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शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

नारी अभिव्यक्ति का एक सशक्त ऐतिहासिक प्रयास : नूशु लिपि

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- श्रीश बेंजवाल 



मनुष्य मन हमेशा से स्वयं को अभिव्यक्त करने का इच्छुक रहा है। इसके लिये उसने विभिन्न भाषायें एवं लिपियाँ बनायी। दुनिया में अनेक भाषायें एवं लिपियाँ हैं। हाल ही में पुरानी लिपियों के बारे में पढ़ते हुये मुझे नूशु नामक एक रुचिकर एवं कम जानी जाने वाली चीनी लिपि का पता चला। नूशु का शाब्दिक अर्थ है 'महिलाओं का लेखन', नाम के अनुसार ही यह लिपि विशिष्ट रूप से महिलाओं द्वारा बनायी गयी एवं महिलाओं द्वारा ही प्रयोग की जाती थी।


अरब की तरह चीनी परम्परागत समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान शिक्षा का अधिकार नहीं था। परम्परागत चीनी समाज पुरुषों के वर्चस्व वाला था जिसमें लड़कियों को शिक्षा की मनाही थी। इस दौरान दक्षिण चीन के दूरदराज के प्रान्त हुनान के जियांगयोंग क्षेत्र में नूशु नामक एक गुप्त लिपि विकसित हुयी। सैकड़ों सालों में गुप्त रूप से महिलाओं द्वारा ही इसका विकास एवं प्रयोग हुआ। सैकड़ों साल पुरानी इस लिपि के जन्म के समय का सटीक अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता।


यह लिपि चीनी की तरह चित्रलिपि है। यह हुनान प्रान्त के जियांगजांग क्षेत्र के कुछ हिस्सों में बोली जाने वाली तुहुआ नामक चीनी बोली के लेखन हेतु प्रयोग की जाती है। कुछ वर्णचिह्न चीनी से लिये गये हैं जबकि कुछ अलग से विकसित किये गये हैं। चीनी की तरह नूशु ऊपर से नीचे स्तम्भों में लिखी जाती है तथा स्तम्भ दायें से बायें को लिखे जाते हैं। नूशु में लिखा गया कुछ साहित्य मौजूद है।


२०वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में चीन में आये सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों के पश्चात महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी बढ़ी और नई पीढ़ी की महिलाओं ने नूशु को सीखना बन्द कर दिया। इससे धीरे-धीरे यह प्रयोग से बाहर होती गयी। इसे जानने वाली पुरानी महिलाओं की मृत्यु के साथ-साथ इसका प्रचलन घटता रहा। १९३० में चीन में जापान के आधिपत्य के दौरान जापानियों ने इस लिपि के प्रयोग को दबाने का प्रयास किया क्योंकि उन्हें भय था कि इसका प्रयोग चीनी गुप्त सन्देश भेजने के लिये कर सकते थे। १९६६-७६ के दशक में चीनी सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान भी इसका प्रयोग घटा। इसका वास्तविक लेखन करने वाली अन्तिम दो महिलाओं की क्रमशः १९९० तथा २००४ में मृत्यु हो गयी। वर्तमान में यह लिपि लगभग मृतप्राय है। इसे जानने वाले कुछ शोधकर्ता ही हैं जिन्होंने इसे जानने वाली कुछ अन्तिम महिलाओं से सीखा था। इसके संरक्षण हेतु सरकारी स्तर पर कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये। यह दुःखद होगा कि नारी सशक्तिकरण का यह प्रतीक भविष्य की पीढ़ियों के लिये लुप्त हो जायेगा। कुछ संस्थाओं द्वारा इसके संरक्षण हेतु कुछ प्रयास किये गये हैं। इसके यूनिकोडकरण भी प्रस्तावित है।


नूशु के जन्म की कहानी रुचिकर है तथा नारीवाद के इतिहास में एक सशक्त हस्ताक्षर है। यह अभिव्यक्ति के लिये नारी की इच्छा एवं संघर्ष को दर्शाती है। एक-दो अन्य भाषाओं एवं लिपियों का भी महिलाओं से सम्बन्ध रहा है पर नूशु एकमात्र लिपि है जो कि पूरी तरह से महिलाओं को समर्पित कही जा सकती है। नूशु के बारे में अधिक जानकारी के लिये विकिपीडिया पर यह लेख पढ़ें। एक नूशु शोधकर्ता द्वारा बनायी गयी वर्ल्ड ऑफ नूशु नामक वेबसाइट भी पठनीय है।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

स्त्री, उसकी उद्यमशीलता और स्त्रीविमर्श

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स्त्री और उसकी उद्यमशीलता


FICCI के 29वें वार्षिक समारोह में Unleash The Entrepreneur Within विषयक आयोजन में 8 अप्रैल को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का स्त्रीमुद्दों पर दिया यह व्याख्यान कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

सकारात्मकता से परिपूर्ण इस व्याख्यान में इतिहास के कई स्त्रीपात्रों को रेखांकित किया, कई मार्मिक स्थलों पर स्त्री की वर्तमान स्थिति पर विचार उठाया गया व स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में प्रभावी पहल की आवश्यकता को सहजता से रेखांकित किया।
यह पूरा व्याख्यान व प्रश्नोत्तर ध्यान से सुनने योग्य हैं। 






गुरुवार, 14 मार्च 2013

स्त्रीत्व की गरिमा का परिवार से कोई विरोध नहीं

3 टिप्पणियाँ



-          डॉ. ऋषभ देव शर्मा
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः I
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वं नताः स्म परिपालय देवि विश्वं II
भारतीय वाङ्मय में स्त्री और स्त्रीत्व को चरम गरिमा प्रदान की गई है और यह समझा जाता है कि सभ्य समाज में स्त्री को सब प्रकार से सम्मानपूर्ण स्थान मिलना चाहिए. लेकिन दूसरी ओर इसी देश के सामाजिक आचरण में स्त्री को पशुओं और दलितों की श्रेणी में रखा जाना भी एक कटु सत्य है. इतिहास गवाह है कि सत्ता और वर्चस्व के पुरुष के हाथ में केंद्रित होते जाने से स्त्री को शासित और अबला बनने को मजबूर कर दिया गया. एक ओर स्त्री को साक्षात शक्ति मानना तथा दूसरी ओर किसी असहायनिरीहमूक प्राणी ही नहीं अन्य वस्तुओं की भाँति पुरुष द्वारा रक्षा और भोग किए जाने की चीज मानना – समाज के स्त्री विषयक सोच अथवा समाज में स्त्री की स्थिति के परस्पर दो विरोधी प्रतीत होने वाले पक्ष हैं. आशय यह कि लंबी कंडीशनिंग ने हमारे यहाँ स्त्री को बलहीन और अशक्त बना डाला. शक्तिशाली को शक्तिहीन बनाने की अपेक्षा अशक्त को सशक्त बनाना अधिक चुनौतीपूर्ण और कठिन है. इसलिए स्त्रीत्व की गरिमा को पुनर्स्थापित करने के लिए आज सामाजिक अभियान चलाने की जरूरत है.
स्त्रीत्व-गरिमा के इस अभियान की केंद्रीय आकांक्षा यह होनी चाहिए कि समाज के सभी क्षेत्रों में स्त्री के अस्तित्व को मनुष्य के रूप में स्वीकृति प्राप्त हो. स्त्री और पुरुष की ऐसी समानता की व्यावहारिक प्रतिष्ठा आवश्यक है जिसमें स्त्री अन्याद्वितीयकगौणउपेक्षिता अनुगामिनी या अनुचर नहींअनिवार्य और सहचर की भूमिका में हो. अर्द्धनारीश्वरवाक् और अर्थसाम और ऋक् तथा द्यावापृथिवी जैसे मिथकों के माध्यम से भारतीय संस्कृति ने सभ्यता के आरंभ से ही स्त्री-पुरुष की इस समानता को स्वीकृति प्रदान की है. इसी युग्म-भाव और पारस्परिकता को आधुनिक संदर्भ में प्रतिष्ठित करना आज की ज़रूरत है. शक्ति और शिव के योग संबंधी मिथ को सामाजिक धरातल पर घटित होते देखने की इच्छा को नोस्टेलजिया न समझा जाए क्योंकि यह रूपक गतिशील है जड़ नहीं और इसे अपनाते समय आधुनिक समाज की आमूलचूल परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा. स्त्री और पुरुष – किसी का भी दूसरे पर निर्भर होना या अंश-अंशी होनाआज स्वीकार्य नहीं हो सकता. आज तो दोनों को एक-दूसरे की स्वतंत्रता और अस्मिता का सम्मान सीखना होगा. स्त्री को अबलापन से पैदा होने वाली हीनता ग्रंथि से बाहर आना होगा और वह आत्मबल अर्जित करना होगा जो एक खास तरह की निर्भीकता प्रदान करता है और विकट परिस्थिति में आत्मनिर्णय का प्रतीक भी है. पातिव्रत्य के नाम पर गुडिया बना दी गई सीता,सावित्रीद्रौपदी और राधा के चरित्रों में निहित इस तेजस्विता को पहचानना होगा वे पुरुष की अनुगामिनी छाया मात्र नहीं हैं. वे अपनी सशक्तता को निर्विवाद रूप से प्रमाणित करने में सक्षम हैं. लेकिन स्त्री के अबला रूप की पोषक शक्तियों ने उनकी इस तेजस्विता की उपेक्षा करके उन्हें पति-परमेश्वर की अनुचरी मात्र बनाकर रख दिया. उन्हें जब तक फिर से परमेश्वरी नहीं बनाया जातातब तक स्त्री-पुरुष-समता का दावा नहीं किया जा सकता. परमेश्वरी बनाने का अर्थ स्त्री के मानवी रूप की पूर्ण स्वीकृति मात्र हैदेवी बनाकर पूजना नहीं.
यह भी सामाजिक-सांस्कृतिक विडंबना ही है कि समाज स्त्री को या तो देवी के रूप में पूजता है या दानवी के रूप में उससे घृणा करता है. स्त्री के ये दोनों ही अतिरंजित रूप न तो सामान्य हैं और न स्वीकार्य. सशक्त स्त्री का अर्थ देवी या दानवी होना नहींमानवी होना है जिसमें पुरुष की तरह ही शक्तियाँ भी हैं और दुर्बलताएँ भी. यही मनुष्य की सहज पूर्णता है. मानवी होने के इस नैसर्गिक अधिकार से स्त्री को सभ्यता के किसी असभ्य मोड पर वंचित कर दिया गया और उसका जन्म ही अभिशाप तथा पराधीनता का द्योतक बन गया. जिस मानव-जीव को संपूर्ण पृथ्वी पर केवल इसलिए दंडित किया जाता है कि उसका जन्म स्त्री के रूप में हुआ हैवह शारीरिक और मानसिक स्तर पर अशक्तता का शिकार नहीं होगा तो और क्या होगाइसी से घर-बाहर सर्वत्र पुरुषों को अबाध स्वतंत्रता और निर्णय क्षमता प्राप्त हुईं तथा स्त्रियों को अबला कहकर इनसे वंचित कर दिया गया. स्त्रीत्व की गरिमा की प्रतिष्ठा का अर्थ है स्त्रियों को उनकी हरण की गई अबाध स्वतंत्रता और निर्णय क्षमता लौटाना. जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक अथर्वसंहिता के हवाले से अपने घर में पुत्र और शत्रु के घर में कन्या के जन्म की प्रार्थनाएँ की जाती रहेंगी अथवा ऐतरेय ब्राह्मण के हवाले से कन्या के जन्म को शोक का विषय माना जाता रहेगा.
भारत में तो फिर भी वेदकाल से आज तक सशक्त और स्वतंत्र स्त्रियों के सम्मान के अनेक उदाहरण प्राप्त हैंदुनिया के अन्य अनेक देशों ने दार्शनिक चिंतन और बौद्धिक विमर्श से स्त्रियों को सदा दूर रखने के प्रयास किए तथा उन्हें गुलाम और वहशी कहकर पुरुष के अधीन रहने को विवश किया है. स्त्रीत्व की गरिमा के लिए यह अधीनता टूटनी आवश्यक है ताकि मताधिकारशिक्षा और रोजगार के अवसरों से किसी मानव-जीव को मात्र स्त्री होने के कारण वंचित न किया जाए. इस स्वतंत्रता का अर्थ सौंदर्य प्रतियोगिताओं और विज्ञापनों की उपभोक्तावादी दुनिया की अंधी दौड में शामिल होना मात्र नहीं समझा जाना चाहिए. सशक्त स्त्री अपनी गुलामी के इस नए रूप को पहचानेगी और पुरुषत्व को आधिपत्य तथा स्त्रीत्व को उपभोग का पर्याय बनाने के उत्तरआधुनिक षड्यंत्र को निष्क्रिय बना सकेगीऐसी आशा रखी जानी चाहिए.
यह चिता का विषय है कि विविध माध्यम आज भी स्त्री की स्वतंत्रता पर आक्रमण कर रहे हैं. उसके शरीर और सौंदर्य को विभिन्न सभ्यताओं ने विविध रूपों में अलग-अलग संस्थाओं के नाम पर पुरुष के,कभी एकांत और कभी सार्वजनिकउपभोग की वस्तु बनाने में कभी कोई कोताही नहीं की है. आज भी बाजार की शक्तियां अधिक सुनियोजित ढंग से वही सब कर रही हैं. सशक्त स्त्री पालतू होने से इनकार करेगीमनोरंजन का साधन नहीं बनेगी और इस प्रकार समाज को उन्नत और सुसंस्कृत बना सकेगी. याद रहे कि बाजार की शक्तियों द्वारा चलाई जा रही देह की राजनीति का शिकार होने वाली स्त्रियाँ सशक्त नहीं हैं इसलिए स्त्रीविरोधी जाल में इतनी आसानी से फँस जाती हैं. वस्तुतः अपनी अस्मिता और व्यक्तित्व की गरिमा के प्रति जागरूक हुए बिना हर सशक्तीकरण अपूर्ण है.
स्त्री सशक्तीकरण की चर्चा चलते ही कुछ लोगों को घरपरिवार और विवाह के टूटने की चिंता सताने लगती है. इस बारे में मेरा मानना है कि यदि किसी संस्था के जीवित रहने के लिए उसके आधे हिस्से का अशक्त रहना जरूरी हैतो उसे टूट ही जाना चाहिए. परंतु सच्चाई यह नहीं है. इन संस्थाओं के लिए स्त्री का सशक्त होना ही श्रेयस्कर है. इन्हीं संस्थाओं के बीच स्त्री ने सभ्यता और संस्कृति का आविष्कारसंरक्षण और संवर्द्धन किया है. रसोई और घर बनाने से लेकर शिल्प और पशुपालन तक के क्षेत्रों में स्त्री ने ही पहल करके विकास का मार्ग प्रशस्त किया है. वह स्त्री आत्मनिर्भर और स्वायत्त थी. कालांतर में उसे भूमि और संपत्ति का पर्याय बना दिया गयाजिससे उसकी सृजनशीलता कुंठित हुई. अपनी सृजनशक्ति को स्त्रियों ने लोकगीतों के माध्यम से भी प्रमाणित किया है. सृजन स्त्री का स्वभाव हैघर उसका अपना आविष्कार. स्त्री की सशक्तता और घर एक-दूसरे के विरोधी नहीं है. लेकिन घर,परिवार और विवाह को बनाए रखने की एकपक्षीय जिम्मेदारी केवल स्त्री पर नहीं डाली जा सकती. झूठी मर्यादा के नाम पर स्त्री से हर तरह के बलिदान की माँग करना और पुरुष को घर फूँकनेपरिवार तोड़ने तथा विवाह की पवित्रता को भंग करने की केवल पुरुष होने के नाते छूट देना न्यायसंगत नहीं है. सशक्त स्त्री पुरुष के इस स्वैराचार को बर्दाश्त नहीं करेगी तो यह घर-परिवार के हित में ही होगा. इसलिए सबसे पहले स्त्रीत्व की गरिमा की प्रतिष्ठा परिवार के स्तर पर ज़रूरी है.
स्त्रीत्व-गरिमा की प्रतिष्ठा  का अर्थ स्त्री को समाज से अलग करना नहीं है और न ही पुरुष से प्रतिस्पर्धा या विरोध. इसका आधार तो सहयोग और सहानुभूति हैऔर उद्देश्य है व्यापक सामाजिक समरसता. इस समरसता की प्राप्ति में जो प्रवृत्तियाँ बाधक हैं पुरुष को उनसे मुक्त होकर सामाजिक दायित्वबोध के साथ इस अभियान का हिस्सा बनना होगा ताकि वह स्वयं पौरुष की झूठी परिभाषाओं से मुक्त होकर बेहतर मनुष्य बन सके और स्त्री-पुरुष-समता पर आधारित एक बेहतर दुनिया के लिए काम कर सके. सृजन के हर क्षेत्र में स्त्री-पुरुष सहयोगी रहे हैंरह सकते हैं. इस धरती को रूढ़िग्रस्तता,सांप्रदायिकताकट्टरवादभ्रष्टाचारहिंसा और आतंक से मुक्त करने के लिए सशक्त स्त्री की भी उतनी ही जरूरत है जितनी सशक्त पुरुष की.
दुनिया भर में स्त्री आज भी विविध प्रकार की हिंसा झेल रही है. मारपीटक्रूरताअभद्रताबलात्कार और परिवार तथा समाज में तिरस्कार को शताब्दियों से स्त्री नियति मानकर इस तरह बर्दाश्त करती आई है मानो पुरुष के हाथों दिया गया हर तरह का दुःख ही स्त्री का एकमात्र प्राप्य’ हो! ऐसी दमित-शोषित स्त्री,निश्चय हीसमाज के तो क्या अपने भी उत्थान के लिए कुछ कर सकती हैइसमें संदेह है. समाजोत्थान के विविध कार्यक्रमों में उसकी सक्रिय भागीदारी के लिए इस बहुआयामी हिंसा से उसे मुक्त करना होगा. दुर्भाग्य तो यह है कि स्त्री को अवांछित-जीव समझे जाने के कारण यह हिंसा उसके जन्म से पूर्व ही शुरू हो जाती है. ऊपर सेविविध प्रचार माध्यम स्त्री पर हिंसा को नित्य नए आयाम प्रदान कर रहे हैं और सामंती बर्बरता से भरा समाज उन्हें स्वीकृति भी प्रदान कर रहा है. इन माध्यमों में मनोरंजन से लेकर विज्ञापन तक सर्वत्र पुरुष का स्त्री के प्रति व्यवहार हिंसकआक्रामकविद्वेषपूर्ण और मालिकाना ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है. इस षड्यंत्र को भी हमें पहचानना होगा कि कामुकता और विलासिता की अश्लील प्रस्तुति के बीच प्रतिपल स्त्री-पुरुष के सहज प्रेम की हत्या की जा रही है और दर्शक सिर धुनने के बजाय ताली पीट रहे हैं. एक प्रवृत्ति यह भी पनपी है कि स्वावलंबी य स्वतंत्र महिलाओं की छवि क्रूर और दुश्चरित्र के रूप में गढ़ी जा रही है ताकि सशक्त स्त्री को संदेह और घृणा का पात्र बनाया जा सके. इससे एक ओर तो स्त्रीविरोधी अपराध बढ़ रहे हैं तथा  दूसरी ओर विवाह के प्रति वितृष्णा का भाव तेजी से फ़ैल रहा है. ये दोनों ही बातें सामाजिक समरसता के लिए अमंगलकारी हैं. अश्लीलता सदा अमंगलकारी ही होती है. इससे मुक्ति के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन अपेक्षित है अन्यथा मानव-सभ्यता विकास के नाम पर विनाश को ही प्राप्त होगी.
इस वांछित मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिवर्तन का नेतृत्व स्त्री को करना होगा  – भाषा और साहित्य के स्तर से लेकर आर्थिक और राजनैतिक स्तर तक. सभ्यता और संस्कृति का विकास अकेले पिताओं ने नहीं किया हैउसमें माताओं का भी बराबर का योगदान है. भविष्य निर्माण में माताओं के इस योगदान को सुनिश्चित करने के लिए स्त्री को अपने ऊपर थोपे गए अबलापन से निकलना ही होगा. इसके लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता ही काफी नहीं हैशिक्षा और सामाजिक चेतना का व्यापक प्रसार भी आवश्यक है. भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह भी ध्यान में रखना होगा कि स्त्रीत्व-गरिमा का लक्ष्य शहरी और सुविधासंपन्न स्त्री तक सीमित नहीं है वरन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र तक की स्त्री का इसमें सम्मिलित होना अनिवार्य है. साहित्यशिक्षाआर्थिक विकास और राजनैतिक चेतना सभी स्तरों पर ग्रामीण स्त्री की सक्रिय और सार्थक भागीदारी को सुनिश्चित करना होगातभी यह अभियान पूर्णता प्राप्त कर सकता है. इसके लिए स्त्र्री-बहनापा बेहद ज़रूरी है वरना सारे प्रयास व्यर्थ हो जाएँगे. धर्मजाति और संप्रदाय की सीमाओं से परे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि स्त्री संतान को केवल ससुराल जाने के लिए तैयार न किया जाए बल्कि जीवन और जगत के हर मोर्चे के लिए प्रशिक्षित किया जाए. इससे व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न क्षेत्रों में स्त्री की भागीदारी को बढ़ाया जा सकता है और उसे एक पूर्ण मानव के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सकता है.
अंत में यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि पूर्ण मानव/मानवी  होने का अर्थ स्त्रीत्व से निवृत्त या विमुख होना कदापि नहीं है. बल्कि इससे तो स्त्री और पुरुष के बीच के रिश्ते को प्रेमपूर्ण होने में और सहायता ही मिलेगी क्योंकि प्रेम के लिए समानता आवश्यक है. मालिक और गुलाम के बीच प्रेम नहीं हो सकता (यदि हो सकता है तो वे मालिक और गुलाम नहीं रहते). प्रेम की अभिव्यक्ति के नाम पर होने वाले अमर्यादित आचरण पर भी इससे अंकुश लगेगा. जयदेवकालिदास और मीराँ की काव्यकृतियाँ अथवा खजुराहो की कलाकृतियों में जो उदात्त प्रेम दीखता हैउसका स्रोत स्त्री-पुरुष की उस समानता में निहित है जिसका आधार परस्पर सहचरी-सहचर होने का उन्मुक्त भाव है. समता के स्तर पर प्रेमपात्र के व्यक्तित्व में अपने व्यक्तित्व के विसर्जन में ही यदि प्रेमियों का मोक्ष निहित है तो इसके लिए अधिकार नहीं समर्पण चाहिए – सहज समर्पण. अशक्त के पास तो समर्पित करने को कुछ अपना होता ही नहीं. इसलिए सशक्त स्त्री से किसी को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है. स्त्रीत्व की गरिमा से अभिमंडित यह नई स्त्री विविध सामाजिक संबंधों को अधिक प्रेम और अधिक गरिमा प्रदान करेगीइस पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए!  O  


