Sunday, June 14, 2009

गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत  

4 comments

एकालाप



गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत


पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से
बड़ी संडासी में
पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड
जकड़कर .


माँ धौंक रही
हवा से फुलाकर
धौंकनी लगातार.


भट्टी तप रही .
दुपहरी भी तप रही .
तप रहे हम दोनों.


मैं और तुम
आमने - सामने ,
तुम्हारे हाथ में घन ,
मेरे हाथ में भी
उतना ही भारी घन.


पिता ने भरी हुंकारी.
उठे दोनों घन.
चक्राकार घूमे हवा में.
दनादन पड़ने लगे
तपते लौहखंड पर
एक के बाद एक ,
क्रम से ,
दुगुने दम से.


तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में ,
मेरी आँखें तुम्हारी आँखों में.
त्राटक! मारणमन्त्र! सम्मोहन!
लोहा पिटता रहा,
कुटता रहा,
ढलता रहा.
साँस फूलती रही
मेरी भी
तुम्हारी भी .


एक गोले में घिरे हम.
सब घेरकर पुकार रहे
तुम्हें उकसाते हुए,
मुझे शाबासी देते हुए.


घन बिजली की तरह चले.
चिंगारियाँ फूटीं.
साँस फूलती रही.
पसीना चू पड़ा तुम्हारी झबरी मूँछों से.
तरबतर हो गई मेरी छींट की कोरी अँगिया.


ढल गया लोहा.
बन गया औजार.
पिता ने डाल दिया पानी में
बुझने को.


चिहुँक उठा सारा कबीला .
न तुम हारे
न मैं हारी ,
न तुम जीते
न मैं जीती.
तुम्हारा पौरुष
मेरे बल से टकराकर
हो गया दुगुना.


पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है !


लोहा एक बार फिर
लोहे से टकरा रहा है.
आग के फूल खिल रहे हैं
मेरी नज़रों में ,
तेरी निगाहों में.


सच में तू मेरी जोट का है !
0



- ऋषभ देव शर्मा 
 




I'm reading: गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीतTweet this! View blog reactions View blog reactions
Links to this post **************************************************************************************************************************************

What next?

You can also bookmark this post using your favorite bookmarking service:

Related Posts by Categories



4 comments: to “ गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत

Post a Comment

आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

Related Posts with Thumbnails