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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

क्यों?

3 टिप्पणियाँ

क्यों? आखिर क्यों?
- गिरिजेश तिवारी 


 Dear friend, have the devotees of Kali and Durga the courage to allow their daughters and wife to act like these goddesses. I think any way they can go to any length to do the opposite. if the self-esteem of kaalee and the valor of Durga develops in the personality of my daughter, then what's the point! Less than that the women-freedom is impossible. is this ambition not comletely an indian desire? do my conservative friends have the courage to agree with me?



"Stand up, to break the chains! Why are you chanting the stereotypes? becoming weak and vulnerable you are only defending this system! have you not become a curse to your own race? "



to oppose the women’s liberation there are standing in opposition the Tikadhari Kupmnduk conservatives on one side and on the other are the Taliban fighters intent on maintaining the value system of islam by making captive the women inside the mask. The husband is burning their wife in day to day family life at in law’s residence while she is alive and he is not even hesitating from killing her in dowry murder. there are fathers donating their daughters to become free from her burden by killing her even before her birth inside the uterus and turban bearing jaats have insisted on going ahead to kill their daughters in the name of prestige killing to maintain the purity of their clan’s blood. even today the women are bound to live the life of second grade citizen and are oppressed inside the frame of the doorway of house, as well as both in the in the market and the office being humiliated by not accepting them as humans on the level of equality but merely an "stuff" to be consumed by male dominated society all over the world. The women’s liberation movement may become even more powerful – I want to politely request you to involve, with your influential role in the campaign of women’s liberation movement. long live women’s liberation movement! long live revolution!with a lot of love 



प्रिय मित्र, काली और दुर्गा की पूजा करने वाले भक्त गण क्या अपनी बेटी को दुर्गा और पत्नी को काली जैसा आचरण करने की छूट देने की हिम्मत रखते हैं. मैं समझता हूँ वे किसी भी तरह से किसी भी हद तक उतर कर इसका उलटा ही करते हैं. अगर मेरी बेटी में काली का आत्मसम्मान और दुर्गा का शौर्य हो तो क्या बात है! इससे कम पर नारी-मुक्ति असंभव है. क्या यह कामना पूरी तरह भारतीय नहीं है? क्या मेरे परम्परावादी मित्र मुझसे सहमत होने का साहस रखते हैं?


"उठ खड़ी हो, बन्धनों को तोड़ दे!  कर रही क्यों रूढ़ियों का जाप है?  तन्त्र को इस पोसती, अबला बनी, खुद बनी निज जाति पर अभिशाप है?"


आज नारी-मुक्ति के विरोध में खड़े हैं एक ओर टीकाधारी कूपमंडूक परम्परावादी, तो दूसरी ओर हैं नकाब में नारी को कैद करके रखने का दुराग्रह बनाये रखने पर आमादा तालिबानी जेहादी. जहाँ पतिदेव हर दिन उनको जिन्दा नरक में भूनते रहते हैं और दहेज-वध करने से भी बाज़ नहीं आते, वहीँ पिता जी या तो भ्रूण-हत्या करके अपनी कन्या का जन्म लेने के पहले ही 'दान' कर के मुक्त हो जाते हैं या फिर प्रतिष्ठा-हत्या कर के खाप के खाप पग्गडधारी जाट अपने खून को शुद्ध बनाये रखने पर बजिद हैं. अभी भी जहाँ चौखट के अन्दर नारी उत्पीड़ित है, वहीँ बाज़ार और ऑफिस में भी उसे मनुष्य नहीं 'माल' मान कर अपमानित किया जा रहा है. ऐसे में नारी-मुक्ति आन्दोलन और भी सबल बने - इस कामना को साकार करने के अभियान में अपनी प्रभावशाली भूमिका का निर्वाह करने का आप से विनम्रता के साथ अनुरोध करना चाहता हूँ.



आज भी नारी को समानता और सम्मान उपलब्ध नहीं है. सारी दुनिया में नारी दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जी रही है. उसे सेकंड सेक्स कहा जाता है. फर्स्ट सेक्स नहीं. पुरुष ही फर्स्ट सेक्स बना हुआ है- क्यों? परिवार में कितना प्रेम है आप भी जानते हैं. औरत को अपने पिता का घर छोड़ कर पति के घर जा कर रहना होता है. पति क्यों नहीं पत्नी के घर जा कर अपनी जवानी के बाद का मृत्यु तक का जीवन बिताते हैं? क्यों औरत ही चूल्हे चौके की ज़िम्मेदारी उठा रही है. पति क्यों सुबह केवल अखबार पढ़ना और चाय का प्याला भी पत्नी के हाथ का ही पीना चाहता है? सारे व्रत नारी के लिये हैं क्यों? क्यों पत्नी की जगह पति कोई एक भी उपवास नहीं करता? अपने पूरे शरीर को रंग रोगन से पोत कर क्यों नारी ही सुन्दर मानी जाती है? पतिदेव क्यों मेकअप नहीं कर के स्वयं को और सुन्दर बना डालते हैं? मेरी एक बेटी है वह पढ़ना चाहती है, उसे टेलीफोन से पढाता हूँ. उसके ससुराल के लोग उसे केवल पेट पर्दा पर जनम-जेल में खटाने पर बजिद हैं? क्यों बेटी सरकारी स्कूल में जाती है और बेटा इंग्लिश मीडियम स्कूल में? क्यों केवल लडकी के घर से बाहर जाने पर निगाह रखते हैं माता-पिता, बेटे पर नहीं? क्यों लड़की की इज्ज़त ही बलात्कार का शिकार बना कर अपमानित की जाती है? लड़कों के कुकर्मों से माँ-बाप की इज्ज़त नहीं प्रभावित होती? क्यों पुरुष अनेक पत्नी रखता है? क्यों बहुपतिप्रथा जो एक समय में भारत में प्रचलित थी, अब प्रचलन में नहीं है. मगर बहुपत्नीप्रथा दिखाई दे जाती है? क्यों केवल नारी ही रखैल बनायी जाती है? पति रखेला नहीं बनता? पत्नीव्रती पति क्यों नहीं हैं? क्यों पतिव्रता नारी का ही गौरवगान भरा है पूरे साहित्य में? क्यों पूरा साहित्य नारी सौन्दर्य का वीभत्स चित्र लिखता रहा है ? पुरुषों ने ही अधिकतम ग्रंथों को क्यों लिख डाला? नारी और शूद्र क्यों वेद पढ़ने सुनने से प्रतिबंधित किये गये? क्यों नारी को असूर्यपश्या अवगुंठनवती बन कर रहना पड़ा? ये सारे प्रश्न उत्तर चाहते है?



