Friday, June 15, 2012

व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि : शालिनी माथुर




समकालीन स्त्रीकविता व कवितादृष्टि पर एक खरा खरा अद्भुत लेख 
जो आप को अंत तक बाँधे रखेगा और नई दृष्टि देगा 


`कथादेश' के जून अंक में शालिनी माथुर का एक अत्यंत विचारोत्तेजक व समकालीन कविता को प्रचलित अर्थों से इतर देखने की दृष्टि से सम्पन्न आलेख प्रकाशित हुआ है। Ashutosh Kumar जी द्वारा यह लिखने पर  कि " कथादेश के जून अंक में शालिनी माथुर ने गज़ब का लेख लिखा है. कविता की 'व्याधि' पर .निवेदन है कि इसे दूसरे दस काम छोड़ कर पढ़ा जाए . पवन करण और अनामिका अपनी स्त्रीवादी चेतना के लिए चर्चित रही हैं . लेकिन माथुर तर्क करती हैं कि उन की कवितायें न केवल स्त्री विरोधी हैं ,बल्कि सब से आपराधिक अर्थों में पोर्नोग्राफिक हैं. किसी भी रूप में उन की बहस नैतिकतावादी या अंध -अस्मितावादी नहीं है , न कविता के प्रति बेवजह कठोर .इस लेख पर चर्चाओं का तूफ़ान उठना चाहिए",  इस लेख को पढ़ने की उत्कंठा थी।


`कथादेश' यद्यपि ऑनलाईन उपलब्ध हुआ करता था किन्तु सितंबर 2011 के बाद से साईट पर अद्यतन नहीं हुआ है अतः पढ़ पाना संभव न था। अंततः कल कृतिदेव फॉन्ट में यह आलेख उपलब्ध हुआ। वैचारिक लेखन , स्त्रीविमर्श और कविता तथा आलोचना में रुचि रखने वालों के लिए उक्त आलेख को कल यूनिकोडित किया है। 


सच में आलेख पठनीय और विचारणीय है। विवश करता है, उस आलोचना और चलन के चीरफाड़ की भी जो विमर्श के नाम या अपने पराए के नाम पर मीमांसा को दरकिनार किए है। एक बेहद आवश्यक और रेखांकित करने योग्य आलेख। 


आवश्यक नहीं है कि सहमत असहमत हुआ ही जाए। हाँ, पढिए अवश्य ; और इस बहाने कविता की समकालीन आलोचना और दृष्टियों पर चर्चा भी अवश्य की जानी अनिवार्य है। अपने विचार देना न भूलें। 

- कविता वाचक्नवी
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व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि
शालिनी माथुर




साहित्य का कोई प्रयोजन तो होता ही होगा, लोकसंग्रह ,आत्माभिव्यक्ति, संस्कृति को समृद्ध करना या फिर हिन्दी की फ़िल्म डर्टी पिक्चर  की भांति एन्टरटेन्मेन्ट, एन्टरटेन्मेन्ट एंड एन्टरटेन्मेन्ट। कविता करने वालों को कहानीकारों , नाटककारों, और निबन्धकारों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता है। कविता भाव प्रधान हो सकती है, भावना प्रधान हो सकती है, अर्थवान् भी और निरर्थक भी । कविता एब्सर्ड भी होती है पर कविता को कुछ न कुछ तो निरूपित करना होगा चाहे वह निरर्थकता या एब्सर्डिटी ही क्यों न हो। कविता ने शिल्प के अनुशासन से तो स्वयं को मुक्त कर लिया है- न छंद , न लय, न अलंकार, न छवियाँ, न बिम्ब। कविता अब गाई भी नहीं जाती, पढ़ ली जाती है। तो क्या पढ़ कर समझी भी न जाए ? पाठक कविता से क्या अपेक्षा करे ? खास कर जब कवि कवयित्री स्वयं को नारीवाद जैसे मानवीय विषय का प्रवक्ता बताते हुए अमानवीय रचनाएँ करें, निरन्तर करते रहें और  करते ही चले जाएँ। वे व्याधि पर कविता करें, इस चेतना के बग़ैर कि व्याधि से जूझ रहे मानव समाज को कैसा लगता होगा?



     बीमारी एक खास किस्म का रूपक बनाती है- अंधता, हैज़ा, कुष्ठ, प्लेग, टी0बी0, कैंसर और अब एड्स। अबे अंधा है क्या, कोढ़ की तरह सड़ना, प्लेग की तरह फैलना, टी0बी0  या राजरोग से गलना, कैंसर की तरह जड़ जमाना यह सारे शब्द और मुहावरे मनुष्य  की हृदयहीनता प्रदर्शित करते है। बातचीत और बतकहियों में रोग को मुहावरे की तरह इस्तेमाल करना एक प्रकार की क्रूरता है जिसे लोग बिना विचारे करते रहते हैं। सूसन सॉन्टैग जो स्वयं कैंसर से पीड़ित होकर इलाज से ठीक हुई थीं अपनी पुस्तक `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' में कहती है कि ऐसे प्रयोगों से रोग ही नहीं रोगी भी कलंकित होता है । वह निरूत्साहित हो जाता है , चुप्पी साध लेता है और शर्मिन्दा हो कर इलाज कराने से झिझकने लगता है। व्याधि को रूपक बनाते ही हम व्याधि को ख़तरनाक और असाध्य बना देते हैं। इससे रोगियों का एक अलग वर्ग तैयार हो जाता है- आइसोलेटेड - अलग-थलग अपने कर्मों का फल भोगते हुए, अपने अंत की प्रतीक्षा करते हुए।



     सूसन सॉन्टैग  का लेख `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' 1978 में छपा और बहुत चर्चित हुआ। स्वयं कैंसर का इलाज करवाते समय उन्होंने पाया कि किस प्रकार बीमारी को रूपकों और मिथकों से जोड़ने से उत्पन्न मानसिक दबाव अनेक मरीजों की मौत का कारण बनता है। वे कहती हैं कैंसर केवल एक बीमारी है- (जस्ट अ डिज़ीज) अभिशाप नहीं, सज़ा नहीं, शर्मिन्दगी नहीं। इसका इलाज हो जाए तो यह ठीक हो जाता है।



साहित्य में क्या स्त्री दृष्टि  और पुरुष दृष्टि  अलग-अलग होती होगी ? यह प्रश्न अक्सर हमारे सामने आ खड़ा होता है। आज स्तन के कैंसर पर लिखी गई पवन करण की कविता ’स्तन’ और अनामिका की कविता ‘ब्रेस्ट कैंसर’ की समीक्षा करते समय उत्तर ढूंढ़ने का प्रयास कर लेते हैं। क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से अलग है? क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से इसलिए अलग होनी चाहिए, क्योंकि अनामिका स्त्री हैं ? क्या पुरुष के पास  पुरुष दृष्टि  और स्त्री के पास स्त्री दृष्टि होती है? या कवि चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो, दृष्टियाँ दो प्रकार की होती हैं मर्दवादी और नारीवादी, या फिर मानवीय और अमानवीय।



  स्त्री का वक्षस्थल पुरुष कवियों का प्रिय विषय रहा है। उसका वर्णन सामान्यतः सौन्दर्य वर्णन के लिए  शृंगारिक भाव से किया जाता रहा है। स्त्री शरीर के उतार-चढ़ावों को निरूपित करने के लिए अनेक उपमाएँ दी जाती रहीं हैं। क्या किसी पुरुष ने अपने किसी अंग के बारे में इस प्रकार का वर्णन या निरूपण किया है? शायद नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ ही वर्ष पूर्व तक कविता लेखन पूरी तरह पुरुष वर्चस्व के अधीन था पर आज हमारे सामने जो कविताएँ हैं वे इसी सदी में लिखी गई हैं। ये कविताएँ उन समयों में लिखी गई हैं जिन समयों में जॉन स्टुअर्ट मिल और मैरी वोल्टसन क्राफ्ट स्वतंत्रता तथा स्त्री-पुरुष समकक्षता के सिद्धान्त प्रतिपादित कर चुके थे। ये कविताएँ घोषित रूप से स्वयं को स्त्री का पक्षधर कहने वाले नारीवादी कवियों की हैं। ये स़्त्री के ‘ब्रेस्ट कैंसर’ पर लिखी गई कविताएँ हैं।


इस विषय पर द ब्यूटी मिथ में नाओमी वुल्फ़ ने गम्भीर चर्चा की है। वे बताती हैं कि किस प्रकार पुरुष के शरीर के नग्न निरूपण को अश्लील समझा जाता है और उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है चाहे वह एड्स जैसी बीमारियों के विषय में जागरूकता हेतु ही क्यों न किया गया हो, और किस प्रकार स्त्री के वक्षस्थल का सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शन के लिए प्रयोग होता रहा है, कभी विज्ञापन के रूप में, कभी फिल्म के रूप में, कभी गीतों के रूप में । इस प्रकार पुरुष का शरीर बेहद सम्भ्रान्त तरीक़े से ढका रहता है जिससे वह शालीन बना रहता है,  और स्त्री का शरीर और उसकी चोली विज्ञापन और पर्दे पर थिरकती रहती है , जिससे उसका शरीर बाज़ारू बनता है। जो संस्कृतियाँ स्त्रियों को सामान्यतः नग्न निरूपित करती हैं और पुरुष को नहीं, वे लगातार धीरे-धीरे असमानता सिखाती हैं।


