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बुधवार, 12 जून 2013

बलात्कार की न्यायिक प्रक्रिया : मामला हंस और शिकारी का

20 टिप्पणियाँ
बलात्कार की न्यायिक प्रक्रिया 

प्राक्कथन 
प्राचीन संस्कृतियों में अपने प्रति होने वाले अपराध और अपमान का बदला मज़लूम खुद लेता था। कहानी चाहे यूलिसीज़ और इडिपस की हो, चाहे रामायण और महाभारत की, बहादुरी की सारी गाथाएँ ऐसे लोगों के पराक्रम के विषय में है जिन्होंने अपराधी को दण्ड दिया ,अपने और अपने समाज के अपमान का बदला लिया और समाज में सुरक्षा की भावना लाने का प्रयास किया।
जब आधुनिक व्यवस्था आई तो संविधान का राज्य हो गया। अब किसी व्यक्ति के प्रति किया गया अपराध राज्य के प्रति किया गया अपराध माना जाने लगा। अब अपराधी को दण्ड देना राज्य का काम है- समाज को अपराध से मुक्त रखना भी। परन्तु क्या राज्य पीड़ित को न्याय दिला पा रहा है? पीड़ित निहत्था है - उसके पास आत्मरक्षा का भी हक नहीं है, अपराधी हथियारबन्द है और राज्य के बनाए सारे कानून अभियुक्त के अधिकारों की व्यवस्था कर रहे हैं। पीड़ित के पास कोई हक़ नहीं- उसे तो उसके मामले में हो रही सुनवाई की सूचना तक दिया जाना ज़रूरी नहीं। हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम,जस्टिस फार द क्रिमिनल है, न कि जस्टिस फार द विक्टिम ऑफ क्राइम। क्या पीड़ित को न्याय मिल पाता है ?
पिछले कुछ दिनों में भारत के संविधान में प्रदत्त प्रावधानों और न्याय प्रक्रिया के आधार पर उच्चतम न्यायालय द्वारा अपराधी पाए गये जिन अपराधियों को फाँसी की सजा सुनाई गई थी उनमें से दो को वास्तव में फाँसी दे दी गई। वे दोनों आतंकवाद से जुड़े थे अतः उनकी सज़ा से उठे विवाद ने एक और रंग ले लिया, जो राजनीतिक था। कसाब के पक्ष में कविताएँ लिख कर ईमेल द्वारा वितरित की गईं, अफ़ज़ल गुरु की माता, पत्नी तथा पुत्र का चित्र छापते हुये शोक व्यक्त किया गया। हममें से किसी ने भी इन हत्याकांडों में मारे गये दो सौ से भी अधिक पीड़ितों के शोकसंतप्त परिवार वालों के चित्र नहीं देखे, न ही उनकी व्यथा प्रसारित की गई। जिन्होंने अपराधी को फाँसी की सज़ा का समर्थन किया वे प्रतिक्रियावादी ठहराये गये और अपराधी के अधिकारों का समर्थन करने वाले प्रगतिशील कहलाए।
इसी प्रकार वर्ष 2012 के अन्तिम माह में 16 तारीख़ को हुए बर्बरता पूर्ण, नृशंस और क्रूर कृत्य को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई। दस अप्रैल 2013 को दिये वक्तव्य में हमारे प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने कहा कि 16 दिसम्बर की घटना ने हमें नया कानून बनाने और संशोधित करने पर मजबूर किया। द्रष्टव्य है कि हमारा देश स्त्री के लिये बनाये गये हर कानून के लिए हादसे का इन्तजार करता रहा है। 'रेप' के विरूद्ध बनाए गए नियम में गवाही का नियम तब बदला गया जब 1979 में मथुरा बलात्कार काण्ड हुआ और कार्यस्थल पर यौनशोषण रोकने का विशाखा दिशा निर्देश ( जो फरवरी 2013 में कानून बन गया ) तब जारी हुआ जब 1997 में राजस्थान में भंवरी देवी का बलात्कार हुआ।
मगर इस बार इंटरनेट पर अधिक सक्रिय रहने वाले नारीवादी संगठनों ने वर्ष 2013 में जस्टिस एस सी वर्मा कमेटी को सिफारिशें भेजने में आश्चर्यजनक भूमिका निभाई। वे घूरने और पीछा करने (स्टाकिंग) के अपराधों को ग़ैरज़मानती बनाना चाहती हैं, ताकि इन अपराधों की गम्भीरता को समझा जाए और न्यायोचित सजा मिले जो सही भी है, परन्तु नाबालिग, पांच छः वर्ष की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वाले अपराधियों को कठोरतम दंड देने के वे सख़्त खिलाफ हैं। गैंगरेप यानी सामूहिक बलात्कार के अपराधी को फाँसी न दिए जाने के पक्ष में उन्होंने हस्ताक्षर अभियान चलाया। अपराधी को क्या सज़ा हो इस बात पर सारा बुद्धिजीवी वर्ग साफ़़़तौर पर वामपंथ और दक्षिणपंथ के आधार पर बँटा दिखाई दिया- इनमें कुछ नारीवादी संगठन भी थे।
प्रस्तुत आलेख मैंने अगस्त सन् 2004 में लिखा था, जब धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी, और अपने संगठन के सहयोगियों के साथ साझा किया था। वह आलेख ज्यों का त्यों अपनी सारी दुविधाओं के साथ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूँ। देखें इन नौ वर्षों में क्या बदला- सरकार, न्यायव्यवस्था, सत्ता पक्ष, विपक्ष, वामपंथी, मानवाधिकारवादी, मुजरिम, हत्यारे या पीड़ित और उनके रिश्तेदार, बेकसूर मज़लूम । देखें, कुछ बदला भी है या नहीं ?              -(शालिनी )

- शालिनी माथुर


क्राइम एन्ड पनिशमेंट यानी जुर्म और सजा पर लेखनी उठाने वालों में मैं पहली नहीं हूँ। जब से सामाजिक व्यवस्था बनी है, यह मुद्दा तभी से चर्चा में रहा है।

चौदह अगस्त 2004 को धनंजय चटर्जी नाम के व्यक्ति को फाँसी पर लटका कर सजा दी गई। उसने एक दसवीं कक्षा में पढ़ती हुई बच्ची का क़त्ल किया था, और क़त्ल से पहले बलात्कार। फाँसी उसे क़त्ल का जुर्म करने के लिए दी गई। फाँसी उसे जुर्म के चौदह साल बाद दी गई। राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका खारिज कर दी। उसके बाद पुनः उसने सर्वाच्च न्यायालय से इस आधार पर मुक्ति की याचना की, कि वह चौदह वर्ष जेल में काट चुका है। सर्वाच्च न्यायालय ने एक ही दिन में यह कह कर मामला खारिज कर दिया कि यह विलम्ब अपराधी ने जानबूझ कर स्वयं अपने ऊपर कई स्थानों से मुकदमें चलवा कर करवाया है, क़त्ल की सजा फाँसी है।

जब से ओपेन स्काइ पालिसी के तहत अनेक टी.वी चैनल आए हैं, तब से अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर अनर्गल प्रलाप करने की एक अद्भुत परम्परा प्रारम्भ हो गई है। कातिल के माँ-बाप कितने शोक संतप्त हैं यह सभी चैनल दिखाने लगे। स्टार न्यूज़ ने बताया कि हत्यारे की तीन नम्बर पर अटूट आस्था है। वह जेल की तीन नम्बर कोठरी में रहता है। उसके लिए ट्रे में नाश्ता आता है। वह नाश्ते में एक अंडा, छः टोस्ट, एक फल और एक गिलास दूध पीता है। वह खाने में तली हुई मछली, दाल, चावल, रोटी और सब्ज़ी खाता है। वह रेडियो से मनोरंजन करता है। (बेचारा टी.वी.नहीं देख पाता) उसकी बहन अनब्याही है। कातिल के प्रति दया की याचना करते हुए कुछ मानवाधिकारवादी भी दिखाए जाते रहे ।

इस बीच उस मासूम बच्ची के माता पिता जो कलकत्ता छोड़ कर मुंबई में बस गए थे, वे अपने घर से भाग कर कहीं और जा छिपे ताकि मीडिया पीछा न करे। हममें से कोई नहीं जानता कि इन चौदह वर्षां तक उस बच्ची के माँ बाप ने यह मुक़द्दमा कैसे लड़ा, वकीलों को कितनी फीस दी, कितना पैसा ख़र्च किया और अपनी मासूस बच्ची की हत्या के सदमे को बर्दाश्त करते हुए यह चौदह वर्ष कैसे काटे।

जिस बात ने मुझे बहुत द्रवित किया वह थी, एक व्यक्ति, जो मृत बच्ची का पड़ोसी रहा था तथा जिसकी बेटी उस बच्ची के साथ पढ़ती थी, हत्यारे की फाँसी वाले दिन जेल तक आया। वह चाहता था कि फाँसी ज़रूर हो। हत्यारा उस बिंल्डिग में लिफ़्टमैन था, बिंल्डिंग के बच्चों के स्कूल से घर लौटने पर उन्हें घर पहुँचाने की ज़िम्मेदारी उसकी थी। ज़ाहिर है वह चौदह वर्ष की बच्ची भी उस पर यक़ीन करती रही होगी। सर्वाच्च न्यायालय के वकील ने भी कहा कि अस्सी प्रतिशत से भी अधिक जनता हत्यारे को फाँसी चाहती है। हम जानते है कि फाँसी की सजा जनमत के आधार पर नहीं दी जाती। पर यह दोनों हृदयस्पर्शी बातें यह द्योतित करती हैं कि मानव हृदय आज भी पोयटिक जस्टिस चाहता है - मुजरिम को सज़ा, निर्दोष को माफ़ी।

लेकिन जुर्म और सज़ा के इस मुद्दे पर लेखनी उठाना मेरे लिए उतना सहज नहीं है, जितना किसी अन्य के लिए होता। आज से छः वर्ष पूर्व मैंने स्वयं अपने इन्हीं हाथों से लेखनी उठाकर, अपनी ओर से हस्ताक्षर करके एक दया याचिका राज्यपाल और राष्ट्रपति को सौंपी थी, जिसमें बंदिनी रामश्री के प्राणों की भीख माँगी थी। मेरी उस दया याचिका पर उसकी फाँसी की सजा उम्रकैद में बदल दी गई और आज वह औरत लखनऊ जेल में है। वह अक्सर जेल से मुझे पत्र भिजवाती रहती है। यह बात और है जिस समय मैंने वह दया याचिका लिखी थी, उस समय तक मैंने उसे देखा तक नहीं था। इस प्रकरण में प्रतिष्ठित वकील श्री आई.बी.सिंह मेरे सहयोगी थे।

एक ओैरत को हत्या के लिए माफी ओैर एक आदमी को हत्या के लिए फाँसी, कहीं यह मानदण्ड दोहरे तो नहीं ? आज पुनरावलोकन करना होगा।

मैंने पुरानी फाइलों में से निकाल कर वह दया याचिका पुनः पढ़ी। यह याचिका मैंने अखबार में 16 मार्च 1998 को छपी रिपोर्ट के आधार पर 17 मार्च 1998 को लिखी थी और 18 मार्च 1998 को राज्यपाल को सौंप दी थी ओैर राष्ट्रपति को फैक्स द्वारा प्रेषित कर दी थी। दया-याचिका के आधार पर क्षमादान का अधिकार राष्ट्रपति तथा राज्यपाल दोनों के पास समान रूप से होता है। दया के लिए हमने एक व्यक्ति की निजी एवं विशेष सामाजिक परिस्थिति को आधार बनाया था। हमने कहा था कि बंदिनी ने जेल में ही एक बच्ची को जन्म दिया, जो तीन वर्ष की हो गई पर उससे मिलने कोई नहीं आया पति तक नहीं, कि बंदिनी के साथ उसके पिता तथा भाई भी फाँसी पाने वाले हैं और बंदिनी की फाँसी के बाद उसकी पुत्री अनाथ हो जाएगी, कि जिस समाज में माता पिता के जीवित होते हुए भी पुत्री बराबरी का दर्जा नहीं पाती वहाँ निर्धनवर्ग की अनाथ तीन वर्ष की बच्ची का क्या होगा, कि बंदिनी अपने पिता व भाई के साथ सह अपराधिनी है मुख्यअभियुक्त नहीं, कि न्यायालय में सत्र परीक्षण के दौरान या अपील के दौरान किसी ने उसकी ओर से उचित बचाव या पैरोकारी नहीं की, कि बंदिनी का मामला उच्च अदालतों तक गया ही नहीं, और साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि हम नहीं चाहते कि एक व्यक्ति को केवल इस लिए क्षमा कर दिया जाए कि वह स्त्री है। हमारी दयायाचिका के विषय में अनेक अखबारों ने प्रमुखता से छापा था।

महामहिम को दया याचिका सौपनें जब मैं और गीता कुमार गए तो इस बात पर बार-बार ज़ोर दिया कि फाँसी का मामला सर्वाच्च न्यायालय तक जाना ही चाहिए। रामश्री निपट निरक्षर और इतनी निर्धन थी कि उसकी अपील उच्चतम न्यायालय तक पहुँची ही नहीं थी। उसे उच्च न्यायालय के आदेश से ही फाँसी होने वाली थी। इसके बरअक्स धनंजय चटर्जी का मामला सर्वाच्च न्यायालय तक दो बार गया और राष्ट्रपति तक भी। उसने देर करने के सारे हथकण्डे अपनाए और फाँसी की पूर्व संध्या पर भी उसने यही कहा कि वह स्वयं को दोषी नहीं समझता।

मेरा मन बार-बार अपनी दयायाचिका पर लौट जाता है। वह औरत निचली अदालत से सजा पाकर अपील के बिना 6 अप्रैल 1998 को फाँसी चढ़ जाती, अपने फैसले की कापी पाये बिना। दयायाचिका देने के कई महीने बाद हम लोगों ने उच्च न्यायालय में फीस के पैसे जमा करके बड़ी कठिनाई से फैसले की नकल फैक्स द्वारा इलाहाबाद से मँगवाई थी। फैसला पढ़ कर हम स्तब्ध रह गए थे। माननीय न्यायाधीशों ने रामश्री के विषय में लिखा था कि उसके वकील ने एक बार भी उसे निर्दोष सिद्ध करने की कोशिश ही नहीं की थी, केवल उसकी सज़ा कम करने का अनुरोध किया था, अतः न्यायाधीश के पास फाँसी देने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। फैसले के अनुसार उसके पूरे परिवार को फाँसी होनी थी।

एक निर्धन निरक्षर औरत के मामूली वकील ने मुवक्किल को निर्दाष साबित करना ज़रूरी नहीं समझा, तो जज फाँसी के अलावा क्या सज़ा देता। हमारी पूरी न्यायप्रणाली आमूलचूल परिवर्तन चाहती है। आज से छः साल पूर्व रामश्री के लिए दी गई दया याचिका का मुझे कोई मलाल नहीं।

मामला रामश्री की माफ़ी का हो या धनंजय की फाँसी का, एक बहुत बड़ा सवाल जो हमारे सामने खड़ा है , वह यह कि हर जुर्म की सज़ा पाने के लिए सिर्फ ग़रीब लोग ही जेल में क्यों है?

