गुरुवार, 30 अक्तूबर 2008

एकालाप : अभिनव शाकुंतल : स्त्रीविमर्श

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एकालाप-11
अभिनव शाकुंतल
- ऋषभ
देव शर्मा




-

यह दूसरी शकुंतला
यह दूसरा दुष्यंत.
इस बार फिर
गान्धर्व विवाह,
इस बार फिर
वही
अपरिचय का नाटक,
वे ही लांछन, वे ही धक्के।



और फिर
आ गया है चक्रवर्ती
भूल के अपराध को
भूल जाने को,
भोली शकुंतला को
राजमहल के
स्वप्न दिखाने को।



शकुंतला
लेकिन शकुंतला नहीं रही.
प्रेम का मायाजाल
और नहीं मोह पाया.
आँखें अंगार हुईं,
उठ गई तर्जनी।




तर्जनी संकेत पर
सिंहों से खेलता
बालक भरत
बोला पास आकर यों-



राजरानी कौन,
राजमाता मैं बनाऊँगा.
सिंहासन मेरा है,
भीख नहीं लूँगा मैं

राजा से छीन लाऊँगा.



बुधवार, 22 अक्तूबर 2008

भेज रही हूँ नेह निमंत्रण, २५ का ... / (Hindi-Bharat)

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हिन्दी भारत
समूह को आरम्भ हुए आज २३ अक्तूब को पूरा एक वर्ष हो गया । इसके इस कार्यकाल को समूह के साथियों की उपस्थिति ने अत्यन्त जीवन्त व प्राणवान् बनाए रखा है।

मैं एक वर्ष के अतीत में आज देखती हूँ तो वे कुछ दिन स्मरण हो आते हैं जब इसके गठन के लिए मूल चिन्ताओं से व्यग्र हो यह प्रयास आरम्भ किया था। भविष्य में देखती हूँ तो आने वाले समय के लिए बहुत -सी सुखद कल्पनाओं से भर जाती हूँ। किसी भी संस्था अथवा संगठन का अस्तित्व उसके बने रहने मात्र में नहीं निहित होता अपितु प्रकारान्तर में उसके मन्तव्यों के सफलीभूत होने में निहित रहता है। जैसे जैसे सामूहिक चिन्ताओं पर सामूहिक सम्वाद की स्थितियाँ बनती हैं तैसे तैसे उनके निराकरण की दिशाएँ व मार्ग भी प्रशस्त होने की सम्भावनाएँ प्रबल होती चली जाती हैं। यों होना तो उस से अधिक चाहिए, अपेक्षित भी होता है किन्तु यही क्या कम हर्ष का विषय है कि किसी मुद्दे को लेकर कम से कम देश दुनिया में रहने वाले कुछ मुट्ठीभर लोग तो एकत्र हुए! बस, इसी सामूहिकता के बूते बड़ी बड़ी सुलझनें भी पा ही ली जा सकती हैं; आशा बल देती है.

अस्तु!
इस प्रथम वर्षगाँठ को वार्षिक अधिवेशन के रूप में २५ अक्टूबर, शनिवार को नेट पर एक सामूहिक चर्चा के माध्यम से सम्पन्न करने का विचार बन रहा है। यदि आप में से कोई नया विचार सु्झाएँ तो उसका भी स्वागत है। इसे भारतीय समय से रात्रि बजे व यूके (लंदन समय) .३० बजे दोपहर को आरम्भ करने की योजना है ; लगभग दो घंटे का कार्यक्रम रहेगा । इसे याहू के मैसेंजर के माध्यम से चित्र व ध्वनि-कॊन्फ़्रेन्सिंग के रूप में सम्पन्न किया जाएगा । जिसमें एक हेडफ़ोन ( माईक सहित) की आवश्यकता होगी। परिचर्चा को सम्बोधित करने के लिए ३-४ वक्ताओं की अभी योजना है, जो १५1 मिनट हमें सम्बोधित करेंगे। शेष एक घंटा हम परस्पर सम्वाद का सुख लेंगे। (- यह अभी तक ऐसी इच्छा है।) आप सभी किसी भी प्रकार का सुझाव देना चाहें तो स्वागत है। तुरत प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा है। नेट पर भाषा, संस्कृति, सामाजिक प्रश्न व साहित्य आदि में रुचि रखने वालों से निवेदन है की अपनी उपस्थिति से इसे सफल व सार्थक बनाएँ | इसा खुले मंच पर सभी का स्वागत कर हर्ष होगा |

इसके तकनीकी पक्ष के लिए नीचे दी गई जानकारी देखें -
विस्तृत जानकारी


सामूहिक चर्चा में भाग लेने के लिये :
  1. आप को याहू id और याहू मेसेन्जर सौफ़्ट्वेयर की ज़रूरत होगी । यदि आप के पास याहू id नहीं है तो एक नया id बनायें । याहू मेसेन्ज़र सौफ़्ट्वेयर यहाँ उपलब्ध है , download करें और स्थापित करें http://messenger.yahoo.com/
  2. याहू मेसेन्ज़र पर logon करें (याहू id का प्रयोग करते हुए).
  3. याहू मेसेन्ज़र में Contacts और फ़िर Add a Contact पर click करें | email address की जगह bharathindi@yahoo.co.uk टाइप करें और next पर Click करें । एक बार फ़िर next पर Click करें और फ़िर finish पर ।
  4. निर्धारित समय (भारतीय समय रात बजे, न्यूयार्क समय सुबह ११:३० बजे लन्दन समय दोपहर .३० बजे) याहू मेसेन्ज़र पर logon करें । आप को एक Conference Call में शामिल होने का निमंत्रण मिलेगा , उसे स्वीकार करें ।
  5. Chat Window में आवाज के लिये Call और यदि आप के पास web camera है तो webcam पर Click करें ।
  6. आप को आवाज़ सुनने के लिये speakers और बोलने के लिये Microphone की ज़रूरत होगी । यदि आप के पास headphone है तो वह speaker और Microphone दोनों का काम कर सकते हैं। यदि आप के पास web camera है तो और लोग आप को देख सकेंगें ।
  7. पूर्व में इस तरह के प्रयोग में देखा गया था कि यदि आप के पास Vista Operating Systsem है तो आप को शायद Conference call में न जोड़ा जा सके ।
  8. वार्ता शनिवार को करना तय हुआ है । इस की तैयारी के लिये शुक्रवार को ठीक उसी समय एक प्रयोग किया जा सकता है ।
  9. यदि आप के पास कोई प्रश्न हो तो इस ब्लॉग पर टिप्पणी के रूप में लिखें। यदि अपना ईमेल यहाँ न देना चाहें तो आपको उत्तर भी यहीं प्राप्त होगा ।
  10. जो इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं, वे Yahoo Messenger पर जा कर bharathindi@yahoo.co.uk को अपने Contacts में जोड़े या bharathindi@yahoo.co.uk पर एक पत्र भेजें ।

- आप सभी की उपस्थिति प्रार्थित है |




मंगलवार, 21 अक्तूबर 2008

वूमन इन इस्लाम - An Axegesis (४) - Abul Kasem

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स्त्री, भले ही वह किसी भी वर्ग-विशेष से सम्बन्ध रखती हो, अपने सामान्य मानवीय अधिकारों के प्रति पक्षपात का शिकार हुई है, होती चली आई हैजिस पर समाज के निर्माण का दायित्व व्यवस्था में सर्वाधिक था, वह स्वयं ही उस व्यवस्था समाज में दोयम दर्जे की उत्पीड़न की त्रासदियों से दो -चार होती रही हैहमारा उद्देश्य किसी भी वर्ग, जाति,सम्प्रदाय, मत अथवा क्षेत्र की सीमा से परे जा कर सारे स्त्री समाज को अपने प्रति बरते गए रवैये के प्रति सचेत करते हुए पारस्परिक सद्भाव की आपसी समझ की पहल उनमें जगानी हैसाथ ही ऐसे प्रत्येक व्यवहार भेदभाव को रेखांकित करना है, जिसके सन्दर्भ में कोई भी समाज अपनी आनेवाली नस्लों के सम्मुख गौरवान्वित नहीं हो सकता

यह लेखमाला सिडनी के श्री Abul Kasem ने तैयार की है, जिसकेभाग पूर्व में प्रकाशित किए जा चुके हैं। उसपर मिले प्रतिक्रियात्मक (विरोध) आलेख को भी उसी श्रृंखला में पूरा प्रस्तुत किया गया था। लंबे अन्तराल के बाद पुन: मूल श्रृंखला की चौथी कड़ी को अब यहाँ देखें-पढ़ें .........
क.वा.

Women in Islam: An exegesis

by Abul Kasem
(Part -4)

Sharia is on men's side and make no mistake about it!

Islam has shocked the world with the its best kept secret, that is, Sharia laws, especially its provision on matters of sex, marriage, gender rights, polygamy-etc. Islamists are dying to enact these barbaric laws wherever they see their potential of success. A few of the once secular countries (such as Iran, Pakistan, Afghanistan, Sudan, and certain parts of Malaysia and Nigeria) have come under these medieval, uncivilized, barbaric rules of Islamic Sharia. Words fail to describe the inhumane, tormenting, and mind boggling cruelty and despicable provisions contained in the Sharia laws. More importantly, this Sharia has totally robbed the Muslim women of whatever little rights they could exercise during the 'decadent' secular rules. The worst and the largest victim of Sharia had been the women, unquestionably. Quite often, we find a woman is to be stoned to death for being raped by criminals. A victim is to be executed for the crime committed by the culprits!! This is what is 'true' Islamic justice.

