गुरुवार, 22 नवंबर 2012

....नायक की प्रतीक्षा करती व उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती .....

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हिन्दी की समकालीन काव्यालोचना की सर्वाधिक ज्वलंत शृंखला 


अनामिका व पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था व तत्पश्चात राहुल ब्रजमोहन का "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"।  

उसी बहस के क्रम में आज पढ़ें -



धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका
(संदर्भ - पवन करण और अनामिका की कविताओं पर जारी बहस)

- कात्यायनी 


पवन करण और अनामिका की कविताओं का शालिनी माथुर ने जो कुशाग्र विश्लेषण प्रस्तुत किया, उस पर पहले ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं लगी। शालिनी की केन्द्रीय स्थापनाओं से मेरी पूरी सहमति थी। पर बहस के दौरान मूल मुद्दे को इधर-उधर खींचने-तानने-घसीटने से कुछ नए विवाद के मुद्दे उभरकर आए। उन पर अपने विचार रखने की जरूरत महसूस हुई।


पहली बात यह है कि निर्वस्त्रता (जैसा कि शालिनी ने भी लिखा है) अपने आप में अश्लील या पोर्नोग्राफ़िक नहीं होती। यदि ऐसा होता तो पुनर्जागरण काल से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक की यूरोपीय चित्रकला की कई क्लासिकी कृतियाँ अश्लील मान ली जातीं। हाँ, कोर्णाक और खजुराहो की मैथुनरत युगलों और पशुओं तक से मैथुन की मूर्तियाँ भारतीय समाज के एक गतिरुद्ध और पतनोन्मुख समाज के अभिजनों-पुरोहितों की सांस्कतिक सड़ान्ध की अभिव्यक्ति-मात्र हैं। अर्चना वर्मा 'इन्हें इस बहुलताप्रेमी देश के समावेशी स्वभाव में विचित्र और विलक्षण आस्थाओं और अस्मिताओं के लिए भी जगह बना देने के पुरागत परम्परा' मानती हैं। उनके हिसाब से, तान्त्रिकों-वामाचारियों के विविध सम्प्रदाय धार्मिक आस्थाओं को रूपकों-प्रतीकों में ढालकर स्त्रियों के साथ (धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर) जो कुछ करते थे, उन्हें भी 'विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं का एक विशिष्ट गढ़न्त '(Construct) मान लिया जाना चाहिए और उनका सहानुभूतिपूर्वक पाठ/पढ़न्त ( Reading ) होना चाहिए। ऐसा ही सती-प्रथा के साथ भी होना चाहिए।


उत्तर आधुनिकतावादी विमर्श (Discourse) प्रणाली की जिस त्रयी - लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त (Text, reading and construct) को अर्चना वर्मा ने अपनी तर्क-प्रणाली का आधार बनाया है, उसकी सबसे बड़ी सहूलियत यह होती है कि उसका कोई सन्दर्भ-चौखटा (Frame of reference) होता ही नहीं। जो भी सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक गढ़न्त हैं, उनके कई लिखंत और कई पढ़न्त हो सकते हैं। किसी एक अवस्थिति के सही या गलत होने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। पक्षधरता या निर्णायकता का मुद्दा अप्रासंगिक हो जाता है। अनामिका ने शालिनी को यह नसीहत यूँ ही नहीं दी है कि आदमी को 'जजमेण्टल' होने से बचना चाहिए। पाठ की बहुस्वरीयता (Polyphony) की बात जब लुनाचार्स्की ने (दोस्तोयेव्स्की के सन्दर्भ में) और बख़्तीन ने की थी तो उन्होंने रचनाकार को सुनिश्चित विचारधारात्मक अवस्थिति और सामाजिक पक्षधरता से मुक्त कत्तई नहीं किया था। अर्चना वर्मा लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त की अवधारणाओं के मूल में भाषा में स्वभावतः निहित अर्थबहुलता और सन्दर्भ-सापेक्षता की चर्चा करते हुए रचनाकार को पूरी छूट देते हुए ज़िम्मेदारी मुख्यतः पाठक की पढ़न्त क्षमता पर डाल देती हैं जो उसकी भाषिक क्षमता, वैयक्तिक सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, वैचारिक प्रतिबद्धता आदि से तय होती है। उनका साफ-साफ कहना है - "लिखन्त की विवक्षा और अर्थान्विति लेखक की मंशा से नियन्त्रित और अभिप्राय से संचालित न होकर पाठक की पढ़न्त क्षमता द्वारा कार्यान्वित होती है।" बात यहाँ साफ हो गई है। यानी असल बात यह है कि रचनाकार इस तर्क से दायित्वमुक्त हो जाता है और अपनी वैचारिक-सामाजिक अवस्थिति की किसी भी आलोचना के जोखिम से सुरक्षित हो जाता है। यह घिसे-पिटे उत्तर आधुनिकतावादी सिद्धान्त-चर्वण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आज हिन्दी की कई स्त्री चिन्तक और स्त्री कवि अपने कृतित्व में जो नारीवाद प्रस्तुत कर रही हैं वह गत शताब्दी के साठ के दशक के पश्चिमी नारीवाद के विविध सरणियों से सर्वथा भिन्न है। उस दौर के नारीवादी आन्दोलन के पास स्त्री-मुक्ति की कोई सांगोपांग परियोजना नहीं थी, उनकी विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु मध्यमवर्गीय अराजकतावादी थी और स्वरूप रैडिकल स्वतःस्फूर्त था। आगे चलकर अपनी तार्किक परिणति के तौर पर भले ही वह धारा विघटित हो गयी और कुछ हद तक प्रतिगामी निष्पत्तियों तक जा पहुँची, पर अपने समय में कई शीर्षस्थ नारीवादी सिद्धान्त-निरूपकों की उपस्थिति के साथ-साथ उस नारीवादी आन्दोलन का स्वरूप जनान्दोलनात्मक था। पूँजीवादी जनवाद के वैधिक दायरे के भीतर उसकी अपनी कुछ उपलब्धियाँ भी थीं। 



स्त्री-मुक्ति और पुरुष वर्चस्व जैसे प्रश्न आज उत्तर-आधुनिकतावादी विमर्श के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टि के अनुसार दमन या उत्पीड़न, विमानवीकरण, वस्तुकरण या ऐसी कोई भी चीज़ एक वस्तुगत सामाजिक यथार्थ नहीं बल्कि एक वैचारिक समस्या है जिसका सम्बन्ध दार्शनिक द्वैतों से है और इन द्वैतों की व्याख्या में ही दमन-उत्पीड़न-वर्चस्व या ऐसी कोई स्थिति स्वीकार की जा सकती है।
आज स्थिति सर्वथा भिन्न है। स्त्री-मुक्ति और पुरुष वर्चस्व जैसे प्रश्न आज उत्तर-आधुनिकतावादी विमर्श के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टि के अनुसार दमन या उत्पीड़न, विमानवीकरण, वस्तुकरण या ऐसी कोई भी चीज़ एक वस्तुगत सामाजिक यथार्थ नहीं बल्कि एक वैचारिक समस्या है जिसका सम्बन्ध दार्शनिक द्वैतों से है और इन द्वैतों की व्याख्या में ही दमन-उत्पीड़न-वर्चस्व या ऐसी कोई स्थिति स्वीकार की जा सकती है। तात्पर्य यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद और उसकी सहोदरा ''उत्तर''-विचारसरणियाँ सभी विचारों, विश्वासों, व्यवहारों, संस्थाओं, घटनाओं-परिघटनाओं को वस्तुगत यथार्थ के बजाय एक पाठ या लिखन्त (text) मानती हैं और इसकी अर्थान्विती भी पूरी तरह से मनोगत होती है यानी प्रेक्षक-पाठक की स्थिति पर निर्भर होती है, जैसा कि अर्चना वर्मा कहती हैं, ''...लिखन्त पाठक के हाथों में आते ही अपने तात्कालिक सन्दर्भों से मुक्त होती और पढ़न्त-सापेक्ष बन जाती है, हालांकि लिखन्त सापेक्षता से पूरी तरह से मुक्त नहीं होती।'' उत्तर-आधुनिकतावाद का जादुई तर्क सिग्निफायर और सिग्नीफायड की अवस्थितियों को मनमाने ढंग से बदलता रहता है। 


