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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

कृष्ण प्रताप कथा सम्मान वर्ष 2011 : निर्णय घोषित

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कृष्ण प्रताप कथा सम्मान वर्ष 2011
निर्णय घोषित 
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कृष्ण प्रताप कथा सम्मान वर्ष 2011 से चर्चित कथा लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ को उनके कहानी संग्रह " केयर ऑफ स्वात घाटी " के लिए नवाजा जायेगा । 

ध्यातव्य है कि इसके पूर्व गत वर्ष चर्चित कहानीकार बन्दना राग को यह सम्मान से उनके कहानी संग्रह "युटोपिया" के लिए दिया जा चुका है । 

कथा सम्मान के निर्णायक श्री विभूति नारायण राय एवं श्री दिनेश कुमार शुक्ल  हैं ।                    
    



     नरेन्द्र पुण्डरीक
सचिव 
केदार शोध पीठ न्यास,


                                                                                      

मंगलवार, 9 जून 2009

मातृदेवो भव

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मातृदेवो भव
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असल में यह एक लोककथा है और लोककथा की शक्ति यह होती है कि जीवन का सार अपने अनुभव के आधार पर लोक उस में भरता है। इन कथाओं की प्रभविष्णुता का मूल स्रोत ही इनकी सामाजिक भूमिका में निहित होता है व जो मूलत: लोकमंगल के लिए ही रची जाती हैं। कल्पना के सम्मिश्रण द्वारा चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। ऐसी ही एक लोक कथा बल्कि कहें तो चित्रकथा यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। कथा कुछ यों है कि जन्म की घडी़ सन्निकट आने से कुछ पहले एक दिन बच्चे ने ईश्वर से प्रश्न किया कि हे पिता सब कह रहे हैं कि कल तुम मुझे धरती पर भेज देने वाले हो, किंतु मैं भला कैसे वहाँ रह सकता हूँ,अभी तो कितना छोटा व असहाय अवस्था में हूँ मैं? उत्तर मिला कि मैंने बहुत सी परियों में से एक ऐसी परी का चुनाव किया है जो व्यग्रता से तुम्हारी प्रतीक्षा में रत है वही तुम्हारे सब दायित्व लेगी।बच्चे ने फिर पूछा कि यहाँ स्वर्ग में मुझे अपने आनन्द के लिए गाने व मुस्काने के अतिरिक्त कुछ नहीं करना होता,पर----------। (आगे की कथा चित्रों में !)


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तो हे माँ ! प्रणाम तुम्हारे हर रूप को । भारती !!!!



मातृदेवो भव




मंगलवार, 20 जनवरी 2009

मंदाकिनी का सच

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मंदाकिनी
का सच


मंदाकिनी से जो एक बार मिल लेगा, वह उसे कभी भूल नहीं सकेगा। वह लड़की नहीं, किसी उपन्यास की पात्र लगती है। ऐसे पात्र जो अन्य पात्रों-कुपात्रों की भीड़ में अलग से जगमगाते हैं। कथा में उनकी भूमिका छोटी-सी होती है, पर उनका व्यक्तित्व इतना बड़ा होता है कि अपनी भूमिका से वे बहुत आगे निकल जाते हैं। जैसे चाँद और चाँदनी से भरे आकाश में कोई तारा अलग से जगमगा रहा हो।


यह मंदाकिनी की आकांक्षा नहीं, उसकी नियति है। मंदाकिनी ने जान-बूझ कर कभी ऐसा करना चाहा हो, यह मुझे याद नहीं। दरअसल, वह है ही ऐसी। उसे प्रचलित कसौटियों पर सुंदर नहीं कहा जा सकता, लेकिन वह हमेशा भीड़ में अलग और सबसे आकर्षक नजर आती है। उसकी संपूर्ण अभिव्यक्ति में कुछ ऐसा है जो उसे सुंदर और शीलवान बनाता है। इन दोनों को सात्विक निखार मिलता है उसकी प्रत्युत्पन्न मति और बौद्धिक तीक्ष्णता से। उसने मुझे कई ऐसे किस्से सुनाए थे, जब उसने अपने से बड़ों को ढेर कर दिया था। एक साहब उसके साथ मनाली की सैर करना चाहते थे। मंदाकिनी ने कहा कि दिल्ली में मेरे एक लोकल गार्डियन हैं। दिल्ली से बाहर जाने के लिए मुझे उनसे अनुमति लेनी होगी। सच यह था कि उसका कोई गार्डियन नहीं था। जब वह पाँच साल की थी, उसके पिता का देहांत हो गया था। माँ चित्रकार है और पेरिस में रहती थी। एक दूसरे साहब मंदाकिनी को एक टीवी चैनल में एंकर बना रहे थे। मंदाकिनी ने उनसे कहा कि मैं पीएचडी खत्म करने के बाद ही कोई नौकरी करूँगी। इसके लिए मुझे कम से कम तीन साल इंतजार करना होगा। सच यह था कि तब तक उसने एमए भी नहीं किया था।


