Tuesday, October 20, 2009

मुझे मेरा पीहर लौटा दो


एकालाप

मणिपुरी स्त्री का पर्वगीत


मुझे मेरा पीहर लौटा दो



कब से देख रही हूँ रास्ता
माँ के घर से बुलावा आएगा
मैं पीहर जाऊँगी
सबसे मिलूँगी
बचपन से अपनी पसंद के पकवान
जी भर खाऊँगी
निंगोल चाक्कौबा पर्व मनाऊँगी


बरस भर से देख रही हूँ रास्ता


याद आता है बचपन
बड़ी बहन इसी दिन हर बरस आती थी
दूर पहाडी पर बसे खिलखिलाते गाँव से
घाटी के घर में,
भाभी इसी दिन हर बरस जाती थी
पर्वत शिखर से बतियाते अपने पीहर
ससुराल की घाटी से


कितनी बार कहा इमा से
कितनी बार कहा इपा से
कितनी बार कहा तामो से


मैं इतनी दूर नहीं जाऊँगी
इतनी दूर ब्याही गई तो जी नहीं पाऊँगी


पर ब्याही गई इतनी ही दूर
काले कोसों
कहाँ घाटी में माँ का घर
कहाँ नौ पहाड़ियों के पार मेरी ससुराल


सबने यही कहा था
निंगोल चाक्कौबा पर तो हर बरस आओगी ही
[इस दिन मिट जाती हैं सब दूरियाँ
घाटी और पहाड़ी की]
सारी सुहागिनें इस दिन
न्यौती जाती हैं माँ के घर


प्रेम से भोजन कराएगी माँ अपने हाथ से
उपहार देगा भाई


हमारे मणिपुर में इसी तरह तो मनाते थे
निंगोल चाक्कौबा पिछले बरस तक
विवाहित लड़कियों [निंगोल] को घर बुलाते थे
भोजन कराते थे [चाक्कौबा]


घाटी और पहाड़ी का प्यार
इस तरह
बढ़ता जाता था हर बरस
सारा समाज मनाता था मणिपुरी बहनापे का पर्व


पर इस बार
कोई बुलावा नहीं आया
कोई न्यौता नहीं आया


भाई भूल गया क्या?
माँ तू कैसे भूल गई
दूर पहाड़ी पार ब्याही बेटी को?
मैं तड़प रही हूँ यहाँ
तुम वहाँ नहीं तड़प रहीं क्या?


माँ बेटी के बीच में
भाई बहन के बीच में
पर्वत घाटी के बीच में
यह राजनीति कहाँ से आ गई अभागी???


क्यों अलगाते हो
पर्वत को घाटी से
भाई को बहन से
माँ को बेटी से ???


मुझे मेरा पीहर लौटा दो
मेरी माँ मुझे लौटा दो
मेरा निंगोल चाक्कौबा लौटा दो !!!


कब से देख रही हूँ रास्ता ........


- ऋषभ देव शर्मा








[दीपावली की शुभ कामनाएँ देने के लिए प्रो. देवराज को इम्फाल फोन किया तो वे उत्साहहीन से लगे, पूछने पर पहले तो टालते रहे , बाद में बताया कि इस बार वहाँ भैया दूज जैसा परन्तु सामाजिक धार्मिक एकता का पर्व निंगोल चाकऔबा सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जा रहा है . देर तक बातें हुईं . फोन कट भी गया... पर एकालाप चलता रहा.  > ऋ.]

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10 comments:

  1. प्रष्ठभूमि को मन में रख कर पढने पर एक मार्मिक अनुभव होता है.

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  2. बहुत जबर्दस्‍त लिखा है। सारी व्‍यथा देशकाल और स्थितियों के अलग होने पर भी बहुत साम्‍य लिए हुए देखी जा सकती है अन्‍य जगहों के संदर्भ में। पीहर मात्र मां का घर नहीं बल्कि वो नीड़ है जहां एक स्‍त्री सारे दुखभूल कर कुछ देर के लिए आंख बंद कर सांस ले लेना चाहती है। उन अनगिनत औरतों के खो गए पीहर की त्रास‍दी बयां कर दी जो शायद खुद कभी कह न पातीं।

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  3. मार्मिक अभिव्यक्ति! जो बदलते वक्त को अंकित कर रही है।

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  4. राजनीति तो हर जगह घुस जाती है, इसका काम ही यही है। बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति दी आप ने पीड़ित को !
    _________________________________
    कलेवर बदलिए। सब कुछ बड़ा बिखरा अजीब सा लगता है।

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  5. पीहर छूटना जैसे एक पौध को नए परिवेश में रोपना है .हर स्त्री जानती है यह पीडा .अनचाही दीवार जब रास्ते में आ जाये तो बेटी कैसे जिए ....

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  6. लगभग हर बेटी की यही पीडा ...और इस पीडा को सहने को तैयार भी करती है अपनी बेटी को ...मार्मिक अभिव्यक्ति ..!!

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  7. कविता जी,
    ये कविता पढ़कर आशा भोंसले का ये गाना न जाने क्यों याद आ गया.. अब के बरस भैया को भेज बाबुल..


    जय हिंद...

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  8. ओह!! खुशदीप जी ने मेरे मन की बात कह दी....कविता पढ़ती जा रही थी और मन में मेरा पसंदीदा गीत "अबके बरस भेज भैया को बाबुल....सावन में लीजो बुलाए" ..याद आ रहा था ...आँखें नाम कर देने वाली रचना...

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  9. bhavna ke saath sunder varnan kiya hai...

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  10. एकदम से छू लेने वाली रचना...

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आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

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