गुरुवार, 22 नवंबर 2012

....नायक की प्रतीक्षा करती व उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती .....

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हिन्दी की समकालीन काव्यालोचना की सर्वाधिक ज्वलंत शृंखला 


अनामिका व पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था व तत्पश्चात राहुल ब्रजमोहन का "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"।  

उसी बहस के क्रम में आज पढ़ें -



धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका
(संदर्भ - पवन करण और अनामिका की कविताओं पर जारी बहस)

- कात्यायनी 


पवन करण और अनामिका की कविताओं का शालिनी माथुर ने जो कुशाग्र विश्लेषण प्रस्तुत किया, उस पर पहले ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं लगी। शालिनी की केन्द्रीय स्थापनाओं से मेरी पूरी सहमति थी। पर बहस के दौरान मूल मुद्दे को इधर-उधर खींचने-तानने-घसीटने से कुछ नए विवाद के मुद्दे उभरकर आए। उन पर अपने विचार रखने की जरूरत महसूस हुई।


पहली बात यह है कि निर्वस्त्रता (जैसा कि शालिनी ने भी लिखा है) अपने आप में अश्लील या पोर्नोग्राफ़िक नहीं होती। यदि ऐसा होता तो पुनर्जागरण काल से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक की यूरोपीय चित्रकला की कई क्लासिकी कृतियाँ अश्लील मान ली जातीं। हाँ, कोर्णाक और खजुराहो की मैथुनरत युगलों और पशुओं तक से मैथुन की मूर्तियाँ भारतीय समाज के एक गतिरुद्ध और पतनोन्मुख समाज के अभिजनों-पुरोहितों की सांस्कतिक सड़ान्ध की अभिव्यक्ति-मात्र हैं। अर्चना वर्मा 'इन्हें इस बहुलताप्रेमी देश के समावेशी स्वभाव में विचित्र और विलक्षण आस्थाओं और अस्मिताओं के लिए भी जगह बना देने के पुरागत परम्परा' मानती हैं। उनके हिसाब से, तान्त्रिकों-वामाचारियों के विविध सम्प्रदाय धार्मिक आस्थाओं को रूपकों-प्रतीकों में ढालकर स्त्रियों के साथ (धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर) जो कुछ करते थे, उन्हें भी 'विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं का एक विशिष्ट गढ़न्त '(Construct) मान लिया जाना चाहिए और उनका सहानुभूतिपूर्वक पाठ/पढ़न्त ( Reading ) होना चाहिए। ऐसा ही सती-प्रथा के साथ भी होना चाहिए।


उत्तर आधुनिकतावादी विमर्श (Discourse) प्रणाली की जिस त्रयी - लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त (Text, reading and construct) को अर्चना वर्मा ने अपनी तर्क-प्रणाली का आधार बनाया है, उसकी सबसे बड़ी सहूलियत यह होती है कि उसका कोई सन्दर्भ-चौखटा (Frame of reference) होता ही नहीं। जो भी सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक गढ़न्त हैं, उनके कई लिखंत और कई पढ़न्त हो सकते हैं। किसी एक अवस्थिति के सही या गलत होने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। पक्षधरता या निर्णायकता का मुद्दा अप्रासंगिक हो जाता है। अनामिका ने शालिनी को यह नसीहत यूँ ही नहीं दी है कि आदमी को 'जजमेण्टल' होने से बचना चाहिए। पाठ की बहुस्वरीयता (Polyphony) की बात जब लुनाचार्स्की ने (दोस्तोयेव्स्की के सन्दर्भ में) और बख़्तीन ने की थी तो उन्होंने रचनाकार को सुनिश्चित विचारधारात्मक अवस्थिति और सामाजिक पक्षधरता से मुक्त कत्तई नहीं किया था। अर्चना वर्मा लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त की अवधारणाओं के मूल में भाषा में स्वभावतः निहित अर्थबहुलता और सन्दर्भ-सापेक्षता की चर्चा करते हुए रचनाकार को पूरी छूट देते हुए ज़िम्मेदारी मुख्यतः पाठक की पढ़न्त क्षमता पर डाल देती हैं जो उसकी भाषिक क्षमता, वैयक्तिक सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, वैचारिक प्रतिबद्धता आदि से तय होती है। उनका साफ-साफ कहना है - "लिखन्त की विवक्षा और अर्थान्विति लेखक की मंशा से नियन्त्रित और अभिप्राय से संचालित न होकर पाठक की पढ़न्त क्षमता द्वारा कार्यान्वित होती है।" बात यहाँ साफ हो गई है। यानी असल बात यह है कि रचनाकार इस तर्क से दायित्वमुक्त हो जाता है और अपनी वैचारिक-सामाजिक अवस्थिति की किसी भी आलोचना के जोखिम से सुरक्षित हो जाता है। यह घिसे-पिटे उत्तर आधुनिकतावादी सिद्धान्त-चर्वण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आज हिन्दी की कई स्त्री चिन्तक और स्त्री कवि अपने कृतित्व में जो नारीवाद प्रस्तुत कर रही हैं वह गत शताब्दी के साठ के दशक के पश्चिमी नारीवाद के विविध सरणियों से सर्वथा भिन्न है। उस दौर के नारीवादी आन्दोलन के पास स्त्री-मुक्ति की कोई सांगोपांग परियोजना नहीं थी, उनकी विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु मध्यमवर्गीय अराजकतावादी थी और स्वरूप रैडिकल स्वतःस्फूर्त था। आगे चलकर अपनी तार्किक परिणति के तौर पर भले ही वह धारा विघटित हो गयी और कुछ हद तक प्रतिगामी निष्पत्तियों तक जा पहुँची, पर अपने समय में कई शीर्षस्थ नारीवादी सिद्धान्त-निरूपकों की उपस्थिति के साथ-साथ उस नारीवादी आन्दोलन का स्वरूप जनान्दोलनात्मक था। पूँजीवादी जनवाद के वैधिक दायरे के भीतर उसकी अपनी कुछ उपलब्धियाँ भी थीं। 