इतिहास को नकारा नहीं जा सकता? क्यों सती को मायके जाने से शिव मना कर देते हैं? शिव को कहीं जाने से तो सती मना नहीं करतीं! क्यों तुलसी कह देते हैं - शिव संकल्प कीन्ह मन माही, यहि तन सती भेंट अब नाही. शिव का अपनी पत्नी को इस तरह मन ही मन तलाक दे देना क्या उचित है? इस्लाम भी तलाक देता है तो केवल पति क्यों देता है? पत्नी तलाक देने की अधिकारिणी धर्म की दृष्टि में क्यों नही है? नारी की समानता या गुलामी प्रश्न केवल इतना सीधा सा है! क्यों काली को क्रोध आया और सप्तशक्तियों को प्रकट करना पड़ा? शिव क्यों अक्षम हो गये काली के क्रोध के सामने? क्यों सारे देवगण दैत्यों का मुकाबला नही कर सके? और तब क्यों उनको अपनी नारी शक्ति को दुर्गा के रूप में युद्ध करने के लिये आह्वान करना पड़ा? क्यों सांख्य दर्शन का आदिपुरुष केवल साक्षी, द्रष्टा और निष्क्रिय है? सारी सृष्टि केवल प्रकृति की नारी शक्ति का ही विस्तार है? माया ही क्यों महाठगिनी है? मोहिनी रूप ही विष्णु को भी क्यों बना कर बार बार ठगना पड़ा? 


सब सवालों का एक जवाब है कि नारी गुलाम थी और है! समाधान न हिन्दू दे सकते, न मुसलमान, समाधान केवल वह देता है, जो समस्या झेलता है और नारी आज समाधान के स्वर में बोल रही है? उसकी आवाज़ तस्लीमा नसरीन की आवाज़ है, कविता वाचक्नवी की आवाज़ है, पुष्पा की आवाज़ है, सिमोन दे बुआ की आवाज़ है, नीलाक्षी की आवाज़ है, रश्मि भारद्वाज की आवाज़ है, आकांक्षा और असंख्य लडकियों की आवाज़ है.


काल-प्रवाह के साथ गूँजती-फैलती यह आवाज समानता के अधिकार का नारी-मुक्ति आन्दोलन का विजय-घोष है, जो पुरुष दम्भ को दहला रहा है. इतिहास का विरोध करने वाले इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं. इतिहास का प्रवाह नारी-मुक्ति का प्रवाह भी है!


मेरा शरीर पुरुष का है, मगर मैं अपनी बेटियों के लिये उनकी अपनी माँ से अधिक नज़दीक हूँ. मुझे अपने बेटों से अधिक अपनी बेटियों पर गर्व है. वे किसी से भी किसी तरह से कम नहीं हैं. उन्होंने आजीवन मेरी अपेक्षाओं और परीक्षाओं - दोनों पर खुद को खरा साबित कर के दिखाया है. आज भी उनके दीप्तमान आवेग और आक्रामक आक्रोश के सामने सारे आभामंडल छिन्न-भिन्न हो रहे हैं. और मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ.







रविवार, 25 सितंबर 2011

पुत्री दिवस पर २ विदारक कविताएँ : डेथ सर्टिफिकेट / पगफेरा

9 टिप्पणियाँ



बेटी की मृत्यु पर एक पिता की हृदयविदारक चीख -- 

मूल गुजराती लेखिका : एषा दादावाला
अनुवाद : सागरचंद नाहर
अनुवाद सहयोग : कविता वर्मा 






युवा कवयित्री एषा दादावाला (सूरत)  की अन्य  गुजराती कविताओं के लिए देखें यहाँ `वरतारो' 









डेथ सर्टिफिकेट 



प्रिय बिटिया
तुम्हें याद होगा
जब तुम छोटी थी,
ताश खेलते समय
तुम जीतती और मैं हमेशा हार जाता

कई बार जानबूझ कर भी !
जब तुम किसी प्रतियोगिता में जाती
अपने तमाम शील्ड्स और सर्टिफिकेट
मेरे हाथों में रख देती
तब मुझे तुम्हारे पिता होने का गर्व होता
मुझे लगता मानों मैं
दुनिया का सबसे सुखी पिता हूँ

तुम्हें अगर कोई दु:ख या तकलीफ थी
एक पिता होने के नाते ही सही,
मुझे कहना तो था
यों अचानक
अपने पिता को इतनी बुरी तरह से
हरा कर भी कोई खेल जीता जाता है कहीं?

तुम्हारे शील्ड्स और सर्टिफिकेट्स
मैने अब तक संभाल कर रखे हैं

अब क्या तुम्हारा “डेथ सर्टिफिकेट” भी
मुझे ही संभाल कर रखना होगा ?