वही मंदाकिन जब पिछले महीने मिली, तो तरद्दुद में थी। इसके पहले मैंने उसे ऐसी दुविधा में नहीं देखा था। परेशान होने पर भी वह नहीं चाहती थी कि किसी को उसकी परेशानी की हवा लगे। एक बार उसने कहा था कि सहानुभूति प्रकट करनेवाले और उसके लिए कुछ भी उठा न रखने की कोशिश करनेवाले उसे इतने मिले थे कि अब वह उनसे कोसों दूर रहना चाहती है। उसने जिसकी भी सहानुभूति ली थी, वह कीमत वसूल करने के लिए घोड़े पर सवार हो कर उसके पास पहुँच जाता था। एक लेखक महोदय ने अपने प्रकाशक के यहाँ उसे प्रूफ रीडर लगवा दिया था। दस दिन के बाद ही उनका आग्रह हुआ कि दफ्तर से लौटते हुए मेरे घर आ जाया करना और एक घंटा मेरी किताबों के प्रूफ पढ़ दिया करना। मंदाकिनी बहुत खुश हुई कि उसे एक स्थापित लेखक के साथ काम करने का मौका मिलेगा और वह भाषा की बारीकियाँ सीख सकेगी। पहले दिन वह लेखक के घर गई, तो पता चला कि जिस उपन्यास के प्रूफ उसे पढ़ने हैं, वह अभी लिखा जाना है। महीना पूरा करने के बाद उसने यह नौकरी छोड़ दी। इससे मिलते-जुलते कारणों से उसे कई नौकरियाँ बीच में ही छोड़नी पड़ गई थीं। तब भी जब उसे पैसों की सख्त जरूरत थी। लेकिन मैंने मंदाकिनी को कभी दुखी या उदास नहीं पाया। शायद अकेले में भी हर दस मिनट पर वह खिलखिला उठती हो।


उसी मंदाकिनी के चेहरे पर आज अवसाद के बादल छाए हुए थे। चाय का प्याला आते ही वे बादल बरस पड़े। उसकी बात, जितना मुझे याद है, उसके शब्दों में ही सुनिए -- 'सर, पहली बार इतनी मुश्किल में पड़ी हूँ। आप जानते ही हैं कि किसी को प्यार करना और उसके साथ घर बसाने की बात सोचना मेरे लिए कितना मुश्किल है। बचपन से ही मेरा शरीर पुरुषों की लोलुपता का कातर साक्षी रहा है। प्रतिरोध करना मैंने बहुत बाद में सीखा। तब से मैंने किसी को अपने शिष्ट होने का फायदा उठाने नहीं दिया। शायद मेरी किस्मत ही कुछ ऐसी है कि मुझे हर बिल में साँप ही दिखाई देता है। जो अपने को जितना स्त्री समर्थक दिखाता है, उससे मुझे उतना ही डर लगता है। लेकिन इस बार एक ऐसे लड़के से मेरा पाला पड़ा है, जिसकी मनुष्यता के आगे मैं हार गई। इतना सीधा और सज्जन है कि छह महीना पहले उससे परिचय हुआ था, पर आज तक उसने मुझे छुआ तक नहीं है। सिनेमा हॉल के अंधेरे में भी। लेकिन मैं जानती हूँ कि वह हर क्षण मेरे ही बारे में सोचता रहता है। एमबीए का उसका आखिरी साल है। कल उसने कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। मैं कोई जवाब नहीं दे पाई। सर, आप ही बताइए, मुझे क्या करना चाहिए।'