Why is it so? Isn't Islamic justice the perfect justice system on earth? After all, the Sharia is Allah's laws. Allah could never do such abominable injustice to women. What a load of rubbish! Sharia is designed to protect men all the way. Through and through. It is simply because tyrannical men who call themselves prophets of God wrote those laws. Didn't they? That is precisely why Sharia is always and will always remain on men's side when it comes to sex, family, matrimonial-any matter where both sexes are involved. In making Sharia, these prophets never consulted women. Imagine what would be the provisions of Sharia if the prophets were women and not men.

Here I am citing a few examples of the bias of Sharia for men।

Men can punish rebellious wives by beating them. However, a woman cannot punish a rebellious husband in a similar manner. If the man is cruel then the woman must seek to please him and compromise with him as per verse 4:128

Men are greedy; if women fear cruelty from men then they can make an amicable settlement...4:128

004.128
YUSUFALI: If a wife fears cruelty or desertion on her husband's part, there is no blame on them if they arrange an amicable settlement between themselves; and such settlement is best; even though men's souls are swayed by greed. But if ye do good and practise self-restraint, Allah is well-acquainted with all that ye do.

Women should beg a man not to divorce her (Shahih Bukhari 7।62.134)

Volume 7, Book 62, Number 134:

Narrated Aisha:

regarding the Verse: 'If a wife fears cruelty or desertion on her husband's part ...') (4.128) It concerns the woman whose husband does not want to keep her with him any longer, but wants to divorce her and marry some other lady, so she says to him: 'Keep me and do not divorce me, and then marry another woman, and you may neither spend on me, nor sleep with me.' This is indicated by the Statement of Allah: 'There is no blame on them if they arrange an amicable settlement between them both, and (such) settlement is better." (4.128)


Polygamy by men is divine. Don't we know this already?

Many Islamic writers take great pride to announce to the world that Islam was the only religion that put a limit on the number of wives that a man can have at any given time. They always cite very ancient, biblical customs when many men used to have unlimited wives. They even go one step further in saying that 'actually Islam promotes monogamy since Qur'an says that it is impossible to be fair with all the wives-and that is a requirement by Allah to have multiple wives, therefore, it is not possible to have more than one wife at any time'. What a convoluted logic! Even a primary school kid will laugh when this type of inane argument is presented. Another issue they always try to avoid is that they never talk about the modern secular matrimonial laws. They are always living in the past --very distant past indeed, at least a few thousand years behind. A further tactic used by these "erudite" Islamic scholars is that they will exhort hundreds of virtues of polygamy when asked why they do not compare their rules with secular ones.

What a bizarre situation. Think of it. At one point, they are adamant that monogamy is the way to go-and Islam is actually for monogamous marriage. At the same time, just like a chameleon they quickly change color to eulogize polygamy for infinite reasons. They will even tell you that the best cure for today's promiscuous society is actually the practice of polygamy by men. According to them, polygamy is a divine provision for men. It is because men, by nature, desire to have multiple sex partners. So, instead of turning to the prostitutes for this excess libido, they should marry more women. How about multiple husbands at any time by a woman? Does not women also desire to have sex with many men? Nope. No way. Allah is absolutely against this. Why? Have any Islamist ever asked any woman on this matter? If they have not, then let me say that the desire to have sex with multiple partners is equally strong in women as it is with men if not more. Have a look at nature. You will see plenty of examples. In fact, prehistoric societies were matriarchal where a woman was the center of everything. She used to have many sex partners without any problem just as Islamic men have multiple wives today.

Can we not, therefore, conclude that Islamic polygamy is just a sexist phenomenon, unfair and an utterly illogical provision on the pretext of enforcing divine sanction?

Let us look at some of the provisions of Islamic polygamy in the Holy Scriptures.

Four free women wives (some say nine) at a time and any number of slave girls are permitted...4:3

004.003
YUSUFALI: If ye fear that ye shall not be able to deal justly with the orphans, Marry women of your choice, Two or three or four; but if ye fear that ye shall not be able to deal justly (with them), then only one, or (a captive) that your right hands possess, that will be more suitable, to prevent you from doing injustice.

People with very little knowledge of Islam often think that the provision of four wives at any time is all that Islam allows for having multiple sex partners. Perish this thought. The reality is that a Muslim man can have sex with as many women as his heart desires at any time whether through marriage or not. In fact, the holy man of Islam, Imam Hasan had up to 300 wives, believe it or not (more on this will be found in a subsequent section). Besides four legal wives at any one time, Islam permits a man to have unlimited number of concubines as long as they are slave women or captive women. More on sex with captive women will be found in a later part of this essay.

So, Muslim men, rejoice! You do not need to carry the burden of four wives. When Islam takes over the world, slavery will be re-introduced. Slave markets will be re-established in all the important parts of the world. If you are tired with your old wives, then just go to the nearest slave market and buy a slave-girl/s. Have sex with her for as long or as much as you like, then when you are tired of her, you can sell her off to recover your principal. All you need to do is to feed and cloth the sex-slave for the duration of your desire. See, how beautiful the Islamic rule is! A free unlimited sex is also possible with captive women. Where can you get captive women in today's world? If you think that this is impossible, then you have not understood Islam. Remember, when the Jihadis conquer the Western countries, all non-Muslim women there become their captives, at least in theory. The Jihadis then can distribute them to all the Muslim residents and among themselves. Then they can enjoy these petite infidel women to their hearts content. This is the provision of Allah. In Iran and the Taliban controlled Afghanistan, the Mullahs did just that. Whenever, an atheist, secular, socialist, communist woman was captured for waging war against God, she was given to a prison guard to use her as he pleased. The guard made sure that he had sexually enjoyed her before she is executed. Unbelievable, huh? See (http://www.homa.org/wings/irisituation.html )

Here is Holy Scripture on sex with slaves and captives.

Sex with captive women and slave women is permitted-23:1-6

023.001
YUSUFALI: The believers must (eventually) win through,-
023.002
YUSUFALI: Those who humble themselves in their prayers;
023.003
YUSUFALI: Who avoid vain talk;
023.004
YUSUFALI: Who are active in deeds of charity;
023.005
YUSUFALI: Who abstain from sex,
023.006
YUSUFALI: Except with those joined to them in the marriage bond, or (the captives) whom their right hands possess,- for (in their case) they are free from blame,

As I wrote before, that many Islamists are adamant that Islam does not encourage polygamy although there is no harm if someone wants to resort to it. These Islamists are simply hiding the truth. The fact of the matter is that the Muslims are openly encouraged to have multiple wives. This is evident from the following hadith.

The best Muslims had the largest number of wives...( Shahih Bukhari 7.62.7)

Volume 7, Book 62, Number 7:

Narrated Said bin Jubair:

Ibn 'Abbas asked me, "Are you married?" I replied, "No." He said, "Marry, for the best person of this (Muslim) nation (i.e., Muhammad) of all other Muslims, had the largest number of wives."

It is not only that the best Muslims had the largest number of wives but they also had incredible sex drive. Imagine having sex with all the wives in one's harem in a single night and that also when you are past fifty! Well, you may say this is almost an impossible task. Then you are not a good Muslim. See the founder of Islam did just that. Allah's Qudrat, no doubt.

The best Muslim men should have incredible sex power (Shahih Bukhari 7.62.142)

Volume 7, Book 62, Number 142:

Narrated Anas bin Malik:

The Prophet used to pass by (have sexual relation with) all his wives in one night, and at that time he had nine wives.

The best women to marry as per Islam

Have you noticed that most of the Islamic Paradises (like, Pakistan, Nigeria Bangladesh, Sudan-etc) are incredibly poor and unbelievably over populated? Why is it so? Does Islam have anything to do with this poverty and overcrowding? It is true that in the past, the government of those Islamic Paradises used to emphasize a lot on birth and population control. The exploding birth rate in these countries is a time bomb ticking away. It is one of the root causes of the backwardness, poverty, and unhygienic/unhealthy living conditions of these teeming millions. When the Islamists took over the control of these nations, population control was no longer a top priority. Why? The reason is that the Islamists have a secret agenda. The agenda is that they want to Islamize the whole world by exploding the population bomb albeit through Islamic population. They are pursuing this issue quite adroitly. Their method of subjugating the world through a terrible Islamic population bomb negates all the attempts by various national and international agencies to improve the living conditions of these 'Islamic Proletariat'. On this matter, they are quite close to the communistic ideology. The Islamists want to replace the communist idea of 'dictatorship of the Proletariat' with the 'dictatorship of the Islamic Proletariat'. Where did the Islamists get this idea from? Did they borrow from Karl Marx's 'Manifesto of the Communist Party' or his classic work 'Das Kapital'? Nope. The Islamists found this strategy in the very words of Muhammad himself. Here is the advice by Muhammad on how to select a woman carefully to be used as a baby-making factory.

