Tuesday, March 17, 2009

पीड़ा और शिकायत भी

एकालाप



बनाया था माँ ने वह चूल्हा




चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर
दिशा अदल - बदल कर.



उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.



गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से .


बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.


सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
- फूले फूले फुलके.



गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर.


जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.


आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है.
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.



माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.


बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.



माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.


रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है.
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है .



मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.


-
ऋषभ देव शर्मा



8 comments:

  1. अद्भुत रचना...इस पर कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं दी जा सकती सिर्फ पढ़ कर कुछ पल मौन ही रहा जा सकता है...ऐसी विलक्षण रचना पढ़वाने के लिए आपको कोटिश धन्यवाद...
    नीरज

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  2. सचमुच कोई प्रतिक्रिया इसे छोटा कर देगी...अद्भुत !!!!

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  3. बहुत मार्मिक और जीवंत कविता जो पाठक को अतीत की ओर झांकने को मजबूर कर देती है। उपले और ज़ेवर का सुंदर संतुलन- बधाई सर जी!!!

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  4. वाह ...बहुत ही प्यारी रचना ......एकदम स्मृतियों में डूबा देने वाली. बहुत बधाई

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  5. कविता अच्छी है पर विवरण कुछ ज़ियादा हैं । इसे कुछ संपादित किया जाना चाहिये । हिंदी में चूल्हे पर बहुत अच्छी कवितायें लिखी गई हैं , यह भी उस परम्परा को आगे बढ़ाती है ।

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  6. कविता अच्छी है पर विवरण कुछ ज़ियादा हैं । इसे कुछ संपादित किया जाना चाहिये । हिंदी में चूल्हे पर बहुत अच्छी कवितायें लिखी गई हैं , यह भी उस परम्परा को आगे बढ़ाती है ।

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  7. लगता है,पूरी कविता लिखी नहीं -किसी रेशमी रुमाल पर मँा की संवेदनाएँ आप ही आप कढ़ गई । बहुत सुंदर!

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आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

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