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रविवार, 6 अक्टूबर 2013

नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE

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नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE   :   कविता वाचक्नवी


नवरात्रों की इस अवधि में, जबकि सदा की भांति कल भी मैंने स्त्री के वन्दनीया होने और उसे समाज में वन्दनीया का स्थान देने की बात लिखी थी, आज पुनः एक उक्ति याद आ रही है - 
"माता निर्माता भवति"। 


बहुधा लोग इसका अर्थ यह लगाते हैं कि माँ सन्तान / व्यक्ति की निर्माता होती है। जबकि यह पूरा सत्य नहीं है। पूरा सत्य यह है कि माँ के रूप में स्त्री परिवार, समय, समाज, देश, भविष्य, जीवन, राजशाही और सब कुछ की निर्माता होती है। घर व समाज में जिस अनुपात में स्त्री के साथ अन्याय, निरादर व असमानता बढ़ेगी उसी अनुपात में क्रमशः समाज का विध्वंस व विनाश सुनिश्चित है।

इसी प्रसंग में आज कवि William Ross Wallace (1819 – May 5, 1881) की एक ऐतिहासिक कविता स्मरण आ रही है। आप सब भी इस अमूल्य कविता का आनन्द लें, प्रेरणा लें।



THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE IS THE HAND THAT RULES THE WORLD.

      BLESSINGS on the hand of women!
        Angels guard its strength and grace.
      In the palace, cottage, hovel,
          Oh, no matter where the place;
      Would that never storms assailed it,
          Rainbows ever gently curled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Infancy's the tender fountain,
          Power may with beauty flow,
      Mothers first to guide the streamlets,
          From them souls unresting grow—
      Grow on for the good or evil,
          Sunshine streamed or evil hurled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Woman, how divine your mission,
          Here upon our natal sod;
      Keep—oh, keep the young heart open
          Always to the breath of God!
      All true trophies of the ages
          Are from mother-love impearled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Blessings on the hand of women!
          Fathers, sons, and daughters cry,
      And the sacred song is mingled
          With the worship in the sky—
      Mingles where no tempest darkens,
          Rainbows evermore are hurled;
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

क्यों?

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क्यों? आखिर क्यों?
- गिरिजेश तिवारी 


 Dear friend, have the devotees of Kali and Durga the courage to allow their daughters and wife to act like these goddesses. I think any way they can go to any length to do the opposite. if the self-esteem of kaalee and the valor of Durga develops in the personality of my daughter, then what's the point! Less than that the women-freedom is impossible. is this ambition not comletely an indian desire? do my conservative friends have the courage to agree with me?



"Stand up, to break the chains! Why are you chanting the stereotypes? becoming weak and vulnerable you are only defending this system! have you not become a curse to your own race? "



to oppose the women’s liberation there are standing in opposition the Tikadhari Kupmnduk conservatives on one side and on the other are the Taliban fighters intent on maintaining the value system of islam by making captive the women inside the mask. The husband is burning their wife in day to day family life at in law’s residence while she is alive and he is not even hesitating from killing her in dowry murder. there are fathers donating their daughters to become free from her burden by killing her even before her birth inside the uterus and turban bearing jaats have insisted on going ahead to kill their daughters in the name of prestige killing to maintain the purity of their clan’s blood. even today the women are bound to live the life of second grade citizen and are oppressed inside the frame of the doorway of house, as well as both in the in the market and the office being humiliated by not accepting them as humans on the level of equality but merely an "stuff" to be consumed by male dominated society all over the world. The women’s liberation movement may become even more powerful – I want to politely request you to involve, with your influential role in the campaign of women’s liberation movement. long live women’s liberation movement! long live revolution!with a lot of love 



प्रिय मित्र, काली और दुर्गा की पूजा करने वाले भक्त गण क्या अपनी बेटी को दुर्गा और पत्नी को काली जैसा आचरण करने की छूट देने की हिम्मत रखते हैं. मैं समझता हूँ वे किसी भी तरह से किसी भी हद तक उतर कर इसका उलटा ही करते हैं. अगर मेरी बेटी में काली का आत्मसम्मान और दुर्गा का शौर्य हो तो क्या बात है! इससे कम पर नारी-मुक्ति असंभव है. क्या यह कामना पूरी तरह भारतीय नहीं है? क्या मेरे परम्परावादी मित्र मुझसे सहमत होने का साहस रखते हैं?