जुर्म और सजा का मसला जटिल होता है और नाजुक भी। हर मसला दूसरे से अलग होता है और विशिष्ट। इसलिए हर मामले को उसकी विशिष्टता में सुलझाने का प्रावधान है। न तो हर हत्या की सजा फाँसी है और न हर चोरी की सज़़ा जेल। मै मानती हूँ कि फाँसी की सजा या तो हो ही न, और यदि हो तो न्याय प्रणाली की सारी राहों को पार करके सर्वाच्च स्तर पर तय की जाय। परन्तु जघन्य अपराधों के क्रूर अपराधियों को कड़ी सज़ा तो मिलनी ही चाहिए।

हमारी न्यायप्रणाली के अनुसार सज़ा के चार मक़सद होते हैं- रिफार्मंटिव - यानी सुधार के लिए, रेस्ट्रिक्टिव यानी अपराधी को बंद करके समाज को उससे बचाने के लिए, डिमास्ट्रेटिव - यानी समाज के अन्य अपराधियों को आगाह कर देने के लिए और रेट्रिब्यूटिव यानी जिसके प्रति अपराध हुआ है उसकी ओर से प्रतिशोध लेने के लिए।

बच्ची के साथ बलात्कार उसके बाद हत्या करने वाले जघन्य अपराधी को सजा देकर समाज को आगाह भी किया गया है और उनके माता-पिता के मन को ठंडक भी पहुँचाई गई है जिन्होंने यह चौदह लम्बे वर्ष मुकद्दमा लड़ते हुए बिताए होंगे। जघन्य हत्या के दोषी के लिए जीवन माँगने वालों ने कहा कि वह चौदह वर्ष जेल में रहा, यह सज़ा काफी है। उन्होंने यह क्यों नहीं पूछा कि हत्या जैसे स्पष्ट मामले की सुनवाई में चौदह वर्ष क्यों लगाए गए। देरी करने के लिए अपराधी दोषी था, यह सर्वाच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया। आमतौर पर ऐसे सभी मामलों में मैंने अपराधियों को तारीख़ बढ़वाते ही देखा है, और इस आधार पर मुक्त होते भी कि मामले में बहुत देर हो रही है सो बेल दे दो, और एक बार बेल हो जाए, तो समझो मुक्ति।
जरा मुड़ कर देखें, तो पाएँगे कि मथुरा बलात्कार के मामले में सारे स्त्री संगठन अपराधियों को सज़ा दिलवाने के लिए उठ खड़े हुए थे और सर्वाच्च न्यायालय द्वारा सज़ा घटा दिए जाने का स्त्री संगठनों ने कड़ा विरोध किया था। इसी प्रकार भंवरी देवी के प्रति अपराध करने वालों को सज़ा न दिये जाने के मामले में सभी स्त्री संगठन न्याय पालिका से नाराज़ हैं और अपना विरोध दर्ज कराते रहे हैं। देश में स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं हैं, यह चर्चा जारी है। बलात्कारों और हत्याकाण्डों का ब्यौरा रखना, मेरी रुचि का विषय नहीं है, इसलिए मैं यह गिनाना नहीं चाहती कि कितने हत्यारे छूट गए। मैं तो यह जानना चाहती हूँ कि आखिर हम चाहते क्या है ? कभी अपराधी को मुक्त करदिए जाने का विरोध करना और कभी अपराधी को सज़ा दिए जाने का विरोध करना एक अन्तर्विरोधी दृष्टि का प्रतीक है। स्त्री संगठनों, मानवाधिकार संगठनो और बुद्धिजीवियों को अपने विचारों में स्पष्टता तो लानी ही होगी।

देश में बढ़ते हुए अपराध और असुरक्षा की भावना का कारण यह नहीं है कि जुर्म की कठोर सज़ा दी जाती है, यहाँ तो समस्या यह है कि असली मुजरिम को सज़ा दी ही नहीं जा पाती। जेलों में बंद कै़दियों में से केवल 10 प्रतिशत ही सज़ायाफ़्ता मुजरिम हैं,शेष 90 प्रतिशत हैं बदनसीब विचाराधीन कैदी, जिनका एक निर्णय लेने में अदालत 10 से 15 वर्ष लगाती है। तिहाड़ जेल में एक समय में बंद 8500 कैदियों में से 7114 विचारधीन कै़दी थे। असली अपराधी या तो स्वेच्छा से तारीख बढ़वाते रहते हैं, या खुले छूट जाते हैं।

भारत में, आज तक ब्रिटिश सरकार द्वारा सन् 1860 में बनाई गई क्रूर तथा रूढ़िवादी दण्ड प्रणाली लागू है जो वकीलों और जजों के लिए लाभदायक है, मुजरिमों और मजलूमों के लिए नहीं। ये व्यवस्था निरक्षर निर्धन और कमजोर मुजरिम, तथा बदनसीब बेगुनाह मज़लूम {विक्टिम} को, चाहे वह किसी भी वर्ग का क्यों न हो, न्याय नहीं दिला सकती। हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम क्रिमिनल के अधिकारों की रक्षा करता है, पीड़ित को कोई हक नहीं देता। 

मैंने अपने संगठन की ओर से एक युवा लड़की रोमिल वाही का केस लड़ा था, जिसके सिर में कई गोलियाँ मार कर उसके ससुर और पति ने उसकी हत्या कर डाली थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा था कि उसकी हत्या से पहले उसे चार दिन तक भूखा रखा गया था। उसकी रिपोर्ट लिखने स्वयं मजिस्ट्रेट को बुलवाना पड़ा था। पुलिस ने रिपोर्ट लिखने से इन्कार कर दिया था, क्योंकि ससुर ज्वांइट डाइटेक्टर प्रासीक्यूशन थे । वे अपनी बड़ी मूँछों के कारण खुद को कर्नल वाही कहलवाना पसंद करते थे। आज वे दोनों बाप बेटा जेल में है। वे हर चार महीने बाद ज़मानत की अर्ज़ी लगाते हैं और उनकी अर्ज़ी का विरोध करने में मृत लड़की के पिता का हर बार चालीस से साठ हजार रुपया खर्च होता है। तीन चार वर्ष तक लाखों रुपया खर्च करके वे थक गए हैं, और अब यदि वे खूब पैसे लगा कर बेल का विरोध नहीं कर सकेंगे तो अपराधी इस आधार पर जमानत पा लेगें कि वे काफी समय से जेल में हैं और निर्णय नहीं हो सका है इसलिए उन्हें कब तक जेल में रखा जाए। मृत लड़की के पिता यदि निर्धन होते तो अपराधी शायद एक क्षण भी जेल में नहीं रहते। अपने इन अट्ठारह साल के अनुभव में मैने दहेज उत्पीड़न और हत्या के बीसियों मामलों में से किसी एक को भी पूरी सज़ा होते नहीं देखा। यह व्यवस्था अपराधी को शक का लाभ 'बेनेफिट आफ डाउट' देती है, अपराध का शिकार तो शिकार होने को अभिशप्त है, पहले शिकारी का, फिर व्यवस्था का।

जो लोग फाँसी की सज़ा का विरोध करना चाहते हैं, वे दण्डविधान में परिवर्तन लाने के लिए संविधान में संशोधन का प्रयास किसी और समय क्यों नहीं करते? दसवीं में पढ़ती हुई मासूम बच्ची का बलात्कार और क्रूरता से हत्या करने वाले अपराधी को मृत्युदण्ड मिलते ही उसके पक्ष में रैली निकालना, बयानबाज़ी करना और फाँसी हो जाने के बाद हाथों में दीपक लेकर उसका महिमामण्डन करते हुए यात्रा निकालना कितना अशोभनीय है, कितना असामयिक ओैर कितना क्रूर यह समझना क्या उसी का काम है जिसने अपनी बच्ची खोई है? मानवता के पक्षधर क्या इतना भी नहीं समझ सकते? 

इस बीच नागपुर में एक सनसनीखे़ज़ घटना हुई जिसमें 13 अगस्त 2004 को कचहरी के अन्दर ही औरतों के समूह ने अक्कू यादव नाम के एक अपराधी को जूते चप्पलों से पीट पीट कर मार डाला। उन्होंने उस पर लाल मिर्च और छोटे चाकुओं से हमला किया। पाँच औरतें अपराध में पकड़ी गईं। चार सौ अन्य औरतें सामने आ गईं और बोलीं कि अपराध में वे भी शामिल हैं। पाँचों औरतों को तत्काल ज़मानत मिल गई। यह अपनी तरह का अनूठा उदाहरण है जहाँ अपनी सुरक्षा, अपने सम्मान और संवेदनाओं के लिए समाज स्वयं उठ खड़ा हुआ। अक्कू यादव 12 बार हत्या और बलात्कार के जुर्म में पकड़ा गया, और हर बार ज़मानत पर छोड़ दिया गया। दस वर्ष से आंतक फैलाने वाला मुजरिम समाज के हाथ मारा गया। यह समाज का स्वायत्त निर्णय था, जहाँ पीड़ित औरतों के समूह ने तय किया कि वह अपराधी को प्रश्रय देने वाली न्यायप्रणाली का मोहताज नहीं रहेगा। भावना इसके पीछे भी उसी पोयटिक जस्टिस की है - अपराधी को सजा और निर्दोष को माफी। ऐसी घटनाएँ भारतीय न्याय-व्यवस्था के लिए ख़तरे की घण्टी हैं।

आज धनंजय चटर्जी को मासूम बच्ची की हत्या और बलात्कार के अपराध पर होने वाली फाँसी से सहमत होने का भी मुझे मलाल नहीं। यह सजाएँ अमानवीय भले ही लगें पर सिद्ध करती हैं कि समाज क्रूर और जघन्य अपराधों को सहन नहीं करेगा। हमें वह समाज बनाना है जहाँ निर्दाष निरपराध लोग भी चैन से जी सकें, जहाँ बच्चियाँ स्कूल जा सकें, पार्कों में खेल सकें, जहाँ माँ - बाप और बच्चों को हर समय बलात्कार और हत्या के खौफ के साये में न जीना पडे़, जहाँ न्यायप्रणाली का एक मात्र ध्येय केवल 99 अपराधियों को इसलिए बचाना न हो कि कहीं एक निरपराध को सजा न हो जाए, बल्कि जन सामान्य को सहज सुरक्षित जीवन जीने में मदद करना हो।

इस प्रकरण में एक अहम् मुद्दा है, मीडिया की भूमिका का। मीडिया गणतन्त्र का चौथा स्तम्भ है। नई तकनीक के कारण टी.वी और अखबार बहुत त्वरित गति से समाचार प्राप्त करके लोगों तक पहुँचाने लगे हैं। नई तकनीक ने उन्हें ताकत दी है, पर क्या उन्होंने इसका सही इस्तेमाल किया है? पत्रकार अपनी ताकत और लोकप्रियता के गर्व में इतने उन्मत्त हैं कि ये वे तय करेंगे कि न्यायवेत्ता न्याय कैसे करें, प्राध्यापक कैसे पढाए, डाक्टर के इलाज में क्या गलती है, सिपाही सरहद पर किस प्रकार लड़े और वैज्ञानिक किस विषय पर शोध करें। यह स्थिति इसलिए पैदा हो गई क्योंकि जनता तक समाचार पहुँचाने का काम पत्रकारों के पास है, वैज्ञानिक शिक्षक, समाज सेवक, न्यायवेत्ता, सिपाही की सीधी पहुँच जनता तक नहीं, वे तो अपने क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, मीडिया एक्सपर्ट कमेंट कर रहा है।

मीडिया 'न्यूज़' की जगह 'व्यूज़' दे रहा है। वह 'समाचार' की जगह 'विचार' दे रहा हैः एक पत्रकार के अपने निजी विचार। सारे पत्रकार समाज के सबसे महान सामाजिक चिन्तक नहीं हैं, यह बात स्पष्ट कर दी जानी चाहिए। उनका दायित्व है समाचार दे कर जनता के मन में विचारों को जगाना, न कि उनके मन में अपने निजी विचार ठूँसना।

इस बीच ऐसी दो गैर जिम्मेदार बाते मीडिया धनंजय चटर्जी के मामले में उठाता रहा, और समाज दोहराता रहा, वे ये कि चौदह साल की उम्रकैद वह काट चुका और बलात्कार के लिए यह सज़ा काफ़ी है। 

वास्तविकता यह है कि उम्रकैद का अर्थ है मृत्युपर्यन्त (टिल द लास्ट ब्रेथ) जेल में रहना। चौदह वर्ष की उम्रकैद केवल हिन्दी फिल्मों में दिखाई जाती है, असली उम्र कैद में सारी उम्र जेल में ही रहना पड़ता है। दूसरी बात यह कि धनंजय को हत्या के अपराध की सज़ा मिली है, न कि बलात्कार की। बलात्कार से जुड़ी मेडिकल टेस्ट आदि की प्रक्रिया इतनी जटिल अपमानजनक तथा अपर्याप्त है कि यह मामला यदि हत्या का न होता तो बच्ची के माता पिता बलात्कार का अपराध सिद्ध ही न कर पाते और यदि कर भी लेते तो धनंजय केवल सात वर्ष तक जेल की कोठरी नम्बर तीन में उबले अंडे, छः टोस्ट, दूध, तली मछली और दाल चावल खाकर रेडियो सुनते हुए समय बिताता और उसके बाद ऐसे ही अन्य अपराध करने के लिए स्वतन्त्र हो जाता।