स्त्री-मुक्ति और पुरुष वर्चस्व जैसे प्रश्न आज उत्तर-आधुनिकतावादी विमर्श के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टि के अनुसार दमन या उत्पीड़न, विमानवीकरण, वस्तुकरण या ऐसी कोई भी चीज़ एक वस्तुगत सामाजिक यथार्थ नहीं बल्कि एक वैचारिक समस्या है जिसका सम्बन्ध दार्शनिक द्वैतों से है और इन द्वैतों की व्याख्या में ही दमन-उत्पीड़न-वर्चस्व या ऐसी कोई स्थिति स्वीकार की जा सकती है।
आज स्थिति सर्वथा भिन्न है। स्त्री-मुक्ति और पुरुष वर्चस्व जैसे प्रश्न आज उत्तर-आधुनिकतावादी विमर्श के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टि के अनुसार दमन या उत्पीड़न, विमानवीकरण, वस्तुकरण या ऐसी कोई भी चीज़ एक वस्तुगत सामाजिक यथार्थ नहीं बल्कि एक वैचारिक समस्या है जिसका सम्बन्ध दार्शनिक द्वैतों से है और इन द्वैतों की व्याख्या में ही दमन-उत्पीड़न-वर्चस्व या ऐसी कोई स्थिति स्वीकार की जा सकती है। तात्पर्य यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद और उसकी सहोदरा ''उत्तर''-विचारसरणियाँ सभी विचारों, विश्वासों, व्यवहारों, संस्थाओं, घटनाओं-परिघटनाओं को वस्तुगत यथार्थ के बजाय एक पाठ या लिखन्त (text) मानती हैं और इसकी अर्थान्विती भी पूरी तरह से मनोगत होती है यानी प्रेक्षक-पाठक की स्थिति पर निर्भर होती है, जैसा कि अर्चना वर्मा कहती हैं, ''...लिखन्त पाठक के हाथों में आते ही अपने तात्कालिक सन्दर्भों से मुक्त होती और पढ़न्त-सापेक्ष बन जाती है, हालांकि लिखन्त सापेक्षता से पूरी तरह से मुक्त नहीं होती।'' उत्तर-आधुनिकतावाद का जादुई तर्क सिग्निफायर और सिग्नीफायड की अवस्थितियों को मनमाने ढंग से बदलता रहता है। 


उत्तर-आधुनिकतावादी, उत्तर उपनिवेशवादी, 'सबआल्टर्न' इतिहासकार और अस्मितावादी राजनीति (Identity Politics) के एन.जी.ओ. पन्थी ज्ञानधुरीण - ये सभी लोग प्रबोधन (Enlightenment), क्लासिकी जनवादी क्रान्तियों और समाजवादी क्रान्तियों के "महाख्यानों" (Metanarretives) और मानववाद, जनवाद, समाजवाद की अवधारणाओं-परियोजनाओं को एकलतावादी, अपचयनवादी (Reduchionist) और वर्चस्ववादी (Hegemonist) मानकर खारिज करते हैं। इनका मानना है कि सत्ता विकेन्द्रित होकर हमारे जीवन के पोर-पोर में घुसी हुई है, आमजनों द्वारा आभ्यन्तरीकृत कर ली गयी है, अतः इसका प्रतिरोध असम्भव है। यथास्थिति की जड़ता की हर आलोचना एक नयी जड़ता को जन्म देती है और सत्ता का हर प्रतिरोध सत्ता के नये रूप को जन्म देता है। (अर्चना वर्मा, शालिनी की आलोचना करते हुए जब कहती हैं कि पितृसत्ता के गढ़न्तों से लड़ते-लड़ते स्त्री-विमर्श की अपनी अनेक निष्पत्तियाँ स्वयं न केवल एक गढ़न्त बल्कि जकड़न्त बन चुकी हैं तो इसके पीछे मूलतः यही तर्कप्रणाली सक्रिय होती है)। ऐसी स्थिति में उत्तर आधुनिक, उत्तर औपनिवेशिक और 'सब-आल्टर्न' विचार-सरणियाँ एकमात्र वैकल्पक सम्भावना  के तौर पर दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों आदि की सत्ता से अनछुई-अप्रदूषित प्राक्-आधुनिक (Pre-modern) अस्मिताओं की तलाश करती हैं और उनकी स्वायत्तता के 'स्पेस' को बचाने-बढ़ाने की कोशिश करती हैं। यह साहित्य और मानविकी के क्षेत्र में भी हो रहा है और राजनीति के क्षेत्र में भी। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित इतिहासकार दीपेश चक्रवर्ती और समाजशास्त्री आशीष नन्दी 'कुलवधु' और 'गृहलक्ष्मी' जैसे 'सुन्दरता की अनपचेय (Irriducable) श्रेणियों' के महिमामण्डन तक जा पहुँचते हैं। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित अर्चना वर्मा 'रसराज शृंगार ' की रीतिकालीन रसानुभूति को सकारात्मक बताती हैं और इस बात के लिए चिन्तित दीखती हैं कि आधुनिकता का पीछा करता हुआ भारत विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं और पुरागत परम्पराओं से विच्छिन्न होता जा रहा है (इसमें लिंग-पूजा, योनि पूजा, पशुओं तक से सम्भोग के भित्ति-चित्रों के उत्कीर्णन आदि सभी शामिल हैं!)। अनामिका की कविताओं में और लेखन में स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से विच्छिन्न कर स्त्री-देह की मुक्ति में ( इसी में मन की मुक्ति भी है!) कीलित करने वाली पश्चिमी बुर्जुआ नारीवादी चिन्तन की एक उपधारा के साथ-साथ, लोक-परम्परा के नाम पर जो कुछ भी है; उसके प्रति जो अधिभूतवादी एवं अनालोचनात्मक स्वीकार-भाव है, उसे भी इसी नजरिए से समझा जा सकता है। यह संगमभूमि दरअसल उत्तर-आधुनिकतावाद की जमीन है जहाँ नारी मुक्ति देह-मुक्ति के रूप में और देह-मुक्ति 'देह के उत्सव' (राजेन्द्र यादव इसे यही नाम देंगे) के रूप में पवन करण और अनामिका अपनी-अपनी कविताओं को अंजाम दे रहे हैं। 



'फैट ब्लैक वुमन' से जो एक कविता उन्होंने उद्धृत की है वहाँ भी मोटी होने, अश्वेत होने और स्त्री होने से जुड़े तीन स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का जो तरीका कवि ने चुना है, वह भी व्यापक सामाजिक प्रश्नों को देह-मात्र में कीलित कर देने का ही तरीका है। कविता की स्त्री के दुद्धू उत्तेजक हैं। किसके लिए? निश्चय ही पुरुष के लिए ! वह पुरुष से अपना जड़ीभूत सौन्दर्य-बोध बदलने का आग्रह करती है ताकि वह उसके तरबूज जैसे स्तनों, जुड़वाँ सील मछलियों जैसी जाँघों और उनके बीच जामुनी चेरी मुँह में दबाए झबरे कुत्ते को सराह सके और नाभि के नीचे नीलिमा में हहाते काले सागर में उतर सके।
बकौल अनामिका, उनकी कविता 'ब्रेस्ट' से जुड़ा सारा रूमान झाड़ते हुए यह भी बताना चाहती है कि स्त्री की अस्मिता किसी एक अंग में कीलित नहीं की जा सकती, पर ऐसा करते हुए वे स्त्री की अस्मिता व उससे जुड़े प्रश्नों को स्त्री-देह मात्र में कीलित कर देती हैं। ग्रेस निकोलस के संकलन 'फैट ब्लैक वुमन' से जो एक कविता उन्होंने उद्धृत की है वहाँ भी मोटी होने, अश्वेत होने और स्त्री होने से जुड़े तीन स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का जो तरीका कवि ने चुना है, वह भी व्यापक सामाजिक प्रश्नों को देह-मात्र में कीलित कर देने का ही तरीका है। कविता की स्त्री के दुद्धू उत्तेजक हैं। किसके लिए? निश्चय ही पुरुष के लिए ! वह पुरुष से अपना जड़ीभूत सौन्दर्य-बोध बदलने का आग्रह करती है ताकि वह उसके तरबूज जैसे स्तनों, जुड़वाँ सील मछलियों जैसी जाँघों और उनके बीच जामुनी चेरी मुँह में दबाए झबरे कुत्ते को सराह सके और नाभि के नीचे नीलिमा में हहाते काले सागर में उतर सके। कविता न्यौता किसे दे रही है? क्या खुद को? नहीं, पुरुष को! अतः यह कविता भी समस्या का अपमानजनक अवमूल्यन करती है और सन्दर्भों से कटकर वस्तुगत तौर पर अश्लील बन ही जाती है। अनामिका भी इतना तो मानती ही हैं कि 'एकांगिता ही अश्लीलता है।' 





करीब ढाई-तीन दशक पहले हिन्दी कविता में स्त्रियों के लिए करुणा की बाढ़-सी आ गयी थी। हिन्दी कवि दयनीय, मौन, उत्पीड़ित स्त्री के प्रति कुछ ज्यादा ही करुणार्द्र हो उठे थे। फिर स्त्री कविता का एक विद्रोही स्वर उभरा जिसका एक व्यापकतर सामाजिक परिप्रेक्ष्य था। उस समय भी ज्यादा हावी धारा कुलीन व्यक्तिवादी स्त्री-कविता की ही धारा थी। और अब यह एक दौर है जब पवन करण की चर्चित कविता जैसी हृदयहीन लम्पट-कामुक कविताएँ और अनामिका की चर्चित कविता जैसी कृत्रिम, 'सिंथेटिक' (प्रभु जोशी ने ठीक कहा है) विकृतमानस और संवेदनहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। पितृसत्ता का विरोध करते हुए स्त्री ने प्रकारान्तर से पितृसत्ता के ही गढ़न्तों को स्वीकार कर लिया है- अर्चना वर्मा की यह बात और कहीं लागू हो न हो, अनामिका की कविता पर तो जरूर लागू होती है।
करीब ढाई-तीन दशक पहले हिन्दी कविता में स्त्रियों के लिए करुणा की बाढ़-सी आ गयी थी। हिन्दी कवि दयनीय, मौन, उत्पीड़ित स्त्री के प्रति कुछ ज्यादा ही करुणार्द्र हो उठे थे। फिर स्त्री कविता का एक विद्रोही स्वर उभरा जिसका एक व्यापकतर सामाजिक परिप्रेक्ष्य था। उस समय भी ज्यादा हावी धारा कुलीन व्यक्तिवादी स्त्री-कविता की ही धारा थी। और अब यह एक दौर है जब पवन करण की चर्चित कविता जैसी हृदयहीन लम्पट-कामुक कविताएँ और अनामिका की चर्चित कविता जैसी कृत्रिम, 'सिंथेटिक' (प्रभु जोशी ने ठीक कहा है) विकृतमानस और संवेदनहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। पितृसत्ता का विरोध करते हुए स्त्री ने प्रकारान्तर से पितृसत्ता के ही गढ़न्तों को स्वीकार कर लिया है- अर्चना वर्मा की यह बात और कहीं लागू हो न हो, अनामिका की कविता पर तो जरूर लागू होती है। 



हिन्दी कविता सामाजिक जीवन और संघर्षों के परिप्रेक्ष्य से आज असामान्य रूप से विमुख हुई है। स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आम स्त्रियों के जीवन, वृहत्तर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक मुक्ति की परियोजना से काटकर अभिजन समाज की स्त्रियों का निठल्ला विमर्श बना दिया गया है। इसका मूल कारण इतिहास का ठहराव और विपर्यय की लहर है। मजे की बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर औपनिवेशिकता, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद आदि का जमाना यूरोप-अमेरिका में क़रीब डेढ़-दो दशक पहले ही बीतने लगा था। भारत में यह फैशन काफी देर से आया है, जैसा कि प्रायः होता है।




हिन्दी कविता सामाजिक जीवन और संघर्षों के परिप्रेक्ष्य से आज असामान्य रूप से विमुख हुई है। स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आम स्त्रियों के जीवन, वृहत्तर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक मुक्ति की परियोजना से काटकर अभिजन समाज की स्त्रियों का निठल्ला विमर्श बना दिया गया है। इसका मूल कारण इतिहास का ठहराव और विपर्यय की लहर है। मजे की बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर औपनिवेशिकता, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद आदि का जमाना यूरोप-अमेरिका में क़रीब डेढ़-दो दशक पहले ही बीतने लगा था। भारत में यह फैशन काफी देर से आया है, जैसा कि प्रायः होता है। पश्चिम के अकादमिक-सांस्कृतिक हलकों में इन दिनों "मार्क्सवाद की वापसी" का नारा देने का ज़माना है। फ़ूको, देरिदा, ल्योतार, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक, होमी भाभा आदि घिस चुके हैं। अब फिकरे और जुमले जि़जेक और अलेन बेदयू आदि से उधार लेने का ज़माना है। 


अनामिका ने शालिनी को प्रेमचन्द की कहानी के पात्र 'बड़े भाई साहब' वाले भाव से नसीहत दी है। प्रेमचन्द के 'बड़े भाई साहब' नसीहत क्यों देते थे, वह जानती ही होंगी। हाँ, यह सम्भावना नहीं है कि कथा के अन्त में बड़े भाई साहब की तरह वे रूपान्तरित होकर सरल वेश में आ जायेंगी। नैतिकता का ठेका लेने, 'सेल्फरायटियसनेस' और 'जजमेण्टल' होने तथा "प्रचण्ड मर्दवादी भाषा के तेवर" में श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त होकर आलोचना करने की प्रवृत्त को उन्होंने जब फासीवादी कहा है तो प्रकारान्तर से शालिनी को ही लक्षित किया है। पर स्वयं उनके लेख से ऊँचाई से 'सरमन' बोलने और नसीहत देने का जो तेवर है, कविता की समझ विकसित करने का जिस अन्दाज़ में दिया गया सुझाव है, उससे तो एक आहत फुफकार ही सुनायी देती है। जो तोहमतें वे शालिनी के आलेख पर लगाती हैं, वे ख़ुद उन पर ज्यादा सटीक ढंग से लागू होती हैं। दिलचस्प बात यह है कि शालिनी की मूल आपत्तियों और तर्कों में से उन्होंने एक को भी सीधे-सीधे नहीं छुआ है और बस दाँयें-बाँयें से निकल गयी हैं। 