उत्तर-आधुनिकतावादी, उत्तर उपनिवेशवादी, 'सबआल्टर्न' इतिहासकार और अस्मितावादी राजनीति (Identity Politics) के एन.जी.ओ. पन्थी ज्ञानधुरीण - ये सभी लोग प्रबोधन (Enlightenment), क्लासिकी जनवादी क्रान्तियों और समाजवादी क्रान्तियों के "महाख्यानों" (Metanarretives) और मानववाद, जनवाद, समाजवाद की अवधारणाओं-परियोजनाओं को एकलतावादी, अपचयनवादी (Reduchionist) और वर्चस्ववादी (Hegemonist) मानकर खारिज करते हैं। इनका मानना है कि सत्ता विकेन्द्रित होकर हमारे जीवन के पोर-पोर में घुसी हुई है, आमजनों द्वारा आभ्यन्तरीकृत कर ली गयी है, अतः इसका प्रतिरोध असम्भव है। यथास्थिति की जड़ता की हर आलोचना एक नयी जड़ता को जन्म देती है और सत्ता का हर प्रतिरोध सत्ता के नये रूप को जन्म देता है। (अर्चना वर्मा, शालिनी की आलोचना करते हुए जब कहती हैं कि पितृसत्ता के गढ़न्तों से लड़ते-लड़ते स्त्री-विमर्श की अपनी अनेक निष्पत्तियाँ स्वयं न केवल एक गढ़न्त बल्कि जकड़न्त बन चुकी हैं तो इसके पीछे मूलतः यही तर्कप्रणाली सक्रिय होती है)। ऐसी स्थिति में उत्तर आधुनिक, उत्तर औपनिवेशिक और 'सब-आल्टर्न' विचार-सरणियाँ एकमात्र वैकल्पक सम्भावना  के तौर पर दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों आदि की सत्ता से अनछुई-अप्रदूषित प्राक्-आधुनिक (Pre-modern) अस्मिताओं की तलाश करती हैं और उनकी स्वायत्तता के 'स्पेस' को बचाने-बढ़ाने की कोशिश करती हैं। यह साहित्य और मानविकी के क्षेत्र में भी हो रहा है और राजनीति के क्षेत्र में भी। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित इतिहासकार दीपेश चक्रवर्ती और समाजशास्त्री आशीष नन्दी 'कुलवधु' और 'गृहलक्ष्मी' जैसे 'सुन्दरता की अनपचेय (Irriducable) श्रेणियों' के महिमामण्डन तक जा पहुँचते हैं। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित अर्चना वर्मा 'रसराज शृंगार ' की रीतिकालीन रसानुभूति को सकारात्मक बताती हैं और इस बात के लिए चिन्तित दीखती हैं कि आधुनिकता का पीछा करता हुआ भारत विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं और पुरागत परम्पराओं से विच्छिन्न होता जा रहा है (इसमें लिंग-पूजा, योनि पूजा, पशुओं तक से सम्भोग के भित्ति-चित्रों के उत्कीर्णन आदि सभी शामिल हैं!)। अनामिका की कविताओं में और लेखन में स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से विच्छिन्न कर स्त्री-देह की मुक्ति में ( इसी में मन की मुक्ति भी है!) कीलित करने वाली पश्चिमी बुर्जुआ नारीवादी चिन्तन की एक उपधारा के साथ-साथ, लोक-परम्परा के नाम पर जो कुछ भी है; उसके प्रति जो अधिभूतवादी एवं अनालोचनात्मक स्वीकार-भाव है, उसे भी इसी नजरिए से समझा जा सकता है। यह संगमभूमि दरअसल उत्तर-आधुनिकतावाद की जमीन है जहाँ नारी मुक्ति देह-मुक्ति के रूप में और देह-मुक्ति 'देह के उत्सव' (राजेन्द्र यादव इसे यही नाम देंगे) के रूप में पवन करण और अनामिका अपनी-अपनी कविताओं को अंजाम दे रहे हैं। 



'फैट ब्लैक वुमन' से जो एक कविता उन्होंने उद्धृत की है वहाँ भी मोटी होने, अश्वेत होने और स्त्री होने से जुड़े तीन स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का जो तरीका कवि ने चुना है, वह भी व्यापक सामाजिक प्रश्नों को देह-मात्र में कीलित कर देने का ही तरीका है। कविता की स्त्री के दुद्धू उत्तेजक हैं। किसके लिए? निश्चय ही पुरुष के लिए ! वह पुरुष से अपना जड़ीभूत सौन्दर्य-बोध बदलने का आग्रह करती है ताकि वह उसके तरबूज जैसे स्तनों, जुड़वाँ सील मछलियों जैसी जाँघों और उनके बीच जामुनी चेरी मुँह में दबाए झबरे कुत्ते को सराह सके और नाभि के नीचे नीलिमा में हहाते काले सागर में उतर सके।
बकौल अनामिका, उनकी कविता 'ब्रेस्ट' से जुड़ा सारा रूमान झाड़ते हुए यह भी बताना चाहती है कि स्त्री की अस्मिता किसी एक अंग में कीलित नहीं की जा सकती, पर ऐसा करते हुए वे स्त्री की अस्मिता व उससे जुड़े प्रश्नों को स्त्री-देह मात्र में कीलित कर देती हैं। ग्रेस निकोलस के संकलन 'फैट ब्लैक वुमन' से जो एक कविता उन्होंने उद्धृत की है वहाँ भी मोटी होने, अश्वेत होने और स्त्री होने से जुड़े तीन स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का जो तरीका कवि ने चुना है, वह भी व्यापक सामाजिक प्रश्नों को देह-मात्र में कीलित कर देने का ही तरीका है। कविता की स्त्री के दुद्धू उत्तेजक हैं। किसके लिए? निश्चय ही पुरुष के लिए ! वह पुरुष से अपना जड़ीभूत सौन्दर्य-बोध बदलने का आग्रह करती है ताकि वह उसके तरबूज जैसे स्तनों, जुड़वाँ सील मछलियों जैसी जाँघों और उनके बीच जामुनी चेरी मुँह में दबाए झबरे कुत्ते को सराह सके और नाभि के नीचे नीलिमा में हहाते काले सागर में उतर सके। कविता न्यौता किसे दे रही है? क्या खुद को? नहीं, पुरुष को! अतः यह कविता भी समस्या का अपमानजनक अवमूल्यन करती है और सन्दर्भों से कटकर वस्तुगत तौर पर अश्लील बन ही जाती है। अनामिका भी इतना तो मानती ही हैं कि 'एकांगिता ही अश्लीलता है।' 





करीब ढाई-तीन दशक पहले हिन्दी कविता में स्त्रियों के लिए करुणा की बाढ़-सी आ गयी थी। हिन्दी कवि दयनीय, मौन, उत्पीड़ित स्त्री के प्रति कुछ ज्यादा ही करुणार्द्र हो उठे थे। फिर स्त्री कविता का एक विद्रोही स्वर उभरा जिसका एक व्यापकतर सामाजिक परिप्रेक्ष्य था। उस समय भी ज्यादा हावी धारा कुलीन व्यक्तिवादी स्त्री-कविता की ही धारा थी। और अब यह एक दौर है जब पवन करण की चर्चित कविता जैसी हृदयहीन लम्पट-कामुक कविताएँ और अनामिका की चर्चित कविता जैसी कृत्रिम, 'सिंथेटिक' (प्रभु जोशी ने ठीक कहा है) विकृतमानस और संवेदनहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। पितृसत्ता का विरोध करते हुए स्त्री ने प्रकारान्तर से पितृसत्ता के ही गढ़न्तों को स्वीकार कर लिया है- अर्चना वर्मा की यह बात और कहीं लागू हो न हो, अनामिका की कविता पर तो जरूर लागू होती है।
करीब ढाई-तीन दशक पहले हिन्दी कविता में स्त्रियों के लिए करुणा की बाढ़-सी आ गयी थी। हिन्दी कवि दयनीय, मौन, उत्पीड़ित स्त्री के प्रति कुछ ज्यादा ही करुणार्द्र हो उठे थे। फिर स्त्री कविता का एक विद्रोही स्वर उभरा जिसका एक व्यापकतर सामाजिक परिप्रेक्ष्य था। उस समय भी ज्यादा हावी धारा कुलीन व्यक्तिवादी स्त्री-कविता की ही धारा थी। और अब यह एक दौर है जब पवन करण की चर्चित कविता जैसी हृदयहीन लम्पट-कामुक कविताएँ और अनामिका की चर्चित कविता जैसी कृत्रिम, 'सिंथेटिक' (प्रभु जोशी ने ठीक कहा है) विकृतमानस और संवेदनहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। पितृसत्ता का विरोध करते हुए स्त्री ने प्रकारान्तर से पितृसत्ता के ही गढ़न्तों को स्वीकार कर लिया है- अर्चना वर्मा की यह बात और कहीं लागू हो न हो, अनामिका की कविता पर तो जरूर लागू होती है। 



हिन्दी कविता सामाजिक जीवन और संघर्षों के परिप्रेक्ष्य से आज असामान्य रूप से विमुख हुई है। स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आम स्त्रियों के जीवन, वृहत्तर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक मुक्ति की परियोजना से काटकर अभिजन समाज की स्त्रियों का निठल्ला विमर्श बना दिया गया है। इसका मूल कारण इतिहास का ठहराव और विपर्यय की लहर है। मजे की बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर औपनिवेशिकता, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद आदि का जमाना यूरोप-अमेरिका में क़रीब डेढ़-दो दशक पहले ही बीतने लगा था। भारत में यह फैशन काफी देर से आया है, जैसा कि प्रायः होता है।




हिन्दी कविता सामाजिक जीवन और संघर्षों के परिप्रेक्ष्य से आज असामान्य रूप से विमुख हुई है। स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आम स्त्रियों के जीवन, वृहत्तर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक मुक्ति की परियोजना से काटकर अभिजन समाज की स्त्रियों का निठल्ला विमर्श बना दिया गया है। इसका मूल कारण इतिहास का ठहराव और विपर्यय की लहर है। मजे की बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर औपनिवेशिकता, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद आदि का जमाना यूरोप-अमेरिका में क़रीब डेढ़-दो दशक पहले ही बीतने लगा था। भारत में यह फैशन काफी देर से आया है, जैसा कि प्रायः होता है। पश्चिम के अकादमिक-सांस्कृतिक हलकों में इन दिनों "मार्क्सवाद की वापसी" का नारा देने का ज़माना है। फ़ूको, देरिदा, ल्योतार, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक, होमी भाभा आदि घिस चुके हैं। अब फिकरे और जुमले जि़जेक और अलेन बेदयू आदि से उधार लेने का ज़माना है। 