"उठ खड़ी हो, बन्धनों को तोड़ दे!  कर रही क्यों रूढ़ियों का जाप है?  तन्त्र को इस पोसती, अबला बनी, खुद बनी निज जाति पर अभिशाप है?"


आज नारी-मुक्ति के विरोध में खड़े हैं एक ओर टीकाधारी कूपमंडूक परम्परावादी, तो दूसरी ओर हैं नकाब में नारी को कैद करके रखने का दुराग्रह बनाये रखने पर आमादा तालिबानी जेहादी. जहाँ पतिदेव हर दिन उनको जिन्दा नरक में भूनते रहते हैं और दहेज-वध करने से भी बाज़ नहीं आते, वहीँ पिता जी या तो भ्रूण-हत्या करके अपनी कन्या का जन्म लेने के पहले ही 'दान' कर के मुक्त हो जाते हैं या फिर प्रतिष्ठा-हत्या कर के खाप के खाप पग्गडधारी जाट अपने खून को शुद्ध बनाये रखने पर बजिद हैं. अभी भी जहाँ चौखट के अन्दर नारी उत्पीड़ित है, वहीँ बाज़ार और ऑफिस में भी उसे मनुष्य नहीं 'माल' मान कर अपमानित किया जा रहा है. ऐसे में नारी-मुक्ति आन्दोलन और भी सबल बने - इस कामना को साकार करने के अभियान में अपनी प्रभावशाली भूमिका का निर्वाह करने का आप से विनम्रता के साथ अनुरोध करना चाहता हूँ.



आज भी नारी को समानता और सम्मान उपलब्ध नहीं है. सारी दुनिया में नारी दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जी रही है. उसे सेकंड सेक्स कहा जाता है. फर्स्ट सेक्स नहीं. पुरुष ही फर्स्ट सेक्स बना हुआ है- क्यों? परिवार में कितना प्रेम है आप भी जानते हैं. औरत को अपने पिता का घर छोड़ कर पति के घर जा कर रहना होता है. पति क्यों नहीं पत्नी के घर जा कर अपनी जवानी के बाद का मृत्यु तक का जीवन बिताते हैं? क्यों औरत ही चूल्हे चौके की ज़िम्मेदारी उठा रही है. पति क्यों सुबह केवल अखबार पढ़ना और चाय का प्याला भी पत्नी के हाथ का ही पीना चाहता है? सारे व्रत नारी के लिये हैं क्यों? क्यों पत्नी की जगह पति कोई एक भी उपवास नहीं करता? अपने पूरे शरीर को रंग रोगन से पोत कर क्यों नारी ही सुन्दर मानी जाती है? पतिदेव क्यों मेकअप नहीं कर के स्वयं को और सुन्दर बना डालते हैं? मेरी एक बेटी है वह पढ़ना चाहती है, उसे टेलीफोन से पढाता हूँ. उसके ससुराल के लोग उसे केवल पेट पर्दा पर जनम-जेल में खटाने पर बजिद हैं? क्यों बेटी सरकारी स्कूल में जाती है और बेटा इंग्लिश मीडियम स्कूल में? क्यों केवल लडकी के घर से बाहर जाने पर निगाह रखते हैं माता-पिता, बेटे पर नहीं? क्यों लड़की की इज्ज़त ही बलात्कार का शिकार बना कर अपमानित की जाती है? लड़कों के कुकर्मों से माँ-बाप की इज्ज़त नहीं प्रभावित होती? क्यों पुरुष अनेक पत्नी रखता है? क्यों बहुपतिप्रथा जो एक समय में भारत में प्रचलित थी, अब प्रचलन में नहीं है. मगर बहुपत्नीप्रथा दिखाई दे जाती है? क्यों केवल नारी ही रखैल बनायी जाती है? पति रखेला नहीं बनता? पत्नीव्रती पति क्यों नहीं हैं? क्यों पतिव्रता नारी का ही गौरवगान भरा है पूरे साहित्य में? क्यों पूरा साहित्य नारी सौन्दर्य का वीभत्स चित्र लिखता रहा है ? पुरुषों ने ही अधिकतम ग्रंथों को क्यों लिख डाला? नारी और शूद्र क्यों वेद पढ़ने सुनने से प्रतिबंधित किये गये? क्यों नारी को असूर्यपश्या अवगुंठनवती बन कर रहना पड़ा? ये सारे प्रश्न उत्तर चाहते है?



