गुरुवार, 19 मार्च 2009

औरत की दुनिया : सुधा अरोडा

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औरत की दुनिया



औरत की दुनिया स्तम्भ का प्रथम भाग २७ फरवरी को आपने पढा था। इसे दुहराने की आवश्यकता नहीं कि इस स्तम्भ को हिन्दी की सम्मानित वरिष्ठ कथाकार सुश्री सुधा अरोड़ा (औपचारिक परिचय गत अंक में देखें) द्वारा लिखा जा रहा है।


गत अंक में सुगंधि व सखुबाई की संघर्षगाथा का प्रथम आमुख आपने पढ़ा। इस बार उस गाथा का उत्तर आमुख आप सुधा जी की कलम से यहाँ पढ़िए व अपने मित्रों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिए। आगामी अंक में क्रमशः दोनों की आत्मकथाएँ सम्मिलित की जाएँगी.

- कविता वाचक्नवी



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गतांक से आगे






- दस बाई दस के कमरों से खेत खलिहानों तक : सुगंधि और सखूबाई की संघर्ष कथा -






सखूबाई गावित महाराष्ट्र में डहाणु तालुका के मेगपाड़ा बांदघर गाँव की एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता हैं । पिछले दस वर्षों से वे ‘ कष्टकरी संघटना ’ के साथ काम कर रही हैं । यह संगठन छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के हित के लिए कार्य करता है । सखूबाई की प्रेरणा और प्रयास के कारण ही इस संगठन ने गाँव में अपनी एक जगह बनायी है ।



भारत के गाँवों कस्बों में आज भी प्रताड़ना का सिलसिला जारी है। किसी भी औरत को चुडैल या डायन घोषित कर उसके साथ मनमाना सुलूक किया जाता है। इसमें कई बार गाँव की दूसरी औरतें भी शामिल हो जाती हैं। ऐसी औरतें जिन्हें उस औरत से कोई ज़ाती नाराजगी या पुराना बैर हो । कुछ औरतें तमाशा या हिंसा देखने के लिहाज से जमा हो जाती हैं। फिल्मों में जैसी हिंसा, तोड़ फोड़, मारपीट दिखाई देती है, रोजमर्रा की वास्तविकता में उसे सामने घटते हुए देखना भी एक विचित्र परपीड़न को पोसता है ।



इस तरह की घटनाओं में कई बार ‘ डायन ’ औरत को पीट पीट कर उसकी हत्या भी कर दी गयी है। लेकिन हर बार हत्यारे छूट जाते हैं क्योंकि हत्यारा कोई एक नहीं, पूरा समूह होता है और गाँव की व्यवस्था उसे सहमति देती है ।



सखूबाई इसके पीछे के कारणों की जाँच में कुछ तथ्यों को सामने रखती है, ‘मुझे भी किसी दिन मौका मिलते ही ये लोग ‘ चेटकीण ’ (चुड़ैल) बता देंगे । मुझे दबाने के लिए दूसरों को भी भड़काएंगे ! ’ सखूबाई कहती है, ‘ ऐसी औरतें जो मजबूत हैं, जो अपने हक के लिए लड़ती हैं, उन्हें ‘ चेटकीण ’ बुलाने का मौका ढूँढते हैं ये लोग ! ’



औरत को डायन ठहराने के पीछे के कारणों की खोज करें तो कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य हाथ लगते हैं । महाराष्ट्र के कैनाड गाँव में एक जमीदार ने एक ऐसी औरत को डायन कहकर प्रचारित कर दिया जिसके आदमी की उन्हीं दिनों मौत हुई थी और उसे उसकी जमीन उसकी विधवा के नाम करनी थी। जमीदार ने कहा कि यह डायन अपने पति को खा गई , इसे गाँव से बेदखल करो। ऐसी विधवा औरतें जिनके बच्चे छोटे छोटे हैं, जिन्हें जमीन अपने नाम करवानी है , उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल करने के लिए उनके बारे में अफवाह फैला दी जाती है कि वे जादू टोना करती हैं । उनके ही पति की मौत की घटना को उन्हें डायन ठहराने के साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है । संयोग से अगर उस दौरान गाँव के किसी भी बच्चे की किसी भी हारी बीमारी से मौत हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी सीधे उस औरत पर डाल दी जाती है, जिसे डायन घोषित कर कुछ लोगों का स्वार्थ सधता है और गाँव के अधिकांश लोग झट इस तरह की घटना को डायन के कारण आई आपदा मानकर अपनी तार्किक बुद्धि को ताक पर रख उस औरत की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं ।



गाँव की किसी भी औरत को उसकी जमीन से बेदखल करने के लिए सबसे आसान तरीका उस जमीन पर कब्जा पाने वाले लोगों को यही लगता है कि काँटे को किसी न किसी बहाने से जड़ से ही उखाड़ डालो। कोर्ट कचहरी के चक्कर में बरसों निकल जाते हैं और हासिल कुछ नहीं होता, वकीलों को घूस देनी पड़ती है फिर भी जमीन हाथ में आने की गारंटी नहीं होती । इसलिए सुनियोजित साजिश को अंधविश्वास का जामा पहना कर गाँव वालों को अपने पक्ष में कर लेना उनके लिए आसान सिद्ध होता है क्योंकि गाँव के लोगों में इस ‘अंधविश्वास’ की जड़ें गहरे तक धँसी हुई है और अंधविश्वास को कोई पुलिस या व्यवस्था बदल नहीं सकती