भारत में भी राई नर्तकियाँ, बेड़िनें और नौटंकी में नाचने वाली ग़रीब औरतें भी अपने चेहरे पर घूँघट ढककर और छाती खोलकर दो पैसों की ख़ातिर नाचती रही हैं और बेशऊर मर्द उन पर चवन्नियाँ लुटाते रहे हैं। नौटंकी देखने औरतें नहीं आतीं-नौटंकी  मर्दां का तमाशा है। इन बेचेहरा औरतों की कोई पहचान नहीं। वे औरत ज़ात हैं, उनका वक्षस्थल ही उनकी पहचान है। चवन्नी उसी पर  न्योछावर की जाती है।


पवन करण ने भी इसी विषय  पर कविता लिखी है, कविता का शीर्षक  है ’स्तन’

  "इच्छा होती तब वह धंसा लेता उनके बीच अपना सिर ... /   और तब तक उन पर आंखें गड़ाये रखता,  जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से /  ....या लजा कर अपने हाथों से छुपा नहीं लेती उन्हें... अंतरंग क्षणों में उन दोनों को हाथों में थाम कर उससे कहता/ यह दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियॉ/ इन्हें संभाल कर रखना/ वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता/“ ... ”वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के / इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती “....“मगर रोग ऐसा घुसा उसके भीतर/ कि उनमें से एक को ले कर  ही हटा देह से। कोई उपाय भी न था सिवा इसके/ उपचार ने उदास होते हुए समझाया/... अब वह इस बचे हुए एक के बारे में/ कुछ नहीं कहता उससे, / वह उसकी तरफ देखता है।/ और रह जाता है कसमसा कर। /.... मगर उसे हर समय महसूस होता है।/ उसकी देह पर घूमते उसके हाथ।/ क्या ढूंढ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” ...."उस खो चुके एक के बारे में भले ही एक दूसरे से न कहते हों वह कुछ, मगर वह विवश जानती है/उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से।"


      कवि पवन करण उक्त गद्यात्मक पंक्तियों को स्तन शीर्षक वाली कविता के रूप में ’स्त्री मेरे भीतर’ नामक संग्रह में संग्रहीत करते हैं।



    पवन करण की कविता में स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है, पुरुष के रमण के लिए, देखें वह स्त्री देह के लिए किस प्रकार के उपमान प्रयोग करते हैं-  "वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/ तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता"। पवन करण की कविता स्त्री देह को गोश्त  के टुकड़े के रूप में निरूपित करती है जिसे पुरुष लालची निगाहों से देखता है "और तब तक उन पर आँखें गड़ाये रखता, जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से"।  पवन करण की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है "वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के /  इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती"।


पोर्नोग्राफर शरीर को मनविहीन, हृदयविहीन वस्तु के रूप में निरूपित करता है आत्मीयता (इंटिमेसी) और सम्बन्ध (कनेक्शन) रहित। (सूसन ग्रिफिन) पवन करण की एक यही कविता नहीं अधिकांश कविताएँ पोर्नाग्राफी की श्रेणी में आती है क्योंकि उनमें शरीर (बाडी) को मन(माइंड) से अलग करके देखा गया है तथा स्त्री शरीर को पुरुष के अधिपत्य की भूमि माना गया है। पवन करण के पुरुष के हाथों में स्त्री शरीर ही नहीं उसके अलग-अलग अंग एक खिलौना हैं।


कविता में निरूपित पुरुष स्त्री को केवल देह के रूप में ही नहीं देह के केवल रमणीय अंगों के रूप में देख सका।  देह भी ऐसी जो कैंसर से ग्रस्त है, कैंसर  भी ऐसा जिससे शरीर का पूरा एक अंग काट कर निकालना पड़ा। दुःखद तो यह है कि कविता का समर्पण नाम लेकर किया गया, "संगीता रंजन के लिए जिसे छाती के कैंसर के कारण अपना एक स्तन गंवाना पड़ा।"  सभ्य समाज में एक आँखवाले, एक टाँगवाले, एक हाथवाले व्यक्ति की विकलांगता को द्योतित करने वाले शब्द कहना उचित नहीं समझा जाता, वहाँ स्त्री के एक ब्रेस्ट को कैंसर के कारण काट दिये जाने पर ऐसी कविता लिखी गई और नाम लेकर व्याधिग्रस्त स्त्री को समर्पित की गई ।


    स्त्री पुरुष से हीनतर है, वह पुरुष के अधीन है, इस बात को पोर्नोग्राफ़र इतनी बार कहता है कि लोग इस बात पर यकीन करने लगते हैं। (सूसन ग्रिफ़िन ) पवन करण की स्त्री भी अपने शरीर को पुरुष की दृष्टि से देखती है। वह आब्जेक्टिफ़ाइड है (वस्तुकृत), कंट्रोल्ड (विवश) और ह्यूमिलिएटेड (अपमानित) कि उसे कैंसर से मरने से बचने के लिए स्तन गंवाना पड़ा। "उस खो चुके एक के बारे में भले ही/ एक दूसरे से न कहते हो वह कुछ/ मगर वह विवश जानती है/ उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से "। स्त्री विवश है, पोर्नाग्राफी की क्लासिकल स्त्री छवि ।

         
पवन करण के पुरुष को इस बात का संतोष नहीं कि सर्जरी से उसकी सहचरी को जीवन के कई नए वर्ष मिल गए। मगर उसे हर समय महसूस होता है। उसकी देह पर घूमते उसके हाथ/क्या ढूँढ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” पवन करण को संदेह का लाभ दें तब भी पाएँगे कि कवि की सहानुभूति स्त्री के नहीं पुरुष के प्रति है जिसका खिलौना शल्य चिकित्सा से कट गया। पुरुष  के पास शरीर भी है और मन भी क्योंकि खिलौना टूट जाने से उसका मन मायूस है और हाथ भी। पवन करण कहते हैं कि शरीर के विरूपित हो जाने से स्त्री को हानि हो न हो पुरुष को होती है क्यों कि वह स्त्री शरीर से उस तरह से नहीं खेल सकता जिस तरह खेलना चाहता है और पुरुष यदि स्त्री में रुचि लेना बंद कर दे तो स्त्री का जीवन निरर्थक है क्यों कि स्त्री की प्रसन्नता इसी में है कि पुरुष का हाथ उसकी देह से खेले।



"पोर्नोग्राफर स्त्री की हीनता ( इन्फीरियोरिटी ) में पूरा यकीन रखता है। वह इस बात में इतना गहरा विश्वास  रखता है कि वह इसे सिद्धान्त ( डॉक्ट्रिन ) के रूप में नहीं कहता। वह इसे एक सच्चे तथ्य (फैक्ट) के रूप में कहता है। वह यह नहीं कहता कि मुझे यह कहना है कि स्त्री हीन होती है। स्त्री कमतर है, सामान्यतः इस बात को वह इतनी  बार कहता जाता है- इशारों से, और वाक्यों से, कि इस प्रश्न पर बहस की कोई गुंजायश ही नहीं रह जाती।’’ (सूसन ग्रिफिन) उक्त परिभाषा  पर पवन करण शत प्रतिशत सही उतरते हैं।
                  

      पवन करण अपवाद को नियम के रूप में स्थापित करते हैं। उनकी कविता दुःख क्षोभ या खेद से नहीं लिखी गई है, न ही ऐसा सोचने वाले पुरुष के प्रति हिकारत से। वह कविता यकीन के साथ लिखी गई है। पाठक देख सकते है कि पवन करण यह नहीं मानते कि स्त्री को इस रूप में देखना गलत है, उन्हें यकीन है कि स्त्री शरीर की यही उपयोगिता है। संभव है डेविल्ज़ एडवोकेट बन कर कोई कहे कि कुछ पुरुषों  की यही धारणा होती होगी,  परन्तु यूँ तो कुछ पुरुष  पेडोफ़ैलिक भी होते हैं। क्या हम उन मानसिक व्याधिग्रस्त पुरुषों को छोटे बच्चों का यौनिक और कामुकतापूर्ण नखशिख वर्णन करने की अनुमति देंगे और पुरस्कृत करेंगे?



पोर्नोग्राफर डिटर्मिनिस्टिक होते हैं, वे सोचते हैं, ठीक है, लोग ऐसे ही होते हैं, और हम उन्हें वह ही दे रहे हैं जो वे चाहते हैं पर यह सच नहीं है। सच यह है कि संस्कृति का निर्माण हम स्वयं करते है। (सूसन ग्रिफ़िन) । पवन करण के पात्र कीचड़ से सने हैं और यह  कीचड़ भी उन्होंने खुद ही तैयार किया है। शल्य क्रिया के बाद एक स्तन वाली स्त्री पवन करण के पुरुष का प्रेम नहीं पा सकती। पवन करण की स्त्री पुरुष के हाथों विवश है और अपमानित, उस पुरूष  के हाथों, जो उसके शरीर का मालिक था। पोर्नोग्राफी का मकसद है- दूसरे के शरीर पर कब्ज़ा (मास्ट्री ऑफ़ दीज़ अदर्स) ।


पवन करण की इस कविता को वीभत्स कहना भी वीभत्स रस का अपमान करना है क्योंकि वीभत्स भी एक रस है जो सामान्यीकृत हो कर पाठकों तक पहुँचता है। पोर्नोग्राफी में नग्नता और पीड़ा पहुँचाना शामिल हो यह ज़रूरी नहीं। उनकी कविता हृदयहीन और अमानवीय है, जिसमें स्त्री  विवश, वस्तुकृत और अपमानित है। यह पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचना है- हैवानियत से भरी। (मैं पाशविकता की जगह हैवानियत शब्द का प्रयोग कर रही हूँ, चूंकि पशु जगत में ऐसी नृशंसता अकल्पनीय है।)  