मैं क्या बताता। इस मामले में मेरे अनुभव ऐसे हैं कि सलाह देना असंभव जान पड़ता है। स्त्री-पुरुष संबंधों में जो पेच हैं, उनका कोई हल नहीं है। इसलिए जो भी रास्ता पकड़ो, वह कहीं न कहीं जा कर बंद हो जाता है। फिर भी, चूँकि मंदाकिनी लगातार इसरार किए जा रही थी, इसलिए हालाँकि, अगर, मगर वगैरह लगाते हुए मैंने कहा, 'मेरे खयाल से, तुम्हें अब सेट्ल हो जाना चाहिए। तुम भी नौकरी करती हो। एमबीए पूरा करने के बाद उसे भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी। कब तक खुद भटकती रहोगी और दूसरों के भटकाव का कारण बनती रहोगी?' इस पर मंदाकिनी ठठा कर हँस पड़ी। बोली, 'आप ठीक कहते हैं। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की सीख है कि पुरुष को जितनी देर से हो सके, शादी करनी चाहिए और स्त्री को जितनी जल्दी हो सके, शादी कर लेनी चाहिए !'


एक हफ्ते बाद एक साहित्यिक कार्यक्रम के समापन पर मंदाकिनी से मुलाकात हो गई। मंडी हाउस में पेड़ों की छाँह-छाँह चलते हुए मैंने पूछा, 'तो अंत में तुमने क्या फैसला किया?' वह बेहद संजीदा हो आई। फिर मुसकराते हुए कहा, 'मैंने उससे कह दिया कि मेरी शादी हो चुकी है।' अब संजीदा होने की बारी मेरी थी। उसने मुझे भारहीन करने के लक्ष्य से कहा, 'सर, मैंने उससे कहा कि चलो, शादी के बिना ही साथ रहते हैं। पर वह राजी नहीं हुआ। बार-बार पूछता कि शादी से तुम्हें दिक्कत क्या है? एक दिन मैंने उससे कह दिया कि मेरी शादी हो चुकी है। पति इसी शहर में रहता है -- किसी और के साथ। तब से मैंने तय किया है कि मैं शादी नहीं करूँगी। जिसके साथ रहना होगा, यों ही रहूँगी। यह सुनते ही वह भाग खड़ा हुआ। फिर उससे मुलाकात नहीं हुई।'



मैंने सोचा कि मंदाकिनी को बधाई दूँ, पर मेरी आँखें गीली हो आईं। मंदाकिनी ने ही मुझे उबारा, 'सर, आप तो लड़कियों की तरह भावुक हो उठे। मुझे देखिए, कितनी सख्तजान हूँ। झूठ बोल-बोल कर अपने सच को खोज रही हूँ । उस लड़के ने मुझमें कम से कम यह विश्वास तो पैदा कर ही दिया है कि आधा-अधूरा मिला है, तो कभी पूरा भी मिलेगा।'


- राजकिशोर


गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

एक मर्मान्तक आत्मकथ्य : माता न कुमाता ........

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माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले

- राजकिशोर







दुनिया भर में जिस व्यक्ति का मैं सबसे ज्यादा गुनहगार हूँ, वह है मेरी माँ जिस स्त्री ने मेरे सारे नखरे उठाए, जिसने मुझे सबसे ज्यादा भरोसा दिया, जिसने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की, उसे मैंने कोई सुख नहीं दिया। दुख शायद कई दिए। अब जब वह नहीं है, मेरा हृदय उसके लिए जार-जार रोता है।


लगभग साल भर से अकसर रात को सपने के वक्त या सपने में मेरी माँ, मेरे पिता, मेरी भौजी, मेरे बड़े भाई किसी न किसी दृश्य में मेरे सामने आ उपस्थित होते हैं। बड़े भाई की मृत्यु पिछले साल ही हुई। वे मेरे पूर्व पारिवारिक जीवन की एकमात्र जीवित कड़ी थे। शायद उनकी मृत्यु के बाद से ही पुराने पारिवारिक दृश्य बार-बार मेरी स्मृति में या मेरे स्वप्न जगत में मुझे घेर ले रहे हैं। उस समय न कोई विषाद होता है, न कोई आनंद। बस मैं उस दृश्यावली का सामान्य अंग बना अपने अतीत को जीता रहता हूँ लेकिन आँख खुलने पर या वर्तमान में लौटने पर मुझे अपनी माँ और पिता दोनों की बहुत याद आती है । यह ग्लानि घेर लेती है कि मैंने उनके साथ बहुत अन्याय किया। खासकर माँ के साथ, जिसने मुझे अपने ढंग से बहुत प्यार दिया।



