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मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

न्यूड वीडियो मामला और राजेन्द्र यादव

10 टिप्पणियाँ


(प्रथम भाग)


जुलाई 2013 में एक समाचार आया था कि राजेन्द्र यादव की प्रिय लेखिका ज्योति कुमारी ने ‘हंस’ का बहिष्कार किया है। सितम्बर के संपादकीय में ज्योति को लेकर श्री यादव का अनर्गल प्रलाप छपा। अक्टूबर संपादकीय में उन्होंने अपनी गलती के लिए युवा लेखिका से क्षमा माँग ली। राजेन्द्र यादव और 'हंस' के बहिष्कार को लेकर आशीष कुमार ‘अंशु’ ने ज्योति कुमारी से लंबी बातचीत की। ज्योति ने विस्तार से पूरी कहानी बयान की। इस कहानी में यदि आने वाले समय में राजेन्द्र यादव का पक्ष शामिल होता है तो यह कहानी पूरी मानी जाएगी। यहाँ प्रस्तुत है, ज्योति का बयान, जैसा उन्होंने आशीष को बताया। 


‘हंस’ का बहिष्कार करना किसी भी नई लेखिका के लिए आसान फैसला नहीं होता। खास तौर पर जब मेरे लेखन की अभी शुरूआत है। इस बात से कोई इंकार नहीं है कि हंस में जब कहानी छपती है तो अच्छा रिस्पांस मिलता है। मेरी कहानियाँ ‘हंस’, ‘पाखी’, ‘परिकथा’, ‘नया ज्ञानोदय’ और अभी 'बहुवचन' में छपी हैं लेकिन हंस में प्रकाशित किसी भी कहानी के लिए सबसे अधिक फोन, एसएमएस और चिट्ठियाँ मिली हैं। किसी भी लेखक को यह अच्छा लगता है।

मैं पिछले दो सालों से राजेन्द्र यादव और हंस के लिए काम कर रहीं थी। मेरा वहाँ काम यादवजी जो बोले, उसे लिखने का था, हंस में अशुद्धियों को दुरुस्त करना और उसके संपादन से जुड़े काम को भी मैं देखती थी। जब ‘स्वस्थ्य आदमी के बीमार विचार’ पर काम शुरू किया, उसके थोड़ा पहले से मैं उनके पास जा रही थी। लगभग दो साल से मैं उनके पास जा रही हूँ। इस काम के लिए वे मुझे दस हजार रूपए प्रत्येक महीने दे रहे थे। मैं मुफ्त में उनके लिए काम नहीं कर रही थी। सबकुछ ठीक था। यादवजी का स्नेह भी मिल रहा था। उस स्नेह में कहीं फेवर नहीं था। अपनी कहानियों के लिए कभी मैंने उन्हें नहीं कहा। मैं उन्हें लिखने के बाद कहानी दिखलाती थी और कहती थी कि यह यदि हंस में छपने लायक हो तो छापिए। मेरी पाँच-छह कहानियाँ हंस में छपीं।

यदि किसी लेखिका की पहली कहानी छपना उसे किसी साहित्यिक पत्रिका का प्रोडक्ट बनाता है तो मुझे ‘परिकथा’ का प्रोडक्ट कहा जाना चाहिए। मेरी पहली कहानी ‘परिकथा’ में छपी है। मैं हंस की प्रोडक्ट नहीं हूँ। यह सच है कि कथा संसार में मेरी पहचान हंस से बनी। ‘हंस’ मेरे लिए स्त्री विमर्श की पत्रिका रही है। ‘हंस’ से मैने स्त्री अधिकार और स्त्री सम्मान को जाना है। राजेन्द्र यादव जो अपने संपादकीय में लिखते रहे हैं और जो विभिन्न आयोजनों में बोलते रहे हैं। इन सबसे उनकी छवि मेरी नजर स्त्री विमर्श के पुरोधा की बनी।

एक जुलाई 2013 को उनके घर में जो दुर्घटना हुई, उससे पहले उनसे मेरी कोई शिकायत नहीं थी। सब कुछ उससे पहले अच्छा चल रहा था। मैं उन्हें अपने अभिभावक के तौर पर पितातुल्य मानती रही हूँ। मेरा उनसे इसके अलावा कोई दूसरा रिश्ता नहीं रहा। इसके अलावा केाई दूसरी बात करता है तो गलत बात कर रहा है। राजेन्द्र यादव मुझसे कहते थे- ‘तुझे देखकर मेरे अंदर इतना वात्सल्य उमड़ता है, जितना बेटी रचना के लिए भी नहीं उमड़ा। कभी मैं उन्हें कहती थी कि मुझे हंस छोड़ना है तो वे मुझे बिटिया रानी, गुड़िया रानी बोलकर, हंस ना छोड़ने के लिए मनाते थे। राजेन्द्र यादव हमेशा मेरे साथ पिता की तरह ही व्यवहार करते थे।

जब से मैं उनके पास काम कर रहीं हूँ, प्रत्येक सुबह 8.00 बजे- 8.30 बजे उनके फोन से ही मेरी नीन्द खुलती थी। फोन उठाते ही वे कहते- अब उठ जा बिटिया रानी। मैं उनके घर 10.30 बजे सुबह पहुँचती थी। वे रविवार को भी बुलाते थे। रविवार को उनके घर शाम तीन-साढे तीन बजे पहुँचती थी।

राजेन्द्र यादव का मानना था कि वे हंस कार्यालय में एकाग्र नहीं हो पाते हैं। इसलिए वे संपादकीय लिखवाने के लिए घर ही बुलाते थे। जब मैंने राजेन्द्र यादव के साथ काम करना शुरू किया, उन दिनों राजेन्द्र यादव दफ्तर नहीं जाते थे। वे बीमार थे। तीन-चार महीने तक वे बिस्तर पर ही पड़े रहे।‘स्वस्थ आदमी ......’ वाली किताब उन्होंने घर पर ही लिखवाई। उस दौरान वे हंस नहीं जा रहे थे। जब उन्होंने हंस जाना प्रारंभ किया, उसके बाद भी वे रचनात्मक लेखन घर पर ही करते थे। दफ्तर में वे चिट्ठियाँ लिखवाते थे। मेरी नौकरी उनके घर से शुरू हुई थी, इस तरह मेरा एक दफ्तर उनका घर भी था।

30 जून 2013 की रात 10.00 -10.15 बजे के आस-पास मेरे मोबाइल पर नए नंबर से फोन आया। नए नंबर के फोन इतनी रात को मैं उठाती नहीं। लेकिन एक नंबर से दो-तीन बार फोन आ जाए तो उठा लेती हूँ।जब दूसरी बार में मैंने नए नंबर वाला फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज आई- ‘मैं प्रमोद बोल रहा हूँ।’ जब मैने पूछा -‘कौन प्रमोद?’ तो उसने राजेन्द्र यादव का नाम लिया। प्रमोद, राजेन्द्र यादव का अटेन्डेन्ट था। ‘हंस’ में मेरी राजेन्द्र यादव और संगम पांडेय से बात होती थी और किसी से कुछ खास बात नहीं होती थी। मैं बातचीत में थोड़ी संकोची हूं, यदि सामने वाला पहल ना करे तो मैं बात शुरू नहीं कर पाती। प्रमोद से मेरी बातचीत सिर्फ इतनी थी कि वह दफ्तर पहुँचने पर राजेन्द्र यादव के लिए और मेरे लिए एक गिलास पानी लाकर रखता था और पूछता था- ‘मैडम आप कैसी हैं?’ इससे अधिक मेरी प्रमोद से कोई बात हुई हो, मुझे याद नहीं।

उसका फोन आना मेरे लिए आश्चर्य की बात थी। उसने फोन पर कहा- ‘मुझसे आकर मिलो। मैंने तुम्हारा वीडियो बना लिया है। उसे मैं इंटरनेट पर डालने जा रहा हूँ।’

यह फोन मेरे लिए झटका था। कोई यदि वीडियो बनाने की बात कर रहा है तो निश्चित तौर पर यह किसी आम वीडियो की धमकी नहीं होगी। वह नेकेड वीडियो की बात कर रहा होगा। मैंने राजेन्द्र यादव को उसी वक्त फोन मिलाया। जब राजेन्द्र यादव से मेरी बात हो रही थी, उस दौरान भी प्रमोद काफोन वेटिंग पर आ रहा था। राजेन्द्र यादव को मैने फोन पर कहा- ‘प्रमोद नेकेड वीडियो की बात कर रहा है, आप देखिए क्या मामला है?’