         इसी वर्ष 2012 में प्रतिष्ठित साहित्यकार और नारीवादी चिंतक एड्रियन रिच का निधन हो गया। 1880 में लिखे अपने लेख ’’ कम्पलसरी हेट्रोसेक्सुअलिटी एंड लेस्बियन एक्ज़िस्टेंस’’ में वे पितृसत्ता  को पुरुष द्वारा स्त्री के शरीर, पैसे और भावना पर आधिपत्य (मेल राइट ऑफ फ़िज़िकल, इकोनामिक एंड इमोशनल एक्सेस टु वुमन) स्थापित करने का एक हिंसक राजनीतिक उपकरण सिद्ध करती हैं । पवन करण कहते हैं  "उन दोनों को हाथों में थामकर उससे कहता / ये दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियाँ / इन्हें संभाल कर रखना।’’  स्त्री का वक्षस्थल स्त्री के अंग है या पुरुष की अमानत और आधिपत्य क्षेत्र?  एड्रियन रिच ने विस्तार से विचार किया है कि किस प्रकार मर्दवादी विवरणों और छवियों के कारण स्त्रियाँ स्वयं अपने ही शरीर को अपनी दृष्टि से देख पाने में असमर्थ रहती हैं।


       उधर पत्रिका पाखी के फरवरी 2012 के स्त्री लेखन विशेषांक  में ‘‘हिन्दी की समकालीन कवयित्रियों  में  शीर्ष  पर विराजमान ’’ कवयित्री अनामिका की कविता प्रकाशित हुई है, ब्रेस्ट कैंसर। वे कहती हैं-

 :दुनिया की सारी स्मृतियों को / दूध पिलाया मैंने, / हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!, तब जाकर / मेरे इन उन्नत पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  / जाले लगे! कहते हैं महावैद्य / खा रहे हैं मुझको ये जाले / और मौत की चुहिया / मेरे पहाड़ों में / इस तरह छिप कर बैठी है कि यह निकलेगी तभी जब पहाड़ खोदेगा कोई! निकलेगी चुहिया तो देखूँगी मैं भी, सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहूँगी - हलो कहो कैसी रही ? अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! दस बरस की उम्र से तुम मेरे पीछे पड़े थे, /  अंग संग मेरे लगे ऐसे, दूभर हुआ सड़क पर चलना ! बुलबुले अच्छा हुआ फूटे! कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम से बाहर! / मेरे ब्लाउज़ में छिपे मेरी तकलीफों के हीरे, हलो / कहो कैसे हो?" 

“जैसे निर्मूल आशंका  के सताए / एक कोख के जाए / तोड़ लेते हैं सम्बन्ध / और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है! / जाने दो जो होता है सो होता है, मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया, /  दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैने! / , हाँ,  बहा दीं दूध की नदियाँ! / तब जाकर / जाले लगे मेरे इन उन्नत  पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  ! / लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”


कवयित्री ने यह कविता उत्तमपुरुष (फर्स्ट पर्सन) यानी "मैं’’ इस्तेमाल करते हुए लिखी है, यद्यपि कविता किसी अन्य स्त्री की व्याधि पर लिखी गई है और उन्हीं वनिता टोपो को निवेदित की  है।



ब्रेस्ट कैंसर शीर्षकवाली कविता में ब्रेस्ट के लिए "उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं’’ वाला उपमान कितना उपयुक्त है? पहाड़ों और गुफाओं का दूध से तो दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध है ही नहीं पर क्या व्याधिग्रस्त अंगों के लिए सौन्दर्य वर्णन के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपमानों का प्रयोग उचित प्रतीत हो रहा है? उत्तम पुरुष में लिखी इस कविता में, मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं का प्रयोग स्त्री द्वारा स्वयं अपना नखशिख वर्णन करने के लिए किया गया है। हमें याद होगा कि एक राज्य की भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने स्वयं अपनी ही मूर्तियाँ बनवाकर, स्वयं उनका अनावरण किया था। हिन्दी की इस कविता में स्त्री स्वयं अपनी देह के सौन्दर्य का वर्णन करके अपनी देह को स्वयं ही अनावृत्त कर रही है। यहाँ प्रश्न अनावरण का नहीं निरूपण का है।



         अश्लीलता निर्वस्त्रता में नहीं होती। सड़क पर पत्थर फोड़ती हुई स्त्री जब बच्चे को सार्वजनिक स्थान पर दूध पिलाती है, कभी-कभी मध्य तथा उच्च आय वर्ग की स्त्री भी बस या ट्रेन में ऐसा करती देखी जा सकती हैं, तब अश्लीलता का अहसास नहीं होता पर जब कोई स्त्री बेध्यानी का अभिनय करती हुई जान-बूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती है, और ध्यान से चारों ओर देखती है कि सबने उसे ध्यान से देखा या नहीं तब वह अश्लील हरकत कर रही होती है। लम्पट पुरुष  इस हरकत पर मस्त हो सकते हैं पर ऐसा करते समय वह उन स्त्रियों को भी निर्वस्त्र कर रही होती है जो निर्वस्त्र नहीं होना चाहतीं। ठीक उसी तरह जिस तरह पोस्टर पर बनी नग्न और अपमानित स्त्री की छवि वहाँ से गुज़रने वाली हर स्त्री को नग्न अनुभव कराती है। इसमें पूरी स्त्री जाति के वे सदस्य भी नग्न हो जाते हैं जो नग्न नहीं होना चाहते ।


       कवयित्री ‘‘संसार की स्मृतियों को दूध पिलाया’’, ‘‘बहा दीं दूध की नदियाँ’’, पदों का प्रयोग करती हैं। संसार की स्मृतियों का ब्रेस्ट कैंसर नामक व्याधि से क्या लेना देना? `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' नामक पुस्तक में इस विषय पर गहन चिन्तन है। चिकित्सक इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि इस व्याधि का इंसान के व्यक्तित्व से कोई ताल्लुक नहीं है, न स्वभाव से न स्मृति से । यह व्याधि नवजात शिशुओं तक को हो जाती है। यदि स्मृतियों का कोई अर्थ लगाना भी चाहें तो कह सकते हैं कि स्मृतियों  को वक्षस्थल में सहेजा जा सकता है, पर तब वक्षस्थल का अर्थ मन होता है। यहाँ पर कवयित्री मन नहीं स्तन के बारे में बात कर रही हैं।



     इसके बाद का पद है "तब जाकर’’। हम लोग हिन्दी भाषा  में कहते हैं, "हमने कटरा से तेरह किलोमीटर चढ़ाई की तब जाकर वैष्णों  देवी के दर्शन  हुए’’, "पार्वती ने पर्वत पर वर्षों तप किया तब जाकर शिव जैसा पति पाया’’, "सिद्धार्थ ने वर्षों तक साधना की तब जाकर ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए ’’, या "मैं रिज़र्वेशन कराने के लिए `वृद्धों विकलांगों तथा महिलाओं ’ वाली टिकट खिड़की के सामने एक घंटा पंक्ति में खड़ी रही तब जाकर रेल का टिकट मिला’’। स्पष्ट है ' तब जाकर ’ पद का प्रयोग तब किया जाता है जब हम किसी वस्तु या अवस्था को प्राप्त करना चाहें और उसके लिए कठिन प्रयास करें `तब जाकर’ वह वस्तु या अवस्था प्राप्त हो। अनामिका अपनी कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों में कहती हैं, "बहा दीं दूध की नदियाँ तब जाकर मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में जाले लगे" और यही रूपक आरम्भ से अन्त तक चलता रहता है।


वे फैले हुए कैंसर के लिए जाले लगने का रूपक इस्तेमाल करती हैं। क्या वे जाले लगवाना चाहती थीं ? क्या वे जाले लगवाने के लिए प्रयासरत थीं ‘‘मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया,’’ ? दृष्टव्य  है वे किसी छोटी-मोटी बीमारी या दुःख-दर्द की बात नहीं कर रहीं, वे कैंसर की बात कर रहीं हैं, वैसा कैंसर जो इतना फैल चुका हो कि पूरा अंग काटकर शरीर से अलग करना पडे़। व्याधि यथार्थ होती है रूपक नहीं।



वे निर्मूल आशंका पद का प्रयोग करती हैं, जैसे दो भाई निर्मूल आशंका से पुराना सम्बन्ध तोड़ लेते है वैसे ही स्त्री ने अपने स्तनों से सम्बन्ध तोड़ लिया। कैंसर के पूरी तरह फैल जाने के बाद ही ऐसी सर्जरी होती है। डाक्टर किसी भी अंग का रिमूवल तभी करता है जब और कोई उपाय नहीं रहता। ऐसी सर्जरी निर्मूल आशंका से नहीं होती।


     प्रसिद्ध कहानीकार मार्क ट्वेन का कथन है कि शब्द के सही प्रयोग (करेक्ट यूज़) और लगभग सही प्रयोग (आलमोस्ट करेक्ट यूज़) के बीच उतना ही बड़ा अन्तर है जितना आसमान में कड़कने वाली बिजली और जुगनू में। उन्नत पहाड़, नन्हें पहाड़, तकलीफों के हीरे, मौत की चुहिया, बुलबुले, शरीर के एक ही अंग के लिये इतने सारे परस्पर विरोधाभासी उपमान? “स्मृतियों को दूध पिलाया,’’ "तब जाकर जाले लगे’’, ‘‘लगे तो लगे’’ ’’दूधों नहाए पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ’’ यह सब पदों और शब्दों का सही प्रयोग है या लगभग सही प्रयोग? ’’