परिश्रमी तो मेरे पिता भी थे, पर माँ के मेहनती होने को मैं अधिक गाढ़ी स्याही से रेखांकित करना चाहता हूँ हमारे समुदाय में स्त्रियों का मुख्य काम होता है खाना बनाना, कपड़े धोना और घर को साफ-सुथरा रखना। शुरु में यह सब करते हुए मैंने अपनी माँ को कभी नहीं देखा, क्योंकि जब मैंने होश संभाला, मेरी ममतामयी भौजी घर का चार्ज ले चुकी थीं। माँ मेरे और मेरे छोटे भाई और बहन के कपड़े जरूर धो देती थी। लेकिन बाद में जब पारिवारिक कलह के कारण मेरे बड़े भाई ने अपनी अलग इकाई बना ली, तो माँ ने गजब जीवट का परिचय दिया। वह हम सबके लिए खाना बनाती थी, कपड़े भी धोती थी और दुकानदारी में पिताजी के साथ सहयोग भी करती थी। एक पल के लिए भी बेकार बैठना उसे गवारा नहीं था। मैं उन दिनों आधुनिक साहित्य पढ़-पढ़ कर ऐसा उल्लू का पट्ठा हो चुका था कि एक छोटी-सी बात पर नाराज हो कर मैंने घर छोड़ दिया और अलग अकेले रहने लगा। वह दृश्य मुझे कभी नहीं भूलेगा जब करीब ग्यारह बजे अपने दो-चार कपड़े और कुछ किताबें एक छोटे-से सूटकेस में भर कर मैं घर छोड़ रहा था। पिताजी देख रहे थे, माँ देख रही थी, पर किसी ने भी मुझे नहीं रोका। यह दुख अभी तक सालता है। वैसे तो थोड़ा बड़ा होते ही मुझे यह एहसास होने लगा था कि मेरा कोई नहीं है, पर उस घटना के बाद इसका फैसला भी हो गया।


दरअसल, मुझे न तो पिता पसंद थे, न माँ। वे दोनों बहुत ही साधारण भारतीय थे। उन्हें न तो बच्चों से लाड़-प्यार करना आता था और न उनकी देखभाल करना। घर-द्वार सजाने में भी उनकी कोई रुचि नहीं थी। कपड़े फट जाने पर सिल-सिल कर पहने जाते थे -- जब तक वे एकदम खत्म न हो जाएँ गरीबी थी, पर उससे ज्यादा मानसिक गरीबी थी। एक तरह से मैं अपने आप ही पला, जैसे सड़क पर पैदा हो जानेवाले पिल्ले पल जाते हैं या मोटरगाड़ियों के रास्ते के किनारे के पौधे पेड़ होते जाते हैं। इसीलिए मेरे मानसिक ढांचे में काफी खुरदरापन है। प्रेम पाने की इच्छा है, प्रेम देने की इच्छा है, भावुकता भी है, लेकिन कुछ अक्खड़पन, कुछ लापरवाही, कुछ व्यंग्यात्मकता और कुछ गुस्सा भी है। आज मैं इस बात की सच्चाई को अच्छी तरह समझता हूँ कि जिसे बचपन में दुलार नहीं मिला, उसका व्यक्तित्व जीवन भर के लिए कुंठित हो जाता है। मैं बहुत मुस्तैदी से इस कुंठाग्रस्तता से लड़ता हूं, फिर भी पार नहीं पाता।


