Tuesday, February 3, 2009

मुझे पंख दोगे ?

एकालाप




मुझे पंख दोगे ?
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मैंने किताबें माँगी
मुझे चूल्हा मिला ,
मैंने दोस्त माँगा
मुझे दूल्हा मिला.



मैंने सपने माँगे
मुझे प्रतिबंध मिले ,
मैंने संबंध माँगे
मुझे अनुबंध मिले.



कल मैंने धरती माँगी थी
मुझे समाधि मिली थी,
आज मैं आकाश माँगती हूँ
मुझे पंख दोगे ?
ऋषभ देव शर्मा

8 comments:

  1. आप सादर आमंत्रित हैं, आनन्द बक्षी की गीत जीवनी का दूसरा भाग पढ़ें और अपनी राय दें!
    दूसरा भाग | पहला भाग

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  2. Nihshabd kar diya aapne.......

    kya kahun......ekdam sateek .

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  3. आज की नारी को समाधि नहीं आकाश और पंख तो मिलेंगे ही क्योंकि समाज और नारी - दोनों में जागृति और बदलाव आया है। अच्छी कविता के लिए बधाई।

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  4. भावपूर्ण शब्द संयोजन एवं तुलनात्मक शैली के माध्यम से कविता का उद्देश्यपूर्ण अंत निस्संदेह सराहनीय है. कविता जी ..
    -विजय

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  5. ऐसी सुंदर कविता के लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है....बहुत बहुत बधाई।

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  6. वाह वाह बहुत सुंदर.

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आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

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