कवयित्री को इस व्याधि के ख़तरे का पूरा ज्ञान है परन्तु कवयित्री को मुहावरे इस्तेमाल करने का इतना शौक है कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया की तर्ज़ पर वे कैंसर को मौत की चुहिया बताती हैं, जिसे महावैद्य ने बाहर निकाला। वे यह भूल जाती कि महावैद्य ने जिन्हें बाहर निकाला वह चुहिया नहीं थी पूरे पहाड़ ही थे जिनमें जाले लग गये थे। वे यह भी भूल गर्इं कि जिन्हें वे उन्नत पहाड़ बता रही थीं, उन्हें वे सर्जरी की प्लेट में रखे नन्हें पहाड़ कहने लगीं जबकि सामान्य व्यक्ति भी जानता है कि शरीर से बाहर निकाल दिए जाने पर शरीर के अंग कई गुना बड़े दिखाई देते हैं क्योंकि वातावरण के प्रभाव से वे फूल जाते हैं।


मेरा उद्देश्य चीरफाड़ पर लिखी गई कविता की चीरफाड़ करना नहीं है,  मेरा उद्देश्य इस ओर संकेत करना है कि अपने समय की सबसे ख़तरनाक बीमारी पर इतनी निर्दयता, क्रूरता और संवेदनहीनता से खिलवाड़ करती हुई कविता लिखते हुए एक कवयित्री को ज़रा भी संकोच का अनुभव नहीं हुआ ।



अंग्रेज़ी के प्रख्यात कवि कीट्स की टी0बी0 के कारण हुई मौत इतनी रोमांटिक मानी गई, कि अनेक लोग जवानी में वैसी मौत पाने की चाहत करने लगे। पच्चीस वर्ष की आयु में वास्तविक जीवन में व्याधि और मौत दर्दनाक होती है। तब टी0बी असाध्य रोग था। दर्द की असहनीयता के कारण कीट्स अफी़म खाते थे। मरने से कुछ पहले तो उन्होंने अफ़ीम की पूरी बोतल मंगा ली थी और उनके मित्र को भय लगने लगा था कि दर्द से छुटकारा पाने के लिए वे कहीं पूरी बोतल खा कर खुदखुशी न कर लें। कीट्स को अपने जीवन की क्षण भंगुरता का दुःख था, उन्हें अपनी बीमारी से तकलीफ़ थी। उन्होंने अपनी समाधि के पत्थर पर लिखे जाने वाले हर्फ़ खुद ही लिखे थे, "यहाँ सो रहा है वह व्यक्ति, जिसका नाम पानी पर लिखा था’’ (हियर लाइज़ ही हूज़ नेम वाज़ रिट इन वाटर्स)। आज उमड़ने और कल मिट जाने का उन्हें दुःख था। व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। जवानी में बीमार होकर तपेदिक से मर जाना तमाशबीनों के लिए रूमानी हो सकता बीमार के लिए नहीं। मौत चुहिया नहीं होती ।



हम अनामिका की इस कविता का सहानुभूति पूर्ण पाठ करें और उन्हें इस बात का श्रेय देना भी चाहें तो नहीं दे सकते कि वे यह यह कह रही हैं कि हिंसक दृष्टिवाले पुरुषों से दस वर्ष की बच्ची भी त्रस्त है और स्त्री को अपने वक्षस्थल के कारण अपमानित और जोखिम ग्रस्त (वल्नरेबल) होना पड़ता है, इसलिए बेहतर है कि वह अंग हो ही न परन्तु वे यह नहीं कह रहीं। वे प्रारम्भ से अन्त तक वक्षस्थल का वर्णन सौन्दर्य बोधक उपमानों के साथ करती हैं और अन्त में उल्लास से भर उठती हैं ‘‘ बुलबुले अच्छा हुआ फूटे’’, कि अंग काट दिए गए तो अच्छा हुआ। शरीर के अंग का कटना दारूण दुःख होता है। क्या कोई भी स्त्री या पुरुष  अपने शरीर को कटवाना चाह सकता है, और कटवा डालना भी व्याधि से ग्रस्त होकर जिसे पाने के लिए स्त्री ने दूध की नदियाँ बहा दीं, और व्याधि भी ऐसी जो जाले की तरह फैल गई और अंग काटकर ही ठीक हो सकी क्योंकि यदि नहीं काटा जाता तो व्यक्ति की मृत्यु हो हो सकती थी। अन्तिम हृदयहीन पंक्तियाँ हैं  - "लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”। मुहावरे इस्तेमाल करने को उतावली कवयित्री यह बताना भूल गईं कि ऐसी कौन सी स्मृतियाँ है जो मन का नहीं स्तन का दूध पीती हैं । अनामिका की कविता रोगी का मनोबल बढ़ाने का केवल नाटक करती है। दरअसल अनामिका भी स्त्री शरीर को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से ही देखती हैं।



 ‘‘पोर्नोग्राफर शरीर और मन का द्वैत स्थापित करता है। पोर्नोग्राफ़र असामान्य होता है, वह स्त्री को अपने शरीर से नफ़रत करना सिखाता है।’’ (सूसन ग्रिफ़िन ) क्या कोई भी सामान्य बुद्धि वाला स्त्री पुरुष  या बच्ची-बच्चा अपने शरीर को कटवा डालने पर खुश हो सकता है? अनामिका की कविता में स्त्री बहुत खुश है, वह सर्जरी की प्लेट में रखे अपने कटे हुए अंगों से हँसकर बातें कर रही है - हलो कहो कैसी रही? पवन करण का पुरुष  स्त्री को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित कर रहा है और अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित हो रही है।


सूसन ग्रिफिन का कहना है कि पोर्नोग्राफी सैडिज्म है।  "एक औरत जब ऐसी सड़क या मुहल्ले में प्रवेश करती है जहाँ स्त्री शरीर की पोर्नोग्राफ़िक छवियाँ प्रर्दशित की गई हों, वह तुरन्त शर्मिन्दा हो जाती है। पोर्नोग्राफिक छवियों की वीथि में प्रवेश करते ही वह स्वयं ही उनमें से एक छवि हो जाती है कि वह उसका शरीर है जो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लगाया गया है। यदि वह स्वयं भी पोर्नोग्राफी में रूचि रखती है तो वह पोर्नोग्राफिक स्पेक्युलेशन का विषय बनती है। यदि वह दहशत में आ जाती है और ऐसी छवि के प्रति घृणा से विमुख हो जाती है, तो वह पोर्नोग्राफी की शिकार (विक्टिम) बन जाती है। इस प्रकार बिना अपमानित हुए वह पोर्नोग्राफी से बच नहीं सकती। इस तरह पोर्नोग्राफी सारी महिलाओं के प्रति सेडिज्म का उपकरण बनती है।’’ नाओमी वुल्फ़ भी पोर्नोग्राफी की पत्रिकाओं के सार्वजनिक पोस्टरों में पीटी जाती हुई, खून से सराबोर, हाथ-पाँव बंधी हुई स्त्री की छवियों का उदाहरण देती हैं। अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफी की  विक्टिम है।



पवनकरण और अनामिका ने व्याधि पर ही कविता नहीं लिखी हैं उन्होंने  स्तन की व्याधि पर कविता लिखी है। स्तन एग्ज़ॉटिक है। क्या वे किसी अन्य अंग के रिमूवल पर ऐसी कविता लिखते? क्या वे एम्प्यूटेशन से काटी गई टाँगों से पूछतीं कहो कैसी हो प्यारी बहनों, अच्छा हुआ कट गर्इं। क्या वे किसी बीमारी से निकाली गई आँखों की पुतलियों से पूछतीं, कैसी हो प्यारी कौड़ियों, अच्छा हुआ निकाल दी गर्इं, बहुत दुखती थीं, चश्मा पहनना पड़ता था। इन दोनों में से एक कवि की कविताएँ कदाचित् बी.ए. के पाठ्यक्रम में चलती हैं, और दूसरी कवयित्री शायद बी. ए. को पढ़ाती हैं।


एक विशेषता यह है कि पवन करण और अनामिका इन दोनों ने नाम लेकर उन स्त्रियों पर कविता लिखी है, जिनको ब्रेस्ट कैंसर हुआ। बिग बॉस नामक सबसे घटिया टी0वी0 सीरियल में ब्रिटेन की जेड गुडी आई थीं, जिन्होंने  भारतीय प्रतिभागी शिल्पा शेट्टी को डॉग (कुत्ता) कह कर तमाशा खड़ा किया था। जेड गुडी की भी कैंसर से ही मृत्यु हुई थी। उन्होंने अपनी मौत को टी0 वी0 पर प्रर्दशित करने के अधिकार बेचे थे। इन दोनों कवियों ने भी शायद इन स्त्रियों से अधिकार खरीदे होंगे। बाजा़र में बेचने के लिए बीमारी और मौत भी बहुत बड़ा तमाशा है। 



      इन कवियों ने भले ही कैंसर पीड़ित स्त्रियों से अनुमति ले ली होगी पर हजारों लाखों लोग ऐसे हैं जो इस व्याधि से जूझ रहे हैं। व्याधि लाइलाज नहीं, पर इलाज कष्टसाध्य है। इसके कारण का पता नहीं है, इसलिए इसके साथ रहस्यमयता और दहशत जुड़ी हुई है। व्याधि पर ऐसी कविता पढ़ कर हजारों पीड़ितों का मन दहशत से भर जाता है।