इतिहास को नकारा नहीं जा सकता? क्यों सती को मायके जाने से शिव मना कर देते हैं? शिव को कहीं जाने से तो सती मना नहीं करतीं! क्यों तुलसी कह देते हैं - शिव संकल्प कीन्ह मन माही, यहि तन सती भेंट अब नाही. शिव का अपनी पत्नी को इस तरह मन ही मन तलाक दे देना क्या उचित है? इस्लाम भी तलाक देता है तो केवल पति क्यों देता है? पत्नी तलाक देने की अधिकारिणी धर्म की दृष्टि में क्यों नही है? नारी की समानता या गुलामी प्रश्न केवल इतना सीधा सा है! क्यों काली को क्रोध आया और सप्तशक्तियों को प्रकट करना पड़ा? शिव क्यों अक्षम हो गये काली के क्रोध के सामने? क्यों सारे देवगण दैत्यों का मुकाबला नही कर सके? और तब क्यों उनको अपनी नारी शक्ति को दुर्गा के रूप में युद्ध करने के लिये आह्वान करना पड़ा? क्यों सांख्य दर्शन का आदिपुरुष केवल साक्षी, द्रष्टा और निष्क्रिय है? सारी सृष्टि केवल प्रकृति की नारी शक्ति का ही विस्तार है? माया ही क्यों महाठगिनी है? मोहिनी रूप ही विष्णु को भी क्यों बना कर बार बार ठगना पड़ा? 


सब सवालों का एक जवाब है कि नारी गुलाम थी और है! समाधान न हिन्दू दे सकते, न मुसलमान, समाधान केवल वह देता है, जो समस्या झेलता है और नारी आज समाधान के स्वर में बोल रही है? उसकी आवाज़ तस्लीमा नसरीन की आवाज़ है, कविता वाचक्नवी की आवाज़ है, पुष्पा की आवाज़ है, सिमोन दे बुआ की आवाज़ है, नीलाक्षी की आवाज़ है, रश्मि भारद्वाज की आवाज़ है, आकांक्षा और असंख्य लडकियों की आवाज़ है.


काल-प्रवाह के साथ गूँजती-फैलती यह आवाज समानता के अधिकार का नारी-मुक्ति आन्दोलन का विजय-घोष है, जो पुरुष दम्भ को दहला रहा है. इतिहास का विरोध करने वाले इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं. इतिहास का प्रवाह नारी-मुक्ति का प्रवाह भी है!


मेरा शरीर पुरुष का है, मगर मैं अपनी बेटियों के लिये उनकी अपनी माँ से अधिक नज़दीक हूँ. मुझे अपने बेटों से अधिक अपनी बेटियों पर गर्व है. वे किसी से भी किसी तरह से कम नहीं हैं. उन्होंने आजीवन मेरी अपेक्षाओं और परीक्षाओं - दोनों पर खुद को खरा साबित कर के दिखाया है. आज भी उनके दीप्तमान आवेग और आक्रामक आक्रोश के सामने सारे आभामंडल छिन्न-भिन्न हो रहे हैं. और मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ.







शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है : जिंदा गाड़ दी गई लड़की

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 ..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है 

- कविता वाचक्नवी 




पिछले दिनों अलग अलग अवसरों पर जब महिला मुद्दों को लेकर मैंने जरा भी कुछ लिखा तो मेरे ब्लॉग की पोस्ट के बाद व्यक्तिगत रूप से या फेसबुक की वॉल पर टिप्पणी करते हुए अनेक पुरुष - रत्नों ने मुझे समझाईश दी कि कविता जी ज़माना बदल गया है अब कहाँ आप महिलाओं पर अत्याचार की बात करती हैं अब तो ...... आदि आदि अनादि... । 

..... और कुछ महापुरुषों ने तो इतने भद्दे कमेन्ट किए कि उनकी भाषा और विचार पढ़कर उनके प्रति वितृष्णा ही जागी कि कैसे कैसे लोग हैं। अस्तु ! 

आज इस बदले जमाने का सच उघाड़ती सचाई देखें -






कुछ लोग देते हैं कि महिलाओं के प्रति अत्याचार के लिए महिलाओं की ही अधिक भूमिका होती है, उसे क्यों नकारते हैं या पुरुष को क्यों दोषी ठहराते हैं। ऐसा तर्क देने वाले लोग जरा समाज-मनोविज्ञान या समाज शास्त्र आदि को गहराई से जानें समझेंगे तो पता चलेगा कि कभी यदि जब महिलाएँ ऐसा करती हैं तो क्यों करती हैं ।

 ..... क्योंकि समाज पुरुष-प्रधान है। 


बात यह नहीं है कि किसने गलत किया, बात यह है कि क्यों किया गया। हमारी सामाजिक बुनावट में वे कौन- से ऐसे तत्व हैं जो किसी को बाध्य करते हैं ऐसा करने को .... इस पर विचार किया जाना अनिवार्य है। 


ऐसा नहीं कि स्त्री ने जब ऐसा किया तो उसे समझने/ समझाने के लिए किन्हीं बड़े ग्रन्थों का पारायण अनिवार्य है और  न ही इन बातों पर नासमझी का तर्क देकर पीठ फेर लेने से काम चलता है कि केवल  शिक्षित व्यक्ति ही समाज की बनावट और बुनावट को समझ सकते हैं।  यह चीज पुस्तकों से अधिक समाज के मन को और उसकी गतियों को अधिक निकट से समझने की है। क्रिया और प्रतिक्रिया को देखने बूझने की है ,  `किसी ने ऐसा किया तो क्यों किया ' के विवेचन की है। 

जिस आयु में स्त्री माँ बनती है, उस आयु में भारतीय समाज व्यवस्था में वह मुखिया नहीं हो चुकी होती। उसके ऐसा करने के पीछे कई कारक होते हैं, उन कारकों को तलाशना जरूरी है। वे कारक कोई किताबों की चीज नहीं। तब जरा-सा ध्यान देने पर  समझ आ जाएगा कि स्त्री की भूमिका कितनी है और पुरुष की कितनी । 


 एक युवक ने इसी प्रसंग में प्रतिप्रश्न किया कि क्या स्त्री परिवार और समाज में पद पर नहीं होती, क्या उसके पास कोई अधिकार नहीं होते या वह बेटी, माँ, बहू की ज़िम्मेदारी के समय मज़बूर बन जाती है। 

तो ऐसे प्रश्नकर्त्ता ये भूल जाते हैं कि स्त्री के  पद पर होने न होने का प्रश्न नहीं है यहाँ। उसके पद पर होने या अधिकार-सम्पन्न (?) होने से क्या होगा ? 



(1) पहली बात तो यह कि समाज में कितने प्रतिशत महिलाएँ स्वायत्त अथवा अधिकार सम्पन्न हैं?