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पगफेरा




बिटिया को अग्‍निदाह दिया,
और उससे पहले ईश्‍वर को,
दो हाथ जोड़ कर कहा,
सुसराल भेज रहा हौऊं,
इस तरह बिटिया को,
विदा कर रहा हूँ,
ध्यान तो रखोगे ना उसका?
और उसके बाद ही मुझमें,
अग्निदाह देने की ताकत जन्मी !
लगा कि ईश्‍वर ने भी मुझे अपना
समधी बनाना मंजूर कर लिया

और जब अग्निदाह देकर वापस घर आया
पत्‍नी ने आंगन में ही पानी रखा था
वहीं नहा कर भूल जाना होगा
बिटिया के नाम को

बिना बेटी के घर को दस दिन हुए
पत्नी की बार-बार छलकती आँखें
बेटी के व्यवस्थित पड़े
ड्रेसिंग टेबल और वार्डरोब
पर घूमती है
मैं भी उन्हें देखता हूँ और
एक आह निकल जाती है

ईश्‍वर ! बेटी सौंपने से पहले
मुझे आपसे रिवाजों के बारे में
बात कर लेनी चाहिए थी
कन्या पक्ष के रिवाजों का
मान तो रखना चाहिए आपको
दस दिन हो गए....

और हमारे यहाँ पगफेरे का रिवाज है !



गुरुवार, 13 मई 2010

कि नारी तन मुझे देकर कृतारथ कर दिया ओ माँ !

7 टिप्पणियाँ
कृतारथ कर दिया ओ माँ !



कृतारथ कर दिया ओ माँ !


सृजन की माल का मनका बना कर जो , 
कि नारी तन मुझे देकर कृतारथ कर दिया ओ माँ !

*

सिरजती एक नूतन अस्ति अपने ही स्वयं में रच ,
इयत्ता स्वयं की संपूर्ण वितरित कर परं के हित ,
नए आयाम सीमित चेतना को दे दिए तुमने, 
विनश्वर देह को तुमने सकारथ कर दिया ओ माँ !

*

बहुत लघु आत्म का घेरा, कहीं विस्तृत बना तुमने,
मरण को पार करता अनवरत क्रम जो रचा तुमने ,
कि जो कण-कण बिखर कर विलय हो कर नाश में मिलता ,
नया चैतन्य का वाहन पदारथ* कर दिया ओ माँ !
कि नारी तन मुझे देकर कृतारथ कर दिया ओ माँ !

*पदारथ = मणि

- प्रतिभा सक्सेना 


मंगलवार, 4 मई 2010

निरुपमा की हत्या की गुत्थियाँ

4 टिप्पणियाँ


अपनी गत प्रविष्टि पर  सुजाता जी के दिए लिंक द्वारा अभी चोखेरबाली पढ़ कर -




यहाँ  "स्त्रीविमर्श" पर कल गत पोस्ट 

शीर्षक के माध्यम से  अपनी बात कह ही चुकी हूँ। फिर भी,  मेरे तईं यद्यपि स्त्री की स्थिति का धर्म से कुछ लेना देना नहीं है, वह पुरुष की सत्तात्मक मानसिकता की यद्यपि सारी कुंठा इस विभेद से हटकर वहन करती आई है, परन्तु निरुपमा की दुर्घटना को साझे "समाज की मानसिकता का प्रतिफल" के रूप में लिया जाना चाहिए अर्थात् सम्प्रदाय -विशेष / जातिविशेष वर्सेज़ स्त्री नहीं अपितु समस्त समाज/सभी सम्प्रदाय वर्सेज स्त्री के रूप में देखा जाना चाहिए।


निरुपमा किसी भी सम्प्रदाय (धर्म ?)  में होती, उसके कुँआरे मातृत्व को स्वीकारने की हिम्मत किसी में न होती।


और इस घटना के दो बिन्दुओं ( जातिभेद के कारण हत्या या कुँआरे मातृत्व के कारण हत्या) को स्पष्ट समझते ही यह धुंध छ्टँ जानी चाहिए,  ऐसी मेरी आशा है।


अब जरा इस दुर्घटना पर विचार कर लिया जाए तो चीजें स्पष्ट हों।


मैं इसे अन्तर्जातीयता के चलते की गई हत्या नहीं अपितु कुआँरे मातृत्व के चलते की गई हत्या ( यदि पितॄकुल के द्वारा हुई है तो ) मानती हूँ। उसका एक कारण है।


वह कारण यहीं स्पष्ट हो जाता है जब यह स्पष्ट हो जाए कि निरुपमा का अपने तथाकथित प्रेमी (?) से विवाह हुआ क्यों न था।

इस विवाह न होने का एकमात्र कारण क्या निरुपमा के माता-पिता थे? या कोई और भी कारण था?

 यह कारण चीन्हना बहुत जरूरी है सुजाता ; क्योंकि जो लड़की महानगर में अकेली रहती है व प्रतिष्ठित पत्रकारिता से जुड़ी है, अपने पैरों पर खड़ी है, और सबसे बढ़कर जो एक पुरुष के साथ सहवास करने का साहस रखती है ( विशेषकर, उस भारतीय समाज में जहाँ विवाहपूर्व यौन सम्बन्ध मानो भयंकरतम जघन्य अपराध मानता है समाज, तिस पर उसमें इतना साहस भी है कि वह लगभग तीन माह का गर्भ वहन कर रही है ( ध्यान रहे यह वह काल होता है जब गर्भावस्था के बाह्य लक्षण सार्वजनिक रूप में दिखाई देने प्रारम्भ होने लगते हैं); ऐसी साहसी व निश्शंक लड़की का  माता-पिता के अन्तर्ज़ातीय विवाह के विरोधी होने के डर-मात्र से विवाह न करना कुछ हजम नहीं होता। यदि कोई माता-पिता के डर / दबाव-मात्र से इतना संचालित होता है तो उसका भरे (भारतीय) समाज में विवाहपूर्व गर्भवती होने का साहस करना   - ये दो एकदम अलग ध्रुव हैं। एक ही लड़की, वह भी बालिग व आत्मनिर्भर, विवाह करने का साहस न रखे किन्तु सहवास व कुंआरे मातृत्व का साहस रखे, यह क्या कुछ सोचने को विवश नहीं करता ?