सिल्विया प्लाथ नामक एक महान् नारीवादी कवयित्री हुई हैं। उन्होंने एक कवि से विवाह किया। उनकी दो संताने हुई। सिल्विया प्लाथ की कविताओं को उनके जीवन काल में ही बड़ी सराहना मिली थी। बत्तीस साल की उम्र में अवसाद ग्रस्त होकर सिल्विया प्लाथ ने ओवन में अपना सिर डालकर आत्महत्या कर ली थी। जब उन पर फिल्म बनाने की पेशकश हुई, सिल्विया प्लाथ  की पुत्री इस पर बहुत व्यथित हुई और उन्होंने अपनी मृत माँ की अस्वाभाविक असामयिक मृत्यु पर फिल्म बनाने को मूँगफली चबाती हुई जनता को एक परिवार की त्रासदी पर गुदगुदाने  का गिरावट भरा प्रयास बताया। सिल्विया प्लाथ की मृत्यु के समय उनकी पुत्री फ्रीडा ह्यूज़ चार वर्ष की थी,बड़ी होकर वे कवयित्री बनीं। फ्रीडा ह्यूज़ की कविता है-

"और अब,
 वे एक फिल्म बनाना चाहते हैं,
 जिस-तिस के लिए ,
 जिसमें इतनी भी क्षमता नहीं,
 कि स्वयं कल्पना कर सकें उस शरीर की
 जिसका सिर तंदूर में पड़ा हो,
 वह शरीर जो अपने बच्चों को अनाथ छोड़ कर जा रहा हो।
 वे सोचते हैं, मैं उन्हें अपने माँ के शब्द दे दूँ,
 जिन्हें वे अपने बनाए हुए हैवान पुतले के मुँह में ठूँस सकें-
 उनकी सिल्विया- आत्मघाती कठपुतली।’’

सिल्विया प्लाथ की बेटी की कविता उन “मानवभक्षी लोगों पर प्रहार करती है जिन्हें जानने की उत्सुकता और लालसा है कि ओवन में पड़े सिरवाला" मानव कैसा लगता है- वे आत्महत्या को चित्रित करने को लालायित हैं। खतरनाक बीमारी को रूपक के रूप में प्रयोग करते हुए अंग-भंग के मरीज़ पर कविता लिखना और नाम लेकर समर्पित करना वैसा ही है।


यह आलेख नग्नता के खिलाफ नहीं है। यह आलेख स्त्री शरीर के पोर्नाग्राफिक निरूपण के खिलाफ है और व्याधि के हृदयहीन क्रूर निरूपण के खिलाफ भी। ऐसी कविताएँ पोर्नोग्राफी के उपभोक्ताओं के लिए लिखी जाती है। ऐसी कविताओं से पोर्नोग्राफी के नए-नए उपभोक्ता भी बनते हैं। यह एक फायदेमंद व्यवसाय है। 


पवन करण की कविताओं से मेरा परिचय भले ही पहली बार पिछले ही वर्ष हुआ जब मैंने उनकी पुस्तक ‘‘स्त्री मेरे भीतर’’ पढ़ी, परन्तु पुस्तक में उल्लेख है कि उन्हें अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। ‘‘स्त्री मेरे भीतर" में संग्रहीत पवन करण की एक यही कविता नहीं, अनेक अन्य कविताएँ भी पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचनाएँ  है जिनमें स्त्री विवश, वस्तूकृत और अपमानित है।



यह समय कुछ ज़रूरी सवाल उठाने का है। स्त्री के शरीर के पोर्नोग्राफिक निरूपण और व्याधि पर अनुत्तरदायित्वपूर्ण अमानवीय और क्रूर कविता के विषय में औचित्य का प्रश्न उठाना मैं ज़रूरी समझती हूँ । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या केवल कवियों के पास ही है? पाठकों के पास भी तो कोई अधिकार होंगे? मैं पाठकों के अधिकार का प्रयोग करते हुए यह प्रश्न उठा रही हूँ।



        शेयर मार्केट में एक फिनॉमिना होता है, इसमें कुछ दलाल मिलकर एक समूह बना लेते हैं जिसको कार्टेल कहते हैं। वे लोग मिलकर किसी भी बेहद घटिया कम्पनी के शेयर खरीदते जाते हैं जिससे उसका मूल्य अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। इससे घटिया कम्पनी को लाभ होता है। वे ही लोग मिलकर कम्पनियों के शेयरों के दाम अस्वाभाविक रूप से घटाते-बढ़ाते रहते हैं। कार्टेल बनाना हमारे देश में आर्थिक अपराध माना जाता है। आपको याद होगा कि केतन पारेख आदि दलाल एक बार इसी अपराध में जेल भी गए थे। कार्टेल को इस सब से भले ही लाभ होता हो पर इससे देश की अर्थव्यवस्था  नष्ट हो जाती है।


      हिन्दी के कवियों के कार्टेल ने पवन करण पर दाँव खेला है। कार्टेल के लाभ- हानि के बारे में नहीं कह सकती, पर इससे साहित्य की हानि तो हुई ही है। साहित्य में इस अपराध की कोई सज़ा नहीं। यह एक खुला खेल है। इस बाजा़र में स्त्री शरीर सबसे ज्यादा बिकाऊ चीज़ है। पर क्या व्याधियाँ भी इसमें बेची जाएँगीं ? मेरे प्रश्न स्त्री शरीर के बारे में ही नहीं व्याधि के बारे में भी हैं। ये व्याधि पर लिखी कविताएँ हैं या ये व्याधि ग्रस्त कविताएँ हैं, उन कवियों द्वारा लिखी हुई हृदयहीन कविताएँ जिन्हें कविताएँ लिखते चले जाने की व्याधि है ?


      हिन्दी साहित्य में स्त्री की इस दशा का ज़िम्मेदार कौन है?
      इस  प्रश्न के उत्तर में हमारे कवियों का कार्टेल मौन है।
                      (कवि धूमिल की कविता पर आधारित)


        व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। बीमारी की गम्भीरता, बीमारी के साथ जुड़ी तकलीफ़, असहनीय दर्द, दुर्बलता, जीर्ण होते हुए शरीर, बिस्तर पर पड़े रहने की मजबूरी, अंगों के कट जाने, शरीर के विरूपित हो जाने और अपने परिवारजनों और हमदर्दो की आँखों से बरसती सहानुभूति और उनके चेहरों पर लिखे ख़ौफ से आँकी जाती है। बीमारी को इतनी बेदर्दी बेरहमी और गै़रजिम्मेदारी से निरूपित करने वाले हिन्दी के शीर्षस्थ माने जाने वाले ये कवि कवयित्री नृशंसता की हद तक संवेदनहीन हैं।

       
अंग्रेज़ी में वश्यावृत्ति करवाने को फ़्लेश ट्रेड कहते हैं जिसमें स्त्री एक व्यक्ति न हो कर गोश्त होती है केवल गोश्त। पवन करण और अनामिका दोनों स्त्री शरीर के लिए ऐसे उपमानों और रूपक का प्रयोग करते है कि वे स्त्री को व्यक्ति की जगह फ़्लेश बना देते है। अनामिका की कविता शरीर के प्रति अनसेल्फ़कांशस बनानेवाली कविता नहीं है यह शरीर के प्रति अतिरिक्त सजगता मिटानेवाली कविता भी नहीं है। अनामिका की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है अन्तर यह है कि पवन करण की कविता की ‘‘वह विवश जानती है / उसकी देह से उस एक के हट जाने से / कितना कुछ हट गया उनके बीच से।’’ और अनामिका की कविता की स्त्री ‘‘सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहती है...अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! ’’ गोश्त का टुकड़ा हट जाने से वह उल्लास से भर जाती है। उल्लास का अन्दाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अनेक कहावतों और मुहावरों से युक्त इस कविता में बारह विस्मयादिबोधक चिन्ह हैं।


आज से सौ वर्ष पहले जन्मे लेखक मंटो ने एक कहानी लिखी थी ‘ठंडा गोश्त’। चर्चित होने की लालसा से प्रेरित हो कर पोर्नोग्राफिक माइंड से लिखनेवाले अनेक अन्य रचनाकार अपने घटियापन को न्यायसंगत ठहराने के लिए आजकल यह कहते पाए जाते हैं कि अश्लीलता का आरोप तो मंटो पर भी लगाया गया था। ऐसे लोगों को यह अहसास ही नहीं, कि मंटो की उस मार्मिक कहानी का ध्वन्यार्थ था कि मानव शरीर को गोश्त समझकर व्यवहार करनेवाला व्यक्ति निर्वीर्य हो जाता है। उस कहानी में यह ध्वनि इतनी प्रखर थी कि पाठक उस ध्वनि को आज भी नहीं भूले। (स्तन तथा ब्रेस्ट कैंसर इन दोनों गृहणीय कविताओं के साथ मंटो की उस हृदय स्पर्शी रचना का उल्लेख मात्र करने का भी मुझे खेद है।) मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि यह टिप्पणी स्तन और ब्रेस्ट कैंसर इन दो कविताओं पर है, इन कवियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर नहीं।



      बचपन में अध्यापिकाएँ हमसे कहती थीं- गाय पर निबन्ध लिखो। बच्चे लिखते थे- गाय के दो सींग होते हैं, चार टाँगें होती है, एक पूँछ होती है, चार थन होते हैं। गाय हमें दूध देती है। गाय हमारी माता है। कुछ बडे़ हो गए तो हमने एक चुटकुला सुना। अध्यापिका ने बच्चों से गाय पर निबन्ध लिखने को कहा। सब बच्चे लिखने लगे। दो बच्चे कक्षा से बाहर चले गए। थोड़ी देर में वे कक्षा में लौटे। उनके साथ एक गाय थी । वे गाय के शरीर के ऊपर कलम और स्याही से निबन्ध लिखकर गाय को कक्षा में हाँक लाये थे। अध्यापक के पूछने पर उन्होंने ढिठाई से कहा आप ही ने तो कहा था कि गाय पर निबन्ध लिखो। चुटकुला सुनकर हम हँस पड़ते थे।