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क्रमश:



- सुधा अरोड़ा




बुधवार, 18 मार्च 2009

इस्लाम कोई ‘मेन्स-ओनली’ क्लब नहीं

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इस्लाम कोई ‘मेन्स-ओनली’ क्लब नहीं
--शीबा असलम फ़हमी








जब से होश सम्भाला अपने आस-पास जो मुस्लिम समाज देखा उसमें बहुत से मर्द अपनी बीवियों-बहनों से ज़्यादा पढे़-लिखे थे, मगर बहुत-सी औरतें भी अपने शौहरों या भाइयों से ज़्यादा पढी-लिखी थीं। यह भी देखा कि शौहर अपनी बीवी का खर्च उठाते हैं, मगर यह भी कि कई बीवियाँ भी काम करती हैं और अपने शौहरों का खर्च उठाती हैं। कुछ मर्दों को घर पर रहकर घर और बच्चों की देखभाल में मज़ा आता है, तो कुछ औरतें बाहर की दुनिया में मग्न दिखती हैं। एक ही घर में भाई को खाना पकाने का शौक है तो बहन इंजीनियरिंग कर रही है, ऐसी भी औरतें देखीं जिन्हें अपने शौहर की दूसरी शादी से सख्त एतराज़ है, और ऐसी भी कि जो यह मानने से इन्कार करती हैं कि ‘अल्लाह ने शौहर को बीवी की पिटाई का हक दिया है’। और बहुत सी ऐसी औरतें भी देखीं जो यह मानने को तैयार ही नहीं कि अधिकार सारे मरद के और कर्तव्य सारे औरत के हों।



मगर मुल्ला हज़रात तो कुछ और बताते हैं। उनके अनुसार अल्लाह ने हर मर्द को हर औरत से आला बनाया है। इसलिए मर्द और औरत के बीच बराबरी नहीं हो सकती। वे यह भी कहते हैं कि उनके इन दावों पर औरत सवाल नहीं खडे़ कर सकती क्योंकि यह अल्लाह का कानून है। मुल्लाओं के अनुसार औरत पर मर्द का मालिकाना हक है। वह उसका ‘खाविंद’ और ‘क़व्वाम’ है। कोई इन मुल्लाओं से पूछे कि क्या कोई ऐसा शख़्स होगा जो खुशी-खुशी इस व्यवस्था को मान ले कि उसका वजूद सिर्फ पिटने, सेवा करने, जुल्म सहने, तिरस्कार झेलने और सारे समाज और दुनिया से छुपकर चारदिवारी में रगड़-रगड़ कर जीने के लिए है? क्या यह व्यवस्था किसी होशमंद इन्सान को मंज़ूर हो सकती है? और क्या यह मुमकिन है कि जो मज़हब ज़बान, पहनावा, खानपान, नस्ल, ज़ात, लिंग, स्थान व समय की सीमाओं से ऊपर उठकर, सारी कायनात को अपने [इस्लाम के] दायरे में लाने का दावा करे, वह दुनिया की आधी आबादी को मुन्किर [अल्लाह को न माननेवाला], बागी़ व नाफ़रमान होने की तरफ धकेल दे? क्या इस्लाम जैसे एम्बीशियस मज़हब की परिकल्पना इतनी अधकचरी और कमज़ोर होगी कि वह यह नहीं जानती कि एक मां के रूप में यही औरत अपनी औलाद को किस दिशा में मोड़ सकती है? क्या सिर्फ मुसलमान में पैदा हो जाने से एक औरत खुद को बेइज़्ज़ती व तिरस्कार के लिए तैयार कर लेती है? और यह भी सुनती है कि जहन्नम में भी औरतें ही ज़्यादा जाएंगी। मतलब यह कि ‘यहां’ से ‘वहां’ तक ऐश सिर्फ मर्द करेगा। मौलाना, तो फिर औरतों के लिए क्या आफर है कि वह अकी़दे में रहे? और इस तरह के इस्लाम को फैलाकर आप इस्लाम की कैसी खि़दमत कर रहे हैं? समझ में नहीं आता कि अपने क्षुद्र स्वार्थों को पोषित करने मात्र के लिए मुल्लाओं ने न केवल स्त्री समाज में भय, संशय और नफरत का माहौल पैदा कर दिया बल्कि इस्लाम को हास्यास्पद अतार्किक और बर्बर धर्म भी बना डाला है।......



अभी भारत में अल्पसंख्यकवाद की चादर ने इन मुद्दों को ढंक रखा है पर इंटरनेट के ज़माने में यह ज़्यादा दिन नहीं चलेगा। इस्लाम सारी कायनात के लिए आया है जहां न सिर्फ इन्सानों बल्कि जानवर व पेड़-पौधों तक के अधिकार व सम्मान सुरक्षित रखे गए हैं इसलिए औरतों को इस्लाम ने जो दिया है उसे मुल्लाओं के चंगुल से छुडाना ही है।



हंसके मार्च २००९अंक के लेख का अंश



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