Tuesday, May 26, 2009

औरत की दुनिया (३)



औरत
की दुनिया



सुगन्धी की कहानी : उसकी जुबानी

सुधा अरोड़ा





गतांक से आगे


मेरी सास को हिंदी बिल्कुल नहीं आती थी और मुझे तमिल भाषा का ज्ञान नहीं था । हम दोनो घर में इशारों से एक दूसरे को अपनी बात समझाते और समझते थे , लेकिन मैं एक-डेढ़ साल में अच्छी तरह से तमिल बोलना सीख गई । अब तो मैं थोड़ा बहुत तमिल पढ़ भी लेती हूँ । फ्रांसिस के साथ शादी के बाद मेरे घरवालों ने चोदह साल तक मुझसे कोई संबंध नहीं रखा । वैसे फ्रांसिस के तमिल समाज में भी दहेज का चलन था । उस समाज में आनेवाली बहू के साथ भारी दहेज की उम्मीद रखी जाती थी । मैं तो अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं आई थी । इधर फ्रांसिस के पिता भी कर्ज में डूबे थे । बावजूद इसके उन्होंने मेरे साथ हमेशा बहुत अच्छा बर्ताव किया ।



एक साल के भीतर मैने एक बेटी को जन्म दिया और पाँच साल में मैं तीन बच्चों की माँ बन गई । कुर्ला में रहते वक्त ही मुझे पता चल गया था कि फ्रांसिस शराब का आदी है । लेकिन क्या करती ? कहाँ जाती ?अब तो वापस लौटना नामुमकिन था । मेरी कोई सहेली या परिचित कोई भी ऐसा नहीं था जिससे मैं अपनी तकलीफ बाँट पाती !



अपनी मर्जी से शादी करनेवाली लड़कियों के साथ अक्सर ऐसी परेशानियाँ आती हैं । ऐसी शादियाँ सफल रहीं तो ठीक है । लेकिन अगर कोई समस्या उठ खड़ी हो , परिवार में झगड़े झमेले होते रहें , अलगाव या तलाक की नौबत आ जाए तो ऐसी जुल्म की मारी औरतों का कोई ठिकाना नहीं रहता । अगर लड़की अपने माँ - बाप से मदद या सहारा माँगती है तो उसे जवाब मिलता है कि अपनी हालत के लिए तुम खुद जिम्मेदार हो । तुमने हमसे पूछकर तो शादी नहीं की । इसलिए अपने किये का नतीजा खुद भुगतो । पति से झगड़ा , सास - ससुर का दुराव और माता - पिता का कोई आसरा नहीं । ऐसे में वो क्या करे ? उसकी स्थिति ‘ न घर की न घाट की ’ वाली हो जाती है । दूसरी तरफ अगर माँ - बाप की मर्जी से , उनके द्वारा चुने गए लड़के के साथ शादी करने पर भी इसी तरह की समस्याएँ उठ खड़ी हों तो यही माँ - बाप कहते हैं कि हम क्या करें ? उसकी तो किस्मत ही खोटी है । इस तरह औरत पर दो तरफा मार पड़ती है । दोनो ही स्थितियों में जिम्मेदार वही ठहरायी जाती है ।



1975 में जब मेरा तीसरा बच्चा पैदा हुआ , फ्रांसिस देवीदयाल कंपनी में काम करते थे । यूनियन का लीडर होने के कारण उन्हें काम पर से निकाल दिया गया । अब हमारी माली हालत और भी बिगड़ गई । मेरे पति पहले भी पीते थे पर अब काम न होने पर शराब पीना जैसे रोज की बात हो गई थी । नौकरी छूट जाने के बाद फ्रांसिस की बेरोजगारी का दौर शुरु हो गया और घर में जरुरी चीजों का भी अभाव रहने लगा । तनाव के इन दिनों में रोज घर में मारपीट - झगड़ा होने लगा । शुरु - शुरु में फ्रांसिस को मारपीट करना बुरा भी लगता था । वो पछताता भी था । मुझसे माफी माँग लेता और मुझे खुश करने के लिए खुद खाना बनाकर मुझे खिलाता । लेकिन लम्बे अरसे तक बेरोजगार रहने से , उसमें निराशा और कुंठा बढ़ती गई ।



नौकरी छूटने के बाद से ही वह काम धंधे की खोज में लगातार जुटा रहता था , लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पाई । उसी की कोशिश का नतीजा था 1982 में होटल की शुरुआत , जो बाद में हमें चलाना पड़ा । होटल चलाने में सुबह 5 बजे से लेकर रात 9 बजे तक काम होता था । उसमें ज्यादा कमाई न हो पाने से खीझ उठना और होटल की कमाई में से शराब पीना चलता रहता था । इन सब कमजोरियों के बावजूद फ्रांसिस बच्चों को बहुत प्यार करता था । उनकी जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करना, विभाग में रहनेवाले लोगों की मदद करना उसका स्वभाव था । अपने घर में खाने को हो या न हो , फिर भी दूसरों को मदद करने में वह आगे रहता । लेकिन लम्बे अरसे तक बेरोजगार रहने से , उसमें निराशा और कुंठा बढ़ती गई ।



किसी भी तरह की नौकरी न मिलने के कारण उन्हीं दिनों फ्रांसिस ने शराब बेचना शुरु कर किया । मैने इसका बहुत विरोध किया , पर मेरी एक न चली । कुछ दिनों तक फ्रांसिस ने बाहर कहीं शराब बेचनी शुरु की , लेकिन वहाँ झगड़ा - टंटा होने लगा । तब फ्रांसिस ने घर में ही शराब बेचना शुरु कर दिया । शराब बेचना एक ऐसा काम था जिसके लिए मेरी आत्मा कभी गवाही नहीं देती थी । इसका नतीजा यह हुआ कि मेरा विरोध बढ़ता गया । मैं जितना विरोध करती , उतनी ही मुझे मार पड़ती । मैं फ्रांसिस को भला - बुरा कहती , उसे ताने मारती , वो और भी भड़क उठता । नतीजा - ज्यादा शराब पीना , जमकर मारना पीटना । यह वो दौर था जब मैं रोजाना फ्रांसिस से पिटती थी । घर में शराब बेचने का आलम यह था कि ज्यादातर शराब खुद फ्रांसिस और उसके यार दोस्त मुफ्त में पी जाते थे । फ्रांसिस की गैर मौजूदगी में कभी - कभी मुझे मन मारकर ग्राहकों को शराब देनी पड़ती थी । बहुत लड़-झगड़ कर , मार खाकर किसी तरह एक - दो साल में शराब बेचने का क्रमशः बंद करवाया ।





क्रमशः


2 comments:

  1. यह जीवट और जूझ अनेक साधारण औरतों में है. वे ही असली समाजनेत्रियाँ हैं.

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