अब दो शब्द बुद्धिजीवियों के विषय में। भारतीय गणतन्त्र में एक है पक्ष और एक है विपक्ष। अक्सर देखा गया है कि शासन जो भी निर्णय ले, उसके विरोध में आवाज उठाना ज़रूरी समझा जाता है, और अनेक बुद्धिजीवी विरोधी पक्ष में जा खड़े होना बेहद जरूरी समझते हैं। यह सच है कि सत्ता के मद में चूर होते प्रशासन के सामने न्याय की बात रखना बुद्धिजीवियों का दायित्व है, पर हमेशा ही विरोध का स्वर उठाते रहना इस वर्ग को अप्रांसगिक बना देगा।

अंहिसा में विश्वास करने वाले गाँधीवादी विचारक यदि फाँसी का विरोध करें तो यह उनकी धारणा के अनुरूप है। पर स्वयं को वामपंथी बताने वाले कम्युनिस्ट संगठनों से जुड़े तथाकथित जनवादी अपने अति बौ़द्धिक लेखों में लोकतन्त्र के विरुद्ध हथियारबन्द आन्दोलनों को सही ठहराते हैं, भले ही इनमें होने वाली हिंसा का शिकार हो कर मरने वालों में वे सब आम नागरिक हों जिनका कोई क़सूर नहीं। खेद है कि इन तथाकथित जनवादियों द्वारा उकसाए गए लोगों द्वारा की गई बेकसूरों की हत्या को जो लोग जायज मानते हैं, वे ही लोग न्याय की पूरी प्रक्रिया से गुजर कर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई उस सजा ए मौत को हिंसक बता कर उसके खिलाफ खड़े हैं जो उस बलात्कारी तथा हत्यारे को सुनाई गई जिसे कसूरवार पाया गया।

फाँसी की सज़ा किसी को भी होनी ही नहीं चाहिए, यह बात अंहिसा में विश्वास करने वाले गांधीवादी विचारक माने तो ठीक हैं, परन्तु महाश्वेता देवी जैसी विदुषी लेखिका तो अपने अनेक लेखों कहानियों और उपन्यासों में ऐसी असहनीय परिस्थितियों में जीते हुए लोगों को चित्रित करती रही हैं जिनके आगे नक्सली हिंसा में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। वे शोषण दमन और अन्याय के विरूद्ध हिंसात्मक प्रतिरोध को ग़लत नहीं मानतीं। ‘हज़ार चौरासी की माँ’ हो या 'नीलछवि', या ‘मास्टर साहब’ या 'घहराती घटाएँ', हिंसात्मक प्रतिरोध का चित्रण महाश्वेता देवी सहानुभूति से ही करती रही हैं, भले ही एक निरुपाय, दमित, शोषित विकल्पहीन व्यक्ति के अन्तिम विकल्प के रूप में।

मासूम बच्ची के बलात्कार और हत्या के अपराधी से निबटने का और क्या विकल्प था? अपराधी की हिमायत में खडे़ अनेक आदतन-विरोधी पक्ष रखने वाले बुद्धिजीवियों की पंक्ति में महाश्वेता देवी का खड़ा होना, मुझे अचभ्मित करता है और विचलित भी। उनके प्रति असीम सम्मान ओैर श्रद्धा रखने के बावजूद इस विषय पर मैं उनसे अपनी असहमति दर्ज कराती हूँ ।

‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है’ और जो जीवन हम दे नहीं सकते उसे हम ले भी नहीं सकते’ यह वाक्य कह कर तथागत सिद्धार्थ ने एक सुकोमल निर्दाष हंस का जीवन शिकारी देवव्रत से बचा लिया था। सिद्धार्थ ने यह बात निर्दाष हंस का जीवन बचाने के लिए कही थी। बचपन में पढ़ी इस कहानी का असली अर्थ भूलकर, अपने अति उत्साह में मानवाधिकार के नाम पर बुद्धिजीवी यह वाक्य हंस के स्थान पर शिकारी को बचाने के लिए इस्तेमाल करने लगे। पीड़ित की पीड़ा को पूरी तरह नजरअंदाज करके इस बार ये लोग निर्ममता से अभियुक्त ही नहीं, एक निर्मम अपराधी के पक्ष में खड़े हैं।

गणतन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सही इस्तेमाल हमारी बहुत बडी जिम्मेदारी है। हमें मुँह खोलने से पहले सोचना है कि हम निर्दाष हंस को बचाएँगे या नृशंस शिकारी को। )
(शालिनी माथुर, 15 अगस्त 2004 लखनऊ)

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आज लगभग नौ साल बाद भी मामला ज्यों का त्यों है। 16 दिसम्बर 2012 की खौफनाक घटना के बाद जब पूरा देश सड़कों पर उतर कर बलात्कार व हत्या के लिए कठोरतम सजा की माँग कर रहा था, तब यह बात फिर से चर्चा में आई कि देश की भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभापाटिल ने गृह विभाग की संस्तुति पर तीस लोगों की फाँसी की सजा माफ कर दी थी, जिनमें 22 ऐसे लोगों की सज़ा माफ की गई, जिन्होंने बच्चियों का बलात्कार किया था, सामूहिक हत्याकाण्डों को अंजाम दिया था और छोटे बच्चों को बर्बरतापूर्वक मार डाला था। इंडियाटुडे (22 दिसम्बर2012) में छपी सूचना के अनुसार मोतीराम तथा संतोष यादव बलात्कार के जुर्म में जेल में रह रहे थे, उन्हें सुधारने केलिए उन्हें जेलर के बगीचे का बागवान नियुक्त किया गया। उन्होंने जेलर की दस वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार करके उसे मार डाला। प्रतिभा पाटिल ने उसे क्षमादान दिया। सुशील मुर्मू ने एक नौ वर्षीय बच्चे का गला काट डाला इससे पहले वह अपने छोटे भाई की बलि चढ़ा चुका था, वह भी पाटिल की दया का पात्र बना। धर्मेन्द्र और नरेन्द्र यादव ने नाबालिग़ बच्ची का बलात्कार का प्रयास किया था और उनका प्रतिरोध करने पर उसके परिवार के पाँच लोगों की हत्या कर दी थी और एक दस साल के लड़के की गरदन काट कर उसका शरीर आग में झोंक दिया था। मोहन और गोपी ने एक पांच वर्ष के बच्चे का अपहरण करके उसे यातनाएँ देकर मार डाला और पाँच लाख की फिरौती माँगी।


हम सब जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय 'रेयरेस्ट आफ द रेयर केसेज' में ही मृत्युदण्ड सुनाता है। हमारे देश में खास कर हमारे उत्तर प्रदेश में पिछले एक वर्ष से सामूहिक बलात्कार के बाद छोटी बच्चियों की हत्या अखबार में प्रतिदिन छपने वाली खबर है। यह रेयर नहीं रह गई है, पर सज़ा रेयरली ही सुनाई जाती है।


भेरूसिंह बनाम राजस्थान सरकार के मामले में जिसमें अपराधी ने अपनी पत्नी तथा पाँच बच्चों की नृशंस हत्या की थी,न्यायालय ने कहा "सज़ा देने का उद्देश्य है कि अपराधी बिना सज़ा के न छूट जाए, पीड़ित तथा समाज को यह संतोष हो कि इंसाफ किया गया है। हमारी राय में सज़ा का परिमाण अपराध की क्रूरता पर निर्भर होना चाहिए,अपराधी के आचरण पर भी और असहाय तथा असुरक्षित पीड़ित की अवस्था पर भी। न्याय की माँग है कि सजा अपराध के अनुरूप हो और न्यायालय के न्याय में समाज की उस अपराध के प्रति वितृष्णा परिलक्षित हो। न्यायालय को केवल अपराधी के अधिकारों को ही नहीं, पीड़ित के अधिकारों को भी ध्यान में रखना चाहिए और समाज को भी।" ( एस सी सी पृ0 481 पृ028)

आज हमारे राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी तथाकथित बुद्धिजीवियों के उपहास व निन्दा के पात्र हैं कि उन्होंने प्रतिभा पाटिल की राह नहीं अपनाई। । अखबार में कार्टून है कि कहीं फाँसी के फंदे चीन से आयात न करने पड़ें। पत्रकार भूल रहे है कि ये सजाएँ 20-30 वर्ष पहले दी गई थीं, यदि तभी तामील हो जातीं तो शायद सज़ा का डिमान्स्ट्रेटिव तथा डिटेरेन्ट होने का लक्ष्य पूरा कर कर पातीं।

प्रणव मुखर्जी ने जिन्हें दया के योग्य नहीं समझा उनमें धरमपाल था, जो बलात्कार के अपराध में जेल गया था। बीमारी के नाम पर पैरोल पर छूटा और बलात्कार की शिकार के परिवार के पाँच लोगों को मार डाला। प्रवीण कुमार ने चार लोगों की हत्या की, रामजी और सुरेशजी चौहान ने बड़े भाई की पत्नी की चार बच्चों समेत कुल्हाड़ी से काट कर हत्या की, गुरमीत ने तीन सगे भाईयों की, उनकी पत्नियों बच्चों समेत तेरह लोगों को तलवार से काट डाला, जाफ़र अली ने अपनी पत्नी व पाँच बच्चियों को मार डाला। ( हिन्दुस्तान 5 अप्रैल 2013 )

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने जिनको क्षमादान नहीं दिया उनमें वीरप्पन के चार साथी भी शामिल हैं। पाठकों को शायद स्मरण हो कि जब सैकड़ों हाथियों और पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाले तस्कर वीरप्पन को पूर्ण क्षमादान का आश्वासन देकर उससे आत्मसमर्पण करवाने की बात सरकार चला रही थी तब एक शहीद पुलिस अधीक्षक की पत्नी ने याचिका दी थी कि यदि अपराधी से समझौता ही करना या तो क्यों जंगलो की रक्षा करते हुए उसके पति को, वीरप्पन के हाथों मारे जाने दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने शहीद पुलिस अधीक्षक की पत्नी की याचिका पर सरकार द्वारा वीरप्पन से समझौते पर रोक लगा दी थी।


जेल में रहकर अपराधी को अनेक अधिकार हैं। पैरोल पर छूटकर बाहर आकर अपराधों को अंजाम देने और पीड़ित के परिवार को नेस्तानाबूत करने और गवाहों को धमकाने के उदाहरण असंख्य हैं। हमारे प्रयासों से जो कर्नल वाही पिता-पुत्र जेल गए थे वे भी अक्सर लखनऊ की जेल-रोड पर घूमते और फल सब्ज़ी खरीदते देखे जाते थे। हम सबने नीतीश कटारा के हत्यारे विकास यादव, कार से लोगों को कुचलने वाले नंदा और अपराधी मनु शर्मा को पैरोल पर छूट कर मयखानों में डिस्को डांस करते हुए दिखाई देने के समाचार पढ़े हैं।अपराधी स्वयं अपनी सुविधा के अनुसार समर्पण करते हैं। हम लोग यह सब संजय दत्त के मामले में देख ही रहे हैं, कि वे जेल में जाने के लिए 6 महीने की मोहलत माँग रहे हैं,और उनके साथ के अन्य अपराधी भी। मोहलत माँगने का हक़ मुल्ज़िम को है, क्या अपराधी अपने शिकार को कोई मोहलत देते हैं ?


शिकार के हक़ की रक्षा तो कानून भी नहीं करता। शिकार और उनके दोस्त अहबाब सिर्फ इन्तज़ार करते हैं। अभी गोण्डा में 31 वर्ष पहले हुई पुलिस के एस ओ, श्री के पी सिंह तथा 12 अन्य निर्दोषों की हत्या के अपराधियों को निचली अदालत ने फाँसी की सजा सुनाई। अखबार में सुश्री किंजल सिंह की रोते हुए तस्वीर छपी है, पिता की हत्या के समय वे चार माह की थीं, आज वे एक आइ ए एस अधिकारी हैं। इन 31 वर्षों के बीच उनकी माँ भी गुज़र गईं। (दैनिक जागरण 6 अप्रैल2013) ऐसे अपराधियों के पास सर्वोच्च न्यायालय तक जाने और वहाँ भी अपराधी पाए जाने के बाद भी दया पाने का हक है। सिर्फ पीड़ितों के पास इंसाफ़ पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं ।


सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डा0 ए0एस0 आनन्द ने 'विक्टिम आफ क्राइम - अनसीन साइड’ में लिखा है, " विक्टिम (मज़लूम) दुर्भाग्य से दण्डप्रक्रिया का सर्वाधिक विस्मृत और तिरस्कृत प्राणी है। एंग्लो सेक्सन प्रणाली पर आधारित अन्य प्रणालियों की भाँति हमारी दण्डप्रक्रिया भी अपराधी पर केन्द्रित है - उसके कृत्य,उसके अधिकार और उसका सुधार। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विकसित देशों जैसे ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमरीका आदि ने अभागे पीड़ितों पर भी ध्यान देना शुरू किया है, जो दरअसल अपराध के सबसे बड़े शिकार होते हैं और जिनकी क्षतिपूर्ति ( रिड्रेसल ) किया ही जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्रसंघ की घोषणा 1985 के बाद अमरीका ने भी विक्टिम आफ क्राइम एक्ट बनाया। मुजरिम को ज़मानत का अधिकार एक अधिकार स्वरूप मिला है, पर पीड़ित को जमानत का विरोध करने का यह अधिकार नहीं। राज्य की इच्छा पर निर्भर है कि वह चाहे तो विरोध करे चाहे न करे। पूरी दण्डप्रक्रिया में पीड़ित की भूमिका सिवा एक गवाह के कुछ नहीं, वह भी तब, यदि सरकारी वकील चाहे। ’’ (डा0 ए0एस0 आनन्द)


मेरा यह आलेख फाँसी की सज़ा के पक्ष में लिखा गया आलेख नहीं है। यह मज़लूम के हक़ों के पक्ष में लिखा गया लेख है। यह आवाज़ पीड़ित के अधिकार के पक्ष में उठी आवाज है। हमारी दण्डप्रक्रिया क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम कहलाती है, जो क्रिमिनल को केन्द्र में रखती है - उसके अधिकार, उसकी सुविधा, उसकी सुरक्षा, उसकी खुराक, उसका परिवार, उसके परिवार का दु:ख, दंड का विरोध करने का उसका हक, उसका सुधार। निर्भया-काण्ड के अभियुक्त विनय शर्मा ने अदालत के माध्यम से अपने लिए तिहाड़ जेल में फलों अंडे और दूध से युक्त बेहतर खुराक की माँग की है कि वह परीक्षा में बैठेगा। जिन्होंने बेटी खोई है, वे क्या खा रहे होंगे, क्या उन्हें भी ऐसी माँगे रखने का कानूनी हक़ है ? जो अपराध का शिकार हुए,उस पीड़ित व्यक्ति की पीड़ा न हमारी जिज्ञासा का विषय है, न हमारे कानून की।

