके से एक पक्ष लेकर आती है..

कि यह निकलेगी तभी
जब पहाड़ खोदेगा कोई!


इस तरह के कथन से मालूम हो जाता है कि कविता एक गैरजरूरी संवाद और मजाकिया लहजे के साथ लगातार कल्पना-लोक में विचरण करने की मंशा से भरी है. जिसका हकीकत से कोई सम्बन्ध नजर नहीं आता और सबसे अधिक भयभीत करने वाली व्याधि ‘कैंसर’ से कोई जद्दोजहद भरा पीड़ाजनक सम्बन्ध स्पष्ट दिखाई नहीं देता है. बेहद अजीब है कि कोई कवि घातक बीमारी को लेकर इतना असंवेदनशील हो सकता है और उस पर तुर्रा यह कि

निकलेगी चुहिया तो देखूँगी मैं भी,
सर्जरी की प्लेट में रखे
खुदे-फुदे नन्हे पहाड़ों से
हँसकर कहूँगी-हलो,
कहो, कैसे हो? कैसी रही?


यह कहते-कहते कविता अतिवादी और विक्षिप्त होती चली गयी. जहाँ यह मानना होगा कि कवि का कल्पना-लोक इतना संकुचित और दृष्टि इतनी दोषपूर्ण हो सकती है ! जिस घातक बीमारी के जाले हटाने और चुहिया को मारकर निकालने की गारंटी चिकित्सक भी नहीं ले सकता, उसे कवि अपनी काव्यात्मक शल्य-क्रिया द्वारा कुशल औजारों के प्रयोग से बड़ी सहजता और शैशव-जिज्ञासा के निमित्त रहकर एक सुखद निश्चित परिणाम को प्राप्त भी कर लेता है. वाह रे कवि मन.. धन्य हो ऐसी कल्पना..


बात यहीं खत्म हो जाती तो भी ठीक था. अब जबकि कवि ने सर्जरी कर दी, उसे सफलता मिल गयी, तब वह गम्भीर हो जाने की बजाय और अधिक मनोरंजक व खिलंदड़ तरीके से पेश आता है.. भला ऐसी कौन -सी स्त्री होगी, जो अपने सौंदर्य के प्रतिमान और स्मृतियों तक को दूध पिलाकर पोसने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग को खोकर आह्लाद और आनंद की चरम अवस्था में जियेगी और सुखद अनुभूतियों की गल्प-कथा से बतरस करेगी? जिन उन्नत पहाड़ों से इतिहास और स्मृतियाँ निर्मित हुईं, जिन पहाड़ों ने भविष्य की सूखी परियोजनाओं में दरिया बहा दिए, जिन पहाड़ों के रस और सौंदर्य से स्वप्न, कल्पना और यथार्थ का रेशा-रेशा सींचा गया, जिन पहाड़ों के गर्भ-गृह में आदि से अनंत तक बसे पुरखे और पुश्तें लाखों योनियों के चक्कर काटकर बारम्बार दुनिया में विचरते हैं, जिन पहाड़ों पर टिकी हैं कायनात की सबसे जीवंत साँसें, जिन पहाड़ों में वे औषधियाँ छिपी हैं जो अबोध चेतना की शिराओं को बोधगम्य बनाती हैं और कमजोर को ताकतवर; आखिर उन पहाड़ों को काटकर भला कोई कैसे सर्जरी की प्लेट में सजाये उनकी अवहेलना और उपेक्षा कर सकता है? यह निर्मम और क्रूरतम उद्घाटन है जैसे किसी मानसिक रोगी ने अपने विकार और व्याधि के वशीभूत इतना घिनौना कृत्य और नृसंश घटना को अंजाम दिया हो. हमें यह कहने में हरगिज़ कोई गुरेज नहीं कि यह हिन्दी कविता-जगत में अब तक की सबसे क्रूरतम और अतिसंवेदंहीन प्रस्तुति है. जिसमें मानवीय होने की गरिमा व पक्षधरता कतई कहीं भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती.


इस प्रकरण के बाद कविता अपना मानसिक संतुलन कहें कि पूरी तरह खो देती है. वह आपे से बाहर जाकर एक विकृत दुनिया से वाबस्ता होती है, जहाँ उसे किसी भी तरह के विरोध की कोई संभावना कहीं दिखाई नहीं देती.

अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी!
दस बरस की उम्र से
तुम मेरे पीछे पड़े थे,
अंग-संग मेरे लगे ऐसे,
दूभर हुआ सड़क पर चलना!
बुल बुले, अच्छा हुआ, फूटे!
कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर।
मेरे ब्लाउज में छिपे, मेरी तकलीफों के हीरे, हलो !
कहो, कैसे हो?'


इस कथन में रोग से निजात पाने की भावना जो किसी बीमारी से जूझ रही स्त्री में होती है और निजात पाने के बाद समूची देह का निखार जिसे वह प्राप्त पुनः करती है वह पक्ष जैसे एकाएक खारिज कर कर दिया गया है. अनामिका ने जिन्हें कविता के आरम्भ में उन्नत पहाड़ की संज्ञा से पहचान दी उसे ही अब बुलबुले, अच्छा हुआ फूटे कहकर संबोधित कर रही हैं और इससे भी आगे जाकर मेरी तकलीफों के हीरे कहने से भी नहीं चूकतीं. इन विशेषणों से साफ़ जाहिर है कि कविता में संवाद करने वाले चरित्र का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. यहाँ किसी अंग के भंग होने पर पीड़ा की बजाय अतिवादी सोच की परिणति हुई है, जोकि वस्तुतः वास्तविक दुनिया में कतई सम्भव नहीं. इस स्थिति में संवाद के स्तर पर जाकर कुछ भी कहना एक साइकेडेलिक दुनिया की निर्मिति मालूम होता है. एक ऐसा संसार जहाँ व्यक्ति की चेतना में बसी छवियाँ आकार लेती हुई कुछ नई सृष्टि करती हैं. एक ऐसी सृष्टि जो वास्तविक संसार से पृथक है जिसमें मनुष्य अब तक जिया उससे बिल्कुल भिन्न, अलग, इतर। यहाँ मन में उठने वाले आवेग और संवेगों से लगातार नयी-नयी कल्पनाएँ अपना अस्तित्व ग्रहण करती हैं और मनोकूल परिस्थितियों में जीती हुई आनंद में सराबोर बार -बार उत्प्लावित होती हैं. वहाँ संवाद और भी गहराते हैं, जैसे अनामिका की ये पंक्तियाँ कहो, कैसे हो? कैसी रही?/अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! /दस बरस की उम्र से तुम मेरे पीछे पड़े थे,/अंग-संग मेरे लगे ऐसे,/दूभर हुआ सड़क पर चलना!/बुल बुले, अच्छा हुआ, फूटे!/कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर।


कविता में कतई अहसास तक नहीं होता कि कोई जहरीली चुभन थी. किसी असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिली हो. यहाँ ऐसा प्रतीत होता है मानो एक विकार भीतर छिपा था. जिसे बाहर निकालकर उसके बेघर होने की कामना से उत्सव मनाया जा रहा है. आखिर ये तकलीफों के हीरे हैं क्या? यही अब तक स्त्री के उपहार या फिर जगत-निर्मिति के आधार या फिर इतिहास में सबसे मौजूं और विश्वासपात्र थे, जो अब घृणा के दायरे में लाकर रख दिए गए हैं. यह तकलीफों का कैसा प्रचलन है जिसमें मनुष्यता की सारी सीमाएँ लाँघकर कविता अतार्किक और बड़बोली होती चली गयी है. जब स्मृतियों को दूध पिलाने की कल्पना में कविता लेकर जाती है तब एक भव्य प्रतिमा का अहसास होता है, एक दिव्यता की अनुभूति होती है, एक विशालता में जीवन का सबसे सुंदर क्षण कुलांचें लेता दिखाई देता है, एक स्त्री द्वारा मनुष्य के भीतर उन्मुक्त और तरंगित जीवन-रस का आस्वादन होता है. वह लम्हा मानो तमाम खुशगवार पलों पर भारी है; मगर जैसे ही मौत की चुहिया का जिक्र आता है मानो सारी कल्पनाओं के ढाँचे को कुतरने और खोखला करने का भी व्याप्त करने का प्रयास किया जाता है. किन्तु एक स्वप्न में ही संभव है चूहे का इतने बड़े ढाँचे को बड़ी सहजता से भीतर घुसकर उसे कुतरना. मगर फिर संदेह होता है कि यदि ये चुहिया ही मौत का रूप धारण कर आई है तो फिर ये जाले किसने लगाए हैं? वो मकड़ी कौन थी जो पूरी कविता में कहीं दिखाई नहीं देती मगर जाले दिखाई देते हैं. ऐसा लगता है मानो कविता में फैंटसी-जगत के किवाड़ खटखटाते हुए यह ख्याल कि अब कविता अपने समूचे वजूद को लेकर उसमें प्रवेश कर गयी है, बेहद भटकाव पैदा करने वाली तमाम स्थितियाँ लेकर आता है. कविता बेचैन करने की बजाय संरचनागत त्रुटियों से भरी दिखाई देने लगती है. वह जिस प्रयोजन को पाना चाहती है वहाँ तमाम अड़चनें साफ़ झलकती हैं.


जैसे कि स्मगलर के जाल में ही बुढ़ा गई लड़की
करती है कार्यभार पूरा अंतिम वाला-
झट अपने ब्लाउज से बाहर किए
और मेज पर रख दिए अपनी
तकलीफ के हीरे!


ये तकलीफ के हीरे यहाँ स्तन हैं या फिर कैंसर की गाँठें. कुछ भी स्पष्ट नहीं है. अगर ये कैंसर की गाँठें हैं तो इन्हें वह स्तनों से बाहर नहीं निकाल पाई बल्कि उसके साथ ही स्तन देह से काटकर बाहर निकाल दिए गए. यह अंग का काटकर देह से अलग किये जाने का जो क्रम है वह हमेशा ही एक अस्वाभाविक प्रक्रिया रही है. किसी भी कविता के फैंटसी जगत की निर्मिति में कला के तीन क्षण हमेशा मौजूद होते हैं – एक, जिसमें जहाँ चेतन-अवचेतन में बसे दृश्य-बिम्ब होते है. दूसरा, जहाँ इन बिंबों के साथ कुछ विचार आते हैं । तीसरा, अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए बिंबों, विचारों को लेकर कल्पना-लोक निर्मित होता है. यह क्षण इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहाँ वैज्ञानिक चेतना के द्वारा कविता अपने अन्तिम पड़ाव तक पहुँचती है. और उद्देश्य को पूरा करने के लिए मूल आधारों को लेकर सभी के संयोजन से लक्षित होती है.


इस धरातल पर भी यह कविता अपने पूर्ण रूप में खुद को अभिव्यक्त कर पाने में पूरी तरह प्रेरक-तत्वों और फैंटसी के सशक्त माध्यमों को ग्रहण नहीं कर सकी है. हाँ, कई बार यह भ्रम हो सकता है कि कविता की इस योजना में सब कुछ ठीक-ठीक प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि कविता का रूप और अंतर्वस्तु के बीच भाषा, शिल्प संवेदना का संयोजन एक निश्चित मात्र में किया गया है. किन्तु उद्देश्य को यह योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने के बावजूद यथार्थ की संश्लिष्ट संरचना को भेद नहीं पाती. स्मगलर शब्द अपने औचित्य को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका. वह केवल एक खाली स्पेस भरने के लिहाज से आगे आये शब्दों की कतार को थोड़ा और आगे खिसकाने का काम अवश्य करता है. जबकि यहाँ बिना इस शब्द के भी अर्थ में कोई बदलाव, भटकाव, अस्पष्टता कहीं दिखाई नहीं देती। यदि स्मगलर शब्द हटा भी दिया जाए तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जाले तो कविता के आरम्भ में बिना किसी ऐसी संज्ञा से जुड़े हुए भी अपनी बात कहते हैं, जैसे कि जाल में ही बुढ़ा गई लड़की. यहाँ अगर कविता पहले ही अपने अर्थ को लेकर तटस्थ होती तो ऐसे किसी सहयोगी विशेषण ‘स्मगलर’ की जरूरत नहीं पड़ती. एक और बात –

जैसे कि निर्मूल आशंका के सताए
एक कोख के जाए
तोड़ लेते हैं संबंध
और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है!

