Monday, December 15, 2008

यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!


एकालाप


'न' कहने की सज़ा
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- उन्होंने जोरों से घो
षणा की :
अब से तुम आजाद हो,
अपनी मर्जी की मालिक.
 
 
- मुझे लगा,
मैं अब अपने सारे निर्णय ख़ुद लूंगी,
इन देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना  पड़ेगा.
 
 
- मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी 
कि फ़रिश्ते आ गए. 
बोले-हमारे साथ चलो.
हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे.
 
 
- मैंने इनकार कर दिया.
मेरा अकेले उड़ने का मन था..
 
 
- फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए.
उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए.
गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई.
 
 
- सर्पविष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली 
और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन 
एक एक धमनी में समाती चली गई.
 
 
- मैं तड़प रही  हूँ.
फ़रिश्ते जश्न मना  रहे हैं - जीत का जश्न.
 
 
- जब जब वे मुझसे हारे हैं 
उन्होंने यही तो किया है.
 
 
- जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी ,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा,
तब तब या तो  मुझे 
आग के दरिया में कूदना पड़ा
या उन्होंने अपने अग्निदंश से
मुझे जीवित लाश बना दिया.
 
 
- जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा
तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा
या महाभारत रचाना पड़ा.
 
 
- मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे 
कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे
कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी
कितनी बार....
कितनी बार...
 
 
- पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है
घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में ;
और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक 'ना' 
तो वे सारी नफरत 
सारा तेजाब 
उलट देते हैं मेरे मुँह पर . 
 
 
- मैं अब नरक में हूँ
अन्धकार और यातना के नरक में . 
 
 
- अब मुझे नींद नहीं आती
आते हैं जागती आँखों डरावने सपने.
नहीं,
उड़ान के सपने नहीं,
आग के सपने 
तेजाब के सपने 
साँपों  के सपने
यातनागृहों के सपने
वैतरणी के सपने .. 
 
 
- यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!


-ऋषभ देव शर्मा



5 comments:

  1. I HAVE NO WORD TO WRITE COMMENT. NARAYAN NARAYAN

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  2. बहुत जबर्दस्त ! स्त्री को पूरी स्वतंत्रता है, बस ना नहीं कहे तब तक !
    घुघूती बासूती

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  3. अच्छी कविता। इन पंक्तियों में जो गुस्सा, जो क्षोभ, जो आक्रोश झलकता है, वो यकीनन सदियों की घुटन का नतीजा है।

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  4. रिषभ जी की यह कविता मार्मिक , यथार्थ पर आधृत और एकालाप शैली में लिखित है । कवि बधाई के पात्र हैं ।खेद है कि मैं इसे पहले न पढ़ सका ।

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आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

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