Muhammed advised not to marry barren women, but to marry only those women who can give birth to plenty of children...( Sunaan Abu Dawud 11.2045)

Book 11, Number 2045:

Narrated Ma'qil ibn Yasar:

A man came to the Prophet (peace_be_upon_him) and said: I have found a woman of rank and beauty, but she does not give birth to children. Should I marry her? He said: No. He came again to him, but he prohibited him. He came to him third time, and he (the Prophet) said: Marry women who are loving and very prolific, for I shall outnumber the peoples by you.

The above hadith clearly explains the agenda of the Islamists. Doesn't this hadith make a woman as some kind of a child-making factory? You see, in an Islamic marriage, mutual love, understanding, companionship is not so important. The most important reason for marriage is procreation (the production of unlimited number of children) without any regard for the health or the welfare of the women (mothers in this case).

It is not only that a woman is quite similar to a baby-making factory; she is also a machine for enjoyment. Read this disgusting hadith to see for yourself how merciful and sympathetic Islam is towards women!

If you marry a pregnant woman, then her vagina is lawful if you pay the dowry, after she gives birth, flog her; the child becomes your slave...( Sunaan Abu Dawud 11.2126)

Book 11, Number 2126:

Narrated Basrah:

A man from the Ansar called Basrah said: I married a virgin woman in her veil. When I entered upon her, I found her pregnant. (I mentioned this to the Prophet). The Prophet (peace_be_upon_him) said: She will get the dower, for you made her vagina lawful for you. The child will be your slave. When she has begotten (a child), flog her (according to the version of al-Hasan). The version of Ibn AbusSari has: You people, flog her, or said: inflict hard punishment on him.

How about the women who are secularists/freethinkers and feminists? These women can forget about getting married, as they are totally haram for any Muslim man. Can they marry non-Muslims? Don't even think of that, for, that is haram too. If any woman violates this rule, then she and her husband faces possible stoning to death as this type of union will be regarded as adultery. If you are not a beautiful woman, your chances of marriage with a Muslim man are also very slim. These women are all condemned to remain spinster until they die, -if we go by the 'real Islam' here is what Imam Ghazali says.

Women not legal for marriage. Already married, apostate, atheist, feminist, permissive, Zoroastrian, idol worshipper, a fifth wife, accused of adultery whether proved or not, and others prohibited due to kinship. (Ref: 7 vol. I, pp 226-228)

She should be beautiful Ibid, p228)

She should be beautiful, this is also desirable as with it you will preserve your chastity. As for her nature, she should not be ugly, as much as she should be beautiful so her nature should be beautiful, as the two should go hand in hand.

The definition of the best woman (Ibid, p228)

The prophet said, "The best of your women is the one who if her husband looks at her she pleases him, and if he orders her something she obeys, and if he is away she keeps him in herself and his wealth."

She should be beautiful and cheap (Ibid, p228)

Her dowry should be reasonable. The Prophet said: "The best of the women are the beautiful in face and the least in dowry."

She should be fertile (Ibid, p228)

She should be fertile, so if she was known to be barren, she should not be sought in marriage. The Prophet said: "Marry the fertile and amicable." If she was not married and her condition was unknown, then watch her health and youth as if she is healthy and young and she will be fertile.

She should be virgin if not previously married (Ibid, p229)

She should be virgin. The Prophet said to Gaber when he married a deflowered woman: "It would have been better if you had married a virgin you would have enjoyed each other better."

Choose carefully for your sperm (Ibid, p229)

The prophet said: "Stay away from the flower which grows in the sewerage." So they said: " And what is the flower which grows in the sewerage?" he said: "She is the beautiful woman of bad origin." He also said: "Choose carefully for your sperm, because bad traits are inherited."

Asking men to look for beautiful women may be benign. How about ugly and unsightly men? While the beauty of a woman is a desirable feature for a Muslim man, there is gross injustice for a beautiful woman who ends up with an ugly man. If a woman marries an ugly man, then surprisingly the fault still lies with the woman and not with the ugly man!! Some justice, huh!

As per Imam Ghazali, an ugly husband is a woman's punishment.

An ugly husband is a punishment for a beautiful woman (Ibid, p235)

It was narrated that Al Asmo'ai said: "I entered a scrub land who had the ugliest face, so I asked her: "O you, how did you accept to marry some one like him?" she said: "Hold your tongue, you have uttered a wrong thing, he may be best in what is between himself and his creator, so He made me a reward for him, or it may be that I am the worst in what is between myself and my creator, so he made him my punishment."

Dower (Mahr) for women

Marriage is an important institution in Islam. With marriage, a family unit, the basic building block of a society is founded. An Islamic marriage is not a legal marriage without mahr. And what is mahr? Mahr is the dower a prospective groom pays to contract a woman for marriage. No Islamic marriage is valid without a mahr. If we condemn the dower demanded by grooms (in India and Bangladesh) to marry a woman, then we must also do the same for Islamic mahr. Why should a man pay a woman to get married to her?

The plain answer is that a man pays to his wife/s to have sexual intercourse with her. What? This is outrageous, you say. Here is the truth. As per Islam, the mahr is the price a man pays to use a woman's private parts. Are you enraged and furious? Of course, you are. Now, before you call me an 'Islam basher' please read on.

Let us search the Qur'an first.

Give dower to women as a free gift...4:4

004.004
YUSUFALI: And give the women (on marriage) their dower as a free gift; but if they, of their own good pleasure, remit any part of it to you, Take it and enjoy it with right good cheer.

This verse looks very innocent indeed until we dig deeper. After all, giving some present to some one is nothing so special. We all do that. Sons give present to their mothers. Mothers give presents to their children. Friends give present to friends and so on. Husbands give present or gift to wives and vice versa. This custom is very much a social etiquette. Now, what is so different in giving mahr to a woman for marriage?

To get the real reason for a mahr we need to look at hadith and Sharia. Read the following hadith from Shahih Bukhari.and Shahih Muslim

Marriage gives the man the right to enjoy a woman's private parts...( Shahih Bukhari;7.62.81)

Volume 7, Book 62, Number 81:

Narrated 'Uqba:

The Prophet said: "The stipulations most entitled to be abided by are those with which you are given the right to enjoy the (women's) private parts (i.e. the stipulations of the marriage contract)."

The most worthy condition that must be fulfilled in a marriage is that sexual intercourse becomes lawful-(Shahih Muslim 8.3302)

Book 008, Number 3302:

'Uqba b. Amir (Allah be pleased with him) reported Allah's Messenger (may peace be upon him) as saying: The most worthy condition which must be fulfilled is that which makes sexual intercourse lawful. In the narration transmitted by Ibn Muthanna (instead of the word" condition") it is" conditions".

These two ahadith are still not convincing that mahr is a payment to have sex with a woman (wife, in this case). After all, no one can deny the fact that sexual enjoyment of each other's private parts is, indeed, an important part of a marriage. Now, if some man pays a woman to have sexual intercourse with her, what do we call her? An Islamic scholar from Nigeria, Abdur Rahman I. Doi admits that the mahr is indeed a remuneration (Ref: 9, p 162). Remuneration for what?

See how Muhammad prevented Ali from sleeping with Fatima until he (Ali) paid the mahr.

Ali could not have intercourse with Fatima (Muhammed's daughter) until Ali paid her dowry (the coat of mail)...( Sunaan Abu Dawud 11.2121 )

Book 11, Number 2121:

Narrated A man from the Companion of the Prophet:

Muhammad ibn Abdur Rahman ibn Thawban reported on the authority of a man from the Companions of the Prophet (peace_be_upon_him): When Ali married Fatimah, daughter of the Apostle of Allah (peace_be_upon_him), he intended to have intercourse with her. The Apostle of Allah (peace_be_upon_him) prohibited him to do so until he gave her something. Ali said: I have nothing with me, Apostle of Allah. The Prophet (peace_be_upon_him) said: Give her your coat of mail. So he gave her his coat of mail, and then cohabited with her.

A more elaborate reason for mahr is given in the Dictionary of Islam.

Dower is the payment for usufruct of wife (Ref: 6, p91)

Dower is considered by some lawyers to be an effect of the marriage contract, imposed on the husband by the law as a mark of respect for the subject of the contract - the wife; while others consider wife, and its payment is necessary for the usufruct of the wife, and its payment is necessary, as upon the permanency of the matrimonial connection.

So, what price a man should pay a woman to have an Islamic marriage (read for sexual intercourse)? Surprisingly, it is not that expensive. There is a minimum mahr that can be as little as a pair of shoes (Ref: 9, p163). And there is no limit to the maximum. It is even possible to contract an Islamic marriage without paying any money or any object of pecuniary value. If a woman agrees then a man can marry in exchange for reciting a verse from the Quran (Ref: 9, pp163, 164). Sex from a woman could be as cheap as that.

Minimum dower is ten dirham (Ref: 6, pp 91, 314)

Dower need not invariably be in currency or even in metal; everything except carrion, blood, wine and hog. Also the bridegroom's own labour, if he is a freeman, being held by the law to be a good dower.

When one pays dower for having sex with wives then that indicates that women's sexual organs have some money value i.e. they are some sort of product or services for which payments are necessary to derive their benefits. This is exactly how it is mentioned in 4:24. The dowry is also called a duty (as per Pickthal) or a wage as per verse 4:24.