(2 ) उनके अधिकार की सीमा क्या है ? अर्थात वे अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र हैं, या पति के भी, या पति और परिवार के भी या या बच्चों के भी ? क्या आर्थिक और सामाजिक निर्णयों में उनकी भूमिका / निर्णय का कोई महत्ब है ?


(3) वे अधिकार संपन्न (?) महिलाएँ कहाँ रहती हैं, उन पर अन्य दबावों / निर्णयों / परिस्थितियों का प्रभाव कितना होता है ? 

 
(4) बेटी के जन्म के साथ ही उस के पालन पोषण से जुड़ी असुरक्षा से बचाव के कितने हथियार उसके पास होते हैं ? 


(5) बेटी के जन्म से ही उसके साथ जुड़ी पारिवारिक हीनताबोध , संत्रास की स्थितियों में उसके साथ कितने लोग होते हैं?


(6) बेटी के साथ जुड़ी बलात्कार, छेड़छाड़, अपहरण, दहेज, वर ढूँढने , उसे संतुष्ट करने, उसे बेटी पसंद आने/ न आने, बेटी के बार बार रिजेक्ट हो कर बाजार में बिकती वस्तुओं की तरह अपनी बोली लगाए जाने की पीड़ा ..... अनगिन समस्याओं का क्या हल है उस तथाकथित अधिकार सम्पन्न महिला के पास ?


(7) बेटी के ससुराल में जला दिए जाने , मार दिए जाने या पति के परस्त्रीगामी होने पर उस अधिकार सम्पन्न स्त्री का कितना बस है?

आशा है इतने जरा से कारक उसकी भूमिका का कुछ तो खुलासा कर देंगे । या कम से कम इतना तो पता दे ही देंगे कि सामाजिक संरचना में वे कौन-से तत्व हैं, जिनके कारण यह सब आज भी हमारे आसपास ही चुपचाप व सरेआम भी चल रहा है। 



गुरुवार, 22 सितंबर 2011

बैड पैरेन्टिंग : माता पिता के बीच की दरारों से दिग्भ्रमित बच्चे

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बैड पैरेन्टिंग - माता पिता के बीच की दरारों से दिग्भ्रमित बच्चे
- सुधा अरोड़ा



माता और पिता के रूप में बच्चों को भावनात्मक सहारा देना और उन्हें एक स्वस्थ माहौल में बड़ा होने की सुविधाएँ और अवसर देना हमारे हाथ में है । अपने तनावों का दंश  बच्चों को देकर असमय उनसे उनका बचपन छीन लेना और उन्हें एक दहशत के माहौल में बड़ा होने देना एक अपराध से कम नहीं ! 







पिछले दिनों ब्रिटेन के कई शहरों में दंगे भड़के । टोटेनहम से शुरु हुई यह आग बरमिंघम , मैनचेस्टर और कई शहरों तक फैल गई । इसके राजनीतिक और वर्णविभेद के कारणों और दंगों के बीच भारतीय चैनलों पर कई जगह यह कैप्शन बार बार दिखा - ‘‘ बैड पैरेन्टिंग - कॉज़ फ़ॉर रायट्स ’’ -- कि दंगों को भड़काने में, बड़े बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर की लूट और फसाद में आठ नौ साल से लेकर ग्यारह साल के बच्चों तक की भागीदारी इसमें देखी गई । बैड पैरेन्टिंग - यानी बच्चों के पालन पोषण में खराबी, बच्चों को घर में सही संस्कारों और अपनी उम्र का अपेक्षित भावनात्मक संरक्षण न मिलने के कारण उनका दिशाहीन होना । 