आज जब मैं अपने इस पुराने आलेख को पुनः आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ, हमारे आदरणीय बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन 14 अप्रैल है। अखबार में उनके संविधान सभा में किए गये भाषण का मुख्य अंश छपा है - "संविधान सभा के कार्य पर नज़र डालते हुए नौ दिसम्बर 1946 को हुई उसकी पहली बैठक के बाद अब दो वर्ष ग्यारह महीने और सात दिन हो जाएँगे। संविधान सभा में मेरे आने के पीछे मेरा उद्देश्य अनुसूचित जातियों की रक्षा करने से अधिक कुछ नहीं था। जब प्रारूप समिति ने मुझे उसका अध्यक्ष निर्वाचित किया तो मेरे लिए यह आश्चर्य से भी परे था। इतना विश्वास करने और सेवा का अवसर देने के लिए मैं अनुग्रहीत हूँ। मैं मानता हूँ कि कोई संविधान चाहे जितना अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। एक संविधान चाहे कितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों।’’( दैनिक हिन्दुस्तान रविवार,14 अप्रैल 2013 पृ0 16)

हमारे संविधान निर्माता डाक्टर अम्बेडकर की कही हुई उक्त अन्तिम पंक्ति कितनी सरल और कितनी साधारण है, पर कितनी सारगर्भित। अच्छे लोग पीड़ित की पीड़ा को देखकर पीड़ित के अधिकार की रक्षा के लिए संविधान का इस्तेमाल करेंगे या संविधान में दी गई भाँति भाँति की न्यायिक प्रक्रियाओं का आश्रय लेकर अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा करते हए अपराधियों के पक्ष में जलूस निकालते रहेंगे। हमारा समाज और संविधान भोले बेकसूर हंस की रक्षा करेगा या क़ुसूरवार बेरहम शिकारी की ?

- शालिनी माथुर,
ए 5/6 कारपोरेशन फ़्लैट्स,
 निराला नगर, लखनऊ
फोन 9839014660





मुंबई पुस्तक मेले में आयोजित चर्चा सत्र ‘बलात्कार और न्यायिक प्रक्रिया” (19 अप्रैल 2013 की रपट 

“निर्दोष हंस को बचाना है, नृशंस शिकारी को नहीं ”  

“निर्दोष हंस को बचाना है नृशंस शिकारी को नहीं”- यह बात लखनऊ से मुंबई पुस्तक मेले में आईं श्री शालिनी माथुर ने अपने वक्तव्य में कही। इस अवसर पर उन्होंने अपने आलेख “ज़ुर्म और सज़ा” का पाठ किया और स्त्री के प्रति हर तरह की हिंसा और जुड़े हुए सभी न्यायिक मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात कही। शालिनी ने कहा कि हमें वह समाज बनाना है जहाँ निर्दोष निरपराध लोग भी चैन से जी सकें, जहाँ बच्चियाँ स्कूल जा सकें, पार्कों में खेल सकें, जहाँ माँ-बाप और बच्चों को हर समय बलात्कार और हत्या के ख़ौफ़ के साए में न जीना पड़े, जहाँ न्याय प्रणाली का एक मात्र ध्येय केवल 99 अपराधियों को इसलिए बचाना न हो कि कहीं एक निरपराध को सज़ा न हो जाए, बल्कि जन सामान्य को सहज, सुरक्षित जीवन जीने में मदद करना हो। उन्होंने आगे कहा कि 1860 से चली आ रही क्रूर तथा रूढ़िवादी दंड प्रणाली आज भी लागू है जो वकीलों तथा जजों के लिए लाभदायक है, मुज़रिमों और मजलूमों के लिए नहीं ।
इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार सुधा अरोड़ा ने कहा कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को न्याय मिलना लगभग असंभव है। कमज़ोर स्त्री अपने अधिकारों के प्रति न तो जागरूक है , न उसे अपने अधिकारों की जानकारी है । कहीं कुछ रास्ता दिखे भी, तो उसके पास इतना साहस नहीं है कि अपने लिए न्याय की गुहार लगा सके । देश की न्यायिक प्रक्रिया उसके लिए एक ऐसी अंतहीन यंत्रणा बन जाती है जो अपराध से अधिक आतंकित करने वाली और डरावनी होती है। जो मामले सामने आते हैं वे तो हम जान लेते हैं लेकिन देश भर में हजारों मामले दर्ज ही नहीं हो पाते क्‍योंकि पुलिस में मामले को ले जाना एक यातनादायक प्रक्रिया है . फिर पूछताछ और तफ्तीश से पीड़ित को इतना तोड़ दिया जाता है कि वह आगे जाने की हिम्मत ही नहीं करती . इस देश में भंवरी देवी के मामले को हम देख सकते हैं जिसे सारे महिला संगठनों की कोशिश के बावजूद न्‍याय नहीं मिल पाया । 
इस चर्चा में मलयालम की प्रसिद्ध लेखिका मानसी ने कहा कि हमारे युवा वर्ग के पास कोई सपने नहीं हैं, कोई लक्ष्य नहीं है इसलिए वो दिशाहारा सा है और पोर्नोग्राफ़िक सामग्री देखकर अपना समय बिताता है। उसके बाद वो उसका प्रेक्टिकल करने के लिए स्त्री के प्रति यौन हिंसा करता है। मराठी लेखिका सुषमा सोनक .ने कहा कि व्यवस्था स्त्री को कभी भी सशक्त नहीं बनाना चाहती । उसी तरह समानता का राग अलापने वाली न्यायिक प्रक्रिया पीड़ित स्त्री को बचाने की जगह अपराधी को ऐसे अवसर देती है जो न सिर्फ़ बच जाए और उस स्त्री को पुनः प्रताड़ित करे । अपराधियों को न सज़ा का भय है न समाज का। 
कथाकार रामजी यादव ने कहा कि कोई भी चीज जहाँ से दिखती है केवल वहीँ गड़बड़ नहीं होती बल्कि उसका सिरा कहीं और होता है . हमारे देश में पूँजी ने जैसा माहौल पैदा किया है वह सोच को ऊपर से नीचे तक थोपता है . स्त्री के साथ व्यव्हार और उसके प्रति धारणाएं आज काम कर रही पूँजी और उसके चरित्र का एक प्रतिबिम्ब है . अक्सर यह देखा गया है कि औद्योगिक और पूंजीवादी समाज में पुरानी जड़ताएं और संस्कृतियाँ टूटती हैं लेकिन भारत में इसका उल्टा चलन दीखता है . पूँजी ने यहाँ स्त्री को न सिर्फ एक कमोडिटी के रूप में पेश किया है बल्कि उसके प्रति सामंती धारणाओं को भी पुख्ता किया है . शासन अब ऐसे लोगों के हाथ में है जो स्त्री को इतना सॉफ्ट शिकार समझते हैं कि उसके साथ हुए दुर्व्यवहार का संज्ञान भी नहीं लेते . वे उन प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं जो लिंगभेद और स्त्रियों पर नियंत्रण को एक दर्शन की तरह विकसित कर रही हैं . इंटरनेट पर परोसी जा रही अश्लील सामग्री का बढ़ता व्यापार भारतीय संसद के गलियारे तक पहुँच गया है। बाज़ारवाद की आंधी ने न सिर्फ़ हमारी पूरी व्यवस्था को कब्ज़े में ले लिया है बल्कि हमारे देश की युवा पीढ़ी की मानसिकता को भी नियंत्रित कर लिया है। इसी के चलते इंटरनेट पर पोर्न का सबसे बड़ा बाज़ार पैदा किया गया है जो पूरी आबादी की वैचारिकता को नष्ट कर रहा है। इसका शिकार बनना पड़ता है देश की स्त्री जाति को- धर्म, वर्ग, जाति, वर्ण से परे। भारतीय न्यायव्यवस्था को संवेदनशील तो बनाना ही होगा, पैसे के अनियंत्रित प्रभाव को भी कम करना होगा . केवल निम्न वर्ग ही नहीं , उच्च वर्ग में भी स्त्री के साथ बलात्कार की घटना पर सजा को प्रभावशाली और कारगर बनाना होगा . 
प्रो.रवीन्द्र कात्यायन ने कहा कि तकनीक के प्रचंड आवेग ने जैसे हमारी सारी भावनाओं को अपना गुलाम बना लिया है। हमारी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त प्राय हो चली है। इसलिए न हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कोई सपना दे पा रहे हैं न कोई स्वस्थ माहौल। व्यवस्था पंगु है और न्यायिक प्रक्रिया पिछड़ी। ऐसे में हज़ारों सालों से चली आ रही स्त्री को गुलामी से कौन मुक्त कराएगा ? स्त्री के प्रति बढ़ते अपराधों के प्रति समाज की असंवेदनशीलता और पुलिस तथा न्याय व्यवस्था की लचर स्थिति ने हमारे समय को बहुत बेबस बना दिया है जहाँ स्त्री के लिए सुरक्षित रहते हुए सम्मान से जीना आज सबसे बड़ी चुनौती है। और अपने समय की इस बेबसी पर हमारा समाज शर्मिंदा भी नहीं होता ! 
शालिनी माथुर ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अपराधी के प्रति अतिरिक्‍त कन्‍सर्न पर तंज करते हुए कहा - हमारी दण्ड प्रक्रिया अपराधी पर केन्द्रित है - उसके कृत्य , उसके अधिकार और उसका सुधार . ऐसे अपराधियों के पास सर्वोच्च न्यायालय तक जाने और अपराधी पाए जाने के बाद भी दया पाने का हक है .जो अपराध का शिकार हुए , उस पीडि़त व्यक्ति की पीड़ा न हमारे कानून की जिज्ञासा का विषय है , न हमारी . पीडि़तों के पास शीघ्र इंसाफ़ पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं . भारत का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम क्या कभी जस्टिस फॉर द विक्टिम भी बन पाएगा ?

मंगलवार, 5 मार्च 2013

बनाकर फ़कीरों का हम भेस गालिब.....

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'कथादेश' में प्रकाशित शालिनी माथुर के लेख "व्याधि पर कविता या ...." से प्रारम्भ हुए विमर्श पर शालिनी माथुर के गत लेख  "मृतात्माओं का जुलूस" के क्रम में इसे पढ़ने से पूर्व कृपया पिछला लेख  यहाँ  देखें, उसी क्रम की एक कड़ी के रूप में इस बार पढ़ा जाए सुनील सिंह के - बनाकर फकीरों का हम भेस गालिब 


नीचे दिए पन्नों पर क्लिक करने से वे बड़े आकार में खुलेंगे। खुलने पर वहाँ एक सूक्ष्मदर्शी ( 'मैग्नीफाईंग ग्लास ) पर + का चिह्न आएगा, जिसे क्लिक करने से शब्दों का आकार और भी बढ़ा कर पढ़ सकते हैं।

- सुनील सिंह 









शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

मृतात्माओं का जुलूस : शालिनी माथुर

38 टिप्पणियाँ



अनामिका व पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था व तत्पश्चात राहुल ब्रजमोहन का "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"। उसी क्रम में प्रख्यात कवयित्री कात्यायनी का आलेख " धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका" भी आपने यहाँ पढ़ा। एक अन्य लेख अनिल पुष्कर कवीन्द्र का देह के भीतर छिपे देह के आख्यान भी यहाँ प्रकाशित किया था।

पाठकों ने इन लेखों को जिस गंभीरता से पढ़ा व अपने विचार व्यक्त किए वह प्रशंसनीय व अविस्मरणीय है। शालिनी माथुर के मूल लेख (व्याधि पर कविता या....) पर छिड़े विमर्श ने विमर्श का पथ छोड़ कब व कैसे व्यक्तिगत आक्षेपों आदि का रूप /रंग ले लिया इसे पाठक 'कथादेश' के अंकों में देख चुके होंगे या देख सकते हैं। 

कविताओं पर लिखे अपने आलोचना लेख से प्रारम्भ हुए हिन्दी की समकालीन काव्यालोचना के इस सबसे ज्वलंत विमर्श के पूरे प्रकरण पर शालिनी माथुर का एक दूसरा लेख अभी अभी 'कथादेश' के फरवरी 2013 अंक में "मृतात्माओं का जुलूसशीर्षक से प्रकाशित हुआ है; जिसे दिल्ली के एक साहित्यिक मित्र ने सौजन्यपूर्वक स्कैन कर भिजवा दिया। उस स्कैन से पाठ तैयार करने में दो तीन दिन का समय लग गया। 

अब उसी लेख का अविकल पाठ सुधि पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत है। आपकी सार्थक प्रतिक्रिया की उत्कंठा से प्रतीक्षा रहेगी। 
- कविता वाचक्नवी

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औरत के नज़रिये से
मृतात्माओं का जुलूस
- शालिनी माथुर
ईसा के दो हज़ार बारहवें वर्ष का अंतिम माह इस विडम्बना के लिए याद रखा जाएगा कि जिस समय देश की राजधानी दिल्ली में हज़ारों आम लोग रेप के विरुद्ध जुलूस में चल रहे थे, उसी समय हिन्दी साहित्य की विद्वत्त्रयी दिल्ली में पोर्न के पक्ष में जुलूस निकाल रही थी। यह समय अंधेरा है। मेरा यह प्रतिरोध एक नारीवादी एक्टिविस्ट का पोर्न के विरूद्ध प्रतिरोध है, जो इसी तरह जारी रहेगा क्यों कि मेरा यकीन है कि “पोर्न इज़ द थियरी, रेप इज़ द प्रैक्टिस ।”  इस अंधेरे समय में मैं अपनी रोशनी के साथ खड़ी हूँ कि अब मैं अकेली नहीं, मेरे साथ हिन्दी का लगभग सारा संसार है। 



हमारे देश की राजधानी नई दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्ष की एक युवा स्त्री के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। यह रेप एक पुरुष द्वारा किया गया केवल वासनामूलक यौन शोषण ही नहीं था, इसमें कई पुरुषों ने मिलकर क्रूरता, बर्बरता और नृशंसता से पूरे स्त्री--रीर को अपमानित किया और विरूपित करके चलती हुई बस के बाहर फेंक दिया। 29 दिसम्बर को क्रूर हिंसा की शिकार युवती की मृत्यु हो गई। प्रसिद्ध पुस्तक ’सिस्टरहुड इज़ पावरफ़ुल’ की लेखिका और मिज़ मैगज़ीन की सम्पादिका अमरीकी नारीवादी चिन्तक रॉबिन मार्गन का कथन है -“पोर्न इज़ द थियरीः रेप इज़ द प्रैक्टिस।” हम सब इस कृत्य में रॉबिन मार्गन के इस कथन का सत्यापन होते देख सकते हैं ! 