अनामिका के मर्दवाद-विरोध की ब्रह्मगाँठ तब खुल जाती है, जब एक नैतिक-बौद्धिक रूप से परिष्कृत आधुनिक स्त्री के अकेलेपन के लिए उन्हें "रामगुप्तों से घिसी ध्रुवस्वामिनी के अकेलेपन" का रूपक सूझता है। यानी मर्दवाद (पुरुष वर्चस्ववाद) का सारतत्व यह है कि अपनी नामर्दगी को ढंकने के लिए कायर पुरुष अतिरिक्त आक्रामक और निर्दय आचरण करते हैं।
अनामिका के मर्दवाद-विरोध की ब्रह्मगाँठ तब खुल जाती है, जब एक नैतिक-बौद्धिक रूप से परिष्कृत आधुनिक स्त्री के अकेलेपन के लिए उन्हें "रामगुप्तों से घिसी ध्रुवस्वामिनी के अकेलेपन" का रूपक सूझता है। यानी मर्दवाद (पुरुष वर्चस्ववाद) का सारतत्व यह है कि अपनी नामर्दगी को ढंकने के लिए कायर पुरुष अतिरिक्त आक्रामक और निर्दय आचरण करते हैं। फिर मर्दवाद का समाधान क्या है? यह कि पुरुष "संकल्पपूर्वक अतिपुरुष के खाँचे से बाहर आकर सम्यक् पुरुष यानी प्रजातान्त्रिक/दोस्त पुरुष" बने, "ध्रुवस्वामिनी के योग्य चन्द्रगुप्त" बने, "पद्मिनी नायिका के योग्य धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक" बने। अनामिका जी, महाकाव्य काल के धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक उदारचरित भले हों, पर सत्री के प्रति प्रजातान्त्रिक रुख रखने वाले दोस्त पुरुष तो कत्तई नहीं होते थे। ध्रुवस्वामिनी का अपना व्यक्तित्व था और चन्द्रगुप्त एक जेनुइन प्रेमी और साहसी राजा था, पर आधुनिक स्त्री के स्वतन्त्र व्यक्तित्व और प्रजातान्त्रिक पुरुष व्यक्तित्व को उन दोनों पर आरोपित करना अतिबौद्धिकता के हास्यास्पद द्रविण प्राणायाम से अधिक कुछ भी नहीं है। आज के मूल्यों के सन्दर्भ-चौखटे से देखें तो धीरोदत्त नायक अतिपुरुष के खाँचे में कैद होता था और पद्मिनी नायिका आचरण और सौन्दर्यबोध की दृष्टि से प्राचीन/मध्यकालीन पुरुष वर्चस्ववादी कसौटियों पर खरी होती थी। यानी शब्दों में तो अनामिका पुरुष के अतिपुरुष होने का विरोध करती हैं, पर वास्तव में प्रतीक्षा उन्हें एक अतिपुरुष की ही है। 



बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब वे ("शालिनी बाबू", "शालिनी भैया" को सम्बोधित करते हुए) मानो दुनिया के सारे पुरुषों को चुनौती देती हैं कि "कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें... पढ़ी-लिखी, चेतन परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं"। अब यहाँ यौनिकता से तात्पर्य यदि 'सेक्सुअलिटी' से है, तो वह एक स्वायत्त-सकारात्मक प्रत्यय है, वह एक उन्नत स्त्री-चेतना में उपस्थित रहती है, उसे पुरुष द्वारा जगाने की जरूरत नहीं होती। यौनिकता से तात्पर्य यदि स्वस्थ यौनक्षुधा या स्वस्थ ऐन्द्रिक कामना से है, तो कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और उन्नत चेतना वाली आधुनिक स्त्री इस मामले में समान सक्रिय पक्ष की भूमिका निभाती है।
बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब वे ("शालिनी बाबू", "शालिनी भैया" को सम्बोधित करते हुए) मानो दुनिया के सारे पुरुषों को चुनौती देती हैं कि "कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें... पढ़ी-लिखी, चेतन परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं"। अब यहाँ यौनिकता से तात्पर्य यदि 'सेक्सुअलिटी' से है, तो वह एक स्वायत्त-सकारात्मक प्रत्यय है, वह एक उन्नत स्त्री-चेतना में उपस्थित रहती है, उसे पुरुष द्वारा जगाने की जरूरत नहीं होती। यौनिकता से तात्पर्य यदि स्वस्थ यौनक्षुधा या स्वस्थ ऐन्द्रिक कामना से है, तो कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और उन्नत चेतना वाली आधुनिक स्त्री इस मामले में समान सक्रिय पक्ष की भूमिका निभाती है। अनामिका के विचार से स्त्री शरीर पुपुही नहीं बल्कि गम्भीर राग-रागिनियों, श्रुतियों-अनुश्रुतियों से भरी हुई रुद्रवीणा है, लेकिन है वह एक वाद्ययंत्र ही, जिसके अन्तर्संगीत को जगाने के लिए किसी धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक की जरूरत है। (यह 'साहब, बीवी और गुलाम' की नायिका की कामना लगती है न कि किसी आधुनिक स्वतंत्र चेतस स्त्री की)। धीरोदत्त नायक के पुरातन खाँचे-साँचे वाले ऐसे किसी अतिपुरुष की प्रतीक्षा एक लोकतान्त्रिक सोच न होकर एक फासीवादी आत्मिक जगत और सौन्दर्यशास्त्र की अभिलाक्षणिकता है। यह फासीवादी विचारों से अनुकूलित एक मिथ्याभासी स्त्री-स्वातन्त्रय चेतना है। उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवाद लोकजीवन की रागात्मक चाशनी में लिथड़ी प्राक्आधुनिक सोच-संस्कारों-विचारों-संस्थाओं को महिमामण्डित करने के साथ ही लोकतान्त्रिक मूल्यों-संस्कारों का विरोध करता ही है। साथ ही जेण्डर पर केन्द्रित हर विमर्श को व्यापक सामाजिक-ऐतिहासिक सन्दर्भों से काटकर वह देहकेन्द्रित, यौनकेन्द्रित, 'स्त्री बनाम मर्द' - केन्द्रित बनाकर स्त्री मुक्ति के प्रश्न को परियोजना में रूपान्तरित करने की जगह विमर्श और मुहावरेबाजियों-जुमलेबाजियों तक सीमित कर देता है। कविता और विचार के क्षेत्र विश्वविद्यालयों की अभिजन विदुषियाँ आजकल ऐसा धमाल खूब मचाये हुई हैं। 


अनामिका को ताज्जुब है कि शालिनी ने न जाने कहाँ ऐसी स्त्रियाँ देखी हैं जो बेध्यानी का अभिनय करते हुए जानबूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती हैं और ध्यान से चारों ओर देखती हैं कि सबने उसे ध्यान से देखा या नहीं । हमारे जैसे बन्द समाजों की घुटन में यह विमानवीकरण, विघटित स्त्री चेतना और रुग्णता खूब देखने को मिलती है स्त्रियों के एक हिस्से में। अनामिका को दिल्ली के मध्यवर्गीय इलाकों में जाकर व्यापारियों और बाबुओं की, रुटीनी गार्हस्थ्य से बोर पत्नियों का पास-पड़ोस के "भाई-साहबों" से व्यवहार पर गौर करना चाहिए, कलकत्ता के किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों की बहुतायत वाले इलाकों में जाकर पास-पड़ोस की "भाभी जी" लोगों का उनके साथ व्यवहार देखना चाहिए, किसी तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा-गाकर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री का मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार देखना चाहिए। यही नहीं, साहित्य के मठाधीश कई नौकरशाहों की महफिलों और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तरों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जायेंगे। कविता और कहानी में भी एक स्त्री जब कोई निमित्त तलाशकर, विद्रोह या त्रासदी के नाम पर या किसी अन्य बहाने से, स्त्री को अनावृत करती है तो रुग्ण पुरुष मानस को गुदगुदाने (titillation) का ही काम करती है।

अनामिका को दिल्ली के मध्यवर्गीय इलाकों में जाकर व्यापारियों और बाबुओं की, रुटीनी गार्हस्थ्य से बोर पत्नियों का पास-पड़ोस के "भाई-साहबों" से व्यवहार पर गौर करना चाहिए, कलकत्ता के किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों की बहुतायत वाले इलाकों में जाकर पास-पड़ोस की "भाभी जी" लोगों का उनके साथ व्यवहार देखना चाहिए, किसी तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा-गाकर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री का मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार देखना चाहिए। यही नहीं, साहित्य के मठाधीश कई नौकरशाहों की महफिलों और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तरों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जायेंगे। कविता और कहानी में भी एक स्त्री जब कोई निमित्त तलाशकर, विद्रोह या त्रासदी के नाम पर या किसी अन्य बहाने से, स्त्री को अनावृत करती है तो रुग्ण पुरुष मानस को गुदगुदाने (titillation) का ही काम करती है।

दूर की कौड़ी लाने के चक्कर में वकील कभी-कभी केस बिगाड़ने और मुवक्किल की फजीहत कराने का ही काम किया करते हैं। ऐसा ही आशुतोष कुमार ने किया है। सीढ़ी दर सीढ़ी तर्क़ करते हुए वे यहाँ जा पहुँचते हैं कि जरूरी नहीं कि पोर्नोग्राफ़ी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही हो। सनी लियोन ख़ुद मानती हैं कि पोर्नोग्राफ़ी उनके लिए सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति का एक खास तरीक़ा है जिसे उन्होंने अपनी इच्छा से चुना है और इस पर उन्हें गर्व है। आशुतोष कुमार जी, पोर्नोग्राफ़ी के बारे में 'वैल्यू जजमेण्ट' इस आधार पर नहीं लिया जा सकता कि सनी लियोन इसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम और अपना स्वतन्त्र निर्णय मानती हैं। पोर्न उद्योग और यूरोप के सेक्स उद्योग में लगी ज्यादातर स्त्रियाँ यही कहेंगी कि वे अपने स्वतन्त्र निर्णय से ऐसा कर रही हैं। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। इनके पीछे सैकड़ों परोक्ष रूप से आर्थिक-सामाजिक परिवेशिक दबाव काम करते हैं या फिर एक विघटित स्त्री चेतना काम करती है जो अलगाव और पूँजीवादी सांस्कृतिक अद्यःपतन का परिणाम होती है। यदि कुछ पुरुषों के लिए सनी लियोन कुत्सित उल्लास का रूपक या एक गाली का पर्याय बन चुकी है तो मात्र इसी से यह तय नहीं हो जाता कि हम सनी लियोन (निश्चय ही, उसके निर्णय की आज़ादी उसकी अपनी है, पर उसके निर्णय से असहमति की भी उतनी ही आज़ादी है) के कृत्य का औचित्य प्रतिपादन करने लगें। जहाँ तक सृजनात्मक अभिव्यक्ति का सवाल है, तो आशुतोष जी, पोर्न इण्डस्ट्री तो छोड़ ही दीजिए, हॉलीवुड-बॉलीवुड के कमर्शियल सिनेमा में भी अभिनेता की सृजनात्मक अभिव्यक्ति का 'स्पेस' बस नाम को या अपवादस्वरूप ही होता है। वहाँ कुछ है तो बस पैसे और स्टारडम की कुत्तादौड़ है, खोखलापन है, वैचारिक दिवालियापन है और घनघोर आत्मिक रिक्तता है। आशुतोष कुमार ने अपने लेख के अन्त में पोर्नोग्राफ़ी के बारे में काफ़ी कुछ ठीक-ठीक बातें लिखीं हैं। यह सही है कि पोर्नोग्राफ़र स्त्री को केवल वस्तुकृत नहीं करता (क्योंकि वह कभी भी पूरी तरह से वस्तुकृत नहीं हो सकती)। कभी-कभी वह उसे पशुवत् 'ट्रीट' करके परपीड़क आनन्द लेता है, कभी गोपन को खोलने और निजी स्पेस में झाँकने की फन्तासी रचता है, कभी अपनी समस्त रुग्ण मर्दवादी फन्तासियों-अप्राकृतिक यौनाचार (अब यह मत कहियेगा कि अप्राकृतिक कुछ नहीं होता और यह भी एक पुरानी जड़ीभूत सोच है), सामूहिक यौनाचार, सार्वजनिक नग्नता, 'वाइफ स्वैपिंग' आदि का शिकार बनाता है। यह भी सही है कि जैसे हर उत्पीड़क अन्दर से डरा होता है, उसी तरह पोर्नोग्राफ़र भी स्त्री की स्वतन्त्रता और यौनिकता से डरा होता है। विचित्र बात यह है कि पोर्नोग्राफ़ी के बारे में आशुतोष कुमार ने जो विश्लेषण किया है, उसी के हिसाब से देखें तो भी पोर्नोग्राफ़ी अपनी मूल प्रकृति से ही एक पुरुष वर्चस्ववादी स्त्री विरोधी फासिस्ट उपकरण है। इसे कला-विधा भी नहीं कहा जा सकता। यह बस एक स्त्री विरोधी आक्रामक सांस्कृतिक औजार है। 



विश्लेषण में काव्यात्मक अमूर्तन रचनाकार को पतली गली से निकल लेने का मौका देता है और आलोचक को यह अवसर देता है कि वह (1) रचनाकार का कोपभाजन न बने और (2) अवसरानुसार, अपनी बात का मनमाना भाष्य कर सके और करवा सके। आप चिन्ता न करें, ठोक वस्तुपरक विश्लेषण से निराला, शमशेर, मुक्तिबोध का वस्तुपरक मूल्यांकन (जो प्रायः सकारात्मक ही होगा) ही होगा, कुछ बिगड़ेगा नहीं। पाब्लो नेरुदा की कविताओं को लेकर भी आप बेकार ही चिन्तत हैं।
बहस में कातर ढंग से अपने कम ज्ञान की दुहाई का दिखावा करते हुए एक बॉक्स की टिप्पणी के जरिए कवि मदन कश्यप का टपक पड़ना भी कुछ अजीब ही लगता है। निहायत अधिभूतवादी तरीके से वे ज्ञान और तर्क को संवेदना से अलगाते हैं और डराते हैं कि कविता को यदि अंक भौतिकी की तरह हल करना चाहेंगे तो पता नहीं निराला, शमशेर और मुक्तिबोध की कितनी कविताओं का क्या होगा? यानि कविता का विश्लेषण कविता की भाषा में होना चाहिए (बतर्ज़, 'सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो') मदन कश्यप जी, कविता ही नहीं, शास्त्रीय संगीत के किसी पक्के राग या सिम्फ़नी का भी जब विश्लेषण किया जायेगा तो ठोस, वस्तुगत, विज्ञान की भाषा में ही किया जायेगा। विश्लेषण में काव्यात्मक अमूर्तन रचनाकार को पतली गली से निकल लेने का मौका देता है और आलोचक को यह अवसर देता है कि वह (1) रचनाकार का कोपभाजन न बने और (2) अवसरानुसार, अपनी बात का मनमाना भाष्य कर सके और करवा सके। आप चिन्ता न करें, ठोक वस्तुपरक विश्लेषण से निराला, शमशेर, मुक्तिबोध का वस्तुपरक मूल्यांकन (जो प्रायः सकारात्मक ही होगा) ही होगा, कुछ बिगड़ेगा नहीं। पाब्लो नेरुदा की कविताओं को लेकर भी आप बेकार ही चिन्तत हैं। प्रश्न यहाँ काम-भावना और यौन-आधारित बिम्बों का नहीं है। इनसे किसी को आपत्ति नहीं है। शालिनी की मूल आपत्ति पर गौर कीजिए। निर्वस्त्रता या यौन सम्बन्ध का चित्रण अश्लील या पोर्नोग्राफिक हो, यह ज़रूरी नहीं है। अश्लील (Indecent)* कामुक (sensual), ऐन्द्रिक (sensvous), कामोद्दीपक/रत्यात्मक (Erotic) और कामविकृति (Peruersity, perversion) में फर्क नहीं करेंगे तो कबाड़ा हो जायेगा। जो पोर्नोग्राफ़िक है वह अश्लील है, कामुक है और कामविकृत है। रत्यात्मक, स्थिति सापेक्षता के अनुसार सकारात्मक भी हो सकता है, नकारात्मक भी। और जो ऐन्द्रिकता है, वह स्वस्थ सौन्दर्यात्मक-कलात्मक मूल्य है। पाब्लो नेरुदा की कविताओं में, ज्यादातर, (हमेशा नहीं) यौनिकता, स्त्री शरीर, सम्भोग आदि के इंगित या प्रसंग स्वस्थ ऐन्द्रिकता के रूप में आते हैं और नेरुदा ही क्यों, होमर अफलातून, होरेस जुवेनाल और गोयठे से लेकर गोओर्ग वेयेर्त जैसे उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वहारा कवि तक के कृतित्व में यह स्वस्थ ऐन्द्रिकता मौजूद है। वेयेर्त के बारे में फ्रेडरिक एंगेल्स के इस विचार पर गौर कीजिए - 