राजेन्द्र यादव ने कहा- अब मेरे सोने का वक्त हो रहा है। सुबह बात करूँगा। उनसे बात खत्म हुई प्रमोद का फोन जो वेटिंग पर बार-बार आ ही रहा था। फिर आ गया- उसने फिर मुझे धमकाया।

राजेन्द्र यादव जो दो साल से प्रतिदिन मुझे फोन करके उठाते थे। उस दिन उनका फोन नहीं आया। जब मैंने फोन किया तो उन्होंने कहा- ‘मैं आँख दिखलाने एम्स जा रहा हूं। तुमसे दोपहर में बात करता हूँ। फिर राजेन्द्र यादव का फोन नहीं आया। फिर मैंने ही फोन किया, राजेन्द्र यादव ने फोन पर मुझे कहा- प्रमोद कह रहा है, वीडियो सुमित्रा के पास है और सुमित्रा कह रही है वीडियो प्रमोद के पास है। पता नहीं चल पा रहा कि वीडियो किसके पास है। ऐसा करो, इस मसले को अभी रहने दो। इस पर बात 31 जुलाई वाले कार्यक्रम के बीत जाने के बाद बात करेंगे। मुझे यह बात बुरी लगी। मैंने कहा- ‘आज एक जुलाई है। 31 जुलाई में अभी तीस दिन है। इस बीच प्रमोद ने कुछ अपलोड कर दिया तो फिर मेरी बदनामी होगी। आप भारतीय समाज को जानते हैं। मैं कहीं की नहीं रहूँगी। मैंने कई बार राजेन्द्र यादव को फोन किया और एक बार प्रमोद को भी फोन किया- ‘आप सच बोल रहे हैं या कोई मजाक कर रहे हैं। क्या है उस वीडियो में?’

उसने ढंग से बात नहीं की। उसका जवाब था- ‘जब दुनिया देखेगी, तुम भी देख लेना।’

जब कई बार फोन करने के बाद भी राजेन्द्र यादव ने मेरी बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया फिर मैंने उन्हें फोन करके कहा कि मैं शाम में आपके घर आ रही हूँ। यह छोटी बात नहीं है। आप प्रमोद से बात करिए।

मेरे साथ जो दुर्घटना हुई, उसके बाद मैने लोगों से बातचीत बंद कर दी थी। अब जब फिर से बातचीत हो रही है तो यह सुनने में आ रहा है कि कुछ लोग कह रहे हैं- ज्योति अगर राजेन्द्र यादव के घर में कुछ गलत काम नहीं कर रही थी, राजेन्द्र यादव के साथ उसके नाजायज संबंध नहीं थे फिर वह वीडियो की बात से डरी क्यों? यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह वीडियो मेरा और राजेन्द्र यादव का होता तो मैं बिल्कुल नहीं डरती। ना मैं घबराती, वजह यह कि प्रमोद राजेन्द्र यादव के पास काम करता था, फिर क्या वह अपने मालिक का वीडियो अपलोड करता? अपलोड करता तो क्या सिर्फ ज्योति की बदनामी होती? क्या राजेन्द्र यादव की नहीं होती। राजेन्द्र यादव का कद बड़ा है। उनकी बदनामी भी बड़ी होती। यदि वे सेफ होते तो मैं भी सेफ होती लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। वे मुझे बेटी तुल्य मानते रहे थे। मेरे लिए वे पितातुल्य थे। इसका मतलब था कि यदि प्रमोद ने कोई वीडियो वास्तव में बनाया था तो वह मेरी अकेली की वीडियो होगी। मैं राजेन्द्र यादव के यहाँ काम करती थी तो उनका बाथरूम भी इस्तेमाल करती थी। राजेन्द्र यादव से मेरी घनिष्ठता हो ही गई थी। कई बार जब मेरे घर पानी नहीं आया होता तो राजेन्द्र यादव कहते थे- मेरे घर आ जाओ। डिक्टेशन ले लो और यहीं पर नहा लेना। उनके बाथरूम का कई बार मैने इस्तेमाल नहाने के लिए किया है। मेरा डर यही था, बाथरूम में नहाते हुए कैमरा छुपाकर मेरा नेकेड वीडियो प्रमोद, राजेन्द्र यादव के घर में बना सकता है। एक अकेली लड़की का नेकेड वीडियो जब इंटरनेट पर डाला जाता है तो बिल्कुल नहीं देखा जाता कि वह अकेली है या फिर किसी के साथ है। यदि लड़की वीडियों में नेकेड है तो उसकी बदनामी होनी है, उसकी परेशानी होनी है। इस बात से मैं डरी थी। यदि राजेन्द्र यादव के साथ कोई वीडियो होता फिर डर की कोई बात नहीं थी। यदि राजेन्द्र यादव सेफ हैं तो उनके साथ वाला भी सेफ है।


वीडियो वाली बात से मैं काफी परेशान थी। परेशान होकर मैं राजेन्द्र यादव के घर पहुँची। एक जुलाई को 6.30-6.45 बजे शाम में। मैंने राजेन्द्र यादव से कहा- ‘सर आप मेरे सामने प्रमोद से बात करें कि वह क्या वीडियो है? वह दिखलाए।’

मैं राजेन्द्र यादव को सर ही कहती हूँ। उनका जवाब था- ‘मैं प्रमोद को कुछ नहीं कहूँगा। उसे बुला देता हूँ , तुम खुद ही उससे बात कर लो।’

यह बातचीत राजेन्द्र यादव के कमरे में हुई। वे उस वक्त शराब पी रहे थे। उनके सामने ही प्रमोद ने अपशब्दों का प्रयोग किया। यह मामला अभी न्यायालय में है। प्रमोद यह आलेख लिखे जाने तक जेल में है। इस पूरी घटना में दुखद पहलू यह है कि यह सब एक ऐसे आदमी की नजरों के सामने हुआ जिसकी छवि देश में स्त्रियों के हक में खड़े व्यक्ति के तौर पर है। वह मुकदर्शक बनकर अपने कर्मचारी द्वारा एक स्त्री के लिए प्रयोग किए जा रहे अशालीन भाषा को सुनता रहा। वे उस वक्त भी शराब पीने में मशगूल थे, जब उनका कर्मचारी स्त्री के साथ अमर्यादित व्यवहार कर रहा था। इस पूरी घटना के दौरान राजेन्द्र यादव बीच में सिर्फ एक वाक्य प्रमोद को बोले- ‘यार कुछ है तो दिखा दे ना...’

मानों छुपन छुपाई के खेल में चॉकलेट का डब्बा गुम हो गया हो। जबकि प्रमोद कई बार राजेन्द्र यादव के सामने धमका चुका था- वीडियो इंटरनेट पर अपलोड कर दूँगा। फिर भी वे चुप थे। मैं भी चुप हो जाती। कोई कदम नहीं उठाती लेकिन उसके बाद जो प्रमोद ने किया वह किसी भी स्त्री के लिए अपमानजनक था। मामला न्यायालय में है इसलिए उस संबंध में यहाँ नहीं बता रहीं हूँ। मेरे साथ जो हुआ, उसके बाद मैं समझ गई थी कि मेरा अब यहाँ से बच कर निकलना नामुमकिन है। मैंने राजेन्द्र यादव के कमरे में रखे टेलीफोन से सौ नंबर मिलाया। उस वक्त राजेन्द्र यादव बोले- ‘यह क्या कर रही हो? फोन रख।’ तब तक दूसरी तरफ फोन उठ चुका था। मैंने फोन पर सारी बात बता दी। मेरे साथ क्या हुआ और मुझे मदद की जरूरत है।

फोन रखने के बाद अब तक शांत पड़े राजेन्द्र यादव फिर बोले- ‘यह सब क्या कर रही हो? पुलिस के आने से क्या हो जाएगा? बेवजह बात ना बढ़ा।’

पुलिस को फोन मिलाने के बाद प्रमोद शांत हो गया था। राजेन्द्र यादव ने अब प्रमोद से कहा- ‘तू जा यहाँ से।’ उनकी आज्ञा मिलते ही प्रमोद आज्ञाकारी बच्चे की तरह चला गया। अब राजेन्द्र यादव ने मुझसे कहा- पुलिस को कुछ नहीं बताना है। मैंने कहा- ‘यह नहीं होगा सर। आपके सामने, आपके घर में इतनी बुरी हरकत हुई है मेरे साथ। आपसे मैं बार-बार फोन पर कहती रही कि आप प्रमोद से बात कीजिए लेकिन आपने वह भी नहीं किया। अब मैं पुलिस को सारी बात बताऊँगी।’

यदि मेरे मन में कोई चोर होता तो मैं वहाँ डर जाती। मेरे मन में कोई चोर नहीं था, इसलिए मैं डरी नहीं। मेरे अंदर सिर्फ इतनी बात थी कि मेरे साथ जो हुआ है, वह गलत हुआ है। इसलिए मैं पुलिस में शिकायत करूँगी।

राजेन्द्र यादव लगातार मुझे समझाते रहे कि पुलिस में शिकायत करने से कुछ नहीं होगा। सौ नंबर पर उन्होंने रिडायल किया, शायद यह कन्फर्म करने के लिए कि उनके घर से पुलिस के पास फोन गया था या नहीं? जब उधर से कहा गया कि फोन आया था तो यादवजी ने कहा- ‘अब पुलिस को भेजने की जरूरत नहीं है। आपसी मारपीट थी। अब सुलझ गया सब कुछ।’

मैं वहीं बैठी थी। मैने दुबारा फोन मिलाया कि पुलिस अभी तक नहीं आई? दूसरी तरफ से मुझसे सवाल पूछा गया- ‘मैडम आप इतनी सुरक्षित तो हैं ना, जितनी देर में पुलिस आप तक पहुँच सके?’