मुझे तो विवश करता है।

...और फिर यह सोचना मुझे दिखाता है कि एक कुंआरी व सबल तथा आत्मनिर्भर माता द्वारा अपने तथाकथित प्रेमी से विवाह न करने के पीछे और भी कई गुत्त्थियाँ व राज हैं।

ये गुत्त्थियाँ ही/भी वे कारक हो सकती हैं न सुजाता (जी) जिनके कारण परिवार में झगड़ा हुआ होगा।


इसलिए पितृ-परिवार में झगड़े / विरोध / हत्या के लिए केवल अन्तर्जातीयता-मात्र के विरोध को कारक सिद्ध कर के एक सैद्धान्तिकी बनाना और धर्म के नाम पर हिंदुत्व मात्र को दोष देने की प्रथा कम से कम मेरी समझ से ऊपर की चीज है। क्षमा करें।


एक ऐसे अमानवीय समय में जबकि दो व्यक्तियों की हत्या की भर्त्सना करते हुए पूरे समाज को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए व स्त्री की सुरक्षा और उसके जीवन के मौलिक अधिकार, मातृत्व के मौलिक अधिकार की बात होनी चाहिए, सामाजिक न्यायव्यवस्था की बात होनी चाहिए; वैसे समय में ब्राह्मणवाद आदि  का नाम लेकर हिन्दुत्व को धिक्कारने के प्रसंग निकालना मुझे उसी शैतानी पुरुषवाद की चाल दिखाई देते हैं जो स्त्री को अपने प्यार की फाँस में फँसा कर उसे भोग्या और वंचिता दोनों बनाता है। विवाह की जिम्मेदारी से बचता है और छलना करता है,  दूसरी ओर भाई और अपना परिवार अपना पौरुष दिखाते हैं।

स्त्री क्या करे? कहाँ जाए?

किस न्यायपालिका की शरण ?

उन सब शैतान पुरुषों के लिए तो ऐसे अन्य मुद्दों का उठना बड़ा वरदान है,  आरोप व सारा दोष किसी और की ओर जो हुए  जा रहा है। ऊपर से उनकी लम्पटता निर्बाध चल सकती है, उस से तो सावधान करने के अवसर पर गालियाँ और कटघरे में आया कोई अन्य मुद्दा|


पुनश्च
६ मई २०१०


तथ्यों के आलोक में इन चीजों को भी जोड़ दिया जाना चाहिए -

निरुपमा को लिखा पिता का पत्र किसने जारी किया?
क्या माता पिता ने स्वयं? या प्रियभांशु ने?
प्रियभांशु के पास वह पत्र आया कैसे?

सन्देह यह जाता है कि निरुपमा की हत्या के समाचार के बाद प्रियभांशु निरुपमा के आवास पर गया होगा, तभी तो वह खोजकर पत्र जारी करता है। 

यदि गया तो यह उसका सम्वैधानिक अपराध है, तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने की मंशा और उसे क्रियान्वित करना। अर्थात् प्रियभांशु ने कुछ तथ्य मिटाए भी होंगे, उड़ाए भी होंगे।

क्या यह सम्भव नहीं है कि प्रियभांशु विवाह से मुकर गया हो व निरुपाय निरुपमा अपने माता-पिता के पास इसी दुविधा में गई हो व वहाँ जा कर विवाह न होने की सम्भावना के बावजूद वह प्रियभांशु के गर्भ को नष्ट न करने की जिद्द पर हो... और ऐसी तनातनी, कहासुनी, झगड़े और विवाद का फल हो उसकी मॄत्यु!

प्रियभांशु के मोबाईल के अन्य रेकोर्ड्स की जाँच भी अनिवार्य है।

पिता का पत्र जारी करके सारे कथानक को जातिवाद के रंग में रंगने की साजिश का बड़ा मन्तव्य प्रियभांशु के अपने अपराध से ध्यान हटाने व पुलिस और मीडिया को गुमराह करने की साजिश हो।

वरना मॄत्यु की पहली सूचना के तुरन्त साथ ही प्रियभांशु अपना नाम व चित्र सार्वजनिक न होने की जद्दोजहद में न होता ( जैसा कि कई एजन्सियों ने तब कहा/लिखा/बताया था)।

वस्तुत: यह स्त्री के साथ छलनापूर्ण प्रेम कथा का पारम्परिक दुखान्त व भर्त्सनायोग्य दुष्कृत्य है। जिसकी जितनी निन्दा की जाए कम है। हत्यारों और हत्या की ओर धकेलने वालों को कड़ा दण्ड मिलना ही चाहिए।





मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

पुरुषों के विरुद्ध एक अविश्वास प्रस्ताव

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जहाँ आत्मीयता होती है, वहाँ भी लोग ठगे जाने से बचने की कोशिश करते हैं। यह सावधानी स्त्री-पुरुष व्यवहार में और ज्यादा अपेक्षित है, क्योंकि अब तक के इतिहास की सीख यही है। इसलिए माता-पिता और अभिभावकों का यह एक मूल कर्तव्य है कि वे लड़की को लड़की के रूप में विकसित होते समय ही उन फंदों और गड्ढों से अवगत कराते रहें जो आगे उसकी राह में आनेवाले हैं। इसके साथ ही, उसे निर्भय होने और स्व-रक्षा में सक्षमता की शिक्षा भी देनी चाहिए। लेकिन इस कीमत पर नहीं कि मानवता में ही उसका विश्वास डिग जाए। बहुत ही प्रेम और समझदारी से उसमें यह बोध पैदा करना होगा कि लोग सभी अच्छे होते हैं, पर हमेशा सचेत रहना चाहिए कि वे बुरे भी हो सकते हैं। लड़कियों को यह सीख भी दी जानी चाहिए कि यह बहुत गलत होगा अगर अति सावधानी के परिणामस्वरूप वे किसी पुरुष से आत्मीय रिश्ता बना ही न पाएँ। घृणा तो किसी से भी न करो – ज्ञात पापी से भी नहीं, सभी को प्रेम और विश्वास दो, पर अपनी सुरक्षा की कीमत पर नहीं।



रसांतर
पुरुषों के विरुद्ध एक अविश्वास प्रस्ताव
राजकिशोर

उस दिन मैं अचानक क्या कह गया, यह मेरी भी समझ में नहीं आया। अवसर था स्त्री-विमर्श पर केंद्रित ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ की पहली वर्षगाँठ पर दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक विचार बैठक का। मधु किश्वर और सुकृता पॉल बोल चुकी थीं। दोनों के ही भाषण बहुत अच्छे थे । दोनों ने ही स्त्री अस्मिता के मुद्दों पर गहराई से विचार किया था। उनके बाद अपनी बात कहते हुए मैंने पहले तो इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि यहाँ मैं अकेला पुरुष वक्ता हूँ। इस पर ‘चोखेर बाली’ की संचालिकाओं में एक सुजाता ने स्पष्ट किया कि हमारे ब्लॉग पर पुरुष भी लिखते हैं। मुझे यह बात मालूम थी, क्योंकि मैं भी उनमें एक हूँ। फिर, मैंने कहा कि स्त्रीविमर्श सिर्फ पुरुषों का मामला हो भी नहीं सकता, क्योंकि अगर यह सभ्यता विमर्श और सभ्यता समीक्षा है, तो पुरुषों की सहभागिता के बिना यह काम कैसे पूरा हो सकता है? आगे मैंने कहा कि यह भी उल्लेखनीय है कि नारी अधिकारों को प्रतिष्ठित करने में पुरुष लेखको, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मूल्यवान भूमिका रही है। यह भी कि ऐसे असंख्य पुरुष हुए हैं जिनमें स्त्री के गुण थे और ऐसी स्त्रियाँ भी कम नहीं हुई हैं जिनका व्यक्तित्व पुरुष गुणों के कारण विकृत हुआ है। इसी संदर्भ में मैंने कहा कि स्त्री विमर्श में पुरुषों को खुल कर सहभागी बनाइए और बनने दीजिए, लेकिन स्त्री-पुरुष संबंधों के इतिहास को देखते हुए पुरुषों पर विश्वास कभी मत कीजिए। वे कभी भी धोखा दे सकते हैं और अगर यह धोखा उन्होंने मित्र बन कर दिया, तो यह और भी बुरा होगा।


बात कुछ हँसी की थी और हँसी हुई भी, पर विचार करने पर लगा कि बात में दम है। एक बहुत पुरानी मान्यता है कि स्त्री-पुरुष का साथ आग और फूस का साथ है। दोनों निकट आएँगे, तो फूस का भभक उठना तय है। आजकल के लोग इस तरह की मान्यताओं की खिल्ली उड़ाते हैं। उनका कहना है कि यह बेहूदा बात इसलिए फैलाई गई है ताकि स्त्रियों को बंधन में रखा जा सके। मैं इस स्थापना से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। पुरुष से अधिक कौन जानता होगा कि स्त्री को देख कर पुरुषों के मन में सामान्यत: किस प्रकार की भावनाएँ पैदा होती हैं। इसलिए अगर उन्होंने आग और फूस को दूर-दूर रखने का फैसला किया, तो यह बिलकुल निराधार नहीं था। इसके साथ-साथ होना यह चाहिए था कि ऐसी समावेशी संस्कृति का विकास किया जाता जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच की सामाजिक और सांस्कृतिक दूरी घटे और दोनों मित्र भाव से जी सकें। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका। पुरानी, रूढ़िवादी संस्कृति चलती रही, बल्कि कहीं-कहीं उग्र भी हो गई, और उसके प्रति विद्रोहस्वरूप आधुनिक संस्कृति का भी विकास होता रहा, जिसमें स्त्री-पुरुष के साथ को खतरनाक नहीं, बल्कि अच्छा माना जाता है। पुरानी संस्कृति में स्त्री के शील की रक्षा उस पर पहरे बिछा कर, उसे उपमानव बना कर की जाती थी, जैसा आज के तालिबान चाहते हैं, तो दुख की बात यह भी है कि आधुनिक संस्कृति में स्त्री का उपयोग उपभोक्तावाद को बढ़ाने और कामुकता का प्रचार करने में हो रहा है तथा बलात्कार या इसकी आशंका से उसे परिमित और खामोश करने की कोशिश की जा रही है। जरूरत बीच का रास्ता निकालने की है, जहाँ प्रेम भी हो, निकटता भी हो और मानव अधिकारों का सम्मान भी।