"जिस चीज़ में वेयेर्त आचार्य हैं, जिसमें वह हाइने से ऊपर थे ( क्योंकि वे अधिक स्वस्थ और सच्चे थे) और जर्मन साहित्य में जिनका स्थान केवल गोयठे के एकदम बाद आता है, वह भी स्वाभाविक, स्वस्थ विषय-भोग तथा दैहिक वासना की अभिव्यक्त A Sozial-demokrat के बहुत से पाठक सहमे रह जायेंगे, अगर मैं Neue Rheinische Zeitung से कुछ व्यंग लेख पुनः मुद्रित कर दूँ परन्तु मैं इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता। परन्तु यह टीका किये बिना नहीं रह सकता कि जर्मन समाजवादियों के लिए वह वक़्त आना चाहिए, जब उन्हें इस अन्तिम जर्मन कूपमण्डूकीय पूर्वाग्रह को खुलेआम एक ओर फेंक देना होगा। यह झूठी निम्न-बुर्जुआ लज्जा तो गुप्त अश्लीलता के लिए केवल पर्दे का काम देती है। उदाहरण के लिए फ्रैलीगराथ की कविताओं को पढ़ते समय सचमुच यह सोचा जा सकता है कि लोगों के पास यौनांग ही नहीं हैं। परन्तु चुपके से कोई मसालेदार चुटकुला सुनने में किसी को इतना मज़ा नहीं आता था, जितना काव्य में इस घोर सतित्वधर्मी फैलीगराथ को। अन्ततः समय आ गया है कि कम से कम जर्मन मज़दूर इसके बारे में, जो वे स्वयं दिन या रात को करते हैं, प्राकृतिक, अपरिहार्य तथा निरपवाद रूप से आनन्दयोग्य चीज़ों के बारे मे उतनी ही स्पष्टता के साथ बातें करें, जितनी स्पष्टता के साथ रोमान्सभाषी जनगण करते हैं, तथा होमर और अफ़लातून, होरेस तथा जुवेनाल, पुरानी इंजील तथा Neue Rheinische Zeitung ने की।" 
                                                   (मार्क्स-एंगेल्स - 'साहित्य और कला', राहुल फाउण्डेशन, पृ-375) 



पवन करण और अनामिका की कविताएँ स्वाभाविक-स्वस्थ ऐन्द्रिकता और नैसर्गिक काम भावना की कविताएँ नहीं हैं। ये यौन-उत्पीड़न की विद्रोही प्रतिक्रिया या स्त्री के वस्तुकरण के प्रतिरोध की कविताएँ नहीं हैं। ये मनोरोगी और कामविकृत कविताएँ हैं जो ब्रेस्ट कैंसर के बहाने ब्रेस्ट पर रुग्ण उद्दीपक विमर्श प्रस्तुत करती हैं। एक जगह मर्द के शहद के छत्तों दशहरी आमों की जोड़ी में से एक खो गया, अमानत में खयानत हो गया है, दुखी क्षणों का शरण्य छिन गया है और स्त्री भी उदास है जिसके बारे में बातें सुनकर वह बौराती थी, आइने में जिसे देखकर झूमती थी और दोनों एक साथ अपने प्रेमी के मुँह में भर देने की सोचती थी , उसके देह से उनमें से एक के हट जाने से कितना कुछ हट गया है उनके बीच से। अन्त की कारुणिकता यदि मर्द-मानस पर चोट भी हो, तो भी यह तिनके की ओट बेकार है। पूरी कविता में प्याररत स्त्री भी अपने को लजीज़ गोश्त का टुकड़ा ही समझती रही है और मूल बात है कैंसर जैसे प्रसंग में एक बेरहम कामुक अंग-वर्णन और अनामिका की कविता में उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में लगे जालों, पहाड़ों में छिपी मौत की चुहिया, सर्जनी के प्लेट में खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से खिलन्दड़ा संवाद, दस बरस से पीछे पड़े बुलबुलों का फूटना, ब्लाउज के छिपे तकलीफ़ों के हीरों को निकाल बाहर करना- यह सारा कुछ एक मनोरुग्ण प्रलाप-सा लगता है। दरअसल, एक जबर्दस्त साहसी नारीवादी कविता गढ़ने के चक्कर में अनामिका ने न सिर्फ़ अन्तरविरोधी रूपकों-बिम्बों का जंगल खड़ा कर दिया है, बल्कि एक बेहद संवेदनहीन, असौन्दर्यात्मक, आत्मिक रूप से कंगाल 'सिंथेटिक' कविता बना डाली है। यहाँ भी उनका उत्तर-आधुनिक लोकवाद उपस्थित है। दूध भी वे दुनिया की सारी स्मृतियों को पिलाती हैं। स्मृतियाँ अतीत और परम्पराओं से जुड़ती हैं। कोई भविष्य-स्वप्न नहीं है उनके पास दूध पिलाने के लिए। राहत देने के लिए अन्तिम शरण्य फिर स्मृतियाँ ही हैं। इन कविताओं पर मेरी स्थिति कुल मिलाकर शालिनी माथुर, प्रभु जोशी, राहुल ब्रजमोहन और दरबारी लाल ('समयान्तर', सितम्बर, 2012) के साथ है, हालांकि मेरी और इन सभी टिप्पणीकारों की विचारधारात्मक अवस्थितियाँ अलग-अलग हैं। 


इन कविताओं और इनके (विशेषकर वामपन्थी पैराकारों के) तर्कों-वितर्कों को आज के उस देशकाल के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाना चाहिए जब चतुर्दिक पुरोगामी प्रवृत्तियों पर प्रतिगामी प्रवृत्तियाँ हावी हैं, यथास्थिति का ठहराव सड़ान्ध पैदा कर रहा है, मुक्ति की हर परियोजना को वर्चस्वकारी यूटोपिया बताकर खारिज किया जा रहा है, साहित्य में वामपन्थ के दायरे में भी नवरूपवादी क्रीड़ा-किल्लोल हो रहे हैं, अस्मिताओं के स्वयंस्फूर्त संघर्षों का महिमामण्डन हो रहा है, सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों को दृष्टओझल किया जा रहा है, "लोकवाद" के नाम पर प्राक आधुनिक व्यामोह परोसे जा रहे हैं, खाया-पिया-अघाया महानगरीय बौद्धिक समुदाय जनाकांक्षाओं के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है, अकर्मक विमर्श और खिलन्दड़ा सृजन कर्म हो रहा है। ऐसे में, व्यापक स्त्री समुदाय के जीवन, संघर्ष और स्वप्नों से कोसों दूर ऐश्वर्य द्वीप की निवासिनी विश्वविद्यालयी विदुषियाँ स्त्री देह में स्त्री प्रश्न का कीलन कर रही हैं, पाखण्डपूर्ण बुद्धिविलास कर रही हैं और साथ ही, "रसिक-जनों" का काफी मनोरंजन भी कर रही हैं। और जहाँ तक आज के उदीयमान-प्रतिभावान, प्रशंसित-पुरस्कृत, ज्यादातर वामपन्थी (वैसे आजकल वाम दक्षिण में और दक्षिण वाम में प्रतिष्ठित हो रहा है) युवा कवियों का सवाल है, अपने जीवन और कृतित्व में स्त्री को लेकर वे कितने "उग्र मुक्तिकामी" और "परम्पराभंजक" हैं, यह हिन्दी साहित्य प्रदेश के सुधी नागरिकगण जानते ही होंगे। 
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डी-68, निराला नगर, लखनऊ-226020 
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शुक्रवार, 15 जून 2012

व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि : शालिनी माथुर

57 टिप्पणियाँ



समकालीन स्त्रीकविता व कवितादृष्टि पर एक खरा खरा अद्भुत लेख 
जो आप को अंत तक बाँधे रखेगा और नई दृष्टि देगा 


`कथादेश' के जून अंक में शालिनी माथुर का एक अत्यंत विचारोत्तेजक व समकालीन कविता को प्रचलित अर्थों से इतर देखने की दृष्टि से सम्पन्न आलेख प्रकाशित हुआ है। Ashutosh Kumar जी द्वारा यह लिखने पर  कि " कथादेश के जून अंक में शालिनी माथुर ने गज़ब का लेख लिखा है. कविता की 'व्याधि' पर .निवेदन है कि इसे दूसरे दस काम छोड़ कर पढ़ा जाए . पवन करण और अनामिका अपनी स्त्रीवादी चेतना के लिए चर्चित रही हैं . लेकिन माथुर तर्क करती हैं कि उन की कवितायें न केवल स्त्री विरोधी हैं ,बल्कि सब से आपराधिक अर्थों में पोर्नोग्राफिक हैं. किसी भी रूप में उन की बहस नैतिकतावादी या अंध -अस्मितावादी नहीं है , न कविता के प्रति बेवजह कठोर .इस लेख पर चर्चाओं का तूफ़ान उठना चाहिए",  इस लेख को पढ़ने की उत्कंठा थी।


`कथादेश' यद्यपि ऑनलाईन उपलब्ध हुआ करता था किन्तु सितंबर 2011 के बाद से साईट पर अद्यतन नहीं हुआ है अतः पढ़ पाना संभव न था। अंततः कल कृतिदेव फॉन्ट में यह आलेख उपलब्ध हुआ। वैचारिक लेखन , स्त्रीविमर्श और कविता तथा आलोचना में रुचि रखने वालों के लिए उक्त आलेख को कल यूनिकोडित किया है। 


सच में आलेख पठनीय और विचारणीय है। विवश करता है, उस आलोचना और चलन के चीरफाड़ की भी जो विमर्श के नाम या अपने पराए के नाम पर मीमांसा को दरकिनार किए है। एक बेहद आवश्यक और रेखांकित करने योग्य आलेख। 


आवश्यक नहीं है कि सहमत असहमत हुआ ही जाए। हाँ, पढिए अवश्य ; और इस बहाने कविता की समकालीन आलोचना और दृष्टियों पर चर्चा भी अवश्य की जानी अनिवार्य है। अपने विचार देना न भूलें। 

- कविता वाचक्नवी
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व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि
शालिनी माथुर




साहित्य का कोई प्रयोजन तो होता ही होगा, लोकसंग्रह ,आत्माभिव्यक्ति, संस्कृति को समृद्ध करना या फिर हिन्दी की फ़िल्म डर्टी पिक्चर  की भांति एन्टरटेन्मेन्ट, एन्टरटेन्मेन्ट एंड एन्टरटेन्मेन्ट। कविता करने वालों को कहानीकारों , नाटककारों, और निबन्धकारों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता है। कविता भाव प्रधान हो सकती है, भावना प्रधान हो सकती है, अर्थवान् भी और निरर्थक भी । कविता एब्सर्ड भी होती है पर कविता को कुछ न कुछ तो निरूपित करना होगा चाहे वह निरर्थकता या एब्सर्डिटी ही क्यों न हो। कविता ने शिल्प के अनुशासन से तो स्वयं को मुक्त कर लिया है- न छंद , न लय, न अलंकार, न छवियाँ, न बिम्ब। कविता अब गाई भी नहीं जाती, पढ़ ली जाती है। तो क्या पढ़ कर समझी भी न जाए ? पाठक कविता से क्या अपेक्षा करे ? खास कर जब कवि कवयित्री स्वयं को नारीवाद जैसे मानवीय विषय का प्रवक्ता बताते हुए अमानवीय रचनाएँ करें, निरन्तर करते रहें और  करते ही चले जाएँ। वे व्याधि पर कविता करें, इस चेतना के बग़ैर कि व्याधि से जूझ रहे मानव समाज को कैसा लगता होगा?