कथादेश पत्रिका के जून 2012 अंक में औरत के नज़रिए से स्तम्भ में मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था- ''व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि।'' वह आलेख हिन्दी साहित्य में स्त्री-शरीर के पोर्नोग्राफ़िक निरूपण के विरुद्ध था। पोर्न साहित्य और पोर्न कला में स्त्री शरीर को बर्बरतापूर्वक विवश, अपमानित, यौनीकृत और विरूपित रूप में निरूपित किया जाता है और रेप में वास्तविक जीवन में वैसा किया जाता है। पोर्न थियरी यानी सिद्धान्त है और रेप प्रैक्टिस यानी क्रियान्वयन। यह दोनों विमानवीकरण की ही प्रक्रियाएँ हैं।


''व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि'' को पाठकों का इतना सुचिन्तित, सुविचारित, प्रतिबद्ध और उत्साह से परिपूर्ण जन समर्थन मिला क्योंकि यह लेख न्याय के पक्ष में था, सदाशयतापूर्ण था और इसमें पाठक अपने विचारों का प्रतिबिम्ब देख सके थे। इतना बड़ा पाठक वर्ग मेरा हमनवा इसीलिए बना क्योंकि लेख ने उनके ही भावों की तर्जुमानी की थी। इस आलेख को 'कथादेश' से लेकर कम से कम पच्चीस इन्टरनेट पत्रिकाओं ने छापा और लगभग इतनी ही अन्य लघु पत्रिकाओं ने। 


पाठकों का आभार व्यक्त करने के लिए शब्द पर्याप्त नहीं हैं। लेख छपने के बाद तीन जून को मेरे पास पहला प्रशांसात्मक फोन आया और आज आठ जनवरी 2013 तक कोई भी दिन ऐसा नहीं हुआ जिसमें मुझे कोई नया फोन या एस0 एम0 एस0 न मिला हो। जो फोन नम्बर मैं बचा सकी उनको एक छोटी डायरी में लिख लिया है। इनकी संख्या 565 है। इंटरनेट पर आई टिप्पणियाँ जोड़ लें तो पाठकों की प्रतिक्रियाओं की संख्या हज़ारों में होगी। पाठकों की कुल संख्या का तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।


मैं स्वंय को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानती हूँ और विद्यार्थी जीवन से ही समाज से जुड़ कर सामाजिक मुद्दों पर काम करती रही हूँ । साहित्य लेखन में मेरा प्रवेश भी मेरे सामाजिक सरोकार का हिस्सा है। मैं हिन्दी भाषी हूँ। आज मुझे अपने हिन्दी भाषी होने पर बहुत गर्व हो रहा है।


ऐसे आलेख वाहवाही बटोरने के लिए नहीं लिखे जाते । पवन करण और अनामिका की उन दो कविताओं को, जिन्हें मैंने पोर्नोग्राफ़ी की शास्त्रीय रचनाएँ कहा है, मैंने बड़ी तकलीफ़ के साथ उद्धृत किया था। पाठकों की संवेदनाओं को कष्ट पहुँचाने का मुझे खेद है। आज यह लेख भी उतनी ही तकलीफ के साथ लिख रही हूँ, कि लिखना बहुत ज़रूरी हो गया है, उन मृतात्माओं के बारे में जिन्होंने एक गम्भीर चर्चा को मखौल में बदलने का प्रयास किया, एक छद्म विपक्ष खड़ा करके उसे बहस में तब्दील करने का प्रयास किया और अहंकार में चूर हो कर खुद ही ने बहस समाप्ति की घोषणा भी कर दी। वह आलेख मेरा था, उस पर चर्चा मैं यूँ ही समाप्त नहीं होने दूँगी।


मैंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि '' यह टिप्पणी केवल दो रचनाओं पर है, कवि तथा कवयित्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व या कृतित्व पर नहीं।’’ फिर भी अगस्त के कथादेश में जो लेख छपे उनमें से अर्चना वर्मा का लेख " प्रिय शालिनी को सस्नेह’’ और अनामिका का लेख सुश्री ''शालिनी माथुर'' को निवेदित’’ था। तब से अब तक मैंने इस विषय पर एक भी शब्द नहीं लिखा, आज भी न लिखती यदि अर्चना वर्मा ने झूठ, दम्भ, कुत्सा और दुर्भावना से भरे पूरे ग्यारह पृष्ठ उसी कथादेश के दिसम्बर 2012 अंक में न लिखे होते, जिस कथादेश की वे सम्पादन सहयोगी हैं।


जिस आलेख में अर्चना वर्मा का कोई ज़िक्र न था, वह बात उनको बहुत नागवार क्यों गुज़री ? वे इतनी व्यथित, इतनी व्याकुल, इतनी उत्तेजित, इतनी आगबबूला क्यों हैं ? कोई ख़ास बात है क्या? इसका उत्तर इसी आलेख में आगे ढूँढेंगे, पहले उनके झूठ का प्रतिवाद कर दें-


1) अर्चना वर्मा ने लिखा है कि "शालिनी ने आशंका जाहिर की कि कहीं ऐसा तो नही है कि उद्धृत कवियों के विरोधियों का कोई कार्टेल इतर कारणों से मुद्दे को ले उड़ा। ’’ (अगस्त पृष्ठ 8 )

यह झूठ है, मैंने ऐसा नहीं कहा । पाठकों का कोई कार्टेल नहीं हो सकता क्योंकि उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं होता। मैंने अपने लेख में कवियों के कार्टेल का जिक्र किया था जो खुद ही एक दूसरे को पुरस्कृत किया करते हैं। इस प्रकरण ने भी यही सिद्ध किया है कि पाठकों द्वारा तिरस्कृत कवि, कार्टेल द्वारा पुरस्कृत हैं।


2) "शालिनी कथादेश की आमन्त्रित और एक वर्ष से नियमित स्तम्भकार है। उनसे मेरा परिचय उनके लेखन के माध्यम से ही है। यह आमन्त्रण अपने आप में उनमें लेखन की तेजस्विता और धार की स्वीकृति है। कथादेश को इस बात का गर्व है कि उसके लिए व्यक्तिगत जान पहचान का नहीं रचना का महत्व है। ’’ (दिसम्बर पृष्ठ 8) अर्चना वर्मा ने यह साबित करने का प्रयास किया हैं मानों मैं उनके आमन्त्रण पर कथादेश में आई हूँ। यह सच नहीं। सच यह है कि मेरी पहली टिप्पणी ' कहेगी तो बेघर हो कर रहेगी ' अगस्त 2007 में और मेरा पहला वैचारिक आलेख "नारीवादी आन्दोलन पर एक नारीवादी का अन्तर्दर्शन" आज से पूरे पाँच वर्ष पूर्व फरवरी 2008 में प्रतिष्ठित नारीवादी रचनाकार सुधा अरोड़ा ने 'कथादेश' के अपने स्तम्भ 'औरत की दुनिया' में छापा था। उस पर छिड़ी लम्बी बहस में मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग, प्रभु जोशी, प्रभा खैतान, कात्यायनी, रुनू चक्रवर्ती तथा कुसुम त्रिपाठी ने भाग लिया था। उस समय अर्चना वर्मा 'हंस' में सम्पादन सहयोग कर रही थीं। सितम्बर 2008 में साहित्य के नाम पर पत्रिका 'हंस' में चल रही मठाधीशी और पोर्नोग्राफिक प्रवृत्ति के विरुद्ध 'कथादेश' के औरत की दुनिया में ही मेरा आलेख छपा था "नवरीतिकालीन संपादक और उनके चीयर लीडर्स।", वह लेख भी चर्चित हुआ।


3) स्तम्भकार होने का उलाहना अर्चना वर्मा मुझे न ही देतीं तो बेहतर होता। फ़रवरी 2012 में मेरा लेख ''ओथेलो का नारीवादी पाठ'' पढ़ने के बाद एक वरिष्ठ लेखिका होते हुए स्वयं अर्चना वर्मा ने मुझे फ़ोन ही नहीं किया बल्कि उस लेख की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव रखा कि मैं एक स्तम्भ क्यों न शुरू कर दूँ। मार्च 2012 में 'औरत के नज़रिये से' नामक अपने स्तम्भ में मैंने मातृत्व के व्यवसायीकरण पर एक लेख लिखा। मगर अगले ही माह उस स्तम्भ में अर्चना वर्मा ने अपनी एक विस्तृत टिप्पणी के साथ नीहारिका की कहानी छाप दी और उसके कुछ समय बाद उसी स्तम्भ में विभास वर्मा द्वारा किया गया एक अपठनीय अनुवाद। क्या किसी आमन्त्रित स्तम्भकार के स्तम्भ में कोई सहयोगी सम्पादक ऐसी घुसपैठ करता है ? क्या यही उनकी सम्पादकीय नैतिकता है? मुझे स्तम्भकार कहलाने का कोई शौक नहीं है, न ही साहित्यकार कहलाने का । इस प्रकरण को पाठकों के सामने उठाने का मुझे खेद है।


आइए अब अपने लेख के सम्बन्ध में छपे कुछ आलेखों की पाठाधारित चर्चा कर लें। 


दिसम्बर 2012 के 'कथादेश' में छपा अर्चना वर्मा का आलेख 'पढ़न्त की राजनीति'  पूरे ग्यारह पृष्ठों में विस्तीर्ण है। इसकी पढ़न्त उसकी पढ़न्त, तेरी पढ़न्त मेरी पढ़न्त, ऐसी पढ़न्त वैसी पढ़न्त, लगभग इकहत्तर बार पढ़न्त पढ़न्त लिख कर कदाचित् उन्होंने यह कहने का प्रयास किया है कि एक ही रचना को कई तरह से पढ़ा जा सकता है। अनामिका और पवन करण दोनों ही पन्द्रह बीस वर्ष से लिख रहे होंगे। मैंने तो अपना केवल एक ही पाठ उन पाठकों के आगे प्रस्तुत किया था जिनके शीर्ष पर चढ़ कर वर्षों से ऐसा कविता पाठ चल रहा था। अर्चना वर्मा आखिर कितनी पढ़न्त करेंगी ? क्या मेरे जैसा सामान्य पाठक एक पाठ भी नहीं कर सकता ? यह पढ़न्त की कैसी राजनीति है ?


अनामिका के लेख के विषय में वे कहती हैं, "पढ़ने वालों ने अनुचित ही इसे “शालिनी के जवाब"की तरह पढ़ा और उचित ही असन्तुष्ट हुए कि जवाब नहीं मिला, जवाब दिया ही नहीं गया था।... इसी तरह अर्चना वर्मा का आलेख भी पिछले अंक से जारी लेख का पूरक अंश था।’’(दिसम्बर पृष्ठ 8 ) मतलब यह, कि दोनों विदुषियों ने स्वतन्त्र लेख लिखे हैं, न कि प्रतिवाद । 



अनामिका ने जो लेख बक़ौल अर्चना वर्मा मेरे लेख के जवाब के रूप में नहीं लिखा था उसकी बानगी देखें -"प्रतिवाद- कविता के कंधे -(सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित) "प्रिय शालिनी जी, प्रेमचन्द के बड़े भाई साहब वाले भाव से आप से दो बातें कहना चाहूँगी...। हबड़ तबड़ करने वाले हड़बड़िया पाठकों के सामने कविता खुलती नहीं.....। शालिनी बाबू मैं जिस मिथिला की हूँ वहाँ तो अट्ठाइस तीस की उम्र में ही माताएँ सासें ब्लाउज़ धारना बन्द कर देती हैं ... । लड़कियों की जीन में वाई फैक्टर नहीं होता, न अन्जान सिंह की छवि प्रक्षेपित करने की मजबूरी।... स्त्री शरीर कोई पुपुही नहीं होता कि एक ही फूँक में बजने लगे ...उन्नत पहाड़ विशाल भी हों यह ज़रूरी नहीं। ...नैतिकता का ठेका तो आप खैर लें ही मत......इस बन्धन की गाँठे धीरे धीरे खुलती हैं । यत्न करके देखिये। सस्नेह, अनामिका।’’


अनामिका दर्पवती हैं, वे ईसा मसीह नहीं हैं, वे क्षमा नहीं करेंगी, वे पाठ पढ़ाएँगी, - " ईसू, यदि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं तो इन्हें जानना चाहिए, हम दिखाएँगे इन्हें आईना कि इन्हें पता तो चले कि ये क्या कर रहे हैं। ’’(अगस्त पृ 13) पाठक एक कवयित्री की स्नेह भरी भाषा देखें।


'समयांतर' के प्रतिष्ठित स्तम्भकार दरबारी लाल कहते हैं कि  "अनामिका के लेख की विशेषता उनका गुस्सा है। उनके लेख में नोट करने लायक बात यह है कि वे शालिनी को कम से कम दो जगह पुल्लिंग में बदल देती हैं। इस तरह वे ठीक उस पुरुषवादी तौर तरीके का इस्तेमाल करती नज़र आती हैं, जो अपने विरोधी पुरुषों को अपमानित करने के लिए उन्हें स्त्री या स्त्रैण सम्बोधित ही नहीं करते सिद्ध करने की कोशिश भी करते हैं।’’ (समयांतर सितम्बर 2012) मैं इसमें जोड़ना चाहूँगी कि अनामिका के लेख में रौद्र रस ही नहीं अद्भुत रस भी विद्यमान है। पूरा आलेख ही विस्मयपूर्वक लिखा गया है, अनामिका के पद्य में बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह थे, अनामिका के गद्य में लगभग छप्पन । प्रभु जोशी ने आशंका व्यक्त की है कि, ''अनामिका के पास यदि भाषा का कोई बघनखा होता तो वे शालिनी की आलोचना का पेट फाड़ कर अंतड़ियाँ बाहर निकाल देतीं। " निश्चिन्त रहें, अनामिका ऐसा कर नहीं सकेंगी। वे बेहद सौभाग्यशाली हैं कि गम्भीर आलोचना की निगाह अब तक उनकी एक ही कविता पर पड़ी है। 