मैंने कहा- सुरक्षित हूँ। प्रमोद बाहर बैठा है और राजेन्द्र यादव फोन पर किसी से बात कर रहे हैं।

पुलिस आई। उन्होंने प्रमोद को थाने ले जाने के लिए पकड़ा। साथ में मुझे भी बयान के लिए ले जा रहे थे। राजेन्द्र यादव ने पुलिस वाले से कहा- ‘क्या इतनी छोटी सी बात के लिए ले जा रहे हो? बैठो यहाँ। स्कॉच लोगे या व्हीस्की? मेरे पास 21 साल पुरानी शराब है। एक से एक अच्छी शराब है। कहो क्या लोगे?’

लेकिन पुलिस वाले ने कहा- ‘सर लड़की के साथ ऐसा हुआ है। यह छोटी बात नहीं है।’

मेरा कुर्ता खींच-तान में फट गया था। मेरे पास ऐसी खबर आ रही है कि कुछ लोग कह रहे हैं कि ज्योति ने खुद ही अपने कपड़े फाड़ लिए। कोई भी लड़की पहली बात इतनी बेशरम नहीं होती कि अपने कपड़े खुद फाड़ ले। यदि फाड़ेगी तो उसका उद्देश्य क्या होगा? सामने वाले पर इल्जाम लगाना। मैने इसके लिए प्रमोद पर आरोप नहीं लगाया है। मैंने कहा है कि यह खींच-तान में फटा है।

प्रमोद राजेन्द्र यादव के पास अप्रैल में आया है। वह राजेन्द्र यादव के घर में रहता है। उनके कमरे में सोता है। उसकी गिरफ्तारी भी राजेन्द्र यादव के घर से हुई थी।


सोमवार, 16 अगस्त 2010

क्या पुरुष अपने ‘समदुखी मीत’ की व्यथा कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

6 टिप्पणियाँ
औरत की दुनिया -


क्या पुरुष अपने ‘समदुखी मीत’ की व्यथा कथा समानुभूति से लिखेंगे ?
-  सुधा अरोड़ा  
      




mannu bhandari indore city bhaskar interview‘‘ साहित्य समाज का दर्पण है ’’ उक्ति घिस घिस कर पुरानी हो गई , पर साहित्य का समाशास्त्रीय  विश्लेषण  आज भी साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं बन पाया । साहित्य और समाजविज्ञान के बीच की इस खाई ने साहित्य और साहित्यिक समीक्षाओं को शुद्ध कलावादी बना दिया और समाजविज्ञान के मुद्दों को एक अलग शोध का विषय , जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं ।




हिन्दी साहित्य में महिला रचनाकारों की आत्मकथाएँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं । पुरुषवर्ग यह सवाल पूछता है कि लेखिकाएँ  अपनी आत्मकथाएँ  क्यों नहीं लिखतीं ? पर लिखी गयी आत्मकथाओं को इस या उस कारण से कटघरे में खड़ा करता रहता है।




हमारा भारतीय लेखक समाज काफी क्रूर और निर्मम है । बाहर बाहर से सहानुभूति जताता हुआ, यह एक लेखिका के पर कतरने को और उसके औरत होने के कारण जन्मे दुख, उसकी तकलीफ, उसकी व्यथा पर ठहाका लगाने की मंशा रखता हुआ, शातिर अंदाज में मंद मंद मुस्कुराता और व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करता है ।




Ek Kahani Yah Bhiहंस के मार्च अंक में ‘‘ आत्मा का आईना ’’ आलेख में वरिष्ठ समीक्षक मैनेजर पांडे ने बेहद उदारमना होकर मन्नू जी की किताब ‘ एक कहानी यह भी ’ की एक बेहतरीन विश्लेषणात्मक समीक्षा की है , लेकिन अंत तक आते आते उनकी आलोचकीय दृष्टि पर पुरुषवादी सोच ने धावा बोल दिया है। उनका एक लंबा पैराग्राफ है जिसमें मीता के प्रति गहरी समानुभूति से उन्होंने एक टिप्पणी दी है । वे लिखते हैं -


‘‘ इस कहानी में एक पात्र और उससे जुड़ा प्रसंग ऐसा है जिस पर अगर मन्नू परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती. वह पात्र है मीता, जो एक ओर राजेन्द्र यादव के बौद्धिक छल का शिकार हुई है तो दूसरी ओर मन्नू तथा राजेन्द्र के बीच तनाव और अलगाव का कारण भी है. मेरे सामने सवाल यह है कि क्या मीता के कुछ दुख-दर्द नहीं होंगे. अगर वे हैं तो उनकी चिंता किसी को नहीं है, न राजेन्द्र को और न मन्नू को. मन्नू तो एक स्त्री हैं और संवेदनशील लेखिका भी. यही नहीं, वे स्वयं राजेंद्र के छल से पीड़ित स्त्री हैं इसलिए उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे मीता की पीड़ा को एक समदुखिनी के दर्द को समझने और व्यक्त करने की कोशिश करतीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. मीता तो लेखिका नहीं है फिर उसके दुख दर्द की कहानी कौन कहेगा ? लगता है कि दूसरी असंख्य स्त्रियों की तरह मीता की पीड़ा भी अनकही रह जाएगी . ’’ (हंस: मार्च 2010 - पृष्ठ-54 ) 




इस पैराग्राफ में प्रश्नकर्ता का भी बौद्धिक छल उजागर होता है । वह लेखिका से उस विश्लेषण की माँग कर रहा है जो कृति का अभीष्ट है ही नहीं । हाल ही में मन्नू जी से एक पत्रकार ने साक्षात्कार लिया और `हंस'(मार्च) में प्रकाशित इस आलेख ‘ आत्मा का आईना ‘ के अंतिम पैराग्राफ पर उनकी राय पूछी । मन्नू जी ने कहा - ‘‘ जब मीता ने राजेंद्र जी से सारे सम्बन्ध तोड़ लिए थे, उनके सारे पत्र भी लौटा दिए थे, तो जैसे ही उसे पता चला कि वह मुझसे शादी कर चुके हैं, दोबारा वह उनकी जिन्दगी में दाखिल हो गई । अगर उसकी जगह मैं होती और राजेंद्र किसी और से शादी कर रहे होते या कर चुके होते मैं तो अपने को पूरी तरह उनसे काट लेती, उनकी जिंदगी में कोई दखल न देती और एक पत्नी का अधिकार छीन कर कभी अपना घर बसाने का सपना तो नहीं ही देखती । ’’ मन्नू जी की इस उक्ति से आप स्त्रियों की किस्मों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींच सकते हैं । इस विभाजक रेखा के दूसरी ओर पड़ी स्त्रियों का दुख उनके अस्तित्व का नहीं, उनकी आकांक्षाओं ( आज के संदर्भ में महत्वाकांक्षाओं ) का है जिसमें प्रेम या भावना से पैदा होने वाली पीड़ा-व्यथा का कहीं नामो निशान नहीं है । अगर कुछ है तो वह तहस नहस करने का एक त्रासजनित सुख है ।




‘ अन्या से अनन्या ' की लेखिका प्रभा खेतान क्या मीता नहीं हैं ? क्या उस ‘मीता’ की भरी पूरी आत्मकथा से अनकही मीताओं के तथाकथित दुख दर्द की भरपाई नहीं हो गई ? मन्नू जी ने तो फिर भी मीता के कोण से कई कहानियाँ  लिखीं - जिनमें ‘स्त्री सुबोधिनी’ , ‘एक बार और’ चर्चित भी हुईं क्योंकि उसकी स्थिति में कल्पना का पुट देकर कहानियाँ  लिखना ही उनके लिए संभव था । मीता के वास्तविक जीवन की न तो मन्नू जी को जानकारी थी, न वे उसके निजी जीवन से वाकिफ होना चाहती थीं तो वे आत्मकथा जैसी विधा में उसका क्या बयान करतीं - जो पूरी तरह सच और वास्तविकता पर आधारित होती है । जिस ‘व्यथा’ को हाईलाइट करने की बात हमारे वरिष्ठ समीक्षक करते हैं , शायद वे यह नहीं जानते कि यह मीता ‘तनाव’ का कारण जरूर थी पर ‘अलगाव’ का नहीं । मीता - चाहे वह जैसी भी हो - का एकवचन तो पत्नी स्वीकार करके जीवन के तीसेक साल गुजार देती है पर बहुवचन में ‘ मीताओं ’ को स्वीकार करना मुश्किल होता है ।




विडम्बना तो यह है कि इनमें से कुछ मीताओें के भी एक नहीं , कई मीत होते हैं । आज के समय में इन बहुवचन में ‘मीत’ पालने वाली ‘मीताओं’ का दुख दर्द कैसा ? अनकही पीड़ा का अर्थ क्या है ? यह अनकही पीड़ा-व्यथा किस किस्म के समीक्षकों को आलोड़ित करती है ? ऐसी मीताएँ पुरुषों  के ‘‘बौद्धिक छल का शिकार’’  नहीं होतीं, वे तो सबकुछ जानते समझते एक पिता और पति के दायित्व से पुरुष  को डिगा कर उसका प्रेमी के रूप में खुद शिकार करती हैं । इस शिकार में उसे न सिर्फ विवाहित पुरुष से प्रेम (!) करने का , बल्कि सिर्फ अपनी देह के तांडव के बूते पर एक समर्पित-समझदार-विदुषी औरत को उसके अधिकार से अपदस्थ और उसकी ‘स्पेस’ से बेदखल करने का दोहरा सुख शामिल हो जाता है जो उसे एक त्रासदी निर्मित करने का और संगति में विध्वंस करने का भी क्रूर त्रासजनित आनंद देता है । हमारे समीक्षकों के पास इन देहवादी ‘मीताओं’ को पहचानने की निगाह क्यों नहीं है ? समीक्षकीय दृष्टि की सारी स्पष्टता इस ‘मीता’ के संबंध पर आकर धुंधलके में क्यों बदल जाती है ?




