मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

क्या कोई और रास्ता नहीं है ?

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यह कैसे तय किया जाए कि माँ की पुरानी भूमिका अच्छी थी या आज की भूमिका अच्छी है? पहली भूमिका में माँ का जीवन त्याग-तपस्या से भरा होता है और दूसरी भूमिका के कारण दुनिया में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जिन्होंने माँ-बाप का प्यार जाना ही नहीं। जाहिर है, जिसे प्यार नहीं मिला, वह प्यार दे भी नहीं सकता। क्या कोई और रास्ता भी है, जिसमें माँओं को अपना जीवन स्थगित न करना पड़े और बच्चों को भी भरपूर प्यार मिल सके?






माँ का जीवन



तीन दिन पहले हमसे एक भारी अपराध हुआ। घर की मरम्मत कर रहे एक कारीगर ने पुरानी खिड़की को तोड़ कर नीचे गिराया, तो एक कबूतर का घोंसला भी उजाड़ दिया। तिनकों का वह बेतरतीब समवाय फर्श पर आ गिरा जो उस कबूतर और उसके दो नवजात शिशुओं का घर था। खिड़की के एक टुकड़े पर दोनों शिशु, अपनी आसन्न नियति से अनजान, अपने पैर हिला-डुला रहे थे। अभी उनकी आँखें भी नहीं खुली थीं। पंखों में कोई जान नहीं थी। यह चार्ल्स डारविन का दौ सौवाँ जन्मदिन है, इसलिए मैंने अनुमान लगाया कि जैसे हम मनुष्यों के पूर्वजों ने कभी यह तय किया होगा कि सामने के दोनों पैरों का प्रयोग हाथों के रूप में करना चाहिए, वैसे ही पक्षियों के पुरखों ने कभी यह इच्छा की होगी कि सामने के दोनों पैरों का प्रयोग पंख के रूप में करना चाहिए। तय किया था या इच्छा की थी, यह कहना शायद ठीक नहीं है। यह तथा पशु-पक्षियों में इस तरह के अन्य परिवर्तन जीवन के विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया में ही हुए होंगे। मैंने इसके पहले पक्षियों के अंडे तो देखे थे, पर उनके नवजात शिशु नहीं। उस दिन देखा और मन में ये खयाल आए, तो यह बात भी याद आई कि देखना ही जानना है। पढ़ा है कि दर्शन शब्द की उत्पत्ति जिस धातु से हुई है, उसका अर्थ भी देखना ही है।


अपराध बोध की शुरुआत तब हुई जब हम यह सोचने लगे कि अब इन नवजात शिशुओं का क्या होगा। क्या ये जीवित रह पाएँगे? वे जिस अवस्था में थे, हम उनके लिए कुछ नहीं कर सकते थे। क्या ये भी विकास की बलि वेदी पर शहीद हो जाएँगे? हमने उनके घोंसले का जैसा-तैसा पुनर्निर्माण किया और कमरे से दूर हट कर इंतजार करने लगे कि शायद इनकी माँ आए और इनकी देखभाल करने लगे। जब अंधेरा हो आया और वह नहीं लौटी, तो हम निराश होने लगे। तभी याद आया कि एक दूसरी खिड़की पर बनाए अपने घोंसले में एक दूसरी कबूतर ने अंडे दिए हुए हैं। पत्नी ने सुझाया कि इन बच्चों को उसी घोंसले में रख दिया जाए। शायद कोई सूरत निकल आए।