यहाँ कोख के जाए का जो सम्बन्ध स्तनों में जीवित व्याधि से जोड़ा जा रहा है, तो यह एक अवैज्ञानिक सोच का परिणाम है. क्योंकि कोख से जन्म लेने वाली संतानें अपने नैसर्गिक रूप में स्वभाविक चरण पूरे करते हुए समूची कल्पनाओं से भरी रोमांचित करती हुई देह से बाहर आती हैं और आनंद की अनुभूति से भर देती हैं स्त्री-देह. यहाँ स्त्री देह में प्रजनन के समय की पीड़ा को कविता अपने भीतर व्याधि की पीड़ा से जोड़कर देखती है. जोकि निहायत गलत उदाहरण के बतौर पर पेश किया गया है. संतानें कोख से बाहर इसलिए नहीं आतीं कि वे देह को दुःख पहुँचा रही हैं, बल्कि उनके प्रजनन के सभी चरण पूरे होते ही वे अपने स्वाभाविक स्वरूप में देह से बाहर आती हैं; जबकि व्याधि यदि अपने समस्त चरण देह में पूरे करती तो वह देह को पूरी तरह खा जाती, उसके प्राण हर लेती, उसे लाश बनाकर छोड़ती. यदि स्त्री अपना दूध पिलाकर इस व्याधि को पोसती तो फिर वह व्याधि उसका खून क्यूँ पीती? उसका जिस्म क्यूँ निचोड़ती? उसकी देह के भीतर अनंत पीड़ाओं के गुच्छे रक्त-शिराओं में क्यूँ उपजाती? चूंकि कविता का मनस्ताप ज्यादा विद्रोही होने का भी प्रयास करता है, शायद इसीलिए नई-नई मुश्किलों में लगातार फँसता चला जाता है.

जाने दो, जो होता है सो होता है,
मेरे किए जो हो सकता था-मैंने किया,
दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने!
हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुपफाओं में!


कविता में अर्थ को पाने की जो तकनीक, यांत्रिकता, उत्पादक क्षमता यहाँ अपनाई गयी हैं निश्चित ही उनमें कहीं भी साम्यता नहीं दिखाई देती। वे आपस में ही एक-दूसरे के साथ अंतर्विरोधों को भोगती हुई आपस में गुत्थमगुत्था हैं और बेचैनी में कोई हल जैसे नहीं सूझता इस स्थिति में कविता कह उठती है - जाने दो, जो होता है सो होता है, मानो कविता बनने के क्रम में तमाम नए तरह की चुनौतियाँ सामने आती गयीं जिनसे कविता उलझना नहीं चाहती. यह भाग्यवादी और निरुपाय होने की ओर अपराधी भावना का आत्मसमर्पण से भरा एक संकेत है. फिर अंत में अपने अतीत का वही स्वर्णकाल भरा गान- “दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने!” आरम्भ होता है. और एक तयशुदा संतोष के साथ कविता अपने भीतर सुखद क्षणों में जीती अपने दुखों के साथ एक आत्मतोष भरे लहजे याकि संवाद के साथ समाप्त होती है

हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में!


कविता का यह चरित्र निहायत फिल्मी और आदर्शवादी लगता है, किन्तु यथार्थ और वैज्ञानिक चेतना से भरा तो हरगिज़ नहीं हो सकता. कविता यह माँग भी नहीं करती कि पाठक क्या सोचता है. वह तो जुनून में अपनी स्क्रिप्ट के भीतर गम्भीर समस्या को नाटकीय तरीके से लेकर आती है और जितनी नाटकीय संवादधर्मिता उसके समूचे दृश्यों में निभाई गयी है उतने ही नाटकीय अंदाज़ में उसके समाधान को भी दर्शाया गया है. इस कविता की पटकथा सुनकर विचार और यथार्थ चेतना से कमजोर पक्ष वाले व्यक्ति को भले ही संतोष मिले, एक सुख का अनुभव हो, किन्तु इस समस्या के प्रति जागरूक व्यक्ति को यह हल और तार्किक परिणति कतई रास नहीं आयेगी.

हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में!
लगे तो लगे, उससे क्या!
दूधो नहाएँ
और पूतों फलें
मेरी स्मृतियाँ!


लगे तो लगे, उससे क्या! स्त्री देह के भीतर दुःख में भी सुख का साझा. अतीत की गौरव-गाथा के शिलान्यास के साथ वर्तमान की दैहिक-व्यथा की तिलांजलि. काश, यथार्थ की कटु रौशनाई इस दृश्य पर पड़ी होती; तो इन सुखद यात्राओं की स्वप्निल रंगीन पॉलिश उतर गयी होती. परिकल्पना के बंधे पुलिंदे भरभरा कर हाथ से छूट गए होते तो अच्छा होता. कम से कम स्त्री-देह जो इस पीड़ा के साथ एक जरूरी अभियान में शामिल लड़ रही है और अंत तक लड़ेगी, जब तक जीत या हार नहीं होती, उसे ये सुखद कल्पनाओं के घोड़े रौंदकर न चले गए होते. अतीत का सुख उसे नहीं अखरता.

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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

जहाँ शुरू नहीं होती कविता.........

5 टिप्पणियाँ
अनामिकापवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख  ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं  कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था।

उसी क्रम में आज पढ़ें राहुल ब्रजमोहन का लेख  -  "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"

- कविता वाचक्नवी
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जहाँ शुरू नहीं होती कविता.........
- राहुल ब्रजमोहन


‘‘यह बता पाना बेहद मुश्किल है कि कविता में शाब्दिक अभिव्यक्ति कहाँ खत्म होती है और दिक् का विस्तार कब शुरू हो जाता है।"

इसके पहले कि हम रिल्के की इस स्थापना पर सौंदर्यशास्त्रीय मिजाज से विचार करें, हमें कविता परिधि में साहित्य के उस समाजशास्त्रीय-अवलोकन की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही है, जो कथ्य के प्रतिपाद्य सत्य और उसके आद्य-अतीत की लम्बी काल सर्जित रेखा पर संतुलन साधना सिखाता है, यद्यपि यह साहित्य की नहीं, विशुद्ध रूप से समाज की जरूरत का मामला है.... साहित्य में इसीलिए भाषा के साथ होने वाला प्रश्नोत्तर और इस संवाद के उत्तर प्रश्न हमेशा ही प्रासंगिक होते हैं। इधर हिन्दी कविता में काफी कुछ उथल-पुथल हुई है। उसने अपना एक नया मुहावरा गढ़ा (या आहरित किया) है और अब वह अपनी उत्तुंग शिरोभंगिमा के साथ उस नीली घाटी में प्रवेश कर गई है, जहाँ उसे लगता है कि उसके पीछे सिर्फ जलते हुए वन का वसंत (दुष्यंत के शब्दों में) रह गया है और आधुनिकता के नवोद्यान में आश्रय पाने के लिए उसे एक ऐसे ‘दैहिक विमर्श’ की अपरिहार्य आवश्यकता है, जो कविता को एक ग्लॉसी मेकओवर का रूतबा सौंपे दें, जिसकी चौंध में हर रूखाई चिकनाई प्रतीत हो और आप चाह कर भी न बता पाएँ कि कथ्य की लकीर पर कब शाब्दिक संवेदना दम तोड़ती है और कहाँ ‘देह का अनंग राग’ शुरू हो जाता है।


‘कथादेश‘ में समकालीन कविता पर पिछले दिनों प्रकाशित शालिनी माथुर के आलेख और तदनंतर आई प्रतिक्रियाओं की उन्मादी आमद से लगा, जैसे कविता-लोक में कोई बड़ी अनहोनी घट गई हो जो नहीं होनी चाहिए थी। चूंकि प्रतिवाद का स्वर कमोबेश शालिनी के विरोध में एक-सी आक्रामकता में आपादमस्तक निमज्जित था। लिहाजा यही प्रतीत हुआ कि कहीं कुछ ऐसा अघटित-सा घटा है, जिसे घटने से रोका जा रहा था। सब चाहते थे कि वह न घटे और अब जबकि यह घट गया, तो हर तरफ अफरातफरी मच गई है... मैं कविता के विषय में अधिक जानने का दावा तो नहीं कर सकता क्योंकि वह मेरे रचनाकर्म के दायरे से बाहर है। उस पर किसी प्राधिकारी सत्ता की तरह टिप्पणी करना मेरे लिए उचित नहीं होगा। फिर भी कविता के एक साधारण पाठक की हैसियत से मुझे लगता है कि उस टिप्पणी में जो मुद्दे उठाए गये हैं, वे कतई अनावश्यक या अनामंत्रित तो नहीं ही कहे जा सकते। भले ही उनकी विवेचना सर्वग्राह्य न हों किन्तु उनके द्वारा प्रस्तुत प्रश्नों की सार्थकता को संदिग्ध नहीं कहा जा सकता । उन पर विचार विनियम बेहद जरूरी है। क्योंकि अभी तक कविता के इरोटिक होने को लेकर उसे प्रश्नांकित नहीं किया जाता रहा है लेकिन पहली बार पोर्न के उसकी पीठ पर आरूढ़ होने की बात उठायी गयी है । 


अनामिका की कविता को जिस हद तक संशय का लाभ दिया जा सकता है, वह उनके तर्कों के लिए मुमकिन नहीं है। अपने पक्ष में उनकी दलीलें इतनी पुष्ट और असंदिग्ध नहीं लगतीं। भाषा के जिन दो लक्ष्यों का जिक्र उन्होंने किया है, उन्हें वह कविताएँ कतई पूरा नहीं करतीं जिन पर शालिनी को आपत्ति है। रुग्णता को रूपक बनाकर लिखी जा रही अधिकांश कविताएँ उस संप्रभु व्यक्ति को सम्बोधित हैं, जिसे पण्य संस्कृति ने गढ़ा है, जो अपने आत्म से नहीं स्वेच्छाचारिता की देह से मुखातिब रहते हुए इरादतन वह खिड़की खुली रखना है जिससे रोशनी नहीं बल्कि ‘भोगाविष्ट’ दृष्टि ही भीतर आ सकती है। व्यक्ति की संप्रभुता अपनी सार्वजनिक नुमाइश में ही सार्थकता तलाश लेती है। ‘उद्बोधन’ और ‘प्रश्नकीलन’-भाषा के यह दोनों ही प्रयोग इस व्यक्ति को लक्षित कर लिखी गई कविताओं के संदर्भ में अर्थहीन हैं, जो केवल शारीरिक पुलक को संवाद की अंतिम अभिलाषा मानता है। मर्यादा को अभिशप्त शब्द बनाकर आप रचना में कोई सौष्ठव नहीं पैदा कर सकते क्योंकि हर आकार एक मर्यादित निग्रह का ही परिणाम होता है। 