संभवतः इसका कारण यह है कि हिन्दी साहित्य मीताओं से अंटा पड़ा है । आज के अधिकांश लेखकों- कवियों-समीक्षकों के जीवन में एक एक मीता है । ये सब मीताओं वाले पुरुष हैं - गाँव में जिनकी बेपढ़ी बीवियाँ या शहर में जिनकी पढ़ी लिखी बीवियाँ उनके बच्चों को बगैर किसी गिले-शिकवे के पाल रही हैं इसलिए अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर इन मीताओं के प्रति उनकी सहानुभूति का पलड़ा भारी है ।




हिन्दी साहित्य में पुरुष रचनाकारों ने भी आत्मकथाएँ लिखी हैं । क्या हमारे वरिष्ठ समालोचक पुरुष आत्मकथा लेखक से आग्रह करेंगे कि उनकी पत्नी का अगर कोई ‘मीत’ रहा है तो उस समदुखी ‘मीत’ की व्यथा कथा का वे संवेदनशीलता से बयान करें ? आखिर संवेदनशीलता सिर्फ महिलाओं की बपौती तो नहीं है न !




प्रभा खेतान की ‘‘अन्या से अनन्या’’ की काफी चर्चा हुई क्योंकि खुलकर उन्होंने विवाहित पुरुष से अपने प्रेम संबंध की चर्चा की । राजेंद्र जी ने भी प्रभा खेतान से अपनी मित्रता को सार्त्र और सिमोन के संबंधों के बरक्स रखा और एक साक्षात्कार में यह भी कहा - ‘‘ प्रभा खेतान मेरी बहुत इंटीमेट फ्रेंड रही हैं ।’’ ( 23 लेखिकाएँ और राजेंद्र यादव - पृष्ठ 85) .   मुझे हैरानी तब होती है जब मैं देखती हूँ  कि प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘‘अन्या से अनन्या ’’ के बारे में प्रकाशित  तमाम समीक्षाओं में, एक भी आलोचक ने यह सवाल नहीं उठाया कि सहजीवन निभाने वाले जिन अपने प्रेमी डॉ. गोपालकृष्ण सराफ के बारे में उन्होंने इतने विस्तार से लिखा है , वह संवेदनशील लेखिका जरा अपनी समदुखिनी - पाँच बच्चों की माँ, श्रीमती सराफ की पीड़ा, यातना के बारे में भी कुछ लिखतीं कि पति को अन्या के पास जाते देखकर उन महिला पर क्या बीतती होगी ? कलकत्ता के तमाम साहित्यकार ‘जन्नत की हकीकत’ जानते हैं पर जाहिर है , हमें सिर्फ उतना ही दिखाई देगा और उतना ही समझ में आएगा, जो शब्दों में कह दिया गया है । उस आत्मकथा में बस इतना ही जिक्र है कि डॉ. सराफ कहते हैं कि वह हर समय रोती रहती है, उसे तो रोने की आदत पड गयी है । ‘अन्याओं ’ से संबंध रखने वाले अधिकांश लेखक कवि कलाकारों की बीवियों को रोने की आदत पड़ जाती है जिससे बचने के लिए वे साइकिएट्रिस्ट के चक्कर लगाती हैं या एंटी डिप्रेसेंट दवाइयाँ खाती हैं । इनसे हमारे समीक्षक वर्ग का सरोकार नहीं है क्योंकि एक रोने-कलपने वाली, चिड़चिडी, बुझी हुई पत्नी कमोबेश सबके घरों में मौजूद है जो खुद तनाव और बीमारियों से ग्रस्त होते हुए भी, गैर जिम्मेदार पति को बख्शते हुए बच्चों समेत परिवार के दोनों पहियों को अपने मजबूत (!) कंधों पर यथासंभव भरसक खींचती चली जाती हैं । इसी श्रेणी में आती हैं मन्नू जी । मन्नू जी की किताब एक कहानी यह भी - जिसके बारे में भूमिका में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि यह किताब चौदह साल में टुकड़ों टुकड़ों में लिखी गयी । यह उनके जीवन की लेखकीय यात्रा है, आत्मकथा नहीं है और उन्होंने अपने निजी जीवन के प्रसंग खोलकर नहीं लिखे, एक पूरक प्रसंग भी उन्होंने एक संपादक के दबाव के तहत ही लिखा वर्ना वह उतना भी नहीं लिख पातीं , फिर भी समीक्षक ढिठाई से कहे चले जा रहे हैं कि मीता के बारे में वे परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती।.......




आज भारतीय समाज और जीवन में ही नहीं , साहित्य में भी मूल्य बदल रहे हैं । अनैतिकता हमें चौंकाती नहीं है, आकर्षित  करती है । उसका बयान हमें रोमांचकारी लगता है । दूसरे तमाम मुद्दों को दरकिनार कर , हम ललक कर उस किताब को पढ़ना चाहते हैं । साहित्य का प्रकाशक इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ है । मैत्रेयी की आत्मकथा का फ्लैप मैटर देखें -‘‘ मैत्रेयी ने डॉ. सिद्धार्थ और राजेंद्र यादव के साथ अपने संबंधों को लगभग आत्महंता बेबाकी के साथ स्वीकार किया है।’’ अंदर पूरी किताब का एक एक पन्ना पढ़ जाइए , आप उस ‘आत्महंता बेबाकी’ (!) को ढूँढते रह जाएँगे । इसके उत्तर में फरवरी 2009 के आउटलुक में राजेंद्र यादव की अपनी एक टिप्पणी पर्याप्त है -‘‘ मैत्रेयी ने मुझे कुछ जरुर जाना होगा पर लिखने में शायद वह भी चूक गई है । चूकने से ज्यादा कहना चाहिए कि वह छिपा गई है। वह जो इबारत में नहीं झाँकता, पर पीछे से झाँकता जरूर दिखता है। जाने उसने ऐसा क्यों किया ? ’’ ( आउटलुक: फरवरी 2009 - पृष्ठ - 75 )




आत्मकथा लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है -  अपने जीवन, बल्कि कहना चाहिए, अपनी व्यथा से, अपने झेले हुए से, एक दूरी बनाने की । आत्मकथा लेखन में सेल्फ सेंसरशिप - स्व प्रतिबंध - अपना अंकुश सबसे पहले सबसे आड़े आता है । भारतीय समाज में परिवार एक बहुत महत्वपूर्ण इकाई है । अगर हम सच बोल रहे हैं तो हमारे अपने परिवार के या करीबी लोग नाराज हो सकते हैं। तो मेरा मानना यह है कि इस तरह के प्रतिबंधों के बीच आत्मकथा नहीं लिखी जानी चाहिए । एक ईमानदार आत्मकथा तभी लिखी जा सकती है जब आप यह मानकर चलें कि आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा, सिवाय उन जंजीरों के जो समाज ने हमारे इर्द गिर्द जकड़ रखी हैं । 





जबकि वास्तविकता यह है कि एक औरत का अपनी आत्मकथा लिखना स्त्री सशक्तीकरण की ओर बढ़ता पहला चरण है । ईमानदारी इसकी पहली शर्त है । अपने जीवन को और अपनी कलम को महिमामंडित करने या अपने गुनाहों पर परदा डालने के लिए लेखकीय बुनावट के साथ शब्दों से खेलना , भाषा की कशीदाकारी करना और कला के कीमखाबी लिहाफ में अपनी करतूतों को सजा धजाकर प्रस्तुत करना आत्मकथा की विधा के मकसद को ही डिफ्यूज करना है । 