पिछले दो दशकों से पश्चिमी देश में बच्चों में बढ़ती हुई हिंसा - कभी स्कूल की अपनी क्लास के सहपाठियों को बंदूक की गोलियों से भून डालना , कभी शिक्षकों के साथ बेअदबी करना , कभी स्कूल में अपनी कलाई की नस काटने की आत्महंता कोशिश और कभी निराशा के गर्त में डूबे बच्चे का शून्य में ताकना और किसी सवाल का जवाब न देना , सोलह से अठारह साल के लड़कों का बाप बन जाना l इसके साथ साथ पिछले कुछ सालों में ब्रिटेन में माता पिता द्वारा चार साल से बारह साल तक के बच्चों पर की गई हिंसा के कई मामले सामने आये हैं । ऐसी घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त पश्चिमी देशों की इतनी विकराल समस्या रही है कि वहाँ सभी स्कूलों में एकाधिक काउंसिलर तो होते ही हैं, कई बार स्कूल के शिक्षकों और प्रधानाचार्य को भी काउंसिलर की भूमिका निभानी पड़ती है । 


यह एक ऐसी समस्या है , जिसका हल तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक ढूँढा नहीं जा सका और इसमें दिन पर दिन बढ़ोतरी ही होती जा रही है जिसका सबसे ताज़ा उदाहरण ब्रिटेन में एक ब्लैक की गोली मारकर हत्या के बाद फैले हुए दंगों के बाद प्राइम मिनिस्टिर का यह बयान है कि बच्चों का लूट पाट और हिंसा में शामिल होना ‘‘ बैड पैरेन्टिंग’’ का नतीजा है । 


सोलह साल का एक लड़का लूटपाट में पकड़े जाने पर कैमरे के सामने बयान देता है कि सरकार इसके लिये जिम्मेदार है क्योंकि सरकार सिर्फ अमीरों के लिये है, गरीबों की उसे कोई चिन्ता नहीं और उसने डिपार्टमेंटल स्टोर से अपने बेटे के लिये कपड़े, नैपीज़ और घर की ज़रूरत का सामान लूटा है । 


कुछ वर्ष पहले मैं लंदन में अपनी मित्र डॉ. अरुणा कपूर अजितसरिया से मिली जो कोलकाता वि. विद्यालय से हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी. थी और जो लंदन से कुछ और डिग्रियाँ हासिल करने के बाद बच्चों के स्कूल में प्रधानाचार्या के पर पर काम कर रही थी । उसने बताया कि स्कूल में उसे प्रिंसिपल की भूमिका से ज़्यादा एक काउंसिलर की भूमिका निभानी पड़ती है क्योंकि नब्बे प्रतिशत बच्चे हैफ पेरेंट्स ( आधे परिवार से ) हैं यानी कोई अपने पिता के साथ है तो माँ सौतेली है या पिता की एकाधिक गर्ल फ्रेंड्स हैं और कोई अपनी माँ के साथ है तो सौतेले पिता है या माँ का कोई फ्रेंड है जिसे बच्चा सम्मान नहीं दे पाता । ये बच्चे पढ़ाई में एकाग्र नहीं हो पाते, इनमें ‘‘ लॉस्ट लुक’’ (खोया खोया सा भाव ) या सेंस ऑफ नॉन बिलॉगिंग( किसी से जुड़ाव महसूस न कर पाना ) होता है, आत्मविश्वास की कमी और असहिष्णुता होती है । उन्हें समझाने या रोकने - टोकने पर वे तोड़ फोड़ करने लगते हैं या चीखने चिल्लाने लगते हैं । 


भारत अभी इस स्थिति पर तो नहीं पहुँचा कि यहाँ सोलह से अठारह साल के लड़के गर्व से अपने ‘‘बाप’’ बन जाने की घोषणा करें । पर भारत के महानगरों के मनोचिकित्सक ( हीरानंदानी हॉस्पिटल के प्रख्यात डॉ. हरीश शेट्टी ) भी कहते हैं कि डिप्रेशन के शिकार टीन एजर्स की तादाद में पिछले कुछ वर्षों में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोतरी हुई है । इसका कारण माँ-बाप का बच्चों को पर्याप्त समय न दे पाने के साथ साथ इंटरनेट, ब्लैकबेरी और तमाम आधुनिक तकनीकी उपकरण हैं जिनके कारण बच्चे समय से पहले ही वयस्कों की दुनिया से परिचित हो जाते हैं और असमय ही अपना बचपन खो बैठते हैं । 