      आज कहा जा रहा है, स्त्री को चर्चा से केन्द्र में लाओ। स्त्री पर कुछ लिखो। स्त्री के शरीर पर लिखी कविताएँ हैं  -  "स्त्री के दो स्तन होते हैं /  वे पर्वत के समान होते हैं / वे दशहरी आम के समान होते हैं/ उनमें से दूध की नदियाँ बहती हैं / उनसे पुरुष  खेल सकता है / यदि उनमें से एक कट जाए तो पुरुष  के हाथ मायूस हो जाते हैं /  यदि दोनों ही कट जाएँ तो स्त्री उल्लास से भर जाती है / " आदि। 




पवन करण और अनामिका ने व्याधि से ग्रस्त , दर्द से दुखते हुए, मृत्यु के भय से आक्रान्त, शल्य चिकित्सा के कारण विरूपीकृत स्त्री के शरीर पर नश्तर से कविताएँ उकेर दीं और स्त्री के रक्त स्नात अनावृत शरीर को हम सब के बीच ला खड़ा किया मगर इस बार इन दोनों कवियों के इस क्रूर, हिंसक, बर्बर और निहायत ग़लीज़ मजाक़ पर हँस पाना भी हमारे लिए मुमकिन नहीं।

- शालिनी माथुर, 
ए 5@6 कॉर्पोरेशन फ़्लैट्स, निराला नगर, लखनऊ 
फोन 9839014660
17 मई 2012

57 comments:

  1. shukriya! ise padhwaane ke liye. Shalini Mathur ko salaam !

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  2. शालिनी जी, लीजिये स्तन इसमें भी मौजूद हैं लेकिन..
    .रोएगा तो और पिटेगा 0प्रदीप नील



    आज तक भी नहीं हूं भूला,

    जब मैं पहली बार पिटा था

    एक साल का मैं होता था, भूख सताती तो रोता था

    और ऐसा अक्सर ही होता था

    कि मां मुझे अपनी गोद लिटाती,लोरी गाती दूध पिलाती

    पकड़ हाथ से मां की छाती,लातें खूब चलाता था

    खिली खिली सी मां रहती, मैं बिना बात मुस्काता था

    पर उस रात शायद मां की तबियत ठीक नही़ थी

    चूल्हे तक को खबर थी इसकी, मेरे पेट को मगर नहीं थी

    मैंने मां के स्तन को पकड़ा,झिंझोड़ा और दबाया

    दूध की बूंद नहीं आई तो मैने ज़ोर से काट खाया

    पीड़ा से चिल्लाकर मां ने एक तमाचा मुझे जडा

    फिर विलाप करने लगी हाय राम मैंने ये क्या किया

    बिलख-बिलख कर जब मैं रोया,मां कितना पछताई थी

    मै तो सो गया थोड़ी देर में मां कहाँ सो पाई थी

    अपने कलेज़े मुझे लगाकर सारी रात मां लेटी रही

    लकवा मारे मेरे हाथ को, शाप ये खुद को देती रही

    चूम चूम कर मेरा माथा मां ने कितना पुचकारा था

    तब मैंने ये जाना मां ने मुझे नहीं खुद को मारा था

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  3. छाती या स्तन शब्द अश्लील नहीं हैं कवि (?) का माइंड डर्टी होता है तो इनमे मातृत्व की जगह ... भर देता है , कविता जी
    बहर हाल लेख भीतर तक झकझोर गया
    सादर , प्रदीप नील

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  4. पवन करण तथा अनामिका की कविता मन में घृणा का भाव पैदा करती है . स्त्री अंगों का अमानवीय वर्णन है दोनों की कविताओं में . ऐसा लगता है जैसे सायास इसे रचा गया है . आज कल स्त्री देह सबसे सरल विषय है . पवन करण ने पुरुषवादी मानसिकता का परिचय दिया है लेकिन अनामिका ने स्त्री होते हुए भी उस पीड़ा को समझने के बजाय संवेदनहीनता का परिचय दिया है . रचना की सार्थकता उसकी कसौटी है . दोनों कवितायेँ यहाँ असफल दिखती हैं . मंटो पर भले ही अश्लीलता के आरोप लगें हों पर उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार स्पष्ट दीखता है .
    मैंने लिखा 'औरत '
    तब जान पाया कि मेरे हाथ मे
    बाज़ार मे सबसे तेज़ बिकने वाला शब्द है ...
    इस विचारोत्तेजक लेख के लिए शालिनी जी को धन्यवाद्

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  5. लेख बहुत अच्छा है और कवियों के गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार पर चोट करता है। कवि को वाकई आँख खोल कर देखना होगा कि जिस सदी की बात वह अपनी कविता में कह रहा है, उस बात की सच्चाई, हर स्तर पर क्या है और फिर उस सच्चाई को संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करे अगर कवि यह ज़िम्मेदारी नहीं निबाहता तो पाठक को प्रश्न करने ही चाहिये। बहुत-बहुत बधाई शालिनी जी,

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  6. बहुत ही मर्मस्पर्शी आलेख .... अजीब सिहरन से भर उठी हूँ, निशब्द .हूँ....

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  7. बरसों बाद कोई ऐसा आलेख जिसमें 'व्यक्तिगत' की जगह कविता पर बात की गयी है, उसके वैचारिक पक्ष पर बात की गयी है और शुद्ध रूप से साहित्यिक तथा दार्शनिक प्रतिमानों पर कविता को कसने का मुश्किल काम किया गया है. मैं इससे पूरी तरह सहमत नहीं हूँ, लेकिन इसे बेहद महत्वपूर्ण मानता हूँ.

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  8. बहुत ही सुविचारी लेख है. बधाई आपको. आपने साहस के साथ लिखा वरना यह ऐसा समय है की ऐसी स्तनजीवी कविताओं को कालजयी बताया जा सकता है. आपने बड़ी बारीकी के साथ कवि-मानसिकता को पकड़ा है.

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  9. मैं सन्न हूं, दंग हूं इस विश्लेषण को पढ़ कर। एकदम दो टूक, खरी बात। महसूस कर सकती हूं, किस शिद्दत से शालिनी माथुर ने इस विषय पर सोचा और लिखा। और हैरान हूं सोचकर कि इस तरह की अमानवीय रचनाएं पुरस्कार और सराहनाएं पा रही हैं।

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  10. ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह का कुंडली के 'प्रथम'-लग्न भाव और 'अष्टम' भाव से संबंध हो तथा साथ ही साथ 'मंगल' ग्रह से 'शनि' का संबंध हो तो निश्चय ही 'कैंसर' होता है।
    अतः शनि एवं मंगल ग्रहों की वैज्ञानिक पद्धति से शांति करना और रोजाना 108 बार पश्चिम की ओर मुंह करके इन दोनों के मंत्रों का जाप करने से रोग पर काबू पाया जा सकता है।-
    1-ॐ शाम शनेश्चराय नमः
    2- ॐ अंग अंगारकाय नमः

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  11. जिस दिन से ये विचार विमर्श पढा तब से मन उद्वेलित था उस वक्त तो कमेंट भी नही कर पायी मगर आज मन शांत है क्योंकि मेरी निगाह मे परिस्थिति साफ़ है आज मैने इसी विषय को दूसरे दृष्टिकोण से लिखा है जल्द ही टाइप करके लगाऊँगी बस सोच और चिन्तन का ही फ़र्क होता है ।

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  12. mujhe lagta hai ki maine itna saargarbhit lekh aaj tak nahi padha . shalini ji ko salaam .

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  13. Aisa alekh hindi mein aaj tak nahin likha gaya. Behad suvichrit vicharsheel aur darshanik tatthyon par adharit lekh. Yaha vartaman pravrittiyon par tippani hai kaviyon par nahin. Keval manch par khade ho kar vyakhyan dene wale hindi sameekshak is se bahut kuchch seekh sakte hain.

    Shalini Mathur ne vastav mein naari vaadee sarokaron ko le kar lekh likha hai.Main bahut prabhavit hui. Kathadesh June mein chchapa lekh itnee jaldee blog par lane ka shkriya.
    Yaha lekh hindi alochna ka naya sopan sabit hoga. Shalini Ji ke gyan, vichar, sahas aur bhasha ki maryada ko shat shat pranam.

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  14. Ek atyant vaicharik boddhik lekh. Aalochna ka aisa painapan hindi mein nahin dikhai deta. Aalochkon ko shalini ji se seekhna padega ki vichar ke adhar par alochna karna kya hota hai. Shalini ji ko salam.
    Vandana ji ka chintan kya hai?

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  15. Behtareen alekh. Aisa vaicharik boddhik aur adbhut lekh hindi main kabhi nahin padha. alochakon ko Shalini Mathur se seekhna hoga ki vichar par adharit sameeksha kya hoti hai.