PICKTHAL: And all married women (are forbidden unto you) save those (captives) whom your right hands possess. It is a decree of Allah for you. Lawful unto you are all beyond those mentioned, so that ye seek them with your wealth in honest wedlock, not debauchery. And those of whom ye seek content (by marrying them), give unto them their portions as a duty. And there is no sin for you in what ye do by mutual agreement after the duty (hath been done). Lo! Allah is ever Knower, Wise.

This verse clearly states that mahr is a payment that gives the man the right of ownership of sex organs of a woman. This blunt statement will, no doubt, offend many Muslims who blindly follow Islam. We must accept the fact that the Islamic system of payment of mahr to a woman is nothing but a price that is put on her sexual and reproductive organs. We may or may not like this unpleasant statement but this is the truth. I shall discuss more on this matter in later sections.

So, Islamic mahr represents nothing but the exploitation of women of the highest order. It is nothing but the ownership of the body of female slaves by a master. I raise my previous question again. If a man pays a woman to have sexual intercourse with her, what do we call her?


Abul Kasem writes from Sydney, Australia. His e-mail address is -
abul88@hotmail.com



रविवार, 19 अक्तूबर 2008

हिन्दी लेखकों की स्व-अर्जित बदकिस्मती

4 टिप्पणियाँ
यह वैचारिक निबन्ध राजकिशोर जी ने एक वर्ष से भी कुछ अधिक समय पूर्व लिखा था; जो स्वयम् में सामयिक होते हुए भी काल का अतिक्रमण करता है व उनके दृष्टिकोण को व्यक्त करने के साथ साथ पूरे लेखक समाज को एक प्रकार के जुझारुपन के लिए ललकारता -सा है। स्त्री लेखन पर भी कुछ गम्भीर प्रश्न उठाने वाले इस आलेख को स्त्रीविमर्श के सभी पाठकों के लिए प्रथम बार प्रस्तुत किया जा रहा है। आवश्यक नहीं कि आप लेखक के सभी विचारों से सहमत ही हों, फिर भी मूल कथ्य हमें स्वयम् पर व अपने समय के दुर्भाग्यों पर सोचने को विवश करता है। सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
-कविता वाचक्नवी


हिन्दी की तस्लीमाएँ कहाँ हैं?
राजकिशोर


तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में मुस्लिम कट्टरपंथियों की ओर से जो हमला हुआ, उसके प्रतिवाद में हिन्दी के दिल्ली-निवासी तमाम मूर्धन्य लेखक एक हो गए, यह आनंद की बात है। तसलीमा कुछ खास मानव मूल्यों का प्रतीक बन चुकी हैं, इसलिए जरूरी है कि उनकी आवाज को दबाने के सभी प्रयत्नों को निष्फल किया जाए। वे अपनी अभिव्यक्तियों में अकेली हैं, यह एहसास तो उनके भीतर पैदा होने ही नहीं दिया जाना चाहिए। दुख की बात यह है कि तसलीमा नसरीन का महत्व समझते हुए भी हिन्दी जगत में यह प्रश्न बार-बार उठाए जाने पर भी नहीं उठ पा रहा है कि हमारी तसलीमाएँ कहाँ हैं। मेरा खयाल है कि हिन्दी को एक नहीं, कई-कई तसलीमा नसरीनों की जरूरत है। कुछ पुरुष तसलीमा भी होने चाहिए।

ऐसा नहीं है कि हिन्दी में विद्रोही पुरुष या महिलाएँ नहीं हैं। उर्दू, बांग्ला या किसी भी अन्य भारतीय भाषा से अधिक बारीकी और गहराई के साथ हिन्दी में स्त्रियों के बहुमुखी शोषण की विवेचना की गई है और की जा रही है। इस समझ के बनने में मार्क्सवाद का विशेष योगदान रहा है। लेकिन मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं ने बिना किसी वाद का सहारा लिए सतर्क जीवनानुभव के आधार पर (जीवन किसी भी सिध्दांत से बड़ी पाठशाला है) शोषण, दमन और आत्मदमन के पहलुओं पर निर्भीक हो कर कलम चलाई है। यह जरूर है कि तसलीमा जिस धड़ल्ले से धर्म के वीभत्स रूपों और धर्म की आड़ में चलने वाले अधर्मों पर कलम चलाती हैं, वह हिन्दी में नहीं के बराबर हो रहा है। एक समय में प्रेमचंद, यशपाल और राहुल साँकृत्यायन ने यह काम किया था। भगत सिंह का प्रसिध्द निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ आज तक चाव से पढ़ा जाता है। इस मूल समस्या पर ध्यान देने के बजाय हिन्दी के प्रसिध्द लेखक भी जाति की समस्याओं पर ज्यादा एकाग्र रहे हैं। निश्चय ही जाति की स्वतंत्र सत्ता बन चुकी है, पर हमें भूलना नहीं चाहिए कि वह धर्म नामक वृक्ष की ही एक शाखा है। ब्राह्मणवाद पर लगातार हमला करना और धर्म की आलोचना के लिए समय या चित्त न निकाल पाना एक गंभीर चूक है। प्रेमचंद की विरासत में इस चूक के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। इस संदर्भ में हमें ‘सरिता’ नामक पत्रिका के संस्थापक-संपादक विश्वनाथ जी का आभारी होना चाहिए जिन्होंने इस पत्रिका के माध्यम से धार्मिक पाखंड के खिलाफ लगातार एक तीखा अभियान चलाया। इस मामले में उन्होंने कछ अतियाँ भी कीं, इसके बावजूद उनका यह काम ऐतिहासिक महत्व का है।

हिन्दी की इस न्यूनता पर विचार करते समय तीन बातों की ओर तुरंत ध्यान जाता है। पहली बात यह है कि हिन्दी ने पाठकों से अपना जीवंत संपर्क तोड़ लिया है। आज हिन्दी के श्रेष्ठतम लेखक और कवि वे हैं जो सबसे कम पढ़े जाते हैं। यह हुआ इसलिए कि जब हिन्दी के पाठक, भाषा और साहित्य के स्तर पर घुटनों के बल रेंग रहे थे, हिन्दी लेखक ने तय किया कि उसे विश्व स्तर का साहित्य लिखना है। वह भूल गया कि अंग्रेजी का लेखक तरह-तरह के प्रयोग कर सकता है, क्योंकि उसके पास एक बड़ा और संपन्न पाठक परिवार है। हिन्दी के अधिकांश पाठक तो अभी भी प्रेमचंद और यशपाल के जमाने में रह रहे हैं। साहित्यिक महानता की खोज में अपने पड़ोसी पाठक-पाठिकाओं की साहित्यिक जरूरतों को भूल जाना एक सामाजिक अपराध है, जिसकी कोई ग्लानि हिन्दी जगत में दिखाई नहीं पड़ती।

महत्व की दूसरी बात यह है कि हिन्दी में जनप्रिय साहित्य की बेहद कमी है। यहां सिर्फ दो ध्रुवांत हैं -- महान लेखक और मेरठ उद्योग। मेरठ उद्योग के नीरस और कुरुचिकर उत्पादों के भरोसे हिन्दी के लाखों पाठकों को छोड़ देना एक शर्मनाक घटना है। ऐसा नहीं है कि हिन्दी में यह प्रतिभा नहीं है कि वह ऐसी रोचक-रोमांचक किताबें लिख सके, जिन्हें रेल यात्रा के दौरान या फालतू समय में पढ़ने का लुत्फ उठाया जा सके। चंद्रकांता नामक महान कृति इसी हिन्दी में लिखी गई थी, जिसे पढ़ने के लिए बताते हैं कि हजारों लोगों ने हिन्दी सीखी। धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता अभी भी चाव से पढ़ा जाता है। शिवानी के उपन्यासों की बिक्री कम हो गई है, लेकिन हिन्दी के प्रतिभाशाली प्रकाशकों ने अगर जनप्रिय लेखन छापने और बेचने का मोर्चा अलग से खोला होता, जिससे वे और ज्यादा मालामाल हो सकते थे, तो मेरा अनुमान है कि अकेले मनोहर श्याम जोशी तीन महीने में एक उम्दा उपन्यास उन्हें दे सकते थे। अपने को गंभीर मानने वालों को इस कमतर विधा का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, क्योंकि यही वे प्रवेश द्वार हैं जिनसे हो कर युवा वर्ग का एक हिस्सा गंभीर साहित्य की दुनिया में प्रवेश करता है। कोई बचपन में ही सुकरात या अज्ञेय नहीं हो जाता।