अनामिका ने शालिनी को प्रेमचन्द की कहानी के पात्र 'बड़े भाई साहब' वाले भाव से नसीहत दी है। प्रेमचन्द के 'बड़े भाई साहब' नसीहत क्यों देते थे, वह जानती ही होंगी। हाँ, यह सम्भावना नहीं है कि कथा के अन्त में बड़े भाई साहब की तरह वे रूपान्तरित होकर सरल वेश में आ जायेंगी। नैतिकता का ठेका लेने, 'सेल्फरायटियसनेस' और 'जजमेण्टल' होने तथा "प्रचण्ड मर्दवादी भाषा के तेवर" में श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त होकर आलोचना करने की प्रवृत्त को उन्होंने जब फासीवादी कहा है तो प्रकारान्तर से शालिनी को ही लक्षित किया है। पर स्वयं उनके लेख से ऊँचाई से 'सरमन' बोलने और नसीहत देने का जो तेवर है, कविता की समझ विकसित करने का जिस अन्दाज़ में दिया गया सुझाव है, उससे तो एक आहत फुफकार ही सुनायी देती है। जो तोहमतें वे शालिनी के आलेख पर लगाती हैं, वे ख़ुद उन पर ज्यादा सटीक ढंग से लागू होती हैं। दिलचस्प बात यह है कि शालिनी की मूल आपत्तियों और तर्कों में से उन्होंने एक को भी सीधे-सीधे नहीं छुआ है और बस दाँयें-बाँयें से निकल गयी हैं। 



अनामिका के मर्दवाद-विरोध की ब्रह्मगाँठ तब खुल जाती है, जब एक नैतिक-बौद्धिक रूप से परिष्कृत आधुनिक स्त्री के अकेलेपन के लिए उन्हें "रामगुप्तों से घिसी ध्रुवस्वामिनी के अकेलेपन" का रूपक सूझता है। यानी मर्दवाद (पुरुष वर्चस्ववाद) का सारतत्व यह है कि अपनी नामर्दगी को ढंकने के लिए कायर पुरुष अतिरिक्त आक्रामक और निर्दय आचरण करते हैं।
अनामिका के मर्दवाद-विरोध की ब्रह्मगाँठ तब खुल जाती है, जब एक नैतिक-बौद्धिक रूप से परिष्कृत आधुनिक स्त्री के अकेलेपन के लिए उन्हें "रामगुप्तों से घिसी ध्रुवस्वामिनी के अकेलेपन" का रूपक सूझता है। यानी मर्दवाद (पुरुष वर्चस्ववाद) का सारतत्व यह है कि अपनी नामर्दगी को ढंकने के लिए कायर पुरुष अतिरिक्त आक्रामक और निर्दय आचरण करते हैं। फिर मर्दवाद का समाधान क्या है? यह कि पुरुष "संकल्पपूर्वक अतिपुरुष के खाँचे से बाहर आकर सम्यक् पुरुष यानी प्रजातान्त्रिक/दोस्त पुरुष" बने, "ध्रुवस्वामिनी के योग्य चन्द्रगुप्त" बने, "पद्मिनी नायिका के योग्य धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक" बने। अनामिका जी, महाकाव्य काल के धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक उदारचरित भले हों, पर सत्री के प्रति प्रजातान्त्रिक रुख रखने वाले दोस्त पुरुष तो कत्तई नहीं होते थे। ध्रुवस्वामिनी का अपना व्यक्तित्व था और चन्द्रगुप्त एक जेनुइन प्रेमी और साहसी राजा था, पर आधुनिक स्त्री के स्वतन्त्र व्यक्तित्व और प्रजातान्त्रिक पुरुष व्यक्तित्व को उन दोनों पर आरोपित करना अतिबौद्धिकता के हास्यास्पद द्रविण प्राणायाम से अधिक कुछ भी नहीं है। आज के मूल्यों के सन्दर्भ-चौखटे से देखें तो धीरोदत्त नायक अतिपुरुष के खाँचे में कैद होता था और पद्मिनी नायिका आचरण और सौन्दर्यबोध की दृष्टि से प्राचीन/मध्यकालीन पुरुष वर्चस्ववादी कसौटियों पर खरी होती थी। यानी शब्दों में तो अनामिका पुरुष के अतिपुरुष होने का विरोध करती हैं, पर वास्तव में प्रतीक्षा उन्हें एक अतिपुरुष की ही है। 



बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब वे ("शालिनी बाबू", "शालिनी भैया" को सम्बोधित करते हुए) मानो दुनिया के सारे पुरुषों को चुनौती देती हैं कि "कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें... पढ़ी-लिखी, चेतन परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं"। अब यहाँ यौनिकता से तात्पर्य यदि 'सेक्सुअलिटी' से है, तो वह एक स्वायत्त-सकारात्मक प्रत्यय है, वह एक उन्नत स्त्री-चेतना में उपस्थित रहती है, उसे पुरुष द्वारा जगाने की जरूरत नहीं होती। यौनिकता से तात्पर्य यदि स्वस्थ यौनक्षुधा या स्वस्थ ऐन्द्रिक कामना से है, तो कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और उन्नत चेतना वाली आधुनिक स्त्री इस मामले में समान सक्रिय पक्ष की भूमिका निभाती है।
बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब वे ("शालिनी बाबू", "शालिनी भैया" को सम्बोधित करते हुए) मानो दुनिया के सारे पुरुषों को चुनौती देती हैं कि "कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें... पढ़ी-लिखी, चेतन परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं"। अब यहाँ यौनिकता से तात्पर्य यदि 'सेक्सुअलिटी' से है, तो वह एक स्वायत्त-सकारात्मक प्रत्यय है, वह एक उन्नत स्त्री-चेतना में उपस्थित रहती है, उसे पुरुष द्वारा जगाने की जरूरत नहीं होती। यौनिकता से तात्पर्य यदि स्वस्थ यौनक्षुधा या स्वस्थ ऐन्द्रिक कामना से है, तो कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और उन्नत चेतना वाली आधुनिक स्त्री इस मामले में समान सक्रिय पक्ष की भूमिका निभाती है। अनामिका के विचार से स्त्री शरीर पुपुही नहीं बल्कि गम्भीर राग-रागिनियों, श्रुतियों-अनुश्रुतियों से भरी हुई रुद्रवीणा है, लेकिन है वह एक वाद्ययंत्र ही, जिसके अन्तर्संगीत को जगाने के लिए किसी धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक की जरूरत है। (यह 'साहब, बीवी और गुलाम' की नायिका की कामना लगती है न कि किसी आधुनिक स्वतंत्र चेतस स्त्री की)। धीरोदत्त नायक के पुरातन खाँचे-साँचे वाले ऐसे किसी अतिपुरुष की प्रतीक्षा एक लोकतान्त्रिक सोच न होकर एक फासीवादी आत्मिक जगत और सौन्दर्यशास्त्र की अभिलाक्षणिकता है। यह फासीवादी विचारों से अनुकूलित एक मिथ्याभासी स्त्री-स्वातन्त्रय चेतना है। उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवाद लोकजीवन की रागात्मक चाशनी में लिथड़ी प्राक्आधुनिक सोच-संस्कारों-विचारों-संस्थाओं को महिमामण्डित करने के साथ ही लोकतान्त्रिक मूल्यों-संस्कारों का विरोध करता ही है। साथ ही जेण्डर पर केन्द्रित हर विमर्श को व्यापक सामाजिक-ऐतिहासिक सन्दर्भों से काटकर वह देहकेन्द्रित, यौनकेन्द्रित, 'स्त्री बनाम मर्द' - केन्द्रित बनाकर स्त्री मुक्ति के प्रश्न को परियोजना में रूपान्तरित करने की जगह विमर्श और मुहावरेबाजियों-जुमलेबाजियों तक सीमित कर देता है। कविता और विचार के क्षेत्र विश्वविद्यालयों की अभिजन विदुषियाँ आजकल ऐसा धमाल खूब मचाये हुई हैं। 


अनामिका को ताज्जुब है कि शालिनी ने न जाने कहाँ ऐसी स्त्रियाँ देखी हैं जो बेध्यानी का अभिनय करते हुए जानबूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती हैं और ध्यान से चारों ओर देखती हैं कि सबने उसे ध्यान से देखा या नहीं । हमारे जैसे बन्द समाजों की घुटन में यह विमानवीकरण, विघटित स्त्री चेतना और रुग्णता खूब देखने को मिलती है स्त्रियों के एक हिस्से में। अनामिका को दिल्ली के मध्यवर्गीय इलाकों में जाकर व्यापारियों और बाबुओं की, रुटीनी गार्हस्थ्य से बोर पत्नियों का पास-पड़ोस के "भाई-साहबों" से व्यवहार पर गौर करना चाहिए, कलकत्ता के किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों की बहुतायत वाले इलाकों में जाकर पास-पड़ोस की "भाभी जी" लोगों का उनके साथ व्यवहार देखना चाहिए, किसी तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा-गाकर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री का मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार देखना चाहिए। यही नहीं, साहित्य के मठाधीश कई नौकरशाहों की महफिलों और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तरों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जायेंगे। कविता और कहानी में भी एक स्त्री जब कोई निमित्त तलाशकर, विद्रोह या त्रासदी के नाम पर या किसी अन्य बहाने से, स्त्री को अनावृत करती है तो रुग्ण पुरुष मानस को गुदगुदाने (titillation) का ही काम करती है।