अपने आलेख में शालिनी इसी निग्रह की सांस्कृतिकता के नहीं बल्कि मनुष्यता के सन्दर्भ में एक शालीन माँग कर रही हैं, जिसे दरकिनार करने का मतलब साहित्य में ‘सौष्ठव’ को दरबदर करना होगा। धर्मशास्त्र में ईश्वर की उपस्थिति के पक्ष में टॉमस इक्वीनॉक्स और विलियम पेली जैसे विद्वानों ने जिन युक्तियों का सहारा लिया है, वह साहित्य पर भी लागू होती है, क्योंकि साहित्य का भी अपना एक धर्म है। वह स्वातंत्र्य की प्रविधि में मर्यादा की परिधि का अतिक्रमण नहीं कर सकता। प्रयोजन और वर्जना-दोनों से आप अकारण पीछा नहीं छुड़ा सकते बल्कि बाजदफा तो वर्जनाहीनता ही रचना का प्रयोजन बन जाती है। जैसा कि शालिनी पूछती हैं -  क्या मनोरंजन ही साहित्य की एकमात्र सार्थक निष्पत्ति हो सकती है ? मनोरंजन भी ऐसा, जिसका एकमात्र रंजक तत्व कामोद्दीपन हो। अश्लीलता पर जब भी बहस छिड़ती है, तो उसके पक्ष में बहुधा यह समवेत स्वर उभर कर आता है कि ‘अमुक पूर्ववर्ती रचनाकार पर भी ऐसे ही आरोप लगे थे’ किन्तु कालांतर में वह बड़े लेखक सिद्ध हुए। यह तर्क उतना ही जराजीर्ण है जैसे कि कहा जाए हमारे अब्बा हुजूर भी `की होल' से झांकने का हुनर रखते थे। माशा अल्लाह कभी पकड़े भी गए, तो उनका जवाब था - हम अपनी आत्मा के भीतर झाँक रहे थे, `की होल' तो इत्तफाकन सामने आ गया। 


मंटो और तमाम ख्यातनाम रचनाकारों की विवादास्पद कहानियों के संदर्भ में मेबलडॉज की उक्ति का सहारा अक्सर लिया जाता रहा कि ‘रूह तक पहुँचने का सबसे सुरक्षित और सुनिश्चित जरिया सिर्फ गोश्त से भरा जिस्म है।’ कई नामचीन लेखकों ने इस सफाई से आजमाया फिर भी तलछट में बची रह गई थोड़ी सी अ-‘क्षर’ दृष्टि बता सकती है कि अधिकांश आरोप निराधार नहीं थे। मंटो ने बेशक स्त्री के वक्षों पर ‘फाहा‘ जैसी दिलचस्प और मासूमियत से भरी कहानी लिखी, जो पवन करण और अनामिका की रचनाओं से कहीं बेहतर थीं, मगर यह भी सच है कि उनकी कुछ अन्य कहानियों (ठंडा गोश्त, नंगी आवाजें, बू, पढ़िए कलमा) में अश्लील ब्यौरे कथानक की निर्विवाद श्रेष्ठता के बावजूद पाठ में खलते हैं। उर्दू गद्य में उन दिनों यह चलन में था, क्योंकि कृष्ण चंदर और राजेन्द्रसिंह बेदी की रचनाओं पर भी इसका असर नजर आता है। अगर यही कसौटी रखें, तो हिन्दी कविता हाल में जवान हुई है। मगर मेबल डॉज उसका ‘आपात निर्गम’ साबित नहीं होंगे, क्योंकि शालिनी माथुर ने सूसन ग्रिफिन को उद्धृत करते हुए उस लिहाफ की परतें हटा दी हैं, जिसके नीचे मादकता के नाम पर यौनिकता की धुंधकारी देह विकसित हो रही थी। 


हिन्दी कविता की असली चिंता मन-शरीर की विभक्त व्यंजना के बीच पल रहे उस अनैतिक रचना शास्त्र की पड़ताल पर केन्द्रित होनी चाहिए, जिसकी ओर सूसन ग्रिफिन का आकलन इंगित करता है। देह को आत्मीय संवेग से पृथक कर उसे एक ‘प्लेथिंग‘ में बदलना किसी रचना का मंतव्य नहीं हो सकता क्योंकि कविता सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है-शारीरिक अवयवों और चिलमन से लगे बैठे इरादों का भी नहीं। 


दुर्भाग्यवश हमारे यहाँ राजनीतिक धरा पर भी विमर्श इतनी जल्दी वैयक्तिक बहस में नहीं बदलता, जितना कि साहित्य के जगत में। शालिनी के आलेख को निजी धरातल पर एक फ्रंटल-अटैक की तरह देखे जाने की कोई जरूरत नहीं थी। खासकर तब जब हम साहित्य में भाषा की फुल फ्रंटल मुद्रा के साथ अवसन्न खड़े हैं। संभवतः शालिनी से यह भूल अवश्य हुई है कि अपने आलेख के अन्तर्गत उन्होंने जिन दो कविताओं का हवाला दिया, वह एक ही परिप्रेक्ष्य के धरातल पर भी देखी जा सकती हैं। अतः उन्हें एक रूग्ण काव्य के संदर्भ में परस्पर आरूढ़ (जक्स्टापोज) भी किया जा सकता है। बेशक अनामिका की कविता में इरोटिक एलीमेंट अवश्य मौजूद है। और रचना का मूल अभीष्ट समूची कविता में दृश्य की परिधि से ओझल नहीं होता। समस्त बलाघात देह पर ही है मगर स्मृतियों की सुरक्षित़ ओट लेकर। 


दूसरी ओर पवन करण की कविता को लें, जो देह के एक मांसल सत्य को भाषा के पॉपुलिस्ट मुहावरे में चुहल की तरह प्रस्तुत करती है। भले ही कविता के अंत में त्रासदी का एक दृश्यचित्र यत्नपूर्वक जोड़ा किन्तु वह वैसा ही है, जैसे सिनेमाघर में घंटे भर अश्लील फिल्म चलने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय का कोई सरकारी संदेश दिखाकर उसे फिल्म्स डिवीजन की भेंट बता दिया जाए। पवन की पूरी कविता का समूचा प्रणय संवाद ही यौन अभिमुख है। कवि अपने पात्रों के जरिए लगातार एक ललचाऊ सेक्सुअल बिल्ड अप की सृष्टि करता है। नायिका अपने पुरूष को बदस्तूर दैहिक प्रलोभन दे रही है।


घर पहुँच कर जाँच लेना इन्हें (वक्षों को), शिक्षा संस्थान में बैठी युवती अपनी संगी को इस शैक्षणेतर गतिविधि का खुला आमंत्रण दे रही है। पुरूष उसकी वात्सल्य वाहिनियों को ‘शहद के छत्ते‘ और ‘दशहरी आम‘ जैसी विशुद्ध यौनार्थक उपमाओं से नवाज रहा है और वह (नायिका) आल्हादित है। इस चीप ‘वर्बल फोरप्ले‘ का वह मजा ले रही है, जिसकी परिणति अंततः दैहिक संसर्ग में होना है। नायिका भी यही चाहती है - वह अपने साथी से प्रेम माँग ही नहीं रही। लिहाजा एक वक्ष के न रहने पर वह उसकी अपेक्षा कैसे रख सकती है, जो (कविता के स्त्री-पुरूष के बीच) कभी उपस्थित ही नहीं था। यदि किसी त्रासदीवश पुरुष को अपने अंग विशेष से वंचित होना पड़ता, तब नायिका उसके प्रति क्या वैसी ही उदासीन प्रतिक्रिया दर्शाती, जैसी पुरुष दर्शा रहा है। उन दोनों के दरम्यान ‘वैसा कुछ‘ था ही नहीं, जिसके बगैर उनके बीच ‘कितना कुछ‘ हट जाए। भाव की कोई अगोचर सृष्टि थी ही नहीं, जो गोचर मांसल उपस्थिति के अंग-भंग के बाद भी बची रह पाती।


रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने नृत्य को मनुष्य की एक क्षैतिज कामना की उध्र्वाभिमुख अभिव्यक्ति कहा था। साहित्य में यौन एक निम्नाश्रयी कामना (बेस डिजायर) का दृश्य के दायरे में स्फुरण है, जिसकी उपस्थिति अपरिहार्य तो कतई नहीं कही जा सकती। वह बेशक एक जॉनर के रूप में बनी रहे मगर उसे केन्द्रीय सत्ता घोषित करना उचित नहीं है। इरोटिका को साहित्य के फिटनेस रेजीमन की तरह पेश करने पर हम ‘फिल्दी‘ और ‘हैल्दी‘ का फर्क भी भूल जाएँगे। कदाचित् शालिनी माथुर की असली चिंता यही है। 


22, 21/ सेक्टर-ए,
साईंनाथ कॉलोनी, इंदौर


गुरुवार, 6 सितंबर 2012

'कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ?'

34 टिप्पणियाँ

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यह आकस्मिक नहीं कि हिन्दी में पहली बार `उदारवादी परिवर्तन' के प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। कविता के क्षेत्र  के अराजक दृश्य पर कोई, गंभीर सामाजिक सांस्कृतिक विवेक के साथ, जिरह शुरू हुई है। मैं इसे `रेडिकल डिस्कोर्स' कहूँगी । दरअसल पश्चिम की सांस्कृतिकता ने जिस तरह पूरे भारतीय समाज को अपने हित में अनुकूलित किया है, उसके लक्षण `फैशन और उपभोग' के मार्ग से  साहित्य में स्पष्ट दीख रहे हैं। वर्जनाओं की रेखाओं को तोड़ने की जल्दबाज़ी में, हिन्दी का `स्त्रीविमर्श'  `बाजारवादी देहविमर्श' के अधीन हो गया है। आज यूरो अमेरिकी `यौन-उद्योग'  इसका केंद्रीय संचालक है।

 हिन्दी में `अनामिका और पवन करण'  की कविताओं में इसके लक्षण देख कर `कथादेश' के जून 2012 अंक में शालिनी माथुर ने गहरी मूलगामी दृष्टि से एक जरूरी आक्रामकता के साथ लेख लिखा ( जिसे 15 जून को नेट पर सर्वप्रथम यहाँ प्रकाशित किया गया -  व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि )। इसके छपते ही `देहमुक्ति'  का `बाजार-दृष्टि'  से संचालित बौद्धिकवर्ग इसके विरोध में टूट पड़ा। कविता तथा `पाठ' के प्रश्न खड़े करके कवियों के असली मन्तव्यों पर नेपथ्य डाला जाने लगा। 

परिचर्चाओं व बहसों का यह क्रम अभी चल ही रहा है - 

  1. व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि : शालिनी माथुर 
  2. आख़िर एकांगिता ही तो अश्लीलता है! 
  3. पवन करण के रुदन से अनामिका की खिलखिलाहट क्या बेहतर है? 
  4. दैहिक गरिमा के भीतर-बाहर 
  5. यह (उनकी) पोर्नोग्राफी नहीं, (आप की) गुंडागर्दी है 
  6. क्या हिंदी की मौजूदा काव्य-संवेदना स्वयं रुग्ण और अश्लील है? 
  7. अनामिका की कविता 'ब्रेष्ट कैंसर और पवन करण की कविता 'स्तन 
  8. कविता को समझने के लिए कविता के योग्‍य बनना पड़ता है
  9. इन्‍हें वीभत्स कहना भी वीभत्स रस का अपमान करना है [शालिनी माथुर]
  10. ‘औरत के नजरिये से’ कुछ और भी कहना जरूरी है [उदभ्रांत]
  11. कविता को कैंसरस बना रहे हैं – ये कवि हैं या वायरस? [डॉ दीप्ति गुप्‍ता]
  12. गफलत छोड़िए, समस्त स्त्री-लेखन स्त्रीवादी लेखन नहीं है! [अर्चना वर्मा]
  13. क्या हिंदी की मौजूदा काव्य-संवेदना रुग्ण और अश्लील है? [आशुतोष कुमार]
  14. कुंडली मारे बैठी स्त्री देह
  15. ''कविता , आलोचना और पोर्नोग्राफी ''
  16. कविता की व्याधि या व्याधि की कविता (हाशिया)

..... इस हड़कंप के बीच कथाकार-चित्रकार प्रभु जोशी ने कथादेश के ताज़ा अंक (सितंबर 2012) में अपनी लंबी टिप्पणी लिखी है, जो इस सारे कुहासे को बहुत धैर्य से साफ करती है तथा इस ओर भी इंगित करती है कि सृजनात्मकता के क्षेत्र में फूहड़ता को मूल्य बनाना एक गहरा सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिकता के विरुद्ध अपराध है। 