अर्चना वर्मा कहती हैं - "अनामिका शालिनी के विश्लेषण को जल्दबाज़ पठन्त के रूप में सन्देह का लाभ दे कर कविता की भाषा के कारगर सूत्र देती हैं यह अलग बात है कि वे शालिनी के क्रोध को उबाल देने का काम करते हैं।’’ (दिसम्बर पृष्ठ 9 ) मैंने तो अनामिका के प्रतिवाद पर एक भी शब्द नहीं लिखा, उन को किस सिद्धि की सहायता से इल्हाम हो गया कि मुझे क्रोध आया या दुलार ? मुझे इन दोनों करुणामयी स्त्रियों के प्रेम पर पूरा यक़ीन है। वे कहती हैं कि "भैया और बाबू अपने से छोटे के लिए लाड़ के उभयलिंगी सम्बोधन हैं," (दिसम्बर पृ 10 ) तो सच ही होगा। बाबू कह कर मुझे नवजात शिशु मानते हुए अनामिका ने अपने वात्सल्य रस के घड़े मेरे ऊपर ऐसे उलीचे कि उस रस से भीग कर इस शरद ऋतु में मैं थर थर काँप रही हूँ। क्रोध के उबाल का प्रश्न कहाँ ? मैं तो अर्चना वर्मा के स्नेह से सिक्त हूँ और अनामिका के लाड़ से सराबोर । समझ में नहीं आ रहा महान विदुषी अर्चना वर्मा की इस बात पर '' अहो अहो'' कहूँ या '' धिक् धिक्।'' (साभार अर्चना वर्मा )


अनामिका अपनी ओर से इस काव्यशास्त्रीय और स्त्रीवादी चर्चा के बीच एक अति महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं , "अरे भैया शालिनी, कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें ? "  मेरे पास इस घटिया प्रश्न का तो उत्तर नहीं मगर एक जिज्ञासा ज़रूर है, अनामिका की जिस मिथिला में अट्ठाइस वर्ष की युवा स्त्री ब्लाउज़ पहनना छोड़ चुकी होती है, क्या अनामिका की उसी मिथिला में बच्चों के साथ भी यौनिकता सम्बन्धी चर्चा की जाती है? ऐसी मिथिला कहाँ है? दोनों विदुषियों से निवेदन है कि मेहरबानी करके वे अब न तो हमारी अक़्ल का और इम्तहान लें, न ही हमारे सब्र का।


अर्चना वर्मा पाठकों की "सीमित पठन्त क्षमता", " सीमित भाषिक क्षमता", "सांस्कृतिक पृष्ठभूमि" और "अनिच्छा" पर खेद जताते हुए कहती हैं - अनामिका की  "लिखन्त के तर्क को समझा ही नहीं गया" । विदुषी लेखिका फ़रमाती हैं, "लेकिन अगर किताब के साथ पाठक की खोपड़ी टकराने से खाली घड़ा बजने की आवाज़ आती हो तो क्या ग़लती सिर्फ किताब की होती है?" (दिसम्बर पृ 9 ) पाठक कृपया ध्यान दें , उक्त वचन एक ऐसी महिला के हैं, जिनकी आयु साठ वर्ष से अधिक है, जो तीस वर्ष तक बी0ए0 के विद्यार्थियों को पढ़ाती रही हैं,जो चालीस पैंतालिस वर्ष से हिन्दी में लेखन कार्य कर रही हैं और जो सम्प्रति 'कथादेश' नामक साहित्यिक पत्रिका की सम्पादन सहयोगी हैं।


यहाँ पर एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़ा होता हैं,कि पाठकों की खोपड़ी खाली क्यों है ? कारण कदाचित् यह है कि जिस समय बुद्धि बंट रही थी उस समय अनामिका सब के शीर्ष पर विराजमान थीं, इसलिए लगभग सारी बुद्धि उन्हें ही मिल गई। बची खुची बुद्धि उनकी अभिभाविका अर्चना वर्मा को प्राप्त हुई। इसमें हम पाठकों का कोई दोष नहीं कि जब तक हमारा नम्बर आया तब तक बुद्धि बची ही नहीं थी। अर्चना वर्मा तो अपार बुद्धिमती हैं ,जब उन्हें मालूम ही है कि खोपड़ियाँ खाली हैं, तो वे अपनी किताब से उन पर प्रहार करती ही क्यों हैं ? सिर में बुद्धि नहीं तो क्या उसमें दर्द तो हो ही सकता है। पाठकों पर कुछ तो रहम करें।


मैं लखनऊ शहर की रहने वाली हूँ। अर्चना वर्मा देश की राजधानी दिल्ली में रहती हैं । उनके शहर में पाठकों के साथ पेश आने की क्या यही तहज़ीब है ? 


वे पाठकों से इसलिए नाराज़ है क्योंकि पाठक न अनामिका का पद्य समझ सके न अनामिका का गद्य। वे कहती हैं "अनामिका के आलेख की पढ़न्त कविताओं से कहीं ज्यादा दिक़्क़त तलब साबित हुई दीखती है। "(दिसम्बर पृ10) उन को सहसा वाचिक परम्परा याद हो आई जब श्रोता कवयित्रियों के सामने होता था, (जिसका ज़िक्र कात्यायनी ने तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा गा कर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री के मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार के रूप में किया है)। अर्चना वर्मा कहती हैं, "लेखन की सीमा यह है कि वह पाठक की क्षमताओं और सीमाओं से अपरिचित होता है।" उन्हें पक्का यकीन है कि अनामिका की क्षमता असीमित है और पाठकों की क्षमता अति सीमित। वे आगे कहती हैं कि अनामिका ने ऐसे पाठक की इच्छा की थी जो उनके "लेखन की देह भाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेगा। यह आकांक्षा हताशा के लिए अभिशप्त है।" (दिसम्बर पृ 9) 


हताश क्यों ? हम सब पाठक महान विदुषियों को यकीन दिलाना चाहेंगे कि पाठक भी देहभाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेंगे, बशर्ते देहभाषा की हर भंगिमा, हर इशारा कविता का हो, न कि कवयित्री का। मंच पर चढ़ कर कवि तथा कवयित्री देहभाषा भंगिमा और इशारों से मंच सिद्ध कर सकते हैं, काव्य नहीं। तीन मुहावरे, चार कहावतें, लोकगीतों के पाँच मुखड़े, छः परस्पर विरोधाभासी उपमान, आन्तरिक विसंगतियों से भरे सात वाक्यांश और बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह कवयित्री को शीर्ष पर बैठा सकते है, कविता को नहीं।


विदुषी अर्चना वर्मा जिस उत्तर आधुनिकतावाद की दुन्दुभी ज़ोर ज़ोर से बजा रही हैं वह एक दर्शन है जिसकी अपनी एक विचारपद्धति है और अपनी निजी शब्दावली। जिस तरह वेदान्त में ब्रह्म और माया महत्वपूर्ण प्रत्यय (कान्सेप्ट) हैं, सांख्य में प्रकृति और पुरुष, न्याय में अणु तथा प्रमा, प्रमेय और प्रमाण , भर्तृहरि के व्याकरण दर्शन में स्फोट और मार्क्सवाद में बोर्जु़आ और प्रॉलिटेरियट, उसी तरह भाषा की निर्मितियों पर विषेश ध्यान देने वाले उत्तर आधुनिकतावादी दर्शन में टेक्स्ट,रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट उनके निजी प्रत्यय हैं। इसे 'रीडर्स रिस्पॉन्स थियरी' के अन्तर्गत समझा गया है, यानि एक ही पठनसामग्री को अलग- अलग दृष्टियों से पढ़ा जा सकता है, आदि।


संस्कृत भाषा तथा दर्शन शास्त्र की अपनी पृष्ठभूमि के कारण शास्त्रों की मर्यादा, भाषाओं की गरिमा और अनुवाद के जिस अनुशासन से मेरा परिचय है उसके अनुसार एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि मूल भाषा तथा संस्कृति में उस प्रत्यय की क्या गरिमा , मर्यादा, स्थान और महत्व है। जैसे कूड़े के ढेर पर घूमते जिस पशु को हम सुअर कहते हैं,सांस्कृतिक धार्मिक संदर्भों के अनुसार अन्यत्र उसे ही वराह कहते हैं । कई बार हम अपनी भाषा का कोई प्रचलित शब्द अपना लेते हैं, जैसे अंग्रेजी के रेल को रेलगाड़ी कहना या केवल गाड़ी कह देना जैसे गाड़ी चल पड़ी, गाड़ी छूट गई आदि।


टेक्स्ट, रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट के महत्वपूर्ण उत्तर आधुनिकतावादी प्रत्ययों का अनुवाद लिखन्त, पढ़न्त और गढ़न्त बेहद कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु है। ये शब्द हिन्दी भाषा के पूर्व प्रचलित शब्द भी नहीं हैं। कृत्रिम रूप से गढ़े गए ये शब्द दर्शनशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रत्ययों को ट्रिवियलाइज़ करते हुए उन्हें मखौल की भाषा में बदल देते हैं, जैसे तोतारटन्त, मनगढ़न्त आदि। ये न किसी दर्शनशास्त्र-गरिमा के अनुकूल हैं, न हिन्दी भाषा की । मैं इन कृत्रिम, कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु शब्दों को सिरे से खारिज करती हूँ। इन निरर्थक शब्दों को बार -बार प्रयोग करके करेंसी में लाने के प्रयास गर्हणीय है।


एक ही आलेख में सत्तर से भी अधिक बार पढ़न्त पढ़न्त लिखने वाली अर्चना वर्मा को उसी आलेख में एकाधिक बार पढ़न्त क्षमता पद का प्रयोग करते हुए ज़रा भी संकोच नहीं हुआ। शिक्षा का अधिकार कानून (2009) बनाने में अमर्त्य सेन और मार्था नुस्बॉम द्वारा प्रतिपादित केपेबिलिटी थियरी का आधार लिया गया है जो यह मान कर चलती है कि क्षमता हर एक के भीतर होती है। अब विद्यार्थियों की क्षमता को भी कम ज़्यादा आँकने पर प्रतिबन्ध है और अध्यापकों द्वारा ऐसी भाषा बोला जाना एक दंडनीय अपराध है। उत्तर आधुनिकता भी पाठों की विविधता की बात करती है, क्षमता पद इस दर्शन में सर्वथा अस्वीकार्य है। स्पष्ट है कि अर्चना वर्मा केवल विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए उत्तर आधुनिकता की शब्दावली दोहराती हैं। वे न तो उस दर्शन की भावना समझ सकी हैं, न ही उसे आत्मसात कर सकी हैं। 


जो पाठक अर्चना वर्मा का अगस्त वाला पाठ ठीक से समझ नहीं पाए थे उनकी सुविधा के लिए दयालु लेखिका दिसम्बर वाले पाठ में उन्हें विस्तार से भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल समझाने लगीं- "शल्योपचार अभी हुआ नहीं है ,बल्कि होने वाला है, मौत की चुहिया अभी निकली नहीं है, निकाली जानी है।वह भूतकालिक क्रिया पदों में बावजूद भविष्यार्थे अतीत है।" (दिसम्बर पृ 15) मेरी जिज्ञासा है कि यह 'भविष्यार्थे अतीत'  पाणिनि का कौन-सा सूत्र है ? अनामिका की कविता में स्त्री को ख़तरनाक व्याधि हो गई है यह सुनकर वह भूतकाल में हँस चुकी हो, व्याधि इतनी फैल चुकी है कि मृत्यु से उसे बचाने के लिए पूरे अंग काट कर निकालने पड़ेंगे, यह सुनकर वर्तमान काल में वह हँस रही हो या अंग शरीर से काट कर अलग कर देने के बाद जब 'सर्जरी की प्लेट’ में सजा कर स्त्री के सामने पेश किए जाएँगे तब 'कहो कैसी रही' कह कर वह भविष्यकाल में हँसेगी, तीनों ही स्थितियों में कवयित्री द्वारा किया गया वर्णन अमानवीय, क्रूर, नृशंस, बर्बर और हृदयहीन है। शरीर का विमानवीकरण करते हुए स्त्री स्वयं को पोर्नोग्राफर की नज़र से देख रही है। काल चाहे भूत हो, चाहे वर्तमान, चाहे भविष्य उससे अनामिका की कविता की अश्लीलता में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 


वैसे अनामिका द्वारा 'ग्रेस निकोलस' की कविता की नग्नतावादी पंक्तियों को उद्धृत करने का क्या प्रयोजन रहा होगा? क्या अपनी कविता को उससे कम अश्लील साबित करना? ग्रेस निकोलस की कविता रंगभेद के विरुद्ध लिखी गई विद्रोह की कविता है, उसमें न आत्ममुग्ध नायिका है, न ही व्याधि का हृदयहीन निरूपण। यह उद्धरण अप्रासंगिक है। व्याधि का रूपक लेकर लिखी गई कविताओं पर हो रही चर्चा के बीच यौनिकता जगाने, पुपुही बजाने, और पहाड़ों की ऊँचाई और विशालता का विवरण देने का प्रयास कवयित्री की मानसिकता प्रदर्शित करता है। पाठकों ने देख ही लिया होगा कि अनामिका का गद्य अनामिका के पद्य से भी ज़्यादा अश्लील है।


मेरे आलेख को इन्टरनेट पर पहुँचाने का श्रेय आशुतोष कुमार को जाता है। "स्त्रीविमर्श"  ब्लाग की सम्पादिका डा0 कविता वाचक्नवी ने 15 जून 2012 को लिखा ''आशुतोष कुमार जी द्वारा यह लिखने पर कि 'कथादेश के जून अंक में शालिनी माथुर ने ग़ज़ब का लेख लिखा है, कविता की व्याधि पर। निवेदन है कि इसे दूसरे दस काम छोड़ कर पढ़ा जाए। पवन करण और अनामिका अपनी स़्त्रीवादी चेतना के लिए चर्चित रहे हैं लेकिन माथुर तर्क करती हैं कि उनकी कविताएँ न सिर्फ स्त्री विरोधी हैं,बल्कि सबसे आपराधिक अर्थों में पोर्नोग्राफिक हैं। किसी भी रूप में उनकी बहस नैतिकतावादी या अंध-अस्मितावादी नहीं है , न कविता के प्रति बेवजह कठोर। इस लेख पर चर्चाओं का तूफ़ान उठना चाहिए।’ इस लेख को पढ़ने की उत्कंठा थी। वैचारिक लेखन, स्त्रीविमर्श और कविता तथा आलोचना में रुचि रखने वालों के लिए उक्त आलेख को कल यूनिकोडित किया है।’’( डा0 कविता वाचक्नवी, लंदन )