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  16. Itna sargarbhit ,aur behtareen lekh Hidi mein padha ho, yaad nahin. Keval vichar tark ,gyan aur adhyayan ke adhar par ShaliniMathur ne sabke sammukh sidhdh kar diya ki Pawan Karan ki Kavita pornography ki rachna hai. Anamika bhi bahu charchit rahati hain. Unki kavita ke har shabd ka vishleshan kar ke Shalini Ji ne kewal yahi nahin bataya ki Anamika ki asliyat kya hai, yah bhi bataya ki sameeksha hoti kya hai.
    Shalini ji ko salaam, pranaam. apke blog ko badhai

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  17. कविता जी शालिनी जी जैसा मैने कहा था आज वो रचना लगाई है यदि इस पर भी दृष्टिपात करें तो आभारी रहूँगी साथ मे आपका लिंक भी दिया है इस लिंक को देखें ……………यहाँ इसी व्याधि को अपने नज़रिये से कहने की कोशिश की है ………

    http://vandana-zindagi.blogspot.in/2012/06/blog-post_26.html

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  18. कैंसर पर और वह भी स्तन कैंसर को लोग चर्चा और कविता का विषय बना कर उसे नारी स्वरूप को विद्रूप बनाने वाला साबित कर रहे हें. ये जो जिस पर किसी का वश नहीं होता और शरीर तो सब एक जैसा लेकर ही पैदा होते हें फिर उसकी व्याधि को चर्चा का विषय बना लिया जाय. वह भी पुरुष जो उस दर्द को समझ ही नहीं सकता है. अगर जीवन साथी के इस व्याधि से ग्रस्त होने पर उसके साथी से पूछा जाय कि क्या वह एक पुरुष होने के नाते यही महसूस करता है. नहीं , उसे शरीर के इस अंग से नहीं बल्कि उस नारी के ह्रदय और उसके अस्तित्व से प्रेम होता है और वह किसी भी हालात में उसको जीवित और अपने साथ देखना चाहता है. ये कविता किसी बड़े कवि के जीवन में ऐसा घटित होने के बाद भी नहीं लिखी जायेगी.
    शालिनी माथुर ने जिस गहन शोध के साथ इस लेख को प्रस्तुत किया है इसके लिए वे बधाई की पात्र है और उस लेखनी मो मैं प्रणाम करती हूँ.

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  19. बहुत अच्छी रचना।

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  20. अनामिका जी से कई बार मुलाकात हुई। पहली बार जाना है पढ़ कर बेहद क्षोभ हुआ। इस तरह बीमारी का मज़ाक नही बनाना चाहिये। और पवन करण की तो बात करना ही बेकार है जिन्होनें औरत को ही मज़ाक बना दिया। अफ़सोस।

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  21. बहुत अच्छा लगा इस लेख को पढ़कर! शालिनी जी को शुक्रिया। इस लेख को पढ़ाने के लिये आभार!

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  22. इतना बड़ा आलेख एक सांस में पढ़ लेना, हंसी खेल नहीं है लेकिन जब लेख का एक-एक शब्‍द आपको झकझोर रहा हो तो समय के सरकने का आभास नहीं होतां इतना सार्थक आलेख शायद पहली ही बार पढ़ा है। आपको किन शब्‍दों में बधाई दूं। काश हम वर्तमान लेखन की इसी प्रकार की समीक्षा कर पाते तो पाठकों पर कितना न्‍याय करते।

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  23. बेहद शानदार और साहसी लेख.

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  24. I think our writer needs some heart touching facts to eloborate the word "NAARI".

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  25. i think our writer should also wirte on the burning issue like "Life of a lady begger sitting infront of a temple with his kids"....is anyone ready to elobrate this faccts...

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  26. http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/06/blog-post_27.html

    salute the author shalini

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  27. shalini Mathur ka yaha lekh Hindi alochna jagat mein ek meel ka pathhar ha. Unka adhyayan aur anubhav lekh ke har shabd aur vakya se prakat hota hai. Sabse badi baat yaha hai ki unki sahanubhuti aur samajh anya vimarsh kaaron ki tarah banawati aur jhoothi nahin hai. Isee liyee yaha lekh pichhle pure maheene se charcha mein hai.
    Kathadesh june ank mein prakashit lekh ka is tarah web par lagaya jaana aur us ko ek doosre ko padhhwaya jana, Hindi Jagat mein abhoot poorva ghatna hai. Shalini ji ke gyan samajh aur imaandari tatha sahas ko salaam.
    Vandana ji shayd yah samajh hi nahin sakeein ke kekh keval vyadhi ke nirupan ki nahin balki stree shareer ke ashleel istemaal ki baat kar raha hai. Vandan ji ki kavita aur uspar uthee charcha durbhagya purn hai.
    Adhikansh Pathak Shalini Ji ke lekh ko samajh gaye aur usee se sahamat hain yaha achha hai Badhai

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  28. Yah sach hai, Itna bada lekh ek saath padh dala, kyonki itna pathaneeya, itna convincing aur imaandaar hai. Shalini Ji ka samajik sarokar aur soch har shabd mein jhalakti hai. Yah ek vishva stareeya lekh hai. Kavita ji ne web par padhva kar upkaar kiya hai.Shalini ji Behtareen lekh ke liye badhai.

    Vandana ji ne apni bachkani kavitayen likh kar jo bahas shuru ki us se pata chalta hai ki ve is mudde ki gambhirta ko nahin samajh sakeen.

    Hindi ke pathkon mein is lekh ki charcha hi nahin dhoom hai. Sadhuwad.

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  29. An excellent article. Very thoughtful,and sensitively handled . This is a world class article. Shalini Mathur has enriched Hindi literature.

    Pawan Karn and Anamika are totally exposed and along with them the cartel is also exposed which was promotind them.
    Excellent work.

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  30. Vandana ji aap apni chhchhali kavitaen na likhtin to behtar tha.Ek gambhir mudde par is prakar ki bat cheet theek nahin. Kavita Vachaknavee ka kathan sahi hai, aap mudda samajh nahin sakeen.
    Shalini ka gambhir lekh stree shareer ke nirupan par hai. cancer ke bare mein google par se quote kar ke bhatkav paida na karen.
    Shalini Mathur ka behtareen lekh padhvane ka Kavita ji ko Shukriya.

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  31. यूं तो कविता ऊटपटांग बातों से ही बनती है..
    मगर इसमें तो बेहद ऊटपटांग है...पहली हैरानी इस बात पर कि इन्हें कविता कहा जा रहा है..
    उसके बाद जो भी इनमें भाव हैं..सब के सब बकवास...बेसिरपैर के ..लानत भेजने लायक..

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  32. बहुत सुन्दर लेख शालिनी जी..

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  33. शालिनी माथुर का लेख पढ़ कर स्तब्ध रहगई. इतना सुचिंतित,सुविचारित ,ईमानदार तथा गहन लेख हिंदी में आजतक नहीं लिख गया. आलोचना जगत में यह एक नया प्रयाग है.इतनी गर्हित तथा विरूपित कविताओं पर इतनी मर्यादित भाषा में लिखा जाना संभव है शालिनी जी ने कर दिखाया. हिंदी जगत में कार्टेल के राज्य ने जितनी अश्लीलता को जन्म दिया है वहा सामने आ गई.शालिनी माथुर का लेख वैचारिक मानदंडों के अधर पर एक वर्ल्ड क्लास विश्व स्तरीय लेख है. ऐसा पहले नहीं लिखा गया. बार बार पढ़ती हूँ और दग रह जाती हूँ.यहाँ आलोचना की नवीन भूमि की तय्यारी है. शालिनी जी बधाई. बार बार पढ़ती हूँ और दांग रह जाती हूँ.यह आलोचना की नवीन भूमि की तय्यारी है. शालिनी जी बधाई. कविता जी आपकी महरबानी से यह नायब लेख पढ़ सकी. सोनालिका.

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  34. इन लेख की लेखिका शालिनी माथुर जी की ईमेल से प्राप्त टिप्पणी

    Dear kavita ji
    I am overwhelmed by the response I am getting for my article Vyadhi par kavita ya kavita ki vyadhi .

    Thankyou very much for converting my article in internet friendly fonts and publishing it on web magazine streevimarsh..

    I am still receiving phone calls and sms messages from allover the country and even abroad.

    Hindi world is really waiting for original and honest writing.

    Hindi pathakon ki sahridayata aur udarta ke liye main hriday se abhari hoon.

    I do not know how to type in Hindi, therefore writing in English.

    The response of readers has really amazed me.

    Regards and best wishes

    Shalini Mathur

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  35. इससे ज्यादा नहीं कहा जा सकता की शालिनी माथुर ने बहुत कम साहित्य पढ़ा है और काफी अल्पज्ञ मालूम होती हैं। दरअसल वो कविताओं का गलत अर्थ निकाल कर माताओं एवं बहनों की सहानुभूति लेना चाहती हैं। स्त्री अस्मिता के लिए संघर्ष की आवश्यकता है और संघर्ष के लिए आत्मविश्वास की जिसका शालिनी जी में नितांत कमी नजर आ रहा है, अन्यथा वो अर्थ का अनर्थ न निकालतीं। फिर भी अनामिका जी के लिखे एक लेख की चंद पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा "ग़रीब-अमीर, काले-गोरे, अवर्ण-सवर्ण के बीच में शक्ति-संधर्ष का व्याकरण स्त्रीवादी संधर्ष के व्याकरण से अलग है, क्योंकि यहाँ आप प्रतिपक्षी का भी कल्याण ही चाहते हैं। उसका ध्वंस नहीं चाहते, चाहते हैं कि उसमें मानवीय गरिमा का विकास हो, दोनों के बीच भेड़-भेड़िया का रिश्ता ख़त्म हो और मानवीय धरातल उन्नत हो सम्बंधों का।" शालिनी जी को अभी थोड़ा और पढ़ना चाहिये उस स्तर का सोच लाने के लिए।

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  36. इससे ज्यादा नहीं कहा जा सकता की शालिनी माथुर ने बहुत कम साहित्य पढ़ा है और काफी अल्पज्ञ मालूम होती हैं। दरअसल वो कविताओं का गलत अर्थ निकाल कर माताओं एवं बहनों की सहानुभूति लेना चाहती हैं। स्त्री अस्मिता के लिए संघर्ष की आवश्यकता है और संघर्ष के लिए आत्मविश्वास की जिसका शालिनी जी में नितांत कमी नजर आ रहा है, अन्यथा वो अर्थ का अनर्थ न निकालतीं। फिर भी अनामिका जी के लिखे एक लेख की चंद पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा "ग़रीब-अमीर, काले-गोरे, अवर्ण-सवर्ण के बीच में शक्ति-संधर्ष का व्याकरण स्त्रीवादी संधर्ष के व्याकरण से अलग है, क्योंकि यहाँ आप प्रतिपक्षी का भी कल्याण ही चाहते हैं। उसका ध्वंस नहीं चाहते, चाहते हैं कि उसमें मानवीय गरिमा का विकास हो, दोनों के बीच भेड़-भेड़िया का रिश्ता ख़त्म हो और मानवीय धरातल उन्नत हो सम्बंधों का।" शालिनी जी को अभी थोड़ा और पढ़ना चाहिये उस स्तर का सोच लाने के लिए।

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  37. @rajarshigautam !