प्रभु जोशी का यह लेख शालिनी माथुर के लेख के पश्चात् छिड़े विमर्श को साधता व उसकी परीक्षा करता भी चलता है व साथ ही उसके परिप्रेक्ष्य में उठे प्रश्नों के उत्तर देता हुए हिन्दी की वर्तमान आलोचना व रचना के अंधत्व की तहें भी निर्ममता से उधेड़ता है। दिल्ली के एक मित्र ने डाक से अंक मिलते ही स्कैन कर के लेख मुझे ईमेल कर दिया। उस स्कैनप्रति से तैयार किए इस पाठ को `नेट' पर सर्वप्रथम Beyond the Second Sex (स्त्रीविमर्श)  के माध्यम से पाठकों के समक्ष रखना मेरे लिए यों महत्वपूर्ण है कि शायद यह शल्यचिकित्सा नई पीढ़ी की रचनात्मकता को सँवारने व सही दिशा देने के लिए भी कई अर्थों में महत्वपूर्ण है और एक प्रकार से इस विमर्श के बहाने कई खतरों व छ्द्मों की पट्टियाँ भी खोलती चलती है। हिन्दी की भावी पीढ़ी इस लेख में दिखाए आधुनिक तकनीकी विद्रूप व छ्द्म की पैमाईश के खतरों से सावधान हो कर ही सही, सही दिशा में बढ़ेगी, यह न्यूनतम आशा है। 

 पाठकों के विमर्श हेतु प्रस्तुत है प्रभु जोशी का, बौद्धिक विमर्श को आमन्त्रित करता, वह लेख ।  
- कविता वाचक्नवी

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'कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ?' 
 - प्रभु जोशी 



`कथादेश' के ताजा अंक को देखकर यह सुखद विस्मय हुआ कि मूलत: कहानी पर केन्द्रित एक पत्रिका ने अपने पृष्ठों पर कविता को लेकर, इस उत्तर-औपनिवेशिक समय में, सर्वथा नये कोण से एक ऐसी बहस को जन्म दे दिया है, जिसे जरूरी तौर पर किसी कविता-केन्द्रित पत्रिका से बहुत पहले उठना चाहिए था | कदाचित यह वहाँ इसलिए सम्भव नहीं हो सका, चूँकि एक लम्बे कालखण्ड से वहाँ से बहस बिदा हो चुकी है| और अब बहस इस पर भी नहीं होती कि बहस क्यों नहीं हो रही है ?



'कथादेश' के ताजा अंक को देखकर यह सुखद विस्मय हुआ कि मूलत: कहानी पर केन्द्रित एक पत्रिका ने अपने पृष्ठों पर कविता को लेकर, इस उत्तर-औपनिवेशिक समय में, सर्वथा नये कोण से एक ऐसी बहस को जन्म दे दिया है, जिसे जरूरी तौर पर किसी कविता-केन्द्रित पत्रिका से बहुत पहले उठना चाहिए था | कदाचित यह वहाँ इसलिए सम्भव नहीं हो सका, चूँकि एक लम्बे कालखण्ड से वहाँ से बहस बिदा हो चुकी है| और अब बहस इस पर भी नहीं होती कि बहस क्यों नहीं हो रही है ? दरअसल, यह क्षम्य है क्योंकि उनकी किंचित् अपरिहार्य-सी विवशताएँ हैं| मसलन, सम्प्रति वे एक दूसरे की कविता के 'श्रेष्ठ' और 'श्रेष्ठतर' बताने की परिश्रम-साध्य तार्किक युक्तियों को आविष्कृत करने में लगे हुए हैं | नतीजतन उनके पास अवकाश का ही सबसे बड़ा अभाव है | वे यदा-कदा अपनी उन एक-सी जान पड़ने वाली पत्रिकाओं के पृष्ठों पर, परस्पर एक दूसरे से मिथ्या-असहमति प्रकट करते रहते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से वे एक दूसरे से पूरी तरह सहमत हैं | वस्तुत: वहाँ, उन सब के बीच एक अप्रकट समन्वय है| एक ऐसा मतैक्य है, जिसके पार्श्व में हितों की अखण्ड सूत्रबद्धता है| वे मोलियर के पात्रों की तरह एक दूसरे को बधाइयाँ देते हुए बरामद किये जा सकते हैं | 


बहरहाल कहना न होगा कि उनके बीच मूल-समस्या 'महानता' के निर्धारण की है| सबके अपने-अपने महान हैं, और गाहे-ब-गाहे जिनका 'महा-मस्तकाभिषेक' चलता रहता है| सबके अपने-अपने 'कुलश्रेष्ठ' हैं तथा यह चेतावनी जारी कर दी गई है कि उनके 'रचे हुए' की 'मौलिकता' और 'महानता' के प्रति सभी प्रकार की आशंकाओं को पूर्णत: स्वाहा करने के बाद ही कोई उनकी कविता के निकट आये| यह आकस्मिक नहीं कि, कविता के कुछेक 'कुलशील' तो ऐसे भी हैं, जो ऐसे अप्रत्याशित खतरे का पूर्वानुमान लगा कर अपने काव्य-कुटुम्बियों के सदस्यों की कविता के विषय में होठों को 'अद्भुत' शब्द से ही खोलते हैं| और यदि उनके लिए इस शब्द को प्रतिबंधित कर दिया जाये तो वे हमेशा के लिए गूँगे ही हो जाएँ | 



कविता के क्षेत्र में 'प्रतिमान' शब्द को अब पूरी तरह लज्जास्पद बना दिया गया है| और आलोचना-दृष्टि की बात करने वालों को ताकीद कर दी गई है कि वे इस शब्द से एक किस्म की 'हाइजीनिक-डिस्टेंस' बनाकर रखें|
यह अब कतई विस्मय की बात नहीं कि कविता के क्षेत्र में 'प्रतिमान' शब्द को अब पूरी तरह लज्जास्पद बना दिया गया है| और आलोचना-दृष्टि की बात करने वालों को ताकीद कर दी गई है कि वे इस शब्द से एक किस्म की 'हाइजीनिक-डिस्टेंस' बनाकर रखें| यह अवश्यम्भावी है, ताकि आप 'समझ की रूग्णता' के शिकार होने से बचे रह सकें |......कहना न होगा कि अब उस 'काल' की तो कभी की अन्त्येष्टि हो चुकी है, जिसमें कभी कविता के नये पुराने 'प्रतिमानों' की कागारौल मची रहती थी| अब 'प्रतिमान' नहीं बस 'पैराडाइम' हैं, जो साहित्य में पूर्व 'प्रतिमानों' की मरणासन्नता की सर्वज्ञात सूचना है| 'पैराडाइम' सुविधाजनक प्रविधि से 'दाएँ' या 'बाएँ' शिफ्ट होता रहता है| हालांकि, एक 'विचारधारा' के पराभव के पश्चात बायीं तरफ शिफ्ट होने में किंचित् अड़चनें उठ आती हैं| अत: अब किसी भी कोण के शिफ्ट को अनिवार्यत: बायाँ ही मान लिये जाने का अभूतपूर्व और अघोषित प्रस्ताव है| और, अब वामांगियों को विषयवस्तु बनाकर जो कुछ भी रचेगा, वह स्तुत्य ही होगा | चूँकि यह 'दबी हुई अस्मिताओं' का उदयकाल है| कुल मिलाकर निश्चय ही 'घनमंथन' की इस परिस्थिति की निर्मिति में वामालोचना की वयोवृद्धावस्था ने भी काफी हद तक इमदाद की है| फिर नव-उदारवाद के आगमन के साथ ही उन्हें अवकाश पर भी भेज दिया गया है | 



यूरो-अमेरिकी गर्ली-मेग्ज़ीन्स



बहरहाल , 'कथादेश' के दो अंकों में कदाचित् साहित्य में पहली दफा ''कविता और पोर्नोग्राफी'' के अप्रत्यक्ष गठजोड़ पर हो रही इस तरह की जिरह को पढ़कर मुझे साठ के दशक की यूरो-अमेरिकी गर्ली-मेग्ज़ीन्स का स्मरण हो आया, जिनमें पोर्न-इंडस्ट्री की पूँजी लगी हुई थी | यह प्रिंट में पोर्न को प्रविष्टि दिलाने का ही सुविचारित उपक्रम था, ताकि उसे एक यथेष्ट कानून-सम्मत हैसियत हासिल हो सके | 


उन महिला पत्रिकाओं में उनके सम्पादकीय एकांश के कर्मचारी ही हर अंक में नित नये नामों से चिट्ठियाँ लिखा करते थे| पत्र-सम्पादक नामक स्तंभ में वे स्वयं ही स्त्रियाँ बनकर अपनी यौन संबंधी समस्याओं के विषय में विस्तार से निर्भीक भाषा में लिखते थे कि उनके स्तन का आकार या कुचाग्रों का रंग ऐसा-वैसा होता जा रहा है| योनि संकुचन की शिथिलता बढ़ गयी है...संसर्ग में आनन्द का चरमोत्कर्ष चला गया है.....'बताइये मैं क्या करूँ ?' बाद में वे ही ऐसे प्रश्नों के सन्दर्भ में 'विज्ञान का मुखौटा' लगाकर मिथ्या-गंभीरता के साथ उत्तर तैयार कर के छापते थे, जो उत्तरोत्तर, भाषा के 'सेन्सुअस-इडियम' से अलंकृत किये जाने लगे कि जिसके चलते स्त्रियों से ज्यादा पुरुष पाठकों के 'यौनिक-आनंद' का पाठ-विस्तार होने लगा| रति रोगों की समस्या के समाधान के बहाने, धीरे-धीरे इन पत्रिकाओं में सेक्स को इतना 'ट्रांसपेरेण्ट' बनाया जाने लगा कि हिन्दी के हमारे 'खुला खेल फरूक्काबादी' वाले जुमले का सफल चरितार्थ होने लगा| अब युवतियाँ पुरुष मित्रों से अपने संसर्ग की इच्छा, समस्या और सलाह को समूचे सांस्कृतिक संकोच को तोड़कर रखने लगीं| और जब ऑर्गेज़्म को लेकर समस्याएँ रखी जाने लगीं तो थोड़े ही वक्त में वे पत्रिकाएँ लगभग 'सॉफ्ट पोर्न' की रूप-सज्जा में आ गयीं और उन्होंने बिक्री के मार-तमाम अकल्पित कीर्तिमान बनाने शुरू कर दिये |