‘चोखेर बाली’ की विचार-बैठक के हफ्ते भर बाद सुजाता ने उनके अपने ब्लॉग ‘नोटपैड’ पर किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा भेजी गई यह टिप्पणी मुझे अग्रेषित की : " सविता भाभी के बहाने स्त्री विमर्श का डंका पीटनेवाले ब्लॉगर पत्रकार आकाश (मूल नाम बदल दिया गया है) जी के सारे स्त्री विमर्श की कलई उस समय खुल गई, जब उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की एक छात्रा के साथ, जहाँ अभी कुछ दिनों पहले वे क्लास लेने जाते थे, के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। लड़की की तबीयत ठीक नहीं थी। उन्होंने उसे किसी काम के बहाने ऑफिस में बुलाया और फिर उसके लाख मना करने के बावजूद उसे अपनी नई कार से उसे घर छोड़ने गए। फिर वहाँ उसे चुपचाप छोड़ कर आने के बजाय लगभग जबरदस्ती करते हुए उसका घर देखने के बहाने उसके साथ कमरे में गए। लड़की मना करती रही, लेकिन संकोचवश सिर्फ ‘रहने दीजिए सर, मैं चली जाऊँगी’ जितना ही कहा। वे उसकी बात को लगभग अनसुना करते हुए खुद ही आगे आगे गए और उसका घर देखने की जिद की। लड़की को लगा कि पाँच मिनट बैठेंगे और चले जाएँगे। लेकिन उनका इरादा तो कुछ और था। उन्होंने घर में घुसने के बाद जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ा, उसके लाख छुड़ाने की कोशिश करने के बावजूद उसे जबरदस्ती चूमने की कोशिश की। लड़की डरी हुई थी और खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन इनके सिर पर तो जैसे भूत-सा सवार था। आकाश ने उस लड़की को नारी की स्वतंत्रता का सिद्धांत समझाने की कोशिश की, ‘तुम डर क्यों रही हो। कुछ नहीं होगा। टिपिकल लड़कियों जैसी हरकत मत करो। तुम्हें भी मजा आएगा। मेरी आंखों में देखो, ये जो हम दोनों साथ हैं, उसे महसूस करने की कोशिश करो।’ डरी हुई लड़की की इतनी भी हिम्म्त नहीं पड़ी कि कहती कि जा कर अपनी बहन को क्यूँ नहीं महसूस करवाते। लड़की के हाथ पर खरोंचों और होंठ पर काटने के निशान हैं। लड़की अभी भी बहुत डरी हुई है।"


यह घटना कितनी सत्य है और कितनी मनगढ़ंत, पता नहीं। लेकिन भारत में ही नहीं, दुनिया के एक बड़े भूभाग में इस तरह की घटनाएँ सहज संभाव्य हैं और होती ही रहती हैं। इसीलिए मेरा यह विश्वास बना है कि स्त्रियों को पुरुषों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए – चाहे वे गुरु हों, शिक्षक हों, चाचा, मामा, मौसा-ताऊ हों, मुँहबोले भाई हों, पड़ोसी हों, मेहमान हों, शोध गाइड हों, संपादक हों, प्रकाशक हों, अकादमीकार हों, नियोक्ता हों, मैनेजर हों, पुजारी हों, पंडे हों – कुछ भी क्यों न हों। कई हजार वर्षों की मानसिकता जाते-जाते ही जाएगी। इस संक्रमण काल में स्त्री को बहुत अधिक सावधान रहने की जरूरत है – खासकर अपने शुभचिंतकों से। इसका मतलब यह नहीं है कि हर पुरुष को संदेह की नजर से देखो। इससे तो सब कुछ कबाड़ा हो जाएगा। नहीं, किसी पर भी अनावश्यक संदेह मत करो। विश्वास का अवसर हरएक को दिया जाना चाहिए। लेकिन सावधानी का दीपक हाथ से कभी नहीं छूटना चाहिए। दीपक बुझा कि परवाना लपका।


वैसे, जीवन के एक सामान्य सिद्धांत के तौर पर भी यह सही है। पुरुष पुरुष पर कितना विश्वास करते हैं? स्त्री स्त्री पर कितना विश्वास करती हैं? जहाँ आत्मीयता होती है, वहाँ भी लोग ठगे जाने से बचने की कोशिश करते हैं। यह सावधानी स्त्री-पुरुष व्यवहार में और ज्यादा अपेक्षित है, क्योंकि अब तक के इतिहास की सीख यही है। इसलिए माता-पिता और अभिभावकों का यह एक मूल कर्तव्य है कि वे लड़की को लड़की के रूप में विकसित होते समय ही उन फंदों और गड्ढों से अवगत कराते रहें जो आगे उसकी राह में आनेवाले हैं। इसके साथ ही, उसे निर्भय होने और स्व-रक्षा में सक्षमता की शिक्षा भी देनी चाहिए। लेकिन इस कीमत पर नहीं कि मानवता में ही उसका विश्वास डिग जाए। बहुत ही प्रेम और समझदारी से उसमें यह बोध पैदा करना होगा कि लोग सभी अच्छे होते हैं, पर हमेशा सचेत रहना चाहिए कि वे बुरे भी हो सकते हैं। लड़कियों को यह सीख भी दी जानी चाहिए कि यह बहुत गलत होगा अगर अति सावधानी के परिणामस्वरूप वे किसी पुरुष से आत्मीय रिश्ता बना ही न पाएँ। घृणा तो किसी से भी न करो – ज्ञात पापी से भी नहीं, सभी को प्रेम और विश्वास दो, पर अपनी सुरक्षा की कीमत पर नहीं। हर संबंध की तरह स्त्री-पुरुष संबंध भी एक जुआ है, लेकिन यह जुआ खेलने लायक है, क्योंकि इसी रास्ते हम अपने मनपसंद साथी खोज सकते हैं। इस प्रक्रिया में दुर्घटनाएँ होती हैं, तो होने दो। डरो नहीं, न परिताप करो। लेकिन आँख मूँद कर उस रास्ते पर कभी मत चलो जिसके बारे में तुम्हें पता नहीं कि उस पर आगे क्या-क्या बिछा और फेंका हुआ है। यह संतुलन साधना मामूली बात नहीं है, लेकिन अच्छा जीवन जी पाना भी क्या मामूली बात है?