तीसरी बात भी कम गंभीर नहीं है। जैसे धर्म की बेड़ियाँ होती हैं, वैसे ही विचारधारा की भी बेड़ियाँ होती हैं। सन साठ के बाद हिन्दी लेखन की दुनिया में प्रवेश करने वाले ज्यादातर लेखक मार्क्सवाद से प्रभावित थे। यह बहुत अच्छी बात थी। जो मार्क्सवाद से प्रभावित नहीं हुआ, क्या वह भी कोई विचारशील प्राणी है? लेकिन इसके साथ-साथ एक दुर्घटना भी हुई --- हिन्दी के लेखकों ने अपनी-अपनी पार्टियों को अपना ध्रुवतारा मान लिया। पार्टियां वोट की भिखारी हैं। अंग्रेजी की एक कहावत बताती है, भिखारी को चुनने की आजादी नहीं होती। सो मार्क्स के पवित्र नाम के सहारे अपनी अर्ध-पवित्र या पूर्ण अपवित्र राजनीति करने वाली मार्क्सवादी पार्टियों ने धर्म को तो छेड़ा ही नहीं। जो धर्म के छेड़ेगा, उसे दस वोट भी मुश्किल से मिलेंगे। तथाकथित धार्मिक लोगों ने गांधी जी का भी विरोध किया था। जो पार्टियां स्त्री उत्पीड़न का विरोध करेंगी, वे अपने ज्यादातर पुरुष सदस्यों को नाराज कर देंगी। जैसा कि कई मार्क्सवादी महिला कार्यकर्ताओं ने अपने आत्मवृत्तांतों में लिखा है, मार्क्सवादी दलों के नेता और कार्यकर्ता खुद भी स्त्री के सवाल पर पुरुषवादी विकृतियों के असाध्य शिकार हैं। वे स्त्रियों को सहचर नहीं, सखी भी नहीं, अर्ध-रखैल मानते हैं। हिन्दी का लेखक भी, आत्मप्रेरणावश, इसी दलीय षडयंत्र का शिकार बना रहा है। वह भूल गया कि पार्टी का नेता अलोकप्रिय होने का खतरा नहीं उठा सकता, पर लेखक के लिए तो यह वरदान ही है कि समाज में उससे नाराज लोगों की संख्या बढ़ती जाए। मेरे मित्र शंभुनाथ का कहना है कि वह कलम क्या उठी जिसने शत्रु नहीं बनाए। लेकिन तसलीमा ने शत्रु बनाए हैं तो मित्र भी कम नहीं बनाए हैं। यह ज्यादातर हिन्दी लेखकों की स्व-अर्जित बदकिस्मती है कि उन्होंने हिन्दी के व्यापक समाज में न शत्रु बनाए, न मित्र।



शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

एक डायन की सच्ची कहानी

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क डायन की सच्ची कहानी

- ऋषभ देव शर्मा




आप चाहें तो इसे कहानी मान सकते हैं। लेकिन यह कहानी नहीं है. एक दम ज्वलंत घटना है, शर्मनाक समाचार है. लेकिन हम इसे फिलहाल कहानी की तरह ही सुनाते हैं.


बात है इकीसवी सदी की, सन २००८ के अक्टूबर महीने का पहला इतवार था। राजस्थान नाम का एक ऐतिहासिक भूखंड भारत भूमि पर हुआ करता था, वहां एक जिला था सिरोही, और उस जिले में था एक गाँव खरा नाम का.


हाँ तो इस गाँव खरा में रहती थी घरासिया नाम की एक जन-जाति, अब यह तो आपको मालूम ही हैं कि महान भारतीय लोकतंत्र में उस ज़माने में भी ऐसी जनजातियों की अपनी पंचायतें हुआ करती थीं, सो इस गाँव की भी पंचायत थी। और पंचायत पर कब्ज़ा था पुरुषों का- जो अपने आपको भाग्यविधाता से कम नहीं समझते।


तो हुआ यूँ कि इस गाँव में एक महीने के भीतर घरासिया लोगों के घरों में दो मौतें हो गयीं, अब मौत हुई, तो उसके कारण की तलाश शुरू हुई। ज़रूर इसके पीछे किसी डायन का हाथ होगा. खोज शुरू हुई उस डायन की और बत्तीस साल की गुजरिया पर डायन होने की तोहमत मढ़ दी गई. मीसा और पोटा से ज्यादा खतरनाक हुआ करती है पुरूष वर्चस्व प्रधान पंचायत की चार्जशीट. आरोपी के ख़िलाफ़ कोई सबूत पेश नहीं किए जाते, बस आरोप लगाया जाता है और चुनौती दी जाती है कि हिम्मत है तो ख़ुद को पाक-साफ़ साबित करके दिखाओ, लाचार गुजरिया कैसे स्वयं को निर्दोष सिद्ध करती, या तो सर झुककर अपराध को स्वीकार कर लेती- जैसा उसने नहीं किया. या फिर परीक्षा देती. परीक्षा भारतीय स्त्रियाँ युगों से देती आई हैं - पुरुषों की शर्त पर. गुजरिया को भी परीक्षा से गुजरना पड़ा.


वह इतवार गुजरिया के लिए काला इतवार था। एक पात्र में गरमागरम तेल भरा गया. इस उबलते तेल में चाँदी का सिक्का डाला गया. गुजरिया को नंगे हाथों से यह सिक्का निकालना था. अगर वह भली औरत होगी तो उसके हाथ जलेंगे नहीं. और अगर हाथ जल गए तो साबित हो जाएगा कि वह सचमुच डायन है. गुजरिया गुजरिया थी, कोई सीता माता नहीं कि उसके हाथ न जलते. वैसे कहा तो यह भी जाता है कि अग्निपरीक्षा छाया-सीता ने दी थी, असली सीता तो पहले से अग्निदेव के घर में सुरक्षित थीं. लीला में ऐसा होता है.पर गुजरिया पर जो गुज़री वह लीला नहीं थी. क्रूर सच्चाई थी.

आप समझ ही गए होंगे कि अग्नि परीक्षा में गुजरिया अनुतीर्ण हो गई॥ बस फिर क्या था घोषणा हो गई -- यह चुडैल है, डायन है, पिशाचिनी है, मारो इसे !!!

हर ओर से गुजरिया पर प्रहार किए गए। गरम लोहे की सलाखों से उसकी देह दागी गई. मारे सरियों के उसका सिर फूट गया. इस बहाने जाने किस किस ने उससे क्या क्या बदले चुका लिए !

डायन से अपेक्षा की जाती है कि वह त्रस्त परिवार को कष्टों से मुक्त कर दे। गुजरिया भला कैसे किसी को कष्टों से मुक्त कर पाती. इसलिए उसे मार पीट कर उसके घर के दरवाज़े पर फ़ेंक दिया गया.पति और घर के सभी सदस्य इतने आतंकित कि उसे घर के भीतर नहीं ला सके. अंततः बेहोशी की हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया.

तो यह थी सन २००८ के उत्तरआधुनिक भारत की एक बर्बर दास्तान।

क्या इस कहानी का मोरल यही माना जाए कि भारत में आज भी अंध-विश्वास, अवैज्ञानिकता, अशिक्षा मूर्खता के साथ साथ स्त्री के प्रति सर्वथा अमानुषिक दृष्टिकोण विद्यमान है, और सारे सामजिक , राजनैतिक और बौद्धिक नेतृत्व ने इस सचाई की ओर से आँख मूंद रक्खी है? स्त्रियाँ यहाँ पहले भी डायन थी और आज भी डायन हैं!

इस वीभत्सता में भी सुख और संतोष का अनुभव करने वाला समाज क्या भीतर सड़-गल नहीं चुका है?


गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

‘हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव के नाम एक खुला पत्र

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स्त्री-विमर्श के नाम पर कृपया साहित्य में प्रदूषण न फैलायें
-सुधा अरोड़ा




हंस के जून अंक का सम्पादकीय एक और स्त्री विमर्श पढ़कर एक घटना याद आ गयी।


फतेहपुर सीकरी के राजमहल में गाइड बड़े उत्साह से एक जगह का ब्यौरा देते हैं, जहाँ एक विशालकाय चौपड़ का चार खाने वाला ढाँचा है। उससे कुछ ऊपर राजा-महाराजाओं के बैठने की जगह बनी है, जहाँ से राजा चौपड़ खेलते हुए चाल का पासा फेंकते थे। हरी, पीली, लाल, नीली गोटियों की जगह हरे पीले लाल नीले रंग के वस्त्रों, आभूषणों से सजी कन्याएँ खड़ी रहती थीं और पासे को फेंककर अगर चार नम्बर आया तो उस रंग की गोटी के स्थान पर उस रंग के वस्त्रों से सजी सुसज्जित कन्या पैरों में झांझर पहने झँकारती इठलाती हुई नृत्य के अन्दाज में चार घर चलती थीं। जाहिर है, जिन नर्तकियों या कन्याओं को गोटियों का स्थानापन्न बनाने के लिए बुलाया जाता, वे राजा के महल में प्रवेश पाने को अपना अहोभाग्य समझतीं। ‘हंस’ के पन्नों पर जब भी देहवादी सामग्री परोसी जाती है, मुझे राजा इन्द्र का दरबार सजा दिखाई देता है, जहाँ अप्सराओं(!) को रिझाने लुभाने और उनके करतब देखने के लिए राजा इन्द्र बाकायदा ‘हंस’ की शतरंजी चौपड़ का पासा फेंक रहे हैं। आज बाजार ने तो स्त्री को देह तक रिड्यूस कर ही दिया है। स्त्री की अहमियत क्या है ? महज एक देह! इस देह का करतब हम छोटे-बड़े परदे पर हर वक्त देख रहे हैं। स्त्री की देह, सबसे बड़ी बिकाऊ कमोडिटी बनकर हमारे घर में घुस आयी है और हम उसे रोक नहीं पा रहे। लड़कियाँ यह कहने में शर्मिन्दगी महसूस नहीं करतीं कि आपके पास बुद्धि है, आप पढ़ाकर पैसा कमा रहे हैं, हमारे पास देह है, हम उससे पैसा कमा रही हैं और हमें फर्क नहीं पड़ता तो आप क्यों परेशान हैं ? हम या आप ऐसी औरतों की देह की आजादी में कहाँ आड़े रहे हैं ? देह उनकी, वे जैसे चाहें इस्तेमाल करें। पर छोटे-बड़े परदे पर अर्द्धनग्न औरतों की जमात को सामूहिक रूप से भोंडे प्रदर्शन करते देखना मानसिक चेतना पर लगातार प्रहार करता है। मीडिया और फिल्मों और विज्ञापनों में जिस तरह औरत की देह को परोसा जा रहा है, ‘जनचेतना के प्रगतिशील कथा मासिक’ को उस दिखाऊ उघाड़ू प्रवृत्ति के विरोध में खड़ा होना चाहिए। आप जैसे विचारवान सम्पादक का ‘एक और स्त्री विमर्श’ तो मीडिया और बाजार के समर्थन में खड़ा, उसकी पीठ थपथपाता ही नहीं, जीभ लपलपाता दिखाई दे रहा है।