अंत में कुछ जरूरी बातें --

सबसे पहले मन्नू जी की इस पुस्तक ‘एक कहानी यह भी ’ को पढ़ते हुए यह स्पष्ट कर लिया जाना चाहिए कि यह पुस्तक दाम्पत्य के दैनंदिन के छलावों में मरती खपती एक ईर्ष्यालु स्त्री का सियापा नहीं, बल्कि इसमें एक स्त्री रचनाकार की बौद्धिक दृष्टि और उस दृष्टि का आलोक भी है जो एक ‘सामान्य‘ स्त्री का ‘रचनाकार’ स्त्री में कायांतरण करता है। दाम्पत्य के अलावा भी साहित्यिक और सामाजिक अंतर्विरोधों के कई मुद्दों को रचनात्मकता के पार्श्व में रखकर देखने की इस पुस्तक में वस्तुगत और निरपेक्ष कोशिश है । यहाँ स्त्री के किसी गोपन जगत को खोलकर लोलुप पाठकीय उपभोग के लिए किया गया मुआयना नहीं है बल्कि आत्मसजग भाषा में एक स्त्री रचनाकार के परिवेश की मार्मिक मीमांसा है । लेकिन इसका क्या किया जाए कि हिन्दी साहित्य में आलोचना क्षेत्र के अधिपतियों की आस्वाद ग्रंथि में जादुई यथार्थ ( मैजिकल रिएलिज़्म ) के बदले आभासी यथार्थ ( वर्च्युअल रिएलिज़्म ) का चस्का लग गया है। यह एक दुखद स्थिति है कि वे महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में प्रेम के पुराने त्रिकोण के रोमांच का अतिरेक में आख्यान सुनने की अपेक्षा रखते हैं और ऐसी तमाम मीताओं की मर्मकथा सुनना चाहते हैं ताकि बौद्धिक लंपटई का साहित्यीकरण कर सकें । पुरुष रचनाकारों की आत्मकथा में क्या उन्होंने किसी छूटे हुए प्रसंग या छूटे हुए पात्र को लाने की माँग कभी की,  जो लेखक की पत्नी का लंपट प्रेमी रहा हो ?





जहाँ तक संवेदनशीलता के साथ पीड़ा और दुख दर्द को व्यक्त करने का सवाल है तो वे तो क्रिमिनल्स - जघन्य अपराधियों - के भी हो सकते हैं तो इन मीताओं के क्यों नहीं ? मीताएँ बहुत हैं और उनकी आबादी में उत्तरोत्तर इजाफ़ा हो रहा है क्योंकि साहित्य के बाजार का विचार उनकी रचनात्मकता का राजमार्ग बन रहा है । यह मुद्दा अलग है और इस पर विस्तार से फिर कभी लिखा जाएगा । अभी सिर्फ इतना ही कि आत्मकथात्मक रचना से उस ब्यौरे की अनावश्यक  माँग  बार बार क्यों की जाती है जो उस रचना का अभीष्ट है ही नहीं ?

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1702, साॅलिटेअर, हीरानंदानी गार्डेन्स, पवई, मुंबई - 400 076 





शनिवार, 20 सितंबर 2008

पीली आँधी : प्रभा खेतान

3 टिप्पणियाँ

पुस्तक के कुछ अंश


यह न आत्मकथा है और न परकथा। इस उपन्यास में कोई एक परिवार नहीं, इसमें कुल हैं, कबीला है...संयुक्त परिवार है....मगर सब कुछ टूटता हुआ, उड़ती हुई रेत के ढूहें जैसे स्त्री-पुरुष और उनकी किरकिराती हुयी रेतीले क्षण। तीन पीढ़ियों की स्त्रियां; चाची, बड़ी मां और सोमा, अपनी-अपनी बात कहते हुए भी खामोशी की धुन्ध में खोती हुई। मगर एक चीज जो सब को जिन्दा रखती है-वह है प्रेम। चाहे वह राजस्थान की सुनहली रेत हो या बंगाल की हरित्तमा-यह प्रेम ही तो है जो हम सब की पहचान है।

जो हमारे आपके सबके-सबके हृदय में धड़कता है और धड़कता रहेगा। बंगाल की बारिश में, कीचड़ और कादे से सनी हुई सड़कें राजस्थान के पदछापों की धड़कन सुनेगी और कहेगी-अरे ! यह पीली आंधी यहां बंगाल में क्या कर रही है ?





पीली आंधी

माचे पर लेटे-लेटे वृद्ध सेठजी ने करवट बदली और पास बैठी वृद्धा सेठानी की ओर देखा। सूत कातते हुए वृद्धा के हाथ रुक गए। सर का पल्लू ठीक करते हुए उसने चेहरा घुमाकर ध्यान से पति की ओर देखा। फिर सेठजी से पूछा-‘‘क्या बात है ? कुछ चाहिए क्या ?’’
‘‘पानी !’’
‘‘छाछ पी लीजिए ना ! पानी तो घड़े में थोड़ा कम ही है।’’

‘‘नहीं, मुझे पानी चाहिए। आज बार-बार पानी की जरूरत महसूस हो रही है।’’ वृद्ध ने पगड़ी के छोर से ललाट को पोंछा और सूखे होंठों को जीभ से तर करते हुए पूछा-‘‘रामेसर और किशन की कोई खबर आई ?’’

‘‘नहीं।’’ संक्षिप्त उत्तर था। ठंडी उसांस के साथ वृद्धा ने चरखे को परे सरकाते हुए फिर पति से कहा-‘दिन भर आए-गयों का तांता लगा रहता है। बात करते रहेंगे तो गला नहीं सूखेगा ? आज सुबह से चार बार तो पानी पी चुके हैं। थोड़ा छाछ से भी प्यास बुझाने की कोशिश कीजिए ना !’’

‘‘नहीं मुझे पानी चाहिए।’’ जिद्दी बच्चे की तरह मचलते हुए वृद्ध ने कहा।

बातचीत की आवाज सुनकर अब तक घर की छोटी बीणनी घंघूट काढ़े सामने आकर खड़ी हो गई। वृद्धा सेठानी ने लाड़ से अपनी इस छोटी बीणनी की ओर देखा। चटख रंग के गुलाबी घाघरे पर हरी लहरिये का ओढ़ना जिस पर छोटे-छोटे सच्ची चांदी के कटोरी वाले तारे जड़े थे, आंगी की बांहों पर चौड़ा सुनहला गोटा चमक रहा था, पैरों में चांदी की बिछिया और कड़ा, कमर में सोने की भारी तगड़ी, गले में सोने का सतलड़ा हार, गोरी कलाइयों में सोने-मीने की पछेली और लाल चूड़े से कोहनी तक भरी हुई थी। बोरला, फोणी, नाक का जड़ाऊ नथ घूंघट की झीनी आड़ से चमक रहा था। उन्होंने मन ही मन सोचा कि, बीणनी ने कौन-सा बोरला और खैंचा लगा रखा है ?

कहीं वह मोतियों वाला तो नहीं लगा लिया ? और कहीं मोती की लड़े टूट जाएं ? मोती बिखर जाए तो ? टाबर है, भोली है, कुल चौदह बरस की तो है। चार बरस पहले ही तो मुकलावा लेकर आई थी।

उनको अपनी यह छोटी बीणनी बहुत ही प्यारी लगती। गोरा खुलता हुआ रंग, गोल मुखाकृति स्थिर दृष्टि कोमल हंसी और थोड़ा नाटा कद। बीस दिन हुए बीणनी के माथे में घी दबाकर मोम चिपका कर नेवगण सिर गूंथी करके गई सो वापस आने का नाम नहीं। आकर भी क्या करे ?
सिर नहाने का पानी कहां ? नहाने के लिए अभी पानी की बरबादी करे भी कैसे ? बर्तन तक तो बालू से रगड़कर चमका लेते हैं।
बीणनी के पैरों की ओर उन्होंने देखा। चांदी की बिछिया और चांदी का कड़ा। एक ठंडी सांस अजाने ही निकल गई। कहां गए वे पुराने दिन ? इस बिचारी ने तो कुछ देखा ही नहीं। मेरी सासूजी और तायसजी तो पांवों में सोने के कड़े पहनती थीं, महाराजा गंगा सिंह जी के हुकुम से। ब्याह के बाद पहनाया तो मुझे भी गया था। लेकिन खोल कर रख देना पड़ा।

उन्होंने अपने रेजा का कत्थई रंगवाला फूलपत्ती की छपाई के घाघरे की ओर देखा, और फिर उनकी आंखों के सामने मलमल और सिल्क के सुंदर रंग-रंगीले रेशमी घाघरे घूम गए। पीले, पोमचा, लहरिया सतरंगिया ओढ़नी पर कारचोबिये का काम होता, बेल-बूटी लगी होती, रंग-बिरंगी आंगियों की बांहों में चौड़ा गोठ किनारा रहता। सेठजी पचरंगी पगड़ी और लाल अचकन पहनते।

राजा साहब के यहां पर एक बार जलसे में सासूजी के साथ गई थी। वही से तो जब भी बुलावा आता, मांजी तो गहने की पेटी खोलकर बैठ जातीं। उस दिन तो उन्होंने मुझे सच्चे मोतियों वाला सतलड़ा हार पहनाया था। मैं जब राणी साहिबा के सामने प्रणाम करने झुकी तो मोतियों की आब पर उनकी नजर ठहर गई। मांजी से वे पूछ ही बैठीं-
"यह मोतियों का हार तो बहुत सुंदर है। कहां से मंगवाया है ?"