अनामिका को दिल्ली के मध्यवर्गीय इलाकों में जाकर व्यापारियों और बाबुओं की, रुटीनी गार्हस्थ्य से बोर पत्नियों का पास-पड़ोस के "भाई-साहबों" से व्यवहार पर गौर करना चाहिए, कलकत्ता के किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों की बहुतायत वाले इलाकों में जाकर पास-पड़ोस की "भाभी जी" लोगों का उनके साथ व्यवहार देखना चाहिए, किसी तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा-गाकर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री का मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार देखना चाहिए। यही नहीं, साहित्य के मठाधीश कई नौकरशाहों की महफिलों और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तरों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जायेंगे। कविता और कहानी में भी एक स्त्री जब कोई निमित्त तलाशकर, विद्रोह या त्रासदी के नाम पर या किसी अन्य बहाने से, स्त्री को अनावृत करती है तो रुग्ण पुरुष मानस को गुदगुदाने (titillation) का ही काम करती है।

दूर की कौड़ी लाने के चक्कर में वकील कभी-कभी केस बिगाड़ने और मुवक्किल की फजीहत कराने का ही काम किया करते हैं। ऐसा ही आशुतोष कुमार ने किया है। सीढ़ी दर सीढ़ी तर्क़ करते हुए वे यहाँ जा पहुँचते हैं कि जरूरी नहीं कि पोर्नोग्राफ़ी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही हो। सनी लियोन ख़ुद मानती हैं कि पोर्नोग्राफ़ी उनके लिए सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति का एक खास तरीक़ा है जिसे उन्होंने अपनी इच्छा से चुना है और इस पर उन्हें गर्व है। आशुतोष कुमार जी, पोर्नोग्राफ़ी के बारे में 'वैल्यू जजमेण्ट' इस आधार पर नहीं लिया जा सकता कि सनी लियोन इसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम और अपना स्वतन्त्र निर्णय मानती हैं। पोर्न उद्योग और यूरोप के सेक्स उद्योग में लगी ज्यादातर स्त्रियाँ यही कहेंगी कि वे अपने स्वतन्त्र निर्णय से ऐसा कर रही हैं। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। इनके पीछे सैकड़ों परोक्ष रूप से आर्थिक-सामाजिक परिवेशिक दबाव काम करते हैं या फिर एक विघटित स्त्री चेतना काम करती है जो अलगाव और पूँजीवादी सांस्कृतिक अद्यःपतन का परिणाम होती है। यदि कुछ पुरुषों के लिए सनी लियोन कुत्सित उल्लास का रूपक या एक गाली का पर्याय बन चुकी है तो मात्र इसी से यह तय नहीं हो जाता कि हम सनी लियोन (निश्चय ही, उसके निर्णय की आज़ादी उसकी अपनी है, पर उसके निर्णय से असहमति की भी उतनी ही आज़ादी है) के कृत्य का औचित्य प्रतिपादन करने लगें। जहाँ तक सृजनात्मक अभिव्यक्ति का सवाल है, तो आशुतोष जी, पोर्न इण्डस्ट्री तो छोड़ ही दीजिए, हॉलीवुड-बॉलीवुड के कमर्शियल सिनेमा में भी अभिनेता की सृजनात्मक अभिव्यक्ति का 'स्पेस' बस नाम को या अपवादस्वरूप ही होता है। वहाँ कुछ है तो बस पैसे और स्टारडम की कुत्तादौड़ है, खोखलापन है, वैचारिक दिवालियापन है और घनघोर आत्मिक रिक्तता है। आशुतोष कुमार ने अपने लेख के अन्त में पोर्नोग्राफ़ी के बारे में काफ़ी कुछ ठीक-ठीक बातें लिखीं हैं। यह सही है कि पोर्नोग्राफ़र स्त्री को केवल वस्तुकृत नहीं करता (क्योंकि वह कभी भी पूरी तरह से वस्तुकृत नहीं हो सकती)। कभी-कभी वह उसे पशुवत् 'ट्रीट' करके परपीड़क आनन्द लेता है, कभी गोपन को खोलने और निजी स्पेस में झाँकने की फन्तासी रचता है, कभी अपनी समस्त रुग्ण मर्दवादी फन्तासियों-अप्राकृतिक यौनाचार (अब यह मत कहियेगा कि अप्राकृतिक कुछ नहीं होता और यह भी एक पुरानी जड़ीभूत सोच है), सामूहिक यौनाचार, सार्वजनिक नग्नता, 'वाइफ स्वैपिंग' आदि का शिकार बनाता है। यह भी सही है कि जैसे हर उत्पीड़क अन्दर से डरा होता है, उसी तरह पोर्नोग्राफ़र भी स्त्री की स्वतन्त्रता और यौनिकता से डरा होता है। विचित्र बात यह है कि पोर्नोग्राफ़ी के बारे में आशुतोष कुमार ने जो विश्लेषण किया है, उसी के हिसाब से देखें तो भी पोर्नोग्राफ़ी अपनी मूल प्रकृति से ही एक पुरुष वर्चस्ववादी स्त्री विरोधी फासिस्ट उपकरण है। इसे कला-विधा भी नहीं कहा जा सकता। यह बस एक स्त्री विरोधी आक्रामक सांस्कृतिक औजार है। 



विश्लेषण में काव्यात्मक अमूर्तन रचनाकार को पतली गली से निकल लेने का मौका देता है और आलोचक को यह अवसर देता है कि वह (1) रचनाकार का कोपभाजन न बने और (2) अवसरानुसार, अपनी बात का मनमाना भाष्य कर सके और करवा सके। आप चिन्ता न करें, ठोक वस्तुपरक विश्लेषण से निराला, शमशेर, मुक्तिबोध का वस्तुपरक मूल्यांकन (जो प्रायः सकारात्मक ही होगा) ही होगा, कुछ बिगड़ेगा नहीं। पाब्लो नेरुदा की कविताओं को लेकर भी आप बेकार ही चिन्तत हैं।
बहस में कातर ढंग से अपने कम ज्ञान की दुहाई का दिखावा करते हुए एक बॉक्स की टिप्पणी के जरिए कवि मदन कश्यप का टपक पड़ना भी कुछ अजीब ही लगता है। निहायत अधिभूतवादी तरीके से वे ज्ञान और तर्क को संवेदना से अलगाते हैं और डराते हैं कि कविता को यदि अंक भौतिकी की तरह हल करना चाहेंगे तो पता नहीं निराला, शमशेर और मुक्तिबोध की कितनी कविताओं का क्या होगा? यानि कविता का विश्लेषण कविता की भाषा में होना चाहिए (बतर्ज़, 'सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो') मदन कश्यप जी, कविता ही नहीं, शास्त्रीय संगीत के किसी पक्के राग या सिम्फ़नी का भी जब विश्लेषण किया जायेगा तो ठोस, वस्तुगत, विज्ञान की भाषा में ही किया जायेगा। विश्लेषण में काव्यात्मक अमूर्तन रचनाकार को पतली गली से निकल लेने का मौका देता है और आलोचक को यह अवसर देता है कि वह (1) रचनाकार का कोपभाजन न बने और (2) अवसरानुसार, अपनी बात का मनमाना भाष्य कर सके और करवा सके। आप चिन्ता न करें, ठोक वस्तुपरक विश्लेषण से निराला, शमशेर, मुक्तिबोध का वस्तुपरक मूल्यांकन (जो प्रायः सकारात्मक ही होगा) ही होगा, कुछ बिगड़ेगा नहीं। पाब्लो नेरुदा की कविताओं को लेकर भी आप बेकार ही चिन्तत हैं। प्रश्न यहाँ काम-भावना और यौन-आधारित बिम्बों का नहीं है। इनसे किसी को आपत्ति नहीं है। शालिनी की मूल आपत्ति पर गौर कीजिए। निर्वस्त्रता या यौन सम्बन्ध का चित्रण अश्लील या पोर्नोग्राफिक हो, यह ज़रूरी नहीं है। अश्लील (Indecent)* कामुक (sensual), ऐन्द्रिक (sensvous), कामोद्दीपक/रत्यात्मक (Erotic) और कामविकृति (Peruersity, perversion) में फर्क नहीं करेंगे तो कबाड़ा हो जायेगा। जो पोर्नोग्राफ़िक है वह अश्लील है, कामुक है और कामविकृत है। रत्यात्मक, स्थिति सापेक्षता के अनुसार सकारात्मक भी हो सकता है, नकारात्मक भी। और जो ऐन्द्रिकता है, वह स्वस्थ सौन्दर्यात्मक-कलात्मक मूल्य है। पाब्लो नेरुदा की कविताओं में, ज्यादातर, (हमेशा नहीं) यौनिकता, स्त्री शरीर, सम्भोग आदि के इंगित या प्रसंग स्वस्थ ऐन्द्रिकता के रूप में आते हैं और नेरुदा ही क्यों, होमर अफलातून, होरेस जुवेनाल और गोयठे से लेकर गोओर्ग वेयेर्त जैसे उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वहारा कवि तक के कृतित्व में यह स्वस्थ ऐन्द्रिकता मौजूद है। वेयेर्त के बारे में फ्रेडरिक एंगेल्स के इस विचार पर गौर कीजिए - 