हंस का जून अंक आया और अचानक स्त्री विमर्श पर छायी धुन्ध को लेकर पटना से निकलने वाली साहिती सारिकाके सम्पादक सलिल सुधाकर औरअक्सरके वरिष्ठ सम्पादक हेतु भारद्वाज ने स्त्री विमर्श के स्वरूप से चिन्तित होकर परिचर्चाएँ आयोजित करने का निर्णय लिया। स्त्री विमर्श को लेकर न पश्चिम में कहीं कोई धुन्ध है, न भारत में। भारत में इस धुन्ध के प्रणेता आप बन रहे हैं और इस मुगालते में जी रहे हैं कि सदियों से दबी कुचली स्त्री देह को आजाद करेंगे तो एकमात्र आप ही। जो काम फिल्मों में महेश भट्ट, मीडिया में स्त्री के साथ बाजार कर रहा है और जिसे स्त्रियों की एक खास जमात स्वयं सहमति देकर अपने आप को परोस रही है, वही काम साहित्य में एक जिम्मेदार कथा मासिक का सम्पादक कर रहा है- लोलुपता और लम्पटता को बौद्धिक शब्दजाल में लपेटकर सामाजिक मान्यता प्रदान करना।


स्त्री देह को लेकर गालियाँ, अश्लीलता, छिछोरापन कब किस समाज में, किस युग में नहीं रहा ? साहित्य में वह गुलशन नन्दा की सीधी सपाट शब्दावली के दायरे से निकलकर आपके बौद्धिक आतंक का जामा पहनी हुई भाषा में आ गया है। दिक्कत यह है कि रचनात्मक साहित्यकार समाजविज्ञान से सम्बन्धित विषयों पर शोध किये बिना और सामाजिक मनोविज्ञान की बारीकियों को समझे बगैर सामाजिक स्थापनाओं के रूप में अपनी मौलिक उद्भावनाएँ दे रहा है। निजी व्याधि को साहित्यिक रूप से प्रतिष्ठित कर आप उसे समुदाय की व्याधि बनाना चाह रहे हैं।


पश्चिम में पूँजी के आधिक्य से और भारत में पूँजी के अभाव में आजादी और आधुनिकता आयी है। निम्न मध्यवर्गीय लड़कियों की माँगें और महत्वकांक्षाएँ पूरी नहीं होतीं तो वह देह के बाजार से अपने लिए सुविधाएँ जुटा लेती हैं। शिकागो या न्यू्यॉर्क में चालीस डिग्री के ऊपर गर्मी पड़ती है तो लड़कियाँ ब्रॉ और शॉट्र्स में मॉल में घूमती दिखाई देती हैं। समुद्र या झील के किनारे उनका टॉपलेस में भी नज़र आना हैरानी का बायस नहीं बनता। वहाँ के बाशिन्दों को इसकी आदत हो चुकी है और वहाँ कोई ठिठककर उघड़ी हुई स्त्री देह को देखता तक नहीं। वहाँ की नैतिकता कपड़ों के आवरण से बारह निकल आयी है। भारत के बाशिन्दे अब भी नेक लाइन पर आँखें गड़ा देते हैं और जीन्स से बाहर झाँकती पैंटी के ब्रांड का लेबल पढ़ना नहीं भूलते। नैतिकता का हथियार वहीं वार करता है, जहाँ आज भी स्त्री देह को सौन्दर्य का प्रतीक और सम्मान की चीज़ माना जाता है। उसका भोंडा प्रदर्शन हमें विचलित ही करता है।


स्त्री को ‘अदर दैन बॉडीडिस्कवर करने का स्टैमिना ही नहीं रह गया है- न फिल्म निर्माताओं निर्देशकों में, न आप जैसे सम्पादकों में। अफसोस स्नोवावार्नो की कहानी ‘मेरा अज्ञात मुझे पुकारता है को छापने के बाद भी आप स्त्री देह के सौन्दर्य को उसकी सम्पूर्णता में न देखकर निचले हिस्से का सचजैसी स्थूल शब्दावली में ही देखना चाहते हैं। यह दृष्टि दोष लाइलाज है।


महिला रचनाकारों की इतनी बड़ी जमात लिख रही है अपनी समस्याओं पर। उन्हें अपनी समस्याओं के बारे में खुद बात करने दीजिए। महिलाओं की बेशुमार अन्तहीन सामाजिक समस्याएँ हैं। बेहद प्रतिकूल सामाजिक स्थितियों में, दहेज प्रताड़ना, भ्रूण हत्या और गर्भपात को झेलती, खेती मजदूरी में पसीना बहाती, घर-परिवार की आड़ी तिरछी जिम्मेदारियों को सम्भालनें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद पति की लम्पटता, उपेक्षा या हिंसा को झेलती औरत (आपसे बेहतर कौन इस स्थिति को समझ सकता है) का एक बहुत बड़ा वर्ग है जहाँ देह की आजादी या देह मुक्ति कोई मायने नहीं रखती। आज की औरत को घर के अलावा बाहरी स्पेस से जूझना पड़ रहा है तो सोलहवीं सदी का ‘ओथेलो’ भी पुरुष के भीतर फन फैलाये जिन्दा है। बलात्कार और भ्रूण हत्यायें पहले से कई गुना बढ़ गयी हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में लिंग अनुपात एक हजार लड़कों के पीछे तीन सौ लड़कियों का रह गया है (द टेलीग्राफ: लंदन 22 जून 2008 -अमित राय) पर वह ‘हंस’ के सरोकार का मुद्दा नहीं है।


स्त्री मुक्ति का पहला चरण देह-मुक्ति से ही शुरू होगा का झंडा लिए आप अरसे से घूम रहे हैं। ऐसा नहीं कि आप इसमें कामयाब नहीं हुए हैं। आजाद देह वाली स्त्रियों की तादाद में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। हर शहर में वे पनप रही हैं। पहले सिर्फ मीडिया और कॉरपोरेट जगत में ये स्त्रियाँ अपनी देह के बूते पर फिल्मों और मॉडलिंग में जगह पाती थीं या कार्यालयों में प्रमोशन पर प्रमोशन पा जाती थीं।हंसके स्त्री देह मुक्ति अभियान से आन्दोलित हो वे साहित्य के क्षेत्र में भी देह का तांडव अपनी रचनाओं में दिखा रही हैं और देह को सीढ़ी बनाकर राजेन्द्र यादव जैसे भ्रमित सम्पादकों का भावनात्मक दोहन कर अपनी लोकप्रियता के गुब्बारे आसमान में छोड़ रही हैं। अपने इस अश्वमेघ यज्ञ में आप सहभागी बना रहे हैं- रमणिका गुप्ता और कृष्णा अग्निहोत्री को जिनकी आत्मकथाओं को साहित्य में किन कारणों से तवज्जोह दी गयी, यह किसी शोध का विषय नहीं है। आपके अनुसार योनि शब्द अश्लील और आपत्तिजनक है क्यों ‘योनि अकेली ही किसी एटम बम से कम है’। योनि शब्द से किसी भी स्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति को परहेज नहीं हो सकता। परहेज तब होता है जब उसे प्रस्तुत करने के नजरिये में खोट दिखाई देता है।हंसके जुलाई अंक में ही फरीदाबाद के डॉ. रामवीर ने इस पर सटीक टिप्पणी कर दी है| कृपया प्रेमचन्द की पत्रिकाहंसके साथजनचेतना के प्रगतिशील कथा मासिककी BI लाइन हटाकरस्त्री देह की आजादी का मुखपत्ररख दें पचास साल बाद राजेन्द्र यादव के साहित्यिक अवदान को कितना याद रखा जायेगा, इसकी गारन्टी कोई नहीं दे सकता, पर स्त्री मुक्ति का पहला चरण देह मुक्ति से शुरू होगा’ की उद्घोषणा के प्रथम प्रवक्ता और प्रणेता के रूप में ‘हंस’ सम्पादक का नाम अवश्य स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया जाएगा।” मैं चाहती हूँ कि इस बहाने एक बुनियादी जिरह शुरू हो जिसमें स्त्री को केवल बुर्जुआ समाजशास्त्र और बाजार के देहशास्त्र के बीच रखकर ही न देखा जाए बल्कि उसकी मुक्ति के प्रश्नों को अधिक समग्रता में खाजा जा सके क्योंकि ये प्रश्न अन्ततः हमें उस दिशा की ओर ले जाते हैं कि कौन सा और कैसा समाज गढ़ना चाहते हैं। आज बाजार की सबसे बड़ी शिकार औरत ही हो रही है और वही सबसे ज्यादा दलित है और अपमानित भी। क्या हम बाजार के यूटोपिया से ही संचालित रहेंगे या इसे लाँघ कर आगे भी जाएंगे ?