"जी मालवे की गद्दी पर कोई व्यापारी लेकर आया था। बड़े सेठजी ने खरीद कर रख लिया था कि, कावे-ढीचे पर काम आएगा। मेरी सासूजी ने मुंह दिखाई में इसको मुझे पहनाया। आज मैंने बीणनी से कहा, "तू पहन ले।"
बगल में बैठे पासवानजी ने फरमाया-" सेठानीजी, बीणनी, आपकी बहुत सोणी, उस पर से यह फालसाई रंग का उसका ओढ़ना भी अच्छा लग रहा है।"

जब राणी साहिबा और पासवान की आंखें मुझ पर गड़ीं रहीं तो ठकराणियों की तो क्या बात करें ? वापस घर आकर मांजी ने पहले तो मेरी नजर उतारी और फिर काकोजी से सारी कहानी कह सुनाई। सुसराजी तो ठहरे स्याणे, आदमी तुरंत चुरू की गद्दी पर ओढ़ने का आर्डर भेजा गया, और मांजी से बोले कि, अपने को तो यह बेशकीमती हार राणी साहिबा को नजराने में देनी होगी। बात यह है कि, सेठाणी तुम समझ लो कि राणी की नजर जिस पर पड़े वही उसका नजराना होता है। मोतियों का कंठा लेकर सासूजी खुद गई थीं
और ओढ़ना भेजा गया था, पासवानजी के पास।
उन्होंने प्रत्यक्ष में पति से पूछा-"हां...जी ! आपको वह मोतियों के कंठे की याद है ना ?"
"तेरी मति कहां चली गई ? मैं पानी के लिए छटपटा रहा हूं और तू कौन से कंठे का जिकरा लेकर बैठ गई ?" सेठजी एकदम से झल्ला उठे।

छोटे बेटे किशन की बीणनी एक कदम और आगे बढ़ी, चुड़ले की आवाज सुनकर सास ने कहा-"बीणनी काकोजी पानी मांग रहे हैं, एक गिनौड़ा डाल देना, प्यास कम लगेगी।"

"दादी, मैं भी एक गिनौड़ा चूसूंगा...!" बाहर से दौड़कर आते हुए माधो ने कहा।
"तू राम मारया ! इत्ती लाय में बाहर क्या कर रहा था ?"
"दादी तिबारे में ही तो था, भायलो के साथ गिल्ली-डंडा खेल रहा था।" अब वह वापस मचल रहा था-"दो....ना....दादी, गिनौड़ा दो....ना, तुम तो गिनौड़ा छुपा कर रखती हो।"

"दे बीणनी दोनों छोरों को एक-एक गिनौड़ा दे दे। चूसते रहेंगे तो प्यास कम लगेगी।"
"जी !" कहते हुए बीणनी, चौके की ओर वापस मुड़ गई। मांचे के पास जमीन पर बैठा खेलता हुआ बच्चा अपनी मां को यों पलटते देख जोर से चिंघाड़ उठा।

"अरे गीगा क्यों रो रहा है ? ज्यादा रोएगा तो गला और सूखेगा।" सेठजी ने कहा।
"हो जाएगा चुप, अभी हो जाएगा।" कहते हुए उन्होंने बच्चे को गोद में बैठा लिया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए वृद्धा सेठानी वापस अपने ख्यालों में खो गई-

छोटी बीणनी के पीहर वालों ने मुकलावा अच्छा दिया था। नवलगढ़ वालों की हैसियत अच्छी है। बस सासू की तील थोड़ी हल्की थी, लेकिन जाने दो क्या फायदा मन में शिकायत रखकर, बड़ी बीणनी के पीहर से तो वह भी नहीं आता। छोटकी के मुकलावे के दस दिन बाद ही तो दोनों बेटे दिसावर चले गए थे। कमाई के लिए जाना ही पड़ता। कोई उपाय भी तो नहीं, लेकिन अबकी यात्रा और लंबी थी-"रायबक्सगंज तक की। किशन तो साथ जाता ही। लेकिन किशन ने तो बस बेटा होने की खबर ही सुनी है,
उस समय जो दोनों भाई गए तो फिर गांव लौटकर ही कब आए ? अबकी तो आते ही दो काम बड़े करने हैं-एक तो खिचड़ी का नेग और दूसरे सालासारजी जाकर "गीगे" का जड़ुला (मुंडन) करवाना है, साथ में परोजन का भी नेग होता है। लेकिन दोनों नेग एक साथ करेंगे ना, तो किशन के सासरले सासू की तील हल्की कर देंगे। इससे तो अच्छा है कि जात-जडुला बाद में कर लेवें।
इसी बहाने बेटों में रामेसर नहीं तो कम से कम किशन को तो गांव जल्दी ही आना होगा। गीगा तीन का हो गया, पांचवां लगते ही मैं तो जड़ुला करवा दूंगी। इसकी अभी से ही चोटी गूंथनी पड़ती है। बालों में खेलते-कूदते बालू ही बालू भर जाती है।
वृद्धा सेठानी की एक ठंडी सांस कमरे में फैली गर्म हवा के साथ ठहर गई। अपने-आप में मां की प्रतीक्षा थी-बेटों के लिए। जाते समय उन्होंने बेटे रामेश्वर से पूछा भी था, "क्यों बेटा मिर्जापुर नहीं जाओगे ?"

"नहीं मां, वहां अब पहले वाली कमाई नहीं। हमें तो रायबक्सगंज से भी और आगे जाना होगा। कंपनी सरकार तक। देख नहीं रही हो कि, घर में खाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।"
"एक ही तो पोता है, दस वर्ष का।" प्यार से अपने बड़े पोते माधो के सर पर हाथ फेरते हुए उन्होंने बेटे से कहा था। दादी की ममता से माधो खिल उठा था।

"जी, दस महीने में छोटकी बीणनी के एक और आ जाएगा।" घूंघट को सामने खींचते हुए बड़ी बीणनी ने कहा था।
"देखो लंगड़िया बाबा की किरपा होगी तो। कहां बेटे पड़े हैं, तुम तो दस बरस में एक ही पैदा करके थक गई।"
घूंघट के अंदर एक ठंडी सांस थी। बिना कुछ कहे भी वृद्धा सास इन उसांसों का अर्थ समझती थी। बड़ा बेटा रामेश्वर देश में रह ही कहां पाया ? तीन-तीन बरस की लंबी दिसावरी।

पति-पत्नी साथ रहें तब ना बच्चे हों। अफीम के कारोबार से सेठजी ने पैसा तो कमाया ही था। लेकिन अब उनका गिरता हुआ स्वास्थ्य और दिन-दिन भर अम्मल पानी के नशे में मांचे पर पड़े रहना। नाई, ब्राह्मण, यार दोस्तों का जमघट लगा ही रहता।
‘‘दादी प्यास लगी है।" अब पानी मांगने की माधो की बारी थी।
"दिन भर उछल-कूद करेगा तो प्यास नहीं लगेगी ? जा, चाची से मांग कर छाछ पी लो।" फिर मानो अपने आप से बोली-"गला तो सभी का सूख रहा है, लेकिन घर में पानी कहां ?"
"क्यों ?" वृद्ध सेठजी की सफेद भौंहों में बल पड़ गए।

"बड़ी बीणनी दो दिन से बुखार में तप रही है, छोटी बीणनी की आंखें देर से खुली, तब तक गांव की लुगाइयां नोहर की ओर चली गई थीं।"
"लेकिन तू क्या कर रही थी ? तू तो चार बजे उठ ही जाती है।" वृद्ध के स्वर की रुक्षता से वृद्धा ने भी चिढ़कर उत्तर दिया-
"मेरा तो बुढ़ापे का शरीर ठहरा। गोड़े के दरद से तो मैं खुद परेशान हूं।"
"कितनी बार कहा, मेथी की फांकी ले लो।"
"मुझे नहीं भाता।" नवोढ़ा की तरह ठुनकते हुए वृद्धा ने कहा।
"तो भागवान तू मेथी के लाड़ू बनवा लेती।" वृद्ध के स्वर में लाड़ था।

"जी, अब आप चुप करिए तो, क्या जोर आया बोलने में ? बीणनियां तो घर के काम में उलझी रहती हैं।" वृद्धा रोते हुए बच्चे को फिर वापस थमकने लगी...और मानो पुनः स्वयं से बोली-
"बड़की बीणनी तो दिन भर नमक की डली-सी घुलती जा रही है। इतनी तो माड़ी हो गई। रोज शाम को हल्की बुखार चढ़ जाती है। लेकिन तब भी काम में फुर्ती है। काम अधूरा नहीं छोड़ती। यह तो छह सात दिन से उसने एकदम खाट पकड़ रखा है। बुखार में बेहोश जैसी हो रही है। वैद्यजी का इलाज काम नहीं आया। कितना इलाज कराया था। जत्तीजी को भी दिखाया था, नाड़ी देखकर सर हिला दिए, बोले-"बहूराणी के लक्षण ठीक नहीं, मुझे तो राजरोग लगता है।"