दरअसल, मेरे कॉलेज जाने तक मेरे शेष परिवार और मेरे बीच एक भयानक खाई उभर आई थी। मैं पढ़ते-लिखते हुए मध्यवर्गीय जीवन के सपने देख रहा था और इसमें मेरे माता-पिता की कोई भूमिका नहीं थी। मैं एक नई भाषा सीख रहा था और वे भाषा और संस्कृति की दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे। वे न अखबार पढ़ते थे न रेडियो सुनते थे। माँ पिता की तुलना में और भी पिछड़ी हुई थी। इस तरह के तथ्य मध्यवर्गीय चाहतों वाले मेरे मन में हीन भावना भरते थे। जब से उसे देखने की मुझे याद है, वह बूढ़ी ही थी और स्त्रीत्व की कोई चमक उसमें नहीं थी। शुरू में उसके प्रति मेरे मन में बहुत चाव था। जब चांद से लाए हुए पत्थर के टुकड़ों में से एक टुकड़े का प्रदर्शन कोलकाता में किया जा रहा था, मैं उसे अपने साथ वह टुकड़ा दिखाने ले गया था। लेकिन धीरे-धीरे मैं उससे उदासीन होने लगा, हालांकि वह अपने ढंग से मेरी चिंता करती रही। मैं जब घर के पास एक छोटा-सा कमरा ले कर रहने लगा, तो उसने ग्वाले से कह कर मेरे लिए रोज एक पाव दूध का इंतजाम कर दिया था।


क्रमश:

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

कृष्णा - राजकिशोर

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दुनिया मेरे आगे
तीसरी मुलाकात बहुत दुखदायी थी। वह मुझे नोएडा के एक मॉल में मिली। सिले हुए कपड़े देख रही थी। मैंने ही उसे टोका। इस बीच ढाई-तीन साल बीत चुके थे। उसकी नजरों की चमक और निश्छल हंसी बेदाग थी। पर कहानी बहुत ही करुण। इस बीच उसकी दो शादियां हो चुकी थी। ब्यौरे उसी के मुंह से सुनिए --'दादा, जब पहली बार मेरी शादी हुई, तो मैंने महसूस किया कि यह दुनिया कितनी सुंदर है। मेरे पति को मेरा पिछला इतिहास बता दिया गया था.......

मन करता है कि सड़क पर इतना थूकूं, इतना थूकूं कि सारे मर्द उसमें डूब जाएं।' उसकी आंखें भर आई थीं। खुल कर रोने के लिए वह एक कोने में चली गई।




कृष्णा
- राजकिशोर





उसका मूल नाम कृष्णा था। तीन साल तक वह जिस पेशे में रही, उसका नाम पता नहीं कितनी बार बदला गया होगा। तीन नाम तो उसने खुद ही बताए थे -- रेशमा, गुरमीत और बबली। लेकिन जब दिल्ली के एक वेश्यालय से उसकी मुक्ति कराई गई, तो रजिस्टर में उसने अपना वही नाम लिखवाया जो उसके मां-बाप ने उसे दिया था -- कृष्णा। कृष्णा का एक अर्थ होता है काली, पर वह सांवली थी। स्वस्थ शरीर, सारे अवयव खिले हुए और त्वचा पर अर्ध-परिपक्वता की परत। उसे मुक्त करानेवाली टोली के प्रधान थे एक मित्र पुलिस अधिकारी, जो हमारे इंस्टीट¬ूट में यौन शोषण के व्यापार के लिए स्त्रियों और बच्चों की तस्करी पर शोध कर रहे थे। वे ही मुझे उस जगह ले गए जहां मुक्त कराई गई बारह लड़कियों-स्त्रियों को रखा गया था। कई से मैंने बातचीत की। कृष्णा पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले की थी। मैं बांग्ला जानता हूं, इसलिए उससे बातचीत थोड़ी लंबी चली। चार साल लंबे दोहन के बाद भी उसकी मूल ऊर्जा सूखी नहीं थी। वह एक ऐसे मैने की तरह फुदक रही थी, जो अभी-अभी पिंजरे से निकल पर किसी नरम, हरी डाल पर बैठी हो। कृष्णा का गांव के ही एक लड़के से भालोबासा हुआ और दोनों गांव से भाग आए थे। एक हफ्ते तक बनारस में ऐश करने के बाद दोनों दिल्ली आए और लड़के ने उसे किसी को बेच दिया ।