     बीमारी एक खास किस्म का रूपक बनाती है- अंधता, हैज़ा, कुष्ठ, प्लेग, टी0बी0, कैंसर और अब एड्स। अबे अंधा है क्या, कोढ़ की तरह सड़ना, प्लेग की तरह फैलना, टी0बी0  या राजरोग से गलना, कैंसर की तरह जड़ जमाना यह सारे शब्द और मुहावरे मनुष्य  की हृदयहीनता प्रदर्शित करते है। बातचीत और बतकहियों में रोग को मुहावरे की तरह इस्तेमाल करना एक प्रकार की क्रूरता है जिसे लोग बिना विचारे करते रहते हैं। सूसन सॉन्टैग जो स्वयं कैंसर से पीड़ित होकर इलाज से ठीक हुई थीं अपनी पुस्तक `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' में कहती है कि ऐसे प्रयोगों से रोग ही नहीं रोगी भी कलंकित होता है । वह निरूत्साहित हो जाता है , चुप्पी साध लेता है और शर्मिन्दा हो कर इलाज कराने से झिझकने लगता है। व्याधि को रूपक बनाते ही हम व्याधि को ख़तरनाक और असाध्य बना देते हैं। इससे रोगियों का एक अलग वर्ग तैयार हो जाता है- आइसोलेटेड - अलग-थलग अपने कर्मों का फल भोगते हुए, अपने अंत की प्रतीक्षा करते हुए।



     सूसन सॉन्टैग  का लेख `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' 1978 में छपा और बहुत चर्चित हुआ। स्वयं कैंसर का इलाज करवाते समय उन्होंने पाया कि किस प्रकार बीमारी को रूपकों और मिथकों से जोड़ने से उत्पन्न मानसिक दबाव अनेक मरीजों की मौत का कारण बनता है। वे कहती हैं कैंसर केवल एक बीमारी है- (जस्ट अ डिज़ीज) अभिशाप नहीं, सज़ा नहीं, शर्मिन्दगी नहीं। इसका इलाज हो जाए तो यह ठीक हो जाता है।



साहित्य में क्या स्त्री दृष्टि  और पुरुष दृष्टि  अलग-अलग होती होगी ? यह प्रश्न अक्सर हमारे सामने आ खड़ा होता है। आज स्तन के कैंसर पर लिखी गई पवन करण की कविता ’स्तन’ और अनामिका की कविता ‘ब्रेस्ट कैंसर’ की समीक्षा करते समय उत्तर ढूंढ़ने का प्रयास कर लेते हैं। क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से अलग है? क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से इसलिए अलग होनी चाहिए, क्योंकि अनामिका स्त्री हैं ? क्या पुरुष के पास  पुरुष दृष्टि  और स्त्री के पास स्त्री दृष्टि होती है? या कवि चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो, दृष्टियाँ दो प्रकार की होती हैं मर्दवादी और नारीवादी, या फिर मानवीय और अमानवीय।



  स्त्री का वक्षस्थल पुरुष कवियों का प्रिय विषय रहा है। उसका वर्णन सामान्यतः सौन्दर्य वर्णन के लिए  शृंगारिक भाव से किया जाता रहा है। स्त्री शरीर के उतार-चढ़ावों को निरूपित करने के लिए अनेक उपमाएँ दी जाती रहीं हैं। क्या किसी पुरुष ने अपने किसी अंग के बारे में इस प्रकार का वर्णन या निरूपण किया है? शायद नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ ही वर्ष पूर्व तक कविता लेखन पूरी तरह पुरुष वर्चस्व के अधीन था पर आज हमारे सामने जो कविताएँ हैं वे इसी सदी में लिखी गई हैं। ये कविताएँ उन समयों में लिखी गई हैं जिन समयों में जॉन स्टुअर्ट मिल और मैरी वोल्टसन क्राफ्ट स्वतंत्रता तथा स्त्री-पुरुष समकक्षता के सिद्धान्त प्रतिपादित कर चुके थे। ये कविताएँ घोषित रूप से स्वयं को स्त्री का पक्षधर कहने वाले नारीवादी कवियों की हैं। ये स़्त्री के ‘ब्रेस्ट कैंसर’ पर लिखी गई कविताएँ हैं।


इस विषय पर द ब्यूटी मिथ में नाओमी वुल्फ़ ने गम्भीर चर्चा की है। वे बताती हैं कि किस प्रकार पुरुष के शरीर के नग्न निरूपण को अश्लील समझा जाता है और उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है चाहे वह एड्स जैसी बीमारियों के विषय में जागरूकता हेतु ही क्यों न किया गया हो, और किस प्रकार स्त्री के वक्षस्थल का सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शन के लिए प्रयोग होता रहा है, कभी विज्ञापन के रूप में, कभी फिल्म के रूप में, कभी गीतों के रूप में । इस प्रकार पुरुष का शरीर बेहद सम्भ्रान्त तरीक़े से ढका रहता है जिससे वह शालीन बना रहता है,  और स्त्री का शरीर और उसकी चोली विज्ञापन और पर्दे पर थिरकती रहती है , जिससे उसका शरीर बाज़ारू बनता है। जो संस्कृतियाँ स्त्रियों को सामान्यतः नग्न निरूपित करती हैं और पुरुष को नहीं, वे लगातार धीरे-धीरे असमानता सिखाती हैं।


भारत में भी राई नर्तकियाँ, बेड़िनें और नौटंकी में नाचने वाली ग़रीब औरतें भी अपने चेहरे पर घूँघट ढककर और छाती खोलकर दो पैसों की ख़ातिर नाचती रही हैं और बेशऊर मर्द उन पर चवन्नियाँ लुटाते रहे हैं। नौटंकी देखने औरतें नहीं आतीं-नौटंकी  मर्दां का तमाशा है। इन बेचेहरा औरतों की कोई पहचान नहीं। वे औरत ज़ात हैं, उनका वक्षस्थल ही उनकी पहचान है। चवन्नी उसी पर  न्योछावर की जाती है।


पवन करण ने भी इसी विषय  पर कविता लिखी है, कविता का शीर्षक  है ’स्तन’

  "इच्छा होती तब वह धंसा लेता उनके बीच अपना सिर ... /   और तब तक उन पर आंखें गड़ाये रखता,  जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से /  ....या लजा कर अपने हाथों से छुपा नहीं लेती उन्हें... अंतरंग क्षणों में उन दोनों को हाथों में थाम कर उससे कहता/ यह दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियॉ/ इन्हें संभाल कर रखना/ वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता/“ ... ”वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के / इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती “....“मगर रोग ऐसा घुसा उसके भीतर/ कि उनमें से एक को ले कर  ही हटा देह से। कोई उपाय भी न था सिवा इसके/ उपचार ने उदास होते हुए समझाया/... अब वह इस बचे हुए एक के बारे में/ कुछ नहीं कहता उससे, / वह उसकी तरफ देखता है।/ और रह जाता है कसमसा कर। /.... मगर उसे हर समय महसूस होता है।/ उसकी देह पर घूमते उसके हाथ।/ क्या ढूंढ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” ...."उस खो चुके एक के बारे में भले ही एक दूसरे से न कहते हों वह कुछ, मगर वह विवश जानती है/उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से।"


      कवि पवन करण उक्त गद्यात्मक पंक्तियों को स्तन शीर्षक वाली कविता के रूप में ’स्त्री मेरे भीतर’ नामक संग्रह में संग्रहीत करते हैं।



    पवन करण की कविता में स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है, पुरुष के रमण के लिए, देखें वह स्त्री देह के लिए किस प्रकार के उपमान प्रयोग करते हैं-  "वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/ तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता"। पवन करण की कविता स्त्री देह को गोश्त  के टुकड़े के रूप में निरूपित करती है जिसे पुरुष लालची निगाहों से देखता है "और तब तक उन पर आँखें गड़ाये रखता, जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से"।  पवन करण की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है "वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के /  इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती"।


पोर्नोग्राफर शरीर को मनविहीन, हृदयविहीन वस्तु के रूप में निरूपित करता है आत्मीयता (इंटिमेसी) और सम्बन्ध (कनेक्शन) रहित। (सूसन ग्रिफिन) पवन करण की एक यही कविता नहीं अधिकांश कविताएँ पोर्नाग्राफी की श्रेणी में आती है क्योंकि उनमें शरीर (बाडी) को मन(माइंड) से अलग करके देखा गया है तथा स्त्री शरीर को पुरुष के अधिपत्य की भूमि माना गया है। पवन करण के पुरुष के हाथों में स्त्री शरीर ही नहीं उसके अलग-अलग अंग एक खिलौना हैं।


कविता में निरूपित पुरुष स्त्री को केवल देह के रूप में ही नहीं देह के केवल रमणीय अंगों के रूप में देख सका।  देह भी ऐसी जो कैंसर से ग्रस्त है, कैंसर  भी ऐसा जिससे शरीर का पूरा एक अंग काट कर निकालना पड़ा। दुःखद तो यह है कि कविता का समर्पण नाम लेकर किया गया, "संगीता रंजन के लिए जिसे छाती के कैंसर के कारण अपना एक स्तन गंवाना पड़ा।"  सभ्य समाज में एक आँखवाले, एक टाँगवाले, एक हाथवाले व्यक्ति की विकलांगता को द्योतित करने वाले शब्द कहना उचित नहीं समझा जाता, वहाँ स्त्री के एक ब्रेस्ट को कैंसर के कारण काट दिये जाने पर ऐसी कविता लिखी गई और नाम लेकर व्याधिग्रस्त स्त्री को समर्पित की गई ।


    स्त्री पुरुष से हीनतर है, वह पुरुष के अधीन है, इस बात को पोर्नोग्राफ़र इतनी बार कहता है कि लोग इस बात पर यकीन करने लगते हैं। (सूसन ग्रिफ़िन ) पवन करण की स्त्री भी अपने शरीर को पुरुष की दृष्टि से देखती है। वह आब्जेक्टिफ़ाइड है (वस्तुकृत), कंट्रोल्ड (विवश) और ह्यूमिलिएटेड (अपमानित) कि उसे कैंसर से मरने से बचने के लिए स्तन गंवाना पड़ा। "उस खो चुके एक के बारे में भले ही/ एक दूसरे से न कहते हो वह कुछ/ मगर वह विवश जानती है/ उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से "। स्त्री विवश है, पोर्नाग्राफी की क्लासिकल स्त्री छवि ।

         
पवन करण के पुरुष को इस बात का संतोष नहीं कि सर्जरी से उसकी सहचरी को जीवन के कई नए वर्ष मिल गए। मगर उसे हर समय महसूस होता है। उसकी देह पर घूमते उसके हाथ/क्या ढूँढ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” पवन करण को संदेह का लाभ दें तब भी पाएँगे कि कवि की सहानुभूति स्त्री के नहीं पुरुष के प्रति है जिसका खिलौना शल्य चिकित्सा से कट गया। पुरुष  के पास शरीर भी है और मन भी क्योंकि खिलौना टूट जाने से उसका मन मायूस है और हाथ भी। पवन करण कहते हैं कि शरीर के विरूपित हो जाने से स्त्री को हानि हो न हो पुरुष को होती है क्यों कि वह स्त्री शरीर से उस तरह से नहीं खेल सकता जिस तरह खेलना चाहता है और पुरुष यदि स्त्री में रुचि लेना बंद कर दे तो स्त्री का जीवन निरर्थक है क्यों कि स्त्री की प्रसन्नता इसी में है कि पुरुष का हाथ उसकी देह से खेले।



"पोर्नोग्राफर स्त्री की हीनता ( इन्फीरियोरिटी ) में पूरा यकीन रखता है। वह इस बात में इतना गहरा विश्वास  रखता है कि वह इसे सिद्धान्त ( डॉक्ट्रिन ) के रूप में नहीं कहता। वह इसे एक सच्चे तथ्य (फैक्ट) के रूप में कहता है। वह यह नहीं कहता कि मुझे यह कहना है कि स्त्री हीन होती है। स्त्री कमतर है, सामान्यतः इस बात को वह इतनी  बार कहता जाता है- इशारों से, और वाक्यों से, कि इस प्रश्न पर बहस की कोई गुंजायश ही नहीं रह जाती।’’ (सूसन ग्रिफिन) उक्त परिभाषा  पर पवन करण शत प्रतिशत सही उतरते हैं।
                  

      पवन करण अपवाद को नियम के रूप में स्थापित करते हैं। उनकी कविता दुःख क्षोभ या खेद से नहीं लिखी गई है, न ही ऐसा सोचने वाले पुरुष के प्रति हिकारत से। वह कविता यकीन के साथ लिखी गई है। पाठक देख सकते है कि पवन करण यह नहीं मानते कि स्त्री को इस रूप में देखना गलत है, उन्हें यकीन है कि स्त्री शरीर की यही उपयोगिता है। संभव है डेविल्ज़ एडवोकेट बन कर कोई कहे कि कुछ पुरुषों  की यही धारणा होती होगी,  परन्तु यूँ तो कुछ पुरुष  पेडोफ़ैलिक भी होते हैं। क्या हम उन मानसिक व्याधिग्रस्त पुरुषों को छोटे बच्चों का यौनिक और कामुकतापूर्ण नखशिख वर्णन करने की अनुमति देंगे और पुरस्कृत करेंगे?



पोर्नोग्राफर डिटर्मिनिस्टिक होते हैं, वे सोचते हैं, ठीक है, लोग ऐसे ही होते हैं, और हम उन्हें वह ही दे रहे हैं जो वे चाहते हैं पर यह सच नहीं है। सच यह है कि संस्कृति का निर्माण हम स्वयं करते है। (सूसन ग्रिफ़िन) । पवन करण के पात्र कीचड़ से सने हैं और यह  कीचड़ भी उन्होंने खुद ही तैयार किया है। शल्य क्रिया के बाद एक स्तन वाली स्त्री पवन करण के पुरुष का प्रेम नहीं पा सकती। पवन करण की स्त्री पुरुष के हाथों विवश है और अपमानित, उस पुरूष  के हाथों, जो उसके शरीर का मालिक था। पोर्नोग्राफी का मकसद है- दूसरे के शरीर पर कब्ज़ा (मास्ट्री ऑफ़ दीज़ अदर्स) ।


पवन करण की इस कविता को वीभत्स कहना भी वीभत्स रस का अपमान करना है क्योंकि वीभत्स भी एक रस है जो सामान्यीकृत हो कर पाठकों तक पहुँचता है। पोर्नोग्राफी में नग्नता और पीड़ा पहुँचाना शामिल हो यह ज़रूरी नहीं। उनकी कविता हृदयहीन और अमानवीय है, जिसमें स्त्री  विवश, वस्तुकृत और अपमानित है। यह पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचना है- हैवानियत से भरी। (मैं पाशविकता की जगह हैवानियत शब्द का प्रयोग कर रही हूँ, चूंकि पशु जगत में ऐसी नृशंसता अकल्पनीय है।)  


         इसी वर्ष 2012 में प्रतिष्ठित साहित्यकार और नारीवादी चिंतक एड्रियन रिच का निधन हो गया। 1880 में लिखे अपने लेख ’’ कम्पलसरी हेट्रोसेक्सुअलिटी एंड लेस्बियन एक्ज़िस्टेंस’’ में वे पितृसत्ता  को पुरुष द्वारा स्त्री के शरीर, पैसे और भावना पर आधिपत्य (मेल राइट ऑफ फ़िज़िकल, इकोनामिक एंड इमोशनल एक्सेस टु वुमन) स्थापित करने का एक हिंसक राजनीतिक उपकरण सिद्ध करती हैं । पवन करण कहते हैं  "उन दोनों को हाथों में थामकर उससे कहता / ये दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियाँ / इन्हें संभाल कर रखना।’’  स्त्री का वक्षस्थल स्त्री के अंग है या पुरुष की अमानत और आधिपत्य क्षेत्र?  एड्रियन रिच ने विस्तार से विचार किया है कि किस प्रकार मर्दवादी विवरणों और छवियों के कारण स्त्रियाँ स्वयं अपने ही शरीर को अपनी दृष्टि से देख पाने में असमर्थ रहती हैं।


       उधर पत्रिका पाखी के फरवरी 2012 के स्त्री लेखन विशेषांक  में ‘‘हिन्दी की समकालीन कवयित्रियों  में  शीर्ष  पर विराजमान ’’ कवयित्री अनामिका की कविता प्रकाशित हुई है, ब्रेस्ट कैंसर। वे कहती हैं-

 :दुनिया की सारी स्मृतियों को / दूध पिलाया मैंने, / हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!, तब जाकर / मेरे इन उन्नत पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  / जाले लगे! कहते हैं महावैद्य / खा रहे हैं मुझको ये जाले / और मौत की चुहिया / मेरे पहाड़ों में / इस तरह छिप कर बैठी है कि यह निकलेगी तभी जब पहाड़ खोदेगा कोई! निकलेगी चुहिया तो देखूँगी मैं भी, सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहूँगी - हलो कहो कैसी रही ? अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! दस बरस की उम्र से तुम मेरे पीछे पड़े थे, /  अंग संग मेरे लगे ऐसे, दूभर हुआ सड़क पर चलना ! बुलबुले अच्छा हुआ फूटे! कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम से बाहर! / मेरे ब्लाउज़ में छिपे मेरी तकलीफों के हीरे, हलो / कहो कैसे हो?" 