जून 2012 के प्रथम सप्ताह में फेसबुक पर इसे ग़ज़ब का लेख बताने वाले आशुतोष कुमार ने अगस्त 2012 के प्रथम सप्ताह में 'कथादेश' में अर्चना वर्मा, अनामिका और मदन कश्यप के एक साथ मिलकर आए आक्रमण में शामिल होकर एक ऐसा लेख लिखा, जिसमें इस 'ग़ज़ब के लेख’ की हर एक निष्पत्ति से असहमति जताई गई थी। (अगस्त पृ 82) बात यहीं तक सीमित नहीं है। तब से लेकर अब तक वे फेसबुक पर मेरे आलेख के विरुद्ध एक लम्बा अभियान चला रहे हैं, जिसमें नवम्बर के कथादेश में छपे कात्यायनी के आलेख का विरोध भी शामिल है। (मैं फेसबुक की सदस्य नहीं हूँ।)


व्याधि पर कविता में मैंने कहा था कि मन, बुद्धि, और आत्मा से रहित स्त्रीशरीर का विमानवीकृत निरुपण पोर्नोग्राफी कहलाता है। लेख में मैंने यौनीकृत, उपभोक्ता वस्तु के रूप में निरूपित, विवश, अपमानित, पुरुष के अधीन, हृदयहीन जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग कम से कम एक सौ तीन बार किया था। आशुतोष कुमार ने 'कथादेश' में लिखा है, "विवशता के उल्लेख-मात्र से कविताएँ पोर्नोग्राफिक कैसे हो गईं ? अगर कविता का पाठ इस तरह किया जाएगा तो 'कस विधि रची नारि जग माहीं,पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ और 'मैं नीर भरी दुख की बदली' जैसी पंक्तियाँ भी पोर्नोग्राफिक कहलाएँगी।" (अगस्त पृ. 83) क्या कोई भी पाठक इस बात से सहमत हो सकता है ? उक्त पंक्तियाँ लिखने वाला व्यक्ति अध्यापक है। जो अध्यापक उसी बात को एक सौ तीन बार पढ़ने के बाद भी इतना ही समझ सका, उसकी बुद्धि पर तरस खाने से ज़्यादा तरस उन विद्यार्थियों के भाग्य पर खाया जाना चाहिए जो ऐसे अध्यापक से पढ़ने के लिए अभिशप्त हैं। 


यह एक बेहद घटिया खेल है, आशुतोष कुमार जिसमें शामिल हो कर पवन करण और अनामिका को गोस्वामी तुलसीदास और महादेवी वर्मा, के समकक्ष बता रहे हैं और मदन कश्यप इन्हें पाब्लो नेरुदा, निराला और मुक्तिबोध के समकक्ष । पाठक को कविता समझने में अक्षम साबित करने का प्रयास करते हुए 'कविता समझने की मुश्किल' शीर्षक से 'कथादेश' में बहुत प्रतिष्ठापूर्वक बॉक्स में छापी गई धूर्त टिप्पणी में मदन कश्यप ने विनम्रता का झूठा प्रदर्शन करते हुए अपनी सहयोगी विदुषियों के समान ही मुझसे व्यक्तिगत निवेदन किया है। मेरा उत्तर है कि पवन करण और अनामिका की आलोच्य रचनाएँ यदि छद्मपूर्वक महीयसी महादेवी वर्मा और महाप्राण निराला के नाम से भी प्रकाशित कर दी जातीं तब भी मैं इन्हें पोर्न ही कहती क्यों कि ये पोर्न ही हैं। मेरी धारणा है कि समीक्षा रचना की होती है, रचनाकार की नहीं । मुझे बड़े-बड़े नामों की 'नेम ड्रापिंग' से बिल्कुल डर नहीं लगता। उम्मीद है कि मदन कश्यप को अपने सवाल का जवाब मिल गया होगा। 


मेरे लेख में जो प्रश्न दो रचनाओं पर थे उन पर विद्वतचतुष्टय ने दुर्भावनापूर्ण व्यक्तिगत उत्तर लिखे, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। विचारणीय है कि आशुतोषकुमार के लिए जून में फेसबुक पर जो ग़ज़ब का लेख अन्ध अस्मितावादी नहीं था, अगस्त में वही लेख अन्ध अस्मितावादी (कथादेश पृ 86) हो गया ? कैसे ? कोई ख़ास बात है क्या ?


ख़ास तो दिसम्बर 2012 में 'कथादेश' में छपा मैत्रेयी पुष्पा का पत्र भी है। वे एक वरिष्ठ लेखिका हैं जो हमेशा किसी न किसी कारण से चर्चा में बनी रहती हैं। उन्होंने स्वयं मुझको तीन बार फोन करके इस आलेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारा यह लेख नहीं, शिलालेख है, जिससे उन्होंने बहुत कुछ सीखा । फिर उन्होंने स्वयं अपनी पुस्तक ''तब्दील निगाहें'' मेरे पास भेजी कि मैं उसकी समीक्षा कर दूँ और यदि समीक्षा न भी करूँ तो अपनी राय ज़रूर बताऊँ क्योंकि वे मेरी स्त्रीवादी दृष्टि की कायल हैं। दिसम्बर में उन्होंने उसी लेख के विरुद्ध सम्पादक ने नाम पत्र लिखना ज़रूरी समझा जो लेख कल तक शिलालेख था। शिलालेख के ऊपर उत्कीर्ण इबारत इतनी जल्दी मिट गई ? कैसे?


अपनी पुस्तक ''चाक'' पर सात साल से चल रही चर्चा से तो मैत्रेयी पुष्पा को ऊब नहीं हुई, पर मेरे एक गम्भीर लेख पर हो रही चर्चा से वे सात महीने में ही ऊब गईं, उन्होने लिखा, ''देखते पढ़ते और समझते महीनों बीत गए - बहरहाल अब इस पोर्नोग्राफी की चर्चा चकल्लस पर विराम लगा देना चाहिए।'' ( दिसम्बर पृ 5) मैत्रेयी पुष्पा की भेजी हुई पुस्तक मेरे पास है और एस एम एस भी। उनकी ''तब्दील निगाहें '' की समीक्षा तो मैंने नहीं लिखी मगर खुद मैत्रेयी पुष्पा की निगाहें क्यों तब्दील हुईं, यह वे ही बेहतर जानती होंगी।


अर्चना वर्मा ने और कुछ ठीक लिखा हो या नहीं यह तो ठीक लिखा है कि  ''शालिनी माथुर स्वयं को हिन्दी साहित्य जगत् की अन्तेवासी नहीं मानतीं, और वैचारिक दलबन्दियों, सुविधाजनक गुटबाजियों, व्यक्तिगत ईर्ष्याओं, अवसरवादिताओं की भीतरी राजनीतियों से भी अपरिचित हैं।’’ (अगस्त पृ 8) । ख़ुदा का शुक्र है, मैं हिन्दी के इस अन्तःपुर में नहीं रहती, इसके भीतर बहुत अंधेरा है। 


विद्वत्त्रयी के आलेखों के पक्ष में संजीव चन्दन ने अविनाश के ब्लॉग पर लिखा "मुज़फ़्फरपुर में साहित्यकारों ने अनामिका और पवन करण की कविताओं पर एक विचार गोष्ठी आयोजित की। इसमें शिरकत के लिए मैंने भी अनामिका और पवन करण की कविता, उसके पाठ तथा स्त्रीवादी आलोचना के सन्दर्भ पर विचार किया। पवन करण की कविता पोर्न तो कतई नहीं है, इसे बड़ी तफसील से अर्चना वर्मा ने स्पष्ट किया है। .....शालिनी संस्कृत साहित्य की प्रकांड विदुषी बताई जाती हैं। पता नहीं क्यों वे कविताओं को कविता की तरह नहीं पढ़ रही हैं। मुज़फ़्फरपुर में लोग 'कथादेश' के पन्नों की फ़ोटो कॉपी के माध्यम से इन लेखों का प्रसार कर रहे हैं।’’ संजीव चन्दन पाठकों से अपील करते हैं कि “शालिनी जी के आलेख को अकेले न पढ़कर अर्चना वर्मा, आशुतोष कुमार और अनामिका जी के लेखों के साथ पढ़ा जाए।’’ (मोहल्ला लाइव 24 अगस्त 2012) पाठकों ने देख लिया होगा कि विचार का यह मगध दिल्ली में ही सीमित नहीं है इसकी जड़ें मुज़फ़्फरपुर तक फैली है। इसने मेरे आलेख को एक नए विचार के रूप में नहीं, मगध पर हुए हमले की तरह देखा और किलेबंदी का प्रयास किया जो सफल न हो सका।


अनामिका बड़े गर्व से स्वयं को वाइ फैक्टर से रहित बताती हैं । संजीव चन्दन कहते हैं कि अनामिका की पूरी विचारप्रक्रिया ऐसी स्त्रीवादी विचारप्रक्रिया है जो स्त्री को प्रकृति से ही श्रेष्ठ मानती है। मैं भी एक माँ की ही बेटी हूँ  और एक बेटी की माँ भी। एक्स या वाइ क्रोमोज़ोम प्रकृति प्रदत्त होते हैं उन पर क्या इतराना ? केवल अपने क्रोमोज़ोम के आधार पर साहित्य में जगह बनाने की कोशिश करने वाली कुछ महिलाओं के कारण स्त्री का दर्जा साहित्य में भी गिरा है और समाज में भी।


मैं तो यह बात मान गई कि मैं बाबू अर्थात शिशु हूँ, मेरी जिज्ञासा है कि अनामिका जिन्होंने अर्चना वर्मा के "आग्रह की रक्षा करते हुए व्यस्तता के बावजूद लिखना स्वीकार किया" (दिसम्बरपृ08) स्वयं पद्मिनी नायिका हैं या वे भी शिशु ही हैं। कविताएँ तो वे केवल वयस्कों के लिए लिखती हैं, मगर वयस्क पाठकों के प्रश्नों से 'कीलित’ होते ही वे शिशु बन गईं और अर्चना वर्मा उनकी अभिभाविका बन कर उठ खड़ी हुईं। चाइल्डवुमन पोर्नोग्राफ़र का सब से हसीन ख़्वाब होती है, जिसका “शरीर वयस्क हो और चेहरा शिशुवत्, पलकें झपकाती, इठलाती, तुतलाती। स्वयं को वामपंथी कहने वालों को पता होना चाहिए कि कम्युनिस्ट रूस ने अपने देश में बार्बी डॉल्स पर इसीलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि उसका चेहरा शिशु तुल्य है और शरीर वयस्क, जिसे बच्चों के दिमाग़ के स्वाभाविक विकास के लिए हानिकारक माना गया।


अर्चना वर्मा अपने आमन्त्रणों, आग्रहों, गोवा और कर्नाटक वालों से हुई फोन वार्ताओं और मुजफ़्फ़रपुर में हुई कार्यशाला, वहाँ बाँटी गई फ़ोटोकॉपियों और जारी की गई अपील के बावजूद पोर्न कविताओं के समर्थन में जितने समर्थक जुटा सकीं उनकी संख्या दस से भी कम है, इनमें इन्टरनेट पर आई टिप्पणियाँ भी 'शामिल हैं। मामला 'कथादेश' तक सीमित नहीं, जिसे वे "कुल मिला कर तीन बनाम ग्यारह " (दिसम्बर पृ. 7) बता रही हैं। पोर्न के इस प्रायोजित अनुष्ठान में आमंत्रित सदस्यों के अतिरिक्त कोई भी शरीक नहीं। मामला तीन बनाम ग्यारह नहीं, दस बनाम हज़ारों लाखों है।


अर्चना वर्मा केवल उद्भ्रान्त, उर्मिला जैन, अनिता गोपेश, प्रभु जोशी, सुनील सिंह, राहुल ब्रजमोहन, उदयभानु पांडे, विद्या लाल और कात्यायनी के लेखों और पाठकों के छपे पत्रों से ही क्षुब्ध नहीं है। उनका कोप इंटरनेट पर हज़ारों की संख्या में आ रही पाठकीय टिप्पणियों को लेकर भी है और उन अनेक आलेखों को लेकर भी जो 'कथादेश' में नहीं छापे जा सके, मगर जो अन्यत्र प्रतिष्ठा से छपे। उद्भ्रान्त का 15 जून 2012 को लिखा पूरा लेख ’दुनिया इन दिनों’ में विस्तार से छपा। लेख में भविष्यवाणी की गई थी कि "उनका कार्टेल क्या ख़ामोश बैठा रह जाएगा? वह बाँस की खपच्चियों की मदद से उन्हें पुनः त्रिशंकु की तरह ‘शीर्ष ’के स्वर्ग की ओर धकेलने का प्रयास तो अवश्य करेगा।" अर्चना वर्मा ने उद्भ्रान्त पर आ रहे गुस्से को उदयभानु पांडे पर उतारते हुए दिसम्बर में प्रोफेसर पांडे को 'मानसिक आलस्य' और 'बौद्धिक जड़ता' का ताना दे कर डपट दिया।


दीप्ति गुप्ता का आलेख भी रचना समय सहित अनेक ब्लॉग्स में छप कर बहुत चर्चित हुआ। उत्तेजना के ज्वार में अर्चना वर्मा ने दीप्ति गुप्ता के नाम से पृष्ठ 13 पर जो आवेशमय टिप्पणी उद्धृत की है वह दीप्ति गुप्ता ने नहीं लिखी थी। डा0 दीप्ति गुप्ता हिन्दी और अंग्रेजी की वरिष्ठ लेखिका हैं और डा0 अर्चना वर्मा की ही तरह विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका भी। अर्चना वर्मा ने अपने क्रोध की गागर मेरे साथ उन पर भी उलीच दी ,"ये कविताएँ दीप्ति गुप्ता और शालिनी जैसों के लिए नहीं हैं। उनकी सीमाएँ समझी जा सकती हैं।" (दिसम्बर पृ 12) 'कथादेश' की सम्पादन सहयोगी ने यदि जानबूझ कर उनकी टिप्पणी ग़लत उद्धृत की है तो उन्हें अपनी दुर्भावना पर ग्लानि होनी चाहिए, यदि भूलवश ऐसा हुआ है तो उन्हें क्षमा माँगनी चाहिए।