कृष्णा से दूसरी और तीसरी मुलाकात का श्रेय संयोग को है। मैं किताबें बदलने के लिए आईटीओ के पास स्थित दयाल सिंह लाइब्रेरी गया हुआ था। एक रैक के सामने मैं भी किताबें खोज रहा था, वह भी। उस पर मेरी नजर पड़ी जरूर, पर मैं पहचान नहीं सका। उसने ही मुझ पर दस्तक दी। पता चला कि समाज कल्याण विभाग ने उसे एक संपन्न महिला के घर रखवा दिया था। उसने कृष्णा को पढ़ाया-लिखाया और अब वह इंदिरा गांधी ओपेन विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन की तैयारी कर रही थी। खुशी से मेरी आंखें छलछला आईं । काश, हर बंदी बनाई गई लड़की का भाग्य इतना अच्छा होता।


तीसरी मुलाकात बहुत दुखदायी थी। वह मुझे नोएडा के एक मॉल में मिली। सिले हुए कपड़े देख रही थी। मैंने ही उसे टोका। इस बीच ढाई-तीन साल बीत चुके थे। उसकी नजरों की चमक और निश्छल हंसी बेदाग थी। पर कहानी बहुत ही करुण। इस बीच उसकी दो शादियां हो चुकी थी। ब्यौरे उसी के मुंह से सुनिए --'दादा, जब पहली बार मेरी शादी हुई, तो मैंने महसूस किया कि यह दुनिया कितनी सुंदर है। मेरे पति को मेरा पिछला इतिहास बता दिया गया था। फिर भी उसने मुझे पत्नी का सम्मान दिया, इसलिए मैं उसका बहुत आदर करती थी। पर धीरे-धीरे तसवीर बदलने लगी। एक दिन झगड़े के दौरान उसने ताना मारा कि रंडी रह चुकी हो, तो जिंदगी भर रंडी ही रहोगी। रात भर रोती रही। जब वह मुझे इतिहास को ले कर बार-बार मुझे निशाना बनाने लगा, तो मैंने उसे छोड़ दिया और आंटी के घर लौट आई। आंटी ने ही मेरा दूसरी शादी कराई। इस बार लड़के को मेरे अतीत के बारे में नहीं बताया गया। हम दोनों बहुत खुश थे। एक दिन खाने पर उसका एक दोस्त आया। वह अविवाहित था और प्यास बुझाने के लिए कई बार मेरे यहां आ चुका था। उसने मुझे पहचान लिया। उस वक्त तो कोई घटना नहीं हुई। पर दोस्त को विदा कर लौटने के बाद मेरा शरीफ पति बिना कुछ पूछे मुझ पर हाथ-पैर चलाने लगा। जब मैं घायल हो कर गिर पड़ी, तो उसने कुरसी पर बैठ कर इत्मीनान से सिगरेट जलाई और धुआं फेंकती सिगरेट को मेरे दाहिने गाल के नजदीक ला कर चीखने लगा -- बोल साली, तुमने मुझसे यह बात क्यों छिपाई कि तुम पेशा कर चुकी हो? मैंने कहा, इससे तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? क्या मैं अच्छी पत्नी साबित नहीं हुई हूं? फिर मुझे मजबूरी में कुछ दिन पेशा करना पड़ा, तो इसमें मेरा दोष क्या था? समझ लो, वह एक्सिडेंट था। तो यह भी एक्सिडेंट है, ऐसा कह कर उसने मेरे दोनों गाल जला दिए। रात को दो बजे उसने मुझे घर से निकाल दिया। पास के बस स्टैंड पर मैंने रात गुजारी। इस बार मैं आंटी के पास नहीं गई। किसी तरह एक नौकरी हासिल की। अब अकेले ही रहती हूं। किसी मर्द को देखती हूं, तो मुझे अपने दोनों पतियों की याद आने लगती है। मन करता है कि सड़क पर इतना थूकूं, इतना थूकूं कि सारे मर्द उसमें डूब जाएं।' उसकी आंखें भर आई थीं। खुल कर रोने के लिए वह एक कोने में चली गई।


विदा लेने के पहले मैंने उससे कहा, 'अगर मैं विवाहित न होता, तो तुमसे कहता कि मेरे साथ चलो, हम इसी दुनिया में अपनी एक अलग दुनिया बनाएंगे।'
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