Friday, April 2, 2010

स्वेच्छाचार


एकालाप 



स्वेच्छाचार 




हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ.
उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहा
मैंने जुआ गिरा दिया,
उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाही
मैंने हौदा ही उलट दिया,
उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहा
मैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पटक दिया,
उन्होंने मुझे जंजीरों में बाँधना चाहा
मैं पग घुँघरू बाँध सड़क पर आ गई!


अब वे मुझसे घृणा करते हैं
माया महाठगनी कहते हैं
मेरी छाया से भी दूर रहते हैं.
बेचारे परछाई से ही अंधे हो गए
हिरण्मय आलोक कैसे झेल पाते!


हाँ, मैं हूँ स्वेच्छाचारी!
मैंने अपने गिरिधर को चाहा
उसी का वरण किया
गली गली घोषणा की -
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई!


मेरे पति की सेज सूली के ऊपर है,री!
मुझे बहुत भाती है,
मैंने खुद जो चुनी है!!

> ऋषभदेव शर्मा 


6 comments:

  1. आभार इस उम्दा रचना को पढ़वाने का.

    ReplyDelete
  2. एक महत्वपूर्ण कविता के लिए शर्मा जी को बधाई!

    ReplyDelete
  3. इतनी अच्‍छी कविता पढ़वाने के लिए आभार।

    ReplyDelete
  4. wow achi rachan he
    aap ko badhai



    shekhar kumawat


    http://kavyawani.blogspot.com/

    ReplyDelete
  5. बहुत अच्छी कविता है. एकदम कड़वा सच.

    ReplyDelete

आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

Related Posts with Thumbnails