Friday, December 18, 2009

मर्दिता

एकालाप

मर्दिता


बहुत मार खाई मैंने
तुम्हारे लिए ,
तुम्हारे प्यार के लिए.


मैंने सपने देखे ,
तुम्हें अपना माना
और बहुत मार खाई
पिता के हाथों,
समाज के हाथों भी :

भला यह भी कोई बात हुई
कि औरत सपने देखे
कि औरत प्यार करे
कि औरत इज़हार करे!


मेरा अंग अंग रोता रहा
एक स्पर्श के लिए
और तुम
रौंदते रहे मुझे
मिट्टी समझकर.


बहुत मार खाई मैंने
तुम्हारे लिए,
तुम्हारे हाथों!

- ऋषभ देव शर्मा



8 comments:

  1. सुन्दर कविता। सटीक अभिव्यक्ति!

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  2. भला यह भी कोई बात हुई ...औरत सपने देखे , प्यार करे और इजहार ना करे ...:)...!!

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  3. kyaa gajab kii kavitaa likhii hai sair aapane . kamaal kar diyaa. merii badhaaii swiikaar kare.

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  4. दर्द की बढ़िया अभिव्यक्ति !

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  5. दर्द का समंदर - बेहद सटीक - अति सुंदर. कवियत्री को सादर धन्यवाद्

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