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सुभाष नीरव के सौजन्य से साभार

बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

सूने पनघट पर पहुँचीं तुम, बहुत वेदना झेली

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एकालाप - १०


सूने पनघट पर पहुँचीं तुम, बहुत वेदना झेली
शोकगीत : एक लडकी की आत्महत्या पर
भाग[३]
- ऋषभ देव शर्मा



[१३]

बाप हो चला बूढा, तुम थीं युवा हो रही आतुर
मिला चाँद का रूप तुम्हें औ' मधुर कोकिला के सुर ..
जाने किस दिन हाथ सुता के हो पायेंगे पीले?
इस चिंता में स्वयं पिता के अंग हो चले ढीले
एक प्रश्न था बस दहेज़ का उस निर्धन के आगे
पुत्री उसे मिली अनमाँगे , कौन पाप थे जागे !



सबसे कम माँगे दस हज़ार*
दिशाएँ करतीं हाहाकार [१३]

[*यह घटना १९७४ में कोडरमा,बिहार में घटित हुई थी.]



निर्धन की एक मात्र पूंजी , हा ! बस तुम थीं, रूपसि !
जिसके लिए जिया था अब तक वह तुम ही थीं , रूपसि !
कब तक घर में तुम्हें कुँवारी बैठाए रख पाता
आँखों आगे कामदेव के तीरों से मरवाता
पर पैसे के बिना विश्व में क्या कुछ हो पाता है?
सब रिश्ते झूठे हैं जग में, धन सच्चा नाता है!



गरीबों पर बेटी का भार !
विश्व में कौन करे उद्धार?[१४]



विवश पिता ने जाना केवल, अपना एक सहारा .
भीख माँगने हर चौखट पर उसने हाथ पसारा..
यह कंगाली की सीमा थी , सौदा नव यौवन का.
मौन देखता रहा विश्व यह नुच-लुटना तन-मन का..
किंतु तुम्हारा मान किशोरी! आहत होकर जागा.
खा न सका वह जगती को तो तुमको डसने भागा..



हुई थी सचमुच गहरी मार .
प्रकम्पित था मन का संसार..[१५]



मान? मान के पीछे जग में हुआ नहीं है क्या-क्या?
अति विचित्र इतिहास मान का, सुना नहीं है क्या-क्या?
अधरों तक आकर भी प्याला,लौट चले जब यों ही.
स्वप्निल पलकें अविचुम्बित ही उठ जाएँ जब यों ही..
उठी रहें अम्बर में बाहें, बिकें विकल आलिंगन.
आशाएँ हिम से आहत हों, उपालंभ दे कण-कण.


क्षुब्ध करती मन का संसार.
टूटते तारों की झंकार.. [१६]


रोती रहीं रात भर तुम यों, अब क्या होने वाला?
भर-भर करके रहीं रीतती, तुम आंखों का प्याला..
आह! प्रेयसी! सूज गए वे आकर्षणमय लोचन.
तरुणाई अभिशाप बन गई, ज़हर बन गया यौवन..
सब सोए थे बेसुध होकर, तुम उठ चलीं अकेली.
सूने पनघट पर पहुँचीं तुम, बहुत वेदना झेली..



हुआ जलमग्न श्वास संसार
गईं तुम जगती के उस पार..[१७]



रोकर बापू तुम्हें ले चला पनघट से मरघट को .
पर घट से क्या तुम्हें प्रयोजन, पार किया अवघट को॥
घट बनकर तुम स्वयं पी चुकीं सारा ही पनघट तो.
केवल रस्म मात्र को फूटा मरघट में वह घट तो..
जली - स्वर्ण सी देह चिता में अलकों का वह मधुवन।
जला और जल गया अचानक मौन अकेला यौवन..



चिता ही है जीवन का सार!
देवि! नश्वर सारा संसार !![१८]

[समाप्त]

सोमवार, 13 अक्तूबर 2008

मेरी माँ

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गतांक से आगे





मैं कुपुत्र साबित हुआ, मेरा यह दुख कोई भी चीज कम नहीं कर
सकती। उसका प्रायश्चित यही है, अगर कोई प्रायश्चित हो सकता है, कि मैं एक ऐसी
की रचना करने में अपने को होम कर दूँ जिसमें माँ का स्थान जीवन के
शीर्ष पर होता है। जो अपनी माँ को प्यार नहीं कर पाया, वह दुनिया में किसी और को

प्यार कर सकेगा, इसमें गहरा संदेह है।









माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही
राजकिशोर




विवाह होने के बाद मुझमें थोड़ी पारिवारिकता आई। मैंने दो कमरों का एक फ्लैट लिया और उसमें रहने के लिए माँ-पिता और छोटे भाई-बहन को आमंत्रित किया। वे कुछ दिन कितने सुंदर थे। लेकिन एक बार पिताजी द्वारा एक मामूली-सी घटना के बाद, जो हिन्दू परिवारों के लिए सामान्य-सी बात है, पर उन दिनों मेरे सिर पर लोहिया सवार होने के कारण मैंने उन्हें कहला दिया कि जब तक वे मेरी पत्नी से माफी नहीं माँगते , अब वे मेरे घर में खाना नहीं खा सकते। माफी माँगना मेरे घरेलू परिवेश में एक सर्वथा नई बात थी, जिसका अर्थ समझ या समझा पाना भी मुश्किल था। सो पिताजी अलग हो गए। उनके साथ ही दूसरे सदस्य भी उनके साथ हो लिए। मैंने उस समय मुक्ति की सांस ली थी, पर अब लगता है कि वह मेरी हृदयहीनता थी। जवानी में आदमी बहुत-से ऐसे काम करता है जिनके अनुपयुक्त होने का पछतावा बाद में होता है जब प्रौढ़ता आती है। ऐसे कितने ही पछतावे मेरे सीने में दफन हैं। कभी-कभी वे कब्रा से निकलते हैं और रुला देते हैं।


बाद में माँ से मेरा संपर्क बहुत कम रहा। एक बार जब वह बीमार पड़ी, मैं उसे अपने घर ले आया और उसका इलाज कराया। एक बार जब वह गाँव में मेरे मामा के साथ रह रही थी, 'रविवार' के लिए किसी रिपोर्टिंग के सिलसिले में मेरा उत्तर प्रदेश जाना हुआ और मैं जा कर उससे मिल आया। माँ को लकवा मार गया था। कुछ घंटे उसके साथ बैठ कर चलने को हुआ, तो मैंने उसकी मुट्ठी में दो सौ रुपए रख दिए थे वैसा आनंद न उसके पहले मिला था. न उसके बाद मिला। कोलकाता में जब उसे हृदयाघात हुआ, यह मैं ही था जिसके प्रयास से उसे अस्पताल में भरती कराया गया। अस्पताल में उसकी सुश्रूषा के लिए मैंने एक नर्स रख दी थी। उन दिनों मेरी पत्नी ने भी माँ की बहुत सेवा की। यह मेरे लिए चिरंतन अफसोस की बात रहेगी कि जिस दिन उसका देहांत हुआ, मेरे दफ्तर, आनंद बाजार पत्रिका समूह, में अचानक हड़ताल हो गई थी और मैं दफ्तर के लिए घर से निकला, तो दोस्तों-सहकर्मियों के साथ गप-शप करते हुए काफी समय बीत गया और मैं देर रात गए घर लौटा। उन दिनों मोबाईल नहीं था, नहीं तो इतना बडा अघटन नहीं होता कि मैं माँ के शवदाह में शामिल न हो सका। यह सारा दायित्व मेरी पत्नी ने लगभग अकेले संभाला।


जब से मैं भारत के हिन्दी प्रदेश में आधुनिकता की सीमाएँ समझने लगा, तभी से मेरी पिछली गलतियाँ बुरी तरह मुझे हांट कर रही हैं। मैं परिवार में एकमात्र उच्च शिक्षित लड़का था। मुझे संयुक्त परिवार को ढहने से रोकने की पूरी कोशिश करनी चाहिए थी। मुझे अपने मां-बाप की, खासकर बूढ़ी माँ की, सेवा और मदद करनी चाहिए थी। लेकिन यह मैंने नहीं किया। उन दिनों मेरी जो आमदनी थी, वह खुद मेरे लिए ही काफी नहीं थी। लेकिन यह मुख्य कारण नहीं था। माँ से मेरा मन उचट चुका था। मैं उसकी दुनिया से निकल आया था और अपनी दुनिया में पूरी तरह रम चुका था। मुझे यह याद भी नहीं रहता था कि मेरी कोई माँ भी है। उसे शायद याद आता रहता हो, पर वह क्या कर सकती थी? अगर कुछ कर सकती होती, तब भी उसने नहीं किया। लेकिन इसमें सारा दोष मैं अपना ही मानता हूँ (अब मानता हूँ ; उन दिनों दोष की बात दिमाग में भी नहीं आती थी)। यह एक ऐसा पाप था, जिसकी कोई माफी नहीं है। मैं माफ़ी माँगना भी नहीं चाहता -- माँगूँ भी तो किससे। मैं अपने हृदयस्थल में अपने उस पाप को ढोना चाहता हूँ, ताकि उसके अनुताप की रोशनी में अपने सत्यों का लगातार संशोधन और परिमार्जन कर सकूँ।