अगले दिन दोपहर को जो दृश्य दिखाई पड़ा, उससे हम अभिभूत हो गए। एक कबूतर उन दोनों बच्चों के मुँह बारी-बारी से अपने मुँह में डाल कर दुलार कर रही थी। यह दृश्य अत्यन्त आनंददायक था। हममें से किसने युवा माताओं को अपने नवजात शिशुओं को दुलारते-चूमते-उठाते-बैठाते नहीं देखा होगा! उस वक्त स्त्री के चेहरे पर ही नहीं, पूरे अस्तित्व में आह्लाद की जो लहर दौड़ती रहती है, उसका कोई जोड़ नहीं है। यह वह विलक्षण सुख है जो कोई माँ ही अनुभव कर सकती है। कबूतरों की मुद्राओं में इतनी बारीक अभिव्यक्तियाँ नहीं होतीं। क्या पता होती भी हैं, पर हम उन्हें पढ़ना नहीं जानते। सचमुच, हमारे अज्ञान की कोई सीमा नहीं है। हमारे आसपास कितना कुछ घटता रहता है, पर हम उससे अवगत नहीं हो पाते। अपने व्यक्तित्व की कैद दुनिया की सबसे बदतर कैद है। थोड़ी देर बाद हमने पाया कि कबूतर दोनों बच्चों पर बैठ कर उन्हें से रही है। दोनों अंडे भी पास ही पड़े हुए थे। शायद उनके खोल में पल रहे दो जीवन भी सुरक्षित निकल आएं। अब हमने चैन की साँस ली कि हम हत्यारे नहीं हैं।



वह बेचारी कबूतर दिनभर बैठी बच्चों के जीवन में ऊष्मा भरती रही। यह तय करना असंभव था कि उसने दिनभर कुछ खाया या नहीं। हो सकता है, बीच-बीच में कुछ देर के लिए घोंसले से बाहर निकल कर वह कुछ चारे का जुगाड़ कर लेती हो। हो सकता है उसका सामयिक प्रेमी ही कुछ ला कर वहाँ रख जाता हो। जिस बात ने मुझे सबसे अधिक परेशान किया, वह यह थी कि अगर यह माँ कबूतर एक हफ्ते भी इन बच्चों (यह भी पता नहीं कि ये बच्चे उसी के थे या उसने उन्हें अनायास ही गोद ले लिया था) को सेती है, तो हम मनुष्यों की भाषा में उसके सात कार्य दिवस नष्ट हुए। अगर वह कहीं नौकरी करती होती, तो उसके सात दिन के पैसे कट जाते। इन सात दिनों तक वह ममता की कैद में अपने छोटे-से घोंसले तक सीमित रही और मुक्त आकाश में उड़ने तथा अठखेलियाँ करने से वंचित रही। इसका हरजाना कौन देगा? यह तो तय ही है कि कुछ दिनों के बाद बच्चे उड़ जाएँगे और अपनी अलग जिंदगी जीने लगेंगे। तब वे न तो अपनी माँ को पहचानेंगे और न माँ उन्हें पहचान सकेगी। एक स्त्री ने सृष्टि क्रम को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की और किस्सा खत्म हो गया।



बताते हैं कि आदमी के बच्चे का बचपन दुनिया के सभी जीवों में सबसे लंबा होता है। उसका गर्भस्थ जीवन भी सबसे लंबा होता है। इस पूरी अवधि में उसकी माँ को कठिन तपस्या करनी पड़ती है। उसका अपना जीवन स्थगित हो जाता है। आदमी का बच्चा ज्यादा देखरेख और सावधानी की भी माँग करता है। यह अधिकतर माँ के जिम्मे ही आता है, हालाँकि आजकल पति लोग भी कुछ सहयोग करने लगे हैं। जब संयुक्त परिवार का चलन था, तब माँ को कुछ प्रतिदान मिल जाता था। आजकल बड़ा होते ही बच्चे फुर्र से उड़ जाते हैं। वे एक ही शहर में रहते हैं, तब भी माँ -बाप से उनकी मुलाकात महीनों नहीं हो पाती। जिनके बच्चे परदेस चले जाते हैं, उनका बुढ़ापा निराश्रय और छायाहीन हो जाता है। ऐसी माँ को शुरू में भी कष्ट सहना होता है और बाद में भी। मातृत्व की इतनी बड़ी कीमत चुकाना क्या कुछ ज्यादा नहीं है? अन्य पशु-पक्षियों की तुलना में मानव माँ इतना त्याग क्यों करे? आँचल में दूध आंखों में पानी का पर्याय क्यों बने?