"जिस चीज़ में वेयेर्त आचार्य हैं, जिसमें वह हाइने से ऊपर थे ( क्योंकि वे अधिक स्वस्थ और सच्चे थे) और जर्मन साहित्य में जिनका स्थान केवल गोयठे के एकदम बाद आता है, वह भी स्वाभाविक, स्वस्थ विषय-भोग तथा दैहिक वासना की अभिव्यक्त A Sozial-demokrat के बहुत से पाठक सहमे रह जायेंगे, अगर मैं Neue Rheinische Zeitung से कुछ व्यंग लेख पुनः मुद्रित कर दूँ परन्तु मैं इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता। परन्तु यह टीका किये बिना नहीं रह सकता कि जर्मन समाजवादियों के लिए वह वक़्त आना चाहिए, जब उन्हें इस अन्तिम जर्मन कूपमण्डूकीय पूर्वाग्रह को खुलेआम एक ओर फेंक देना होगा। यह झूठी निम्न-बुर्जुआ लज्जा तो गुप्त अश्लीलता के लिए केवल पर्दे का काम देती है। उदाहरण के लिए फ्रैलीगराथ की कविताओं को पढ़ते समय सचमुच यह सोचा जा सकता है कि लोगों के पास यौनांग ही नहीं हैं। परन्तु चुपके से कोई मसालेदार चुटकुला सुनने में किसी को इतना मज़ा नहीं आता था, जितना काव्य में इस घोर सतित्वधर्मी फैलीगराथ को। अन्ततः समय आ गया है कि कम से कम जर्मन मज़दूर इसके बारे में, जो वे स्वयं दिन या रात को करते हैं, प्राकृतिक, अपरिहार्य तथा निरपवाद रूप से आनन्दयोग्य चीज़ों के बारे मे उतनी ही स्पष्टता के साथ बातें करें, जितनी स्पष्टता के साथ रोमान्सभाषी जनगण करते हैं, तथा होमर और अफ़लातून, होरेस तथा जुवेनाल, पुरानी इंजील तथा Neue Rheinische Zeitung ने की।" 
                                                   (मार्क्स-एंगेल्स - 'साहित्य और कला', राहुल फाउण्डेशन, पृ-375) 



पवन करण और अनामिका की कविताएँ स्वाभाविक-स्वस्थ ऐन्द्रिकता और नैसर्गिक काम भावना की कविताएँ नहीं हैं। ये यौन-उत्पीड़न की विद्रोही प्रतिक्रिया या स्त्री के वस्तुकरण के प्रतिरोध की कविताएँ नहीं हैं। ये मनोरोगी और कामविकृत कविताएँ हैं जो ब्रेस्ट कैंसर के बहाने ब्रेस्ट पर रुग्ण उद्दीपक विमर्श प्रस्तुत करती हैं। एक जगह मर्द के शहद के छत्तों दशहरी आमों की जोड़ी में से एक खो गया, अमानत में खयानत हो गया है, दुखी क्षणों का शरण्य छिन गया है और स्त्री भी उदास है जिसके बारे में बातें सुनकर वह बौराती थी, आइने में जिसे देखकर झूमती थी और दोनों एक साथ अपने प्रेमी के मुँह में भर देने की सोचती थी , उसके देह से उनमें से एक के हट जाने से कितना कुछ हट गया है उनके बीच से। अन्त की कारुणिकता यदि मर्द-मानस पर चोट भी हो, तो भी यह तिनके की ओट बेकार है। पूरी कविता में प्याररत स्त्री भी अपने को लजीज़ गोश्त का टुकड़ा ही समझती रही है और मूल बात है कैंसर जैसे प्रसंग में एक बेरहम कामुक अंग-वर्णन और अनामिका की कविता में उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में लगे जालों, पहाड़ों में छिपी मौत की चुहिया, सर्जनी के प्लेट में खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से खिलन्दड़ा संवाद, दस बरस से पीछे पड़े बुलबुलों का फूटना, ब्लाउज के छिपे तकलीफ़ों के हीरों को निकाल बाहर करना- यह सारा कुछ एक मनोरुग्ण प्रलाप-सा लगता है। दरअसल, एक जबर्दस्त साहसी नारीवादी कविता गढ़ने के चक्कर में अनामिका ने न सिर्फ़ अन्तरविरोधी रूपकों-बिम्बों का जंगल खड़ा कर दिया है, बल्कि एक बेहद संवेदनहीन, असौन्दर्यात्मक, आत्मिक रूप से कंगाल 'सिंथेटिक' कविता बना डाली है। यहाँ भी उनका उत्तर-आधुनिक लोकवाद उपस्थित है। दूध भी वे दुनिया की सारी स्मृतियों को पिलाती हैं। स्मृतियाँ अतीत और परम्पराओं से जुड़ती हैं। कोई भविष्य-स्वप्न नहीं है उनके पास दूध पिलाने के लिए। राहत देने के लिए अन्तिम शरण्य फिर स्मृतियाँ ही हैं। इन कविताओं पर मेरी स्थिति कुल मिलाकर शालिनी माथुर, प्रभु जोशी, राहुल ब्रजमोहन और दरबारी लाल ('समयान्तर', सितम्बर, 2012) के साथ है, हालांकि मेरी और इन सभी टिप्पणीकारों की विचारधारात्मक अवस्थितियाँ अलग-अलग हैं। 


इन कविताओं और इनके (विशेषकर वामपन्थी पैराकारों के) तर्कों-वितर्कों को आज के उस देशकाल के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाना चाहिए जब चतुर्दिक पुरोगामी प्रवृत्तियों पर प्रतिगामी प्रवृत्तियाँ हावी हैं, यथास्थिति का ठहराव सड़ान्ध पैदा कर रहा है, मुक्ति की हर परियोजना को वर्चस्वकारी यूटोपिया बताकर खारिज किया जा रहा है, साहित्य में वामपन्थ के दायरे में भी नवरूपवादी क्रीड़ा-किल्लोल हो रहे हैं, अस्मिताओं के स्वयंस्फूर्त संघर्षों का महिमामण्डन हो रहा है, सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों को दृष्टओझल किया जा रहा है, "लोकवाद" के नाम पर प्राक आधुनिक व्यामोह परोसे जा रहे हैं, खाया-पिया-अघाया महानगरीय बौद्धिक समुदाय जनाकांक्षाओं के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है, अकर्मक विमर्श और खिलन्दड़ा सृजन कर्म हो रहा है। ऐसे में, व्यापक स्त्री समुदाय के जीवन, संघर्ष और स्वप्नों से कोसों दूर ऐश्वर्य द्वीप की निवासिनी विश्वविद्यालयी विदुषियाँ स्त्री देह में स्त्री प्रश्न का कीलन कर रही हैं, पाखण्डपूर्ण बुद्धिविलास कर रही हैं और साथ ही, "रसिक-जनों" का काफी मनोरंजन भी कर रही हैं। और जहाँ तक आज के उदीयमान-प्रतिभावान, प्रशंसित-पुरस्कृत, ज्यादातर वामपन्थी (वैसे आजकल वाम दक्षिण में और दक्षिण वाम में प्रतिष्ठित हो रहा है) युवा कवियों का सवाल है, अपने जीवन और कृतित्व में स्त्री को लेकर वे कितने "उग्र मुक्तिकामी" और "परम्पराभंजक" हैं, यह हिन्दी साहित्य प्रदेश के सुधी नागरिकगण जानते ही होंगे। 
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सम्पर्क - 
कात्यायनी, 
डी-68, निराला नगर, लखनऊ-226020 
मोबाइल नं. - 09936650658 
e-mail : katyayani.lko@gmail.com


रविवार, 16 सितंबर 2012

देह के भीतर छिपे देह के आख्यान

5 टिप्पणियाँ

अनामिका व पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर विषयक कविताओं के बहाने हिन्दी कविताओं में पोर्नोग्राफ़ी व यौनिकता की अभिव्यक्तियों पर केन्द्रित शालिनी माथुर के लेख ( व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ) से प्रारम्भ हुई बहस के क्रम में यहाँ 6 सितंबर को प्रभु जोशी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख (कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ) प्रकाशित किया था व तत्पश्चात राहुल ब्रजमोहन का "जहाँ शुरू नहीं होती कविता"।  
उसी बहस के क्रम में आज पढ़ें -


देह के भीतर छिपे देह के आख्यान
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अनिल पुष्कर कवीन्द्र 
प्रधान संपादक 
अरगला


दुनिया के किसी भी रचनाकार के पास रचनाकर्म ही एकमात्र ऐसा जरिया है जिससे वो दुनियाभर में हो रही बर्बरता और पीड़ा की अनुभूति को अभिव्यक्त कर सकता है। इस अभिव्यक्ति के लिए उसके पास कुछ विचार पहले-पहल मस्तिष्क में आते हैं फिर कुछ मुद्दों के साथ वह उस विचार को कुछ दूर ले जाता है, जहाँ उसके भीतर उठ रही कल्पनाएँ नई दृष्टि विकसित करती हैं और फिर वह इन सबको एक खास तरह की संवेदना के साथ अंतरंग होकर मथता है।  उसे पुष्ट करने के लिए किसी एक विचारधारा, दर्शन, को रचना का आधार बनाता है। एक सुलझा हुआ किरदार चुनता है। एक ऐसा किरदार जो उसकी मनोदशा को समझता हो, उससे सहमत हो, और उसके मनोजगत में हो रही हलचलों को शिद्दत से महसूस करता हो, जो उसके भीतर पूरी तरह से उतर चुका हो।  और वह सारी कल्पनाएँ जिसका जुड़ाव अब रचनाकार से है उसे कह पाने में समर्थ हो। यहाँ तक कि रचनाकार के मन के संशय और वहम को भी किरदार अपने भीतर ढालने की कारीगरी में माहिर हो। रचनाकार जिस किरदार को चुनता है उससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि वह किस विचार के तहत जीवन जीने की लालसा से भरा है, किस तरह की गतिविधियों में शरीक होकर रचना-उत्सव मनाना चाहता है याकि न्यायिक परिणति में ढालना चाहता है।  उसकी विचारधारा और दृष्टि का दर्शन बताता है कि वह कौन-सी दुनिया रचने के लिए फिक्रमंद है। किस यथार्थ में वो सुकून से जीने की ख्वाईश रखता है, एक दुनिया जो नजर के सामने है जिससे वह या तो तल्ख़ तेवरों के साथ पेश आता है या रागात्मक याकि लचीला व्यवहार करता है। बनिस्बत उसके, किरदार की बानगी यह बताती है कि वह किस दुनिया का पक्षधर है ! 