मुझे इस बात का एहसास है कि मेरे साथ जो बीती है, वह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है। वह लाखों (शायद करोड़ों) लोगों की बदबूदार कहानी है। निम्न वर्ग या निम्न-मध्य वर्ग से आनेवाले नौजवान जब थोड़ी-बहुत सफलता अर्जित कर लेते हैं, तो उनके पुराने पारिवारिक रिश्ते धूमिल होने लगते हैं। इनमें सबसे ज्यादा उपेक्षा माँ की होती है। वह सिर्फ देती ही देती जाती है, पाती कुछ नहीं । यहाँ तक कि कृतज्ञता का स्वीकार भी नहीं। मैं माँ को ले कर भावुकता का वह वातावरण नहीं बनाना चाहता जो हिन्दी कविता में एक दशक से बना हुआ है (इसके पहले यह दर्जा पिता को मिला हुआ था)। लेकिन माँ -बेटे या माँ-बेटी का रिश्ता एक अद्भुत और अनन्य रिश्ता है। इस रिश्ते का सम्मान करना जो नहीं सीख पाया, वह थोड़ा कम आदमी है। मेरी माँ जैसी भी रही हो, 'साकेत' में मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्ति मेरे सीने में खुदी हुई है कि माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही। मैं कुपुत्र साबित हुआ, मेरा यह दुख कोई भी चीज कम नहीं कर सकती। उसका प्रायश्चित यही है, अगर कोई प्रायश्चित हो सकता है, कि मैं एक ऐसी संस्कृति की रचना करने में अपने को होम कर दूँ जिसमें माँ का स्थान जीवन के शीर्ष पर होता है। जो अपनी माँ को प्यार नहीं कर पाया, वह दुनिया में किसी और को प्यार कर सकेगा, इसमें गहरा संदेह है।


५३, एक्सप्रेस अपार्टमेंट्स
मयूर कुंज
दिल्ली - ११००९६



गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008

एक मर्मान्तक आत्मकथ्य : माता न कुमाता ........

3 टिप्पणियाँ



माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले

- राजकिशोर







दुनिया भर में जिस व्यक्ति का मैं सबसे ज्यादा गुनहगार हूँ, वह है मेरी माँ जिस स्त्री ने मेरे सारे नखरे उठाए, जिसने मुझे सबसे ज्यादा भरोसा दिया, जिसने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की, उसे मैंने कोई सुख नहीं दिया। दुख शायद कई दिए। अब जब वह नहीं है, मेरा हृदय उसके लिए जार-जार रोता है।


लगभग साल भर से अकसर रात को सपने के वक्त या सपने में मेरी माँ, मेरे पिता, मेरी भौजी, मेरे बड़े भाई किसी न किसी दृश्य में मेरे सामने आ उपस्थित होते हैं। बड़े भाई की मृत्यु पिछले साल ही हुई। वे मेरे पूर्व पारिवारिक जीवन की एकमात्र जीवित कड़ी थे। शायद उनकी मृत्यु के बाद से ही पुराने पारिवारिक दृश्य बार-बार मेरी स्मृति में या मेरे स्वप्न जगत में मुझे घेर ले रहे हैं। उस समय न कोई विषाद होता है, न कोई आनंद। बस मैं उस दृश्यावली का सामान्य अंग बना अपने अतीत को जीता रहता हूँ लेकिन आँख खुलने पर या वर्तमान में लौटने पर मुझे अपनी माँ और पिता दोनों की बहुत याद आती है । यह ग्लानि घेर लेती है कि मैंने उनके साथ बहुत अन्याय किया। खासकर माँ के साथ, जिसने मुझे अपने ढंग से बहुत प्यार दिया।



परिश्रमी तो मेरे पिता भी थे, पर माँ के मेहनती होने को मैं अधिक गाढ़ी स्याही से रेखांकित करना चाहता हूँ हमारे समुदाय में स्त्रियों का मुख्य काम होता है खाना बनाना, कपड़े धोना और घर को साफ-सुथरा रखना। शुरु में यह सब करते हुए मैंने अपनी माँ को कभी नहीं देखा, क्योंकि जब मैंने होश संभाला, मेरी ममतामयी भौजी घर का चार्ज ले चुकी थीं। माँ मेरे और मेरे छोटे भाई और बहन के कपड़े जरूर धो देती थी। लेकिन बाद में जब पारिवारिक कलह के कारण मेरे बड़े भाई ने अपनी अलग इकाई बना ली, तो माँ ने गजब जीवट का परिचय दिया। वह हम सबके लिए खाना बनाती थी, कपड़े भी धोती थी और दुकानदारी में पिताजी के साथ सहयोग भी करती थी। एक पल के लिए भी बेकार बैठना उसे गवारा नहीं था। मैं उन दिनों आधुनिक साहित्य पढ़-पढ़ कर ऐसा उल्लू का पट्ठा हो चुका था कि एक छोटी-सी बात पर नाराज हो कर मैंने घर छोड़ दिया और अलग अकेले रहने लगा। वह दृश्य मुझे कभी नहीं भूलेगा जब करीब ग्यारह बजे अपने दो-चार कपड़े और कुछ किताबें एक छोटे-से सूटकेस में भर कर मैं घर छोड़ रहा था। पिताजी देख रहे थे, माँ देख रही थी, पर किसी ने भी मुझे नहीं रोका। यह दुख अभी तक सालता है। वैसे तो थोड़ा बड़ा होते ही मुझे यह एहसास होने लगा था कि मेरा कोई नहीं है, पर उस घटना के बाद इसका फैसला भी हो गया।


दरअसल, मुझे न तो पिता पसंद थे, न माँ। वे दोनों बहुत ही साधारण भारतीय थे। उन्हें न तो बच्चों से लाड़-प्यार करना आता था और न उनकी देखभाल करना। घर-द्वार सजाने में भी उनकी कोई रुचि नहीं थी। कपड़े फट जाने पर सिल-सिल कर पहने जाते थे -- जब तक वे एकदम खत्म न हो जाएँ गरीबी थी, पर उससे ज्यादा मानसिक गरीबी थी। एक तरह से मैं अपने आप ही पला, जैसे सड़क पर पैदा हो जानेवाले पिल्ले पल जाते हैं या मोटरगाड़ियों के रास्ते के किनारे के पौधे पेड़ होते जाते हैं। इसीलिए मेरे मानसिक ढांचे में काफी खुरदरापन है। प्रेम पाने की इच्छा है, प्रेम देने की इच्छा है, भावुकता भी है, लेकिन कुछ अक्खड़पन, कुछ लापरवाही, कुछ व्यंग्यात्मकता और कुछ गुस्सा भी है। आज मैं इस बात की सच्चाई को अच्छी तरह समझता हूँ कि जिसे बचपन में दुलार नहीं मिला, उसका व्यक्तित्व जीवन भर के लिए कुंठित हो जाता है। मैं बहुत मुस्तैदी से इस कुंठाग्रस्तता से लड़ता हूं, फिर भी पार नहीं पाता।


दरअसल, मेरे कॉलेज जाने तक मेरे शेष परिवार और मेरे बीच एक भयानक खाई उभर आई थी। मैं पढ़ते-लिखते हुए मध्यवर्गीय जीवन के सपने देख रहा था और इसमें मेरे माता-पिता की कोई भूमिका नहीं थी। मैं एक नई भाषा सीख रहा था और वे भाषा और संस्कृति की दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे। वे न अखबार पढ़ते थे न रेडियो सुनते थे। माँ पिता की तुलना में और भी पिछड़ी हुई थी। इस तरह के तथ्य मध्यवर्गीय चाहतों वाले मेरे मन में हीन भावना भरते थे। जब से उसे देखने की मुझे याद है, वह बूढ़ी ही थी और स्त्रीत्व की कोई चमक उसमें नहीं थी। शुरू में उसके प्रति मेरे मन में बहुत चाव था। जब चांद से लाए हुए पत्थर के टुकड़ों में से एक टुकड़े का प्रदर्शन कोलकाता में किया जा रहा था, मैं उसे अपने साथ वह टुकड़ा दिखाने ले गया था। लेकिन धीरे-धीरे मैं उससे उदासीन होने लगा, हालांकि वह अपने ढंग से मेरी चिंता करती रही। मैं जब घर के पास एक छोटा-सा कमरा ले कर रहने लगा, तो उसने ग्वाले से कह कर मेरे लिए रोज एक पाव दूध का इंतजाम कर दिया था।


क्रमश:

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