मैंने तो पांव पकड़ लिए थे-"महाराज कोई दवा तो दीजिए। दस बरस का बेटा है, उसकी ओर जोहिए। आप क्या नहीं कर सकते ? मावस की अंधेरी रात को चमाचम पूरणमासी में बदल सकते हैं। आपने तो महावीर स्वामी की इतनी बड़ी तपस्या की, महाराज कोई दवा तो दीजिए। मैं तो बहुत रोई। बहुत गिड़गिड़ाई।"

वृद्धा सेठानी ने चर्खा अपनी ओर खींचा और वापस सूत कातने लगी-"घर-गृहस्थी में काम किए बिना कैसे सरे ? बक्सा में काफी सूत जमा हो गया है। थोड़ी और जमा हो जाए तब लीलगर को रंगने के लिए दे दूंगी। मुझे तो रेजे का यह कत्थई रंग जरा भी नहीं सुहाता। अबकी बार तो मैं उससे कहूंगी-भाया, जरा तेरी लुगाई से सलाह कर ले ! मोटे सूत पर केशारिया रंग ठीक से नहीं खिले तो थोड़ा मिलता-जुलता रंग कर दिए।"

"रामू की मां तेरा तो माथा दिन पर दिन खराब हो रहा है। तू जत्तीजी की बात कर रही थी ना !" सेठजी ने फिर पूछा।
"हां...हां...कहा न मैंने कि, जत्तीजी ने नाड़ हिला दिया। बोले बीमारी बहुत बढ़ गई है, मेरे पास इलाज नहीं है। उन्होंने बीणनी को आशीर्वाद भी नहीं दिया।"

"ओ..हो, जत्तीजी ने आशीर्वाद नहीं दिया ?" अबकी चौंकने की बारी सेठजी की थी। "वे त्रिकालदर्शी हैं, घणा तप किए हैं। उनकी बात गलत नहीं हो सकती, रामेसर की मां ! कभी-कभी सोचता हूं तो कलेजा हिल उठता है।"
"बीणनी कह रही थी कि रचनगढ़ में एक अंग्रेजी पढ़ा हुआ डाक्टर है। दो रुपया फीस का लेता है।"

"रामेसर को आ जाने दो, उसका भी बंदोबस्त हो जाएगा। देखो, तकदीर का लेखा कोई नहीं मिटा सकता। लेकिन पाणी तो छोटी बीणनी भी कर ला सकती थी ?" पानी के बारे में सेठजी का पुनः प्रश्न था।

"ओ.....हो....आपके तो कुचरनी बहुत लग जाती है। कहा न कि, छोटी बीणनी की नींद देर से खुली।"
भीतर, पैंडे में छोटी बीणनी ने घड़े के भीतर झांका आधे से ज्यादा घड़ा खाली देखकर मन ही मन अपने को बरजने लगी-बास तो लगे मेरी नींद को। सूरज चढ़ने तक सोती ही रह गई। कागे की कांव-कांव से भी नींद नहीं खुली। लेकिन आज सुबह कागा मेरी खिड़की पर बैठा था। कौन आएगा ? मुकलावे के बाद जिसके साथ मैं बस दस दिन ही रह सकी थी। उसके हृदय में एक हल्की-सी पीर उठी।
एक कसक, एक रीती चीख...क्यों आखिर क्यों हमारे पुरुषों को दिसावरी में जाना पड़ता है ? और वह भी इतनी कम उमर में ? गांव का नाई नहीं जाता, जोशी नहीं जाता, ठाकुर नहीं जाते, राजा साब नहीं जाते, फिर खाली हम बाणिये ही क्यों जाते हैं ? जैसे उनका गुजारा होता है, वैसे हमारा भी क्या नहीं हो सकता ? उसको याद आया-हां, यहीं तो मैंने चार साल पहले उस दिन, उस आखिरी रात को अपने पति से भी पूछा था-

"क्यों जी, क्या यहां अपने सुजानगढ़ में गुजर-बसर नहीं कर सकते ? कोई दुकान खोल लीजिए।"
"तुम भी क्या बोलती हो ? बाणिये का बेटा घर में मोदी की दुकान खोलकर बैठ जाए, दो सूखी रोटी में गुजारा कर ले...तब हो चुका गांव वालों का भरण-पोषण। यह मत भूलो कि, तुम सेठ गुरमुखदास रूंगटा के पोते की बहू हो। दादाजी तो रतनगढ़ रहते थे। अफीम का बहुत बड़ा व्यापार था।

जब मालवा, अजमेर, मिर्जापुर की गद्दियों से मुनीम गुमाश्ते लौटते, तब दादाजी बीकानेर महाराज के लिए अशर्फियों से भरा चांदी का थाल नजराने में ले जाते। यह तो कंपनी सरकार की वजह से अफीम का कारबार बंच हो गया। एक बार तो रुपये की चौकी बनाकर महाराज को उस पर बैठाया गया था। दादाजी ने महाराज का तिलक किया, इक्कीस तोपों की सलामी दी गई और नजराने में वे सारे नोटों की गड्डियां पेश की गई थीं।"

"आपको याद है ? आपने महाराज गंगासिंहजी को देखा था ?"
"मुझे तो उतना याद नहीं, लेकिन रामेसर भाया को रतनगढ़ की सारी बातें याद हैं। वे ही कभी-कभी बताया करते हैं। लेकिन तब भी अपने महाजनी में बहुत कमाई थी। राज घराने से रोज धन की मांग आती, आखिर हम भी कहां तक राजाजी को धन निकाल-निकाल कर देते ?

कितना सदाव्रत खोलते ? हम भूखे तो नहीं मर सकते थे। छप्पनिये के अकाल के बाद भी अपने देश में अकाल पड़ता ही रहता है। आए दिन के इन अकालों से हमारी तो हिम्मत टूटने लगी थी।
वह अपनी बाल सुलभ चंचलता को भूलकर पति का चेहरा निहारती रह गई थी।

उसने धीरे से मुस्कुरा दिया...उसकी आंखों के सामने पति का खूबसूरत चेहरा था-वह ध्यान से निहार रही थी। अपने पति का चौड़ा ललाट, बड़ी-बड़ी आंखें ऊंची नासिका, लाल होंठों के ऊपर बारीक मूंछें, नुकीली ठुड्डी। ब्याह के समय पीहर में बड़ी भावज ने बड़ा हुलस कर गाया था।

"म्हारी ननदल बाई तो सुकुमार ए नन्दोई म्हाने प्यारा लागो जी !"
मां ने कहा था-"देखो भगवान ने नाम का भी कैसा हिसाब बैठाया, अपनी राधा को साक्षात् कृष्ण कन्हैया ही मिले।"
शायद वह अपने आपसे कुछ और बातें करती। शायद वह फिर उस कागे के बारे में सोचती जो पिया के पास उसका संदेश लेकर जाएगा, शायद यह भी सोच लेती कि क्या पता दिसावरी करने गया हुआ उसका पति आज ही लौट आए और वह हल्के-हल्के गुनगुना उठी-
"उड़...उड़ रे...म्हारा काला कागला, जे म्हारा पीवजी घर आवे। खीर खांड को थाल परोसूं....थारी सोने चोंच मढ़ाऊं रे कागा...थारी...जलम...जलम...गुण गाऊं रे...कागा जलम...जलम..."
लेकिन तब तक वृद्धा सास की तेज आवाज थी...हां, ऐ बीणनी कहां रह गई ?"

आवाज से वह चौंकी। गिलास में पानी डालते हुए घबराहट में थोड़ा पानी बाहर छलक गया। अफसोस और गिला से उसका कलेजा उमड़ आया। इतना पानी तो बच्चा ही पी लेता। कब से रो रहा है। या फिर जिठाणीजी को पिला देती, बुखार से उनका शरीर तप रहा होगा, कंठ सूख रहा होगा।
घूंघट को और थोड़ा नीचे खींच वह उठ खड़ी हुई। काकोजी कल ही तो मांजी को बता रहे थे...राम की मां तुम तो छप्पनिये के अकाल की तो कल्पना नहीं कर सकती..ढोर-डांगर की तो किसको चिंता थी। चारों तरफ हड्डियों के कंकाल के डेर लग गए थे। प्यास से आदमी तड़फड़ाने लगे थे।
भूख और गरीबी देखी नहीं जाए। दिन में एक बार बाजरे की लाप्सी मिल गई या किसी को दो टिक्कड़ खाने को मिल जाए गए तो बहुत बड़ी बात थी। क्या करते लोग, रोजगार की खोज में सब निकले। सेठ, साहूकार निकले, उनके मुनीम गुमाश्ते निकले। कोई अजमेर, मालवा की ओर गया, कोई पंजाब की तरफ, तो कोई बंबई की ओर।
बापूजी ने मालवा में अफीम का व्यापार तभी शुरू किया था। अपनी अफीम की पेटियां चीन और जापान तक जातीं। साथ ही बड़े ताऊजी ने चुरू में गद्दी खोली, महाजनी का काम बढ़ाया।"
"छप्पनिये की अकाल की तो मुझे ज्यादा बेरा नहीं, लेकिन यहां सुजानगढ़ में भी तो सेठ छेदीलालजी की जोहड़ भी सूख गई, पानी कहां ? खाली काचड़ी ही कीचड़ दिखाई देता है। दो साल पहले जब बिरखा हुई थी तो जोहड़ कैसा लबालब भर गया था। गांव के सब लोग गोठ करने गए थे।"
"कहावत है न, कि अपने देश में तो हर "तीसरो सूखो, आठवों अकाल" पड़ता ही रहता है।" हताशा के स्वर में सेठजी ने कहा।
भीतर छोटी बीणनी ने अपनी फटी हुई एड़ियों की ओर देखा और सोचा, कितना भी घी लगाकर सोए, लेकिन पीली रेत पर कोसों का आना जाना, जूती के भीतर तलवे जलने लगते हैं, एड़ियां फटने लगती हैं। उसने देखा, घड़े के जमीन पर गिरा हुआ पानी मिनटों में सूख गया। सुजानगढ़ की जमीन प्यासी थी।