स्त्री की देह का नया लोकार्पण  


टेलिजेनिक पिता विज्ञापनों में अपने सुपुत्र को एड्स नामक महारोग से बचाने के लिये उसकी जीन्स की जेब में चुपचाप कण्डोम रखकर अपनी विज्ञानवादी भूमिका में आ गया| बदचलनी बदलकर उत्तर-आधुनिक जीवनशैली कहलाने लगी | माँएँ सैक्सी कहला कर दर्पवती होने लगीं |
....... बहरहाल, दुर्भाग्यवश प्रिंट में हमारे यहाँ स्त्री-यौनिकता का ऐसा सार्वदेशीय खुलापन हासिल करने में मार-तमाम कई अड़चने थीं, लेकिन भला हो कि भारत में एड्स का छींका सौभाग्यवश अमेरिका के 'सेण्टर फॉर डिसीज कण्ट्रोल' की कृपा से ऐसा टूटा कि हम बहुत जल्दी उन तमाम गर्ली-मेग्ज़ीन्स को पछाड़ने की हैसियत में आ गये| 'नाको' के कण्डोम-प्रमोशन कार्यक्रम ने इस उपलब्धि में आशाजनक अभिवृद्धि की| ये माध्यमिक शाला के बच्चों तक में ज्ञानार्जनार्थ वितरित किये गये| बिल क्लिण्टन के भारत आगमन पर बैंगलोर में कण्डोम के स्वागत द्वार बनाये गये| टेलिजेनिक पिता विज्ञापनों में अपने सुपुत्र को एड्स नामक महारोग से बचाने के लिये उसकी जीन्स की जेब में चुपचाप कण्डोम रखकर अपनी विज्ञानवादी भूमिका में आ गया| बदचलनी बदलकर उत्तर-आधुनिक जीवनशैली कहलाने लगी | माँएँ सैक्सी कहला कर दर्पवती होने लगीं | वस्त्र देह पर गनीमत होने लगे | फैशन ने भारतीय स्त्री की देह का नया लोकार्पण किया | प्रोढ़ाओं का यौनिक-निजता को ढाँपते रहने वाला पल्ला उड़ा और युवतियों के लिये 'डॉगी-फक' की फैण्टसी फार्म करने वाली जीन्स की 'बैक-फिटिंग' आने लगी | यह पोर्न इंडस्ट्री के भारत में प्रवेशपूर्व का प्रशस्तीकरण- प्रक्रिया थी | क्योंकि जितनी विदेशी पूँजी के लिए हमने अपनी अर्थ-व्यवस्था के दरवाजे खोले, उससे कई गुना राजस्व चीन अमेरिका से सेक्सटॉयज के व्यापार से अर्जित कर लेता है | एक हम हैं कि इस क्षेत्र में ठिठके और ठहरे हुए हैं फिर हमारे यहाँ सेक्स-वर्जनाओं की बहुत सारी बाधाएँ हैं | वे स्पीड ब्रेकर्स हैं| यदि इसे एक गतिमान समाज बनाना है तो उनकी 'सैद्धांतिकी' बताती है कि 'सामाजिक आघात' ही 'सामाजिक विकास' है | भारत को इस दिशा में शीघ्र ही कार्यवाही करनी है| कहना न होगा कि बाजार के वर्चस्व के बढ़ने के साथ ही यह सम्भव भी होने लगा है | सांस्कृतिक संकोच की बिदाई बेला का पूर्वरंग है | 


जब भाई आशुतोष कुमार ने अपने आलेख में पोर्नोग्राफिक होने के लांछन से इरादतन बदनाम की जा रही हिन्दी की श्रेष्ठतम कविताएँ उद्धृत कीं तो सचमुच ही मैंने उन्हें पहली बार अविकल रूप में पढ़ा और पाया कि हिन्दी में कैंसर एक नयी 'काव्य-युक्ति' बनकर ऐन्द्रिकता से निर्विघ्न क्रीड़ा के लिए ''उपर्युक्त नई और निर्द्वंद्व संकोचहीनता'' के साथ मनोवांछित स्पेस निर्मित करने में सफलतापूर्वक इमदाद कर रहा है| यह रोग और कविता के मध्य नया सहकार है जो कविता की दुनिया को पहली बार इस सूत्र से सेन्सुअसली सम्पन्न बना रहा है | 

बहरहाल, अब हम 'स्तन' नामक कविता के आन्तरिक स्थापत्य को देखें तो वहाँ, उसकी आरंभिक चालीस पंक्तियाँ प्रकारान्तर से 'प्लेज़र विद बेबी बूब्स' का ही वितान रचती है| अत: 'स्तन' कविता की संरचना के बारे में यदि मैं अपनी स्थानीय मालवी बोली में बताऊँ तो कहना होगा, 'ये तो मांड्णा में टिपकी धर देणे का काम है|'

बहरहाल, अब हम 'स्तन' नामक कविता के आन्तरिक स्थापत्य को देखें तो वहाँ, उसकी आरंभिक चालीस पंक्तियाँ प्रकारान्तर से 'प्लेज़र विद बेबी बूब्स' का ही वितान रचती है| अत: 'स्तन' कविता की संरचना के बारे में यदि मैं अपनी स्थानीय मालवी बोली में बताऊँ तो कहना होगा, 'ये तो मांड्णा में टिपकी धर देणे का काम है|' अर्थात् आप मांडना तो अपनी मन-मर्जी का चाहे जैसा बनाइये बस उसके अंत में कहीं 'टिपकी' (बिन्दी) लगा दीजिये| यह आपके किये धरे को 'अनालोच्य' बनाने की चतुराई होगी| यह आपके 'चित्रण' को लेकर उठ सकने वाली किसी भी किस्म की आपत्तियों को छीन लेगी| इसलिए कविता में अपनी आरंभिक-संरचना में कवि कुचों से पूर्वरंग की तरह कितनी ही किस्म की 'कुचमात' करता रहे और चाहे कविश्रेष्ठ के लिये यही कविता का आत्यन्तिक अभीष्ट भी हो, लेकिन अंत में करूणा का तिनके की आड़ की तरह उपयोग कर लीजिए | यह आलोचना के खतरे से परिचित होना तथा संभावना को सफलता से दुहना होगा | यह आपत्ति उठाने के लिए मुँहतोड़ उत्तर का आधार होगा| क्योंकि 'करूणा का आचमन' अवशिष्ट की भी शुद्धि करके उसे स्वीकार्य बना देगा | दरअसल कविता में यह अपनी 'चतुराई पर आश्वस्त' कवि का स्वयम् को जरूरत से ज्यादा मेधाग्रस्त समझ लेने का संकट है | 


यह पुरुषवादी नहले पर, स्त्री-वादी दहला मारने की तसल्ली है 


दोनों ही सर्जक अतिरिक्त रूप से सतर्क हैं कि वहाँ कहीं शिशु न आ धमके | क्योंकि कविता में आते ही वह कमबख्त दुधमुँहा उसकी 'अमानत' होने के दावे को खारिज कर देगा, क्योंकि 'जैविक-रूप' से तो वे उसकी ही अमानतें हैं | उन पर उसका 'बॉयोलॉजिकल-'पजेशन' है | उसके जीवन-मरण का प्रश्न जुड़ा है उनसे | वह सस्पेन्शन ऑफ सेक्‍सुएल्टी की अवांछनीय-स्थिति निर्मित कर देगा | कविता में व्यर्थ ही 'यौनिकता' और 'मातृत्व' का द्वैत खड़ा कर देगा| क्योंकि अभी तक संसार में कहीं भी ऐसी स्त्री का बिम्ब नहीं है जिसमें 'मैथुन और मातृत्व' एक साथ रख दिये गये हों | यहाँ तक कि कोई पोर्नोग्राफर भी ऐसा धृष्टतम दुस्साहस नहीं कर पाया है
दूसरी कविता 'ब्रेस्ट कैंसर' है | दोनों ही कविताओं में 'दुद्धुओं' से भाषा से भाषा में पैदा किये जाने वाले खेल में स्वयं को पारंगत समझने वाले कवि का युक्ति-प्रदर्शन है | शायद इसे ही विटगेंस्टाइन ने 'भाषा के छुट्टी पर जाने से पैदा हुई मौज' कहा है | यहाँ कविता में मौज ही प्रतिपाद्य है | यहाँ ध्यान देने की एक महत्वपूर्ण बात और भी है | देखें कि दोनों ही सर्जक अतिरिक्त रूप से सतर्क हैं कि वहाँ कहीं शिशु न आ धमके | क्योंकि कविता में आते ही वह कमबख्त दुधमुँहा उसकी 'अमानत' होने के दावे को खारिज कर देगा, क्योंकि 'जैविक-रूप' से तो वे उसकी ही अमानतें हैं | उन पर उसका 'बॉयोलॉजिकल-'पजेशन' है | उसके जीवन-मरण का प्रश्न जुड़ा है उनसे | वह सस्पेन्शन ऑफ सेक्‍सुएल्टी की अवांछनीय-स्थिति निर्मित कर देगा | कविता में व्यर्थ ही 'यौनिकता' और 'मातृत्व' का द्वैत खड़ा कर देगा| क्योंकि अभी तक संसार में कहीं भी ऐसी स्त्री का बिम्ब नहीं है जिसमें 'मैथुन और मातृत्व' एक साथ रख दिये गये हों | यहाँ तक कि कोई पोर्नोग्राफर भी ऐसा धृष्टतम दुस्साहस नहीं कर पाया है कि स्तनपानरत स्त्री को सम्भोगरत चित्रित कर दे | न कहो 'सृजनात्मक-स्वायत्तता' को वर्जनाहीन ध्रुवान्त तक ले जाने का जो नया स्त्रैण-शौर्य ऐसी कविता में देह के जिस चातुर्य के साथ दिगम्बरत्व का दिग्दर्शन करा रहा है वह कुछ भी करवा सकता है| बहरहाल, स्त्री स्तनों के साथ वहाँ, कविता से धात्री के रूप में तयशुदा ढंग से विस्थापित कर दी गई है | केवल कुचवती है, जो स्त्री को केवल शिश्न-कीलित ऑब्जेक्ट में अवघटित कर देता है| 



कवि-द्वय जानते हैं कि वस्तुत: बच्चा कविता में दाखिल होते ही कविता के निर्धारित स्थापत्य को ध्वस्त कर देगा| उसकी किलकारी से कविता कामाश्रयी होने की रंजकता से हाथ धो बैठेगी | यौनानंद का नियोजित 'उपादानी वृत्त' टूट जायेगा| वह 'रमणीत्व' की ऐन्द्रिकता से पैदा होने वाले 'सुख मे प्रवंचना' खड़ी कर देगा| इसलिए स्पष्टत: दोनों की कविता का अभीष्ट भिन्न नहीं है| अलबत्ता, दूसरे नम्बर की कविता पहले नम्बर की कविता को चुनौती देती है जैसे कहती है, ''यह विषय स्त्री का है, कवि बाबू ! अत: देखो, एक नयी स्त्रैण युक्ति से ऐसे विषय पर कविता की चमकीली गढ़न्त कैसे संभव होती है | आओ, मैं बताती हूँ | '' इस कविता में पवनकरण की कविता को पीछे छोड़ने का सृजन-संकल्प है| यह कविता नहीं है, बल्कि पुरुषवादी नहले पर, स्त्री-वादी दहला मारने की तसल्ली है| पहली कविता की अपेक्षा यहाँ इस कविता में सर्जक के पास अपने 'स्त्री-वर्चस्व' की निर्भीकता भी है | वह निर्द्वन्द होकर कुचों से क्रीड़ा रचती है | यह 'माय वैजाइना माय रूल' की पोर्नोग्राफिक मुनादी का साहस है, जिसके चलते स्त्री की यौनिक-निजता का पोर्न-उद्योग के व्यापक हित में लोकार्पण कराना संभव हुआ था | 


cancer isn't prettyपहली कविता में तो मात्र एक को ही खो देने का हादसा था| यहाँ एक के बजाय दोनों को खो देने से कवि के लिये कविता में 'क्रीड़ा का वृत्त' वृहद् होने की गुंजाइशें बनीं | यह मेसेक्टटॉमी पर एकाग्र कविता है| यहाँ  मेरा मन्तव्य दोनों कविताओं के बीच तुलना करने का कतई नहीं है| 'श्रेष्ठ' और 'श्रेष्ठतर' के पंगे का प्रश्न मेरे लिये सर्वथा निर्मूल है| यह कवि बिरादरी के कौटुम्बिक कलह का आन्तरिक प्रकरण है| पर दूसरी कविता में स्त्री में रजोनिवृत्ति के बाद सेक्स को लेकर जो खिलन्दड़पन अपने पूर्ण प्राकट्रय पर होता है, उसका भी यथोचित योगदान है | घरों में हमें रजोनिवृत प्रौढ़ा चाचियों, मौसियों व बुआओं की नवोढ़ाओं से होने वाली चुहल में इसके स्पष्ट दर्शन मिलते हैं | 


बहरहाल तुलनाएँ सिर्फ उनके मंसूबों की हैं, जो कि अपनी प्रकृति में 'रचना-साम्य' के लिये दोनों सर्जकों को पूर्णत: वशीभूत कर के रखते हैं | क्योंकि दोनों ही कवि 'गोपन' को खोलने की 'थ्रिल' को करूणा के कतरों से छुपाने का स्वांग रचते हुए, उन्हें खोलकर उनसे खेलने को ही अपना 'काव्याभीष्ट' बनाते हैं| वही उनका और कविता का प्रतिपाद्य है| यहाँ  नवगीतकार नईम की बात याद आ रही है, जिसमें वे गोश्तखोरी की ओर संकेत करते हुए कहते हैं, 'ईद-बकरीद बस तो बहाना है'। यह वैसा ही चातुर्य है, जो करूणा का कारोबार करते हुए फिल्मों के पेशेवर लोग दृष्य-भाषा के माध्यम से दर्शक की 'यौनोत्तेजना' से इस तरह खेलते हैं कि दृश्य से आँख से ज्यादा अन्तर्वस्त्र भीग उठें |

