Tuesday, June 2, 2009

इतिहास हंता मैं

एकालाप







इतिहास हंता मैं


मैं घर से निकल आई थी
तुम्हें पाने को ,
मैंने धरम की दीवार गिराई थी
तुम्हें पाने को,
अपने पिता से आँख मिलाई थी -
भाई से ज़बान लड़ाई थी -
तुम्हें पाने को!




माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई ,
पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया;
मैंने मुड़ कर नहीं देखा.
मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी -
तुम्हें पाने को!




तुमने मुझे नया नाम दिया -
मैंने स्वीकार किया ,
तुमने मुझे नया मज़हब दिया -
मैंने अंगीकार किया.
वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे
जितना मेरा जला हुआ अतीत.
मैंने प्रतिकार नहीं किया था .
तुम जैसे भी थे,जो भी थे -
बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे.
मैं भागी चली आई थी
तुम्हें पाने को ;




और सो गई थी
थककर चकनाचूर.




आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी ,
तुम हिजाब कहकर
मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे.




तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर -
ये तो मेरे पिता की आँखें हैं!
मैं देखती ही रह गई ;
तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया!




एक बार फिर
सब कुछ जलाना होगा -
मुझे
खुद को पाने को!!


- ऋषभदेव शर्मा



5 comments:

  1. मै आँखें फाड देखती रही
    ये तो मेरे पिता की आँखें है
    पुरुषप्रधानता का एकदम सही चित्रण और स्त्री की एककोणीय भावुकता का भी ।

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  2. रचना में गहरे भाव हैं।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  3. कविता में यथार्थ बहुत ही सुंदर रीति से अभिव्यक्त हुआ है। सचाई को इस तरह अभिव्यक्त कर देना आसान नहीं होता।

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  4. दिल को बहुत गहरे छूकर झकझोर दिया आपकी इस रचना ने....बहुत बहुत आभार इस सुन्दर रचना हेतु...

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आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।अग्रिम आभार जैसे शब्द कहकर भी आपकी सदाशयता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।आपकी इन प्रतिक्रियाओं की सार्थकता बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि संयतभाषा व शालीनता को न छोड़ें.

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