Sunday, August 31, 2008

स्त्रीविमर्श: एकालाप : कई नाम दिए उन्होंने मुझे





एकालाप -








कई नाम दिए उन्होंने मुझे









उन्होंने मुझे
एक नाम दिया - माँ
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
बहुत सारी स्वतंत्रताएँ
दुहने को ज़मीन की तरह मुझे
और उपेक्षित छोड़ देने की




*




उन्होंने मुझे
दूसरा नाम दिया - बहन
और अपने लिए सुरक्षित कर लिए
बहुत सारे अधिकार
मेरा अधिकार हड़पने के
और उपेक्षित छोड़ देने के .



*




उन्होंने मुझे
तीसरा नाम दिया - पत्नी
और अपने लिए सुरक्षित कर लिया
दुनिया भर का प्रभुत्व और वर्चस्व
मेरा सर्वस्व हरण करने को
और उपेक्षित छोड़ देने को।



*




उन्होंने मुझे
चौथा नाम दिया - बेटी
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
स्वर्ग की सीढियां, करके कन्यादान
बाँध कर पराये खूंटे पर
अरक्षित मुझे।



*


उन्होंने मुझे
एक और नाम दिया - वेश्या
और आरक्षित कर ली अपने लिए
भूमिका पतितपावन, उद्धारक और मसीहा की
धकेलते रहने को बार बार
मुझे उनकी अपनी वासना के नरक में .......




-ऋषभ देव शर्मा





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6 comments:

  1. बहुत ही सुंदर लिखा कविता जी,दिल में उतर गई कविता.
    आलोक सिंह "साहिल"

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  2. सही सामाजिक यथार्थ की कविता।

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  3. सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई।

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  4. कवि की ओर से सभी के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ.पुन: स्वागत कर सन्तोष होगा.

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  5. रचना को पसंद करने
    और सराहने के लिए
    कृतज्ञ हूँ.

    स्नेह बनाए रखें.

    >>> ऋषभ

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  6. नारी के विभिन्न रूप तो हैं पर वही नियति! हाय नारी तेरी वही कहानी....... बधाई चिंतनपरक कविता के लिए।

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