    आपकी टिप्पणी से आपके बौद्धिक स्तर का पता चलता है कि एक वैचारिक बहस व विमर्श में आप किस तरह एक भद्र महिला पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने लगे।

    फिलहाल आपको अभी बहुत कुछ सीखना-जानना,पढ़ना व समझना चाहिए ताकि कम से कम `विषय' पर बात करते समय `विषय' पर ही बात की जाए, इस बात को आप सीख सकें।

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  38. मुझे मजा आया ये जानकर कि शालिनी जी ने बहुत कम पढ़ा है साहित्य
    और भी मज़ा आया ये जानकर कि कवि ने बहुत पढ़ा है....
    हद से ज्यादा मजा आता है जब कोई इन विचारों को..(सही गलत या अच्छे बुरे नहीं ) ..

    कविता का नाम देता है .....
    इस से बहुत ज़्यादा बुरी दशा तो modern आर्ट की भी नहीं हुई है अभी

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  39. शालिनी जी सचमुच आपका आलेख कविता की गली मे घुस आये फैशनेबल लोगों का पर्दाफाश करता है। चर्चित होने के लिए लोग जाने क्या क्या करते हैं..?आपका लेख हिन्दी कविता को ही नही समीक्षा को भी नई राह दिखाता है धन्यवाद इस सुन्दर लेख के लिए।

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  40. शालिनी जी सचमुच आपका आलेख कविता की गली मे घुस आये फैशनेबल लोगों का पर्दाफाश करता है। चर्चित होने के लिए लोग जाने क्या क्या करते हैं..?आपका लेख हिन्दी कविता को ही नही समीक्षा को भी नई राह दिखाता है धन्यवाद इस सुन्दर लेख के लिए।

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  41. शालिनी जी सचमुच आपका आलेख कविता की गली मे घुस आये फैशनेबल लोगों का पर्दाफाश करता है। चर्चित होने के लिए लोग जाने क्या क्या करते हैं..?आपका लेख हिन्दी कविता को ही नही समीक्षा को भी नई राह दिखाता है धन्यवाद इस सुन्दर लेख के लिए।

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  42. I was very encouraged to find this site. I wanted to thank you for this special read. I definitely savored every little bit of it and I have bookmarked you to check out new stuff you post.

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  43. इस लेख पर अपने विचार देने वाले सभी पाठक मित्रों का आभार।

    आप सब की सूचना के लिए निवेदन है कि ज्वलंत मुद्दे की भांति यह विषय साहित्य जगत में इन दिनों केंद्र में है और इस पर तीखे विमर्श निरंतर जारी हैं। इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण आलेख कल यहीं प्रकाशित किया है। आप उसे इस लिंक पर पढ़ें व अपनी राय दें -
    http://streevimarsh.blogspot.co.uk/2012/09/Anamika-PawanKarans-poems-on-breast-cancer.html

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  44. vicharon ko udvelit karne vala silsilevar vishleshan prastut karta aalekh..
    kavita ke bahane cancer jaisi beemari ki peeda ka majak banaya gaya hai...
    abhar..

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  45. kavita ji bahut bahut dhanywad is lekh ko padhwane ke liye .shalini ji badhai ki hakdar hain .hindi men aajkal stri vimarsh ke man par streedeh par vimarsh ho raha hai .sach kahun to shalini ji ne jis bebaki se tasweer kheench dee hai us par ab toofan to uthna hi hai.punh badhai aapko bhi aur shalini ji ko bhi

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  46. ब्रेस्ट कैंसर पर एक रचना डॉ गीता ( कैंसर कंसल्टेंट ) के अनुरोध पर कि है , शायद आप पसंद करें !

    http://satish-saxena.blogspot.in/2012/10/blog-post.html

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  47. बहुत सुन्दर आलेख

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  48. बहुत अच्छा आलेख। शालिनी जी बधाई। बहुत दुख होता है समकालीन कविता की ऐ दशा देखकर। नीरज और बालकवि बैरागी की बगिया में ऐ कैसे कैसे बेहुदे स्थापित हो गये हैं आ के। पवन जी की कविता खीज पैदा करती है, जबकि अनामिका जी की कविता सतही तौर पर ठीक प्रतीत होती है। आदरणीया कविता वाचक्नवी जी ऐ आलेख पढवाने के लिए धन्यवाद

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  49. व्याधि पर कविता लेख आज पढ़ सका।सच बताऊँ हिंदी में इतना गहरा और इस स्तर का लेख पहले नहीं लिखा गया। इस पर चर्चा कई महीने से चल रही है यह हिंदी का सौभाग्य है। पाठकों ने भी बहुत रूचि ले कर टिप्पणियाँ लिखीं . पवन करण की कविता हर दृष्टि से घटिया है।बात कविता की नहीं है प्रवृत्ति की है जिसे तर्क तथा विचार के आधार पर रखा गया है। शालिनी माथुर का लेख अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है इसमें संदेह नहीं। प्रभु जोशी कात्यायनी और राहुल ब्रजमोहन के लेख भी विचारणीय हैं। इतने अच्छे लेख पढ़वाने के लिए कविता जी को धन्यवाद . प्रस्तुतीकरण भी बढ़िया है।
    मृतात्माओं का जुलूस सारे सवालों का जवाब है।
    विशाल सारस्वत

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  50. आपके ब्लॉग पर व्याधि पर कविता लेख पढ़ा था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही नारीवादी चर्चा को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का काम वही कर सकता है जिसका मानसिक स्तर ऊँचा हो और मन बिलकुल साफ़ .बहुत ही बढ़िया और उच्च कोटि का चिंतन। विरोधी टिप्पणियों को मोहल्ला लाइव पर देखा। हिंदी में जिस प्रकार की पोलिटिक्स चल रही है वह उसे रसातल में ले जाएगी। मृतात्माओं का जलूस पढ़ कर लगा कि शालिनी जी जैसी समर्थ लेखिका निर्भीकता से सारे सवालों का जवाब दे सकती हैं। जीत सच की ही होती है। राहुल ब्रजमोहन का लेख कई दार्शनिक मुद्दे उठाता है।प्रभु जोशी का लेख विस्तृत है और बताता है कि कवियों में मौलिकता भी नहीं। अच्छा लगा।
    शालिनी माथुर के आलेखों ने स्त्री विमर्श को नई ऊंचाई पर पहुँचाया है। अब तक यह स्त्री के प्रति हिंसा या फिर देह मुक्ति तक सीमित था।शालिनी जी ने नया आयाम खोल दिया है। एक बात प्रशंसनीय है।अपने नाम के अनुरूपशालिनी माथुर ने प्रतिवाद का उत्तर देते समय भी न तो धीरज खोया न ही शालीनता .

    अशोक कुमार
    ashokkumar196556@yahoo.in

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  51. शालिनी माथुर से पहले यथार्थवाद के भ्रम में कवियों की रूचि और मानसिकता को किसी नें भी प्रश्नांकित नहीं किया था .द्विवेद्वी युग में एक-आध उदहारण ऐसे मिलते है ,जैसे निराला जी की जूही की कली महावीर प्रसाद जी को अश्लील लगी थी .इधर के दौर में ऐसे हस्तक्षेप की ऐतिहासिक जरुरत उनके लेख से पूरी हुई है .इसके बावजूद यह भी सच है कि पवन करण और अनामिका दोनों में कवित्व है .एक उपद्रवी काम-आवेग वाली महिला के आपरेशन जनित निर्वेद के रूप में उनकी भी व्यक्त अनुभूतियाँ सच ठहराई जा सकती हैं -चरम यौन जिज्ञासा के मोह भंग काल के रूप में -आखिर हारमोन काल समाप्त होने पर योवन काल की बदनाम महिलाऐं भी शालीन लगाने लगती हैं .जैसे वर्षा ऋतू बीतने पर ग्रीष्म ऋतू में वही नदी शान्तदिखने लगती है

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  52. निशब्द हु,काफी कुछ बोलना चाहती हु । शालिनी जी ने बहुत अछा लिखा है।
    दर्द जो महसूस करता है वही जानता हे,दुसरो के लिए शायद वो मजाक,कविता,कहानी,या खबर हो ।
    उस असहनीय दर्द की व्याख्या नही की जा सकती ।
    यहाँ भी नारी ही टारगेट हे,व्याधि को भी नारी से जोड़कर लिखा गया,पुरुष से क्यों नही ।

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  53. निशब्द हु,काफी कुछ बोलना चाहती हु । शालिनी जी ने बहुत अछा लिखा है।
    दर्द जो महसूस करता है वही जानता हे,दुसरो के लिए शायद वो मजाक,कविता,कहानी,या खबर हो ।
    उस असहनीय दर्द की व्याख्या नही की जा सकती ।
    यहाँ भी नारी ही टारगेट हे,व्याधि को भी नारी से जोड़कर लिखा गया,पुरुष से क्यों नही ।

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आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

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