शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

मर्दिता

8 टिप्पणियाँ
एकालाप

मर्दिता


बहुत मार खाई मैंने
तुम्हारे लिए ,
तुम्हारे प्यार के लिए.


मैंने सपने देखे ,
तुम्हें अपना माना
और बहुत मार खाई
पिता के हाथों,
समाज के हाथों भी :

भला यह भी कोई बात हुई
कि औरत सपने देखे
कि औरत प्यार करे
कि औरत इज़हार करे!


मेरा अंग अंग रोता रहा
एक स्पर्श के लिए
और तुम
रौंदते रहे मुझे
मिट्टी समझकर.


बहुत मार खाई मैंने
तुम्हारे लिए,
तुम्हारे हाथों!

- ऋषभ देव शर्मा



मंगलवार, 17 नवंबर 2009

पुरुष विमर्श - २

4 टिप्पणियाँ
26/05 /2008 से प्रारम्भ हुए पाक्षिक `एकालाप '  स्तम्भ के २००९ - नवम्बर ( प्रथम ) अंक  में पुरुष-विमर्श शीर्षक से प्रकाशित कविता के क्रम में इस बार प्रस्तुत है उसका दूसरा भाग   -



पुरुष विमर्श - २ 
ऋषभदेव शर्मा 


ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद 
सपनों पर पहरे बिठलाए |
भाई! तेरा भी धन्यवाद 
तुम दूध छीन कर इठलाए ||
           संदेहों की शरशय्या दी 
           पतिदेव! आपका धन्यवाद ;
बेटे! तुमको भी धन्यवाद 
आरोप-दोष चुन-चुन लाए ||



मैं आज शिखर पर खड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
तुमसब के कद से बड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
           कलकल छलछल बहती सरिता 
           जम गई अहल्या-शिला हुई;
मन की कोमलता कड़ी हुई 
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!




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