शायद इसीलिए पश्चिम की आधुनिक स्त्री मातृ्त्व की महिमा को ताक पर रख कर अपना जीवन जीने में कोताही नहीं करती। गर्भावस्था के आखिरी महीने ही उसकी गतिविधियों को सीमित करते हैं। गर्भ-मुक्त होते ही वह फिर पूर्ववत सक्रिय हो जाती है और बच्चे अकेले या बेबी सिटरों की निगरानी में पलते-बढ़ते हैं। बाद में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए खिलौने के ढेर, टेलीविजन और वीडियो गेम दे दिए जाते हैं। हमारे महानगरों में भी यह चलन शुरू हो गया है। स्त्रियाँ माता का पुराना लंबा रोल निभाना नहीं चाहतीं। यह कैसे तय किया जाए कि माँ की पुरानी भूमिका अच्छी थी या आज की भूमिका अच्छी है? पहली भूमिका में माँ का जीवन त्याग-तपस्या से भरा होता है और दूसरी भूमिका के कारण दुनिया में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जिन्होंने माँ -बाप का प्यार जाना ही नहीं। जाहिर है, जिसे प्यार नहीं मिला, वह प्यार दे भी नहीं सकता। क्या कोई और रास्ता भी है, जिसमें माँओं को अपना जीवन स्थगित न करना पड़े और बच्चों को भी भरपूर प्यार मिल सके?



- राजकिशोर



सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

प्रत्येक संबंध एक नाजुक खिलौना है

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रसांतर
प्रत्येक संबंध एक नाजुक खिलौना है



चाँद मुहम्मद की दूसरी पत्नी फिजा का छटपटाना, रोना-धोना और न्याय के लिए सबसे फरियाद करना जिसे प्रभावित न करे, उसका दिल बहुत कठोर हेगा। उन्हें तो हृदयहीनही मानना चाहिए जिनके लिए यह हास-परिहास और मनोरंजन का विषय है। टीवी वालों के लिए कोई भी मेलोड्रामा, उस पर विषाद की चाहे जितनी गहरी छाया हो, जश्न मनाने की चीज होती है। शायद ही कोई दूसरा पेशा हो जिसमें किसी का दुख किसी और का सुख बन जाता है। डॉक्टरी और वकीली को कुछ हद तक ऐसा कहा जा सकता है। सो हमारे समाचार चैनल फिजा की ट्रेजेडी को देश भर में इस तरह फैला रहे हैं मानो कोई इस घटना के किसी पहलू से अपरिचित रह गया, तो उसके जीवन में बहुत बड़ा शून्य आ जाएगा।



आज फिजा की जो मनोदशा है, वही मनोदशा कुछ महीने पहले चाँद मुहम्मद की पहली पत्नी सीमा की थी। यह भी कहा जा सकता है कि दूसरी पत्नी को जो मिल रहा था, पहली पत्नी उससे कहीं बहुत ज्यादा खो रही थी। चाँद मुहम्मद बनने के पहले चंद्रमोहन ने अपनी सारी संपत्ति पहली पत्नी सीमा के नाम कर दी, इससे कोई तसल्ली नहीं मिलती। चंद्रमोहन ने अपनी समझ से क्षतिपूर्ति या न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया था, पर जैसा कि बाइबल में कहा गया है, जिंदगी सिर्फ रोटी के सहारे नहीं चलती। रोटी तो अनुराधा बाली के पास भी थी, पर उसे चाँद चाहिए था। यह बात मीडिया संचालकों को नहीं पता हो, यह नहीं हो सकता। वे भी सिर्फ लंच और डिनर के सहारे जिंदगी नहीं काट रहे होंगे। लेकिन न तब अब सीमा की मनस्थिति के बारे में जानने की उत्सुकता किसी को थी और न अब है। जब सीमा का बहुत कुछ लुट रहा था, तो उसमें कुछ मजा नहीं था। अब, जब कि फिजा अपने लुटेहुएपन पर विलाप कर रही है, तो सभी को इसमें जानने की सामग्री मिल रही है। यही जीवन है। लेकिन क्या यही जीवन है?


