Tuesday, November 3, 2009

पुरुष विमर्श

एकालाप 

 पुरुष विमर्श


ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
नन्हें हाथों में कलम धरी.
भाई! तेरा भी धन्यवाद
आगे आगे हर बाट करी.
तुम साथ रहे हर संगर में
मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद;
बेटे! तेरा अति धन्यवाद
हर शाम दिवस की थकन हरी.



शिव बिना शक्ति कब पूरी है
शिव का भी शक्ति सहारा है.
मेरे भीतर की अमर आग
को तुमने नित्य सँवारा है.
अनजान सफ़र पर निकली थी
विश्वास तुम्हीं से था पाया;
मैं आज शिखर पर खड़ी हुई
इसका कुछ श्रेय तुम्हारा है.

- ऋषभदेव शर्मा


3 comments:

  1. हम पैदा हुए, यह श्रेय तुम्‍हारा था
    हम बचे रहे, यह अधिकार तुम्‍हारा था
    श्‍वेत वस्‍त्र या साज श्रृंगार, यह भी देय तुम्‍हारा था
    हम कब तक जिए या सति बने, यह धर्म तुम्‍हारा था।
    भाई बढिया, स्‍वयं का अधिकार। शीर्षक अच्‍छा है - एकालाप।

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  2. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

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  3. आदरणीय डॊ. अजित गुप्ताजी, आप के कमेंट से ऐसा लग रहा है कि कवि ने कुछ पुरुष प्रधान कविता लिख दी है और आप आहत हैं। शीर्षक पर भी आपको मुगालता हुआ है। कवि ने शीर्षक ‘पुरुष विमर्श’ दिया है जो ‘एकालाप’ स्तम्भ में छपा है।

    शायद आप कविता की अंतिम पंक्तियों तक पहुंचती तो आपका भ्रम दूर हो जाता क्योंकि कवि ने शिव और शक्ति को एक दूसरेका पूरक बताया है। यदि कवि ने यहां पुरुष गान भी किया है तो क्या आप इस बात से इनकार करेंगी कि आपके पिता ने पढा-लिखा कर इस काबिल बनाया, आपके साहित्यिक रुची को आपके पति और बच्चों ने प्रोत्साहित किया? यदि हां, तो फिर यह एकालाप ही क्यों कि स्त्री-विमर्श का मतलब सदा पुरुष को कोसते ही रहॊ:)

    आशा है कि आप पुनः इस कविता को पढेंगी और कवि के मर्म को समझेंगीं।

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