दो दुनियाएँ उसके आमने-सामने हमेशा ही मौजूद रहती हैं। एक, जिसमें वह जीता है। दूसरी, जिसमें वह किसी खास मकसद से महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की बुनियाद रखता है। जिसके लिए वह एक गढ़े हुए मनचाहे किरदार के साथ जीना चाहता है। रचना जब अपने अन्तिम शिखर पर पहुँच चुकी होती है तब उसका फैसला पाठक या आलोचक को करना होता है कि रचना में जिया हुआ जीवन-जगत भोगे हुए यथार्थ से किस माने में कमतर या बेहतर है। किरदार के भीतर रहकर वो उसकी विकृतियों को अपनाने में दिलचस्पी लेता है। याकि किरदार के भीतर जीते हुए यथार्थ का चिंतन करता है जिसमें रचना के भीतर का जीवन जगत का फलसफा बेहद विस्तृत है। वहाँ जो कुछ भी ले जाकर तरतीबवार संजोकर रखा गया है वो किन मायनों में दो दुनियाओं के बीच एक-दूसरे से भिन्न है?

इन्हीं सवालों को हर रचनाकार जब-तब अपने-अपने रचना संसार में निहित निष्कर्षों तक  ले जाकर सहमति-असहमति की गुंजाइश पैदा करता है। ऐसे ही तमाम सवालों को लेकर अनामिका की रचना और पवन करण की रचना का पाठ एक बार फिर कुछ नए सन्दर्भों और नई दृष्टि के साथ प्रस्तुत है। तमाम बार ऐसा हुआ है कि किसी एक रचना का पुनर्पाठ उसके भीतर दबी साँसों के स्पंदन से पुनः जीवन की बची हुई स्मृतियों से हमारी चेतना को भर देता है और कई बार हमें आहत कर देता है।  हमारे इस पुनर्पाठ से आपकी संवेदना अगर कहीं आहत होगी तो इसके लिए क्षमा....देह के भीतर छिपे देह के आख्यान के साथ पाठ को वापस नए नजरिये से तर्क और विचार के बीच संगत करते हुए अनामिका की कविता “ब्रेस्ट कैंसर” पर एक जरूरी बहस.....


मनुष्य कुंठाग्रस्त मानसिकताओं का एक बड़ा पुंज है. जब-जब कुंठाएँ उफनाती हैं रोग उफनाकर निकलने को उतावले होकर बाहर आने को आतुर होते हैं. ऐसे में तमाम तरह की व्याधियाँ उत्पन्न हो ही जाती हैं याकि उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है. ये व्याधियाँ अपने भीतर उद्दाम क्षमता और निर्बाध-आवेग लिए आती हैं. तमाम मनुष्य जो उसके संपर्क में आते चले जाते हैं वे उन्हें किसी न किसी रूप में प्रभावित कर ही लेती है. जो उससे प्रभाव में नहीं आ पाते वे उन्हें लगातार अतिक्रमण के जरिये अपने अस्तित्त्व पर हावी नहीं होने देतीं. इस तरह उसके अस्तित्व और अन्य के प्रभाव के सम्पुट के बीच मनुष्य के रोगी न होने की तमाम स्मृतियाँ उसके अपने मस्तिष्क के भीतर एकत्रित की गयी तमाम तरह की सकारात्मक और नकारात्मक विशेषताओं से भरी होती हैं और मनुष्य उन्हें नजरंदाज नहीं कर पाता. इस स्थति में वो आत्मतुष्टि के लिए तर्क और विचार से उठाने और दबाने के लिए नए-नए तरीके ढूँढ़ ही लेता है. इन स्मृतियों में आदमी के अतीत और भविष्य का अंश छिपा होता है. इन स्मृतियों में वर्तमान से संवाद और उसमें मौजूद संरचनाओं, समय और अंतराल के बीच का एक लंबा उत्सर्जन और अशुद्धियों का स्खलन क्रमशः जारी रहता है. हाँ ये बात और है, कई बार एक समुदाय उन अशुद्धियों को अपने सामाजिक सरोकारों से जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित करने का कार्य भी सम्पादित करता है. बहस और संवाद के बीच यहीं से स्मृतियों के सकारात्मक और निष्क्रिय अंतर्भूत विषयों का कई बार टकराव होता है.


तात्पर्य है कविता स्मृतियों के ही एक दृश्य-बिम्ब का साक्षात अवलोकन है, जिसमें समय अंतराल और वर्तमान तथा भविष्य के गर्भ में छिपे पहलुओं पर बीजांकुर होता है. यदि कोई विषय कविता में सहज ही या सायास आया है उस पर स्मृतियाँ लगातार हावी रहकर अपनी जरूरी भूमिका अदा करती हैं. कविता में कई बार स्मृतियों की ऐतिहासिकता और प्रासंगिकता के चलते उसके अन्य तमाम पहलू दबकर रह जाते हैं. जिन्हें कविता अपने अंदर तब तक जीवित रखती है जब तक उसपर बातचीत का सही समय नहीं आता या भविष्य में सुरक्षित नहीं रहता. हमें अनामिका और पवन करण की कविता को इसी बुनियाद पर रखकर, कसौटी में कसकर देखने की जरूरत है. जब अनामिका कहती हैं....

दुनिया की सारी स्मृतियों को
दूध पिलाया मैंने,
हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर
मेरे इन उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में
जाले लगे!


दुनिया की सारी स्मृतियों को/ दूध पिलाया मैंने, यह पंक्तियाँ इस ओर साफ़ संकेत करती हैं कि वो आदिम सभ्यता में रची बसी स्मृतियों का स्तुति-गान कर रही हैं. स्मृतियों में छिपे इतिहास की गूँज यहाँ मौजूद है. और इस गान में उनका समर्पण भाव उन्हें चेतना के उस स्तर पर ले जाकर खड़ा कर देता है जहाँ अतीत का पुनर्जीवन कवि के अंतर्जगत में आरम्भ हो चुका है...किन्तु अवशेष स्मृतियों के साथ सबसे बड़ी बाधा है- निश्चित समय का निरंतर बने रहकर आभास होना. इसीलिए वे आगे कहती हैं “तब जाकर” यानी जब वह कार्य पूरी तरह संपादित होकर अपने प्रस्थान बिंदु तक पहुँच चुका है, स्मृतियों का पुनरुत्थान तब दिखाई देता है। वे आगे कहती हैं “मेरे इन उन्नत पहाड़ों की/ गहरी गुफाओं में” यानी स्मृतियों का पुनर्जीवन और उसके अंग अब वर्तमान के साथ संपर्क बना चुके है. स्मृतियों के भीतर ही वर्तमान तक आने के क्रम में तमाम तरह के विकार और दोषपूर्ण गत्यात्मकताएँ छिपी होती हैं. ऐसे में यदि कविता अपने इतिहास-संसार से ऐसा कुछ हासिल नहीं कर सकी है जोकि वर्तमान को अपने तर्क और विचार से सहमत कर सके तो द्वंद्वात्मकता और अस्थिरता के बीच विषय के साथ एकचित्त होकर भी ‘कविता का अस्तित्व’ अपने पूर्ण संकट में आना स्वाभाविक है. “जाले लगे” इसी तरफ एक जटिल होती हुई प्रक्रिया जान पड़ती है.


फिर जाले के साथ मौत की चुहिया का आना अत्यंत अस्वाभाविक-सा जान पड़ता है; लगता है जैसे एक अस्पष्ट व जबरन अर्थगर्भित थोपा हुआ बिंब एक खास प्रयोजन तक पहुँचने के लिए लादकर लाया जा रहा है. जाले के साथ मकड़ी यदि आती तो बात समझ में आ सकती थी.