“जैसे निर्मूल आशंका  के सताए / एक कोख के जाए / तोड़ लेते हैं सम्बन्ध / और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है! / जाने दो जो होता है सो होता है, मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया, /  दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैने! / , हाँ,  बहा दीं दूध की नदियाँ! / तब जाकर / जाले लगे मेरे इन उन्नत  पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  ! / लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”


कवयित्री ने यह कविता उत्तमपुरुष (फर्स्ट पर्सन) यानी "मैं’’ इस्तेमाल करते हुए लिखी है, यद्यपि कविता किसी अन्य स्त्री की व्याधि पर लिखी गई है और उन्हीं वनिता टोपो को निवेदित की  है।



ब्रेस्ट कैंसर शीर्षकवाली कविता में ब्रेस्ट के लिए "उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं’’ वाला उपमान कितना उपयुक्त है? पहाड़ों और गुफाओं का दूध से तो दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध है ही नहीं पर क्या व्याधिग्रस्त अंगों के लिए सौन्दर्य वर्णन के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपमानों का प्रयोग उचित प्रतीत हो रहा है? उत्तम पुरुष में लिखी इस कविता में, मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं का प्रयोग स्त्री द्वारा स्वयं अपना नखशिख वर्णन करने के लिए किया गया है। हमें याद होगा कि एक राज्य की भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने स्वयं अपनी ही मूर्तियाँ बनवाकर, स्वयं उनका अनावरण किया था। हिन्दी की इस कविता में स्त्री स्वयं अपनी देह के सौन्दर्य का वर्णन करके अपनी देह को स्वयं ही अनावृत्त कर रही है। यहाँ प्रश्न अनावरण का नहीं निरूपण का है।



         अश्लीलता निर्वस्त्रता में नहीं होती। सड़क पर पत्थर फोड़ती हुई स्त्री जब बच्चे को सार्वजनिक स्थान पर दूध पिलाती है, कभी-कभी मध्य तथा उच्च आय वर्ग की स्त्री भी बस या ट्रेन में ऐसा करती देखी जा सकती हैं, तब अश्लीलता का अहसास नहीं होता पर जब कोई स्त्री बेध्यानी का अभिनय करती हुई जान-बूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती है, और ध्यान से चारों ओर देखती है कि सबने उसे ध्यान से देखा या नहीं तब वह अश्लील हरकत कर रही होती है। लम्पट पुरुष  इस हरकत पर मस्त हो सकते हैं पर ऐसा करते समय वह उन स्त्रियों को भी निर्वस्त्र कर रही होती है जो निर्वस्त्र नहीं होना चाहतीं। ठीक उसी तरह जिस तरह पोस्टर पर बनी नग्न और अपमानित स्त्री की छवि वहाँ से गुज़रने वाली हर स्त्री को नग्न अनुभव कराती है। इसमें पूरी स्त्री जाति के वे सदस्य भी नग्न हो जाते हैं जो नग्न नहीं होना चाहते ।


       कवयित्री ‘‘संसार की स्मृतियों को दूध पिलाया’’, ‘‘बहा दीं दूध की नदियाँ’’, पदों का प्रयोग करती हैं। संसार की स्मृतियों का ब्रेस्ट कैंसर नामक व्याधि से क्या लेना देना? `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' नामक पुस्तक में इस विषय पर गहन चिन्तन है। चिकित्सक इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि इस व्याधि का इंसान के व्यक्तित्व से कोई ताल्लुक नहीं है, न स्वभाव से न स्मृति से । यह व्याधि नवजात शिशुओं तक को हो जाती है। यदि स्मृतियों का कोई अर्थ लगाना भी चाहें तो कह सकते हैं कि स्मृतियों  को वक्षस्थल में सहेजा जा सकता है, पर तब वक्षस्थल का अर्थ मन होता है। यहाँ पर कवयित्री मन नहीं स्तन के बारे में बात कर रही हैं।



     इसके बाद का पद है "तब जाकर’’। हम लोग हिन्दी भाषा  में कहते हैं, "हमने कटरा से तेरह किलोमीटर चढ़ाई की तब जाकर वैष्णों  देवी के दर्शन  हुए’’, "पार्वती ने पर्वत पर वर्षों तप किया तब जाकर शिव जैसा पति पाया’’, "सिद्धार्थ ने वर्षों तक साधना की तब जाकर ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए ’’, या "मैं रिज़र्वेशन कराने के लिए `वृद्धों विकलांगों तथा महिलाओं ’ वाली टिकट खिड़की के सामने एक घंटा पंक्ति में खड़ी रही तब जाकर रेल का टिकट मिला’’। स्पष्ट है ' तब जाकर ’ पद का प्रयोग तब किया जाता है जब हम किसी वस्तु या अवस्था को प्राप्त करना चाहें और उसके लिए कठिन प्रयास करें `तब जाकर’ वह वस्तु या अवस्था प्राप्त हो। अनामिका अपनी कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों में कहती हैं, "बहा दीं दूध की नदियाँ तब जाकर मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में जाले लगे" और यही रूपक आरम्भ से अन्त तक चलता रहता है।


वे फैले हुए कैंसर के लिए जाले लगने का रूपक इस्तेमाल करती हैं। क्या वे जाले लगवाना चाहती थीं ? क्या वे जाले लगवाने के लिए प्रयासरत थीं ‘‘मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया,’’ ? दृष्टव्य  है वे किसी छोटी-मोटी बीमारी या दुःख-दर्द की बात नहीं कर रहीं, वे कैंसर की बात कर रहीं हैं, वैसा कैंसर जो इतना फैल चुका हो कि पूरा अंग काटकर शरीर से अलग करना पडे़। व्याधि यथार्थ होती है रूपक नहीं।



वे निर्मूल आशंका पद का प्रयोग करती हैं, जैसे दो भाई निर्मूल आशंका से पुराना सम्बन्ध तोड़ लेते है वैसे ही स्त्री ने अपने स्तनों से सम्बन्ध तोड़ लिया। कैंसर के पूरी तरह फैल जाने के बाद ही ऐसी सर्जरी होती है। डाक्टर किसी भी अंग का रिमूवल तभी करता है जब और कोई उपाय नहीं रहता। ऐसी सर्जरी निर्मूल आशंका से नहीं होती।


     प्रसिद्ध कहानीकार मार्क ट्वेन का कथन है कि शब्द के सही प्रयोग (करेक्ट यूज़) और लगभग सही प्रयोग (आलमोस्ट करेक्ट यूज़) के बीच उतना ही बड़ा अन्तर है जितना आसमान में कड़कने वाली बिजली और जुगनू में। उन्नत पहाड़, नन्हें पहाड़, तकलीफों के हीरे, मौत की चुहिया, बुलबुले, शरीर के एक ही अंग के लिये इतने सारे परस्पर विरोधाभासी उपमान? “स्मृतियों को दूध पिलाया,’’ "तब जाकर जाले लगे’’, ‘‘लगे तो लगे’’ ’’दूधों नहाए पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ’’ यह सब पदों और शब्दों का सही प्रयोग है या लगभग सही प्रयोग? ’’



कवयित्री को इस व्याधि के ख़तरे का पूरा ज्ञान है परन्तु कवयित्री को मुहावरे इस्तेमाल करने का इतना शौक है कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया की तर्ज़ पर वे कैंसर को मौत की चुहिया बताती हैं, जिसे महावैद्य ने बाहर निकाला। वे यह भूल जाती कि महावैद्य ने जिन्हें बाहर निकाला वह चुहिया नहीं थी पूरे पहाड़ ही थे जिनमें जाले लग गये थे। वे यह भी भूल गर्इं कि जिन्हें वे उन्नत पहाड़ बता रही थीं, उन्हें वे सर्जरी की प्लेट में रखे नन्हें पहाड़ कहने लगीं जबकि सामान्य व्यक्ति भी जानता है कि शरीर से बाहर निकाल दिए जाने पर शरीर के अंग कई गुना बड़े दिखाई देते हैं क्योंकि वातावरण के प्रभाव से वे फूल जाते हैं।


मेरा उद्देश्य चीरफाड़ पर लिखी गई कविता की चीरफाड़ करना नहीं है,  मेरा उद्देश्य इस ओर संकेत करना है कि अपने समय की सबसे ख़तरनाक बीमारी पर इतनी निर्दयता, क्रूरता और संवेदनहीनता से खिलवाड़ करती हुई कविता लिखते हुए एक कवयित्री को ज़रा भी संकोच का अनुभव नहीं हुआ ।



अंग्रेज़ी के प्रख्यात कवि कीट्स की टी0बी0 के कारण हुई मौत इतनी रोमांटिक मानी गई, कि अनेक लोग जवानी में वैसी मौत पाने की चाहत करने लगे। पच्चीस वर्ष की आयु में वास्तविक जीवन में व्याधि और मौत दर्दनाक होती है। तब टी0बी असाध्य रोग था। दर्द की असहनीयता के कारण कीट्स अफी़म खाते थे। मरने से कुछ पहले तो उन्होंने अफ़ीम की पूरी बोतल मंगा ली थी और उनके मित्र को भय लगने लगा था कि दर्द से छुटकारा पाने के लिए वे कहीं पूरी बोतल खा कर खुदखुशी न कर लें। कीट्स को अपने जीवन की क्षण भंगुरता का दुःख था, उन्हें अपनी बीमारी से तकलीफ़ थी। उन्होंने अपनी समाधि के पत्थर पर लिखे जाने वाले हर्फ़ खुद ही लिखे थे, "यहाँ सो रहा है वह व्यक्ति, जिसका नाम पानी पर लिखा था’’ (हियर लाइज़ ही हूज़ नेम वाज़ रिट इन वाटर्स)। आज उमड़ने और कल मिट जाने का उन्हें दुःख था। व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। जवानी में बीमार होकर तपेदिक से मर जाना तमाशबीनों के लिए रूमानी हो सकता बीमार के लिए नहीं। मौत चुहिया नहीं होती ।



हम अनामिका की इस कविता का सहानुभूति पूर्ण पाठ करें और उन्हें इस बात का श्रेय देना भी चाहें तो नहीं दे सकते कि वे यह यह कह रही हैं कि हिंसक दृष्टिवाले पुरुषों से दस वर्ष की बच्ची भी त्रस्त है और स्त्री को अपने वक्षस्थल के कारण अपमानित और जोखिम ग्रस्त (वल्नरेबल) होना पड़ता है, इसलिए बेहतर है कि वह अंग हो ही न परन्तु वे यह नहीं कह रहीं। वे प्रारम्भ से अन्त तक वक्षस्थल का वर्णन सौन्दर्य बोधक उपमानों के साथ करती हैं और अन्त में उल्लास से भर उठती हैं ‘‘ बुलबुले अच्छा हुआ फूटे’’, कि अंग काट दिए गए तो अच्छा हुआ। शरीर के अंग का कटना दारूण दुःख होता है। क्या कोई भी स्त्री या पुरुष  अपने शरीर को कटवाना चाह सकता है, और कटवा डालना भी व्याधि से ग्रस्त होकर जिसे पाने के लिए स्त्री ने दूध की नदियाँ बहा दीं, और व्याधि भी ऐसी जो जाले की तरह फैल गई और अंग काटकर ही ठीक हो सकी क्योंकि यदि नहीं काटा जाता तो व्यक्ति की मृत्यु हो हो सकती थी। अन्तिम हृदयहीन पंक्तियाँ हैं  - "लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”। मुहावरे इस्तेमाल करने को उतावली कवयित्री यह बताना भूल गईं कि ऐसी कौन सी स्मृतियाँ है जो मन का नहीं स्तन का दूध पीती हैं । अनामिका की कविता रोगी का मनोबल बढ़ाने का केवल नाटक करती है। दरअसल अनामिका भी स्त्री शरीर को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से ही देखती हैं।



 ‘‘पोर्नोग्राफर शरीर और मन का द्वैत स्थापित करता है। पोर्नोग्राफ़र असामान्य होता है, वह स्त्री को अपने शरीर से नफ़रत करना सिखाता है।’’ (सूसन ग्रिफ़िन ) क्या कोई भी सामान्य बुद्धि वाला स्त्री पुरुष  या बच्ची-बच्चा अपने शरीर को कटवा डालने पर खुश हो सकता है? अनामिका की कविता में स्त्री बहुत खुश है, वह सर्जरी की प्लेट में रखे अपने कटे हुए अंगों से हँसकर बातें कर रही है - हलो कहो कैसी रही? पवन करण का पुरुष  स्त्री को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित कर रहा है और अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित हो रही है।