'इमेजिनेटिव सिन्थेसिस' से 'भाषान्ध' बनाने की अचूक तकनीक

निश्चय ही ऐसे में टिप्पणीकर्ता ने इसमें चतुराई से छुपा ली गई 'पोर्नोग्राफिक-नीयत' को पढ़ लिया | उसके पाठ को महान रचनाओं पर 'पोर्नो' होने के लांछन लगाना मानते हुए कविता बिरादरी के पारखियों का एक समूह सहसा तमतमा उठा| दरअसल, पोर्नोग्राफर शब्द के सहारे चित्रात्मक ढंग से 'मिथ्या-यौन तुष्टि' की तरफ ले जाता है | जबकि, 'विजुअल-लैंग्विज' का पोर्नोग्राफर धीरे-धीरे स्त्री को राजी करता है, स्वयं को खोलने के लिए| वह स्वयं को खोलती है और बाद इसके, खुद से खुलकर खेलने लगती है | अपनी यौनिकता भर से नहीं, यौनांगों से खेलते हुए वह 'अन्य' को 'आनन्द' का उपभोक्ता बना लेती है | जो फ्रेम और टेक्स्ट से बाहर है | उसमें पीड़ा और प्रश्नों से भरा कोई सांस्कृतिक संकोच नहीं होता | उसका खिलन्दड़ापन ही माल का सौंदर्यीकरण है | वह जितना खेल के वृत्त का विस्तार करेगी, उतना ही वह उपभोक्ता की तसल्ली का दायरा बृहद बनता जायेगा।  यह 'ब्रेस्ट कैंसर' के लेबल के साथ 'वुमन-सेक्सुअल्टी' की सेंसुअसनेस की पण्य-उद्देश्य के लिये की गई प्रीतिकर पैकेजिंग है| इन बातों को ध्यान में रखकर देखें तो लगता है, यहाँ कविता से मंजा हुआ चातुर्य झलकता है| इस कविता का कवि कुचों को उम्र के दस वर्षों में ले जाता है | पहाड़ों पर चढ़ता है | दूध की नदियाँ बहाता है| पहाड़ खोद कर चुहिया को पकड़ कर लाता है | ज्वैलथीफ के फिल्मी-स्मगलर की तर्ज पर वहाँ से हीरे निकालता है-- यानी एक शब्द की छाया से दूसरे शब्द की तरफ फलाँगते हुए, कई-कई तरह से 'दुद्धुओं' से पर्याप्त दिलेरी के साथ खेलता है | वह कभी उन्हें एब्सट्रैक्ट में ले जाता है फिर कंक्रीट में ले आता है | मुहावरे के परम्परागत अर्थ की छाँह में छुपता है और फिर अर्थ से बाहर निकल कर 'अनर्थ का आनंद' पैदा करता है | यह शब्द में सेक्सुअल की सोलो पर्फार्मेंस है | एक 'इमेजिनेटिव सिन्थेसिस' से 'भाषान्ध' बनाने की अचूक तकनीक है | 

डेस्कटॉप पर राइयों का पहाड़ 

हमारे समीक्षकों का वृद्ध-वृन्द जो अपनी तकनीक-विरक्त दयनीयता को ''स्वयं के भीतर बचा कर रख ली गई मनुष्यता'' के रूप में विज्ञापित करता है | वे नहीं जानते कि ये 'मौलिकता' की कथित 'मार्मिकता' से भरी कविताएँ सिर्फ सिन्थेटिक कविताएँ हैं-जो साइबर स्पेस को खंगालते रहने की अभ्यस्तता से बहुतेरी गढ़ी जा सकती हैं| इस खदान से कविता के कई चमकीले हीरे जवाहरात निकाल कर उसकी द्युति से हिन्दी आलोचना के अधिपतियों को अभिभूत करते हुए 'भाषान्ध' बनाया जा सकता है|
हमारे समीक्षकों का वृद्ध-वृन्द जो अपनी तकनीक-विरक्त दयनीयता को ''स्वयं के भीतर बचा कर रख ली गई मनुष्यता'' के रूप में विज्ञापित करता है | वे नहीं जानते कि ये 'मौलिकता' की कथित 'मार्मिकता' से भरी कविताएँ सिर्फ सिन्थेटिक कविताएँ हैं-जो साइबर स्पेस को खंगालते रहने की अभ्यस्तता से बहुतेरी गढ़ी जा सकती हैं| इस खदान से कविता के कई चमकीले हीरे जवाहरात निकाल कर उसकी द्युति से हिन्दी आलोचना के अधिपतियों को अभिभूत करते हुए 'भाषान्ध' बनाया जा सकता है| आप गूगल का आश्रय लेकर 'ब्रेस्ट केंसर' को लेकर लिखी गयी कविताओं की राई ढूँढने जायेंगे तो वह आपके कम्प्यूटर के डेस्कटॉप पर राइयों का पहाड़ लगा देगा| आप अपने माउस की मदद से उस पहाड़ में से कविता के काम की चुहिया निकाल लीजिये| भाषा की इतनी पूँजी तो आपके पास होनी ही चाहिये कि चुटकी भर 'रसना' से आप बारह गिलास बना लें |......वहाँ एक नहीं दोनों स्तनों की शल्यक्रिया से की जाने वाली 'बाई-लेटरल मेसटक्टॉमी' पर अलग से कविताएँ भरी पड़ी हैं, जिनका किसी भी साहित्यिक दृष्टि से कोई काव्य-मूल्य नहीं है | वहाँ 'गेट-वेल' पोएट्री है, जो रस्मी तौर पर रोगियों के बीच नर्सों और शुभाकांक्षी-समूहों द्वारा अस्पताल के वोर्डों में वितरित की जाती हैं, ताकि उनकी जिजीविषा और आत्मबल बढ़े| वे रोगी के लिए की जाने वाली लैंग्विज-थैरेपी का हिस्सा हैं | वहाँ हर किस्म की व्याधियों पर लिखी गई कविताओं का जखीरा भरा पड़ा है, जिसको उठाकर कोई 'चतुर कविताभ्यासी' अन्य रोगों पर हिन्दी के वृद्ध समीक्षकों को चमत्कृत कर डालने वाली कविताएँ थमा कर, महानता की कतार में खड़े होने के लिए, उनके हाथों से इतिहास के दरवाजे का गेटपास छीन सकता है| 'वी ऑर क्रैक्ड पॉट्रस' रजस्वला होने के साथ स्त्री से जुड़ जाने वाले नियमित रक्तस्राव को लेकर तंजिया कविताएँ हैं| रजोनिवृति पर भी मसखरी करती कई कविताएँ हैं| और तो और, आप मासिकधर्म के रक्त से सने सेनेट्री नेपकिन को लेकर कविता और पेण्टिंग्स दोनों ही बरामद कर सकते हैं| पेण्टिंग में अचानक कर दी गई मूर्खता जैसा भी सौन्दर्य नहीं है| वहाँ 'दुद्धू' और 'पद्दू' पर भी पोएट्री है| बहरहाल कई कई तरह की बीमारियों की सनसनी और सच्चाई से लथपथ ऐसी कई संभावनाशील कविताएँ और कवि वहाँ हचर-हचर कर रहे हैं| सड़ांध में स्वादनिर्माण करने की व्यंजनविधि में निष्णात हिन्दी के कुछ अतिरिक्त प्रतिभाशाली कवि वहाँ से वांछित क्षेत्र की सामग्री उठायें और उसमें अपने पास से 'मिथ्या-भावमयता' भर कर कई ताजा 'भरवाँ' कविताएँ बना सकते हैं| वे गर्मागर्म भी रहेंगी और आस्वाद के स्तर पर आलोचक के मुखारविन्द से विशेषणों को लार की तरह लगातार टपकाएँगी | 


कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी तमाम चमकीली कविताएँ किसी दिन मौलिकता के संदर्भ में 'विश्वास को इरादतन मुअत्तल' करने का काम करेंगी | यदि ऐसी 'सिन्थेटिक' कविताओं की फसल को आलोचना की टेढ़ी नजरों से बचाने के लिए कोई भाषा के काँटेदार तर्कों की बागड़ करेगा तो वह स्वयं संदिग्ध हो जायेगा | यह `गंजे के सिर पर टोपी का इंतजाम' की कोशिश कही जायेगी |' डोंट ट्राय टू कीप द कैप्स ऑन बाल्ड हेड' | 




हिन्दी में साठ के दशक की 'अकविता' प्रवृत्तियाँ 

यहाँ मैं साठ के दशक का स्मरण करना चाहता हूँ, जब योरप में आमतौर पर और अमेरिका में खासतौर पर 'कल के विरुद्ध बिना किसी कल' वाली पीढ़ी 'विचारहीनता के विचार' की सुरंग में फँस चुकी थी| उस वक्त की अंधी कोख से जन्मी थी, 'एंटी-पोयट्री' जिसके विकृत अनुकरण में हिन्दी में 'अकविता-आंदोलन' खड़ा हो गया था| तब कविता स्त्री की जाँघ में पीप और मवाद ढूँढ रही थी| कवि सड़क पर चलती हर स्त्री को छेद की तरह देख रहा था| मरे हुए बत्तखों की-सी लटकती छातियों पर हस्तमैथुन से वीर्याभिषेक कर रहा था | उस समय की अमेरिकी 'एण्टी-पोएट्री' में 'ब्लैक-पोएट्री' नाम की कविता का फैलाया हुआ 'घृणा का समाजशास्त्र' अपने कपड़े उतार रहा था| नग्नता और फूहड़ता विकृति का नया कीर्तिमान बन रही थी| वह सर्जन नहीं उत्सर्जन था| साथ ही साथ अकहानियों की धमचक भी शुरू हो गई थी| जिसमें समुद्र तट की रेत में श्वेत-स्त्री के साथ संभोग करते हुए, पात्र को 'वह अमेरिका की ले रहा है', जैसा शौर्यानुभव हो रहा था| शायद तभी धर्मवीर भारती ने 'चिकनी सतहें बहते आन्दोलन' तथा कमलेश्वर ने 'ऐय्याश प्रेतों का विद्रोह' नामक लेख बहुत आक्रामकता के साथ लिखे थे| लेकिन यहाँ हिन्दी आलोचना के सामाजिक विवेक की सराहना की जाना चाहिए कि उसने 'बेहतर के लिए मेहतर' की भूमिका निभाई और नाबदान को समय रहते निर्ममता के साथ साफ कर दिया था| 'विजप' ( गंगाप्रसाद विमल, जगदीश चतुर्वेदी और श्याम परमार ) की उस कवि-त्रयी की उन रचनाओं का आज कोई अता-पता नहीं है| लोगों को सिर्फ राजकमल चौधरी की ''मुक्ति-प्रसंग'' भर की स्मृति है| चन्द्रकान्त देवताले आदि जल्दी ही अलग हो गये थे - और स्वयं को व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य से जोड़कर आज अपने समय के एक महत्वपूर्ण कवि होने का सम्मान अर्जित किये हुए हैं| 
आलोचना के पास तब व्यापक सामाजिक-आर्थिक संदर्भों में सृजन को नाथने का प्रतिबद्ध संकल्प था| कुछ निश्चित प्रतिमान थे | लगता है दुर्भाग्यवश वैसी साहसिक आलोचना अब नहीं रह गयी है | नयी 'दमित अस्मिताओं’ की अभिव्यक्ति के नाम पर आ रही ऐसी फूहड़ता के बारे में कुछ भी बोलते हुए आलोचना की अब घिग्घी बंध जाती है |