'कहते हैं महावैद्य
खा रहे हैं मुझको ये जाले
और मौत की चुहिया
मेरे पहाड़ों में
इस तरह छिपकर बैठी है


महावैद्य स्मृतियों में आख्यायित ज्ञानसंपदा से संचालित एक सक्षम और निष्कर्ष तक जाने का बोध देने वाला शब्द-चरित्र है. यह सशक्त चरित्र इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि वह मौत को सार्वभौम जगत के जटिल प्रश्न ‘कैंसर’ को बचकाने तरीके से हल करते हुए उसे ‘चुहिया’ के रूप में ले आया है. यदि यहाँ मकड़ी आयी होती तो मौत का उद्घाटन करने में ज्यादा बेहतर स्थिति होती. मकडी तो चूहे से हर मामले में सशक्त और खतरनाक चरित्र हो सकता था. मगर मौत का अगंभीर वर्णन कविता में कहीं भी दहशत और तनाव नहीं पैदा करता. इसीलिए यह स्मृतियों का महावैद्य इतिहास से कटा हुआ और काल्पनिक तथा अवैज्ञानिक जान पड़ता है. कारण, मकड़ी एक मांसाहारी जंतु है और चूहा उससे कम घातक और हिंसक है. कैंसर रूपी व्याधि के जाले उन्नत पहाड़ों को यानि छातियों को खा रहे हैं. चूहे जाले नहीं बुन सकते. जबकि मकड़ी जाले बुनकर मांसाहार करने के लिए ही जानी जाती है. ये जाले जहरीले हैं. इनके एक-एक रेशे में जहर भरा है, जिससे उन्नत पहाड़ भीतर ही भीतर खोखले हो रहे हैं. ये जाले विकृतियों के जाले हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध व्याधि ‘कैंसर’ से है. यह कविता का असम्वेदनशील और सबसे अधिक कमजोर पक्ष रहा है जहाँ से कविता अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान कर रही है. अब जबकि बिम्ब और उसका प्रतिबिम्बन ही अवैज्ञानिक हो तब कविता से यह उम्मीद करना कि वह सही-सही अपने उद्देश्य को प्राप्त करे सिद्धांत और व्यवहार दोनों ही स्तरों पर बेहद कठिन और श्रमसाध्य कार्य है. जिसकी परिणति यह हुई कि कविता आगे बढ़कर निहायत गैरजिम्मेदाराना तरीके से एक पक्ष लेकर आती है..

कि यह निकलेगी तभी
जब पहाड़ खोदेगा कोई!


इस तरह के कथन से मालूम हो जाता है कि कविता एक गैरजरूरी संवाद और मजाकिया लहजे के साथ लगातार कल्पना-लोक में विचरण करने की मंशा से भरी है. जिसका हकीकत से कोई सम्बन्ध नजर नहीं आता और सबसे अधिक भयभीत करने वाली व्याधि ‘कैंसर’ से कोई जद्दोजहद भरा पीड़ाजनक सम्बन्ध स्पष्ट दिखाई नहीं देता है. बेहद अजीब है कि कोई कवि घातक बीमारी को लेकर इतना असंवेदनशील हो सकता है और उस पर तुर्रा यह कि

निकलेगी चुहिया तो देखूँगी मैं भी,
सर्जरी की प्लेट में रखे
खुदे-फुदे नन्हे पहाड़ों से
हँसकर कहूँगी-हलो,
कहो, कैसे हो? कैसी रही?


यह कहते-कहते कविता अतिवादी और विक्षिप्त होती चली गयी. जहाँ यह मानना होगा कि कवि का कल्पना-लोक इतना संकुचित और दृष्टि इतनी दोषपूर्ण हो सकती है ! जिस घातक बीमारी के जाले हटाने और चुहिया को मारकर निकालने की गारंटी चिकित्सक भी नहीं ले सकता, उसे कवि अपनी काव्यात्मक शल्य-क्रिया द्वारा कुशल औजारों के प्रयोग से बड़ी सहजता और शैशव-जिज्ञासा के निमित्त रहकर एक सुखद निश्चित परिणाम को प्राप्त भी कर लेता है. वाह रे कवि मन.. धन्य हो ऐसी कल्पना..


बात यहीं खत्म हो जाती तो भी ठीक था. अब जबकि कवि ने सर्जरी कर दी, उसे सफलता मिल गयी, तब वह गम्भीर हो जाने की बजाय और अधिक मनोरंजक व खिलंदड़ तरीके से पेश आता है.. भला ऐसी कौन -सी स्त्री होगी, जो अपने सौंदर्य के प्रतिमान और स्मृतियों तक को दूध पिलाकर पोसने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग को खोकर आह्लाद और आनंद की चरम अवस्था में जियेगी और सुखद अनुभूतियों की गल्प-कथा से बतरस करेगी? जिन उन्नत पहाड़ों से इतिहास और स्मृतियाँ निर्मित हुईं, जिन पहाड़ों ने भविष्य की सूखी परियोजनाओं में दरिया बहा दिए, जिन पहाड़ों के रस और सौंदर्य से स्वप्न, कल्पना और यथार्थ का रेशा-रेशा सींचा गया, जिन पहाड़ों के गर्भ-गृह में आदि से अनंत तक बसे पुरखे और पुश्तें लाखों योनियों के चक्कर काटकर बारम्बार दुनिया में विचरते हैं, जिन पहाड़ों पर टिकी हैं कायनात की सबसे जीवंत साँसें, जिन पहाड़ों में वे औषधियाँ छिपी हैं जो अबोध चेतना की शिराओं को बोधगम्य बनाती हैं और कमजोर को ताकतवर; आखिर उन पहाड़ों को काटकर भला कोई कैसे सर्जरी की प्लेट में सजाये उनकी अवहेलना और उपेक्षा कर सकता है? यह निर्मम और क्रूरतम उद्घाटन है जैसे किसी मानसिक रोगी ने अपने विकार और व्याधि के वशीभूत इतना घिनौना कृत्य और नृसंश घटना को अंजाम दिया हो. हमें यह कहने में हरगिज़ कोई गुरेज नहीं कि यह हिन्दी कविता-जगत में अब तक की सबसे क्रूरतम और अतिसंवेदंहीन प्रस्तुति है. जिसमें मानवीय होने की गरिमा व पक्षधरता कतई कहीं भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती.


इस प्रकरण के बाद कविता अपना मानसिक संतुलन कहें कि पूरी तरह खो देती है. वह आपे से बाहर जाकर एक विकृत दुनिया से वाबस्ता होती है, जहाँ उसे किसी भी तरह के विरोध की कोई संभावना कहीं दिखाई नहीं देती.

अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी!
दस बरस की उम्र से
तुम मेरे पीछे पड़े थे,
अंग-संग मेरे लगे ऐसे,
दूभर हुआ सड़क पर चलना!
बुल बुले, अच्छा हुआ, फूटे!
कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर।
मेरे ब्लाउज में छिपे, मेरी तकलीफों के हीरे, हलो !
कहो, कैसे हो?'


इस कथन में रोग से निजात पाने की भावना जो किसी बीमारी से जूझ रही स्त्री में होती है और निजात पाने के बाद समूची देह का निखार जिसे वह प्राप्त पुनः करती है वह पक्ष जैसे एकाएक खारिज कर कर दिया गया है. अनामिका ने जिन्हें कविता के आरम्भ में उन्नत पहाड़ की संज्ञा से पहचान दी उसे ही अब बुलबुले, अच्छा हुआ फूटे कहकर संबोधित कर रही हैं और इससे भी आगे जाकर मेरी तकलीफों के हीरे कहने से भी नहीं चूकतीं. इन विशेषणों से साफ़ जाहिर है कि कविता में संवाद करने वाले चरित्र का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. यहाँ किसी अंग के भंग होने पर पीड़ा की बजाय अतिवादी सोच की परिणति हुई है, जोकि वस्तुतः वास्तविक दुनिया में कतई सम्भव नहीं. इस स्थिति में संवाद के स्तर पर जाकर कुछ भी कहना एक साइकेडेलिक दुनिया की निर्मिति मालूम होता है. एक ऐसा संसार जहाँ व्यक्ति की चेतना में बसी छवियाँ आकार लेती हुई कुछ नई सृष्टि करती हैं. एक ऐसी सृष्टि जो वास्तविक संसार से पृथक है जिसमें मनुष्य अब तक जिया उससे बिल्कुल भिन्न, अलग, इतर। यहाँ मन में उठने वाले आवेग और संवेगों से लगातार नयी-नयी कल्पनाएँ अपना अस्तित्व ग्रहण करती हैं और मनोकूल परिस्थितियों में जीती हुई आनंद में सराबोर बार -बार उत्प्लावित होती हैं. वहाँ संवाद और भी गहराते हैं, जैसे अनामिका की ये पंक्तियाँ कहो, कैसे हो? कैसी रही?/अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! /दस बरस की उम्र से तुम मेरे पीछे पड़े थे,/अंग-संग मेरे लगे ऐसे,/दूभर हुआ सड़क पर चलना!/बुल बुले, अच्छा हुआ, फूटे!/कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर।


कविता में कतई अहसास तक नहीं होता कि कोई जहरीली चुभन थी. किसी असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिली हो. यहाँ ऐसा प्रतीत होता है मानो एक विकार भीतर छिपा था. जिसे बाहर निकालकर उसके बेघर होने की कामना से उत्सव मनाया जा रहा है. आखिर ये तकलीफों के हीरे हैं क्या? यही अब तक स्त्री के उपहार या फिर जगत-निर्मिति के आधार या फिर इतिहास में सबसे मौजूं और विश्वासपात्र थे, जो अब घृणा के दायरे में लाकर रख दिए गए हैं. यह तकलीफों का कैसा प्रचलन है जिसमें मनुष्यता की सारी सीमाएँ लाँघकर कविता अतार्किक और बड़बोली होती चली गयी है. जब स्मृतियों को दूध पिलाने की कल्पना में कविता लेकर जाती है तब एक भव्य प्रतिमा का अहसास होता है, एक दिव्यता की अनुभूति होती है, एक विशालता में जीवन का सबसे सुंदर क्षण कुलांचें लेता दिखाई देता है, एक स्त्री द्वारा मनुष्य के भीतर उन्मुक्त और तरंगित जीवन-रस का आस्वादन होता है. वह लम्हा मानो तमाम खुशगवार पलों पर भारी है; मगर जैसे ही मौत की चुहिया का जिक्र आता है मानो सारी कल्पनाओं के ढाँचे को कुतरने और खोखला करने का भी व्याप्त करने का प्रयास किया जाता है. किन्तु एक स्वप्न में ही संभव है चूहे का इतने बड़े ढाँचे को बड़ी सहजता से भीतर घुसकर उसे कुतरना. मगर फिर संदेह होता है कि यदि ये चुहिया ही मौत का रूप धारण कर आई है तो फिर ये जाले किसने लगाए हैं? वो मकड़ी कौन थी जो पूरी कविता में कहीं दिखाई नहीं देती मगर जाले दिखाई देते हैं. ऐसा लगता है मानो कविता में फैंटसी-जगत के किवाड़ खटखटाते हुए यह ख्याल कि अब कविता अपने समूचे वजूद को लेकर उसमें प्रवेश कर गयी है, बेहद भटकाव पैदा करने वाली तमाम स्थितियाँ लेकर आता है. कविता बेचैन करने की बजाय संरचनागत त्रुटियों से भरी दिखाई देने लगती है. वह जिस प्रयोजन को पाना चाहती है वहाँ तमाम अड़चनें साफ़ झलकती हैं.