सास-ससुर की बात सुनकर बीणनी को भी ख्याल आया कि, हां हमारे हेली के पीछे वाला कुआं भी तो सूख ही गया। कुआं तो मेरे ब्याह के बाद ही बनवाया गया था। जिस दिन पहली बार कुएं का पानी निकाला गया था, तब पानी चखने के लिए सारा गांव उमड़ पड़ा था। लंगड़िये बाबा के नाम का राती जुगा हुआ, चूरमे का परसाद किया गया था। कोई दो सौ आदमियों को तो जीमने बुलाया गया था।

कुएं की सारण ढालू रखी गई ताकि बेचारे बैलों को मेहनत कम पड़े। कुएं की पास की बाड़ी में हरी साग-सब्जी होती। रामी दादी तो बिचारी जात की भंगन ठहरी, कभी कुएं के ऊपर नहीं चढ़ी, नीचे बनी खोलों से ही पानी ले जाती या फिर पास बनी गढ़ाइयों में ही अपनी पीतल की चमकती हुई गोल कलसी डुबाती। सबेरे-सबेरे माली काका पानी खींचने के लिए बैलों को जोत देते और भजन गाते, सुनकर मन निहाल हो जाता।

शाम को हेली के पिछवाड़े सारा गांव जमा हो जाता, मेला लग जाता। लेकिन इतना अच्छा कुआं भी सूख गया। मांजी के मन में तो इसका विचार भी बहुत हुआ, कुआं, सूखना अच्छा सगुन नहीं। कई बार जी नाराज करने लगती है, देख ऐ बीणनी कुआं कैसे सूख गया। देखो, रामजी की मरजी जो होसी सो होसी।

ठंडी सांसों के साथ छोटकी बीणनी ने मन ही मन कहा-लेकिन कुआं तो अंधा ही हो गया। अब तो पानी लाने के लिए पांच कोस, सात कोस आना जाना पड़ता है। मैं तो रोज ही जाती थी। बस आज ही गलती हो गई। पास-पड़ोस की बहुएं और बेटियां तो सुबह पानी भर के ला चुकी होंगी। नोहर पर उगी थोड़ी बहुत हरी सब्जी मालण लाकर बेच भी गई।

अब कौन जाएगा इतनी दूर....एकेले तो मैं जा नहीं सकती और न ही मुझे जाने दिया जाएगा, लेकिन घड़े में तो पानी नाम भर का है, किससे कहूं....अपने ही सोच में डूबी उसने पानी का गिलास सास को पकड़ाया और रोते हुए बच्चे को गोद में उठा लिया।
"लीजिए, पानी पी लीजिए।" सेठानी पत्थर की दीवारों के पार देखते हुए अपने-आप से कहने लगी-"बाहर लाय पड़ रही है।"
"गाय-बछड़ों की ओर तो देखा नहीं जाता, उनकी पीठ पर जगह-जगह घाव हो गए हैं। उस पर अपनी धोलती गाय तो उठकर खड़ी नहीं हो पा रही। घाव पर मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं। बिना चारे पानी के वह कितने दिन जीएगी ? उसकी पूंछ में ताकत ही कहां बची होगी कि, भिनभिनाती मक्खियों को परे सरकाए।" सेठजी मानों खुद से ही कह रहे थे। या अपनी सेठानी से ? या चौखटे पर खड़ी छोटी बीणनी से ?

"ऐ रामजी, सोच-सोचकर मेरा तो कलेजा मुंह को आता है। मेरी गोमाता को कुछ हो न जाए। अब गांव के वैद्यजी से कुछ पूछिए ना..." वृद्धा सेठानी के स्वर में प्राणों की छटपटाहट थी।

"रामू की मां, तुम भी क्या टाबरपने की बात करती हो। पानी नहीं। गांव में कहीं पानी नहीं। हरी घास का तिनका नहीं..कहां से इनके लिए चारा मंगवाऊँ ? क्या करूं ? मेरी अपनी बुढ़ापे की लाचारी।"
"हे पीतर देवता, मेरी गोमाता की रच्छा करीयो।" सेठानी ने आंसू पोंछते हुए कहा-"ऐसा अशुभ नहीं हो जाए। अनर्थ हो जाएगा।"
"हवा के रुख से तो मुझे लगता है, आंधी आएगी।" पानी का खाली गिलास पत्नी को पकड़ते हुए सेठजी बोले।
बच्चे को कंधे से सटाए-सटाए छोटी बीणनी ससुर की बात सुनकर सहम सी गई। रे मेरी, मां इतने कम पानी से कैसे काम चलेगा ? पड़ोस की काकी सा से मांग कर ले आती हीं, उनके बंद कुंडे में तो पानी होगा, आधा घड़ा पालर मांगने में कोई वे मना थोड़े ही करेंगी ? कल एक घड़ा और ज्यादा भर कर ला दूंगी। नहीं होगा तो कुएं पर दो बार चली जाऊंगी, चार-पांच घर ही तो बाणिये के हैं, जहां से पानी उधार लिया जा सकता है।

राजा साहब के घर से या पासवानजी के घर से भी लिया जा सकता है, लेकिन सासूजी को पसंद नहीं। राजा साहब के घर से यदि कभी कुछ खाने-पीने का सामान आ जाए तो मांजी बिना कुछ कहे परे सरका देती हैं-"किसी से कुछ कहना मत, लेकिन राजा साहब के घर तो भक्ष्य-अभक्ष्य सब कुछ बनता है। अपने उनका छुआ हुआ पानी भी नहीं पी सकते।"
बार-त्यौहार कभी जीमने का न्यौता आए तो बीणनियां चली जातीं, लेकिन सासूजी नहीं। कहतीं-"उनकी गढ़ी में रहते हैं तो इसका यह अर्थ तो नहीं कि अपना धरम भ्रष्ट कर लें।"

ब्राह्मण के घर कुछ खाने का सवाल ही नहीं पैदा होता। ब्राह्मण को अपने दान दें या फिर उससे लेकर खाएं और यही बात दूसरे छोटे लोगों पर लागू होती है।

"ले बीणनी, गिलास ले जा। गरमी के मौसम में भी अम्मलपानी (अफीम) का नशा करेंगे तो प्यास तो लगेगी ही...तुम किसी सोच में डूबी हो ?"
"जी घड़े में पानी नहीं है।" उसने धीरे से सास से कहा।

"बीणनी पानी तो कहीं नहीं है। ढोर-ढांगर तड़फड़ा रहे हैं....प्यासी धरती की छाती फटी जा रही है। कैसा तावड़ा है कि आंख नहीं खुलती और आकाश से तो लाय बरस रही है, लाय ! यह गांव सुजानगढ़ है भी ऐसा। वहां चुरू में तो कितने कुएं हैं। बीकानेर महाराजा गंगासिंहजी के नहर बनाने से तो काफी समस्या सुलझ गई।"

"तुमने फिर बीकानेर की बात छेड़ दी ? तुमको यह गाँव अच्छा नहीं लगता ना, भागवान ब्याह कर आए इतने बरस हो गए। रतनगढ़ से यहां सुजानगढ़ आकर बसे बीस बरस हो गए लेकिन तू इस गांव की बुराई करने से नहीं चूकती।"
बीणनी के कान में सास-ससुर की बात पड़ी। उसने सोचा, पता नहीं क्या बात है

कि, आजकल बात-बात में काकोजी और मांजी की लड़ाई हो जाती है। कहां-सुनी का अंत नहीं। क्या वजह हो सकती है ? बुढ़ापा ? नहीं, यह राम मारी गरमी के कारण। गरमी भी तो कैसी गरमी नस-नस को सुखा डाले, ऐसी लू चलती है।

साभार : भा . सा. सं.
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