अधिकांश माँएँ भी नौकरीपेशा हैं और घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारी के कारण वे बच्चों को र्प्याप्त समय नहीं दे पातीं । जो गृहिणियाँ हैं, वे भी अगर उच्चमध्यवर्ग की हैं तो मॉल कल्चर और किटी पार्टी की आदी हैं, अगर मध्यवर्ग की हैं तो उनकी शिकायत है कि टीन एज में जाते ही बच्चे बात मानना बंद कर देते हैं और उनकी अवज्ञा करते हैं । 


यह सब देखकर अक्सर भारत के गाँव - कस्बों के संयुक्त परिवार याद आते हैं , जहाँ चाचा, ताऊ, मामा सबके बच्चे आपस में ही पूरा एक स्कूल बना लेते थे, उन्हें बाहर के बच्चों की ज़रूरत ही नहीं होती थी, एक ही जगह खाना बनता था और बच्चों के लिए साथ साथ मिल बैठकर हर रोज़ का खाना एक उत्सव होता था । भारत में संयुक्त परिवार की अवधारणा रही है, जहाँ बच्चे अपेक्षाकृत स्वस्थ सुसंस्कृत माहौल में बड़े होते थे । 


आज के समय और समाज में वैसे संयुक्त परिवारों की कल्पना ही एक खाम खयाली है क्योंकि आज घर की आर्थिक जिम्मेदारी में औरतें भी सहभागी होती हैं और संयुक्त परिवारों की अवधारणा ही अतीत का एक स्वप्न बनकर रह गई हैं । माता और पिता के रूप में बच्चों को भावनात्मक सहारा देना और उन्हें एक स्वस्थ माहौल में बड़ा होने की सुविधाएँ और अवसर देना हमारे हाथ में है । अपने तनावों का दंश बच्चों को देकर असमय उनसे उनका बचपन छीन लेना और उन्हें एक दहशत के माहौल में बड़ा होने देना एक अपराध से कम नहीं ! 


पश्चिम के देशो में भी स्त्रियों की सोच में एक बदलाव देखा जा रहा है । अधिकांश स्त्रियाँ घर में एक गृहिणी बनकर रहना बेहतर समझती हैं ताकि वे बच्चों को अपनी देख रेख में बड़ा कर सकें । बाहर नौकरी करने के अगर फायदे हैं तो तनाव और कुंठाएँ भी कम नहीं जो कार्यालयों में असहयोगी माहौल और प्रतिस्पर्धा रखने वाले सहयोगियों के कारण पैदा होती हैं । 


एक कहावत सदियों से भारत में कही सुनी जाती रही है कि बच्चे हमारे प्रेम की निशानी है । आज पूरे विश्व में बच्चों को जो माहौल दिया जा रहा है - यही कहना पड़ेगा कि बच्चे माता पिता के प्रेम की नहीं, हवस की निशानी हैं जो हवस की समाप्ति पर उनकी जिम्मेदारी से हाथ धो लेते हैं । बच्चे अपनी मर्ज़ी से नहीं आते इस दुनिया में । उन्हें अगर हम लाते हैं तो उनके मानसिक स्वास्थ्य और ज़िम्मेदार नागरिक बनाने की जिम्मेदारी भी एक माँ बाप की है, किसी और की नहीं । 


हमें सोचना है कि इस खूबसूरत दुनिया में हम क्या बच्चों को यहाँ की तमाम बदसूरती दिखाने के लिये लाये थे ? 


इसका जवाब हम बड़ों को ढूँढना है , बच्चों को नहीं !




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