जैसे कि स्मगलर के जाल में ही बुढ़ा गई लड़की
करती है कार्यभार पूरा अंतिम वाला-
झट अपने ब्लाउज से बाहर किए
और मेज पर रख दिए अपनी
तकलीफ के हीरे!


ये तकलीफ के हीरे यहाँ स्तन हैं या फिर कैंसर की गाँठें. कुछ भी स्पष्ट नहीं है. अगर ये कैंसर की गाँठें हैं तो इन्हें वह स्तनों से बाहर नहीं निकाल पाई बल्कि उसके साथ ही स्तन देह से काटकर बाहर निकाल दिए गए. यह अंग का काटकर देह से अलग किये जाने का जो क्रम है वह हमेशा ही एक अस्वाभाविक प्रक्रिया रही है. किसी भी कविता के फैंटसी जगत की निर्मिति में कला के तीन क्षण हमेशा मौजूद होते हैं – एक, जिसमें जहाँ चेतन-अवचेतन में बसे दृश्य-बिम्ब होते है. दूसरा, जहाँ इन बिंबों के साथ कुछ विचार आते हैं । तीसरा, अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए बिंबों, विचारों को लेकर कल्पना-लोक निर्मित होता है. यह क्षण इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहाँ वैज्ञानिक चेतना के द्वारा कविता अपने अन्तिम पड़ाव तक पहुँचती है. और उद्देश्य को पूरा करने के लिए मूल आधारों को लेकर सभी के संयोजन से लक्षित होती है.


इस धरातल पर भी यह कविता अपने पूर्ण रूप में खुद को अभिव्यक्त कर पाने में पूरी तरह प्रेरक-तत्वों और फैंटसी के सशक्त माध्यमों को ग्रहण नहीं कर सकी है. हाँ, कई बार यह भ्रम हो सकता है कि कविता की इस योजना में सब कुछ ठीक-ठीक प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि कविता का रूप और अंतर्वस्तु के बीच भाषा, शिल्प संवेदना का संयोजन एक निश्चित मात्र में किया गया है. किन्तु उद्देश्य को यह योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने के बावजूद यथार्थ की संश्लिष्ट संरचना को भेद नहीं पाती. स्मगलर शब्द अपने औचित्य को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका. वह केवल एक खाली स्पेस भरने के लिहाज से आगे आये शब्दों की कतार को थोड़ा और आगे खिसकाने का काम अवश्य करता है. जबकि यहाँ बिना इस शब्द के भी अर्थ में कोई बदलाव, भटकाव, अस्पष्टता कहीं दिखाई नहीं देती। यदि स्मगलर शब्द हटा भी दिया जाए तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जाले तो कविता के आरम्भ में बिना किसी ऐसी संज्ञा से जुड़े हुए भी अपनी बात कहते हैं, जैसे कि जाल में ही बुढ़ा गई लड़की. यहाँ अगर कविता पहले ही अपने अर्थ को लेकर तटस्थ होती तो ऐसे किसी सहयोगी विशेषण ‘स्मगलर’ की जरूरत नहीं पड़ती. एक और बात –

जैसे कि निर्मूल आशंका के सताए
एक कोख के जाए
तोड़ लेते हैं संबंध
और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है!

यहाँ कोख के जाए का जो सम्बन्ध स्तनों में जीवित व्याधि से जोड़ा जा रहा है, तो यह एक अवैज्ञानिक सोच का परिणाम है. क्योंकि कोख से जन्म लेने वाली संतानें अपने नैसर्गिक रूप में स्वभाविक चरण पूरे करते हुए समूची कल्पनाओं से भरी रोमांचित करती हुई देह से बाहर आती हैं और आनंद की अनुभूति से भर देती हैं स्त्री-देह. यहाँ स्त्री देह में प्रजनन के समय की पीड़ा को कविता अपने भीतर व्याधि की पीड़ा से जोड़कर देखती है. जोकि निहायत गलत उदाहरण के बतौर पर पेश किया गया है. संतानें कोख से बाहर इसलिए नहीं आतीं कि वे देह को दुःख पहुँचा रही हैं, बल्कि उनके प्रजनन के सभी चरण पूरे होते ही वे अपने स्वाभाविक स्वरूप में देह से बाहर आती हैं; जबकि व्याधि यदि अपने समस्त चरण देह में पूरे करती तो वह देह को पूरी तरह खा जाती, उसके प्राण हर लेती, उसे लाश बनाकर छोड़ती. यदि स्त्री अपना दूध पिलाकर इस व्याधि को पोसती तो फिर वह व्याधि उसका खून क्यूँ पीती? उसका जिस्म क्यूँ निचोड़ती? उसकी देह के भीतर अनंत पीड़ाओं के गुच्छे रक्त-शिराओं में क्यूँ उपजाती? चूंकि कविता का मनस्ताप ज्यादा विद्रोही होने का भी प्रयास करता है, शायद इसीलिए नई-नई मुश्किलों में लगातार फँसता चला जाता है.

जाने दो, जो होता है सो होता है,
मेरे किए जो हो सकता था-मैंने किया,
दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने!
हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुपफाओं में!


कविता में अर्थ को पाने की जो तकनीक, यांत्रिकता, उत्पादक क्षमता यहाँ अपनाई गयी हैं निश्चित ही उनमें कहीं भी साम्यता नहीं दिखाई देती। वे आपस में ही एक-दूसरे के साथ अंतर्विरोधों को भोगती हुई आपस में गुत्थमगुत्था हैं और बेचैनी में कोई हल जैसे नहीं सूझता इस स्थिति में कविता कह उठती है - जाने दो, जो होता है सो होता है, मानो कविता बनने के क्रम में तमाम नए तरह की चुनौतियाँ सामने आती गयीं जिनसे कविता उलझना नहीं चाहती. यह भाग्यवादी और निरुपाय होने की ओर अपराधी भावना का आत्मसमर्पण से भरा एक संकेत है. फिर अंत में अपने अतीत का वही स्वर्णकाल भरा गान- “दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने!” आरम्भ होता है. और एक तयशुदा संतोष के साथ कविता अपने भीतर सुखद क्षणों में जीती अपने दुखों के साथ एक आत्मतोष भरे लहजे याकि संवाद के साथ समाप्त होती है

हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में!


कविता का यह चरित्र निहायत फिल्मी और आदर्शवादी लगता है, किन्तु यथार्थ और वैज्ञानिक चेतना से भरा तो हरगिज़ नहीं हो सकता. कविता यह माँग भी नहीं करती कि पाठक क्या सोचता है. वह तो जुनून में अपनी स्क्रिप्ट के भीतर गम्भीर समस्या को नाटकीय तरीके से लेकर आती है और जितनी नाटकीय संवादधर्मिता उसके समूचे दृश्यों में निभाई गयी है उतने ही नाटकीय अंदाज़ में उसके समाधान को भी दर्शाया गया है. इस कविता की पटकथा सुनकर विचार और यथार्थ चेतना से कमजोर पक्ष वाले व्यक्ति को भले ही संतोष मिले, एक सुख का अनुभव हो, किन्तु इस समस्या के प्रति जागरूक व्यक्ति को यह हल और तार्किक परिणति कतई रास नहीं आयेगी.

हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में!
लगे तो लगे, उससे क्या!
दूधो नहाएँ
और पूतों फलें
मेरी स्मृतियाँ!


लगे तो लगे, उससे क्या! स्त्री देह के भीतर दुःख में भी सुख का साझा. अतीत की गौरव-गाथा के शिलान्यास के साथ वर्तमान की दैहिक-व्यथा की तिलांजलि. काश, यथार्थ की कटु रौशनाई इस दृश्य पर पड़ी होती; तो इन सुखद यात्राओं की स्वप्निल रंगीन पॉलिश उतर गयी होती. परिकल्पना के बंधे पुलिंदे भरभरा कर हाथ से छूट गए होते तो अच्छा होता. कम से कम स्त्री-देह जो इस पीड़ा के साथ एक जरूरी अभियान में शामिल लड़ रही है और अंत तक लड़ेगी, जब तक जीत या हार नहीं होती, उसे ये सुखद कल्पनाओं के घोड़े रौंदकर न चले गए होते. अतीत का सुख उसे नहीं अखरता.

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