दिसम्बर 2012 में लिखे आलेख में अर्चना वर्मा ने सारे टिप्पणीकारों, पत्रलेखकों और पाठकों को नाम ले लेकर कोसा है। कोसने के इस क्रम में उन्होंने मुझ नाचीज़ का नाम चालीस से भी अधिक बार लिया है। वैसे चालीसा के बारे में कहा गया है कि यदि कोई भक्त इतनी बार प्रेमपूर्वक प्रभु का नाम लेता है तो प्रभु स्वयं धरती पर उतर कर उसके संकट हर लेते हैं।


इस पूरे प्रकरण में अर्चना वर्मा की भूमिका क्या है? न चर्चित लेख उनका था, न आलोच्य कविताएँ उनकी। वे स्पष्ट कहती हैं कि उनकी "शालिनी की पढ़न्त से घनघोर असहमति" है (दिसम्बर पृ. 8)। अनामिका और पवन करण के पद्य के पक्ष में उन्होंने छह पृष्ठ लिखे, और अनामिका के गद्य के पक्ष में ग्यारह पृष्ठ । ज़ाहिर है, वे एक पक्षकार हैं। उन्होंने एक गम्भीर चर्चा को छद्मपूर्वक एक घटिया खेल में तब्दील करने का प्रयास किया और स्वयं एक ऐसी रेफरी की भूमिका में आ गईं, जो सरेआम पक्षपात करते हुए अपनी टीम को पूरे अंक देता है और विपक्षी टीम को केवल फ़ाउल ।


अर्चना वर्मा इतनी व्याकुल इतनी उद्वेलित, इतनी उत्तेजित और क्रोधित यूँ ही नहीं है, बात बहुत ख़ास है। वह ख़ास बात यह है कि इन वरिष्ठ विश्वविद्यालयीय विदुषी के पास हिन्दी के समकालीन साहित्य के लिए एक बहुत बड़ी परियोजना थी, जिसमें कदाचित् मेरे इस छोटे आलेख से बड़ा व्यवधान पड़ गया। अर्चना वर्मा की इस महती परियोजना का प्रस्ताव हम स्पष्ट देख सकते है, वे लिखती हैं-  "एक समाज का पोर्न किसी दूसरे समाज का रसराज शृंगार हो सकता है।" (कथादेश अगस्त पृ0 8) पोर्न को "नैतिक सदमा" बताने वाली इस अति बुद्धिमती विदुषी की इस निष्पत्ति का मैं कड़ा विरोध करती हूँ। 


विश्व की किसी भी सभ्यता संस्कृति के पूरे इतिहास के किसी भी कालखंड में पोर्न का कोई साहित्यिक मूल्य नहीं रहा। अर्चना वर्मा कहती हैं कि वह एक ही रस है, उसे कहीं पोर्न कहते हैं, कहीं रसराज श्रृंगार । उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि पोर्न शृंगार का विलोम है। ग्रीक साहित्यालोचन में भी दो विपरीत ऊर्जाएँ मानी गई है - ईरॉस और थानाटॉस। शृंगार की ऊर्जा है - ईरॉस, पोर्न की ऊर्जा है - थानाटॉस, एक प्रेम है दूसरी मृत्यु। पोर्न दरअसल सारे रसों का विपर्यय है। 


आज से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व भारत में भरत के नाट्यशास्त्र की रचना हुई थी, जिसमें आठ रस वर्णित थे। लोक स्मृति के आधार पर प्रस्तुत कर रही हूँ - 

शृंगारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः।
वीभत्साद्भुतौ संज्ञौ चेत् अष्टौनाट्ये रसाः स्मृताः।।

उसके लगभग एक हज़ार वर्ष बाद हमारे आचार्य अभिनवगुप्त ने 'नाट्यशास्त्र' पर टीका लिखी 'अभिनव भारती', जिसमें नवाँ रस शामिल किया गया- शांतरस, जिसका स्थाई भाव है शम, अर्थात् आठों रसों की सामरस्य पूर्ण उपस्थिति। आज, ईसा के लगभग दो हजार साल बाद, दिल्ली की विदुषी अर्चना वर्मा दशम् रस 'पोर्न' को प्रतिष्ठित करने का प्रस्ताव लाई हैं। इसका स्थाईभाव क्या होगा, विमानवीकरण, विरूपीकरण, और अगर उर्दू से परहेज़ न हो तो ''ग़लाज़त ?'' 



खेल सामने आ चुका है, मामला दो कविताओं की अस्मिता का नहीं, हिन्दी के समकालीन साहित्य में पोर्न की प्रतिष्ठा का है। प्रस्ताव अर्चना वर्मा का है और समर्थन वामपंथी आलोचक आशुतोष कुमार का-   “शालिनी माथुर के चर्चित आलेख में कहा गया है कि वह नग्नता के खिलाफ़ नहीं है सिर्फ स्त्री शरीर के पोर्नोग्राफ़िक निरूपण के खिलाफ हैं, तब भी वह उन तमाम स्त्रियों के खिलाफ़ तो है ही जो अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए पोर्न कलाकार बनती हैं।...आखिर पोर्न कलाकार बनने का फैसला स्त्री के लिए अपमानजनक क्यों होना चाहिए।........पोर्नोग्राफी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही होती है यह कोई सर्वस्वीकार्य धारणा नहीं है।" ( अगस्त पृ0 85 ) पोर्नस्टार की जीविका के अधिकार का प्रश्न उठाते हुए वामाचार के पक्ष में खड़े आशुतोष कुमार अपने नाम से पूर्व बेहयाई से वामपंथी लिखते हैं, इससे ज़्यादा लज्जास्पद बात और क्या हो सकती है ?


जिस तरह हम सब को मालूम है, उसी तरह आशुतोष कुमार को ज़रूर मालूम होगा कि पोर्न एक इंडस्ट्री (व्यवसाय) है और पोर्नस्टार उसका प्रोडक्ट (उत्पाद)। पोर्न इंडस्ट्री उत्पाद को अपमानित, विवश, विरूपित, यौन-उपभोक्ता सामग्री के रूप में पोर्न के उपभोक्ताओं को बेचती है। पोर्न इंडस्ट्री में स्त्री पण्यवस्तु है, उसे बेचा ख़रीदा जाता है। आशुतोष कुमार ने सोच समझ कर ही अर्चना वर्मा की प्रस्तावित पोर्न प्रतिष्ठा का समर्थन किया होगा । यह वामपंथ है, यह जनवाद और जनसंस्कृति है, यह प्रगतिशीलता है, तो अवनति शीलता कैसी होती होगी ? यह समय बहुत अंधेरा है। 


मानिनी विदुषी अर्चना वर्मा ने पवन करण की शहद के छत्तों और दशहरी आमों वाली कविता में संस्कृत के व्याकरण दर्शन के आचार्य भर्तृहरि के शब्दब्रह्म स्फोट का संधान किया है ( अगस्त पृ. 9 ) और अभिमानिनी विदुषी अनामिका ने अपनी उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं वाली कविता को "कालिदास की पंक्तियों से अन्तर्पाठीय संवाद करती" ( अगस्त पृष्ठ 14 ) ब्रह्मगाँठ बताया है जिसे खोल पाना मेरे जैसे सामान्य पाठक के लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।


अर्चना वर्मा, संजीव चंदन और मदन कश्यप ने कहा है कि मैं कविता समझने योग्य नहीं हूँ और अनामिका मुझसे सस्नेह निवेदन कर चुकी हैं कि, ''नए पाठक को कविता के योग्य बनना पड़ता है! समझने की योग्यता विकसित करनी पड़ती है ! यत्न करके देखिये !" ( अगस्त पृ. 14 )


योग्यता वाली बात पर बचपन में पढ़ी हुई एक कहानी याद आ गई, जिसमें सम्राट के कपड़े उसी को दिखाई देते थे जो इस योग्य होता था। नए वर्ष में आइए वह पुरानी कहानी सुनें ।


बहुत दिन पहले एक राजा था। उस मूर्ख और घमंडी राजा को कपड़ों के साथ नए नए प्रयोग करने का बहुत शौक था और वह हमेशा चापलूसों से घिरा रहता था। एक बार उस दम्भी सम्राट के दरबार में दो धूर्त ठग आए और बोले कि वे उसके लिए एक ऐसे कपड़े की पोशाक तैयार करके देंगे जो उसको दिखाई नहीं देगी जो नादान होगा या जो अपने पद के योग्य नहीं होगा।


वे धूर्त ठग हथकरघे पर बिना धागे के ताना-बाना बुनने लगे, वे हवा में सुई में धागा पिरोने का अभिनय करने लगे, फिर वे ऐसी सुई से उस कपड़े पर बारीक बेलबूटे काढ़ने का अभिनय करने लगे जो बुना ही नहीं गया था। वे सोने चाँदी और रेशम के तार मँगवाते और पुरस्कार स्वरूप अपने थैलों में भर लेते। ऐसा बहुत दिनों तक चलता रहा। राजा ने दरबारियों को भेजा। कपड़ा उन्हें दिखाई तो नहीं दिया,पर स्वयं को योग्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने सम्राट से कपडे़ की प्रशंसा की, उसकी नर्मी, बुनावट और उस पर कढ़े बारीक बेलबूटों की भी। सम्राट स्वयं जा पहुँचा, कपड़ा उसे भी दिखाई नहीं दिया पर वह नादान नहीं, योग्य था। 


धूर्त ठगों ने हवा में कैंची चलाते हुए कपड़ा काटा और हवा में सुई धागा चला कर पोशाक सीकर सम्राट को पहनाने का अभिनय किया। आत्ममुग्ध सम्राट अदृश्य पोशाक पहनकर चाटुकार दरबारियों के जुलूस का नेतृत्व करता हुआ शहर के बीच चल पड़ा। भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ ने देखा पर चुप रही। इसी बीच भीड़ में खड़ा एक बच्चा ( मिथिला का बाबू) चिल्लाया - "राजा ने तो कुछ भी नहीं पहन रखा।" "नादान बच्चे की आवाज सुनो", एक बुजुर्ग बोला, और फिर यह आवाज़ फुसफुसाहटों में बदलकर एक कान से दूसरे कान तक होती हुई एक शोर में बदल गई- "देखो राजा के तन पर तो वस्त्र ही नहीं।"


हांस क्रिस्चन एंडरसन की यह कहानी भले ही फेयरीटेल के रूप में संकलित हो, यह कहानी बच्चों की नहीं है। दरबार की हिप्पोक्रेसी और बौद्धिकता के झूठे दम्भ के खिलाफ लिखी कहानी यहीं समाप्त नही होती। कहानी आगे चलती हैं- आवाज़ को सुनकर राजा समझ गया कि सब लोग जान चुके हैं कि वह निर्वस्त्र है, मगर उसने निर्णय किया कि वह उसी प्रकार दरबारियों के जलूस का नेतृत्व करता रहेगा। प्रजा शोर मचाती रही, दरबारी निर्वस्त्र सम्राट के नेतृत्व में चलते रहे और यह दिखावा करने के लिए और भी अधिक श्रम करने लगे कि वे एक बेहद शानदार, बेशकीमती, बेहतरीन पोशाक के दूर तक फैले दामन की झालर को सावधानी से संवार और संभाल कर चल रहे है। 


निर्वसन सम्राट और योग्य दरबारियों का जुलूस
निर्वसनों के वसनों की प्रशंसा में अनेक बौद्धिक लेख लिखे जा चुके हैं। प्रगतिशील तथा अवनतिशील कवि तथा विद्वत्जन निर्लज्जता से निर्वसन के नेतृत्व वाले जलूस में चल रहे हैं। उन सब ने नादान बच्चे की आवाज सुन ली है, और उन सब की भी जिन्हें वे आम पाठक और सामान्य पाठक कह कर अपमानित और तिरस्कृत करते रहे हैं । छद्म खुल चुका है, फिर भी मृतात्माओं का जुलूस चल रहा है। खूबी यह है कि इस जुलूस में इस बार स्त्रियां भी शामिल हैं। 


अर्चना वर्मा ने अपनी आठों सिद्धियों के द्वारा प्राप्त अलौकिक ज्ञान के आधार पर मेरे संस्कारों को कोसा है और मेरे जेहादी नारीवादी एक्टिविज़्म को भी। मुझे अपने बहुत पढ़े लिखे सुसंस्कृत माता पिता से मिले संस्कारों पर नाज़ है, जिनके कारण मैं सामाजिक एक्टिविस्ट बनी। 


ईसा के दो हज़ार बारहवें वर्ष का अंतिम माह इस विडम्बना के लिए याद रखा जाएगा कि जिस समय देश की राजधानी दिल्ली में हज़ारों आम लोग रेप के विरुद्ध जुलूस में चल रहे थे, उसी समय हिन्दी साहित्य की विद्वत्त्रयी दिल्ली में पोर्न के पक्ष में जुलूस निकाल रही थी। यह समय अंधेरा है। मेरा यह प्रतिरोध एक नारीवादी एक्टिविस्ट का पोर्न के विरूद्ध प्रतिरोध है, जो इसी तरह जारी रहेगा क्यों कि मेरा यकीन है कि “पोर्न इज़ द थियरी, रेप इज़ द प्रैक्टिस ।”  इस अंधेरे समय में मैं अपनी रोशनी के साथ खड़ी हूँ कि अब मैं अकेली नहीं, मेरे साथ हिन्दी का लगभग सारा संसार है। 


मैं इस तरह से खेल समाप्ति की घोषणा नहीं होने दूँगी क्योंकि मेरे लिए यह कोई खेल नहीं, एक गम्भीर चर्चा है। यह चर्चा अभी समाप्त नहीं हुई है।

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 कथादेश (फ़रवरी 2013)

8 जनवरी 2013
  - शालिनी माथुर ,                            
ए 5/6 कारपोरेशन फ़्लैट्स, 
निराला नगर, 
लखनऊ 
फोन 9839014660


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