सूसन ग्रिफिन का कहना है कि पोर्नोग्राफी सैडिज्म है।  "एक औरत जब ऐसी सड़क या मुहल्ले में प्रवेश करती है जहाँ स्त्री शरीर की पोर्नोग्राफ़िक छवियाँ प्रर्दशित की गई हों, वह तुरन्त शर्मिन्दा हो जाती है। पोर्नोग्राफिक छवियों की वीथि में प्रवेश करते ही वह स्वयं ही उनमें से एक छवि हो जाती है कि वह उसका शरीर है जो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लगाया गया है। यदि वह स्वयं भी पोर्नोग्राफी में रूचि रखती है तो वह पोर्नोग्राफिक स्पेक्युलेशन का विषय बनती है। यदि वह दहशत में आ जाती है और ऐसी छवि के प्रति घृणा से विमुख हो जाती है, तो वह पोर्नोग्राफी की शिकार (विक्टिम) बन जाती है। इस प्रकार बिना अपमानित हुए वह पोर्नोग्राफी से बच नहीं सकती। इस तरह पोर्नोग्राफी सारी महिलाओं के प्रति सेडिज्म का उपकरण बनती है।’’ नाओमी वुल्फ़ भी पोर्नोग्राफी की पत्रिकाओं के सार्वजनिक पोस्टरों में पीटी जाती हुई, खून से सराबोर, हाथ-पाँव बंधी हुई स्त्री की छवियों का उदाहरण देती हैं। अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफी की  विक्टिम है।



पवनकरण और अनामिका ने व्याधि पर ही कविता नहीं लिखी हैं उन्होंने  स्तन की व्याधि पर कविता लिखी है। स्तन एग्ज़ॉटिक है। क्या वे किसी अन्य अंग के रिमूवल पर ऐसी कविता लिखते? क्या वे एम्प्यूटेशन से काटी गई टाँगों से पूछतीं कहो कैसी हो प्यारी बहनों, अच्छा हुआ कट गर्इं। क्या वे किसी बीमारी से निकाली गई आँखों की पुतलियों से पूछतीं, कैसी हो प्यारी कौड़ियों, अच्छा हुआ निकाल दी गर्इं, बहुत दुखती थीं, चश्मा पहनना पड़ता था। इन दोनों में से एक कवि की कविताएँ कदाचित् बी.ए. के पाठ्यक्रम में चलती हैं, और दूसरी कवयित्री शायद बी. ए. को पढ़ाती हैं।


एक विशेषता यह है कि पवन करण और अनामिका इन दोनों ने नाम लेकर उन स्त्रियों पर कविता लिखी है, जिनको ब्रेस्ट कैंसर हुआ। बिग बॉस नामक सबसे घटिया टी0वी0 सीरियल में ब्रिटेन की जेड गुडी आई थीं, जिन्होंने  भारतीय प्रतिभागी शिल्पा शेट्टी को डॉग (कुत्ता) कह कर तमाशा खड़ा किया था। जेड गुडी की भी कैंसर से ही मृत्यु हुई थी। उन्होंने अपनी मौत को टी0 वी0 पर प्रर्दशित करने के अधिकार बेचे थे। इन दोनों कवियों ने भी शायद इन स्त्रियों से अधिकार खरीदे होंगे। बाजा़र में बेचने के लिए बीमारी और मौत भी बहुत बड़ा तमाशा है। 



      इन कवियों ने भले ही कैंसर पीड़ित स्त्रियों से अनुमति ले ली होगी पर हजारों लाखों लोग ऐसे हैं जो इस व्याधि से जूझ रहे हैं। व्याधि लाइलाज नहीं, पर इलाज कष्टसाध्य है। इसके कारण का पता नहीं है, इसलिए इसके साथ रहस्यमयता और दहशत जुड़ी हुई है। व्याधि पर ऐसी कविता पढ़ कर हजारों पीड़ितों का मन दहशत से भर जाता है।



सिल्विया प्लाथ नामक एक महान् नारीवादी कवयित्री हुई हैं। उन्होंने एक कवि से विवाह किया। उनकी दो संताने हुई। सिल्विया प्लाथ की कविताओं को उनके जीवन काल में ही बड़ी सराहना मिली थी। बत्तीस साल की उम्र में अवसाद ग्रस्त होकर सिल्विया प्लाथ ने ओवन में अपना सिर डालकर आत्महत्या कर ली थी। जब उन पर फिल्म बनाने की पेशकश हुई, सिल्विया प्लाथ  की पुत्री इस पर बहुत व्यथित हुई और उन्होंने अपनी मृत माँ की अस्वाभाविक असामयिक मृत्यु पर फिल्म बनाने को मूँगफली चबाती हुई जनता को एक परिवार की त्रासदी पर गुदगुदाने  का गिरावट भरा प्रयास बताया। सिल्विया प्लाथ की मृत्यु के समय उनकी पुत्री फ्रीडा ह्यूज़ चार वर्ष की थी,बड़ी होकर वे कवयित्री बनीं। फ्रीडा ह्यूज़ की कविता है-

"और अब,
 वे एक फिल्म बनाना चाहते हैं,
 जिस-तिस के लिए ,
 जिसमें इतनी भी क्षमता नहीं,
 कि स्वयं कल्पना कर सकें उस शरीर की
 जिसका सिर तंदूर में पड़ा हो,
 वह शरीर जो अपने बच्चों को अनाथ छोड़ कर जा रहा हो।
 वे सोचते हैं, मैं उन्हें अपने माँ के शब्द दे दूँ,
 जिन्हें वे अपने बनाए हुए हैवान पुतले के मुँह में ठूँस सकें-
 उनकी सिल्विया- आत्मघाती कठपुतली।’’

सिल्विया प्लाथ की बेटी की कविता उन “मानवभक्षी लोगों पर प्रहार करती है जिन्हें जानने की उत्सुकता और लालसा है कि ओवन में पड़े सिरवाला" मानव कैसा लगता है- वे आत्महत्या को चित्रित करने को लालायित हैं। खतरनाक बीमारी को रूपक के रूप में प्रयोग करते हुए अंग-भंग के मरीज़ पर कविता लिखना और नाम लेकर समर्पित करना वैसा ही है।


यह आलेख नग्नता के खिलाफ नहीं है। यह आलेख स्त्री शरीर के पोर्नाग्राफिक निरूपण के खिलाफ है और व्याधि के हृदयहीन क्रूर निरूपण के खिलाफ भी। ऐसी कविताएँ पोर्नोग्राफी के उपभोक्ताओं के लिए लिखी जाती है। ऐसी कविताओं से पोर्नोग्राफी के नए-नए उपभोक्ता भी बनते हैं। यह एक फायदेमंद व्यवसाय है। 


पवन करण की कविताओं से मेरा परिचय भले ही पहली बार पिछले ही वर्ष हुआ जब मैंने उनकी पुस्तक ‘‘स्त्री मेरे भीतर’’ पढ़ी, परन्तु पुस्तक में उल्लेख है कि उन्हें अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। ‘‘स्त्री मेरे भीतर" में संग्रहीत पवन करण की एक यही कविता नहीं, अनेक अन्य कविताएँ भी पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचनाएँ  है जिनमें स्त्री विवश, वस्तूकृत और अपमानित है।



यह समय कुछ ज़रूरी सवाल उठाने का है। स्त्री के शरीर के पोर्नोग्राफिक निरूपण और व्याधि पर अनुत्तरदायित्वपूर्ण अमानवीय और क्रूर कविता के विषय में औचित्य का प्रश्न उठाना मैं ज़रूरी समझती हूँ । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या केवल कवियों के पास ही है? पाठकों के पास भी तो कोई अधिकार होंगे? मैं पाठकों के अधिकार का प्रयोग करते हुए यह प्रश्न उठा रही हूँ।



        शेयर मार्केट में एक फिनॉमिना होता है, इसमें कुछ दलाल मिलकर एक समूह बना लेते हैं जिसको कार्टेल कहते हैं। वे लोग मिलकर किसी भी बेहद घटिया कम्पनी के शेयर खरीदते जाते हैं जिससे उसका मूल्य अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। इससे घटिया कम्पनी को लाभ होता है। वे ही लोग मिलकर कम्पनियों के शेयरों के दाम अस्वाभाविक रूप से घटाते-बढ़ाते रहते हैं। कार्टेल बनाना हमारे देश में आर्थिक अपराध माना जाता है। आपको याद होगा कि केतन पारेख आदि दलाल एक बार इसी अपराध में जेल भी गए थे। कार्टेल को इस सब से भले ही लाभ होता हो पर इससे देश की अर्थव्यवस्था  नष्ट हो जाती है।


      हिन्दी के कवियों के कार्टेल ने पवन करण पर दाँव खेला है। कार्टेल के लाभ- हानि के बारे में नहीं कह सकती, पर इससे साहित्य की हानि तो हुई ही है। साहित्य में इस अपराध की कोई सज़ा नहीं। यह एक खुला खेल है। इस बाजा़र में स्त्री शरीर सबसे ज्यादा बिकाऊ चीज़ है। पर क्या व्याधियाँ भी इसमें बेची जाएँगीं ? मेरे प्रश्न स्त्री शरीर के बारे में ही नहीं व्याधि के बारे में भी हैं। ये व्याधि पर लिखी कविताएँ हैं या ये व्याधि ग्रस्त कविताएँ हैं, उन कवियों द्वारा लिखी हुई हृदयहीन कविताएँ जिन्हें कविताएँ लिखते चले जाने की व्याधि है ?


      हिन्दी साहित्य में स्त्री की इस दशा का ज़िम्मेदार कौन है?
      इस  प्रश्न के उत्तर में हमारे कवियों का कार्टेल मौन है।
                      (कवि धूमिल की कविता पर आधारित)


        व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। बीमारी की गम्भीरता, बीमारी के साथ जुड़ी तकलीफ़, असहनीय दर्द, दुर्बलता, जीर्ण होते हुए शरीर, बिस्तर पर पड़े रहने की मजबूरी, अंगों के कट जाने, शरीर के विरूपित हो जाने और अपने परिवारजनों और हमदर्दो की आँखों से बरसती सहानुभूति और उनके चेहरों पर लिखे ख़ौफ से आँकी जाती है। बीमारी को इतनी बेदर्दी बेरहमी और गै़रजिम्मेदारी से निरूपित करने वाले हिन्दी के शीर्षस्थ माने जाने वाले ये कवि कवयित्री नृशंसता की हद तक संवेदनहीन हैं।

       
अंग्रेज़ी में वश्यावृत्ति करवाने को फ़्लेश ट्रेड कहते हैं जिसमें स्त्री एक व्यक्ति न हो कर गोश्त होती है केवल गोश्त। पवन करण और अनामिका दोनों स्त्री शरीर के लिए ऐसे उपमानों और रूपक का प्रयोग करते है कि वे स्त्री को व्यक्ति की जगह फ़्लेश बना देते है। अनामिका की कविता शरीर के प्रति अनसेल्फ़कांशस बनानेवाली कविता नहीं है यह शरीर के प्रति अतिरिक्त सजगता मिटानेवाली कविता भी नहीं है। अनामिका की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है अन्तर यह है कि पवन करण की कविता की ‘‘वह विवश जानती है / उसकी देह से उस एक के हट जाने से / कितना कुछ हट गया उनके बीच से।’’ और अनामिका की कविता की स्त्री ‘‘सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहती है...अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! ’’ गोश्त का टुकड़ा हट जाने से वह उल्लास से भर जाती है। उल्लास का अन्दाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अनेक कहावतों और मुहावरों से युक्त इस कविता में बारह विस्मयादिबोधक चिन्ह हैं।


आज से सौ वर्ष पहले जन्मे लेखक मंटो ने एक कहानी लिखी थी ‘ठंडा गोश्त’। चर्चित होने की लालसा से प्रेरित हो कर पोर्नोग्राफिक माइंड से लिखनेवाले अनेक अन्य रचनाकार अपने घटियापन को न्यायसंगत ठहराने के लिए आजकल यह कहते पाए जाते हैं कि अश्लीलता का आरोप तो मंटो पर भी लगाया गया था। ऐसे लोगों को यह अहसास ही नहीं, कि मंटो की उस मार्मिक कहानी का ध्वन्यार्थ था कि मानव शरीर को गोश्त समझकर व्यवहार करनेवाला व्यक्ति निर्वीर्य हो जाता है। उस कहानी में यह ध्वनि इतनी प्रखर थी कि पाठक उस ध्वनि को आज भी नहीं भूले। (स्तन तथा ब्रेस्ट कैंसर इन दोनों गृहणीय कविताओं के साथ मंटो की उस हृदय स्पर्शी रचना का उल्लेख मात्र करने का भी मुझे खेद है।) मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि यह टिप्पणी स्तन और ब्रेस्ट कैंसर इन दो कविताओं पर है, इन कवियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर नहीं।



      बचपन में अध्यापिकाएँ हमसे कहती थीं- गाय पर निबन्ध लिखो। बच्चे लिखते थे- गाय के दो सींग होते हैं, चार टाँगें होती है, एक पूँछ होती है, चार थन होते हैं। गाय हमें दूध देती है। गाय हमारी माता है। कुछ बडे़ हो गए तो हमने एक चुटकुला सुना। अध्यापिका ने बच्चों से गाय पर निबन्ध लिखने को कहा। सब बच्चे लिखने लगे। दो बच्चे कक्षा से बाहर चले गए। थोड़ी देर में वे कक्षा में लौटे। उनके साथ एक गाय थी । वे गाय के शरीर के ऊपर कलम और स्याही से निबन्ध लिखकर गाय को कक्षा में हाँक लाये थे। अध्यापक के पूछने पर उन्होंने ढिठाई से कहा आप ही ने तो कहा था कि गाय पर निबन्ध लिखो। चुटकुला सुनकर हम हँस पड़ते थे।


      आज कहा जा रहा है, स्त्री को चर्चा से केन्द्र में लाओ। स्त्री पर कुछ लिखो। स्त्री के शरीर पर लिखी कविताएँ हैं  -  "स्त्री के दो स्तन होते हैं /  वे पर्वत के समान होते हैं / वे दशहरी आम के समान होते हैं/ उनमें से दूध की नदियाँ बहती हैं / उनसे पुरुष  खेल सकता है / यदि उनमें से एक कट जाए तो पुरुष  के हाथ मायूस हो जाते हैं /  यदि दोनों ही कट जाएँ तो स्त्री उल्लास से भर जाती है / " आदि। 




पवन करण और अनामिका ने व्याधि से ग्रस्त , दर्द से दुखते हुए, मृत्यु के भय से आक्रान्त, शल्य चिकित्सा के कारण विरूपीकृत स्त्री के शरीर पर नश्तर से कविताएँ उकेर दीं और स्त्री के रक्त स्नात अनावृत शरीर को हम सब के बीच ला खड़ा किया मगर इस बार इन दोनों कवियों के इस क्रूर, हिंसक, बर्बर और निहायत ग़लीज़ मजाक़ पर हँस पाना भी हमारे लिए मुमकिन नहीं।

- शालिनी माथुर, 
ए 5@6 कॉर्पोरेशन फ़्लैट्स, निराला नगर, लखनऊ 
फोन 9839014660
17 मई 2012
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