(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में वरिष्ठ फेलो हैं)


मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

मुझे पंख दोगे ?

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एकालाप




मुझे पंख दोगे ?
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मैंने किताबें माँगी
मुझे चूल्हा मिला ,
मैंने दोस्त माँगा
मुझे दूल्हा मिला.



मैंने सपने माँगे
मुझे प्रतिबंध मिले ,
मैंने संबंध माँगे
मुझे अनुबंध मिले.



कल मैंने धरती माँगी थी
मुझे समाधि मिली थी,
आज मैं आकाश माँगती हूँ
मुझे पंख दोगे ?
ऋषभ देव शर्मा

शनिवार, 22 नवंबर 2008

स्त्री के हमदर्दों की पोलमपोल

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मारे आसपास अनेक ऐसी घटनाएँ नित घटती रहती हैं, हम उन पर क्षोभ व्यक्त व्यक्त करते या जुगाली करते या रुचिपूर्वक आगे से आगे बढ़ाने के काम के अतिरिक्त कुछ नहीं करते हैं | किसी सकारात्मक पहल या जनचेतना की पहल का तो कहना ही क्या? संभवतः अधिकांश के मन में तब तक प्रतिरोध की भावना भी नहीं पनपती जब तक उनके अपने जीवन या सम्बन्धियों के साथ ऐसा नहीं हो जाता| आश्चर्य की बात नहीं की सम्बन्धियों के साथ ऐसा हो जाने के पश्चात भी घटना को दबा -छिपा देने वाला अनुपात बहुत बड़ा होगा| इतनी दुरभिसंधियों और प्रतिकूलताओं के पक्ष में खड़े हुए हम किस आधार पर सामाजिक परिवर्तन की अपक्षा करते हैं? हमने अपने देश की आधी ऊर्जा को तो अपनी ऐसी अकर्मण्यताओं अथवा शोषण के कारण कुंठित कर दिया ! फिर भला कैसे तो परिवार की या देश समाज की आने वाली पीढ़ी सजग उच्च मानवीय बोध वाली हो सकती है? ऐसी ही घटनाओं पर कम से कम कलम तो उठाइये| स्त्री से हमदर्दी जताने वाले अथवा उसके नाम पर अपने मठ पोसने वाले सामुदायिक संगठन और व्यक्ति कहाँ हैं? स्त्री से हमदर्दी केवल उसका उस से लाभ उठाने की भावना या गतिविधि से ही तो नहीं संचालित हो रहा, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है |

- कविता वाचक्नवी
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परत-दर-परत

वर्ग एकता का एक नमूना
- राजकिशोर

यह किस्सा दिल्ली का ही है, लेकिन आप चाहें तो इसे देश के किसी भी विश्वविद्यालय का किस्सा मान सकते हैं। हुआ यह कि एक सीनियर प्रोफेसर पर एक लड़की ने इलजाम लगाया कि उसने मेरे साथ "सेक्सुअल हैरेसमेंट" किया है। लड़की एमफिल करना चाहती थी। अपनी यह वैध इच्छा पूरी करने के लिए उसे प्रोफेसर की अनेक अवैध इच्छाएँ सहन करनी पड़ीं। जब वह रोज-रोज के इस हैरेसमेंट से आजिज गई, तो एक दिन उसने तय किया कि इस सिलसिले को रोकने के लिए अब कुछ करना ही चाहिए। उसने विश्वविद्यालय के अधिकारियों से लिखित शिकायत कर दी। प्रमाणस्वरूप अनेक विश्वसनीय साक्ष्य पेश किए। जाँच चल रही है। नतीजा क्या आएगा, यह अनुमान से परे है, क्योंकि हमारे देश में अदालत के बाहर न्याय एक विरल घटना है।


इसके बाद की घटनाएँ इससे ज्यादा दुखद हैं। जिस प्रोफेसर मित्र से इस घटना की जानकारी मिली, उनसे मैंने अनुरोध किया कि वे अभियुक्त प्रोफेसर को तुरंत इस्तीफा देने के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते। अकेले सफल होने की संभावना दिखती हो, तो समूह में जा कर उनसे बिनती करें। कारण यह कि मामला सार्वजनिक हो जाने के बाद भी अभियुक्त प्रोफेसर में परिताप का कोई भाव पैदा नहीं हुआ है। दूसरे, सरस्वती के मंदिरों में मूल्यों का सम्मान नहीं होगा, तो कहां होगा? लेकिन मेरे मित्र चुप रहे। उनकी कसमसाहट बता रही थी कि प्राध्यापक बिरादरी का मामला है, इसलिए चुप रहना ही ठीक है। कानून को अपना काम करने दिया जाए।