इसकी वजह यही थी कि आलोचना के पास तब व्यापक सामाजिक-आर्थिक संदर्भों में सृजन को नाथने का प्रतिबद्ध संकल्प था| कुछ निश्चित प्रतिमान थे | लगता है दुर्भाग्यवश वैसी साहसिक आलोचना अब नहीं रह गयी है | नयी 'दमित अस्मिताओं’ की अभिव्यक्ति के नाम पर आ रही ऐसी फूहड़ता के बारे में कुछ भी बोलते हुए आलोचना की अब घिग्घी बंध जाती है | 

आलोचना गोलमोल भाषा में अपना छद्म-वक्तव्य देकर बच निकलती है| या फिर मारे डर के वह उल्टे उनकी आरतियों और स्तुतिगान की तैयारियों में जुट जाती है| 

'विचारहीनता के विचार' की सर्वग्रासी अवस्था और आलोचना की सूचना सम्पन्नता की दरिद्रता 

दरअसल सृजनात्मकता के क्षेत्र में ऐसी दारुण दयनीयता इसलिए भी आ गयी है कि वामपंथ के पराभव के पश्चात् के इस उत्तरआधुनिक दौर ने आलोचकों के हाथों से वे उपकरण छीन कर घूरे पर फेंक दिये हैं, जिनसे वे 'सृजन' को कठोरता के साथ कसौटी पर रखते थे| तब वे समूचे सृजन क्षेत्र को विचार से दहकते सवालों को नोंक पर रखते हुए पूछते थे '' तुम्हारे पैमाने और प्रतिमान क्या हैं ?'' पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?'' लेकिन, बकौल नॉम चोमस्की 'अब राजनीति एक बड़ा निवेश हो गयी है और हरेक की जेब में अब अपने-अपने सुभीते और साईज़ का जनतंत्र है| अब मार्केट-फ्रेण्डली फ्रीडम का फण्डा है| चयन को ही सृजन की स्वतंत्रता की तरह बताया जा रहा है| इसलिए कविता व्यापक जन-संदर्भों के सवालों से मुक्त हो गयी है| नतीजतन कवि तथा कविता में 'कैरियरिज्म' ने 'विषय वैचित्र्य' की अनियन्त्रित लिप्सा भर दी है| वह वहाँ जाना चाहता है, जहाँ कभी कोई गया नहीं और कोई जाएगा भी नहीं| यह संस्कृत के 'अगम्यागमन' का ही संकल्प है| वही अब नया 'काव्याभीष्ट' है| फिर भारत जैसे अत्यन्त जटिलता से अंतरग्रथित समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक निषेधों को तोड़े जाने से जो 'थ्रिल' बनती है, वह अब बहुत बिकाऊ सिद्ध हो रही है| भारतीय अंग्रेजी में ऐसे लेखन को लगे हाथ प्रकाशक सर पर उठाने के लिए आगे आ जाता है|
हकीकत ये है कि अब 'फैशन' और 'उपभोग' साहित्य में शिफ्ट हो गया है| यह निश्चय ही 'विचारहीनता के विचार' की सर्वग्रासी अवस्था है| बहरहाल ऐसे समय में 'विचार' की बात करने का अर्थ 'दिगम्बरों' के मुहल्ले में लॉण्ड्री खोलने की जिद करना है|
अत: 'इनसेस्ट' अर्थात् रक्त-संबंधियों से सेक्स का चित्रण बहुत सेलेबल है| याद कीजिए कि कैसे 'ब्लू-बेडस्प्रेड' के प्रकाशन का सौदा तत्काल सत्तर लाख में हो गया| क्योंकि वह सहोदरा से सेक्स को चित्रित करता था| यदि ऐसे साहित्य को हिन्दी में अनूदित कर दिया जाये तो उसकी औकात उस पल्प-लिट्रेचर की रह जायेगी जो रेलों तथा छात्रावासों में पढ़ने-भर की होंगी| हकीकत ये है कि अब 'फैशन' और 'उपभोग' साहित्य में शिफ्ट हो गया है| यह निश्चय ही 'विचारहीनता के विचार' की सर्वग्रासी अवस्था है| बहरहाल ऐसे समय में 'विचार' की बात करने का अर्थ 'दिगम्बरों' के मुहल्ले में लॉण्ड्री खोलने की जिद करना है| 


कुछ वर्षों से 'माय मॉम्स लवर', 'माय मॉम्स न्यू ब्वाय फ्रेण्ड', 'डोण्ट टेल इट टू मॉम' शीर्षकों वाली कविताओं और कहानियों ने साइबर-बिजनेस में करोड़ों की संख्या में 'हिट्स' दीं| अब तो इन टाइटिल के वीडियो आ गये हैं और उनकी क्लिप्स को अपने ब्लैक-बेरी के जरिये मित्रों को भेजना युवा पीढ़ी का नया उत्तर-आधुनिक सांस्कृतिक-आदान-प्रदान है| 'सविता भाभी' भी अपने प्रेमियों के साथ सेक्स-कथा ग्राफिक्स और एनीमेशन में खासा व्यवसाय कर चुकी है| यदि हिन्दी का कोई कवि ऐसे विषयों को कविता में  शामिल करके अपनी प्रतिभा के विस्फोट का चमत्कार पैदा करने लगे और हम उसकी प्रेरणा के मुख्य स्रोतों से अनभिज्ञ हैं तो यह हमारी आलोचना की सूचना सम्पन्नता की दरिद्रता का प्रमाणीकरण है| यह सामाजिक संदर्भों के इलाके का नया अंधत्व है, जिन्हें चमत्कार की चौंध ने 'फोटोफोबिया' पैदा कर दिया है| उनसे ऐसी चमक में विकृतियों की शक्लों की शिनाख्त नहीं हो पा रही है| यह उनके द्वारा गन्धाते गोबर में गालिब का दिग्दर्शन कर लिया जाना है | 


अब बिजूकों के दिन लद गये !

अब अंत में थोड़ी बातें 'ब्रेस्ट कैंसर' नामक कविता की| रचयिता विदुषी अनामिका की प्रति-टिप्पणी को लेकर | टिप्पणी पढ़कर लगा कि उनमें भरपूर कवि-चातुर्य तो है, लेकिन टिप्पणी की भाषा में भी यथेष्ट चतुराई है| वे टिप्पणी के आरंभ में पहले ही अंग्रेजी की छतरी तान कर रख देती हैं | बीच टिप्पणी में डराने के लिए एक अश्वेत कवयित्री की कविता का बिजूका भी गाड़ देती हैं | लेकिन अब बिजूकों के दिन लद गये | वीरेन्द्र कुमार बर्नवाल, जिन्होंने सबसे ज्यादा अफ्रीकी तथा ब्लैक लिट्रेचर खंगाला है, वे बता सकते हैं कि वहाँ की हालत क्या है| रोजन कॉज ने ब्लैक कविता में जहाँ-तहाँ छितरायी हुई इस तरह की फूहड़ता की पर्याप्त सफाई की है | नेट-युग में अब ऐसे बिजूकों से शायद ही हिन्दी का कोई प्रबुद्ध पाठक डरता हो | बहरहाल, वे शालिनी माथुर की टिप्पणी से जागृत अपने क्रोध की 'धधक' को कोमल के ‘कौशल' से 'केमोफ्रलैज' करती हुई , बाहर से बहुत विनम्र जान पड़ती हैं, लेकिन जिस तरह शुरू में ही बहनापे को छोड़ कर, प्रेमचन्द के भाई साहब में काया प्रवेश करते ही, उनके भीतर की उस ज्ञान-वर्चस्व प्रदर्शन की लालसा लगे हाथ लपक कर बाहर आ गयी, वे अपनी सहोदरा की विवेचनात्मक टिप्पणी को 'कोसने और कलपने' का पर्याय बता कर उसे खारिज करने का अप्रकट उपक्रम करती हैं| फिर कविता के स्वभाव को स्त्री का स्वभाव का पर्याय बताने लगती हैं| हालांकि कविता का अगर यही स्वभाव है, तो उन कविताओं का क्या होगा, जो गरेबान पकड़ कर सच को उगलवाने के लिए आगे आती रही हैं ? खैर ऐसे में मुझे सहसा भोपाल स्कूल की समीक्षा-भाषा के स्वांग की याद हो आयी| जहाँ स्वामीनाथन की कलाकृति या कृष्णबलदेव वैद की कहानियों पर बातें शुरू करते हुए कहा जाता था 'उनकी कृति का, कहें कि प्रकारान्तर से, क्वचित् यह स्वभाव ही रहा आया है कि वे पाठक से सहसा सम्वाद के लिए तैयार ही नहीं होतीं | अपितु वह उसकी तरफ इरादतन अपनी पीठ फेरे रहती हैं | उन्हें शनै: शनै: राजी करना होता है |' ज्ञान चतुर्वेदी ने इस चतुराई पर अपनी निर्मल विनोदी टिप्पणी में कहा 'क्या ये यह कहना चाहते हैं कि इनकी कृतियों को औरतों की तरह पटाने की जरूरत होती है ? यानी पाठकजी आयें फिर कविताजी की पीठ पर हाथ फेरें | गुदगुदी करने लगें | तब न कहो कविता जी बुरा ही मान जाएँ| तब क्या होगा ? ..........बहरहाल, गनीमत थी कि वे अपनी टिप्पणी में मिथिला तक ही गई और खजुराहो या अजंता-एलोरा की गुफाओं में नहीं घुसीं | वर्ना जब भी हमारे यहाँ यौनिकता के फूहड़पन पर टिप्पणी की जाती है, तो विद्वज्जन तर्काकाश में उड़ कर तुरत वहाँ पहुँच जाते हैं | और उनकी ही छत्तों और शिखरों पर चढ़ कर टीवी एंकर्स की तरह बोलने लगते हैं--ये देखिये .. यहाँ पत्थरों में मूर्तियों के स्तन भारी हैं, इनके नितम्ब भी भारी हैं और ये सम्भोगरत भी हैं........अब आप ही बताइये कि क्या ये अश्लील हैं ? 
वे दृष्टि में मर्दवाद के महीन लांछन के लिए टिप्पणीकार को 'शालिनी बाबू' भी कहती हैं| उन्हें ईसा का क्रूसीफिकेशन भी याद हो आया | यहाँ तक कि लगे हाथ फासीवाद तक भी याद आ गया| टक्कर के पुरूष और स्त्री की यौनिकता जगा पाने की जैविक चुनौतियों के पार्श्व में खड़े `ऑर्गेज़्म' को भी वे टिप्पणी में ले आयी हैं | पोर्न का सारा व्यवसाय ही 'ऑर्गेज़्म' को रचने या आविष्कृत करने की प्रविधि पर ही टिका है | कहना ना होगा कि किसी दिन ऐसे ही 'पवन-वेग' से भरा कोई नया 'अतिरिक्त-प्रशंसा का शिकार' हिन्दी कविता का नया सम्भावनाशील हस्ताक्षर अपनी बाजारीकृत दिव्यता के साथ इस विषय पर अनामिका और पवन को पछाड़ता हुआ दृश्य में अपना कीर्ति कलश स्थापित कर सकता है


आगे देखें... वे दृष्टि में मर्दवाद के महीन लांछन के लिए टिप्पणीकार को 'शालिनी बाबू' भी कहती हैं| उन्हें ईसा का क्रूसीफिकेशन भी याद हो आया | यहाँ तक कि लगे हाथ फासीवाद तक भी याद आ गया| टक्कर के पुरूष और स्त्री की यौनिकता जगा पाने की जैविक चुनौतियों के पार्श्व में खड़े `ऑर्गेज़्म' को भी वे टिप्पणी में ले आयी हैं | पोर्न का सारा व्यवसाय ही 'ऑर्गेज़्म' को रचने या आविष्कृत करने की प्रविधि पर ही टिका है | कहना ना होगा कि किसी दिन ऐसे ही 'पवन-वेग' से भरा कोई नया 'अतिरिक्त-प्रशंसा का शिकार' हिन्दी कविता का नया सम्भावनाशील हस्ताक्षर अपनी बाजारीकृत दिव्यता के साथ इस विषय पर अनामिका और पवन को पछाड़ता हुआ दृश्य में अपना कीर्ति कलश स्थापित कर सकता है | 