बेशक, सीमा का हश्र एक ऐसी कठोर ट्रेजेडी है जिसमें कुछ भी नया नहीं है। जिनके मर्द उन्हें छोड़ कर चले गए हैं, ऐसी औरतों की संख्या हर साल बढ़ती जाती है। ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं कि किसी ने दूसरी स्त्री को विधिवत अपना बनाने के लिए धर्म परिवर्तन कर लिया हो और राजपाट को खतरे में डाल लिया हो। जब कोई पुरुष या स्त्री पहले विवाह के लिए ऐसा करता है या करती है, तब इसे त्याग और उत्सर्ग का महान उदाहरण माना जाता है। यह है भी। दूसरी स्त्री के लिए ऐसा करने में आदर्शवाद कम है, रोमांस ज्यादा। इसीलिए चाँद-फिजा की जोड़ी एक दिलचस्प खबर बन गई। उससे भी दिलचस्प खबर तब बनी जब चाँद मुहम्मद के जीवन में उतना ही बड़ा एक और मोड़ आया। सुहागरात के रंग अभी फीके भी नहीं पड़े थे कि वह अपनी महबूबा से बीवी बनी स्त्री को त्याग कर अचानक अदृश्य हो गया। फिजा के लिए यह एक मौका था कि वह अपनी परित्यक्त सह-पत्नी सीमा की वेदना से संवेदित होती। पर अपना दुख सभी को ज्यादा भारी लगता है। कोई कर्मफलवादी आस्तिक कहेगा कि बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय।



लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है। सीमा से चंद्रमोहन का संबंध वास्तविक ही रहा होगा, जैसे फिजा से चाँद मुहम्मद का संबंध वास्तविक था। पति-पत्नी के बीच दरार क्यों आई, हम नहीं जानते। चाँद मुहम्मद अपनी नवविवाहिता फिजा को छोड़ कर अचानक क्यों चलता बना, यह भी हम नहीं जानते। ये जानकारियाँ होने से मानव संबंधों के वितान के बारे में हमारा ज्ञान बढ़ता और युग्म जीवन की तमन्ना रखने वाले भावी स्त्री-पुरुष कुछ अधिक सावधान होते। लेकिन दो व्यक्तियों के बीच क्या चल रहा है या क्या घटित हुआ होगा, यह जानना हमारे अधिकारक्षेत्र के बाहर है। शायद यह सब जानने में हमें बहुत ज्यादा दिलचस्पी भी नहीं होनी चाहिए। शायद हम पूरा-पूरा जान भी नहीं सकते। शायद वे दोनों भी पूरी तरह नहीं समझते होते, क्योंकि आपस का मामला होने के साथ-साथ यह दो जनों का अपना-अपना मामला भी है। इसलिए ऐसे विषयों पर चर्चा करना कभी भी खतरे से खाली नहीं होता। इसीलिए इन पर बातचीत करते समय बहुत सावधान रहने की जरूरत है। भले ही इसके अनंत सामाजिक आयाम हों, पर अंतत: यह एक व्यक्तिगत ट्रेजेडी है।