कानून अपना काम करना होता, तो इस तरह की घटनाएँ बढ़तीं ही क्यों? कानून से कोई नहीं डरता, क्योंकि कानून लागू करने वालों ने डर का वातावरण नहीं बनाया है। ऐसी स्थिति में पेशा विशेष के लोग ही अपने कुछ आंतरिक नियम बना सकते हैं और उन्हें लागू कर सकते हैं। पत्रकारों से लगातार कहा जाता है कि वे अपनी आचार संहिता खुद बनाएं। यह बात शिक्षकों पर भी लागू होती है। कानूनी प्रावधानों के अलावा एक नैतिक आचार संहिता भी होनी चाहिए जिसके पालन की जिम्मेदारी शिक्षक समुदाय संभाले। वास्तव में यह आचार संहिता तभी से अस्तित्व में है जब से गुरु-शिष्य का संबंध शुरू हुआ है। यह भी सच है कि इस संहिता का तभी से उल्लंघन भी होता रहा है। यह दुर्भाग्य हर संहिता के साथ जुड़ा हुआ है। कानून बनेगा तो तोड़ा भी जाएगा। यह चिंता की बात नहीं है। देखना यह चाहिए कि किसी समाज या शहर में कानून तोड़ने वालों की संख्या घट रही है, स्थिर है या बढ़ रही है। अफसोस है कि शिक्षकों द्वारा छात्र-छात्राओं के शोषण की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली में ही पिछले एक वर्ष में बहुत-से ऐसे मामले मीडिया में चुके हैं। पता नहीं कितने मामलों में शोषित लड़कियों ने अपनी संकोची जबान सिल रखी है। लड़कियां या स्त्रियां पुरुषों के अतिक्रमणों को चुपचाप सह लेती हैं और शोर नहीं मचातीं, इसका फायदा उठाने की परंपरा बहुत लंबी है। इस लिहाज से हम उस लड़की के अंतत: जाग उठे साहस की प्रशंसा करते हैं जिसने यह मामला विश्वविद्यालय के अधिकारियों को जांच के लिए सौंप दिया है। अन्याय पर चुप्पी साध लेना अन्यायी का साथ देना है।


चिंता का विषय यह भी है कि विश्वविद्यालय का शिक्षक समाज विचलित तो है, पर चुप भी है। निजी बातचीत में सभी कहते हैं कि यह प्रोफेसर दोषी है, पहले भी इस तरह के कांड करता रहा है और इसके सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन जब सामूहिक कार्रवाई की बात उठाई जाती है, तो सभी बगलें झांकने लगते हैं। यह रवैया पुरुष एकता की एक बुरी मिसाल है। सबको ब्लैकमेल और शोषण की शिकार लड़की से सहानुभूति है। लेकिन कोई नहीं चाहता कि प्रोफेसर की नौकरी चली जाए। लड़की का आत्मसम्मान धीरे-धीरे बहाल हो जाएगा, लोग इस घटना को भूल जाएंगे, पर इस प्रोफेसर का क्या होगा? फिर, लड़कियों में अनुचित दिलचस्पी लेने की यह अकेली घटना नहीं है। आज एक के फटे में टांग अड़ाई जाएगी, तो कल दूसरों की भी बारी सकती है। शायद ऐसे ही कारणों से पुरुष प्रोफेसर सक्रिय होना नहीं चाहते। लेकिन महिला प्रोफेसरों को कुछ करने से कौन रोक रहा है? वैसे तो महिलाओं के दमन, शोषण आदि की चर्चा खूब होती है, इस विषय पर लंबे-लंबे प्रबंध लिखे जाते हैं। लेकिन एक सताई गई लड़की को न्याय दिलाने के लिए विश्वविद्यालय का स्त्री शिक्षक समुदाय भी आगे नहीं रहा है। अगर ऐसी ही घटना किसी महिला प्रोफेसर के साथ हुई होती, तो हम सब देखते कि रोज कितनी ढोलें बज रही होतीं। हम एस वर्ग एकता के सदके जाते हैं।


इस तरह की ट्रेड यूनियनी एकता सभी वर्गों, पेशों और समुदायों में देखी जाती है। चिकित्सक चिकित्सकों की गलतियां छिपाते हैं, पुलिस पुलिस का बचाव करती है, नेता नेता का साथ देता है और अफसर अफसर के काम आता है। मजदूर को मजदूर में कोई कमी दिखाई नहीं पड़ती, दलित हर हाल में दलित के साथ होता है, दुकानदार दुकानदारों का और उद्योगपति उद्योगपतियों का पक्ष लेते हैं। यह क्या है? क्यों है? न्याय-अन्याय के प्रश्न ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या समुदायगत स्वार्थ के? हम अभी तक स्वार्थ और हित के बीच फर्क करने की तमीज नहीं जुटा पाए हैं। जो समुदाय अपने दोषी सदस्यों का बचाव करता है, वह अपने समुदाय के अपराधीकरण को प्रोत्साहित करता है।


यहां भक्तराज विभीषण की याद आती है। वे लंका के चंद व्यक्तियों में थे जो मानते थे कि रावण कुमार्ग पर चल रहा है। विभीषण ने अपने कुपथगामी भाई को समझाने की बहुत कोशिश की। इसका नतीजा यह हुआ कि विभीषण को लंका छोड़नी पड़ी। बाद में रावण मारा गया और विभीषण को सत्य का पक्ष लेने और उसके लिए सुविधाओं का त्याग करने का पुरस्कार मिला। विभीषण ने राज्य के लोभ में नैतिक दृढ़ता नहीं दिखाई थी -- उन्होंने परिणामों की चिंता किए बगैर ईमान का काम किया था। लेकिन भारत की जनता ने आज तक विभीषण को माफ नहीं किया है। उन्हें इन्हीं शब्दों में याद किया जाता है - घर का भेदी लंका ढाहे। यह स्वार्थ बुद्धि है। न्याय की खातिर कोई भी सही कदम उठाना जायज है। पाप का भंडा फोड़ने के लिए आज विभीषणों की जरूरत जितनी ज्यादा है, उतनी पहले कभी नहीं थी।

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