कुल मिलाकर कविता की इन विदुषी की प्रति-टिप्पणी पढ़कर मुझे लगा कि उनके भीतर क्रोध का छुपा हुआ तारत्व तो इतना है कि यदि उनके पास भाषा का कोई बघनखा होता तो वे चतुराई से ऐसी टिप्पणी का पेट चीर कर उसकी अंतड़ियाँ निकाल कर बाहर कर देतीं |


मुझे उनकी ऐसी चतुराई देखकर संयोगवश हमारे गाँव में हर वर्ष दीवाली के समय आने वाला एक अत्यन्त दक्ष तमाशबीन याद आता है, जिसको सामने जमीन पर रखा गया सिक्का उठाना होता था तो वह पहले उस सिक्के के चारों ओर दौड़-दौड़ कर बनेठी घुमाता| फिर हवा में कोड़ा घुमाकर खुद की पीठ पर भी मार लेता| बाद इसके उस सिक्के के ऊपर से चारों दिशा में से पचीसों गुलाटियाँ लगाता रहता और थक कर अंत में उस सिक्के को उठाता था | कुल मिलाकर, वह इन करतबों के प्रदर्शन से दर्शकों में यह बोध पैदा करने की जुगत भिड़ाया करता था कि कितने-कितने जतन के बाद पहुँच पाया है वो सिक्के के पास| यह संघर्ष का हासिल है| भोपाल में अशोक-युग के 'पूर्वग्रह' में कविताओं की समीक्षा की यही प्रविधि होती थी | इस प्रविधि के अनुकरण से हिन्दी में कई प्रतिभाग्रस्त समीक्षक पैदा हुए जिन्होंने कई तिलों में 'ताड़त्व' और वामनों में 'विराटत्व' भरने की कोशिशें कीं | वहाँ समीक्षाभाषा में गंभीरता का 'उर्ध्‍व-उत्कीर्णन' होता था| कविता 'प्रश्नकीलन' करती रहती थी| आलोचना में शब्दाम्बर की इस वृत्ति पर ज्ञान चतुर्वेदी ने एक टिप्पणी भी लिखी थी - '’प्रश्नकीलन से उत्पन्न अर्थ-सीलन‘’ | जिससे कविता की कठिनता की विवेचना के लिए और और कठिन भाषा में लिखी जा रही समीक्षा भाषा पर उपालम्भ था | उसमें एक पंक्ति थी कि  '' कहीं ऐसा तो नहीं कि गोरखपुर का कल्याण अपने नये गेट-अप में भारत-भवन से निकलने लगा हो और मैं गलती से वही उठा लाया होऊँ ? ''

दरअसल , यह भाषा की चतुराई की सतही इलेक्ट्रोप्लेटिंग है | यह ऐसी कलई है, जो पढ़ते ही खुल जाती है | मुझे काव्य-विदुषी अनामिका की कविता तथा टिप्पणी के तिलस्म को देख कर भवानीप्रसाद मिश्र की एक काव्य पंक्ति याद आ गयी -''चतुर मुझे कुछ नहीं भाया, ना स्त्री, ना कविता |'' चतुराई निश्चय ही आपके चिंतन और अभिव्यक्ति दोनों को ही संदिग्ध बनाती है| एक कवि को अपनी कविता पर स्वयम् ही स्वस्थ-संदेह करना आना चाहिये कि क्या रुग्णता पर लिखी ऐसी सिन्थेटिक कविता मृत्यु के भय या विभीषिका के विरुद्ध खड़ी रह सकती है ? ' हलो ! कहो कैसे हो । कैसी रही ? ' की मसखरी क्या मृत्यु से निबट सकती है ?  वे पाठकीय विवेक का गलत आकलन कर रही हैं |

 मौत ने घर देख लिया है

इसे लोक-विवेक से जाँचें तो समस्या बुढ़िया के मरने के अफसोस की नहीं बल्कि चिन्ता तो यह है कि मौत ने घर देख लिया है | इसलिये काव्य-कुटुम्ब की घबड़ाहट अनुचित तो कतई नहीं है | उन्हें डर है कि ऐसी दंश मारती 'शालिनी-भैया मार्का' आलोचना का कैंसर अन्य कविताओं के भीतर भी वायरस की तरह घुस जायेगा| तब तो ऐसी 'कैंसर-कीलित' कविताओं की उत्तरजीविता ही संदिग्ध हो जायेगी | बहरहाल जो कविता ऐसी टिप्पणी के खिलाफ नहीं लड़ सकी तो वह कैंसर के खिलाफ कैसे और कितनी दूर तक लड़ पायेगी ?
हालांकि जीवन में अपनी रचनात्मकता के बीच हर बड़ा रचनाकार, एक बार 'ईश्वर', 'समय' और 'मृत्यु' से भिड़े बगैर नहीं रहता है | अलबत्ता ये कि कोई भी इन तीनों से भिड़े बिना बड़ा ही नही होता| न वह, न उसकी रचना| क्योंकि ये तीनों प्रश्न शताब्दियों से कला और साहित्य क्षेत्र के रचनाकर्म के लिए चुनौती की तरह बने रहे हैं | यदि इन दो कवियों की कविता इतनी बड़ी हैं तो फिर इस बात का कैसा डर कि उनके विरोध में मात्र एक टिप्पणी के प्रकाशन से इतनी थरथरा गयीं कि उस कविता को बचाने के लिए हाँक लगानी पड़े और वो लोग आपातकालीन सहायता के लिए दौड़ पड़े जो इन दो कविताओं की रक्षा के प्रश्न से 'कीलित' हैं | बहरहाल जरा गौर से देखें तो यह प्रकरण वस्तुत: पोर्न के आक्षेप से बचने भर की हलातोल नहीं है | इसे लोक-विवेक से जाँचें तो समस्या बुढ़िया के मरने के अफसोस की नहीं बल्कि चिन्ता तो यह है कि मौत ने घर देख लिया है | इसलिये काव्य-कुटुम्ब की घबड़ाहट अनुचित तो कतई नहीं है | उन्हें डर है कि ऐसी दंश मारती 'शालिनी-भैया मार्का' आलोचना का कैंसर अन्य कविताओं के भीतर भी वायरस की तरह घुस जायेगा| तब तो ऐसी 'कैंसर-कीलित' कविताओं की उत्तरजीविता ही संदिग्ध हो जायेगी | बहरहाल जो कविता ऐसी टिप्पणी के खिलाफ नहीं लड़ सकी तो वह कैंसर के खिलाफ कैसे और कितनी दूर तक लड़ पायेगी ? 


हैलन गार्डनर ने कहीं लिखा था 'सच्चा समालोचक कभी कवि पर छत्र लगाकर नहीं चलता ' लेकिन यहाँ तो समालोचक छत्र ही नहीं, रक्षा-पाठ व उसका पारायण करता हुआ अंगरक्षक बन जाता है| कवि पर पुरस्कारों की बौछारें भी कर दी जाती हैं| इससे कविताओं को आलोचना का अभयदान प्राप्त हो जाता है | वे कविता के कवच-कुण्डल बन जाते हैं | जबकि हकीकतन, जो प्रशंसाएँ कवि को बिलकुल आरंभ में मिल जाती हैं, वे बाद में उसके साथ बहुत बुरी तरह से पेश आती हैं, यह नहीं भूलना चाहिए | 


स्वयं के रचे को रद्द करने का वस्तुगत विवेक 

सृजन के क्षेत्र में एक बात यह भी है, जिसे नहीं भुलाया जाना चाहिए कि 'महानों' के रचे हुए में भी बहुत कूड़ा होता है | प्रेमचन्द ने सात सौ कहानियाँ लिखीं हैं, लेकिन आज चर्चा में वे बस दस-पन्द्रह ही आती हैं | पिकासो का सारा 'रचा हुआ' महान नहीं है और ना ही हुसैन का | उनका बहुत सारा ऐसा है, जिसका दर्जा 'कलर्ड गारबेज' से ज्यादा नहीं है | हर 'रचा' या 'लिखा' हुआ कृति का दर्जा या कृति का सम्मान हासिल नहीं कर सकता | बर्गसाँ ने रचनात्मकता के क्षेत्र में सर्जन के आत्म की परिपक्वता के स्तर के संदर्भ में कहा था 'टू चेंज मीन्स टू मैच्योर एण्ड टू मैच्योर मींस टू क्रिएट एण्ड रिजेक्ट अवर ओन सेल्फ | सो टू से दि प्रॉसेस आव क्रिएशन इज इनेविटेबली अ प्रॉसेस ऑफ रिजेक्शन टू|' 


बहरहाल, यदि आपने सृजनात्मकता के इलाके में उतरने के बाद स्वयं के रचे हुए को रद्द करने का वस्तुगत विवेक अर्जित नहीं किया तो वक्त की छलनी खुद उसे छान कर घूरे पर फेंक देगी | गांधी के आत्मविवेक ने तो सैकड़ों बार अपनी धारणाओं को डिस-ओन कर दिया था| 


 'सिन्थेटिक कविता' नेट-प्रसूता होती हैं  
'सिन्थेटिक कविता' नेट-प्रसूता होती हैं'सिन्थेटिक कविता' नेट-प्रसूता होती हैं
अंत में पता नहीं भाई आशुतोष कुमार इस सारी बहस में सनी लियोन को क्यों ले आये| साहित्य के बाणभट्टों के समक्ष सिने जगत के महेश भट्टों की-सी आर्थिक विवशताएँ थोड़े ही हैं कि वे सनी लियोन का प्रतिष्ठा मूल्य बनाएँ| 'जिस्म-दो' में भट्ट की पूँजी लगी हुई है, अत: पोर्न इंडस्ट्री की इस ''भग-वती'' की आरती अर्चना उनके लिए जरूरी है, लेकिन हिन्दी जगत के सर्जनात्मक लोगों का ऐसा कोई पूँजी आधारित प्रोजेक्ट नहीं, जिसके चलते वे पोर्न का 'प्रतिष्ठा-मूल्य' बढ़ाने के लिए आगे आयें | आशुतोष भाई आपकी ऐसी कोशिशों से मुझे लग रहा है कि कहीं पवन करण प्रेरणा ग्रहण करके ' प्रिय पोर्न-पुत्री के नाम पिता का पत्र ' शीर्षक से कविता लिखने न बैठ जायें | क्योंकि 'सिन्थेटिक कविता' नेट-प्रसूता होती हैं | वे तुरन्त ही कवि की गोद में चढ़ने के लिये मचल उठती है | 

विचार के कुरूक्षेत्र में न अस्त्र की जरूरत पड़ती है, न शस्त्र की | विचार स्वयं में ही अस्त्र भी है और शस्त्र भी है | विचार से 'मगध' डरता है, ऐसी सूचना श्रीकान्त वर्मा की कविताओं से बरामद हुई थीं | लेकिन 'सृजनात्मकता' भी विचार से डरने लगे, यह ज्यादा विचारणीय है । ये खतरनाक संकेत हैं । दिल्ली में कविता का कहीं कोई 'मगध' तो नहीं बनने लगा है.......?

`विचार से 'मगध' डरता है'

बहरहाल विचार के कुरुक्षेत्र में न अस्त्र की जरूरत पड़ती है, न शस्त्र की | विचार स्वयं में ही अस्त्र भी है और शस्त्र भी है | विचार से 'मगध' डरता है, ऐसी सूचना श्रीकान्त वर्मा की कविताओं से बरामद हुई थीं | लेकिन 'सृजनात्मकता' भी विचार से डरने लगे, यह ज्यादा विचारणीय है । ये खतरनाक संकेत हैं । दिल्ली में कविता का कहीं कोई 'मगध' तो नहीं बनने लगा है.......? 




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