Friday, September 5, 2008

स्त्रीदेह : बलात्कार और सामाजिक दायित्व



स्त्री से बलात्कार के कारकों पर विरोध जताने वाली गत प्रविष्टि पर आई प्रतिक्रियाओं पर आभार व्यक्त करते समय जिस विचार - मंथन से साक्षात हुआ वह विशद रूप ले गया। उसे मात्र प्रतिक्रियाओं के प्रत्युत्तर में रख छोड़ना उचित नहीं होता।.... देखें >>>http://streevimarsh.blogspot.co.uk/2008/09/blog-post.html 

द्विवेदी जी, जयशंकर जी, समीर जी,रचना जी, पल्लवी जी, प्रजापति जी, नितीश जी, पंगेबाज जी, लवली जी, त्रिपाठी जी व सक्सेना जी!

आप सभी के प्रति आभारी हूँ कि आप की प्रतिक्रियाओं ने मनोबल बढ़ाया.

२ बातें स्पष्ट कर देना चाह्ती हूं. पहली यह कि इस प्रकार की चर्चा किसी भी प्रकार से किसी को भी व्यक्तिगत रूप से नहीं लेनी चाहिए, न मैं इसे किसी के प्रति व्यक्तिगत दुर्भावना के रूप में लेती हूँ व न ही दूसरों से ऐसा करने की आशा करती हूँ.ऐसी या अन्य ऐसी और भी किसी चर्चा को चर्चा के रूप मेइं ही लेना चाहिए व इसे व्यक्तिगत दोस्ती या दुश्मनी का माध्यम बनने नहीं देना चाहिए.इन अर्थों में मुझे शास्त्री जी के या ऐसे किसी और के प्रति कोई व्यक्तिगत दुर्भावना कदापि नहीं है.

दूसरी बात, ऐसी चर्चाएँ जब भी खुल कर होती हों तो उनसे विचलित होने अथवा घबराने या निराश होने की कतई आवश्यकता नहीं है. तात्विक स्तर पर सभी समझदार व सुलझे हुए लोग परस्पर किसी भी विषय पर खुल कर चर्चा कर सकते हैं.बस चर्चा के उद्देश्य सभी के सामने स्पष्ट होने चाहिएँ कि वे चर्चा चर्चित होने के लिए कर रहे हैं या समय बिताने के लिए या रस लेने के लिए या वास्तव में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए अथवा किसी सत्य के अन्वेषण व स्थापना के लिए.

मेरी ओर से यह बात स्त्री या पुरुष का पक्ष लेने की है ही नहीं। बात तो वास्तव में मनुष्य के रूप में सही व गलत और उचित व अनुचित की पक्षधरता की है, विवेक की है और है सामाजिक हित की चिन्ता की। कई बार कुछ चीजें हम निजी तौर पर अपनी मानवीय कमियों व विवशताओं के चलते कर- सुन लेते हैं किन्तु सामाजिक हित में अपनी उन कमजोरियों को सही सिद्ध करना तो कदापि उचित नहीं कहा जाएगा न? जैसे मान लें कि मैं एक भूखे व्यक्ति के चोरी करने या अज्ञानी द्वारा अपराध करने को बहुत बड़ा विषय न मानूँ या उन्हें अपराधी न मानूँ अथवा अपने बच्चे द्वारा की गई किसी बड़ी भूल को भी क्षमा कर दूँ, किन्तु मेरा नैतिक दायित्व फिर भी यही होता है व रहेगा कि चोरी करना गलत है, पाप है,अपराध है। इसी प्रकार हम अपने जीवन में हजार भूलें करने के बाद भी जब उन भूलों को सही सिद्ध करने में लग जाते हैं-- समस्या तब होती है,गलती वहाँ होती है। अत: सामाजिक हित के निमित्त हमें जीवनमूल्यों का पक्ष लेना ही चाहिए, विवेक का पक्ष लेना ही चाहिए. भले ही एक बार को मैं अपने जीवन में सच न बोलूँ किन्तु कभी यह न मान- कह दूँ कि झूठ बोलना ही सही है. इसका ध्यान बने रहना चाहिए.... और यही मेरे विरोध का निमित्त था. बलात्कार क्योंकि सर्वाधिक जघन्य सामाजिक अपराध है अत: उसके दोषियों को अपराधी न कहकर सही सिद्ध करने की मनोवृत्ति का विरोध सामाजिक व मानवीय पक्षधरता है इसलिए वहा आवश्यक है , यह बात सभी को जब तक संप्रेषित नहीं होती तब तक सारे तंत्र का समेकित प्रयास भी इस अपराध को रोक नहीं सकता। इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए इस प्रकार के असामाजिक वक्तव्य देने में जिस प्रकार के मैंने गत पोस्ट में उद्धृत किए थे.....


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