इस सिलसिले में दो बातें बिलकुल स्पष्ट हैं। पहली बात यह है कि दो-दो स्त्रियों के साथ अन्याय हुआ है। पहली स्त्री के साथ हुए अन्याय में चाँद और फिजा, दोनों ही कुछ हद तक शामिल थे। फिजा के साथ हो रहे अन्याय में फिलहाल सिर्फ चाँद दोषी जान पड़ता है। लेकिन हो यह भी सकता है कि फिजा की किसी बात ने उसे यह ड्रास्टिक कदम लेने के लिए मजबूर कर दिया हो। दूसरी बात यह है कि इस पूरे काण्ड में जिस चीज की सबसे ज्यादा तौहीन हुई है, वह है धर्म। क्या चंद्रमोहन और अनुराधा बाली नाम के वास्ते हिन्दू थे? क्या चाँद और फिजा नाम के वास्ते मुसलमान बने? फिर तो हमें हिन्दू-मिसलमान होने का दावा छोड़ ही देना चाहिए। जिस धार्मिक पदाधिकारी ने दोनों को इस्लाम में दाखिल किया, उसकी गुनहगारी भी कुछ कम नहीं है। अब कोई धर्म-रक्षक मौलाना यह फतवा दे रहा है कि चाँद मुहम्मद का अपनी हिन्दू पत्नी के साथ दुबारा घर बसाना इस्लाम के उसूलों के खिलाफ है। लेकिन जब पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम का दुरुपयोग किया जा रहा था, तब किसी ने इस धूर्तता की निंदा नहीं की। यह कैसी धार्मिकता है जो अधर्म को बरदाश्त ही नहीं, प्रोत्साहित भी करती है?


तीन व्यक्तियों के इस नाटकीय घटनाक्रम के आईने में हमारी नजर एक स्थायी सत्य पर भी जानी चाहिए। यह विषादपूर्ण सत्य है मानव संबंधों की नाजुकता। प्रकृति में स्थायी संबंध बहुत कम होते हैं। सब कुछ नदी-नाव संबंध पर आधारित होता है। हमारे पुरखों ने मनुष्य और मनुष्य के बीच, खासकर नर-नारी के बीच, स्थायी संबंध की परिकल्पना की। इसके लिए कायदा-कानून बनाए। धर्म और ईश्वर को भी बीच में डाला। इस व्यवस्था में सबसे ज्यादा अन्याय स्त्री के साथ हुआ। उसकी पीठ पर सभ्यता को बनाए रखने का पूरा बोझ लाद दिया गया। इससे उसका अपना व्यक्तित्व तिरोहित होने लगा। परिणामस्वरूप पुरुष व्यक्तित्व में भी गंभीर विकृतियाँ आईं। इस बीच ऐसे बहुत-से विद्रोही स्त्री-पुरुष हुए जिन्होंने इस व्यवस्था का बंदी होने से इनकार कर दिया। आज, आर्थिक व्यवस्थाएं बदलने से, यह प्रक्रिया जोरों पर है।


इसके साथ ही स्त्री-पुरुष संबंधों की वास्तविकता भी सामने आ रही है। जब व्यक्ति पराधीन होते हैं, तब वे सच को नहीं जीते -- नाटक करते हैं। जब वे अचानक स्वाधीन हो जाते हैं, तो उनके व्यवहार में उच्छृंखलता आ जाती है। आज के समय में दोनों ही चीजें एक साथ देखी जा सकती हैं -- खासकर भारत जैसे समाजों में, जहाँ परंपरा की ताकतें बहुत कमजोर नहीं हुई हैं और आधुनिकता की शक्तियाँ बहुत मजबूत नहीं हो पाई हैं। भविष्य की अपेक्षाकृत संतुलित व्यवस्था में संबंध शायद ज्यादा टिकाऊ हों, पर तब भी यह बुनियादी सचाई अपनी जगह बनी रहेगी कि किसी भी संबंध को बनाए रखना हँसी-खेल नहीं है। यह एक ऐसा नाजुक खिलौना है जो जरा-सी ठेस लगते ही टुकड़े-टुकड़े हो सकता है।


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- राजकिशोर

(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में वरिष्ठ फेलो हैं)
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